रविवार, 10 नवंबर 2019

राम मंदिर पर फ़ैसला और करतारपुर कॉरिडोर खुलना एक ही दिन क्यों...खुशदीप



9 नवंबर 2019
राम मंदिर निर्माण के लिए रास्ता साफ़ होना...
करतारपुर कॉरिडोर का खुलना...
संयोग है कि ये दोनों बातें एक ही दिन, एक साथ हुईं...(30 साल पहले इसी तारीख को बर्लिन की दीवार भी गिरी थी)
राम मंदिर हिन्दुओं की आस्था का प्रतीक है तो करतारपुर में दरबार साहिब गुरद्वारा ‘गुरसेवकों’ के लिए 'पिता' के आखिरी वास की जगह के दर्शन करना है,..यहीं गुरु नानक देव जी ने जीवन के आख़िरी 18 साल गुज़ारे थे... गुरसेवक से यहां मायने सिर्फ़ सिख ही नहीं बल्कि हर वो इनसान है जो बाबा नानक के ‘सर्वत्र भाईचारे’ के संदेश में यकीन रखता है...
अब ज़रा सोचिए नियति ने ऐसा क्यों लिखा हुआ था कि ये दोनों घटनाएं एक ही दिन होंगी...ये संदेश बहुत बड़ा है...विचार कीजिए कि करतारपुर कॉरिडोर क्या खुल सकता था अगर एक मुसलमान लीडर तमाम विरोधाभास होने के बावजूद 10 महीने पहले इसका फैसला नहीं लेता...पीएम मोदी ने शनिवार को इसके लिए पाकिस्तान के पीएम इमरान ख़ान को शुक्रिया भी कहा...
अब बात राम मंदिर की...अयोध्या की ज़मीन के मालिकाना हक़ पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की...जिस तरह की परिस्थितियां थीं, उसमें यही फ़ैसला सबसे बेहतर हो सकता था...पांच जज साहिबान चाहें भी तो इतिहास की गलतियों को नहीं सुधार सकते थे...लेकिन वर्तमान और भविष्य में क्या सबके लिए सबसे अच्छा रहेगा, ये ज़रूर उनके ज़ेहन में रहा होगा...
सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा है कि 1934 में दंगे के बाद बाबरी मस्जिद के गुंबदों को नुकसान पहुंचाना, 22 दिसंबर 1949 की रात को मूर्तियां रखना और 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को तोड़ना अवैध कृत्य थे. बाबरी मस्जिद तोड़े जाने की घटना को सुप्रीम कोर्ट ने ‘क़ानून के राज का धार्मिक उल्लंघन’ क़रार दिया...
कोर्ट आस्था से अधिक भौतिक साक्ष्यों की रौशनी में फ़ैसला करता है...यहां एएसआई की रिपोर्ट उसके फ़ैसले का आधार बनी...इसी से जज साहिबान इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि विवादित ढांचे के नीचे मिले अवशेष इस्लामिक मूल के नहीं थे, मंदिर के थे...
ये अच्छी बात है कि मुस्लिम पक्ष की ओर से पहले ही कह दिया गया था कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जो भी फ़ैसला आएगा वो मंज़ूर होगा क्योंकि वो भारतीय संविधान को सर्वोच्च मानते हैं...वहीं दूसरी तरफ़ सरकार में बैठे ज़िम्मेदार लोगों की तरफ़ से ऐसे बयान भी आते रहे कि आस्था के सवाल पर कोर्ट फैसले नहीं ले सकता...
ख़ैर जो हुआ सो हुआ...अब सभी को सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सम्मान करना चाहिए, जैसा कि हो भी रहा है...अयोध्या में भव्य राम मंदिर बने, ये हर हिन्दू की इच्छा है...लेकिन साथ ही वहां 5 एकड़ जो मुस्लिम पक्ष को दी गई, वहां भी ऐसी मस्जिद की तामीर हो जिसे दुनिया देखने आए...
ये तो रही धर्म और आस्था की बात...अब जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया है तो ये भी सोचना हम सबका कर्तव्य है कि न्याय और मानवता के लिए अब आगे क्या क्या किया जा सकता है...
पहली बात, राम मंदिर निर्माण में मुसलमान और मस्जिद की तामीर में  हिन्दू सच्चे मन से हाथ बंटाए...मंदिर के लिए जो ट्रस्ट बने या मस्जिद की देखरेख जिसे मिले, वो अयोध्या और आसपास के विकास पर भी ध्यान दें...किसी भी धर्म के बच्चे हों उन्हें बेहतर से बेहतर शिक्षा दिलाने का प्रबंध करें...ऐसे अस्पताल भी बनवाएं जहां सभी का अच्छा इलाज़ हो सके...अयोध्या को आस्था के केंद्र के साथ गंगा-जमुनी तहज़ीब की ऐसी मिसाल बनाया जाए जिसके लिए भारत को पूरे विश्व में जाना जाता रहा है...
मैं इसके लिए बचपन में अपने मेरठ शहर में लगने वाले नौचंदी मेले की मिसाल देना चाहता हूं...वहां दुर्गा मंदिर और बाले मियां की मज़ार ठीक आमने सामने थे...दुर्गा मंदिर में भेंटे गाईं जाती थीं...तो बाले मियां के मज़ार पर सूफियाना कलाम और कव्वालियां सुनने को मिलती थीं...दोनों जगह ही जाने पर रूहानी सक़ून मिलता था...सब कुछ सद्भाव के साथ...आने वाले वर्षों में अयोध्या में भी ऐसा देखने को मिले तो क्या बात...
आख़िर में फिर आता हूं बाबा नानक पर...उनके इस संदेश पर कि इनसानी भाईचारे से बड़ा दुनिया में कुछ और नहीं...मुश्किल में कोई दिखे तो उसकी मदद से बड़ी सेवा और कोई नहीं...और इससे अधिक कुछ नहीं जिससे रब को खुश किया जा सके... यही ‘सिखी’ का एक लाइन का संदेश है...
ऐहो जेहिया खुशियां लेआवें बाबा नानका ऐहो जेहिया...
सारी दुनिया दे विच कोई ना गरीब होवे
ऐसा ना होवे जिनू रोटी ना नसीब होवे
रूकी मिसी सब नूं खवाईं बाबा नानका
ऐहो जेहिया खुशियां लेआवें बाबा नानका ऐहो जेहिया...
(इस तरह की खुशियां लाना बाबा नानक, इस तरह की खुशियां, सारी दुनिया में कोई गरीब नहीं हो, ऐसा कोई ना हो जिसे रोटी ना नसीब हो, जैसा भी हो सबका पेट भरना बाबा नानक, इस तरह की खुशियां लाना बाबा नानक...)