शनिवार, 7 नवंबर 2009

बस भौंकना ही भौंकना है...खुशदीप

मुद्दों पर आधारित गंभीर लेखन...हल्का फुल्का लेखन...स्लॉग ओवर...या इनका कॉकटेल...क्या लिखूं...मैं खुद कन्फ्यूजिया गया हूं...और आपकी कुछ टिप्पणियों ने तो मुझे और उलझा दिया
है...कुछ को गंभीर लेखन पसंद आ रहा है.. उनका कहना है कि गंभीर लेखन के साथ स्लॉग ओवर मिसमैच लगता है....बात तो सही है....एकदम से गंभीर ट्रैक से कॉमेडी के ट्रैक पर आना कुछ अटपटा तो लगता है...दूसरी तरफ ऐसी भी टिप्पणियां आई हैं जिसमें कहा गया है कि वो स्लॉग ओवर मिस कर रहे हैं...

अब मैं कौन सा रास्ता निकालूं...काफी दिमाग खपाई के बाद मुझे एक रास्ता नज़र आया है....और ये आइडिया मिला मुझे मेरे बेटे के ट्यूशन शैड्यूल से...वो एक दिन छोड़ कर (आल्टरनेट) एक विषय पढ़ता है...मुझे भी अपनी ब्लॉगिंग के लिए ये आल्टरनेट फॉर्मूला अच्छा लग रहा है...एक दिन मैं लेख लिखूंगा और एक दिन स्लॉग ओवर...मिसमैचिंग का भी खतरा खत्म हो जाएगा और जिसे जो चाहिए, उसे वो भी मिलता रहेगा...इस व्यवस्था पर बाकी जो पंच परमेश्वर (मेरे लिए आप सब परमेश्वर हैं) की राय होगी वो मेरे सिर माथे पर...आज प्रयोग के तौर पर मैं ऐसी चीज लिख रहा हूं जिसमें मुद्दा भी है और गुदगुदाने का मसाला भी...बाकी ये कॉकटेल कैसा रहा, बताइएगा ज़रूर...

स्लॉग ओवर
एक बार हांगकांग में पपी (कुत्ते के बच्चे) बेचने वाली दुकान पर दो ग्राहक पहुंचे...एक भारतीय और एक चीनी नागरिक...संयोग से दोनों को जुड़वा पपी पसंद आ गए....एक पपी को भारतीय ले गया...और एक पपी को चीनी....भारतीय नागरिक पशु कल्याण संस्था से जुड़ा था...लेकिन ये संस्था भी भारत की राष्ट्रीय बीमारी भ्रष्टाचार से पीड़ित थी...महंगे कुत्ते खरीद कर उन पर भारी-भरकम खर्च दिखाकर अनुदान झटक लेने में संस्था के कर्ताधर्ता माहिर थे....पशुओं के कल्याण से हकीकत में उनका कोई लेना-देना नहीं था...

डेढ़-दो साल बाद चीनी नागरिक को भारत में कुछ काम पड़ा...उसने सोचा पपी (जो अब डॉगी बन चुका था) को भी साथ ले चलूं...और मौका मिलेगा तो देखेंगे कि पपी के भाई का क्या हाल है...खैर चीनी नागरिक अपने पपी के साथ भारत आ गया...पशु क्ल्याण संस्था गया तो वहां पपी के भाई का कोई अता-पता नहीं मिला...निराश होकर चीनी नागरिक और पपी वापस जाने लगे...तभी एक नाले से एक कुत्ते के ज़ोर-ज़ोर से भौंकने की आवाज आई...ये आवाज सुनते ही चीन से आए पपी के कान खड़े हो गए...

लहू ने लहू को पहचान लिया...झट से चीन वाला पपी नाले के पास पहुंच गया तो देखा उसका भाई मुंह ऊपर कर लगातार रोने जैसी आवाज़ में भौंक रहा था...अपने भाई की दशा देखकर चीन वाले भाई को बड़ा तरस आया....बिल्कुल मरगिल्ला शरीर...खून जैसे निचुड़ा हुआ (निचुड़े भी क्यों न भारत के सारे कुत्ते-कमीनों का खून धर्मेंद्र भाजी जो पी चुके हैं).... खैर दोनों भाइयों की नज़रें मिलीं...यादों की बारात के बिछुड़े भाइयों की तरह दोनों की आंखों में आंसू आ गए...

भारत वाले पपी ने चीन वाले भाई को देखकर कहा...तेरे तो बड़े ठाठ लगते हैं...घुपला घुपला शरीर उस पर जमीन तक झूलते बाल...बिल्कुल फाइव स्टार लुक...और बता क्या हाल है तेरे चीन में...चीन वाला पपी बोला...क्या बताऊं यार ये चीन वाले खाने को तो बहुत देते हैं...जितना मर्जी खाओ...लेकिन भौंकने बिल्कुल नहीं देते...खैर मेरी छोड तू अपनी बता, तेरी ये हालत कैसे....भारतीय पपी बोला...यहां बस दिन रात भौंकना ही भौंकना है...खाने को कुछ नहीं मिलता...

(निष्कर्ष- और कुछ हो न हो भारत में लोकतंत्र का इतना फायदा तो है कि हम यहां पान की दुकान, गली-नुक्कड़, चौपाल.... जहां चाहे, जिसे चाहे (राष्ट्रपति हो या प्रधानमंत्री, वजीर हो संतरी), किसी की भी शान को अपने कटु वचनों से तार-तार कर सकते हैं...कोई कुछ कहने वाला नहीं है...यही काम आप चीन में करके दिखाओ...फिर पता चलेगा आटे-दाल का भाव)

28 टिप्‍पणियां:

  1. मैने अवधिया जी के ब्‍लाग पर भी एक बार कमेंट किया था कि गंभीर आलेख को पढने के बाद की गंभीरता तुरंत 'चलते चलते' पढकर समाप्‍त हो जाती है .. आपने ये शिड्यूल सही चुना है .. और आपके स्‍लोग ओवर पढने के बाद अपने हाल के बारे में क्‍या चर्चा करना .. बस भूंकते चले !!

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  2. भाई वह क्या बात है, लाजवाब। आप ने बहुत ही खूबसूरती से स्लोग ओवर प्रस्तुत किया, और साथ ही बहुत सी सच्चाई भी उजागर हुई।

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  3. सहमत हूं आपसे।कम से कम लोकतंत्र मे ये तो हक़ मिला हुआ है।वैसे खुशदिल भाई आप जो भी लिखे जिसे पसंद आना है उसे पसंद आयेगा ही और जिसे पसंद नही आना है आप कुछ भी लिख डालिये उसे पसंद आयेगा ही नही इसलिये लोगों की छोडो अपने दिल की सुनो और जो दिल को अच्छा लगे वही लिखो और किसी को पसंद आये ना आये मुझे तो पसंद आयेगा ही।

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  4. केवल चिवड़ा या फ़ली या सेव उतना मज़ा नहीं देते जितना कि इन सब का मिक्सचर:) तो भैया, लगे रहो...कन्फ्यूज़िया की कोई ज़रूरत नहीं; मन में जो विचार आए उंडेलते रहो:) बस गाते रहिए--
    मैं तो चला
    जिधर चले रस्ता....

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  5. आप जो भी लिखते है दिल से लिखते है...... सो जैसे है वैसे रहे !!
    आजकी पोस्ट बेहद उम्दा है, सच है कम से कम हम अपने दिल की बात खुल कर कह तो सकते है!

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  6. भय्यी...अपने से तो ज़्यादा देर तक गम्भीर रहा नहीं जाता...मुझे तो आपका पुराना वाला स्टाईल ही पसन्द आ रहा था...कि मुद्दे की बात भी हो गयी और उसके बाद कुछ हल्का-फुल्का मिल जाने से मूड भी फ्रैश हो गया

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  7. मस्त चकाचक मस्त भाई. आजकल ब्लागिंग मे भी यही सब चल रहा है.:)

    रामराम

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  8. पोस्ट के प्रारम्भिक अंश पर मन में आई प्रतिक्रिया -


    ऐसे द्वंद्व के समय यह याद रखना आवश्यक होता है कि श्रेय मार्ग और प्रेय मार्ग सदा ही हमारे सामने खुले होते हैं, चुनाव हमारे / आपके हाथ में हैं| .....और इस कारण परिणाम भी/प्राप्य भी|

    बस, सोच समझ कर चुनाव करें क्योंकि समाज मनोविज्ञान के अनुसार प्रेय मार्गी (का प्राप्य ) अल्पायु होता है व श्रेय मार्गी का दीर्घायु | यह मानो प्रियता (+ लोकप्रियता) तथा मंगल ( + लोकमंगल) का भी प्रश्न है| ..... ४०-५० की वाह वाह करती भीड़ चाहिए या १-२ विशुद्ध खालिस पाठक जो शायद चुपचाप पढ़ कर ब्लॉग से चले जाते हों बिना टिप्पणी किए|

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  9. बहुत सुंदर लिखा आप ने , मजे दार, अब चोर को चोर नही कहेगे तो ओर क्या कहे, यह साले चुनाव के समय कितने वादे करते है... ओर फ़िर सब गायब.
    धन्यवाद

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  10. भोंकने की सुविधा ...लोकतंत्र की बस इकलौती उपयोगिता बची है हमारे देश में ..तो क्यूँ न जम कर फायदा उठायें ...
    गंभीर विमर्श और स्लोग ओवर द्वारा व्यंग्य पूर्ण हास्य ...दोनों की अपनी अहमियत है ...ये निर्णय पूरी तरह आपका होना चाहिए की आपको कब क्या पेश करना है ...पढने वालों को तो पढने का बहाना चाहिए ...बढ़िया रहा ये कोकटेल भी ...!!

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  11. यह स्लाग ओवर है ? तो फिर गंभीर लेखन क्या होगा ?

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  12. .कोई कुछ कहने वाला नहीं है...यही काम आप चीन में करके दिखाओ...फिर पता चलेगा आटे-दाल का भाव,
    नामारुप खुश कर दिया-आभार

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  13. Aji hazoor !!
    blog aapka..
    kampooter aapka...
    Bheja aapka...
    ungaliyaan aapki...
    Fir ye Cheen bhi nahi hai...
    aur ham kaun ??
    Ham to bas .....khwaam-Khwaaah ....!!!

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  14. देश की सबसे गंभीर बात को लंबे से स्लौग ओवर के बहाने जिस खूबसूरती से कह दिया आपने ..सबके बस में कहां ..रही बात अल्टरनेट या कन्टिन्यू की तो तो वो आप जाने हम तो डेली कस्टमर हैं जी रोजे आते हैं .रोजे पढते हैं ....

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  15. बहुत अच्छा फैसला!

    मुझे भी अब अपने चलते-चलते के लिये इसी प्रकार कदम उठाना होगा। संगीता जी का धन्यवाद!

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  16. .
    .
    .
    खुशदीप जी,

    "भारतीय पपी बोला...यहां बस दिन रात भौंकना ही भौंकना है...खाने को कुछ नहीं मिलता..."
    मुझे तो यह पपी भौंकने के लिये भौंकने के बजाय भूख लगने के कारण भौंकता हुआ लगता है... रही बात चीनी पपी की... भाई पेट भरा हो तो भौंके क्यों ?
    भारत के पपी इसलिये भौंकते हैं कि क्या मालूम किसी कोठी, बंगले या महल की खिड़की खुल ही जाये कभी और किसी को पता चल जाये... बाहर कोई भूखा भी सोता है...उनके घर के बाहर...नाली में...
    यह तो है चर्चा आपके स्लॉग ओवर की....


    अब बात करते हैं आपके निष्कर्ष की, इसमें निहित भाव कुछ असहज कर रहा है, लोकतंत्र हैं मित्र हम, हक है हमें सार्वजनिक जीवन के किसी भी व्यक्ति के कृत्य-कुकृत्य को DISSECT करने का... और हाँ, खबरदार ! पपी से बरोबरी नहीं करना अपन की ।

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  17. भई, आखरी पंक्तियों ने तो क्लीन बोल्ड कर दिया.
    लिखते रहिये, जो भी लिखते हैं, तुंरत लपक लिया जाता है.

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  18. खा-पीकर पिंजरे में चुपचाप पड़े रहने में "वो" मजा नहीं, जो भूखे पेट सोकर लगातार भौंकने में है। और कैसा भी कुता हो भू्ख की बजाय भौंकता तब है, जब सामने चोर दिखाई दे…। ये बात और है कि लोकतन्त्र में कुछ कुत्तों को दो बिस्किट डालकर चुप कराया जा चुका है…

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  19. हास्य का जामा पहना बड़ी गंभीर बात कह दी आपने...पर बात तो तब बनती है जब थोडा पेट भी भरा हो और थोडा भौंकने को भी मिले.

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  20. बढ़िया है। ये कॉकटेल बहुत पुरानी है पर जब भी चखिये, नई का मज़ा देती है।
    भैय्ये, टिप्पणीकर्ताओं के चक्कर में न पड़ें। हमारी मानो, ब्लागिंग आप अपने लिए कर रहे हो। तो मस्त रहो। सुझावों को सिर माथे रखें और करें मन की। ब्लागिंग में कोई शिड्यूल नहीं चलता। जब मन हो, जैसा मन हो, वैसा लिखें। हर चीज़ का स्वागत है। अपने अनुभव से कह रहे हैं कि यहां कोई शिड्यूल फॉलो करना मुश्किल है। बस, लिखने में नियमितता रहे।

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  21. jee......... yahan kam se kam bolne ki swatantrata to hai.....


    bahut achchi lagi yeh post....


    Slog ov ke to kya kahne...........

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  22. Slog over was really very humourous and the way it was presented is applaudable.

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  23. वाह अदा जी, वाह...
    आपने तो एक झटके में पराया कर दिया...हमारी खता आपकी ऐसी बेरुखी की हकदार तो न थी...हम तो आपके समेत हर ब्लॉग को अपना मानते हैं...खामख्वाह ख्याल पाल रखा था कि अपने अदने से देशनामे को भी आप जैसे मेहरबान थोड़ा बहुत तो अपना समझते होंगे...अपना समझकर ही सलाह लेने की खता कर डाली...लेकिन आपने तो दिल ही तोड़ दिया...अब कैसे जोडूं इन दिल के टुकड़ों को...

    जय हिंद

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  24. बेहतर तो यह है कि जो आपको सही लगे, वही करिये...

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  25. एक राजकपूर की फ़िल्म "अराउंड द वर्ल्ड इन एट डॉलर्स"
    उन दिनों सरकार इतने ही पैसे विदेश ले जाने देती थी।जिसे FTSकहते थे,और हमे विदेश भ्रमण का शोक सर पर मंडरा रहा था,फिर क्या था टिकट ली और निकल पड़े हांगकांग,पहले तीन दिन गुरुद्वारे में बिताए,और बाकी किसी मित्र के यहाँ। गुरुद्वारे के भाई(प्रबंधक)ने एक बिल्ली पाल रखी थी,जो अक्सर मियाओ करते पास आया करती थी। एक रोज भाऊं को कोलून में कुछ काम पड़ गया, वह सुबह तड़के निकल गया,और जब शाम को लौटा तो अपनी बिल्ली ढूंढने लगा,बिल्ली के ना मिलने पर हमसे पूछा, कही बिल्ली देखी है !हमने कहाँ वह तो सुबह से नही देखी। फिर क्या था, भाऊ ने एक छड़ उठाई और अपनी चीनी पत्नी की धुलाई करने लगा,आखिर पत्नी ने कन्फेंस किया-वह बिल्ली खा गई,(यानी कि पत्नी ने बिल्ली काटकूट कर खां ली) चीन में बिल्ली हो या कुत्ता,चीनी फीसदी मांसाहारी है। गनीमत है वह नरभक्षी नही है,

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