शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

जो अमेरिका में किसानों के साथ हुआ, वही क्या अब भारत में होगा...खुशदीप

किसानों से जुड़े मुद्दे पर बीजेपी की सबसे पुरानी सहयोगी और बादल परिवार की सरपरस्ती वाली पार्टी शिरोमणि अकाली दल ने बगावत का बिगुल बजा दिया है...गुरुवार रात को बादल परिवार की बहू और इस पार्टी की सांसद हरसिमरत कौर बादल ने मोदी सरकार से इस्तीफा दे दिया....वे खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रही थीं...इस्तीफा मंजूर हो गया है और कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर को इस मंत्रालय की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई है...

आठ साल पहले का फाइल फोटो- अमेरिका के एक खेत में सड़ते छोटे साइज के प्याज क्योंकि बड़ी रिटेल स्टोर चेन को बड़े साइज के प्याज ही चाहिए होते हैं...


दरअसल, अकाली दल के लिए ऐसा करना मजबूरी थी...पंजाब और हरियाणा में किसानों ने आंदोलन छेड़ रखा है...अकाली दल का कोर वोट बैंक किसानों में ही रहा है...पंजाब में किसान एकजुट हैं और उन्होंने साफ कर दिया है कि जो केंद्र सरकार के किसानों से जुड़े बिलों का समर्थन करेगा, उसे गांवों में घुसने भी नहीं दिया जाएगा...100 साल पुरानी पार्टी पहले ही अपने सबसे बुरे राजनीतिक दौर से गुजर रही है...2017 विधानसभा चुनाव में ये पार्टी सिर्फ 15 सीटों पर सिमट गई और पंजाब में दूसरे नंबर पर भी नहीं आ सकी...आम आदमी पार्टी पंजाब मे मुख्य विपक्षी दल बन गई...

दरअसल, अकाली दल के पंजाब की सत्ता में रहते हुए 2015 में श्री गुरु ग्रंथ साहब बेअदबी मामले को लेकर बादलों और उनकी पार्टी को लेकर पंजाब के लोगों में जो गुस्सा था वो 2017 विधानसभा चुनाव के नतीजों में देखने को मिला....अब किसानों के मुद्दों पर अकाली दल ने बीजेपी के खिलाफ जो तेवर अपनाए हैं, वो 2022 पंजाब विधानसभा चुनाव की रणनीति के तहत ही उठाया कदम है....अकाली दल अब कह रहा है- हर किसान अकाली है और हर अकाली किसान है.

तकनीकी भाषा में मोदी सरकार के किन अध्यादेशों/बिलों पर विरोध है, इस पर जाएंगे तो समझना मुश्किल होगा...यही मोदी सरकार की दिक्कत है वो भारत जैसे कृषि प्रधान देश में किसानों से जुड़े बड़े बड़े फैसले ले रही है लेकिन ये साफ संदेश नहीं दे पा रही कि उससे किसानों की ज़िंदगी में क्या बदलाव आएगा...किसानों को तो छोड़ अपने सबसे पुराने सहयोगी दल को ही बीजेपी विश्वास में नहीं ले पाई...

आसान भाषा में बात करें, इससे पहले तीन अध्यादेश/बिलों के नाम जान लीजिए जिन पर अकाली दल ने अपना विरोध व्यक्त किया है-

1.  किसान उत्पाद, व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा)- The Farmers Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation)

2.  किसान सशक्तीकरण और संरक्षण

The Farmers (Empowerment and Protection) Agreement

3.  अध्यादेश और आवश्यक वस्तु (संशोधन)

The Essential Commodities (Amendment)

इनमें से तीसरा वाला बिल लोकसभा में पास भी हो चुका है...

मोटे तौर पर किसानों को जो डर है वो ये है कि उन्हें सरकार की ओर से मिलने वाला न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) बंद हो जाएगा, साथ ही मंडी व्यवस्था खत्म हो जाएगी, जहां वो अपने घरों के पास जाकर अभी तक अपने उत्पाद बेचते रहे हैंं. इसके अलावा कॉन्ट्रेक्ट फॉर्मिंग के जरिए देश का पूरा कृषि सिस्टम उन्हें प्राइवेट सेक्टर के हाथों में जाने का अंदेशा है...ऐसे में किसानों को डर है कि बड़े प्लेयर्स के आने पर उनकी स्थिति सिर्फ मजदूरों जैसी हो जाएगी...

रिटेल सेक्टर में एफडीआई और किसानों से सीधी खरीद का मुद्दा कोई नया नहीं है...इसकी शुरुआत यूपीए सरकार के दौरान ही हो गई थी...मैंने 6 दिसंबर 2012 को इस मुद्दे पर ब्लॉग लिखा था...उसमें वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ के एक लेख का हवाला दिया था...अमेरिका में जो कृषि सेक्टर में पहले ही हो चुका है, वैसा ही सब कुछ अब भारत में भी होता दिखे तो कोई नई बात नहीं...इस मामले में यूपीए और एनडीए की नीतियों में कोई फर्क नहीं है...प्राइवेट सेक्टर को ही हर चीज में आगे करने पर पूरा जोर है...

 आठ साल पहले साईनाथ ने अमेरिका के किसानों के हवाले से जो आगाह किया था...क्या अब वो भारत में भी होने जा रहा है...उन्होंने प्याज को स्टोरी का आधार बनाया था...जब कोई बड़े रिटेल स्टोर चेन किसानों से सीधे प्याज खरीदता है तो उसे बड़े साइज के ही प्याज चाहिए होते है...ऐसे में छोटे साइज के प्याज किसानो को पहले ही अलग कर देने होते हैं जिनका कोई भाव नहीं मिलता और वो खेतों में सड़ते रहते हैं...

पढ़िए 6 दिसंबर 2012 को मैंने देशनामा पर क्या लिखा था, तब कांग्रेस केंद्र की सत्ता में थी और बीजेपी विपक्ष में....  

रिटेल सेक्टर में एफडीआई (विदेशी प्रत्यक्ष निवेश) पर लोकसभा की मंज़ूरी मिलने से सत्ता पक्ष फूले नहीं समा रहा....वहीं विपक्ष का कहना है कि आंकड़ों में बेशक उनकी हार हो गई लेकिन नैतिक तौर पर उनकी जीत हुई...इस चक्कर में दोनों पक्षों के सांसदों को पूरे देश के सामने टेलीविज़न पर गला साफ़ करने का मौका ज़रूर मिल गया...वालमार्ट देश में आया तो क्या क्या होगा...सरकारी पक्ष का तर्क था कि किसानों से सीधे खरीद होगी तो उन्हें फायदा मिलेगा...उपभोक्ताओं को भी सस्ता सामान मिलेगा...मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी का तर्क था कि इससे छोटे दुकानदारों का धंधा चौपट हो जाएगा...सबने बातें तो बहुत बड़ी-बड़ी की लेकिन इतनी अहम बहस के लिए बिना किसी खास तैयारी के...काश ये लोग बहस से पहले पी. साईनाथ का ये लेख ही पढ़ लेते...ये लेख अमेरिका के एक किसान पर आधारित है...अब भारत में जो ये तर्क दे रहे हैं कि छोटे किसानों को विदेशी स्टोरों के आने से फायदा होगा, उनकी आंखें  इस लेख को पढ़ने के बाद ज़रूर खुल जानी चाहिए...इस लेख के लिए मेरी ओर से साईनाथ साहब को ज़ोरदार सैल्यूट....

क्रिस पावेलस्की

मेरे प्याज बड़े हैं, क्या नहीं है?" न्यूयॉर्क सिटी से 60 किलोमीटर बाहर क्रिस पावेलस्की ने हम आगंतुकों के समूह से ये सवाल किया... "क्या आप जानते हैं क्यों?" क्योंकि उपभोक्ताओं की ये मांग है, शायद? शायद बड़े प्याज ग्राहकों की नज़र में जल्दी चढ़ते हैं? पावेलस्की का जवाब था "नहीं "...पावेलस्की के पड़दादा 1903 में पोलेंड से आकर यहां बसे थे...एक सदी से ज़्यादा इसी ज़मीन पर ये परिवार फार्मिंग करता आया है...

 

पावेलस्की का कहना है कि आकार रिटेल चेन स्टोर तय करते हैं... "हर चीज़" उनके फ़रमान के अनुसार होती है... "हर चीज़" में कीमतें भी शामिल हैं...वालमार्ट, शॉप राइट और दूसरे चेन स्टोर पावेलस्की जैसे उत्पादित प्याजों को 1.49 डॉलर से लेकर 1.89 डॉलर प्रति पाउंड (करीब 453 ग्राम) में बेचते हैं...लेकिन पावेलस्की के हिस्से में एक पाउंड प्याज के लिए सिर्फ 17 सेंट (1 डॉलर=100 सेंट) ही आते हैं...ये स्थिति भी पिछले दो साल से ही बेहतर हुई है...1983 से 2010 के बीच पावेलस्की को एक पाउंड प्याज के सिर्फ 12 सेंट ही मिलते थे।

 

पावेलस्की का कहना है कि खाद, कीटनाशक समेत खेती की हर तरह की लागत बढ़ी है...अगर कुछ नहीं बढ़ा है तो वो हमें मिलने वाली कीमतें...हमें 50 पाउंड के बोरे के करीब छह डॉलर ही मिलते हैं...हां इसी दौरान प्याज की रिटेल कीमतों में ज़रूर  इज़ाफ़ा हुआ है...फिर पावेलस्की ने सवाल किया कि क्या कोई खाना पकाता है...हिचकते हुए कुछ हाथ ऊपर खड़े हुए...पावेलस्की ने एक प्याज हाथ  में लेकर कहा कि वो इतना बड़ा ही प्याज चाहते हैं, क्योंकि वो जानते हैं कि आप खाना बनाते वक्त इसका आधा हिस्सा ही इस्तेमाल करेंगे...और बचा आधा हिस्सा आप फेंक दोगे...जितना ज़्यादा आप बर्बाद करोगे, उतना ही ज़्यादा आप खरीदोगे...स्टोर ये अच्छी तरह जानते हैं...इसलिए यहां बर्बादी रणनीति है, बाइ-प्रोडक्ट नहीं...

 

पावेलस्की के मुताबिक  पीले प्याज के लिए सामान्यतया दो इंच या उससे थोड़ा बड़ा ही आकार चलता है...जबकि तीन दशक पहले एक इंच के आसपास ही मानक आकार माना जाता था...पावेलस्की के अनुसार छोटे किसान वालमार्ट के साथ मोल-भाव नहीं कर सकते...इसी वजह से उनके खेतों के पास छोटे प्याज़ों के पहाड़ सड़ते मिल जाते हैं...


पावेलस्की के फार्म को छोटा फार्म माना जाता है...अमेरिकी कृषि विभाग के मुताबिक जिन फार्म की सालाना आय ढाई लाख डॉलर से कम हैं, उन्हें छोटा ही माना जाता है...ये बात अलग है कि अमेरिका के कुल फार्म में 91 फीसदी हिस्सेदारी इन छोटे फार्म की ही है...इनमें से भी 60 फीसदी ऐसे फार्म हैं जिनकी सालाना आय दस हज़ार डॉलर से कम है...पावेलस्की, उनके पिता और उनके भाई संयुक्त रूप से 100 एकड़ में खेती  करते हैं...इस ज़मीन में से 60 फीसदी के ये मालिक हैं और 40 फीसदी ज़मीन किराये की है...

 

पावेलस्की का कहना है कि सिर्फ चेनस्टोर ही छोटे किसानों के हितों के खिलाफ काम नहीं करते...बाढ़ और आइरीन तूफ़ान जैसी प्राकृतिक आपदाओं की भी मार उन्हें सहनी पड़ती है...पावेलस्की को 2009 में फसल नष्ट होने से एक लाख पंद्रह हज़ार डॉलर का नुकसान हुआ था...लेकिन उन्हें फसल बीमे से सिर्फ छह हज़ार डॉलर की भरपाई हुई...जबकि बीमे के प्रीमियम पर ही उनके दस हज़ार डॉलर जेब से खर्च हुए थे...

 

पूरा कृषिगत ढ़ांचा और नीतियां पिछले कुछ दशकों में छोटे किसानों के खिलाफ होती गई हैं....पावेलस्की खुद कम्युनिकेशन्स स्टडीज़ में पोस्ट ग्रेजुएट हैं...उनके पड़दादा ने जब अमेरिका में पहली बार कदम रखा था तो उनकी जेब में सिर्फ पांच डॉलर थे...आज उऩका पडपोता तीन लाख बीस हज़ार डॉलर का कर्ज़दार है...अमेरिकी कृषि का पूरा ढ़ाचा छोटे किसानों की जगह कारपोरेट सेक्टर के हित साधने वाला है...

 

पावेलस्की की पत्नी एक स्कूल में असिस्टेंट लाइब्रेरियन हैं...वो इसलिए ये नौकरी करती हैं कि परिवार को आर्थिक सहारा मिलता रहे...पावेलस्की के मुताबिक पिछले साल उन्होंने पचास एकड़ के फार्म पर कृषि लागत पर एक लाख साठ हज़़ार डॉलर खर्च किए और बदले में उन्हें दो लाख डॉलर मिले....यानी चालीस हज़ार डॉलर की कमाई पर उन्हें टैक्स देना पड़ा...इससे दोबारा निवेश के लिए उनके पास बहुत कम बचा...

 

एसोसिएटेड प्रेस की  2001 में कराई एक जांच से सामने आया था कि सार्वजनिक पैसा सबसे ज़्यादा कहां जाता है...जबकि तब हालात काफ़ी अलग थे, लेकिन  तब भी कारपोरेट जगत और बहुत अमीर कंपनियों की पकड़ बहुत मज़बूत थी...एसोसिएटेड  प्रेस ने अमेरिकी कृषि विभाग के दो करोड बीस लाख चेकों की जांच की तो उनमें से 63 फीसदी रकम इस क्षेत्र के सिर्फ दस बड़े खिलाड़यों को ही मिली...डेविड रॉकफेलर, टेड टर्नर, स्कॉटी पिपेन जैसे धनकुबेरों को भी उनके फार्म्स के लिए सब्सिडी मिली... पी. साईनाथ

 

क्या यही होने जा रहा है अब भारत में भी....

गुरुवार, 17 सितंबर 2020

नंगा सच नहीं सजा-संवरा झूठ पसंद...खुशदीप

दो जुड़वा भाई शहर के बाहर एक नदी के किनारे खड़े थे...

एक का नाम था सचऔर दूसरे का झूठ’...


फोटो आभार- फेसबुक पेज TruthandLiesComedy


झूठ ने सच को नदी में तैरने का चैलेंज दिया...साथ ही कहा कि वो सच से पहले तैर कर नदी के दूसरे किनारे को छू कर वापस आ जाएगा...

फिर झूठ ने ही इस खेल के नियम बताए...इसके मुताबिक दोनों को अपने सारे कपड़े उतार कर तीन तक गिनती के बाद बर्फीले पानी में कूद जाना होगा...

फिर झूठ ने गिनती शुरू की....1...2...3...

झूठ के कहते ही सच पानी में कूद गया...लेकिन झूठ वहीं खड़ा रहा...

सच तैरते हुए नदी का दूसरा किनारा छू कर जल्दी से वापस आने में लग गया...

इस बीच झूठ ने सच के कपड़े पहने और शहर में वापस आ गया...सच बन कर ही वो गर्व से सब लोगों के साथ मिलता रहा...

सच नदी का दूसरा किनारा छू कर वापस आया तो वहां उसे अपना कोई कपड़ा नहीं मिला...झूठ भी नहीं था लेकिन उसके कपड़े वहां पड़े थे...सच ने झूठ के कपड़े पहनना मंज़ूर नहीं किया...वो निर्वस्त्र ही शहर की ओर वापस चल दिया...

लोगों ने सच को इस अवस्था में देखा तो मुंह फेरना शुरू कर दिया...सच ने लोगों को अपनी असल पहचान के बारे में बहुत समझाने की कोशिश की...लेकिन वो निर्वस्त्र था, लोग उसकी तरफ देखने में असहज महसूस कर रहे थे...लोग या उसका मखौल उड़ाते या पास से भगा देते...कोई मानने को तैयार नहीं हुआ कि वही सच है...

लोग झूठ को ही सच मानने लगे क्योंकि उसने टिप-टॉप कपड़े पहने हुए थे और उसकी तरफ देखना आसान था...

वो दिन है और आज का दिन...लोगों ने नंगे सच की जगह सजे-संवरे झूठ पर विश्वास करना शुरू कर दिया...

(Parker Simpson के लेख The Story of Truth & Lie के एक अंश का अनुवाद) 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग    

 

 

रविवार, 13 सितंबर 2020

'ठोकशाही' की ओर शिवसेना के फिर बढ़ने के मायने?...खुशदीप

 नेरेटिव कुछ भी हो, शिवसेना फिर से बाल ठाकरे के ठोकशाही युग की ओर बढ़ चली है...हिन्दी बेल्ट में धारणा कुछ भी हो लेकिन महाराष्ट्र में ये घटनाक्रम शिवसेना को मजबूती देने वाला है...बहुत अर्से बाद शिवसैनिक वैसे ही दबंगई दिखा रहे हैं जैसे किसी जमाने में बाल ठाकरे के खिलाफ ज़रा सी भी चूं करने वाले लोगों के खिलाफ दिखाया करते थे...

 

फाइल फोटो- शिवसेना के फेसबुक पेज से साभार

उद्धव ठाकरे के लिए अक्सर यही कहा जाता रहा है कि उनमें पिता बाल ठाकरे वाले तेवर नहीं हैं...बाल ठाकरे की तरह ही कार्टून बनाने का शौक रखने वाले उनके भतीजे राज ठाकरे में वो तेवर दिखते थे लेकिन बाल ठाकरे के जीते-जी ही राज को शिवसेना से बाहर का रास्ता देखना पड़ा...राज ने बेशक महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नाम से खुद की पार्टी बनाई, लेकिन शिवसेना जैसी सांगठनिक शक्ति वो नहीं जुटा सके...शिवसैनिकों का जो भावनात्मक लगाव बाल ठाकरे से रहा, उसकी बदौलत ही मातोश्री की प्रासंगिकता बनी रही...पिछले कुछ दशक से शिवसेना मुख्य राजनीतिक धारा की पार्टी बनी रही...बाल ठाकरे के दुनिया से जाने के बाद भी शिवसैनिक उद्धव के पीछे मजबूती से खड़े रहे...

बाल ठाकरे की राजनीतिक ताकत का मुख्य आधार दूसरों के दिलों में डर बसा कर राज करना था...उनका कहना था- 'पहले अपना शत्रु चुनो, समर्थकों की सेना खुद-ब-खुद पीछे आकर खड़ी हो जाएगी'...शिवसेना में बाल ठाकरे ब्रैंड राजनीति के तेवर अब बहुत दिनों बाद देखने को मिले हैं....ये बात हिन्दीभाषियों या मुंबई में रहने वाले प्रवासियों को बेशक पसंद न आ रही हो लेकिन शिवसेना के कोर मराठी वोट बैंक को जरूर रास आ रही होगी...

राजनीति अब ये नहीं देखती कि उसमें नीति है या नहीं...इस सियासी हमाम में सभी नंगे हैं...तथाकथित शुचिता की बात करने वाले भी और धर्मनिरपेक्षता की दुहाई की लिप सर्विस करने वाले भी.. पैसे और सत्ता का लालच देकर, दलबदल का खुल कर खेल करने वाले आखिर किस मुंह से शिवसेना से नैतिकता की उम्मीद करते हैं...

शिवसेना अगर खुला खेल फर्रूखाबादी खेलने पर आ गई है, तो ज़रूर उसके पीछे कोई सोचीसमझी रणनीति काम कर रही है...रही बात बॉलीवुड के ड्रग्स और अंडरवर्ल्ड कनेक्शन की तो ये कोई नया किस्सा नहीं है...श्रमिक नेता से राजनेता के तौर पर बाल ठाकरे का जब से उदय हुआ, लगभग उसी कालखंड में मुंबई में अंडरवर्ल्ड ने विकराल रूप लेना शुरू किया...हाजी मस्तान सबसे बड़ा नाम था...उसी के मातहत करीम लाला, और वरदराजन मुदलियार ने भी अवैध शराब, वसूली, स्मगलिंग, रीयल एस्टेट जैसे काले साम्राज्य में धाक बनाई...

 बाल ठाकरे ने साठ के दशक के बीच के वर्षों में पहले मुंबई में ताकतवर हो रहे तमिल प्रवासियों के विरोध के सहारे मराठा जमीन पर अपना आधार बढ़ाना शुरू किया...तब उनका नारा था...बजाओ पुंगी, भगाओ लुंगी...फिर बाद में इसी फॉर्मूले को उन्होंने मुस्लिम विरोध में बदल दिया...6 दिसंबर को अयोध्या के घटनाक्रम पर जब बीजेपी के नेता भी दबी भाषा में बयान दे रहे थे तो हिन्दुत्व के पैरोकार नेताओं में से अकेले बाल ठाकरे थे, जिन्होंने कहा था- अगर ढांचा (बाबरी मस्जिद) शिवसैनिकों ने गिराया है तो मुझे उन पर गर्व है.’’

 पाकिस्तानी कलाकारों का भारत में विरोध हो या क्रिकेट मैच के दौरान पिचें उखाड़ना, नब्बे के दशक के आखिर में अभिनेता दिलीप कुमार पर पाकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज को वापस करने के लिए दबाव डालना, इन सब बातों में शिवसैनिक बढ़ चढ़ कर आगे रहे...ये वो दौर था जब शिवसेना की कमान खुद बाल ठाकरे के हाथ में थी...बाल ठाकरे की उम्र बढ़ने के साथ उनके तेवर नर्म पड़े..अपने आखिरी वर्षों में बाल ठाकरे को राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के बीच विरासत की लड़ाई को भी देखना पड़ा और उन्होंने पुत्र उद्धव ठाकरे को ही विरासत सौंपने पर मुहर लगाई...

उद्धव ठाकरे क्या अब बाल ठाकरे वाले तेवरों की ओर बढ़ चले हैं?  लेकिन विरोधाभास ये है कि बाल ठाकरे ने अपने जीवनकाल में जिस धर्मनिरपेक्षता की परवाह नहीं की और अधिकतर बीजेपी से ही हाथ मिलाए रखा...अब उन्हीं की स्थापित शिवसेना को कांग्रेस और एनसीपी की बैसाखियों के सहारे महाराष्ट्र में सत्ता चलानी पड़ रही है...अब देखना यही होगा कि ये विरोधाभास उद्धव ठाकरे और शिवसेना को ठोकशाही में कहां तक बढ़ने की इजाजत देता है...

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

 

 

शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

हंगामा है क्यूं बरपा फ़ैज़ की नज़्म ही तो पढ़ ली है...खुशदीप



हम देखेंगेनज़्म क्या वाकई हिन्दू विरोधी या इससे डर की वजह कुछ और?


फ़ैज़ अहमद फ़ैज- फोटो आभार: विकीमीडिया 



फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म ‘’व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे)में बुत हटाने के मायने क्या वाकई हिन्दू धर्म और उसे मानने वालों के ख़िलाफ़ थे? क्या इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, कानपुर (IIT-K) में फ़ैज़ की इस नज़्म गाए जाने का विरोध करने वालों ने इसका यही मतलब लगाया तो सही किया?

इन सवालों के जवाब जानने से पहले ये समझना ज़रूरी है कि आख़िर फ़ैज़ की 1979 में लिखी ये नज़्म अब क्यों भारत में सुर्खियों में है? इसके लिए आपको इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी- कानपुर (IIT-K) के परिसर में 17 दिसंबर 2019 को हुई एक घटना पर गौर करना होगा. उस दिन IIT-K में करीब 300 स्टूडेंट्स इकट्ठा हुए. उन्होंने जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी (दिल्ली) में नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) का विरोध करने वाले छात्र-छात्राओं के ख़िलाफ़ पुलिस की कार्रवाई पर नाराज़गी जताई. इस मौके पर एक छात्र ने फ़ैज़ की हम देखेंगे नज़्म भी सुनाई.

IIT-K के उपनिदेशक मनींद्र अग्रवाल के मुताबिक इस मामले की जांच के लिए कमेटी बनाई गई है. मनींद्र अग्रवाल ने इस विषय में कहा- ‘’ऐसी कुछ मीडिया रिपोर्ट आईं कि IIT-K  ने जांच इसलिए बिठाई है कि फ़ैज़ की नज़्म हिन्दू विरोधी है या नहीं.  इस तरह की रिपोर्ट भ्रामक हैं. असलियत ये है कि इंस्टीट्यूट को समुदाय के कुछ वर्गों से शिकायत मिली थीं कि स्टूडेंट्स के विरोध मार्च के दौरान कुछ खास कविताएं (नज़्म) पढ़ी गईं. बाद में सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट भी ऐसी आईं जो भड़काऊ थीं. ऐसे में इंस्टीट्यूट ने इन सारी शिकायतों को देखने के लिए एक कमेटी बनाई है.’’

फ़ैज़ की ज़िस नज़्म पर इतना हंगामा बरपा है, पहले उसे पढ़ लेना ज़रूरी है- 

हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिस का वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिखा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिरां
रूई की तरह उड़ जाएंगे
हम महकूमों के पांव-तले
जब धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हक़म के सर-ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख़्त गिराए जाएंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो गायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उठेगा अनल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्क़-ऐ-ख़ुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो

नज़्म में कुछ ऐसे शब्द हैं, जिनका मतलब जाने बिना इसे ठीक से नहीं समझा जा सकता. मसलन,

लौह-ए-अज़ल: क़यामत तक का जहां सारा ज़िक्र है, वो तख़्ती, स्लेट  या दस्तावेज़
कोह-ए-गिरां: बड़े पहाड़
महकूमों: रियाआ, प्रजा
अहल-ए-हकम: हुक़ूमत चलाने वाले
अर्ज़-ए-ख़ुदा: सारी ज़मीन
अहल-ए-सफ़ा: पवित्र लोग
मरदूद-ए-हरम: वे लोग जिन्हें पाक़ जगहों पर जाने की इजाज़त नहीं
हाज़िर: मौजूद
मंज़र: नज़ारा
नाज़िर: देखने वाला
अनल-हक़: मैं ही ब्रहम हूं या मैं ही खुदा हूं या मैं ही सच हूं
ख़ल्क़ए-ख़ुदा: इनसान समेत खुदा की बनाईं सभी चीज़ें

क्या वाकई इस नज़्म में कुछ ऐसे शब्द हैं जिनसे हिन्दू समुदाय की भावनाएं आहत हो सकती हैं? फ़ैज़ तमाम उम्र फिरकापरस्ती, कट्टरपंथ, तानाशाही और पीछे की ओर ले जाने वाले कदमों का विरोध करते रहें. इसलिए उन्हें अपने ही मुल्क़ में एंटी-इस्लाम, एंटी-पाकिस्तान का तमगा देने वालों की कमी नहीं रही. उनसे सबसे ज्यादा परेशानी पाकिस्तान के फौजी हुक्मरान जिया उल हक़ को हुई. इसलिए उनके दौर में हम देखेंगे नज्म पर ही बैन लगा दिया गया था.

ये फ़ैज़ का ही कमाल था कि उन्होंने तानाशाही, ज़ुल्म करने वाली हुकूमत पर प्रहार करने के लिए हम देखेंगेनज़्म में प्रतीकों के तौर पर ऐसे कई शब्दों का सहारा लिया जिनका कट्टरपंथी ख़ूब इस्तेमाल करते रहे थे.

हम देखेंगेनज़्म को ठीक से समझने से पहले फ़ैज़ के बारे में ये जानना ज़रूरी है कि फ़ैज़ का मुल्क़ पाकिस्तान ज़रूर रहा लेकिन उन्होंने अपनी उम्र का आधा हिस्सा पाकिस्तान के बाहर ही बिताया. पचास के दशक में वो पांच साल तक जेल में भी रहे. जिस नज़्म विशेष हम देखेंगेकी बात की जा रही है, वो उन्होंने 4 दशक पहले 1979 में पाकिस्तान के फौजी हुक्मरान जिया उल हक़ के तानाशाह दौर के ख़िलाफ़ लिखी थी. फ़ैज़ का इंतकाल 20 नवंबर 1984 को लाहौर में हुआ. फ़ैज़ की हम देखेंगेनज़्म शख्स-शख्स की ज़ुबान पर तब चढ़ी जब मशहूर गायिका इक़बाल बानो ने इसे अपनी आवाज़ बख़्शी. इक़बाल बानो ने 13 फरवरी, 1986 को फ़ैज़ के जन्मदिन वाले दिन इस नज़्म को लाहौर के अल-हमरा आर्ट काउंसिल परिसर में करीब 50,000 लोगों के सामने गाया. जिया उल हक़ के तमाम ख़ौफ़ से बेपरवाह इस आयोजन को फ़ैज़ मेले का नाम दिया गया.

दरअसल तब जिया उल हक़ ने अपने एक फ़रमान के तहत औरतों के साड़ी पहनने पर पाबंदी लगा दी थी. इसी पर ऐतराज़ जताने के लिए इकबाल बानो ने काली साड़ी पहन कर ये नज़्म गाई.  
आइए अब जानते हैं कि फ़ैज़ इस नज़्म के जरिए कहना क्या चाहते थे-

हम देखेंगे, हमारा वो दिन देखना तय है जिसका कि वादा है, जो अनंतकाल तक की तख़्ती पर लिखा है. जब ज़ुल्म और सितम के घने पहाड़ रूई की तरह उड़ जाएंगे. तब हम रियाआ (प्रजा) के पैरों के नीचे धरती धड़ धड़ धड़केगी और हम पर राज करने वाले लोगों के सिर पर बिजली कड़ कड़ कड़केगी. जब इस दुनिया से झूठ की पहचान वाले सारे लोग (जो खुद को खुदा समझ बैठे हैं) हटाए जाएंगे. फिर हम जैसे साफ़ लोग जिन्हें पाक़ जगहों से दूर रखा गया, उन्हें बड़े गद्दों पर बिठाया जाएगा. सब ताज उछाले जाएंगे. सब तख़्त गिराए जाएंगे. नाम रहेगा अल्लाह का जो गायब भी है और हाज़िर भी. दृश्य भी है और इसे देखने वाला भी. यहां अल्लाह शब्द का इस्तेमाल ख़ालिस या पवित्रता के लिए हुआ. इसे किसी एक मज़हब से से जोड़ कर देखना बेतुका है. यहां किसी भी धर्म के ईष्ट का इस्तेमाल किया जा सकता था. फ़ैज़ खुद नास्तिक थे और वो अपने लिखे में आवाम को ही सबसे ऊपर बताते थे. अगर उनकी ये नज़्म एक ही मज़हब से जुड़ी होती तो 41 साल बाद भी ताकतवरों की मनमानी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए इतना बड़ा ज़रिया नहीं बनी होती.   

हम देखेंगे नज़्म की सबसे अहम पंक्तियां आगे हैं और इन्हें ठीक से समझना बहुत ज़रूरी है.

उठेगा अनल हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्क़-ऐ-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

मशहूर लेखक-गीतकार जावेद अख़्तर का कहना है कि इस नज्म में 'अनल हक़' का ज़िक्र है. इसका शाब्दिक अर्थ है- अहम ब्रह्म यानि मैं ही खुदा हूं या मैं ही सच हूं. अनल हक़ सूफ़ी परम्परा या भक्ति की कबीर जैसी निर्गुण धारा के करीब है. जावेद अख्तर के मुताबिक ये अद्वैतवाद है. जिसमें क्रिएटर और क्रिएशन यानि सृष्टिकर्ता और उसकी बनाई गई चीज़ों को एक ही माना गया है. जबकि इस्लाम, ईसाई और यहूदी धर्मों में क्रिएटर और क्रिएशन को अलग माना जाता है. अनल हक़ का नारा बुलंद करने की वजह से ही मुगल तानाशाह शासक औरंगजेब ने सूफी सरमद का सिर कटवा दिया था. जिस 'अनल हक़' को औरंगजेब ने इस्लाम और अपनी हुकूमत के खिलाफ माना वो अब भला हिन्दू भावनाओं को आहत करने वाला कैसे हो सकता है?

अनल-हक़ का नारा जब उठेगा यानि रियाआ के लोग भी खुद को हुकूमत करने वालों के बराबर ही मानेंगे. और फिर राज खुदा की बनाई हुई चीज़ें ही करेंगी जो मैं और तुम सब हो.

फ़ैज़ की ये नज़्म तानाशाही, शासकों की मनमानी के ख़िलाफ़ है और लोकतंत्र (जम्हूरियत) की सच्ची आवाज़ है. यही वजह है कि जिया उल हक़ जैसे हुक्मरान ने इसकी ताक़त को समझ कर इस पर बैन लगा दिया था. सीधी सी बात फ़ैज़ की ये नज़्म किसी मज़हब ख़ास के लिए नहीं है और ना ही फ़िरक़ापरस्ती से इसका कोई ताल्लुक़ है.

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