बुधवार, 17 अक्तूबर 2018

#MeToo: जितेंद्र वाला केस क्या नज़ीर बनेगा...खुशदीप



आभार: अक्षिता मोंगा (Arre.co.in)

क्या #MeToo के साथ भी वैसा ही होने वाला है जैसे कि विदेश से आयातित कैम्पेनों के साथ अतीत में होता रहा है. किस-किस ने क्या-क्या कहा?  किस-किस के खिलाफ कहापलटवार में क्या-क्या कहा गया?  एक्शन-रीएक्शन में क्या क्या हुआ?  इस पर बहुत कुछ कहा जा चुका है इसलिए उसे यहां दोहराने की कोई तुक नहीं.

कहते हैं कि बिना आग़ धुआं नहीं उठता. इसलिए कुछ महिलाओं ने आरोप लगाए तो ज़रूर सोच समझ कर ही लगाए होंगेउनकी समझ से उनके पास इसकी वजह भी रही होंगी. रिप्पल इफेक्ट की तरह एक को देख कर दूसरे में जिस तरह हिम्मत आती हैवैसे ही #MeToo में भी हुआ. जिन पर आरोप लगे उनमें से अधिकतर अपने-अपने क्षेत्र में बड़े नाम हैं या कभी बड़े नाम रह चुके हैं.

आरोप सच्चे हैं या झूठेये कोई तय नहीं कर सकता सिवाए अदालत के. लेकिन धारणा है कि बिना किसी वजह आखिर कोई महिला किसी शख्स (वो भी रसूखदार) के खिलाफ आरोप लगाने का जोखिम क्यों मोल लेगी लेकिन अदालतें धारणाओं या परसेप्शन पर नहीं चलतीवो सबूतों के आधार पर फैसले देती हैं.

ये सही है कि इस कैम्पेन से यौन उत्पीड़न के आरोपों के घेरे में आए बड़े नाम वाले लोगों का मान-मर्दन (Naming & Shaming) हुआ. ये अपने आप में ही ‘बड़ी सज़ा’ है. लेकिन जिन्होंने आरोप लगाएक्या वो आश्वस्त हैं कि वो क़ानूनन भी इन्हें सज़ा दिला पाएंगी?  क्या इसके लिए उनके पास पर्याप्त सबूत हैं?

ये भी तय है कि जिन पर आरोप लगे हैं वो खुद को पाक-साफ़ साबित करने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेंगे. बड़े से बड़े वकीलों की मदद लेंगे. अवमानना के नोटिस भी भेजें जाएंगे. ये कोई कम खर्चीला काम नहीं है. उन्हें ऐसा करने का हक़ है. देश का कानून हर नागरिक को खुद के बचाव में सफाई का मौका देता है.

ये सच है कि किसी भी महिला को वर्कप्लेस हो या कोई और जगहसुरक्षा का पूरा माहौल मिलना चाहिए...अगर कोई उनके साथ Misconduct (Verbal or Physical)  करता है तो उसे क़ानून के मुताबिक सज़ा मिलनी चाहिए. ऐसा नहीं कि इस सबंध में प्रावधान नहीं है, कानून नहीं है, कमेटियां नहीं हैं. सब कुछ हैं लेकिन फिर भी ऐसी घटनाएं होती हैं, शोषण होता है.

ये सब कैसे रुके?  #MeToo कैम्पेन को सराहा जाना चाहिए कि इसकी वजह से इस संवेदनशील मुद्दे पर देश भर में बहस तो छिड़ी. केंद्र में महिला और बाल कल्याण मंत्री मेनका गांधी की ओर से ऐसी शिकायतों पर गौर करने के लिए कमेटी बनाने का एलान भी करना पड़ा. मेनका गांधी के मुताबिक मी टू मामलों की जन सुनवाई के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की चार सदस्यीय समिति बनाई जाएगी.

#MeToo के इस दौर में एक केस की ओर ज्यादा लोगों का ध्यान नहीं गया. इस साल के शुरू में 75 वर्षीय अभिनेता जितेंद्र पर उनकी फुफेरी बहन ने ही यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया. आरोप लगाने वाली महिला ने कहा था कि 47 साल पहले 1971 में जितेंद्र एक फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में हिमाचल प्रदेश आए थे तो उन्होंने शिमला के एक होटल में उनका यौन उत्पीड़न किया था. महिला के मुताबिक उस वक्त जितेंद्र की उम्र 28 साल और महिला की 18 साल थी. 47 साल तक महिला क्यों चुप रहीइस सवाल के जवाब में महिला का कहना था कि उस वक्त उसके माता-पिता जीवित थे और वो उन्हें दुखी नहीं करना चाहती थी.   

जितेंद्र के वकील ने इन आरोपों के खिलाफ हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. जितेंद्र के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल के खिलाफ ये केस साजिशन किया गया. शिमला के महिला पुलिस थाने में 16 फरवरी 2018 को आईपीसी की धारा 354 के तहत एफआईआर दर्ज की गई.


जितेंद्र की ओर से दलील दी गई कि FIR उन्हें ब्लैकमेल करने के इरादे से दर्ज की गई. जितेंद्र की ओर से ये भी कहा गया कि आरोप लगाने वाली महिला ने ना तो शिमला के होटल का नाम बतायाना ही फिल्म का नाम बताया और ना ही फिल्म में उनके साथ काम करने वाले किसी सह-कलाकार का नाम बताया. जितेंद्र की ओर से ये तर्क भी दिया गया कि आम आदमी को पुलिस में एफआईआर दर्ज करने में काफी मशक्कत का सामना करना पड़ता हैफिर ये एफआईआर कैसे आननफानन में दर्ज कर ली गई वो भी बिना सबूत और बिना कोई पड़ताल किए.     

हाईकोर्ट ने इस मामले में सुनवाई के बाद आगे जांच या किसी तरह की भी कार्रवाई पर रोक लगा दी. महिला ने माता-पिता को दुख ना पहुंचाने का हवाला देकर शिकायत में इतने साल की देरी की जो वजह बताई, उसे नहीं माना गया.
बता दें कि जितेंद्र के वकील ने कोर्ट में लिमिटेशन एक्ट का हवाला भी दिया था. यानि किसी अपराध के लिए किसी निश्चित समय अवधि तक ही शिकायत दर्ज कराई जा सकती है. जितेंद्र के खिलाफ केस में शिकायत 47 साल बाद दर्ज कराई गई.

यौन अपराधों को लेकर क्या भारत में भी कोई समय अवधि निर्धारित हैऔर क्या उन अपराधों में समय अवधि बीत जाने के बाद शिकायत दर्ज नहीं कराई जा सकतीइस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर है कि उस अपराध में कितनी अधिकतम सजा का प्रावधान है. मान लीजिए कि स्टॉकिंग (पीछा करना) में तीन साल की अधिकतम सजा है. ऐसे में तीन साल के भीतर अपराध की शिकायत करना जरूरी है. तीन साल बीत जाने पर शिकायत नहीं की जा सकती. हालांकि जिन अपराधों में अधिकतम सजा का प्रावधान तीन साल से ज्यादा है वहां ये लिमिट नहीं लागू होती. ऐसे अपराधों में कभी भी शिकायत दर्ज कराई जा सकती है.

भारत समेत दुनिया भर में बच्चों से Sex Abuse (यौन उत्पीड़न) के अधिकतर मामले रिपोर्ट ही नहीं होते. ऐसे में क्या हमारे देश में ये प्रावधान नहीं हो सकता कि ऐसे किसी भी अपराध के लिए जीवन में आगे चलकर पीड़ित कभी भी शिकायत दर्ज करा सके. इस साल फरवरी में राष्ट्रीय महिला आयोग की रजत जयंती के मौके पर केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने कहा था कि सरकार ऐसे प्रस्ताव पर विचार करेगी जिसमें अपराध हुए काफी साल बीतने के बाद भी शिकायत दर्ज कराई जा सके. महिला और बाल कल्याण मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक ये मामला नेशनल कमिशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स को सौंप दिया गया है.

बहरहाल #MeToo जब तक सुर्खियों में है तब तक है. जब ये सुर्खियों में नहीं रहेगा तब की स्थिति पर गौर कीजिए. जिन्होंने आरोप लगाए हैं, उन्हें खुद ही अपनी लड़ाई लड़नी होगी. दूसरी तरफ महंगे वकीलों की फौज होगी. असहज करने वाले सवाल होंगे. सच आपके साथ है तो पूरा दम लगाकर लड़िए. जो दोषी हैं, उन्हें उनके अंजाम तक पहुंचा कर छोड़िए. तमाम मुश्किलात का सामना करने के बावजूद देश की न्याय व्यवस्था पर भरोसा रखिए. एक दोषी को भी सज़ा मिली तो #MeToo से #JusticePrevails का ये सफ़र देश के लिए डिफाइनिंग मोमेंट बनेगा. 

आमीन...


शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2018

#MeToo का शोर, एक गंगापुत्र की मौत और राज कपूर...खुशदीप

2018:  स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद (प्रोफेसर जी डी अग्रवाल)






 2011:  स्वामी निगमानंद


गंगा की धारा को अविरल और निर्मल देखने के लिए दोनों ने प्राणों की आहुति दे दी...ऐसा करने से पहले दोनों ने आमरण अनशन किया...जो देश के कथित कर्णधार हैं, उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंगी...2011 में भी और अब 2018 में भी...

 जो 2014 में गंगा मैया ने बुलाया हैजैसे बोल देकर, गंगा को साफ करने के बड़े बड़े वायदे कर सत्ता में आए, उन्होंने भी अनशन पर बैठे गंगापुत्रस्वामी सानंद की सुध लेना आवश्यक नहीं समझा... 111 दिन के अनशन के बाद स्वामी सानंद ने ऋषिकेश के एम्स में 11 अक्टूबर की दोपहर दम तोड़ दिया...

22 जून से हरिद्वार के उपनगर कनखल में अनशन पर बैठे स्वामी सानंद ने 9 अक्टूबर से जल का भी त्याग कर दिया था...उनका स्वास्थ्य तेजी से गिरने पर पुलिस-प्रशासन ने उन्हें अनशन स्थल से उठाकर ऋषिकेश के एम्स अस्पताल में भर्ती करा दिया था...



स्वामी सानंद की तपस्या के साथ जैसा हुआ वैसा ही कुछ स्वामी निगमानंद के साथ भी हरिद्वार में ही 2011 में हुआ था...(उस पर मैंने 'देशनामा' पर 14 जून 2011 को लिखा था, वो आप यहां विस्तार से पढ़ सकते हैं)...

गंगा के लिए स्वामी सानंद के प्राणों के बलिदान के बाद एक-दो दिन शोर मचेगा ठीक वैसे ही जैसे कि 2011 में स्वामी निगमानंद के दुनिया से जाने के बाद मचा था...फिर सब ढर्रे पर आ जाएगा...

#MeToo के खुलासों के बीच स्वामी सानंद के अनशन पर हमारे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की नज़र भी जाती तो जाती कैसे...आखिर ये कौन सोचता कि स्वामी सानंद के अनशन के दौरान ही उनकी बातो को सुनने के लिए सरकार पर दबाव बनाया जाता...

7 साल पहले स्वामी निगमानंद चले गए...अब स्वामी सानंद चले गए...गंगा वैसी ही मैली की मैली है...सरकार के करोड़ों करोड़ खर्चने के दावों के बाद भी...

ये संयोग है या दुर्योग, राज कपूर ने अस्सी के दशक में अपने निर्देशन में जो आखिरी फिल्म ‘’राम तेरी गंगा मैली’’ बनाई थी, उसका थीम आज देश में गंगा और नारी को लेकर जो मौजूदा परिदृश्य है, उसमें बड़ा प्रासंगिक नज़र आता है....

राज कपूर खुद निर्विवाद नहीं रहे...अपनी फिल्मों की हीरोइनों से उनके कथित संबंधों को लेकर बॉलिवुड की फिजा में कई तरह के किस्से तैरते रहे...लेकिन राज कपूर ने ‘’राम तेरी गंगा मैली’’ में नारी के शोषण की जो तुलना गंगा के मैली होने से की, वो बेमिसाल थी...गंगा अपने उद्गम स्थल गोमुख (गंगोत्री) से निकलती है तो दूध की तरह उजली होती है...लेकिन बंगाल में गंगा सागर में आकर मिलने से पहले इनसानों के पाप धोते धोते इतनी मैली हो जाती है कि किसी बड़े नाले के समान हो जाती है..

राज कपूर ने इसकी अनेलजी (Analogy)  के लिए फिल्म की नायिका मंदाकिनी का नाम फिल्म में 'गंगा रखा''...देवभूमि की रहने वाली नायिका को मैदानी इलाके में आने पर किस किस तरह के शोषण का सामना करना पड़ता है, इसे राज कपूर ने गंगा नदी के गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक के प्रवाह से जोड़ा था...

#MeToo  पर चिंतन के इस दौर में ये भी शाश्वत सत्य है....गंगा वैसे ही मैली है...इलाके ग्रामीण हों या शहरी, नारी को अब भी शोषण और भेदभाव का सामना करना पड़ता है...

और गंगा को अविरल और निर्मल देखने की चाहत में निगमानंदों और सानंदों को अनशन के बाद ऐसे ही मौत को गले लगाना होता है...

#हिन्दी_ब्लॉगिंग