शनिवार, 3 अगस्त 2019

डॉक्टरों में हंगामा है क्यूं बरपा...खुशदीप


डॉक्टरों में हंगामा क्यूं है बरपा,
सरकार NMC बिल जो लाई है...

नेशनल मेडिकल कमीशन यानि राष्ट्रीय मेडिकल आयोग (NMC) बिल, 2019 को लेकर सरकार और देश भर के डॉक्टरों-मेडिकल छात्रों में ठनी हुई है. मेडिकल बिरादरी को बिल के कुछ प्रावधानों को लेकर सख़्त ऐतराज़ है, वही सरकार का कहना है कि बिल के प्रावधान वर्ल्ड मेडिकल स्टैंडर्ड्स के मुताबिक है. देश की राजधानी डॉक्टरों के विरोध का सेंटर बनी हुई है. यहां एम्स, सफदरजंग, आरएमएल समेत तमाम बड़े अस्पतालों के डॉक्टर बीते तीन दिन से हड़ताल पर हैं. मरीज़ों और उनके तीमारदारों का बुरा हाल है. सरकार ने सफदरजंग अस्पताल के डॉक्टरों को चेतावनी दी है कि तत्काल काम पर लौटें वरना उनके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जाएगी.
डॉक्टरों के काम ठप करने से दिल्ली के अस्पताल में परेशान बीमार बच्चे की मा


वहीं, डॉक्टरों की देश भर में नुमाइंदगी करने वाली संस्था इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने रविवार, 4 अगस्त को दिल्ली में बैठक बुलाई है, इसमें आगे की रणनीति पर विचार किया जाएगा.

बता दें कि एनएमसी बिल संसद के दोनों सदनों से पास हो चुका है. राज्यसभा में बहस के दौरान सुझाए गए दो संशोधनों को लेकर ये बिल फिर लोकसभा में पास होने के लिए जाना है. ये दोनों संशोधन नेशनल मेडिकल कमीशन में स्टेट मेडिकल काउंसिल और मेडिकल यूनवर्सिटीज के कुलपतियों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने से संबंधित हैं. 

क्या है NMC बिल, 2019?

NMC बिल, 2019 का अहम उद्देश्य इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट 1956 को निरस्त करना और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) की जगह राष्ट्रीय मेडिकल आयोग (नेशनल मेडिकल कमीशन) को लाना है. बता दें कि MCI को 2010 में ही भंग किया जा चुका है. तब MCI के तत्कालीन अध्यक्ष केतन देसाई पर भ्रष्टाचार के आरोप सीबीआई ने लगाए थे.

बिल के मुताबिक राष्ट्रीय मेडिकल कमीशन (NMC) की जिम्मेदारियों में नए मेडिकल कॉलेजों को मंजूरी देना और मेडिकल कॉलेजों का आकलन होगा. इसके अलावा एमबीबीएस में दाखिले की परीक्षा और फाइनल इयर में एग्जिट परीक्षाओं को संचालित करना, साथ ही मेडिकल कोर्सेज की फीस को रेग्युलेट भी NMC की जिम्मेदारियों में रहेगा.

मोदी सरकार का दावा है कि बिल के जरिए ऐसा मेडिकल शिक्षा सिस्टम बनाया जाएगा जिसमें गुणवत्ता पर ध्यान देने के साथ अफोर्डेबल मेडिकल शिक्षा तक पहुंच को बेहतर बनाया जाएगा. साथ ही इसके ज़रिए देश के सभी हिस्सों में पर्याप्त मात्रा में और उच्च गुणवत्ता वाले मेडिकल प्रोफेशनल्स की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकेगी.  सरकार की ओर से इस बिल को सबसे बड़े मेडिकल शिक्षा सुधार के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है.                

पुराने NMC बिल, 2018 में क्या था? 

NMC बिल, 2018 में  ब्रिज कोर्स का प्रावधान था जिसका डॉक्टर्स और हेल्थ प्रैक्टिशनर्स ने विरोध किया था. इस ब्रिज कोर्स के जरिए होम्योपैथी, आयुर्वेद  वाले आयुष प्रैक्टिशनर्स को एक साल का ब्रिज कोर्स करने पर ऐलोपैथी की प्रैक्टिस करने की अनुमति मिल सकती थी. डॉक्टर समुदाय के विरोध और तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा से कई बैठकों के दौर के बाद संसदीय पैनल को भेजा गया. पैनल ने इस प्रावधान को अनिवार्य ना बनाने की सिफारिश की. पैनल ने उन लोगों के लिए सख्त सजा की भी सिफारिश की जो बिना ज़रूरी योग्यता के मेडिसिन की प्रैक्टिस करते हैं.      

देशभर का डॉक्टर समुदाय नए NMC बिल के विरोध में क्यों?

देश भर में डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों ने पहले ही साफ कर दिया था कि ये बिल अगर मौजूदा ही स्वरूप में संसद में पास भी हो गया तो भी इसका देश भर में पुरज़ोर विरोध किया जाएगा. दरअसल, बिल के कई ऐसे प्रावधान है जिन पर मेडिकल बिरादरी को सख्त ऐतराज़ है. मसलन-

1. कम्युनिटी हेल्थ प्रोवाइडर्स को एलोपैथी प्रैक्टिस का लाइसेंस

यही वो प्रावधान है जिसको लेकर डॉक्टर्स सबसे ज़्यादा नाराज़ हैं.
देश भर के डॉक्टरों की नुमाइंदगी करने वाली इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) का कहना है कि बिल के सेक्शन 32 को किसी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा. इसके जरिए सरकार मेडिकल बैकग्राउंड से बाहर के साढे तीन लाख लोगों को मॉडर्न मेडिसिन (एलोपैथी) की प्रैक्टिस का लाइसेंस देना चाहती है. IMA के  महासचिव आर वी अशोकन ने कहा, “नई धारा 32 जोड़ी गई है जिसमें कि CHP जैसे कि  कम्पाउंडर्स, पैथोलॉजिस्ट, लैब टैक्निशियंस, रेडियोलॉजिस्ट्स, खून के नमूने लेने वाले आदि मेडिसिन की प्रैक्टिस का लाइसेंस हासिल कर सकते हैं, वो भी बिना किसी योग्यता प्राप्त डाक्टर की निगरानी के. 

आईएमए के पूर्व अध्यक्ष रविंद्र वानखेडकर कहते हैं, ये ऐसा है जैसे कि भारत में कानूनी रजिस्टर्ड नीम हकीम खड़े करना. अगर सरकार का विचार मरीजों की संख्या और अस्पताल-क्लिनिक में डाक्टर्स की संख्या के अंतर को पाटने की है, जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्टॉफ की कमी की वजह से है तो मैं कहना चाहूंगा कि क्या ग्रामीण भारत में अच्छे डाक्टर्स नहीं होने चाहिए?  क्या ग्रामीण भारत में रहने वाले लोग दोयम दर्जे के हैं?  क्या उनकी जान को जोखिम में डाला जाना चाहिए ऐसे  लोगों के जरिए जो सही से मर्ज को भी नहीं पहचान सकें.

धारा 31 की उपधारा (1) के तहत रजिस्टर्ड कुल लाइसेंसधारी मेडिकल प्रैक्टिशनर्स की संख्या के एक तिहाई से अधिक नहीं होने चाहिए. एक्ट की धारा 31 सभी मान्यताप्राप्त मेडिकल प्रैक्टिशनर्स का राष्ट्रीय रजिस्टर बनाने से संबंधित हैं जिसका रखरखाव एथिक्स एंड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड की ओर से किया जाएगा.

आंकड़ों के मुताबिक भारत में 11 लाख रजिस्टर्ड एलोपैथ्स हैं. इसका मतलब बिल में एक तिहाई के प्रावधान के मुताबिक करीब 3.5 लाख कम्युनिटी हेल्थ प्रोवाइडर्स  को प्राथमिक स्तर पर मरीजों को स्वास्थ्य सुरक्षा देने के लिए लाइसेंस जारी किए जाएंगे.

IMA ने आधिकारिक बयान जारी कर इस प्रावधान पर कड़ी आपत्ति जताई है. बयान मे कहा गया कि बिल में CHP की अस्पष्ट परिभाषा दी गई है. इसके मुताबिक किसी भी शख्स को जो माडर्न मेडिसिन से जुड़ा है, एनएमसी में रजिस्टर्ड किया जा सकता है और म़ॉडर्न मेडिसिन की प्रैक्टिस के लिए लाइसेंस दिया जा सकता है.

2. नेशनल एग्ज़िट टेस्ट (NEXT)

देश भर के मेडिकल छात्रों को बिल में इस टेस्ट के प्रावधान को लेकर विरोध है. बिल के सेक्शन 15 (1) के मुताबिक नेशनल एग्जिट टेस्ट (NEXT) एमबीबीएस के फाइऩल इयर में कराया जाएगा. ये मेडिसिन प्रैक्टिस शुरू करने, पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल कोर्सेज में दाखिला लेने और राज्य स्तरीय रजिस्टर या राष्ट्रीय स्तर रजिस्टर में खुद को एनरोल करने के लिए जरूरी होगा. विदेश से एमबीबीएस की पढ़ाई करके आने वालों के लिए भी ये स्क्रीनिंग टेस्ट के तौर पर काम करेगा.

मेडिकल छात्र बिरादरी ने NEXT को मौजूदा स्वरूप में पूरी तरह ठुकराते हुए कहा है कि पोस्ट ग्रेजुएट सीट हासिल करने के लिए मेरिट ही आधार होना चाहिए और मौजूदा NEET-PG की व्यवस्था को ही जारी रखना चाहिए. एम्स जैसे अग्रणी मेडिकल कॉलेज के साथ सभी रेजिडेंट्स डॉक्टर्स एसोसिएशन ने साझा बयान जारी कर एनएमसी बिल के मौजूदा स्वरूप का विरोध किया है. उनका कहना है कि ये बिल दिन रात काम करने वाले मेडिकल प्रोफेशनल्स का मखौल उड़ाने जैसा है.   

3. प्राइवेट कॉलेजों की फीस का रेग्युलेशन  

ये मेडिकल बिरादरी के विरोध की तीसरी बड़ी वजह है. बिल में कहा गया एनएमसी प्राइवेट मेडिकल कालेजों और डीम्ड यूनिवर्सिटीज में 50% सीटों पर फीस और अन्य शुल्कों का नियमन (रेग्युलेशन) करेगा. यानि प्राइवेट मेडिकल कालेजों और डीम्ड यूनिवर्सिटीज (जो इस एक्ट के प्रावधानों से निर्देशित होंगे) में 50 फीसदी सीटों पर फीस और अन्य शुल्कों के निर्धारण के लिए गाइडलाइन तय करेगा. बिल के आलोचकों का कहना है कि ये साफ नहीं है कि बाकी 50 फीसदी सीटों का क्या होगा. क्या बिना निगरानी के इन सीटो पर निजी मेडिकल कॉलेज मनमानी फीस नहीं वसूल करेंगे.  

मेडिकल बिरादरी का कहना है कि बिना सरकारी सहायता प्राप्त मेडिकल इंस्टीट्यूट्स में फीस पर कैपिंग होनी चाहिए. इसलिए अभी जो फीस रेग्युलेटिंग अथारिटी की ओर से रेग्युलेशन का सिस्टम है वही रहना चाहिए. इसके लिए बिल के सेक्शन 10(1) (i) को संशोधित करना चाहिए.

4. कमीशन में प्रतिनिधित्व का मामला

25 सदस्यीय राष्ट्रीय मेडिकल कमीशन के चेयरपर्सन और अन्य पार्ट टाइम सदस्यों के लिए सर्च कमेटी केंद्र सरकार को नाम सुझाएगी. एनएमसी के तहत चार स्वायत्त बोर्ड बनाए जाएंगे. ये बोर्ड अंडरग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन, असेसमेंट, रेटिंग और ऐथिकल कंडक्ट पर फोकस करेंगे. 

मेडिकल बिरादरी का ऐतराज है कि बिल के मुताबिक एनएमसी के लिए प्रस्तावित  25 सदस्यों में से सिर्फ 5 निर्वाचित होंगे. बाकी या तो सरकार के अधिकारी होंगे या वो जो सरकार की ओर से नामित किए जाएंगे. मेडिकल बिरादरी के मुताबिक आयोग में लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने गए सदस्यों की नुमाइंदगी अधिक होनी चाहिए ना कि सरकार की ओर से नामित किए गए लोगों की.

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