शनिवार, 5 अक्तूबर 2019

सनकी मंत्री, बिनाका गीतमाला और रेडियो सीलोन...खुशदीप

सरकार तुगलकी फ़ैसले ले ले तो उसका नतीजा क्या होता है. या संस्कृति के नाम पर कोई अपना एजेंडा चलाने की कोशिश करे तो उसके दीर्घकालीन परिणाम क्या आते है. ये जानने के लिए आइए करीब सात दशक पहले चलते हैं जब देश को आज़ाद हुए पांच साल ही हुए थे.

ये वो ज़माना था जब 1952 में आज़ाद भारत के पहले पहले लोकसभा चुनाव संपन्न हुए थे. इंडियन नेशनल कांग्रेस को प्रचंड बहुमत मिला. पीएम जवाहर लाल नेहरू ने सूचना और प्रसारण का अहम मंत्रालय डॉ बालकृष्ण विश्वनाथ केसकर को सौंपा. केसकर पक्के ब्राह्मण और भारतीय शास्त्रीय संगीत के समर्पित समर्थक थे.

बी वी केसकर



केसकर का मानना था कि फिल्मों के गाने लोगों में राष्ट्रीय गौरव भरने की ज़िम्मेदारी पूरी नहीं कर रहे. ये भी सोच थी कि इन गानों में उर्दू की भरमार होती है और वो कामुक (इरोटिक) होते हैं. इसके अलावा उनका ये भी कहना था कि गानों में पश्चिमी साजों और धुनों का समावेश बढ़ता जा रहा है. केसर इनकी पहचान मानव विकास के निम्न स्तरके तौर पर करते थे.

केसकर चाहते थे कि गानों में पश्चिमी इंस्ट्रूमेंट्स की जगह बांसुरी, तानपुरा और सितार का इस्तेमाल किया जाए. केसकर का मत था कि रेडियो के ज़रिए देश की संगीत विरासत को बचा कर रखा जा सकता है. केसकर 1952 से 1962 तक देश के सूचना और प्रसारण मंत्री रहे.

शुरुआत में केसकर ने आदेश दिया कि ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित होने वाले सारे गानों की स्क्रीनिंग की जाएगी. उन्होंने साथ ही टोटल प्रोग्राम टाइम का 10 फीसदी कोटा इसके लिए फिक्स किया. केसकर ने ये भी सुनिश्चित किया कि गाना बजाते समय उसकी फिल्म का नाम ना बता जाए, सिर्फ गायक का नाम दिया जाए. केसकर के मुताबिक फिल्म का नाम देने से उसका विज्ञापन होता था...

मध्य में बी वी केसकर
केसकर के इस रवैए के ख़िलाफ़ पूरी फिल्म इंडस्ट्री एकजुट हो गई. इंडस्ट्री का कहना था कि केसकर का फैसला बाज़ार से फिल्म संगीत को गायब करने की रणनीति है और फिल्म उद्योग की साख को धक्का पहुंचाने वाला है.  विरोध में जिन फिल्म निर्माताओं के पास गानों के अधिकार थे उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के साथ ब्रॉडकास्ट लाइसेंस रद्द करने का फैसला किया. जैसे कि केसकर ने अनुमान लगाया था, फिल्म संगीत तीन महीने में ही रेडियो से पूरी तरह गायब हो गया. इसकी जगह ऑल इंडिया रेडियो शास्त्रीय संगीत का प्रसारण करने लगा.

भारत के लोग हिन्दी फिल्म संगीत को कितना पसंद करते थे, इस ज़रूरत को तब रेडियो सीलोन ने समझा. रेडियो सीलोन 1951 से ही स्पॉन्सर्ड प्रोग्राम बनाने लगा था. वहां डायरेक्टर हमीद सयानी थे.

रेडियो सीलोन के कमर्शियल प्रोग्राम तब मुंबई के सेंट ज़ेवियर कॉलेज के टेक्नीकल इंस्टीट्यूट में बनते थे. उस समय अमीन सयानी उसी कॉलेज में पढ़ रहे थे. उनके बड़े भाई हमीद सयानी तब तक स्थापित ब्रॉडकास्टर बन चुके थे. तभी बिनाका टूथपेस्ट बनाने वाली कंपनी सीबा गाइगी के लिए हिन्दी फिल्मी गानों के काउंटडाउन के आधे घंटे के स्पॉन्सर्ड प्रोग्राम की योजना बनी. इसकी ज़िम्मेदारी किसी युवा को देने की सोची गई, जो प्रोग्राम को लिखे भी, गाने भी चुने, रेडियो पर प्रेजेंट भी करे और श्रोताओं के पत्र चुनकर उनके जवाब भी दे. ये ज़िम्मेदारी तब 19 साल के अमीन सयानी को सौंप दी गई.
अमीन सयानी


इस प्रोग्राम को हिन्दी सिनेमा प्रेमियों ने हाथों हाथ लिया. देखते ही देखते अमीन सयानी अपनी जादुई आवाज़, रिसर्च और प्रोग्राम पर पकड़ की वजह से घर-घर में पहचाने जाने लगे. रेडियो सीलोन पर ये सिलसिला करीब 36 साल (1952-1988) चला. शुरू में ये प्रोग्राम आधे घंटे का होता था, बाद में इसे बढ़ाकर एक घंटे का कर दिया गया.

हर बुधवार रात 8 बजे लोग शॉर्ट वेव पर रेडियो सीलोन से चिपक कर बैठते. ये जानने के लिए कौन सा गीत उस हफ्ते सरताज बना. साल के आखिरी बुधवार वार्षिक गीतमाला में साल के सरताज गीत को जानने के लिए तो लोगों का क्रेज़ देखते ही बनता था...इसके लिए श्रोता गानों की हिट परेड को नोट करने के लिए कागज-पेन साथ लेकर बैठते थे. बुधवार को इस प्रोग्राम की तब दीवानगी ठीक कुछ ऐसे ही थी जैसे रामायण और महाभारत सीरियल्स के दूरदर्शन पर प्रसारण के समय सड़कें-गलियां खाली हो जाती थीं.

प्रोग्राम मुंबई (तब बंबई) में बनता था तो रेडियो सीलोन से कैसे प्रसारित होता था?, इसका जवाब अमीन सयानी ने 2010 में एक इंटरव्यू में दिया. उनके मुताबिक उनकी टीम हर दिन टेप पर शो को रिकॉर्ड करती थी. और फिर हर हफ्ते का कोटा स्विस एयर, एयर सीलोन या एयर इंडिया की फ्लाइट से कोलंबो भेजा जाता.

जैसे जैसे रेडियो सीलोन की भारत में लोकप्रियता बढ़ती गई, सूचना और प्रसारण मंत्री केसकर का प्रभाव घटता गया. आखिर सरकार को रेडियो से हिन्दी गानों पर लगा प्रतिबंध हटाना पड़ा.

1957 में ऑल इंडिया रेडियो पर नॉन स्टॉप फिल्मी संगीत की अवधारणा पर ऑल इंडिया वैरायटी प्रोग्राम (AIVP)  शुरू करने की योजना बनी. पंडित नरेंद्र शर्मा तब ऑल इंडिया रेडियो से जुड़े थे. उन्होंने इस अलग चैनल के लिए विविध भारती नाम सुझाया जिसे तत्काल स्वीकार कर लिया गया. 1967 में विविध भारती कमर्शियल हो गया और विज्ञापन लेने लगा. सत्तर के दशक में विविध भारती भी काफी लोकप्रिय हो गया.

इस पूरे एपिसोड से ये समझा जाना चाहिए कि कैसे केसकर के एक फैसले, जिसे निजी सनक कहना ज्यादा सही रहेगा, ने ऑल इंडिया रेडियो की कीमत पर दूसरे देश के रेडियो को भारत में लोकप्रिय होने और कमर्शियल होने की वजह से पैसे कमाने का मौका दिया. केसकर को पचास के दशक के शुरू में हिन्दी फिल्मी गाने बर्दाश्त नहीं थे तो आज अगर वो होते, और आज के गानों के बोल सुनते तो क्या करते...

निष्कर्ष यही है कि सब कुछ बदल रहा हो तो दुनिया के साथ कदमताल के लिए आप अपनी पसंदीदा विचारधारा दूसरों पर नहीं थोप सकते. आप बंदिशें लगाते हैं तो वैसे ही नतीजे सामने आते हैं जैसे केसकर के फैसले पर आए और नुकसान ऑल इंडिया रेडियो को भुगतने पड़े. ये कुछ वैसा ही है कि जैसे जिन राज्यों में शराब प्रतिबंधित है, वहां पीने वालों को शराब मिल ही जाती है...

 #हिन्दी_ब्लॉगिंग

शनिवार, 3 अगस्त 2019

डॉक्टरों में हंगामा है क्यूं बरपा...खुशदीप


डॉक्टरों में हंगामा क्यूं है बरपा,
सरकार NMC बिल जो लाई है...

नेशनल मेडिकल कमीशन यानि राष्ट्रीय मेडिकल आयोग (NMC) बिल, 2019 को लेकर सरकार और देश भर के डॉक्टरों-मेडिकल छात्रों में ठनी हुई है. मेडिकल बिरादरी को बिल के कुछ प्रावधानों को लेकर सख़्त ऐतराज़ है, वही सरकार का कहना है कि बिल के प्रावधान वर्ल्ड मेडिकल स्टैंडर्ड्स के मुताबिक है. देश की राजधानी डॉक्टरों के विरोध का सेंटर बनी हुई है. यहां एम्स, सफदरजंग, आरएमएल समेत तमाम बड़े अस्पतालों के डॉक्टर बीते तीन दिन से हड़ताल पर हैं. मरीज़ों और उनके तीमारदारों का बुरा हाल है. सरकार ने सफदरजंग अस्पताल के डॉक्टरों को चेतावनी दी है कि तत्काल काम पर लौटें वरना उनके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जाएगी.
डॉक्टरों के काम ठप करने से दिल्ली के अस्पताल में परेशान बीमार बच्चे की मा


वहीं, डॉक्टरों की देश भर में नुमाइंदगी करने वाली संस्था इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने रविवार, 4 अगस्त को दिल्ली में बैठक बुलाई है, इसमें आगे की रणनीति पर विचार किया जाएगा.

बता दें कि एनएमसी बिल संसद के दोनों सदनों से पास हो चुका है. राज्यसभा में बहस के दौरान सुझाए गए दो संशोधनों को लेकर ये बिल फिर लोकसभा में पास होने के लिए जाना है. ये दोनों संशोधन नेशनल मेडिकल कमीशन में स्टेट मेडिकल काउंसिल और मेडिकल यूनवर्सिटीज के कुलपतियों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने से संबंधित हैं. 

क्या है NMC बिल, 2019?

NMC बिल, 2019 का अहम उद्देश्य इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट 1956 को निरस्त करना और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) की जगह राष्ट्रीय मेडिकल आयोग (नेशनल मेडिकल कमीशन) को लाना है. बता दें कि MCI को 2010 में ही भंग किया जा चुका है. तब MCI के तत्कालीन अध्यक्ष केतन देसाई पर भ्रष्टाचार के आरोप सीबीआई ने लगाए थे.

बिल के मुताबिक राष्ट्रीय मेडिकल कमीशन (NMC) की जिम्मेदारियों में नए मेडिकल कॉलेजों को मंजूरी देना और मेडिकल कॉलेजों का आकलन होगा. इसके अलावा एमबीबीएस में दाखिले की परीक्षा और फाइनल इयर में एग्जिट परीक्षाओं को संचालित करना, साथ ही मेडिकल कोर्सेज की फीस को रेग्युलेट भी NMC की जिम्मेदारियों में रहेगा.

मोदी सरकार का दावा है कि बिल के जरिए ऐसा मेडिकल शिक्षा सिस्टम बनाया जाएगा जिसमें गुणवत्ता पर ध्यान देने के साथ अफोर्डेबल मेडिकल शिक्षा तक पहुंच को बेहतर बनाया जाएगा. साथ ही इसके ज़रिए देश के सभी हिस्सों में पर्याप्त मात्रा में और उच्च गुणवत्ता वाले मेडिकल प्रोफेशनल्स की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकेगी.  सरकार की ओर से इस बिल को सबसे बड़े मेडिकल शिक्षा सुधार के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है.                

पुराने NMC बिल, 2018 में क्या था? 

NMC बिल, 2018 में  ब्रिज कोर्स का प्रावधान था जिसका डॉक्टर्स और हेल्थ प्रैक्टिशनर्स ने विरोध किया था. इस ब्रिज कोर्स के जरिए होम्योपैथी, आयुर्वेद  वाले आयुष प्रैक्टिशनर्स को एक साल का ब्रिज कोर्स करने पर ऐलोपैथी की प्रैक्टिस करने की अनुमति मिल सकती थी. डॉक्टर समुदाय के विरोध और तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा से कई बैठकों के दौर के बाद संसदीय पैनल को भेजा गया. पैनल ने इस प्रावधान को अनिवार्य ना बनाने की सिफारिश की. पैनल ने उन लोगों के लिए सख्त सजा की भी सिफारिश की जो बिना ज़रूरी योग्यता के मेडिसिन की प्रैक्टिस करते हैं.      

देशभर का डॉक्टर समुदाय नए NMC बिल के विरोध में क्यों?

देश भर में डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों ने पहले ही साफ कर दिया था कि ये बिल अगर मौजूदा ही स्वरूप में संसद में पास भी हो गया तो भी इसका देश भर में पुरज़ोर विरोध किया जाएगा. दरअसल, बिल के कई ऐसे प्रावधान है जिन पर मेडिकल बिरादरी को सख्त ऐतराज़ है. मसलन-

1. कम्युनिटी हेल्थ प्रोवाइडर्स को एलोपैथी प्रैक्टिस का लाइसेंस

यही वो प्रावधान है जिसको लेकर डॉक्टर्स सबसे ज़्यादा नाराज़ हैं.
देश भर के डॉक्टरों की नुमाइंदगी करने वाली इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) का कहना है कि बिल के सेक्शन 32 को किसी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा. इसके जरिए सरकार मेडिकल बैकग्राउंड से बाहर के साढे तीन लाख लोगों को मॉडर्न मेडिसिन (एलोपैथी) की प्रैक्टिस का लाइसेंस देना चाहती है. IMA के  महासचिव आर वी अशोकन ने कहा, “नई धारा 32 जोड़ी गई है जिसमें कि CHP जैसे कि  कम्पाउंडर्स, पैथोलॉजिस्ट, लैब टैक्निशियंस, रेडियोलॉजिस्ट्स, खून के नमूने लेने वाले आदि मेडिसिन की प्रैक्टिस का लाइसेंस हासिल कर सकते हैं, वो भी बिना किसी योग्यता प्राप्त डाक्टर की निगरानी के. 

आईएमए के पूर्व अध्यक्ष रविंद्र वानखेडकर कहते हैं, ये ऐसा है जैसे कि भारत में कानूनी रजिस्टर्ड नीम हकीम खड़े करना. अगर सरकार का विचार मरीजों की संख्या और अस्पताल-क्लिनिक में डाक्टर्स की संख्या के अंतर को पाटने की है, जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्टॉफ की कमी की वजह से है तो मैं कहना चाहूंगा कि क्या ग्रामीण भारत में अच्छे डाक्टर्स नहीं होने चाहिए?  क्या ग्रामीण भारत में रहने वाले लोग दोयम दर्जे के हैं?  क्या उनकी जान को जोखिम में डाला जाना चाहिए ऐसे  लोगों के जरिए जो सही से मर्ज को भी नहीं पहचान सकें.

धारा 31 की उपधारा (1) के तहत रजिस्टर्ड कुल लाइसेंसधारी मेडिकल प्रैक्टिशनर्स की संख्या के एक तिहाई से अधिक नहीं होने चाहिए. एक्ट की धारा 31 सभी मान्यताप्राप्त मेडिकल प्रैक्टिशनर्स का राष्ट्रीय रजिस्टर बनाने से संबंधित हैं जिसका रखरखाव एथिक्स एंड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड की ओर से किया जाएगा.

आंकड़ों के मुताबिक भारत में 11 लाख रजिस्टर्ड एलोपैथ्स हैं. इसका मतलब बिल में एक तिहाई के प्रावधान के मुताबिक करीब 3.5 लाख कम्युनिटी हेल्थ प्रोवाइडर्स  को प्राथमिक स्तर पर मरीजों को स्वास्थ्य सुरक्षा देने के लिए लाइसेंस जारी किए जाएंगे.

IMA ने आधिकारिक बयान जारी कर इस प्रावधान पर कड़ी आपत्ति जताई है. बयान मे कहा गया कि बिल में CHP की अस्पष्ट परिभाषा दी गई है. इसके मुताबिक किसी भी शख्स को जो माडर्न मेडिसिन से जुड़ा है, एनएमसी में रजिस्टर्ड किया जा सकता है और म़ॉडर्न मेडिसिन की प्रैक्टिस के लिए लाइसेंस दिया जा सकता है.

2. नेशनल एग्ज़िट टेस्ट (NEXT)

देश भर के मेडिकल छात्रों को बिल में इस टेस्ट के प्रावधान को लेकर विरोध है. बिल के सेक्शन 15 (1) के मुताबिक नेशनल एग्जिट टेस्ट (NEXT) एमबीबीएस के फाइऩल इयर में कराया जाएगा. ये मेडिसिन प्रैक्टिस शुरू करने, पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल कोर्सेज में दाखिला लेने और राज्य स्तरीय रजिस्टर या राष्ट्रीय स्तर रजिस्टर में खुद को एनरोल करने के लिए जरूरी होगा. विदेश से एमबीबीएस की पढ़ाई करके आने वालों के लिए भी ये स्क्रीनिंग टेस्ट के तौर पर काम करेगा.

मेडिकल छात्र बिरादरी ने NEXT को मौजूदा स्वरूप में पूरी तरह ठुकराते हुए कहा है कि पोस्ट ग्रेजुएट सीट हासिल करने के लिए मेरिट ही आधार होना चाहिए और मौजूदा NEET-PG की व्यवस्था को ही जारी रखना चाहिए. एम्स जैसे अग्रणी मेडिकल कॉलेज के साथ सभी रेजिडेंट्स डॉक्टर्स एसोसिएशन ने साझा बयान जारी कर एनएमसी बिल के मौजूदा स्वरूप का विरोध किया है. उनका कहना है कि ये बिल दिन रात काम करने वाले मेडिकल प्रोफेशनल्स का मखौल उड़ाने जैसा है.   

3. प्राइवेट कॉलेजों की फीस का रेग्युलेशन  

ये मेडिकल बिरादरी के विरोध की तीसरी बड़ी वजह है. बिल में कहा गया एनएमसी प्राइवेट मेडिकल कालेजों और डीम्ड यूनिवर्सिटीज में 50% सीटों पर फीस और अन्य शुल्कों का नियमन (रेग्युलेशन) करेगा. यानि प्राइवेट मेडिकल कालेजों और डीम्ड यूनिवर्सिटीज (जो इस एक्ट के प्रावधानों से निर्देशित होंगे) में 50 फीसदी सीटों पर फीस और अन्य शुल्कों के निर्धारण के लिए गाइडलाइन तय करेगा. बिल के आलोचकों का कहना है कि ये साफ नहीं है कि बाकी 50 फीसदी सीटों का क्या होगा. क्या बिना निगरानी के इन सीटो पर निजी मेडिकल कॉलेज मनमानी फीस नहीं वसूल करेंगे.  

मेडिकल बिरादरी का कहना है कि बिना सरकारी सहायता प्राप्त मेडिकल इंस्टीट्यूट्स में फीस पर कैपिंग होनी चाहिए. इसलिए अभी जो फीस रेग्युलेटिंग अथारिटी की ओर से रेग्युलेशन का सिस्टम है वही रहना चाहिए. इसके लिए बिल के सेक्शन 10(1) (i) को संशोधित करना चाहिए.

4. कमीशन में प्रतिनिधित्व का मामला

25 सदस्यीय राष्ट्रीय मेडिकल कमीशन के चेयरपर्सन और अन्य पार्ट टाइम सदस्यों के लिए सर्च कमेटी केंद्र सरकार को नाम सुझाएगी. एनएमसी के तहत चार स्वायत्त बोर्ड बनाए जाएंगे. ये बोर्ड अंडरग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन, असेसमेंट, रेटिंग और ऐथिकल कंडक्ट पर फोकस करेंगे. 

मेडिकल बिरादरी का ऐतराज है कि बिल के मुताबिक एनएमसी के लिए प्रस्तावित  25 सदस्यों में से सिर्फ 5 निर्वाचित होंगे. बाकी या तो सरकार के अधिकारी होंगे या वो जो सरकार की ओर से नामित किए जाएंगे. मेडिकल बिरादरी के मुताबिक आयोग में लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने गए सदस्यों की नुमाइंदगी अधिक होनी चाहिए ना कि सरकार की ओर से नामित किए गए लोगों की.

 #हिन्दी_ब्लॉगिंग








सोमवार, 29 जुलाई 2019

हालिया बदलाव समेत RTI पर जानिए सब कुछ...खुशदीप


सूचना का अधिकार यानि राइट टू इन्फॉर्मेशन (RTI)  क़ानून में बदलाव को लेकर मोदी 2.0 सरकार ने कदम बढ़ाया है. इसके लिए संशोधन बिल लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सदनों से पास हो चुका है. 25 जुलाई को राज्यसभा में हाईवोल्टेज ड्रामे और विपक्ष के वॉकआउट के बीच संशोधन बिल पास हुआ. सरकार ने संशोधन बिल के ज़रिए आरटीआई क़ानून में क्या बदलाव किए हैं, इन्हें जानने से पहले साफ़ कर लिया जाए कि सूचना का अधिकार है क्या?   



सूचना का अधिकार क्या है?
लोकतंत्र में जनता अपनी चुनी हुई सरकार को शासन करने का अवसर प्रदान करती है. साथ ही उम्मीद करती है कि सरकार पूरी ईमानदारी के साथ अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाएगी.
लेकिन दुनिया के कई देशों में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गईं ऐसी सरकारें भी हुईं जिन्होंने अपने भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए पारदर्शिता का गला घोंटने में कोई कसर नहीं छोड़ी. ऐसी सरकारों ने जनविरोधी और अलोकतांत्रिक कदम बढ़ चढ़ कर उठाए.  

लोकतंत्र में लोक ही सर्वोपरि होने के नाते जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है, कि जो सरकार उनकी सेवा में है, वह क्या कर रही है? हर नागरिक किसी ना किसी माध्यम से सरकार को टैक्स देता है. कोई भी कहीं भी बाज़ार से सामान खरीदता है तो वो वैट, जीएसटी या एक्साइज ड्यूटी आदि के नाम पर टैक्स अदा करता है. यही टैक्स देश के विकास और वेलफेयर स्टेट के दायित्वों को पूरा करने में लगाया जाता है. इसलिए जनता को यह जानने का पूरा हक है कि उसका दिया पैसा कब, कहाँ, और किस प्रकार खर्च किया जा रहा है?  इसके लिए ज़रूरी है कि जनता को सूचना का अधिकार मिले जो कि क़ानून के ज़रिए ही संभव है. सूचना अधिकार के ज़रिए राष्ट्र अपने नागरिकों को अपनी कार्य और शासन प्रणाली को सार्वजनिक करता है.

मोदी सरकार ने RTI  क़ानून में अब क्या किए बदलाव?
विपक्ष का कहना कि मूल क़ानून में जो बदलाव किए जा रहे हैं वो आरटीआई वॉचडॉग की स्वतंत्रता का गला घोटने वाले हैं और इसे आख़िरकार दंतविहीन (Toothless)  बनाने वाले हैं. वहीं सरकार का कहना है कि संशोधन से सूचना अधिकारियों की शक्तियों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है.

आइए पहले जानिए कि क्या नया किया गया है...

1. अभी तक मुख्य सूचना आयुक्त (CIC) और सूचना आयुक्तों का कार्यकाल पांच साल का निर्धारित होता था. अब ऐसा नहीं होगा और उनका कार्यकाल कितना होगा ये केंद्र सरकार पर निर्भर होगा...

2. अभी तक CIC और सूचना आयुक्तों का वेतन भी तय होता था...अब ये केंद्र सरकार के हाथ में होगा...अभी तक इनका वेतन मुख्य चुनाव आयक्त और चुनाव आयुक्तो के समकक्ष होता है जो खुद ही सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर होता है...इन्हें प्रति माह ढाई लाख रुपए वेतन, 34,000 रु मासिक भत्ता, किराया मुक्त फर्निश्ड आवास और 200 लीटर ईंधन प्रति माह मिलता है...सरकार के मुताबिक सूचना आयोग वैधानिक निकाय है जबकि चुनाव आयोग सांविधानिक निकाय है. सरकार सूचना आयुक्तों का वेतन कम भी कर सकती है....लेकिन मौजूदा सूचना आयुक्तों का वेतन वही रहेगा जो अभी उन्हें मिल रहा है...

3. जैसे केंद्र में CIC और सूचना आयुक्त होते हैं वैसे ही राज्य में भी मुख्य सूचना आयुक्त (SCIC) और सूचना आयुक्त भी होते हैं...अभी केंद्र में इन आयुक्तों की नियुक्ति तीन सदस्यीय पैनल करता है...जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का नेता, और पीएम की ओर से नियुक्त कोई कैबिनेट मंत्री होता है...ऐसे ही राज्य में इन आयुक्तों की नियुक्ति करने वाले पैनल में मुख्यमंत्री, विधानसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का नेता और सीएम की ओर से नियुक्त कोई राज्य का कैबिनेट मंत्री होता है...

नए बदलाव में केंद्र के साथ साथ राज्यों में भी मुख्य सूचना आयुक्त और दूसरे सूचना आयुक्तों की नियुक्ति और कार्यकाल निर्धारित करने का अधिकार भी केंद्र सरकार के पास आ जाएगा...ये राज्य विधायिकाओं की स्वतंत्रता को निरस्त कर देगा...इन सब सूचना आयुक्तों का कार्यकाल केंद्र सरकार के Pleasure (खुशी) पर निर्भर रहेगा...यानि पूरी संभावना कि सूचना आयुक्त सरकार के इस Pleasure को बनाए रखने का पूरा ध्यान रखेंगे जिससे कि उनका कार्यकाल पूरा रहे, ज्यादा ही कृपा रहे तो आगे भी कार्यकाल मिलता रहे.

4. अभी तक व्यवस्था है कि CIC हो या SCIC या फिर दूसरे सूचना आयुक्त, उनका कार्यकाल तय पांच साल या 65 साल की उम्र में जो भी पहले हो वहीं तक होता है. यहां ये भी स्पष्ट है कि कोई सूचना आयुक्त तरक्की पाकर मुख्य सूचना आयुक्त बनता है तो उसका कार्यकाल (सूचना आयुक्त और मुख्य सूचना आयुक्त मिलाकर) पांच साल से ज्यादा नहीं होगा. लेकिन अब कार्यकाल फिक्स करना केंद्र सरकार के हाथ में होगा...

5. जब सभी सूचना आयुक्तों (केंद्र चाहे राज्य) का कार्यकाल केंद्र सरकार के हाथ में होगा तो उनको हटाना भी ज़ाहिर है केंद्र सरकार के हाथ में ही रहेगा...अभी तक जो व्यवस्था थी उसके मुताबिक केंद्र में मुख्य सूचना आयुक्त और दूसरे सूचना आयुक्तों को हटाने का अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति के पास निहित था...इसी तरह राज्य में ये अधिकार राज्यपाल के पास था...वो भी ऐसी सूरत में होता था कि सुप्रीम कोर्ट की जांच के बाद उनके कार्यालय से बर्खास्तगी के समुचित कारण पाए जाएं...

सूचना के अधिकार का इतिहास

अंग्रेज़ों ने करीब ढाई सदी तक भारत पर शासन किया. इस दौरान ब्रिटिश हुकूमत ने भारत के लिए शासकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 बनाया. इसके ज़रिए ब्रिटिश हुकूमत किसी भी सूचना को गोपनीय रख सकती थी. 1947 में आज़ादी मिलने के बाद ये एक्ट भारत में बदस्तूर जारी रहा. आने वाली सरकारें एक्ट की धारा 5 व 6 के प्रावधानों का लाभ उठकार जनता से सूचनाएं छुपाती रहीं.
   
सूचना के अधिकार को लेकर कुछ जागरूकता 1975 में उत्तर प्रदेश सरकार बनाम राजनारायण  मामले से हुई. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में पब्लिक सर्वेन्ट्स के सार्वजनिक कार्यों का ब्योरा जनता को प्रदान करने की व्यवस्था की.  

वर्ष 1982 में दूसरे प्रेस आयोग ने शासकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 की विवादस्पद धारा 5 को निरस्त करने की सिफारिश की. इसके पीछे उसका तर्क था कि ये कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया था कि गोपनीयक्या है और शासकीय गोपनीय बातक्या है? इसलिए परिभाषा के अभाव में यह सरकार के ऊपर था कि कौन सी बात को गोपनीय माना जाए और किस बात को सार्वजनिक किया जाए?

1989 में कांग्रेस की सरकार गिरने के बाद वीपी सिंह की सरकार सत्ता में आई, जिसने सूचना का अधिकार कानून बनाने का वादा किया. इस सरकार ने संविधान में संशोधन करके सूचना का अधिकार कानून बनाने का एलान भी किया. कोशिशों के बावजूद वीपी सिंह सरकार इसे लागू नहीं कर सकी. जल्दी ही इस सरकार के गिर जाने की वजह से भी इस दिशा में कारगर कदम नहीं उठाया जा सका.  

वर्ष 1997 में केंद्र में संयुक्त मोर्चा सरकार ने एच.डी शौरी की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित करके मई 1997 में सूचना की स्वतंत्रता का ड्राफ्ट पेश किया, किन्तु शौरी कमेटी के इस ड्रॉफ्ट को केंद्र में संयुक्त मोर्चे की दो सरकारों ने दबाए रखा.
वर्ष 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में संसद ने सूचना की स्वतंत्रता विधेयक( फ्रीडम ऑफ इन्फॉर्मेशन बिल) पास किया इसे जनवरी 2003 में राष्ट्रपति की मंजूरी मिली, लेकिन इसकी नियमावली बनाने के नाम पर इसे लागू नहीं किया गया.

2004 में यूपीए की सरकार केंद्र में बनने के बाद पारदर्शिता युक्त शासन और भ्रष्टाचार मुक्त समाज बनाने के लिए 12 मई 2005 को सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 संसद में पास किया और इसे 15 जून 2005 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली.12 अक्टूबर 2005 को यह कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू किया गया. राष्ट्रीय स्तर पर अमल में आने से पहले ही नौ राज्यों ने इसे अपना रखा था. इनमें तमिलनाडु और गोवा (1997), कर्नाटक (2000),  दिल्ली (2001), असम, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं महाराष्ट्र (2002)  तथा जम्मू-कश्मीर (2004) शामिल थे.

RTI क़ानून बनने के पीछे जनमुहिम
आरटीआई क़ानून बनने की जनमुहिम में कई लोगों का योगदान रहा लेकिन यहां विशेष तौर पर तीन नामों का ज़िक्र ज़रूरी है. सिविल सर्विसेज़ छोड़ सोशल वर्क से जुड़ी अरुणा रॉय, पूर्व एयर चीफ मार्शल के बेटे निखिल और राजस्थान के रहने वाले ओजस्वी वक्ता शंकर.

अरुणा रॉय की लिखी किताब आरटीआई कैसे आईमें 18 वर्ष की इस जनमुहिम का विस्तार से उल्लेख है. अरुणा रॉय ने 1975 में नौकरी से इस्तीफा दिया और एनजीओ सोशल वर्क एंड रिसर्च सेंटर’ (SWRS) के साथ जुड़ गईं. SWRS अजमेर (राजस्थान) में किसान-मजदूरों के लिए काम कर रहा था. यहीं काम करते हुए अरुणा रॉय से कठपुतली कला में माहिर शंकर मिले. वे लोगों में अपने भाषणों से जोश भरते थे. 1983 में SWRS छोड़ने के बाद भी शंकर उनके साथ रहे.

आगे चलकर निखिल भी इनके साथ जुड़े जो अमेरिका में अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर आ गए थे. वे भी किसान- मजदूरों के लिए काम करना चाहते थे. 1983 में अरुणा, शंकर और निखिल ने मिलकर काम करने का फैसला किया. 1987 में इन्होंने अजमेर के देवडूंगरी गांव को अपनी कर्मस्थली बनाया.  

तीनों ने सोहनगढ़ी गांव में मजदूरों को सरकार की ओर से निर्धारित न्यनूतम मजदूरी 11 रुपए से कहीं कम दिए जाने के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई. इनके कहने पर मजदूरों ने काम बंद कर दिया. फिर सरपंच और अधिकारियों के ख़िलाफ़ जनसुनवाई शुरू होने पर मजदूरों की बात सुनी गई और उन्हें पूरी मजदूरी मिलनी शुरू हो गई.  

इसके बाद तीनों ने मजदूर किसान शक्ति संगठन(MKSS) बनाया जो आगे जाकर आरटीआई को जन्म देने वाला बना. MKSS के तहत जनसुनवाइयों का फिर तो सिलसिला चल पड़ा. 

1995 तक ये मुहिम न्यूनतम मजदूरी से आगे बढ़कर एक कानून की मांग तक पहुंच गई. हर जगह सरकारी कागजों को गोपनीयता कानून का हवाला देकर छुपा लिया जाता था. ऐसे में इन कागजों को निकालने के लिए एक कानून की जरूरत थी जिससे एक नागरिक को कम से कम अपने हक के कागजों तक पहुंच मिल सके. यानि उसे सूचना का अधिकार मिले.

2001 में लोगों के सूचना के अधिकार के लिए राष्ट्रीय अभियान (NCPRI)’ का सम्मेलन बुलाया गया. 2002 में राजस्थान में पहली बार फ्रीडम ऑफ इन्फॉर्मेशन आया जो आरटीआई की दिशा में पहला कदम था. 2003 में MKSS ने इस कानून को देश भर में लागू करने के लिए दिल्ली में आंदोलन किया. यहां उन्हें अरविंद केजरीवाल और अन्य लोगों का समर्थन मिला. आखिरकार 2005 में यूपीए सरकार ने फ्रीडम ऑफ इन्फॉर्मेशन को राइट टू इन्फॉर्मेशनके रूप में लागू किया. 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

मंगलवार, 23 जुलाई 2019

बुढ़ापा हुआ पुराना, अब खुद की क्लासिक या डरावनी पेंटिंग देखें...खुशदीप



खुद को उम्रदराज़ होने पर देखने की चाहत...

अपना फोटो को क्लासिक पोर्ट्रेट में बदलने की ख्वाहिश...

खुद का डरावना चेहरा देखने की सनक...

फोटो आभार- एआईपोर्ट्रेट्स डॉट कॉम

जी हां, ये सब मुमकिन है. सोशल मीडिया पर अपने जानने वालों की बुढ़ापे की तस्वीरें देख देख कर अब तक आप फेसऐप के बारे में तो काफ़ी कुछ जान गए होंगे. ये ऐप इतनी तेज़ी से वायरल हुआ कि तमाम सेलेब्रिटीज़ को भी अपने घेरे में ले लिया.

फेसऐप पर बाद में आते हैं. पहले ये जान लें कि कैसे अपनी फोटो को क्लासिक पोर्ट्रेट और डरावने अंदाज़ में बदला जा सकता है. इस काम के लिए आपको इस वेबसाइट की मदद लेनी होगी. ये वेबसाइट किसी भी फोटो को आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की मदद से पुरानी क्लासिक पेंटिंग का लुक दे सकती है. ये साइट यही नहीं आपके लुक को ख़ौफ़नाक भी बना सकती है. ये साइट हज़ारों क्लासिकल पोर्ट्रेट्स के ट्रेंड ऐल्गोरिथ्म्स पर काम करती है.

फोटो आभार- एआईपोर्ट्रेट्स डॉट कॉम


वेबसाइट के डेवेलपर्स का दावा है कि इस साइट से किसी भी यूज़र की निजता को कोई ख़तरा नहीं है. इनके मुताबिक जो भी तस्वीर सर्वर पर आती है उसे प्रोसेस करने के बाद तत्काल डिलीट कर दिया जाता है.

ब बात करते हैं बुढ़ापा दिखाने वाले ऐप की

लोग खुद के साथ-साथ अपने जानने वालों की तस्वीरों को भी इस ऐप का इस्तेमाल कर देख रहे हैं कि वो उम्रदराज़ होने पर कैसे दिखेंगे. यहां तक कि क्रिकेटर्स, फिल्म स्टार्स और तमाम सेलेब्रिटीज़ की तस्वीरों के साथ भी इस एप्प को आज़माया जा रहा है.
अगर आपके मन में भी खुद के चेहरे को बड़ी उम्र में ‘फेसऐप’ के ज़रिए देखने की इच्छा जागी है तो सावधान. ऐसा करने से पहले आप अपनी ‘प्राइवेसी’ को संभावित ख़तरे के बारे में जान लें.  

फेसऐप कैसे करता है काम?

फेसऐप’ एक ऐसा ऐप है जिसके जरिए यूजर्स किसी भी तस्वीर पर ‘एज फिल्टर’ का इस्तेमाल कर सकते हैं. साथ ही देख सकते हैं कि कोई शख्स (पुरुष या महिला) उम्रदराज़ होने पर कैसा दिखेगाफेसबुक समेत सोशल मीडिया के तमाम  प्लेटफार्म्स पर लोग ऐसी तस्वीरों को शेयर कर रहे हैं.

फेसऐप को रूसी डेवेलपर कंपनी वायरलेस लैब ने बनाया है. इस ऐप के इस्तेमाल से निजता को जो खतरा जताया जा रहा है उसके पीछे इसके नियम और शर्तों का हवाला दिया जा रहा है.

क्या हैं फेसऐप के नियम और शर्तें

इन नियम और शर्तों के मुताबिक 'आप फेसएप्प को अपने कंटेंट का ना बदलने वाला,नॉनएक्सक्लूसिवरॉयल्टी फ्रीविश्वव्यापीपूरा भुगतान हुआट्रांसफर किए जा सकने वाला सब लाइसेंस देते हैं जिसका इस्तेमाल कंटेंट को दोबारा प्रोड्यूस करने, मोडिफाई, अडैप्ट, प्रकाशित, अनुवाद करने के लिए किया जा सकता है.  

ऐसी आशंका जताई जा रही है आप इस ऐप का इस्तेमाल करते हैं तो इसके जरिए सीधे तौर पर आपके फोन में मौजूद कंटेट, आईपी पता, ब्राउजर किस्म, तस्वीरों और नाम तक रिकॉर्ड हो जाता है. फेसऐप की नीति के मुताबिक कंपनी इस ऐप से जुड़ी सभी चीजों का इस्तेमाल अपने व्यावसायिक हितों के लिए कर सकती है.

क्या तस्वीरों का हो सकता है दुरुपयोग?

ऐसे ऐप के इस्तेमाल से इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि भविष्य में आपकी तस्वीरों का इस्तेमाल कॉमर्शियल या सार्वजनिक तौर भी हो सकता है. यानि इन्हें आपकी पसंद के मुताबिक टेलिमार्केटिंग विज्ञापनों और मार्केटिंग के दूसरे फॉर्मेट्स में भी यूज़ किया जा सकता है.

ऐसी भी चिंताएं हैं कि फेसऐप सिर्फ आपकी उन्हीं फोटो को ही अपलोड नहीं करता जिन पर आप इसके सर्वर में एज फिल्टर का इस्तेमाल करते हैं, बल्कि वो आपके फोन की बाकी सभी तस्वीरों को भी अपलोड कर लेता है. लेकिन अभी तक ये आशंका मात्र ही है क्योंकि सुरक्षा शोधकर्ताओं को अभी तक इस बात की पुष्टि करता कोई सबूत नहीं मिला है. ये सच है कि जिस फोटो पर आप एज फिल्टर का इस्तेमाल करते हैं वो फेसऐप सर्वर्स पर अपलोड हो जाती है.

फेसऐप ने दी स़फाई
फेसऐप ने स्पष्टीकरण दिया है कि इसके इस्तेमाल से यूजर्स की निजता को खतरा नहीं है. एक बयान में फेसऐप ने कहा, “फेसऐप अधिकतर फोटो प्रोसेसिंग क्लाउड में करता है. हम सिर्फ वही फोटो अपलोड करते हैं जिसे यूज़र एडिटिंग के लिए चुनता है. हम कभी फोन से किसी दूसरी तस्वीर को क्लाउड को ट्रांसफर नहीं करते. साथ ही अधिकतर तस्वीरें अपलोड की तारीख से 48 घंटे में हमारे सर्वर से डिलीट कर दी जाती हैं. हम यूजर्स के ऐसे आग्रह भी स्वीकार करते हैं कि उनके सारे डेटा को हमारे सर्वर से हटा दिया जाए. फेसऐप का कहना है कि हमारी शोध-विकास (R&D) टीम रूस में है लेकिन ये यूजर्स डेटा को रूस में स्टोर नहीं करते.

अमेरिकी सांसद ने कहा- फेसऐप की FBI जांच करे

अमेरिका में भी फेसऐप को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं. अमेरिकी सांसद चक शुमेर ने कहा है कि फेडरल ब्यूरो ऑफ इंवेस्टीगेशन (FBI) को जांच करनी चाहिए कि क्या अमेरिकी यूजर्स का डेटा रूस में स्टोर किया गया है.
एप्स और वेबसाइटों के प्राइवेसी जोखिम और उल्लंघनों पर नज़र रखने वाले संगठन प्राइवेसी इंटरनेशनल ने कहा है कि यूजर्स के फोटो का इस्तेमाल करने वाले फेसऐप जैसे ऐप यूजर्स के डेटा का दुरुपयोग कर सकते हैं. लोगों की तस्वीरों पर फिल्टर अप्लाई करने से फेसऐप उनके चेहरों का विस्तृत बायोमीट्रिक नक्शा तैयार कर लेता है जो कि उतना ही विशिष्ट होता है जितना कि किसी शख्स का फिंगरप्रिंट या डीएनए होता है.

एक और प्राइवेसी खतरा ये है कि यूजर्स की फोटो का इस तरह के ऐप अपने स्मार्ट एलगोरिथ्म्स को ये सिखाने में भी कर सकते हैं कि लोगों के चेहरे उम्र बढ़ने पर कैसे बदलेंगे. फिर ऐसे सोल्यूशन्स विकसित कर सकता है जो निगरानी और मॉनिटरिंग के लिए चेहरे की पहचान का इस्तेमाल करते हैं.

ऐसे ही खतरे तब भी जताए गए थे जब इस साल जनवरी में फेसबुक पर #10YearChallenge हैशटेग वायरल हुआ था. इसमें लोग 10 साल पहले की अपनी फोटो को अपलोड कर दिखा रहे थे कि उनमें कैसा बदलाव आया.

पहले भी फेसऐप के फिल्टर पर हुआ विवाद

ये पहला मौका नहीं है कि फेसऐप का गलत वजह से नाम सामने आ रहा है. दो साल पहले कंपनी ने एक जातीयता फिल्टर बनाया था जिसके जरिए लोग अपनी तस्वीर को किसी दूसरे देश या नस्ल के शख्स के रूप में बदल कर देख सकते थे. विवाद के बाद फेसऐप ने माफ़ी मांगी थी और इस फिल्टर को हटा लिया था.    

#हिन्दी_ब्लॉगिंग    


सोमवार, 22 जुलाई 2019

क्या बला है टिकटॉक? क्यों सरकार को फ़िक्र...खुशदीप



सोशल मीडिया पर टिकटॉक ऐप के जरिए आपके किसी दोस्त की ओर से शेयर किए गए वीडियो से आपके चेहरे पर कभी मुस्कान आई होगी. हो सकता है कि आपने भी उसे अपने फ्रेंड सर्किल में शेयर किया हो. लेकिन ठहरिए, इस ऐप का हंसने-हंसाने के लिए ही इस्तेमाल नहीं हो रहा. चीन से संचालित इन ऐप के जरिए भारत विरोधी कंटेंट’  और अश्लील वीडियो क्लिप्स शेयर किए जाने के खतरे को लेकर भारत सरकार ने गंभीर रुख अपनाया है.


भारत में टिकटॉक ऐप पर बैन की तलवार लटक रही है. भारत सरकार ने टिकटॉक के साथ ही हेलो ऐप को नोटिस जारी कर 22 जुलाई तक 24 सवालों पर जवाब तलब किए हैं. साथ ही चेतावनी दी है कि अगर संतोषजनक जवाब नहीं मिले तो इन दोनों ऐप को बैन किया जा सकता है. सरकार की ओर से तय मियाद ख़त्म होने से पहले टिकटॉक ने रव बड़ा एलान किया है. टिकटॉक का कहना है कि ये भारतीय यूजर्स का डेटा अब भारत में ही स्टोर करेगी और यहां सेंटर खोला जाएगा. कंपनी अभी तक सिंगापुर और अमेरिका में ऐसा डेटा स्टोर कर रही थी. टिकटॉक और हेलो ऐप को चीन की कंपनी बाइटडॉन्स (ByteDance) संचालित करती है. टिकटॉक शॉर्ट ड़्यूरेशन वीडियो ऐप है जिसमें लोग ह्यूमर या अपनी अन्य टेलेंट दिखाने के लिए वीडियो बनाते हैं.    

सरकार ने 24 सवालों पर मांगा था जवाब
बता दें इलेक्ट्रोनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के साइबर ल़ॉ और ई-सिक्योरिटी विंग (MeitY) ने टिकटॉक और हेलो ऐप प्लेटफॉर्म्स के ऑपरेटर्स को बुधवार को सख्त नोटिस भेज कर 22 जुलाई तक जवाब मांगा है.

मंत्रालय ने टिकटॉक और हेलो को भेजे नोटिस के साथ 24 सवालों की फेहरिस्त भेजी है. दोनों ऐप के ऑपरेटर्स से उन आशंकाओं पर विस्तार से जवाब देने के लिए कहा है जिनके मुताबिक इन ऐप के जरिए भारत विरोधी कंटेट और अन्य गैर कानूनी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा है.         

सूत्रों के मुताबिक दोनो ऐप से पूछा गया है कि

-आपत्तिजनक कंटेंट पर कैसे नज़र रखी जाती है?  और अगर ऐसा कोई कंटेंट मिलता है तो उसे कैसे हटाया जाता है.
- अंडरऐज यूजर्स को लेकर क्या प्रावधान हैं  
- कैसे यूजर्स का डेटा इकट्ठा किया जाता है और उसे कहां शेयर किया जाता है?
-  क्या भारतीय यूजर्स के डेटा को चीन में भी स्टोर किया जा रहा है?
कैसे आश्वस्त करेंगे कि भारतीय यूज़र्स का डेटा किसी विदेशी सरकार, किसी तीसरे पक्ष या निजी संस्था को भविष्य में नहीं बेचा जाएगा  


स्वदेशी जागरण मंच ने लिखी थी पीएम को चिट्ठी
मंत्रालय ने ये सख्त कदम कुछ एजेंसियों की तरफ से लिखित शिकायत के बाद उठाया है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े संगठन स्वदेशी जागरण मंच (SJM) के सह-संयोजक अश्विनी महाजन ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिख कर टिकटॉक और हेलो’ समेत सभी चीनी एप्प पर  प्रतिबंध लगाने की मांग की है.

महाजन ने चिट्ठी में लिखा है“ हाल के हफ्तों में टिकटॉक राष्ट्रविरोधी कंटेंट के लिए हब बन चुका है जिसे एप्प पर धड़ल्ले से शेयर किया जा रहा है जो हमारे समाज के तानेबाने को बिगाड सकता है. ये भी गौर करने लायक है कि हेलो ने अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 11,000 मॉर्फ्ड राजनीतिक विज्ञापनों के लिए 7 करोड़ रुपए खर्च किए.   

महाजन ने शिकायत की कि इनमें से कुछ विज्ञापनों में वरिष्ठ भारतीय राजनेताओं की मॉर्फ्ड तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया. दिलचस्प है कि कुछ बीजेपी नेताओं ने भी हालिया लोकसभा चुनाव के दौरान ऐप के कंटेंट को लेकर चुनाव आयोग से शिकायत की थी.

महाजन की चिट्टी टिकटॉक पर उस वीडियो के शेयर किए जाने के बाद आई, जिसमें तीन यूजर्स लिंचिंग की घटनाओं की वजह से मुस्लिम युवकों के आतंकवाद की ओर मुड़ने जैसी बात कर रहे थे. हालांकि टिकटॉक ने इन तीनों यूजर्स को सस्पेंड कर दिया और वीडियो को अपने प्लेटफॉर्म से हटा लिया.

टिकटॉक के दुनिया में 80 करोड़ यूजर्स
टिकटॉक के दुनिया भर में 80 करोड़ यूजर्स हैं. भारत में भी इनकी अच्छी खासी तादाद है. इस ऐप में लोगों को कुछ ही सेकेंड लंबे वीडियो शेयर करने की अनुमति दी जाती है. ये ऐप हाल ही में तेजी से लोकप्रिय हुआ है. लेकिन साथ ही इसकी पेरेंट कंपनी बाइटडांस के लिए यूसेज गाईड को फाइन ट्यून करना और ऐप के गलत इस्तेमाल को रोकना भी चुनौती बन गया है. यूजर्स टिकटॉक का इस्तेमाल तमाम तरह के वीडियो अपलोड करने और शेयरिंग में कर रहे हैं. इनमें चुटकुलों से लेकर गंभीर राजनीतिक और सामाजिक कमेंट्री जैसा कंटेंट भी होता है.

सरकार से पूरा सहयोग करेंगे टिकटॉक
टिकटॉक ने एक बयान में कहा हैहम अपनी जिम्मेदारियों को समझते हैं और टिकटॉक समुदाय तक इन्हें गंभीरता से ले जाते हैं. हम अपने दायित्वों की पूर्ति के लिए सरकार से पूरा सहयोग करेंगे.  
टिकटॉक ने ये भी कहा है वो भारत के लिए प्रतिबद्ध है और वो यहां एक अरब  डॉलर का निवेश कर रही है.

कोर्ट के आदेश पर टिकटॉक पर पहले भी हो चुकी है कार्रवाई
ये पहली बार नहीं है कि टिकटॉक को लेकर भारत में सवाल उठे हैं. इसी वर्ष अप्रैल में मद्रास हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश पर एंड्रॉयड और आईफोन ऐप स्टोर से हटा दिया गया था. इसे तभी बहाल किया गया जब टिकटॉक ने विस्तार से बताया कि वो ऐप पर आपत्तिजनक कंटेंट से जुड़ी चिंताओं को दूर करने  के लिए क्या क्या कर रहा है.

#हिन्दी_ब्लॉगिंग