शनिवार, 1 सितंबर 2018

आलोचना का चॉपर पाक में उड़ सकता है, हमारे यहां क्यों नहीं...खुशदीप


क्रिकेटर से नेता बने इमरान ख़ान को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बने जुम्मा जुम्मा दो हफ्ते ही हुए हैं...लेकिन वहां कुछ घटनाएं ऐसी हुई हैं जिन्हें लेकर नई नवेली सरकार आलोचनाओं के घेरे में हैं...मीडिया में भी इन घटनाओं को जमकर तूल दिया जा रहा है...वहां के टीवी चैनलों पर प्रसिद्ध कॉमेडी शोज में भी इमरान और उनके मंत्रियों पर खूब चुटकियां ली जा रही हैं...


आइए पहले उन दो प्रमुख घटनाओं के बारे में आपको बता दें जिन्हें लेकर पाकिस्तान में बवाल मचा है..

पहली घटना है इमरान की तीसरी पत्नी बुशरा बीबी के पहले पति खावर मनेका का एक पुलिस अधिकारी से उलझना और फिर उस अधिकारी का पलक झपकते ट्रांसफर होना...

दूसरी घटना है इमरान खान का इस्लामाबाद में बानी गला स्थित अपने निजी आवास से हेलीकॉप्टर के जरिए प्रधानमंत्री आवास तक आना-जाना...

साभार- GEO TV
याद रहे कि इमरान ख़ान ने चुनाव जीतते ही कहा था कि पाकिस्तान की माली हालत बहुत ख़राब है इसलिए सबसे पहले सरकारी फिजूलखर्ची पर वो लगाम लगाएंगे...इमरान ने एलान किया कि वो इसकी शुरुआत खुद से करेंगे और भव्य प्रधानमंत्री आवास में ना रहकर उसी परिसर में स्थित तीन बेडरूम वाले अपार्टमेंट में रहेंगे...

इमरान ने पीएम हाउस को इंटरनेशनल स्टैंडर्ड के एजुकेशनल हब में तब्दील करने का एलान किया ताकि पाकिस्तान के छात्रों को विश्वस्तरीय शिक्षा सुविधाएं मिल सकें...इमरान ने पीएम आवास के 500 से ज्यादा कर्मचारियों के लंबे चौड़े लश्कर में से सिर्फ दो की सेवाएं लेने की बात कही. साथ ही कहा कि पीएम के 80 आलीशान गाड़ियों के बेड़े में से सिर्फ दो ही अपने पास रखेंगे...बाकी सभी गाड़ियों को ऑक्शन कर दिया जाएगा जिनमें अधिकतर 5 करोड़ से ऊपर की बुलेटप्रूफ हैं...

इमरान ने ये भी कहा था कि वो तो पीएम आवास स्थित 3 बेडरूम वाला अपार्टमेंट भी नहीं लेना चाहते थे बल्कि बनी गला स्थित अपने घर पर ही रहना चाहते थे लेकिन उन्हें बताया गया कि सिक्योरिटी कारणों से ऐसा नहीं किया जा सकता...

अब हुआ ये कि इमरान ने बनी गला स्थित अपने निजी घर से पीएम हाउस तक हेलीकॉप्टर से आना-जाना शुरू किया तो वहां सवाल उठने लगे कि ये कैसी फिजूलखर्ची पर लगाम है?

इमरान के बचाव में झट उनके विश्वासपात्र और नए सूचना और प्रसारण (l&B) मंत्री फवाद चौधरी मैदान में उतरे...कभी पत्रकार रह चुके चौधरी ने मुशर्रफ सरकार में भी इसी महकमे की जिम्मेदारी संभाली थी...

चौधरी का कहना है हेलीकॉप्टर से खर्च सिर्फ़ 55 रु प्रति किमी बैठता है...कहां मिलता है ऐसा हेलीकॉप्टर भाई? जब चौधरी से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि गूगल से सर्च किया है...तब से सोशल मीडिया पर उन्हें 'गूगल चौधरी' कह कर तंज कसे जा रहे हैं...

इमरान के हेलीकॉप्टर के जरिए आने जाने के पीछे ये भी तर्क दिया गया कि बनी गला स्थित घर से पीएम हाउस के बीच दूरी 15 किलोमीटर है...आने जाने में 30 किलोमीटर का सफ़र करना पड़ता है...ऐसे में इमरान नहीं चाहते कि सड़क से उनके आने जाने से और लोगों को किसी तरह की असुविधा हो...इस सड़क पर वाहनों की भारी आवाजाही रहती है...

अच्छा चलिए, अब आते हैं फवाद चौधरी की हेलीकॉप्टर से सफ़र पर 55 रूपए प्रति किलोमीटर खर्च आने की कथित गूगल थ्योरी पर...अगर 55 नहीं तो प्रति किलोमीटर हेलीकॉप्टर यात्रा पर वास्तव में कितना खर्च आता है?

पाकिस्तानी चैनल GEO.TV की रिपोर्ट के मुताबिक इमरान प्राइवेट कंपनी प्रिंसली जेट्स के हेलीकॉप्टर की सेवाएं लेते हैं...इस कंपनी के सिंगल इंजन हेलीकॉप्टर 4000 डॉलर प्रति घंटा ( करीब पांच लाख पाकिस्तानी रुपए) के हिसाब से लिए जा सकते हैं...ये प्रति मिनट 66.66 डॉलर (8198 पाकिस्तानी रुपए) बैठता है...एविएशन एक्सपर्ट्स के मुताबिक सिंगल इंजन हेलीकॉप्टर एक मिनट में करीब 3 किलोमीटर उड़ता है...इस तरह हेलीकॉप्टर प्रति किलोमीटर यात्रा का खर्च 2,670 रुपए (पाकिस्तानी करंसी) बैठता है...

यानी इमरान के बानी गला स्थित घर से पीएम हाउस तक एक बार आने जाने में सिंगल इंजन 6 सीटर हेलीकॉप्टर से 80,100 पाकिस्तानी रुपए का खर्च आता है...इमरान डबल इंजन 15 सीटर AW139 हेलीकॉप्टर इस्तेमाल करते हैं...विशेषज्ञों के मुताबिक इस तरह के हेलीकॉप्टर का प्रति किलोमीटर खर्च 6,666 पाकिस्तानी रुपए बैठता है...(अगर आप भारतीय रुपए में ये खर्च जानने के इच्छुक हैं तो आज की तारीख में भारत के एक रुपए की कीमत पाकिस्तानी मुद्रा में 1 रुपए 74 पैसे है...)

चलिए ये तो हो गई हेलीकॉप्टर गाथा...अब आते हैं इमरान की तीसरी पत्नी और आध्यात्मिक गुरु बुशरा बीबी के पूर्व पति खावर फ़रीद मनेका से जुड़े विवाद पर...बताया जा रहा है कि 23 अगस्त की रात को खावर लाहौर से पाकपट्टन जा रहे थे तभी उन्हें रात एक बजे जांच नाके पर रोका गया...पुलिस ने खावर को रुकने का इशारा किया तो वो नहीं रुके. पुलिस ने कार का कुछ किलोमीटर पीछा कर उन्हें पकड़ लिया...खावर ने बताया कि वो कौन हैं, इसके बावजूद नहीं छोड़े जाने पर उन्होंने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल किया...पाकपट्टन के डीपीओ (डिस्ट्रिक्ट पुलिस ऑफिसर) रिज़वान गोंडाल हैं...

रिजवान गोंडाल और खावर फ़रीद मनेका (फोटो आभार-डेली टाइम्स)

मामला ऊपर तक गया तो पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के नए मुख्यमंत्री और पीटीआई नेता उस्मान बुजदार ने डीपीओ गोंडाल को पिछले शुक्रवार को तलब किया...गोंडाल को बताया गया कि खावर ने शिकायत की है कि उनके साथ बदसलूकी की गई, इसलिए गोंडाल को उनके घर जाकर माफी मांगनी चाहिए...

गोंडाल ने माफी मांगने से इनकार करते हुए कहा कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया है. इसके बाद पंजाब के आईजीपी सईद कलीम इमाम ने सज़ा के तौर पर गोंडाल के ट्रांसफर आदेश जारी कर कर दिए...

पाकिस्तान में मीडिया और विपक्ष में यही आरोप लग रहे हैं कि बुशरा बीबी ने खावर मनेका से बदसलूकी की शिकायत इमरान से की थी और इमरान ने ही इस संबंध में पंजाब के मुख्यमंत्री को निर्देश दिए...

वहीं पंजाब पुलिस डीजी पब्लिक रिलेशन नायब हैदर ने एक प्रेस रिलीज जारी कर कहा कि गोंडाल का तबादला किसी राजनीतिक दबाव की वजह से नहीं बल्कि दुराचार और झूठे दावे करने के आरोप में किया गया है...

अभी कहानी में ट्विस्ट आना बाकी है...पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस मियां साकिब नसीर ने इस घटना का स्वत: संज्ञान लेते हुए बुशरा बीबी के पूर्व पति खावर मनेका को 3 सितंबर को समन किया है...सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने पंजाब के आला पुलिस अधिकारियों और मुख्यमंत्री बुज़दार के निजी सचिव और मुख्य सुरक्षा अधिकारी को भी समन किया है...

कोर्ट ने 31 अगस्त को इस मामले की सुनवाई के दौरान ये भी पूछा कि डीपीओ गोंडाल को क्यों मनेका के घर जाकर माफ़ी मांगने के लिए कहा गया और क्यों उनका ट्रांसफर किया गया...बेंच के सदस्य जस्टिस इजाज़ुल अहसान ने ये भी कहा, ‘’हम राजनीतिक दखल या दबाव को बर्दाश्त नहीं करेंगे.’’

पाकिस्तानी मीडिया में इन दोनों मुद्दों पर चटखारे लेने के साथ इमरान सरकार पर जमकर निशाना साधा जा रहा है...सोशल मीडिया पर भी सादगी के दावे करने वाली इमरान सरकार पर खूब मज़े लिए जा रहे हैं...ये जानते हुए भी कि सरकार को आए बामुश्किल चंद दिन ही हुए हैं...

चुनाव के दौरान ये कहा जाता रहा है कि इमरान पाकिस्तानी फौज की कठपुतली हैं...लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान में मीडिया में इमरान सरकार को बख्शा नहीं जा रहा है...जमकर आलोचना की जा रही है...

इमरान ने शुक्रवार को पाकिस्तान के टीवी एंकर्स के साथ बैठक में कहा कि वो आलोचनाओं का स्वागत करते हैं जिससे उन्ह़े सरकार का कामकाज दुरूस्त करने में मदद मिलेगी... इमरान ने अपनी सरकार के कामकाज का मूल्यांकन करने के लिए मीडिया से कहा कि वो उन्हें बस 100 दिन दे...

चलिए पाकिस्तान की बात छोड़िए, अब अपने देश पर लौटते हैं...उस सरकार का क्या जो खुद भी मानती है और चाहती है कि सभी मानें कि वो जो भी करती है सब चकाचक करती है...यहां जनविरोधी नीतियों की आलोचना के लिए क्या कोई गुंजाइश नहीं?

देश में ऐसा आभास देने का माहौल बनाने की कोशिश क्यों कि सरकार दूध की धुली है और तमाम खोट विपक्षी नेताओं में ही हैं...

जय भारत...जय लोकतंत्र...




रविवार, 26 अगस्त 2018

‘दुश्मन’ इमरान से क्या हम ये सीखेंगे...खुशदीप



कभी किसी ने सोचा कि हमारे देश से अंग्रेज़ राज चला गया, वायसराय चले गए...लेकिन जो लाट साहब वाली व्यवस्था उनके वक्त लागू थी वो कई मामलों में आज़ादी के 72वें साल में भी देश में जारी है...क्यों आज भी तमाम कलेक्टर जिलों में महलनुमा सरकारी कोठियों में नौकर-चाकरों के हुजूम के साथ शान-ओ-शौकत वाली ज़िंदगी जीते हैं...क्यों भव्य राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री आवास, लुटियंस जोन में मंत्रियों, जजों और नौकरशाहों के बड़े बड़े बंगले, राज्यों में सीएम हाउस, गवर्नर हाउस और मंत्रियों के रहन-सहन के लिए दिल्ली जैसी ही समानांतर व्यवस्था...आखिर भारत जैसे देश जहां करोड़ों करोड़ों लोगों को हर रोज़ आज भी आधा पेट कर ही सोने को विवश होना पड़ता है...वहां ये विलासिता का भौंडा प्रदर्शन कहां तक न्यायोचित है...

इस मामले में पड़ोसी मुल्क़ पाकिस्तान में नए प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कुछ अच्छी पहल की हैं...अच्छा कुछ दुश्मन भी करे तो उससे सीखने में कोई बुराई नहीं...इमरान ने सरकारी फिजूलखर्ची रोकने के लिए खुद को आगे किया है...उन्होंने पीएम हाउस में ना रह कर 3 बेडरूम अपार्टमेंट में रहने का फैसला किया है...पीएम हाउस को इंटरनेशनल एजुकेशन हब में तब्दील किया जाएगा जिससे छात्रों को विश्व स्तरीय शिक्षा सुविधाएं मिल सकें...इसी तरह पाकिस्तान के राज्यों में स्थित गवर्नर हाउसेज को होटल-रिसॉर्ट्स में तब्दील करने के विचार पर काम किया जा रहा है जिससे वहां से होने वाली कमाई को गरीबों के कल्याण पर खर्च किया जा सके...

पाकिस्तान के नवेले कप्तान इमरान ख़ान वहां प्रधानमंत्री के तौर पर कितनी लंबी पारी खेल पाते हैं ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा...

लेकिन इमरान ने जिस तरह अपनी पारी का आगाज़ किया है वो उम्मीद जगाने वाला है...इमरान को अच्छी तरह पता है कि उनके मुल्क़ के माली हालात कितने ख़राब है...सालाना कर्ज़ चुकाने के लिए भी कर्ज़ लेने वाला पाकिस्तान...इमरान ये सूरत बदलना चाहते हैं...इसके लिए सरकारी फिजूलखर्ची पर लगाम, एक्सपोर्ट बढ़ाना, दुनिया भर में रहने वाले पाकिस्तानियों से देश में घरेलू बैंकों के जरिए निवेश की अपील, विदेश में काला धन भेजने वालों पर लगाम और उसे वापस लाने की कोशिश, भ्रष्ट कमाई की सूचना देने वाले को पकड़ी संपत्ति या रकम में से 25 फीसदी तक इनाम आदि तमाम वो बातें हैं जिन पर इमरान ने फौरी कदम उठाने की बात कही है...

इमरान ने कहा है कि 20 करोड़ पाकिस्तानियों में सिर्फ 8 लाख पाकिस्तानी टैक्स देते हैं...इमरान ने पाकिस्तानियों को टैक्स को जकात की तरह समझने के लिए कहा है...जिससे कि वो पैसा उन गरीबों पर सरकार खर्च कर सके जिन्हें सबसे ज्यादा सेहत आदि मसलों के लिए इनकी जरूरत है...दो करोड़ पाकिस्तानी बच्चे स्कूल नहीं जाते....आधे से ज्यादा वहां बच्चे कुपोषण के शिकार हैं...इमरान ने पाकिस्तान के लोगों वादा किया है कि वो एक भी सरकारी पैसे का दुरुपयोग नहीं होने देंगे...एडवाइजर इशरत हुसैन की अध्यक्षता में सरकारी फिजूलखर्ची पर रोक लगाने के लिए बाकायदा एक विभाग बनाया गया है जो सरकार के हर महकमे में खर्च कम करने के लिए सुझाव देगा...

इमरान ने पाकिस्तान के लोगों से साथ देने की अपील की है...साथ ही उन्होंने लोगों को भरोसा दिलाया है कि तब्दीली के लिए सबसे पहले वो खुद अपने पर कई बातें अमल करने जा रहे हैं...

मसलन इमरान इस्लामाबाद में आलीशान प्राइममिनिस्टर हाउस में ना रह कर इसी के एक थ्री बेडरूम अपार्टमेंट को अपने सरकारी आवास के तौर पर इस्तेमाल करेंगे...इस अपार्टमेंट का इस्तेमाल पहले प्रधानमंत्री के मिलिट्री सेक्रेटरी अपने आवास के तौर पर किया करते थे....इमरान तो बनी गला स्थित खुद के आवास में ही रहना चाहते थे लेकिन सिक्योरिटी कारणों से उन्हें सरकारी थ्री बेडरूम में रहने का फैसला लेना पड़ा....इमरान प्राइममिनिस्टर हाउस की जगह एक इंटरनेशनल क्वालिटी के एजुकेशन सेंटर को शुरू करने का एलान कर चुके हैं, जिससे कि वहां छात्रों को ऊंचे दर्जे की शिक्षा दिलाई जा सके....

इमरान ने प्राइममिनिस्टर हाउस के 524 कर्मचारियों में से सिर्फ दो को अपने साथ रखने का फैसला किया है...साथ ही प्राइम मिनिस्टर के बेड़े में जो 84 गाड़ियां थीं, सिर्फ उनमें से 2 को अपने इस्तेमाल के लिए रखने की घोषणा की है...बाकी सभी गाड़ियों का ऑक्शन किया जाएगा...इनमें से अधिकतर बुलेटप्रूफ और 5 करोड़ से ऊपर की गाड़ियां हैं...

तमाम गवर्नर हाउस को लेकर भी इमरान नई पॉलिसी का एलान जल्द कर सकते हैं...
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  राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री समेत तमाम नेताओं और अधिकारियों के विवेकाधीन कोटे से सरकारी पैसा खर्च करने पर तत्काल प्रभाव से रोक (इमरान सरकार के सूचना मंत्री फवाद चौधरी का दावा है कि पूर्व पीएम नवाज शरीफ ने एक साल में 51 अरब रुपए का विवेकाधीन कोटे के तौर पर इस्तेमाल किया).
-   राष्ट्रपति, पीएम, चीफ जस्टिस, सीनेट चेयरमैन, स्पीकर नेशनल असेम्बली, सभी सीएम अब फर्स्ट क्लास से हवाई यात्रा नहीं कर सकेंगे...सभी को क्लब/बिजनेस में ही यात्रा करनी होगी...
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  प्रधानमंत्री इमरान ने विदेश या घरेलू यात्राओं के लिए विशेष विमान का इस्तेमाल नहीं करने का फैसला किया है. वे बिजनेस क्लास से ही यात्रा करेंगे.
-   इमरान अपने लिए आधिकारिक प्रोटोकॉल का इस्तेमाल भी नहीं करेंगे...
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  इमरान सरकारी दफ्तरों में पांच दिन के काम की जगह छह दिन का रूटीन लाना चाहते थे...इसके लिए वो शुक्रवार और शनिवार में से शनिवार की छुट्टी खत्म करना चाहते थे...पाकिस्तान में 5 डे वीक की शुरुआत 2011 में हुई थी...कैबिनेट की बैठक में ये तय हुआ कि 5 डे वीक से काम पर असर नहीं हुआ इसलिए इस व्यवस्था को फिलहाल जारी रखा जाए...साथ ही इससे सरकारी कर्मचारियों की नाराजगी का भी खतरा है...पाकिस्तान में अब सरकारी दफ्तरों के काम का वक्त सुबह 8 से शाम 4 की जगह अब सुबह 9 से शाम 5 बजे तक कर दिया गया है...

बुधवार, 2 मई 2018

AMU में 'जिन्ना'...माहौल चार्ज करने का पूरा मसाला...खुशदीप

AMU में 'जिन्ना'...
यानी माहौल को चार्ज करने का पूरा मसाला...
बस वही सब सुना जाएगा जिसे सुनने के मकसद से अलीगढ़ के बीजेपी सांसद सतीश गौतम ने AMU के VC को चिट्ठी लिखी कि यूनिवर्सिटी में जिन्ना की तस्वीर क्यों लगी है?...
अब कोई तथ्य बताने की कोशिश करेगा तो उसे देशद्रोही’,  ‘जिन्ना समर्थक’, ‘पाक परस्तक़रार देने मे पलक झपकने मे देर नहीं लगाई जाएगी...क्योंकि ये सवाल उठाया ही इसलिए गया लगता है...
लेकिन तथ्य तथ्य ही रहेंगे और इतिहास इतिहास ही रहेगा...
हां, राजनीतिक मंशा ज़रूर इन तथ्यों को सुनने से इनकार करेगी...
AMU के छात्र संघ के हॉल में लगी जिन्ना की तस्वीर को हटाने या ना हटाने का फैसला सरकार-प्रशासन का होना चाहिए, वही ये फैसला ले और AMU मैनेजमेंट को इस बारे में सूचित कर दे. शासन-प्रशासन ये भी सुनिश्चित करे कि इस मुद्दे पर किसी को राजनीतिक रोटियां सेकने का मौका ना मिले...
अब कुछ ये सवाल...
जिन्ना की तस्वीर AMU छात्र संघ के हॉल में 1938 से लगी है, इसे हटाने की मांग अचानक अब क्यों?
AMU छात्रसंघ स्वतंत्र संस्था है, जिस वक्त ये तस्वीर सेंट्रल हॉल मेंलगी थी, उस वक्त भारत अविभाजित था...उस दौर की कई नामचीन हस्तियों को उस दौर के समाज और देश में योगदान देने के लिए छात्र संघ की ओर से अपनी आजीवन सदस्यता से नवाजा गया...इनमें सर सैयद अहमद खान (AMU के संस्थापक), महात्मा गांधी, मोहम्मद अली जिन्ना, जवाहर लाल नेहरू, रबीन्द्र नाथ टैगोर, डॉ बी आर अंबेडकर, सीवी रमन आदि शामिल थे...ये जिस समय हुआ उस समय की परिस्थितियों को देखते हुआ था...उस वक्त ना देश का बंटवारा हुआ था और ना ही पाकिस्तान अस्तित्व में आया था...
बीजेपी सांसद ने जिन्ना को बंटवारे का सूत्रधार बताते हुए तस्वीर का अभी तक लगे रहने का औचित्य पूछा है...यही तर्क है तो इस मांग को तो 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान के अस्तित्व में आते ही उठा दिया जाना चाहिए था...देश की आज़ादी के 71वें साल में ये मांग क्यों?
इन 71 साल में करीब 13 साल केंद्र की सत्ता में वो पार्टी भीरही है जो अब भी देश की बागडोर संभाले हुए है...उसने पहले क्यों नहीं जिन्ना की इस तस्वीर को हटाने के लिए कदम उठाया...
अब ये बात दूसरी है कि जिन्ना की तस्वीर हटाने की मांग को बीजेपी नेता और यूपी की योगी सरकार में मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने ही बेतुका बता दिया है...मौर्य के क्या शब्द हैं उन्हे भी जान लीजिए...जिन महापुरुषों का देश के निर्माण में हाथ रहा है उन पर कोई उंगली उठाता है तो यह बेहद घटिया बात है. देश के बंटवारे से पहले जिन्ना का योगदान भी इस देश में था. इस प्रकार के बकवास बयान, चाहे उनके दल के सांसद-विधायक दें या दूसरे दलों के, उनकी लोकतंत्र में मान्यता नहीं है.
ये कहा जा सकता है कि स्वामी प्रसाद मौर्य बहुजन समाज पार्टी छोड़ बीजेपी में आए हैं इसलिए पार्टी की मूल विचारधारा से अलग बयान दे रहे हैं...ऐसे में जिन्होंने भी जिन्ना की तस्वीर को हटाने की मांग की है वो पहले मौर्य को ही मंत्री पद से हटाने और बीजेपी से बाहर करने की मांग करें...आखिर वो कैसे जिन्ना के लिए बात करते समय महापुरुष जैसा शब्द इस्तेमाल कर सकते हैं...
चलिए मौर्य को छोड़िए, लाल कृष्ण आडवाणी तो बीजेपी के लौहपुरुष रहे हैं...पार्टी को 2 सीटों से सैकड़े की संख्या पार कराने में उनका महत्ती योगदान रहा है...वो क्यों नेता, विपक्ष होते हुए 2005 में पाकिस्तान में जिन्ना की मजार पर जाकर उन्हें धर्मनिरपेक्ष होने का सर्टिफिकेट दे आए थे...देश के पूर्व वित्त, रक्षा, विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने 2009 में विमोचित अपनी किताब 'जिन्ना: इंडिया, पार्टीशन, इंडिपेंडेंस' में नेहरु-पटेल की आलोचना की थी और जिन्ना की प्रशंसा...जसवंत सिंह तो बीते 4 साल से बीमार हैं और जवाब देने की स्थिति में नहीं है लेकिन जिन्ना की तस्वीर हटाने की मांग करने वाले बीजेपी सांसद सतीश गौतम को आडवाणी से जरूर सवाल करना चाहिए कि वो क्यों जिन्ना की मजार पर गए थे....
जिन्ना की तस्वीर हटाने की मांग के साथ ही मुंबई के मालाबार हिल्स में स्थित अरबों रुपए के जिन्ना हाउस (साउथ कोर्ट) को भी ज़मींदोज़ करने की मांग करनी चाहिए, जिसका कब्ज़ा इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिसर्च (ICCR)  के पास है. ढाई एकड़ में बने इस बंगले पर मुंबई के जमीन माफिया की नजर रही है. लेकिन आखिरकार यहां दक्षिण एशियाई संस्कृति का संग्रहालय बनाने का फैसला लिया गया...लेकिन अभी इस दिशा में ICCR कोकदम उठाना है...
मुझे यहां 1999 का एक प्रकरण भी याद आ रहा है...अभिनेता दिलीप कुमार को 1998 में पाकिस्तान सरकार ने अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाजसे नवाजा था...1999 में करगिल युद्ध हुआ, जो पाकिस्तान के तत्कालीन जनरल परवेजमुशर्रफ की हिमाकत का नतीजा था और जिसमें भारत की जांबाज़ सेना के शौर्य के आगे पाकिस्तानी सैनिकों को ऊंचे रणनीतिक स्थानों पर होने के बावजूद मुंह की खानी पड़ी थी...उस वक्त शिवसेना ने दिलीप कुमार पर बहुत दबाव बनाया था कि वो निशान-ए-इम्तियाज पाकिस्तान को वापस करें...उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे...दिलीप कुमार ने तब कहा था कि वे प्रधानमंत्री वाजपेयी पर ही छोड़ते हैं वो जो भी फैसला लेंगे वो उन्हें मंजूर होगा...
तब वाजपेयी ने कहा था कि अभिनेता दिलीप कुमार के देशभक्त होने और उनकी राष्ट्र को लेकर प्रतिबद्धता पर किसी तरह का संदेह नहीं किया जा सकता...वाजपेयी ने साथ ही कहा था कि ये अवार्ड आपका है और आप जैसा ठीक समझें वैसा करें...दिलीप कुमार ने वाजपेयी के इन शब्दों के बाद निशान-ए-इम्तियाज को वापस नहीं करने का फैसला किया था.
कभी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय तो कभी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को सवालों के घेरे में लाया जा रहा है...दोनों विश्वविद्यालयों में अगर कुछ ग़लत तत्व रहे हैं या हैं तो उन्हें वहां से हटाने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए...इन विश्वविद्यालयोंके छात्रों को भी ऐसे तत्वों से दूरी बनाते हुए उनका बहिष्कार करना चाहिए...लेकिन चंद गलत तत्व कुछ गलत कर रहे हैं तो उसकी सजा पूरे के पूरे संस्थान को क्यों, यहां पढ़ने वाले सारे छात्रों को क्यों?...JNU हो या AMU, संस्थान की छवि खराब करने की कोशिश कोई भी करता है तो उसका नुकसान यहां के सभी छात्रों को उठाना पड़ता है...ये नहीं भूलना चाहिए कि उच्च कोटि की शिक्षा प्रदान करने में इन दोनों संस्थानों का जो योगदान है वो कभी नहीं मिटाया जा सकेगा...
#हिन्दी_ब्लागिंग

मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

हिन्दी, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और चमत्कार...खुशदीप




क्या ऐसा हो सकता है कि दुनिया की किसी भी भाषा की किताब या अखबार आपके सामने हो और आप उसे हिन्दी में फर्राटे के साथ पढ़ सकें?

क्या ऐसा हो सकता है कि आप दिल्ली में बैठकर फोन पर पेरिस में बैठे किसी ऐसे व्यक्ति से हिन्दी में बात करें जिसे हिन्दी बिल्कुल नहीं आती हो. आपको भी फ्रेंच का एक अक्षर नहीं आता हो. फिर भी दोनों एक दूसरे की पूरी बात को अच्छी तरह सुन सकें, समझ सकें?

क्या ऐसा हो सकता है टीचर क्लास में अंग्रेज़ी में बोले और बच्चे को साथ ही साथ सब कुछ अपनी भाषा में समझ आता चला जाए?

क्या ऐसा हो सकता है आप खास चश्मा पहन कर न्यूयॉर्क या लंदन घूमने जाएं और वहां आपको सब साइनबोर्ड, प्रिंटेड सामग्री सब कुछ हिन्दी में ही दिखाई दे?

क्या ऐसा हो सकता है कि आप अपने लैपटॉप या कंप्यूटर के पास आए और वो आपकी उम्र, लिंग के साथ-साथ आपका मूड कैसा है, ये सब भी बता दे.

क्या ऐसा हो सकता है कि खास चश्मे से किसी व्यक्ति को देखें और आपको उसका नाम, उम्र, पिता का नाम, पता सब कुछ साइड में पढ़ने को मिल जाएं.

आपको ये सारे सवाल कल्पना की उड़ान लग रहे होंगे?  लेकिन ये अब सब मुमकिन होने जा रहा है. माइक्रोसॉफ्ट में निदेशक, स्थानीयकरण (Director, Localisation)  बालेन्दु शर्मा दाधीच से हिन्दी और इसके इंटरनेट  से मेल (adaptation)  पर अक्सर अपनी जिज्ञासाओं का निवारण करता रहता हूं. बालेन्दु भाई राजभाषा तकनीक के विकास के साथ साथ हिन्दी को इंटरनेट पर प्रसारित-प्रचारित करने के लिए चुपचाप जो योगदान दे रहे हैं वो बहुत ही महत्वपूर्ण है. सभी हिन्दीभाषियों और भारत की अन्य भाषाएं बोलने वालों के जीवन पर इसका सकारात्मक असर पड़ेगा.

मान लीजिए कि कोई हिन्दी अंचल का छात्र बहुत मेधावी है लेकिन अंग्रेज़ी अच्छी ना जान पाने की वजह से उसका यूपीएससी या अन्य बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में चयन नहीं हो पाता. लेकिन अब तकनीक ऐसे छात्रों के जीवन में क्रांतिकारी भूमिका निभाने जा रही है. यानि ज्ञान की परीक्षा के लिए किसी दूसरी भाषा को जानने की बाध्यता निकट भविष्य में समाप्त होने जा रही है.

मैं भारत में अक्सर ये सवाल भी सुनता रहता हूं कि क्या हिन्दी भी संस्कृत की तरह विलुप्त होने की दिशा में बढ़ रही है?  आख़िर क्यों होती है किसी भाषा या ज़ुबान को लेकर ऐसी फ़िक्र? हिन्दीभाषी भारत समेत दुनिया में कहीं भी हैं उन्हें अपनी इस भाषा से बहुत प्रेम है. विदेश में रहने वाले हिन्दीभाषियों को ये चिंता है कि उनकी अगली पीढ़ी अंग्रेज़ी में इतनी रच बस गई है कि भविष्य में हिन्दी का नामलेवा भी कोई नहीं रहेगा.

ये तो रही विदेश की बात. आप अपने ही देश में देखिए कि ग़रीब से ग़रीब माता-पिता भी यही चाहते हैं कि उनकी संतान अंग्रेज़ी मीडियम स्कूल में पढ़े. इसके पीछे कहीं ना कहीं यही सोच है कि बच्चों के सुनहरे करियर के लिए उन्हें अच्छी अंग्रेज़ी आना बहुत ज़रूरी है. अगर वो सिर्फ़ हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाएं ही जानेंगे तो वे ऊंचे पदों तक नहीं पहुंच सकते.

अंग्रेज़ी को लेकर इतना क्रेज़ इसलिए भी ज़्यादा है क्योंकि इसे विश्व भर में संपर्क की भाषा माना जाता है. ये फ़िक्र भी रहती है कि संतान को बड़े होकर विदेश जाने का मौका मिलता है तो अच्छी अग्रेंजी जाने बिना वो कैसे दुनिया के दूसरे लोगों से संवाद (बातचीत) कर पाएगी? 

ऐसे ही सब सवालों के बीच मैं आपसे कहूं कि निकट भविष्य में ऐसी फ़िक्र करने की आपको कोई ज़रूरत नहीं रहेगी तो आपको अजीब लगेगा. जी हां, अब ना तो किसी भाषा के मृत होने का ख़तरा रहेगा और ना ही आपके लिए अंग्रेज़ी जैसी दूसरी भाषा को जानना मजबूरी रहेगा?  हां, आप शौक के लिए इसे सीखना चाहते हैं तो बात दूसरी है लेकिन ये आपके लिए अब अनिवार्यता नहीं रहेगा.

कैसे...आख़िर कैसे होगा ये सब?  इसका सीधा जवाब है तकनीक या टेक्नोलॉजी. आने वाले 50 वर्षों में तकनीक आपको ऐसी स्थिति में ले आएगी कि आपको अपनी भाषा के अलावा और किसी भाषा को सीखने की ज़रूरत नहीं रहेगी.

अपनी भाषा के हक में हम जब बात करते हैं, उसके अस्तित्व पर ख़तरा जताते हैं तो ये भूल जाते हैं कि तकनीक किस तरह चुपचाप दुनिया की तमाम भाषाओं के संरक्षण में लगी हुई है. बालेन्दु भाई के मुताबिक भारतीय भाषाओं के संरक्षण के लिए तीन चीज़ें बहुत अहम हैं और जिनका आज दुनिया में बहुत ज़ोर है और वो हैं-
1.     आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI)
2.     क्लाउड टेक्नोलॉजी
3.     बिग डेटा एनालिसिस  

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और बिग डेटा एनालिसिस के बारे में आपने सुना होगा. वहीं क्लाउड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल इंटरनेट पर रखी हुई गई सामग्री के लिए होता है.

महान विचारक आर्थर सी क्लार्क के मुताबिक अगर कोई तकनीक समुचित रूप से विकसित हो जाती है तो वो किसी जादू या चमत्कार के समान ही होती है.

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के साथ भी कुछ ऐसा ही है. इसी से संभव हो पाया है कि मशीन या कंप्यूटर में बोली हुई भाषा को समझने की क्षमता विकसित हो गई है. (जैसे कि अब मोबाइल पर आप बोलते हैं और वो खुद ही टाइप होता जाता है)

सीधी सी बात है कि कंप्यूटर आपके निर्देशों को समझने लगा है. WINDOWS में CORTANA नाम का एक सहायक आ गया है जिससे आप बात कर सकते हैं. किसी सवाल का जवाब जान सकते हैं जैसे कि आगरा में अभी कितना तापमान है और वो आपको जवाब देगा.

इसके मायने ये हैं कि कंप्यूटर से संवाद करने की दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं.

लिखी हुई पंक्तियों को बोलने की क्षमता के अलावा कंप्यूटर की देखने की क्षमता बहुत बढ़ गई है. वो अब लिखी हुई, छपी हुई, चित्रों के भीतर मौजूद शब्दों को समझने की क्षमता रखता है. माइक्रोसॉफ्ट ने ऐसी टेक्नोलॉजी बना ली है कि आपका कंप्यूटर बोलेगा तो आपकी आवाज़ में ही बोलेगा.

कंप्यूटर में आसपास की वस्तुओं और लोगों को पहचानने के साथ उनकी भावनाओं, उम्र, लिंग और हैंडराइटिंग तक को सही सही भांपने की क्षमता आ गई है. इसके लिए माइकोसॉफ्ट ने ही Video seeing AI नाम का ऐप विकसित किया है. जैसे कि एक महिला कंप्यूटर के पास आती है तो वो बता देगा कि 28 वर्षीय महिला चश्मा पहने हुए खुश दिखाई दे रही है.

जहां तक अनुवाद का सवाल है तो कंप्यूटर दुनिया की किसी भी भाषा का किसी दूसरी भाषा में अनुवाद करने लगा है. और ये वैसा मशीनी अनुवाद नहीं होता जैसा कि अभी तक आप मशीनी अनुवाद के दौरान कई हास्यास्पद स्थितियों को देखते रहे हैं...जैसे कि Around the clock को घड़ी के चारों ओर लिखा जाए.

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के माध्यम से कंप्यूटर अपने आसपास के माहौल को समझने के बाद दूसरी भाषा में अनुवाद करेगा जिससे कि त्रुटियों की गुंजाइश ना के बराबर हो जाएगी और इनसान की तरह ही अनुवाद संभव हो सकेगा.

निष्कर्ष यही है कि तकनीक हमारी भाषाओं के लिए हौवा नहीं बल्कि उन्हें हमेशा हमेशा के लिए बचाने का काम कर सकती है. साथ ही ये दुनिया की सभी भाषाओं के बीच दूरियां खत्म करने के लिए सेतु का काम भी करेगी.

कितनी तेजी से ये काम हो रहा है इसका अंदाज इसी से लगाइए कि 2006 में गूगल ट्रांसलेटर और 2007 में माइक्रोसॉफ्ट ट्रांसलेटर शुरू हुआ और हम 10 साल में हम यहां तक पहुंच गए हैं. इसी से समझिए कि किस रफ्तार से तकनीक बढ़ रही है, भाषाओं के क्षेत्र में काम कर रही है. आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के लिए चार चीज़ें अहम हैं-

1.     ज्ञान यानि Knowledge- इसमें  80 फीसदी स्तर तक सफलता मिल चुकी है.
2.      दृष्टि यानि Vision-  96 फीसदी स्तर तक सफलता
3.      बोलना यानि Speech- 93 फीसदी स्तर तक सफलता
4.      भाषा यानि Language-  65 फीसदी स्तर तक सफलता

कंप्यूटर पर अनुवाद के दौरान जो त्रुटियां अभी दिखाई देती हैं वो इसी वजह से कि हम भाषा के क्षेत्र में 65 फीसदी स्तर तक ही पहुंचे हैं. जैसे जैसे ये स्तर बढ़ता जाएगा ये त्रुटियां कम होती जाएंगी. और जो ये लोग अभी कहते हैं कि कंप्यूटर कभी अनुवाद में इनसान की बराबरी नहीं कर सकता, उन्हें भी जवाब मिल जाएगा.

कंप्यूटर साइंस के जनक ऐलन टूरिंग का कहना है कि ये जरूरी नहीं कि इनसान किसी चीज़ के बारे में पहले से जानता हो, तभी उसे बना पाए. इससे ऐसे समझिए कि कंप्यूटर मशीन अंकगणित को जाने बिना ही बड़ी से बड़ी गणना बिना किसी त्रुटि कर सकता है. वो भी तब जब कि ये सिर्फ 0, 1 दो ही सिम्बल्स को पहचानता है.
इसी तरह कंप्यूटर किसी भाषा को जाने बिना दो भाषाओं के बीच परफेक्ट अनुवाद भी कर सकता है. इसके लिए वो सहारा लेता है Statistical Translation का जो  ग्रामर, भाषा ज्ञान पर आधारित नहीं बल्कि गणित पर आधारित होता है.

इसके लिए करोड़ों वाक्य एक भाषा में और करोड़ों अनुवाद दूसरी भाषा में तैयार किए जाते है. कंप्यूटर Parallel Corpus के आधार पर सीखता है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल करते हुए अनुवाद कैसे होता है. हम अब क्लाउड की की दुनिया में हैं. जिस तरह से हम डेटा पैदा कर रहे हैं, हम अपने इंटरनेट, मेल, सर्च इंजन, अनुवाद में डेटा पैदा करते हैं वो सारा का सारा डेटा इंटरनेट पर इस्तेमाल किया जा सकता है यदि आपने उसकी अनुमति दी है.
इतने सारे डेटा का ही parallel corpus की तरह इस्तेमाल किया जाएगा तो कंप्यूटर बहुत तेजी से सीखने लगेगा. वही आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस है. एक वक्त ऐसा भी आएगा कि कंप्यूटर अच्छे से अच्छे व्याकरणाचार्य से बेहतर अनुवाद करने लगेगा. आज नहीं तो कल वो करके दिखाएगा.

अब ये सब पढ़ने के बाद आप बताइए कि तकनीक भाषा के क्षेत्र में दुनिया के लोगों के बीच दूरियां घटाएगी या बढ़ाएगी?
बालेन्दु भाई अपनी बात पर केदारनाथ सिंह की इन पंक्तियों का सहारा लेते हुए विराम लगाते हैं-

मैं लौटता हूं तुम में, ओ मेरी भाषा
जैसे चीटिंयां लौटती हैं बिलों में,
जैसे कठफोड़वा लौटता है काठ पर,
जैसे विमान लौटते हैं सारे के सारे,
एक साथ डैने पसारे हुए
हवाई अड्डे की तरफ़,
उसी तरह मैं तुममें लौटता हूं मेरी भाषा,
जब चुप रहते रहते अकड़ जाती है मेरी जीभ,
और दुखने लगती है मेरी आत्मा...

इस वीडियो में बालेन्दु भाई को खुद ही सुनिए...





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सोमवार, 18 दिसंबर 2017

गुजरात नतीजे : दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ें बीेजेपी और कांग्रेस ...खुशदीप




गुजरात-हिमाचल प्रदेश जीतने के लिए बीजेपी के वन मैन शो (मोदी मैजिक) और टू मैन आर्मी’ (नरेंद्र मोदी-अमित शाह जुगलबंदी) को सबसे बड़ा कारण माना जा सकता है. हिमाचल में बीजेपी के मुख्यमंत्री चेहरे प्रेम कुमार धूमल के चुनाव हार जाने के बावजूद पार्टी ने शानदार प्रदर्शन कर इस पर्वतीय राज्य में कांग्रेस से सत्ता झटकी है. लेकिन हिमाचल से कई बड़े मायने गुजरात से निकले जनादेश के हैं. ये तय है कि मोदी-शाह की जोड़ी केंद्र की पूरी सरकार के साथ गृह राज्य के चुनाव में खुद को नहीं झोंकती तो बाज़ी पलट भी सकती थी. गुजरात में बीजेपी छठी बार सत्ता संभालने जा रही है, लेकिन विपक्ष के तौर पर कांग्रेस इस बार जितनी मज़बूत है उतनी पिछले दो दशक में राज्य में कभी नहीं रही.

स्वस्थ लोकतंत्र के लिए विपक्ष का मजबूत होना अहम माना जाता है. ये इसलिए जरूरी है कि कहीं सत्ता पक्ष प्रचंड बहुमत की वजह से मनमानी पर ना उतर आए. गुजरात में इस बार ऐसा ही हुआ है.गुजरात से जो जनादेश निकला है, वो क्षेत्रवार ढंग से विभाजित है. सौराष्ट्र-कच्छ में कांग्रेस का हाथ बीजेपी के ऊपर रहा है तो अन्य क्षेत्रों में बीजेपी का कमल पूरी चमक के साथ खिला है, हां उत्तरी गुजरात में बीजेपी आगे जरूर रही लेकिन कांग्रेस और उसके बीच जीत का अंतर ज्यादा बड़ा नहीं रहा.  

गुजरात ने एक और संदेश दिया है. राज्य के युवा वर्ग, ग्रामीण और गरीब तबके ने कांग्रेस को पसंद किया है. 18 से 25 आयु वर्ग के युवाओं को छोड़ बाकी सभी आयु वर्गों के मतदाताओं ने बीजेपी पर ही भरोसा करना बेहतर समझा. गुजरात के किले को मोदी-शाह की जोड़ी राहुल गांधी-हार्दिक पटेल-अल्पेश ठाकोर-जिग्नेश मेवाणी के आक्रमण से बचा पाई तो इसकी सबसे बड़ी वजह है शहरी क्षेत्र के मतदाताओं का चट्टान की तरह कमल के साथ खड़े रहना. गुजरात कारोबारी बहुल राज्य माना जाता है. नोटबंदी और जीएसटी को अपने दोनों पैरों पर कुल्हाड़ी मानने वाले कारोबारियों ने आखिरकार बीजेपी के साथ चिपके रहना ही बेहतर समझा. आखिर फेविकोल का जोड़ जो है, इतनी आसानी से कोई छूट सकता था. दरअसल वो कारोबारी जिन्होंने अस्सी-नब्बे के दशक का दौर देखा है, वो अहमदाबाद के गैंगस्टर अब्दुल लतीफ का ख़ौफ़ अभी तक नहीं भूले हैं. कारोबारियों को लगा कि कहीं वहीं असुरक्षा का दौर वापस ना आ जाए, इसलिए वो जीएसटी-नोटबंदी का दंश झेलने के बावजूद मतदान के दिन कमल पर वोट दबाने गए. इस भावुक पैंतरे ने भी बड़ा काम किया कि दिल्ली की गद्दी पर बैठे गुजराती भाई की साख का सवाल है.

कारोबारियों के साथ अन्य शहरी मतदाता, उच्च शिक्षित वर्ग भी बीजेपी के साथ जुड़ा रहा. वहीं अशिक्षित वर्ग का कांग्रेस को समर्थन मिला. बीजेपी के लिए इस बार एक और प्लस-पाइंट रहा और वो ये कि जिस तरह आदिवासियों का पारम्परिक रूप से राज्य में कांग्रेस को जैसा एकजुट समर्थन मिलता रहा है, वैसा इस बार ग्रैंड ओल्ड पार्टी को नहीं मिला. संघ की ओर से आदिवासियों के कल्याण के लिए किए जाने वाले काम का बीजेपी को लाभ मिला है. माना जा सकता है कि गुजरात के कुछ क्षेत्रों में हार्दिक पटेल फैक्टर की वजह पाटीदार समुदाय के जो वोट बीजेपी ने खोए, उसकी कुछ भरपाई दूसरे क्षेत्रों में आदिवासियों के अतिरिक्त वोट हासिल करने से हुई.  

जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो पार्टी ने पिछले चुनाव की तुलना में करीब 20 सीट अधिक हासिल की तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी की खुद की कड़ी मेहनत रहा है. इसके अलावा हार्दिक पटेल (पाटीदार), अल्पेश ठाकोर (ओबीसी) और जिग्नेश मेवाणी (दलित) का मतदान से कुछ हफ्ते पहले ही कांग्रेस के साथ तालमेल करना रहा. अल्पेश तो खुद ही कांग्रेस में शामिल हो गए. इसके साथ ही अशोक गहलोत जैसे नेता के लोगों से समन्वय बनाने के हुनर ने भी कांग्रेस के ग्राफ को पहले की तुलना में ऊंचा करने में मदद की.

गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी का बार-बार मंदिरों में जाना बहुत सुर्खियों में रहा. सॉफ्ट हिंदुत्व की लाइन पकड़ कांग्रेस की कोशिश यही थी कि बीजेपी को कहीं ध्रुवीकरण का मौका ना मिले. ऐसे में अल्पसंख्यकों से रणनीति के तहत कांग्रेस ने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान दूरी बनाए रखी. ऐसे में इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि अल्पसंख्यकों ने खुद को अनदेखा महसूस किया हो और मतदान को लेकर उन्होंने वैसा जोश नहीं दिखाया जैसा कि वे पहले दिखाते रहे हैं.

ये ठीक है कि चुनावी राजनीति में अंत में जीत ही मायने रखती है. लेकिन बीजेपी को प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष के गृह राज्य में बामुश्किल मिली जीत के बाद कई चीज़ों पर गौर करना होगा. क्यों युवा मतदाता जिन्हें बीजेपी चुम्बक की तरह खींचती थी, वो पार्टी से छिटक रहे हैं. क्यों गरीब-गुरबे पार्टी को अमीर-शहरियों-कारोबारियों की पार्टी मानते हुए उसके पास आऩे से हिचक रहे हैं.

वहीं, कांग्रेस के लिए भी दीवार पर लिखी इबारत साफ है. केंद्र में यूपीए 1 कार्यकाल में मनरेगा और किसानों के कर्ज माफी जैसी योजनाओं ने 2009 में कांग्रेस के केंद्र की सत्ता में दोबारा आने का रास्ता साफ किया था. कांग्रेस की कोर पहचान गरीब, मजदूर, किसानों, अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जाति- जनजातियों की हितैषी की रही है. कांग्रेस को इस पहचान को मज़बूती से पकड़े रखना ज़रूरी है. सॉफ्ट हिंदुत्व की लाइन वहीं तक सही है जहां तक अल्पसंख्यकों में आशंकाएं और असुरक्षा बोध पैदा ना हो.

2014 लोकसभा चुनाव में लोगों ने जो मोदी सरकार से उम्मीदों का पहाड़ लगाया था, उस पर अब गंभीरता से काम करने का वक्त आ गया है. महज जुमलों से दाल नहीं गलने वाली. अगर एक करोड़ रोजगार देने का वादा किया था तो उसे पूरा करके भी दिखाएं. सी-प्लेन और बुलेट ट्रेन चलाने से कॉरपोरेट और अमीर तबका तो खुश हो सकता है लेकिन गरीब, किसान, मजदूरों के आंसू इससे नहीं पोंछे जा सकते. सत्ता पक्ष के लिए गुजरात के साथ साथ केंद्र में भी संदेश साफ है तो दूसरी तरफ विपक्ष को भी समझना चाहिए कि उसे जनहित के मुद्दे उठाने के लिए 24X7 काम करना होगा. ये देश युवा प्रधान देश है. देश का युवा तमाशा नहीं चाहता वो सच सुनना चाहता है. गंभीरता के साथ काम होते देखना चाहता है. देश के विकास का लाभ समाज के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचे. भारत सही मायने में विकसित तभी बन सकता है जब यहां के युवा वर्ग को सम्मानजक रोजगार के साथ खुशहाल होने के अवसर मिलें और उस युवा का दिल गरीब-वंचितों के लिए दर्द महसूस करे. ये बात देश के राजनीतिक कर्णधार जितनी जल्दी समझ लेंगे उतना ही उनके लिए बेहतर होगा. अन्यथा ये युवा वर्ग खुद ही राजनीतिक विकल्प बन कर अपना रास्ता तलाश लेगा. 

बहरहाल, गुजरात से बात निकली है तो दूर तलक तक जाएगी.           

बुधवार, 4 अक्तूबर 2017

2014 चुनाव से पहले किताब तो 2019 से पहले फिल्म...खुशदीप



डॉ एम एस कोहली...ये नाम लिया जाए तो आप शायद ही पहचान पाएं कि ये शख्स कौन हैं. लेकिन अगर डॉ मनमोहन सिंह कहा जाए तो आप झट से पहचान जाएंगे कि ये देश के पूर्व प्रधानमंत्री हैं. जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद देश में सबसे लंबे समय तक रहने वाले प्रधानमंत्री. डॉ सिंह के बारे में आप शायद एक बात और नहीं जानते होंगे कि ये कभी इनसान की ओर से चलाए जाने वाले रिक्शे में नहीं बैठे. इसी से पता चलता है कि उनकी शख्सियत कैसी है और उनके अंदर कैसा संवेदनशील इनसान है.

इन दिनों पॉलिटिकल फिल्में बनाने का सिलसिला चल निकला है. ऐसे में डॉ सिंह पर भी एक फिल्म बनने जा रही है. ये फिल्म डॉ सिंह पर उनके पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू की किताब द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’  पर आधारित होगी. फिल्म का नाम भी किताब के शीर्षक वाला ही होगा. ये फिल्म 21 दिसंबर 2018 को रिलीज होगी यानि 2019 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले.  

बता दें कि संजय बारू की उपरोक्त किताब भी 2014 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले लॉन्च हुई थी. फिल्म के निर्माता सुनील बोहरा के मुताबिक फिल्म की टाइमिंग को लेकर अधिक कयास नहीं लगाए जाने चाहिएं और फिल्म की निर्धारित रिलीज डेट का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है. बोहरा का कहना है कि इस तरह की बात करना गलत है. राजनीति तो दूर ऐसा कहना भी गलत है कि रिलीज डेट को लेकर कोई एजेंडा है. बोहरा का कहना है कि कॉन्ट्रेक्ट के मुताबिक मुझे अगले साल दिसंबर तक फिल्म रिलीज करनी है. बोहरा इससे पहले गैंग ऑफ वसेपुर, साहेब, बीवी और गैंगस्टर और तनु वेड्स मनु जैसी फिल्मों का निर्माण कर चुके हैं.   

संजय बारू 2004 से 2008 तक डॉ सिंह के मीडिया सलाहकार रहे थे. फिल्म में डॉ सिंह की भूमिका कोई भारतीय कलाकार निभाएगा. इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम और कांग्रेस सांसद अहमद पटेल की भूमिका भी भारतीय कलाकार ही निभाते नज़र आएंगे.      

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के अहम रोल की जिम्मेदारी इतालवी एक्ट्रेस को सौंपी जाएगी. वहीं कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के रोल में इंडो-आयरिश एक्टर नज़र आएंगे. फिल्म निर्माताओं की ओर से भारतीय या विदेशी कलाकारों के बारे में और कोई खुलासा नहीं किया गया है. फिल्म के निर्माता सुनील बोहरा के मुताबिक स्क्रिप्ट तैयार कर ली गई है और दर्शकों को फिल्म में कई चौंकाने वाली बातें भी होंगी.

The Indian Blogger Awards 2017

इकोनॉमिक टाइम्स में इस साल 6 जून को प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया था कि अभिनेता अनुपम खेर फिल्म में डॉ मनमोहन सिंह की भूमिका निभाते नज़र आएंगे. उस रिपोर्ट में ये भी कहा गया था कि फिल्म की शूटिंग अधिकतर लंदन में होगी. फिल्म निर्माता शूटिंग भारत से बाहर इसलिए करना चाहते हैं कि कोई रूकावट फिल्म के शेड्यूल को प्रभावित नहीं करे. उस रिपोर्ट में फिल्म के डायरेक्टर के तौर पर हंसल मेहता का नाम बताया गया था.  

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