मीडिया में एंट्री के लिए पहली बात क्या सीखें...खुशदीप

 


फेसबुक पर Fun Conversation के तहत हालिया पोस्ट में पूछा था न्यूज़ के मायने क्याइसी कड़ी के तहत एक और सवाल किया, किसी युवा को मीडिया में एंट्री के लिए वो क्या बात है जो उसे सबसे पहले आनी चाहिए?


 न्यूज़ के मायने वाली पोस्ट की तरह ही कुछ क्लासिक जवाब इस पोस्ट पर भी आए और कुछ मौज लेने वाले भी. किसी ने मीडिया में एंट्री के लिए आवश्यक बात का एक शब्द में जवाब दिया तो किसी ने विस्तृत. कुल मिलाकर संवाद बहुत रोचक रहा.


पहले आपको मौज वाला जवाब बताता हूं. मेरे ब्लॉगर साथी और शेयर बाज़ार के मास्टर विवेक रस्तोगी ने इसका जवाब दिया- सैटिंग’. 


इसके बाद आता हूं- शॉर्ट में किसने जवाब दिया कि मीडिया में एंट्री के लिए सबसे आवश्यक क्या है.


महफ़ूज़ अली- पढ़ना-लिखना

विकास दीक्षित- जिज्ञासा

पूजा दुबे- सर में मीडिया में नहीं आना चाहती। पर इसका जवाब मुझे लगता है वाकपटुता

सैयद एम मासूम- ड्राफ्टिंग

अल्पयु सिंह-  सवाल पूछना

सलीम अहमद- कॉन्फिडेंस (विश्वास)

मोहिनी भंडारी- विश्वास होना चाहिए कि हम जो बता रहे हैं, वो ही सही है

चंद्र मोहन गुप्ता- किसी भी घटना/ बात को निष्पक्षता से समझने और उसे उसकी मेरिट अनुसार प्रजेंट करने की क्षमता

मुनीष सूद- ख़बर वाली नाक

ऋषभ देव सिंह- पाठन और लेखन में अभ्यस्तता के साथ निष्पक्ष और निर्भीक होना चाहिए

सुनील हंचोरिया- समझना ओर सीखना !

एसकेबी शशांक- ग्राफिक्स/एडिटिंग/एनीमेशन/मॉडलिंग


अब आते हैं, इस सवाल के थोड़े विस्तार वाले जवाबों पर-


सागर राजावत

मीडिया में एंट्री करने के लिए आपको भाषा का ज्ञान और लिखने की कला आना बेहद जरूरी है आप मीडिया के किसी भी रूप में काम करें चाहे वो प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक हर जगह आपकी लेखन शैली को देखा जाएगा.

 

सलीम अख़्तर सिद्दीकी

सिलेबस के अलावा पढ़ना. हर तरह का कंटेंट पढ़ना. अखबार का संपादकीय पेज, वेबसाइट हर तरह के लेख. रिपोर्ट्स और विश्लेषण आदि.

एक अच्छा पाठक ही अच्छा लेखक होता है.


संगीता अस्थाना

धैर्य, संवेदनशीलता, वाकपटुता,जोश, सहजता स्वभाव में तथा सरल से कठिन की ओर एवं सूक्ष्म से स्थूल की ओर चलना होगा

 

मधुलेश पांडेय

सरल भाषा में सही चीज आज कल कोई नहीं चाहता, सबको मिर्च मसाले वाली खबरें चाहिए , मौजूदा हालात में ऐसे ही हलवाई की जरूरत है जो अपने आकाओं के अनुरूप ख़बर छाप सकें.


राष्ट्रीय जजमेंट न्यूज़

अगर कोई वास्तव में पत्रकारिता करना चाहता है तो-

1

सर्वप्रथम वह खुद को दृढ़ संकल्पित करे कि वह ईमानदारी के साथ और कर्तव्यनिष्ठ होकर समाज में सत्य को कायम रखेगा व पीड़ित जनता की आवाज बनेगा.

2

पत्रकार अपनी भाषाशैली को ध्यान में रखते हुए मर्यादित होकर कार्य करना होगा । क्योंकि वह सिर्फ भाषा नही बल्कि राष्ट्र के लिए जनता का एक संदेश होता है.

3

चापलूसी और स्वार्थ त्यागने होंगे.

4

पत्रकार को किसी एजेंडे पर काम नही करना है.

इन विशेषताओं को परिपूर्ण ढंग से निभाने वाला ही असली पत्रकार बन पाएगा.

ऐसा करना आज के समय में मुश्किल है पर चीजे मुश्किल हो इसका मतलब ये तो नही कि उनको सही करने का प्रयास ही न किया जाए.

 

कुणाल विक्रम

सर मेरे विचार से मीडिया में एंट्री के लिए आपको दो बातों का ज्ञान जरूरी है:

1.क्या नहीं बोलना और लिखना है, और

2.कब आपको नहीं बोलना है।


पुष्पेश गर्ग

सर

मीडिया अब काफी बदल गया है.

आपने जब शुरू किया और हाल के वर्षों तक इस क्षेत्र में ज्ञान /मेहनत और सच्चाई की प्रधानता रही

नए पत्रकारों की भर्ती हो या पुराने पत्रकारों का सम्मान

उनके ज्ञान / कौशल पर होता था,

लैंगिक असामनता नहीं थी.

आज हालात बिल्कुल विपरीत हैं, आज ज्ञान कि जगह google और मेहनत की जगह जी-हुजूरी और लैंगिक असमानता ने ले ली है.

अगर आप सिर्फ ज्ञान/ मेहनत और सच्चाई के जरिए आज के पत्रकारिता में मुकाम बनाना चाहते हैं , तो डगर काफी कठिन है.

दिन - ब- दिन मीडिया हाउसेस एक बॉलीवुड वाली नकली दुनिया में समाते जा रहे हैं .

हर कोई नकली सा लगता है , मुंह पर कोई और और पीठ पीछे कोई और.

निष्पक्षता अब सिर्फ वाक्यों/पोस्टरों पर रह गईं है, हक़ीक़त इतनी खौफ़नाक है कि हम आप उसे बर्दाश्त ना कर पाएं.

ये मेरे अनुभव है ... हो सकता है मैं पूरी तरह सही नहीं हूं, लेकिन पूरी तरह गलत भी नहीं ..!

 

यहां मैंने हस्तक्षेप करते हुए पुष्पेश के लिए कमेंट किया- आप अपने अंदर की शक्ति पहचानो, उस पर भरोसा रखो, देर सबेर वही शक्ति जीतेगी...हमने जब शुरू किया तो भी कोई 'सतयुग' नहीं था...


सुरेश शर्मा

सबसे पहले खुद को समझना, मेरी जानकारी और मे कहाँ तक सही हूँ जो सही बात अपने से बडे संपादक जी के समक्ष रख पाऊँ ? बाकी भाई जी मेरा इस विषय मे हाथ छोडो सब कुछ कमजोर है पर खुशी यह है सभी फेसबुक मित्रों के माध्यम से कुछ सीख भी लेंगे.

ऊपर लिखे सारे जवाब सही हैं और कुछ न कुछ मायने लिए हैं. मुझे खुशी है कि इतनी बड़ी संख्या में लोग मीडिया से जुड़े एक बुनियादी और प्रारंभिक विमर्श को आगे बढ़ाने के लिए आगे आए और मेरे इस प्रयास को सार्थकता देने में मेरी मदद की. ष ले ें कुल मिलाकर संवाद बहुत रोचक रहा.

अब मेरी बात

मीडिया में भविष्य देखने वाले युवा साथी ऊपर लिखे हर मायने को गंभीरता के साथ पढ़ें. ये प्रैक्टिकल जीवन में उनके बहुत काम आएगा. लेकिन मैं अपने अनुभव के आधार पर युवा साथियों से एक और बात कहना चाहूंगा.

वो ये है कि आप जिस दिन से भी ये सोचें कि आपको पत्रकारिता में जाना है तो एक काम अवश्य करिएगा. वो है टाइपिंग सीखना. आप किसी भी मीडिया संस्थान में नौकरी करने जाएंगे तो आपका स्पीड के साथ त्रुटिरहित टाइपिंग करना बहुत काम आएगा. वहां मोबाइल वाली टाइपिंग से काम नहीं चलेगा. आपको रैमिंग्टन या फोनेटिक टाइपिंग आनी ही चाहिए. इससे आपका शुरू से ही बहुत विश्वास बढ़ेगा. 

मैंने देखा है कि कुछ इंटर्न वर्कप्लेस पर आकर पहले कुछ हफ्ते टाइपिंग सीखने और स्पीड बढ़ाने में ही लगा देते हैं. अगर ये आपको पहले से ही आता है तो आप वर्कप्लेस पर अपने समय का सदुपयोग और ज़रूरी चीज़ें सीखने में लगा सकेंगे और आपका आत्मविश्वास भी अधिक रहेगा.

दूसरी बात एक और कहना चाहूंगा कि आप हिन्दी पत्रकारिता में भी आना चाह रहे हैं तो अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद की दक्षता आपके काम को आसान कर देगी. हिन्दी अख़बार हो या न्यूज़ चैनल या डिजिटल पत्रकारिता वहां जगह जगह अनुवाद की ज़रूरत पड़ती है. इसलिए इसमें जितना पारंगत हो जाएंगे, उतना ही फायदे में रहेंगे. ये मैं अपने प्रैक्टिकल अनुभव के आधार पर कह रहा हूं.


(खुश😊हेल्पलाइन को मेरी उम्मीद से कहीं ज़्यादा अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है. आप भी मिशन से जुड़ना चाहते हैं और मुझसे अपने दिल की बात करना चाहते हैं तो इस ब्लॉग के दाएं सबसे ऊपर दी गई विंडो को क्लिक कर फॉर्म भर दीजिए)


 

 

मीडिया में भविष्य देख रहे साथी मिशन से ऐसे जुड़ें...खुशदीप

आज से करीब 43 साल पहले अमिताभ बच्चन की फिल्म डॉन रिलीज हुई थी. उसी फिल्म में अनजान के लिखे इस गाने को किशोर कुमार और लता मंगेशकर ने आवाज़ दी थी और कल्याणजी आनंदजी ने संगीतबद्ध किया था.



जिसका मुझे था इंतज़ार
जिसके लिए दिल था बेक़रार
वो घड़ी आ गई, आ गई
आज प्यार में हद से गुज़र जाना है
मार देना है तुझको या मर जाना है...


वाकई मीडिया में भविष्य देख रहे युवा साथियों की मदद का जो मिशन (How to become a good journalist) मैंने चुना है, उसके प्यार में हद से गुज़र जाना है. लेकिन मार देना है तुझको या मर जाना हैवाली लाइन का कुछ और मतलब नहीं निकालिएगा. इसके मायने हैं युद्धस्तर पर मिशन को अंजाम देना.जितनी मेहनत मैं करने को तैयार हूं, उतनी ही मेहनत मुझसे जुड़ने वाले साथियों को भी करनी होगी.


अब बात करते हैं उस घड़ी की जिसका मुझे इंतज़ार था. उम्मीद करता हूं कि आपको भी होगा. अब आपको अपनी बात मुझ तक पहुंचानी है और मुझे आप तक अपनी बात. क्योंकि सॉफ्टवेयर डेवेलप होने में टाइम लगता है. लेकिन मैं अब आपकी बात सुनने के लिए बेताब हूं. सॉफ्टवेयर तैयार होता रहेगा. तब तक के लिए एक वैकल्पिक रास्ता ढूंढा है. मेरे ब्लॉग देशनामा पर आप जाएंगे तो सबसे ऊपर आपको Khush😊Helpline की एक विंडो दिखेगी. इसे क्लिक करिए. यहां आपको एक फॉर्म के जरिए नीचे लिखी जानकारी देनी होगी. 


Name of candidate*/ अभ्यर्थी का नाम:  


E-Mail / ई-मेल:         


Phone*/फोन:


Address*/पता:


Share your problem, we will get back to you ASAP*/ अपनी समस्या बताएं, शीघ्र ही हम आपसे संपर्क करेंगे:


आप इस फॉर्म को हिन्दी या अंग्रेज़ी किसी भी भाषा में भर सकते हैं. अपनी समस्या कहने वाला कॉलम बहुत सावधानी से भरिएगा. बेशक टाइम लेकर पहले इसे वर्ल्ड या नोटपैड पर टाइप कर लें फिर फॉर्म में पेस्ट कर दीजिएगा. फॉर्म भरने में जल्दबाज़ी या हड़़बड़ी मत कीजिएगा. न मैं कहीं भागा जा रहा हूं और न ही आप. शब्द-सीमा का ज़रूर ध्यान रखें.500 शब्द अधिकतम होने चाहिए. ये इसलिए भी ज़रूरी है कि आपको कम से कम शब्दों में सटीकता से खुद को व्यक्त करना आना चाहिए. मीडिया में ये बहुत ज़रूरी है. आप टीवी के नीचे जो टिकर देखते हैं वहां, एक या दो लाइन में पूरी न्यूज़ को समझा देने को मैं सबसे बड़ा हुनर मानता हूं. टीवी न्यूज़ की दुनिया में मैंने भी सबसे पहले टिकर से ही शुरुआत की थी.


अपनी बात रखने वाले कॉलम के आखिर में अगर आपके सोशल मीडिया हैंडल्स (फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग) हैं तो उनके लिंक ज़रूर दें. इससे मुझे फॉलोअप करने में आसानी रहेगी. उदाहरण के तौर पर मेरे सोशल मीडिया लिंक्स नीचे दिए हैं. 


मेरा फेसबुक लिंक

https://www.facebook.com/khushdeepsehgal/

मेरा ट्विटर लिंक

https://twitter.com/deshnama

मेरा ब्लॉग लिंक

www.deshnama.com


एक बात और मैं अपनी ओर से मिशन से जुड़ने वाले किसी भी साथी की पहचान सार्वजनिक नहीं करूंगा.

अच्छा ये तो हो गया आपका अपनी बात रखना. अब मैं आपसे कैसे संपर्क बनाए रखूंगाइसके लिए दो तीन बातें साफ़ करना चाहता हूं जिससे कि आपको आगे चलकर ये न लगे कि मैं तुरंत रिस्पॉन्स नहीं दे रहा हूं. इसकी पहली वजह है कि मैं अकेला हूं. मेरे साथ अभी कोई टीम नहीं है, ऊपर वाले ने चाहा तो शीघ्र ही ये सब भी हो जाएगा. अभी तो सीमित संसाधन में जितना मुझसे बन पड़ेगा, यकीन मानिए वो सब करूंगा. मंशा साफ़ है इसलिए मन में विश्वास है कि आज नेक़ नीयत से लगाया जा रहा ये पौधा एक दिन ज़रूर फलदार पेड़ बनेगा.


अब आपको मेरा साथ देने के लिए कुछ बातों का ध्यान देना होगा-


आपकी बात मेरे तक पहुंच जाने के बाद मैं अपने तरीकों से आपसे संपर्क करूंगा. बस आपको थोड़ा धैर्य दिखाना होगा. मैं हर साथी की बात का जवाब दूंगा. यथाशक्ति उसकी जिज्ञासा शांत करने की कोशिश करूंगा. लेकिन इसमें टाइम लग सकता है. शनिवार और रविवार को मैं पूरी तरह इसी मिशन के लिए समर्पित रखूंगा.

पत्रकारिता, क्रिएटिव राइटिंग और ब्लॉगिंग मेरा कार्यक्षेत्र रहा है, इस पर जो मुझे अनुभव के आधार पर जानकारी  है वो आपसे शेयर करूंगा. लेकिन मीडिया में सिर्फ कॉपीराइटिंग ही नहीं होता और भी बहुत कुछ होता है जैसे कि एंकरिंग, एडिटिंग, ग्राफिक्स, डिजाइनिंग, प्रोडक्शन, सोशल मीडिया, यूट्यूब चैनल आदि. जिस विषय के बारे में मैं नहीं जानता उन पर विशेषज्ञ दोस्त मीडियाकर्मियों से जवाब दिलाने का प्रयत्न करूंगा.


जहां कुछ कर नहीं पाने की संभावना होगी, आपको साफ़ बता दूंगा, अंधेरे में नहीं लटकाए रखूंगा.


आप फेसबुक पर मैसेंजर में तभी कोई मैसेज मुझे करें जब आपको कोई बहुत अर्जेंट बात कहनी हो. मिशन पर फोकस की वजह से हेलो, हाय जैसे सामान्य शिष्टाचार वार्तालाप में समय व्यर्थ न हो, इसमें मेरा सहयोग कीजिएगा. मैं जानता हूं कि आप सबकी शुभकामनाएं हमेशा मेरे साथ हैं. आप सब मेरे दिल में रहेंगे, आप मुझे अपने दिल में रखेंगे या नहीं, ये आप पर छोड़ता हूं. 


आखिरी और सबसे अहम बात, कोई मुझसे ये उम्मीद हर्गिज़ हर्गिज़ न करे कि मैं किसी के लिए कहीं कोई जॉब या अन्य तरह की सिफ़ारिश करूंगा. अगर कोई ऐसा सोच रहा है तो मैं उससे अभी माफ़ी मांगता हूं कि वो मेरे से जुड़ कर अपना समय ख़राब न करे. क्योंकि मेरा मानना है कि खुद को कुंदन की तरह तपा कर इतना मज़बूत कर लेना चाहिए कि कोई जॉब देने से इनकार ही न कर सके.


ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,

ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है...


शेर पुराना है, लेकिन यहां मेरे साथियों के लिए इससे ज़्यादा फिट और कुछ नहीं बैठता...


आख़िर में मैं अपने भाई शाहनवाज़ का दिल से शुक्रिया करना चाहूंगा, जिसने दिन-रात मेरे इस मिशन के लिए वैकल्पिक सिस्टम तैयार करने में मदद की. इस वजह से ही मैं एक अगस्त की तारीख को वादे के मुताबिक मिशन से जुड़ने के तरीके को आपके सामने पेश कर सका. 


न्यूज़ मायने क्या? दाल में तड़का या तड़के में दाल...खुशदीप


 




29 जुलाई 2021 को आज मैंने फेसबुक पर एक प्रयोग किया. मीडिया में भविष्य देखने वाले युवा मेरे मिशन के साथ जुड़ रहे हैं. ये मुझे फ्रेंड रिक्वेस्ट की बाढ़ से पता चल रहा है.

मैंने उनसे एक सवाल किया कि NEWS के मायने क्या. ये सवाल सिर्फ इन युवाओं तक ही सीमित नहीं था. ये सबके लिए ओपन था. जो दिल से खुद को युवा समझते हैं, वो भी इसका जवाब दे सकते थे.

ये सब कुछ फन की तरह था, इसमें फॉर्मल क्लास जैसी कोई बंदिश नहीं. हर कोई खुल कर अपनी बात रख सकता था.

फेसबुक की इस पोस्ट पर भी आता हूं. अगर प्योर थ्योरी के हिसाब से जाएंगे तो न्यूज़ के बहुत सारे मायने मिल जाएंगे. लेकिन मेरा मकसद थ्योरी नहीं है, कभी रहेगा भी नहीं. मेरी कोशिश प्रैक्टीकल नॉलेज बांटने की है. न्यूज़ की परिभाषा आपको पत्रकारिता से जुड़ी किसी भी किताब में मिल जाएगी. या एक मिसाल देता हूं विश्व के नामी संस्थान ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (बीबीसी) के लिए न्यूज़ मिशन के मायने क्या है, दो लाइन में-

जनहित में काम करना, सभी तरह की ऑडियंस को, बिना किसी की तरफ़दारी किए हाई-क्वालिटी  खास आउटपुट और सेवाएं देना जो उन्हें सूचना या जानकारी दे सके, शिक्षित कर सके और उनका मनोरंजन कर सके.

यानि इस काम में वेटेज भी इसी क्रम में था-

1.   सूचित करना (To inform)

2.    शिक्षित करना (To educate)

3.     मनोरंजन करना (To entertain)

 मनोरंजन तीसरे नंबर पर था लेकिन आज हम न्यूज़ की अपने देश में स्थिति देखें तो वही सबसे पहले नज़र आता है. ऐसा भी वक्त रहा कि तीन C’  को ही TRP खींचू न्यूज़ का पर्याय माना जाने लगा-  3 ‘C’  यानि- Crime, Cinema, Cricket.

 दाल में तड़का या तड़के में दाल?

सीधे साधे शब्दों में इन्फॉर्म करने, एडुकेट करने और एंटरटेन करने की जगह न्यूज़ को तड़का लगाए जाने लगा. अब वो तड़का कैसे लगाया जाता है मैं बताने की ज़रूरत नहीं समझता, आप सब जानते हैं.

 इसे ऐसे समझिए कि सादी दाल वैसे स्वास्थ्य के लिए सबसे उत्तम होती है. लेकिन उसमें मसाले और घी का थोड़ा सा छोंक या तड़का लगा दिया जाए तो उसमें स्वाद भी आ जाता है. यहां थोड़े से पर मेरा ज़ोर है क्योंकि उससे दाल के पौष्टिक गुण कुछ हद तक बरकरार रहेंगे. लेकिन अब आप ऐसे समझिए कि दाल में तड़के की जगह तड़के में दाल लगानी शुरू कर दी जाए तो क्या होगा. पौष्टिक गुण तो दूर स्वास्थ्य ही ख़राब होना शुरू हो जाएगा.

अब आता हूं फेसबुक पर किए अपने प्रयोग पर...सबसे ये जानने के लिए कि उनकी नज़र में न्यूज़ के मायने क्या है. इस लिंक पर जाकर आप वहां आए सारे कमेंट्स को पढ़ सकते हैं. बिना किसी फॉर्मेल्टी का पालन किए मज़ेदार संवाद हुआ. किसी ने न्यूज़ की प्रचलित परिभाषा बताई, किसी ने स्टैंडर्ड मीनिंग की तरह NEWS-  NORTH, EAST, WEST,SOUTH बताया. किसी ने 2000 के नोट में चिप’  का हवाला देते हुए मौज भी ली.

अगर प्रैक्टिकली न्यूज़ की ज़रूरत को देखा जाए तो एक इनसान के मनोवैज्ञानिक तौर पर स्वभाव को समझिए. सबसे पहले उसे अपनी चिंता होती है, फिर परिवार के बाकी सदस्यों की, इसके बाद दोस्तों-अन्य रिश्तेदारों का नंबर आता है. इन सबकी कुशलक्षेम की वो जानकारी रखता है. इसके बाद वो अपने गली-मुहल्ले और शहर के घटनाक्रम को जानना चाहता है. क्योंकि इससे उसका जीवन सीधे तौर पर जुड़ा होता है. फिर उसके लिए ज़िला, प्रदेश, देश, दुनिया की घटनाओं का नंबर आता है. यहां भी उसके जीवन को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाली घटनाएं उसकी प्राथमिकता होती है. इसे कोरोनावायरस से जुड़ी महामारी से समझिए. सेकेंड वेव, थर्ड वेव अगर किसी दूसरे देश में भारत से पहले आ रही है तो उससे जुड़ी हर जानकारी पर हमारी नज़र रहेगी. क्योंकि आगे चल कर वो हमें भी प्रभावित करने वाली हैं.

कुल मिलाकर इनसान को सीधे अपने से जुड़ी जानकारियां जानने में सबसे ज़्यादा दिलचस्पी है. इसीलिए अब न्यूज़ का मिज़ाज भी बदल रहा है. अखबार या टीवी पाठकों या दर्शकों को जो ख़बर परोसता है, वहीं उन्हें पढ़ना और देखना-सुनना पड़ता है. लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म ने ये सब कुछ बदल दिया है. अब पाठक या दर्शक अपनी पसंद के अनुसार जो पढ़ना, देखना-सुनना चाहता है वो इंटरनेट पर सब मौजूद है. वो बस अपनी उंगलियों की थोड़ी जुम्बिश से ही अपने मनमाफिक कंटेंट पर पहुंच जाता है. अब उस पर ऐसी बंदिश नहीं है कि उसे जो पढ़ाया जाएगा, दिखाया-सुनाया जाएगा, वही वो देखने को मजबूर होगा. स्मार्टफोन्स, ऐप्स ने पाठक या दर्शक के लिए सब कुछ आसान कर दिया है. यही वजह है कि न्यूज़ का डिजिटल फॉर्मेट जिस तरह दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है, वो कोई और पारम्परिक फॉर्मेट (अखबार, रेडियो, टीवी) नहीं. एडवरटाइजिंग का भी अब सबसे ज्यादा शेयर डिजिटल को ही जा रहा है.

अब आता हूं मेरे लिए न्यूज़ के मायने क्या?

हमारे देश में राजनीति को न्यूज़ का पर्याय माना जाता है. लेकिन मेरी सोच इससे इतर है. इतना ज़रूर है कि प्रदेश-देश में सरकारें कोई अहम फैसला लेती हैं, या चुनाव से जुड़ी ख़बरें तो उसे जानने में आम लोगों की दिलचस्पी होती है क्योंकि वो सीधे तौर पर उनके जीवन से जुड़ी होती हैं. वो ख़बर जितनी पहले ब्रेक होगी, उतना ही उस न्यूज़ देने वाले संस्थान को फायदा होगा. यही बात राजनीतिक दलों और उनसे जुड़े अहम नेताओं के बयानों या इन नेताओं के जीवन से जुड़ी घटनाओं के लिए कही जा सकती है.

लेकिन अगर एक जैसे ही बयान रिपीट किए जाने लगें तो पाठक-दर्शकों की उसमें अधिक दिलचस्पी नहीं रहती. किसी नेता या पार्टी ने नया क्या कहा? अगर कुछ विवादित कहा तो उसके कहने ही क्या?

तो यहां से निकलते हैं NEWS के असल मायने जो इस शब्द के अंदर ही छुपे  हैं. NEWs यानि जो नया है वही ख़बर है. उस जैसा ही पहले हो चुका है तो वो पाठक या दर्शक को इतना अपील नहीं करेगा. मेनस्ट्रीम मीडिया में मैं जिस संस्थान से रिटायर हुआ वहां मैंने ऑफबीट स्टोरीज़ पर सबसे ज़्यादा फोकस किया. ऐसी स्टोरीज को ही दुनिया भर में चुनने पर मेरा ज़ोर रहता था जो यूनीक हों, जिनमें ऐसा कोई पहलू हो जो पहले कभी नहीं हुआ हो. जो पाठक या दर्शक की आंखें चौड़ी करने को मजबूर करे. 

यहां मैं आपको इसी साल जून में अमेरिका में हुई एक घटना का उदाहरण देकर बताता हूं. मैसाच्युसेट्स के रहने वाले 56 साल के माइकल पैकर्ड जानेमाने गोताखोर हैं. पिछले 40 साल से माइकल जीवों को समुद्र से पकड़कर मार्केट में बेचते हैं. एक सुबह इसी काम के लिए माइकल समुद्र में 35 फीट की गहराई तक गए. तभी उन्हें अचानक लगा कि उनकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया है. वो हिल भी नहीं पा रहे थे. उन्हें लगा कि मौत अब कुछ ही लम्हे दूर है. उन्होंने परिवार के सदस्यों को याद करना शुरू कर दिया. तभी एक झटके से वो रोशनी में आ गए और फिर उन्होंने ऊपर की ओर तैरना शुरू कर दिया. दरअसल माइकल एक व्हेल के मुंह में 30 सेकेंड बिता कर बाहर समुद्र में आए थे. व्हेल ने पानी के साथ माइकल को बड़े वेग से मुंह से बाहर उगला था. व्हेल का मुंह बहुत चौड़ा होता है और गर्दन संकरी. वहां से किसी मानव का व्हेल के अंदर जाना संभव नहीं होता.

इस न्यूज़ का उदाहरण देने का मकसद सिर्फ यही है कि विश्व में हमने अपने जीवनकाल में इस तरह की घटना पहले कभी नहीं सुनी थी कि एक इनसान व्हेल के मुंह में जाकर सुरक्षित वापस आ गया. अब इस न्यूज़ में यह नया फैक्टर ही इसे विलक्षण बना देता है. दुनिया का चाहे कोई भी कोना हो, वहां रहने वाले इनसान को ये न्यूज़ अचंभित करेगी. यही इसकी सबसे बड़ी न्यूज़ वैल्यू है. कहने का मतलब है कि अगर दुनिया में कहीं भी कुछ अलग घट रहा है तो बाक़ी दुनिया के लोगों की भी उसे जानने में दिलचस्पी रहेगी.

 इसलिए न्यूज़ या NEWS  मतलब जो नया है वही असली मायने में ख़बर है.

(मेरी फेसबुक पोस्ट पर मेरी सोच से मैच खाते न्यूज़ के नवीनता फैक्टर को ऊपर रखते हुए सागर राजावत, भारत भूषण, काजल कुमार और महफूज़ अली ने कमेंट किए.)   

जो बात कहते डरते हैं सब, तू वह बात लिख!...खुशदीप

 


जो बात कहते डरते हैं सब, तू वह बात लिख,

इतनी अंधेरी थी न कभी पहले रात लिख...

जिनसे क़सीदे लिखे थे, वह फेंक दे क़लम,

फिर खून-ए-दिल से सच्चे क़लम की सिफ़ात लिख...

 जावेद अख़्तर के इस कहे को लेकर और भविष्य के अपने लेखन को लेकर सुबह फेसबुक पोस्ट में वादा किया था कि रात को अपने ब्लॉग पर कुछ अहम लिखूंगा.

 मैंने जितने भी मीडिया संस्थानों में काम किया, अनुशासित सिपाही की तरह काम किया. वर्क प्लेस पर कभी किसी संस्थान की लक्ष्मण रेखा को पार नहीं किया. लेकिन 2009 में हिन्दी ब्लॉगिंग की शुरुआत करने के बाद मुझे एक ऐसा प्लेटफार्म मिला जहां मैं दिल की बात (मन की बात नहीं) कह सकता था. ऊपर वाले के करम से ब्लॉगिंग में बहुत कम समय में ही मैं पहचान बनाने में कामयाब रहा. मेरे ब्लॉग के दाएं में एक आर्काइव लिस्ट है जहां से साल दर साल महीना दर महीना मेरी पुरानी पोस्ट पढ़ी जा सकती हैं. शुरुआती दो-तीन साल मैं बिना नागा हर रात एक पोस्ट लिखता था. फेसबुक, ट्विटर के आने के बाद ब्लॉग लिखने का सिलसिला कम होता गया. इस पोस्ट से पहले तक मैंने अपने ब्लॉग देशनामा पर करीब 1050 पोस्ट लिखी हैं.

अब ब्लॉगिंग को एक बार फिर रफ्तार देने का फैसला किया है. लेकिन साथ ही मीडिया में भविष्य देख रहे युवा साथियों के साथ अपने करीब तीन दशक की पत्रकारिता के अनुभव बांटने का मिशन भी शुरू कर दिया है. अगर आप मेरे ब्लॉग्स, फेसबुक, ट्विटर की पुरानी पोस्ट्स पर जाएंगे तो पाएंगे मैंने जब भी राजनीति पर लिखा, कटाक्ष और व्यंग्य किए वो सब आम लोगों के हित को ऊपर रख कर किए. यूपीए सरकार की जनविरोधी नीतियों पर 2014 से पहले खूब लिखा. (मेरे पुराने ब्लॉग्स गवाह हैं). वहीं 2014 के बाद केंद्र में एनडीए सरकार की पूंजीपतियों के समर्थन वाली नीतियों को लेकर भी जम कर निशाना बनाया. हालांकि 2014 के बाद मैंने एक अलग बदलाव भी देखा. पहले सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ लिखने पर जो वाहवाही मिलती थी वही 2014 के बाद सरकार के विरोध में लिखने पर  कारात्मकता बताई जाने लगी. विपक्ष का पैरोकार बताया जाने लगा. लेकिन मेरा व्यक्तिगत मानना यही है कि एक पत्रकार को हमेशा आम जनता के हित वाले मुद्दों को पूरी ताक़त से उजागर करना चाहिए. हिन्दी पत्रकारिता के पितामह गणेश शंकर विद्यार्थी का कहना था कि पत्रकार को ताकतवरों (जाहिर है सत्ता) के उन कृत्यों को सामने लाना चाहिए जो वो जनता से छुपाना चाहते हैं. इसके लिए ‘BETWEEN THE LINES’ पढ़ने और लिखने की कला आनी चाहिए.

 पिछले 7 साल में मैंने देखा कि राजनीतिक विचारधाराओं के टकराव को लेकर दोस्तों, करीबियों, यहां तक कि रिश्तेदारों में जो विभाजन हुआ, वैसा पहले कभी नहीं देश में देखा गया. शायद ये फेसबुक जैसे सुगम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स आने की वजह से हुआ. यहां सभी को अपनी बात आसानी से कहने का मौका मिल गया.

 ये बात समझनी चाहिए कि सत्तापक्ष की ग़लतियों का विरोध देश-विरोध नहीं होता. पार्टियों की सरकारें आएंगी, जाएंगी, लेकिन हमारा महान भारत देश वहीं रहेगा. मैंने फेसबुक पर देखा कि जिस तरह से मैं सत्ता पक्ष के खिलाफ लिखता था तो मेरे कई पुराने ब्लॉगर साथियों और दोस्तों ने इस पर मेरी पोस्ट्स से दूरी बनाना शुरू कर दिया. हालांकि तथ्य ये है कि 2009 में ब्लॉगिंग शुरू करने के बाद मैंने उस वक्त की सत्तारूढ़ सरकार के खिलाफ भी खूब लिखा था. लब्बोलुआब ये है कि राजनीति की वजह से आपस में तल्खियां आईं, नकारात्मकता आई.

 


आज सुबह जब मैंने फेसबुक पर जावेद अख्तर साहब की लिखी ये पंक्तियां डालीं तो फेसबुक पर ज़्यादातर मित्रों को ये भ्रम हुआ कि मैं अब मेनस्ट्रीम मीडिया से अलग हो गया हूं, इसलिए जो मन में आएगा वो बेबाक़ी के साथ लिखूंगा. क्योंकि मैं अब किसी संस्थान की सोशल मीडिया पॉलिसी से नहीं बंधा हूं. लेकिन उन सब के इस ख़्याल से अलग मैंने जो फ़ैसला किया है उससे सभी चौंकेंगे. लेकिन साथ ही मुझे विश्वास है कि जिस नेक़ मकसद से मैंने ये फैसला किया, उसका वो समर्थन करेंगे.

अब मैंने पत्रकारिता, क्रिएटिव राइटिंग और ब्लॉगिंग में करियर बनाने के आकांक्षियों को मुफ्त प्रैक्टिकल नॉलेज देने का जो मिशन शुरू किया है, उसके लिए मुझे एक और अहम फैसला लेना पड़ रहा है. वो फैसला है सोशल मीडिया पर राजनीतिक मुद्दों से दूरी बनाए रखने का. मैं अपने मिशन में सब कुछ पॉजिटिव चाहता हूं. क्योंकि मेरे साथ जुड़ने वाले युवा किसी भी राजनीतिक विचारधारा के हो सकते हैं. मेरा मकसद उन्हें अपने तीन दशक के मेनस्ट्रीम मीडिया के अनुभवों से लाभ पहुंचाने का है. इसलिए निगेटिविटी की कहीं गुंजाइश न रहे मैंने सोशल मीडिया पर किसी भी तरह का राजनीतिक लेखन नहीं करने का फैसला किया. क्योंकि अगर खुद पॉजिटिव रहना है, दूसरों को भी पॉजिटिव रखना है तो दुनिया में और बहुत से विषय हैं जिन पर लिखा जा सकता है.

इसलिए सोशल मीडिया पर पॉलिटिकल राइटिंग को अब बाय बाय...


 

ये है मेरे मिशन से जुड़ी वो पोस्ट जिसका इंतज़ार था...खुशदीप

 

मेरठ में सम्मान के दौरान...फोटो क्रेडिट अनुज कौशिक
 The Joy Of Sharing ( #JOS)  मिशन से जुड़ी इस ब्लॉग पोस्ट का मेरे नौजवान दोस्तों को बेसब्री से इंतज़ार था, मैं ये अच्छी तरह जानता हूं. यक़ीन मानिए इस नेक़ मक़सद का फ़ैसला अचानक ही किया. शायद ऊपर वाले की मर्ज़ी यही थी. आज इस ब्लॉग पोस्ट में थोड़ी गप-शप करूंगा और बताऊंगा कि मुझ से आप कैसे जुड़ सकते हैं और अपनी बात कैसे पहुंचा सकते हैं.

मैं डॉक्टर बनते बनते पत्रकारिता में कैसे आ गया?

युवा साथियों के साथ मैं मेनस्ट्रीम मीडिया और ब्लॉगिंग का अपना अनुभव बांटना चाहता हूं. उनसे पत्रकारिता के पेशे की बारिकियों और नफ़े-नुकसान  के बारे में संवाद बनाए रखना चाहता हूं. उनकी जिज्ञासाएं शांत करने के लिए सभी सवालों का जवाब यथाशक्ति देना चाहता हूं. लेकिन उससे पहले अपने बारे में थोड़ी वो जानकारी दे दूं जिससे मेरे युवा साथी अभी तक परिचित नहीं हैं.

मैंने पत्रकारिता के पेशे में बहुत लेट (करीब 31 साल की उम्र में) एंट्री ली. 1994 में दैनिक जागरण, मेरठ में ट्रेनी बनकर. कॉलेज की पढ़ाई (बीएससी) मैंने 1983 में ही पूरी कर ली थी. फिर मैंने 1983 से 1994 तक 11 साल क्या कियास्कूल-कॉलेज में बायोलॉजी मेरी स्ट्रीम रही क्योंकि डॉक्टर बनने का सपना था. एक साल मेरा CPMT में सिर्फ दो ऑब्जेक्टिव सवाल के जवाब गलत रहने से MBBS में दाखिला होने से रह गया और उसी मेरिट लिस्ट के आधार पर गाजीपुर होम्योपैथी मेडिकल कॉलेज में BHMS  में एडमिशन मिला. लेकिन मैं वहां नहीं गया. 1985 में मैंने Armed Forces Medical College, Pune में MBBS में दाखिले के लिए ऑल इंडिया एंट्रेंस एग्जाम के लिखित और इंटरव्यू के आधार पर मेरिट में स्थान बना लिया. पुणे एडमिशन के लिए पहुंचा लेकिन चश्मा लगाने की वजह से मेडिकल में रिजेक्ट कर दिया गया. बाद में मैंने रेडियल केरेटोमी ऑपरेशन से चश्मे से छुटकारा पा लिया लेकिन तब तक मेरा डॉक्टर बनने का सपना कहीं पीछे छूट गया. लेकिन मुझे इसका कोई अफ़सोस नहीं. क्योंकि होनी में मेरे लिए कुछ और लिखा था.


फोटो- खुशदीप सहगल
जब कुछ नज़र नहीं आ रहा था तो मेरठ में अपने फैमिली बिजनेस में साथ देने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था. करीब दो साल मैंने मेडिसिन का होल-सेल बिजनेस भी किया. लेकिन मन कारोबार में कभी नहीं रमा. यही सब उधेड़-बुन चल रही थी कि एक घटना ने मेरा जीवन बदल दिया. सम-सामयिक घटनाओं की जानकारी रखने का मुझे स्कूल के वक्त से ही शौक था. तब आज की तरह प्राइवेट न्यूज़ चैनल नहीं थे. ख़बरों के लिए अखबारों के अलावा मात्र दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो ही जरिया हुआ करते थे. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ख़बरों पर सरकार का पूरा नियंत्रण था. इसलिए निष्पक्ष ख़बरें जानने के लिए बीबीसी हिन्दी सर्विस, लंदन को बड़े चाव से सुनता था. ये जानकर सीना चौड़ा हो जाता था कि मेरठ की ज़मीन से निकल कर एक युवा पत्रकार जसविंदर सिंह (जस्सी) ने कैसे बीबीसी, लंदन तक पहुंच कर रिपोर्टिंग में अपनी धाक दुनिया भर में जमा ली थी. जितना जस्सी की निडर रिपोर्टिंग और Daring कारनामों के बारे में सुनता गया, उतना ही वो मेरे ज़ेहन पर छाता चला गया. दुर्भाग्य से 31 दिसंबर 1993 को महज 33 साल की उम्र में जस्सी को गोवा में नहाते वक्त समंदर की लहरों ने हमेशा के लिए अपने आगोश में ले लिया.

फोटो- खुशदीप सहगल

  (जस्सी पर लिखा ये आर्टिकल मेरा पहला आर्टिकल था जो किसी अख़बार में छपा था. ये जस्सी की पहली पुण्यतिथि पर मेरठ के स्थानीय दैनिक प्रभात में प्रकाशित हुआ था)

वहीं से मेरे रोल मॉडल जस्सी ने मुझे लाइन दे दी कि जीवन में आगे क्या करना है. सामान्य ज्ञान और अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद की अच्छी क्षमता और लेखन में फ्लो होने की वजह से मुझे 1994 में दैनिक जागरण में ट्रेनी के तौर पर काम करने का मौका मिल गया. यानि मैंने पत्रकारिता की कहीं से औपचारिक पढ़ाई किए बिना ही इस लाइन में एंट्री ली. यहां मैं अपने मेंटर के तौर पर अमर उजाला ग्रुप को नई ऊंचाइयां देने के लिए अथक मेहनत करने वाले स्वर्गीय अतुल माहेश्वरी भाई साहब (तब वहां सारे एम्पलाइज उन्हें भाई साहब ही कहते थे) को जरूर याद करना चाहूंगा. उन्होंने ही मुझे बहुत कम अनुभव होने के बावजूद बहुत जल्दी चीफ सब एडिटर बना दिया था. साथ ही जब डिजिटल पत्रकारिता का जन्म ही हुआ था तब उन्होंने मुझे मेरठ से नोएडा अमर उजाला डॉट कॉम में हरजिंदर साहनी सर (अब हिन्दुस्तान दिल्ली में संपादक) के डिप्टी के तौर पर भेजा था.

 देखते ही देखते 27 साल मैंने मेनस्ट्रीम मीडिया (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल) में बिता दिए. हां, एक बात और मैंने बीबीसी हिन्दी सर्विस, लंदन के लिए दो बार लिखित परीक्षा अच्छे नंबरों से पास की लेकिन दोनों बार मैं इंटरव्यू नहीं क्लियर कर सका क्योंकि तब रेडियो से ही हिन्दी सर्विस का प्रसारण होता था, इसलिए आवाज़ की परीक्षा भी होती थी. तब मेरे हिन्दी बोलने में कहीं कहीं पंजाबीपन झलक आता था और उर्दू के शब्द बोलने में नुक़्ते का ध्यान नहीं रख पाता था.

ये सब पढ़ कर आपको ज्ञात हो ही गया होगा कि पत्रकारिता में मैंने जो भी सीखा, वो दैनिक जागरण, अमर उजाला, ज़ी न्यूज़, न्यूज़ 24 और आज तक जैसे संस्थानों में काम करते ही सीखा. इसलिए मेरा सारा अनुभव प्रैक्टीकल ज्ञान पर ही आधारित है.

ख़ैर ये तो रहा मेरा पत्रकारिता का सफ़र. अब बात अगले मिशन की.

युवाओं से अनुभव बांटने के पीछे मेरा क्या स्वार्थ?

हर बात का कोई कारण होता है. मेरे इस भावी मिशन के पीछे भी मेरा स्वार्थ है. मुझे अपना ज्ञान बढ़ाना है. कहते हैं ना ज्ञान बांटने से बढ़ता है, इसलिए एक स्वार्थ तो मेरा ये है. दूसरा स्वार्थ ये है कि उम्र के इस पड़ाव पर युवाओं जैसी ऊर्जा के लिए मुझे युवाओं का साथ चाहिए. ऐसे युवा जो प्रफुल्लित हो, जिनके चेहरे से निराशा न झलकती हो, जिनमें स्पोर्ट्समैन स्प्रिट से जीवन की हर चुनौती को हंसते हंसते झेलने का माद्दा हो. इसके अलावा उनमें सादगी हो, सच्चाई हो. करियर में कुछ भी बनने से पहले उनमें अच्छा इनसान बनने का जज़्बा हो. वो वैसे परिवेश से न हो जहां बच्चों को कहा जाता है- ‘BE PRACTICAL, BE SMART’. ये सीधे सीधे उनके लिए मैसेज होता है, ‘BY HOOK OR BY CROOK’ करियर में आगे बढ़ो. ऐसे में मेरा एक आग्रह हैं, जो सही में मेहनत के बल पर अच्छा पत्रकार बनना चाहते हैं, वहीं मेरे ब्लॉग से जुड़ें. अगर कोई सैटिंग-गैटिंग वाली या सिफ़ारिशी पत्रकारिता करना चाहता है तो उसे मेरे ब्लॉग से निराशा ही हाथ लगेगी, इसलिए उनसे यहीं कहना चाहूंगा कि वो अपना समय यहां व्यर्थ न करें.

युवा साथियों से कहना चाहूंगा कि तनाव और दबाव दूर रखने के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि आप उसी काम को अपना करियर बनाएं, जिसमें आपको सबसे अधिक खुशी और आत्मसंतोष मिलता हो. 

It is very simple to be happy but it is very difficult to be simple... Gurudev Rabindranath Tagore

मन की खुशी बहुत जरूरी है. मुझे क्रिएटिव राइटिंग में शुरू से सबसे अधिक आनंद मिलता रहा है तो ऊपर वाले ने पत्रकारिता को मेरे जीवनयापन का ज़रिया बनाया. ब्लॉगिंग से पहचान दिलाई.


 

फोटो- खुशदीप सहगल


फोटो- खुशदीप सहगल



युवा साथियों को एक होम वर्क देता हूं, मैंने 16 अगस्त 2009 को देशनामा पर पहली पोस्ट लिखी थी- कलाम से सीखो शाहरुख़. मैं शुरू में हर पोस्ट के आखिर में पाठकों के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए एक स्लॉग ओवर देता था, इन स्लॉग ओवर्स को पढ़ने के लिए देशनामा पर 2009 से 2011 तक लिखी मेरी पोस्ट्स पर जरूर जाएं. खुद को लाइट और सिम्पल रखने के लिए सेंस ऑफ ह्यूमर जीवन के हर मोड़ पर बहुत काम आता है.

मेरे साथ जुड़ने के लिए शुरुआत कैसे करें?

आप मेरे साथ ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर किसी भी माध्यम से जुड़ सकते हैं. अभी मैं शुरुआत कर रहा हूं, अकेला हूं, सिस्टम धीरे-धीरे विकसित होगा. इरादा नेक़ है, इसलिए विश्वास है कि रास्ते भी बनते चले जाएंगे. सोशल मीडिया के जितने भी प्लेटफॉर्म्स हैं, फ्री टेक्नोलॉजी उपलब्ध हैं, उनका लाभ लेने की कोशिश की जाएगी.

बस आपकी बात मेरे तक और मेरी बात आप तक पहुंचनी चाहिए.

मुझे कुछ वॉट्सऐप ब्रॉडकास्ट बनाने होंगे जिनसे आप तक देशनामा की हर नई बात पहुंचती रहे. देशनामा से जुड़ने वाले हर साथी को जल्दी ही एक यूनिक खुश_हेल्पलाइन नंबर अलॉट किया जाएगा, जिससे उसका डेटाबेस तैयार किया जा सके. इसके लिए सॉफ्टवेयर तैयार होने के साथ ही आपको जानकारी दूंगा. फिलहाल एक्सपेरिमेंट के तौर पर जो भी देशनामा के इस मिशन से लाभ उठाना चाहता है, वो ट्विटर पर @deshnama फॉलो करके जुड़ जाए. फेसबुक पर फ्रेंड्स लिस्ट 5,000 तक ही सीमित रहती है. ट्विटर पर ऐसी बाध्यता नहीं है.

कोई मुझसे सवाल पूछना चाहता है तो देशनामा पर इस ब्लॉग पोस्ट के कमेंट बॉक्स में पूछ सकता है. ट्विटर पर मैसेज के जरिए भी पूछ सकता है. फिलहाल फेसबुक और फोन पर आपकी जिज्ञासा शांत नहीं कर सकूंगा.

अभी मैं हर रविवार की रात को इस मिशन से जुड़ी पोस्ट देशनामा पर अपलोड करूंगा. भविष्य में ऐसे सम-सामयिक विषयों पर भी लिखने की कोशिश करूंगा जिससे कि वो सब्जेक्ट आपको आसान भाषा में समझ आ सके और वर्क-प्लेस पर आपकी मदद करे.

आज के लिए इतना ही, अब अगले रविवार को मिलते हैं...

चलते-चलते 24 जुलाई 2021 को गुरु पूर्णिमा के दिन मेरे जन्मस्थान मेरठ में युवा साथियों के साथ The Joy Of Sharing’ मिशन की शुरुआत का वीडियो देखिए...



                     (वी़डियो- खुशदीप सहगल)


 
Copyright (c) 2010. देशनामा All Rights Reserved.