रविवार, 25 जुलाई 2021

'क्रांति की ज़मीन' पर युवा साथियों से मेरी पहली बात...खुशदीप




जग घूमेया थारे जैसा ना कोई...

24 जुलाई 2021, शनिवार को मैंने मेरठ के कार्यक्रम में अपनी बात इसी वाक्य से शुरू की.

आप जिस शहर में जन्मे, शिक्षा ली, उसे कभी दिल से अलग नहीं कर पाते, चाहे दुनिया में कहीं भी चले जाओ. मेरठ से मेरा लगाव भी ऐसा ही है. बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के पूर्व पत्रकार स्वर्गीय जसविंदर सिंह की जन्मभूमि भी मेरठ है, जिन्हें मैं रोल मॉडल मानते हुए पत्रकारिता की दुनिया में आया.



लेकिन अब जो मिशन हाथ में लिया है, उसमें मेरा लगाव हर उस युवा से है जो मीडिया, क्रिएटिव राइटिंग और ब्लॉगिंग में भविष्य बनाना चाहता है. भले ही उसकी रिहाइश का शहर कोई सा भी हो.



 संयोग से शनिवार को ही गुरु पूर्णिमा का दिन था. मैंने सोच कर ऐसा नहीं किया लेकिन इसी दिन मेरठ में युवा साथियों से मिलने का कार्यक्रम भी तय हो गया. इसके लिए मैं शुक्रिया अदा करना चाहता हूं मेरठ में अमर उजाला में मेरे वरिष्ठ सहयोगी रहे बड़े भाई पुष्पेंद्र शर्मा को. बहुत शॉर्ट नोटिस पर उन्होंने सारी व्यवस्था की. शनिवार और रविवार को मेरठ में लॉकडाउन की वजह से आयोजन को लेकर थोड़ी शंका थी लेकिन पुष्पेंद्र भाई ने सब कुछ बहुत अच्छी तरह होने में सूत्रधार का रोल अदा किया. 



मैं इस मौके पर मेरठ के ओलिविया होटल के युवा प्रोपराइटर अभिजीत का भी आभार जताना चाहता हूं, जिन्होंने बहुत शॉर्ट नोटिस के बावजूद वेन्यू उपलब्ध कराया. साथ ही वहां मौजूद रहे हर शख्स का बहुत अच्छी तरह ध्यान रखा.

व्यवस्था में मेरे स्कूल के दोस्त अमित नागर ने भी पुष्पेंद्र भाई का सहयोग किया. बहरहाल, एक बजे का टाइम दिया गया था. पहले बूंदा-बांदी और फिर तेज़ बारिश ने समां और बांध दिया. खैर मैं एक बजे तक वेन्यू पहुंचा. देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि हॉल की अधिकतर सीटें तब तक भर चुकीं थीं और लोगों का आना जाना जारी था.



जीआईसी (राजकीय इंटर कॉलेज), मेरठ में मेरे साथ पढ़े रजनीश मित्तल, डॉ दीपक थापन, सीए अनुज गोयल के अलावा मेरठ के जानेमाने पैथोलॉजिस्ट डॉ कपिल सेठ ने अपने व्यस्त शेड्यूल के बावजूद वहां पहुंच कर मेरा मनोबल बढ़ाया. डॉ कपिल सेठ से सीखना चाहिए कि इतनी ऊंची जगह पर पहुंचने के बाद भी इंसानियत की मिसाल कैसे बना रहा जा सकता है. अमर उजाला में मेरे सीनियर रहे श्रीकांत अस्थाना को वहां देखकर बहुत अच्छा लगा. मेरठ में एक चौथाई सदी पहले के मेरे सहयोगी अभिषेक शर्मा और फोटो जर्नलिस्ट अनुज कौशिक (चीकू भाई) से मिलना भी हर्षित करने वाला था. इसके अलावा मेरठ में मीडिया के कई नए-पुराने साथी भी वहां मौजूद रहे.



एक और शख्स का नाम लिए बिना ये रिपोर्ट अधूरी रहेगी. उनका नाम है -  मेहर आलम खान. इनसे मेरा नाता बहुत पुराना है. शाहजहांपुर-किठौर (मेरठ) में इनके आम के बागीचे हैं. जब मेरठ रहता था तो ऐसा कोई साल नहीं जाता था जब मेहर भाई अपने फॉर्म पर मैंगो पार्टी का आयोजन न करते हों. इनकी ज़बान भी इनके आमों की तरह ही मीठी है. उर्दू के किसी लफ्ज़ पर मुझे दिक्कत हो या इस्लामिक विषय पर कोई रिपोर्ट लिखनी हो तो एक बार मैं मेहर भाई से ज़रूर कंसल्ट करता हूं.

कार्यक्रम में एक और शख्स की उपस्थिति बहुत अहम रही. वो हैं मुजफ्फरनगर के प्रसिद्ध यूट्यूबर हर्ष कुमार. हम दोनों ने कभी अमर उजाला में साथ काम किया था. प्रिंट मीडिया के कई बड़े संस्थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हर्ष से सीखना चाहिए कि आज के तकनीकी युग में नौकरी किए बिना भी स्वावलंबी रहा जा सकता है. सम-सामयिक विषयों पर कंटेंट तैयार करने वाले हर्ष ने अपने संबोधन में बताया कि उनके यूट्यूब चैनल के ढाई लाख से अधिक सब्सक्राइबर्स हैं. अमिताभ बच्चन भी इस चैनल को फॉलो करते हैं. हर्ष ने इस अवसर पर अपनी सक्सेस स्टोरी को शेयर किया.


 

लेकिन मेरठ जिस उद्देश्य से मैं गया था, अब आते हैं उन युवा साथियों पर. सबसे पहले मैंने उनसे ही अलग बैठ कर बात की. इनमें तीन लड़कियों ने बताया कि वो एंकर बनना चाहती हैं. मैंने उन्हें बताया कि सफल एंकर बनने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है. उसका काम टीपी पर ख़बरें पढ़ने का ही नहीं होता, उसे किस तरह देश-दुनिया के तमाम विषयों की जानकारी रखने के साथ हर वक्त अपने को अपडेट रखना होता है. उनके कुछ सवाल थे जिनके मैंने जवाब दिए. बाकी उनसे कहा कि जब मेरा ऑनलाइन सिस्टम तैयार हो जाएगा तो वो उससे जुड़ जाएं, वहां उनकी हर जिज्ञासा को शांत करने की कोशिश की जाएगी.

 इसके बाद मैंने मंच से अपने संबोधन में जो कहा, उसका पांच लाइन में निचोड़ ये था.

 

1/- यूपीएससी परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों को इम्तिहान की तैयारी के दौरान ही सामान्य अध्ययन के लिए जी-तोड़ मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन एक पत्रकार को हर दिन अपने को दुनिया भर में हो रहे घटनाक्रमों से अवगत रखना होता है.

2. -अगर आप किसी संस्थान में कार्यरत हैं तो वहां की पॉलिसी, नियम कायदों को मानिए. अगर आपका इरादा क्रांतिलाने का है तो पहले संस्थान से इस्तीफा दीजिए. अपना अलग माध्यम खड़ा कीजिए, वहां से वो सब कहिए जो आप कहना चाहते हैं. लेकिन संस्थान के बैनर तले ऐसा करना अनुचित है.

3.  -अच्छे पत्रकार को अपनी स्टोरी  शुरू से आखिर तक यानि रॉ इनपुट से लेकर एंड प्रेजेंटेशन तक ओन (Own) करनी चाहिए. जैसा कि एक अच्छा शेफ अपनी डिश के साथ करता है.

4.   -अच्छे बॉसेज वही हो सकते हैं जिन्हें अपने स्टाफ के हर सदस्य की क्षमताओं की पहचान हो. उसी हिसाब से प्लसपाइंट्स को उभार कर बेहतर काम लिया जा सके.

5.    -युवावस्था में ही मीडिया में कैसे बड़े मकाम तक पहुंचा जा सकता है, इसके लिए कड़ी मेहनत ही एक रास्ता है और कोई शार्ट कट नहीं है. इसके लिए मैंने युवा साथियों को आजतक/इंडिया टुडे ग्रुप के न्यूज डायरेक्टर और मेरे बॉस रहे राहुल कंवल का हवाला दिया.

कार्यक्रम में शरद व्यास, मनोज वार्ष्णेय से मिलने के अलावा वरिष्ठ पत्रकार निर्मल गुप्ता जी को भी सुनने का मौका मिला. आज के शोर शराबे वाली पत्रकारिता से इतर कैसे शालीन और सौम्य तरीके से अपनी बात रखी जा सकती है, ये कोई निर्मल जी से सीखे.

कुल मिला कर बहुत ही खुशनुमा दोपहर गुजरी. उसके बाद लज़ीज़ लंच ने और आत्मा तृप्त कर दी. शुक्रिया '1857 की क्रांति की ज़मीन' मेरठ इतना कुछ देने के लिए. लव यू हमेशा...

बाक़ी मिशन की जानकारी देने वाली जिस पोस्ट का वादा कर रखा है वो आपको 26 जुलाई सोमवार को यहीं इसी ब्लॉग पर पढ़ने को मिलेगी.

 

 

शनिवार, 17 जुलाई 2021

युवा पत्रकार कैसे बेहतर बनें? बॉस लोग क्या करें...खुशदीप

 

   (15 जुलाई 2021 को आजतक/इंडिया टुडे के न्यूज़ डायरेक्टर राहुल कंवल के साथ मैं फेयरवेल स्पीच के दौरान)

करीब 27 साल मैं पत्रकारिता में बिता चुका हूं...इनमें 10 साल प्रिंट में (दैनिक जागरण-अमर उजाला), 10 साल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में (9 साल अकेले ज़ी न्यूज़ में), बाकी 7 साल डिजिटल, ब्लॉगिंग और सिनर्जी में (5 साल अकेले आज तक/इंडिया टुडे में)...यानि पत्रकारिता से जुड़े हर प्लेटफॉर्म में काम करने का मुझे मौका मिला है...

आगे भी लेखन से जुड़ा क्रिएटिव कुछ न कुछ करता रहूंगा...अपने इस लंबे अनुभव के आधार पर अब मैं अपने ब्लॉग देशनामा के माध्यम से ऐसे युवाओं से संवाद कायम करना चाहता हूं जो क्रिएटिव राइटिंग, ब्लॉगिंग या पत्रकारिता से जुड़ना चाहते हैं या हाल-फिलहाल में जुड़ चुके हैं...

 सबसे पहली बात युवा साथियों से कहना चाहता हूं कि पत्रकारिता के मायने सिर्फ़ एंकरिंग या रिपोर्टिंग के ज़रिए स्क्रीन पर चेहरा चमकाना ही नहीं होता...मैंने नज़दीक से देखा है कि कामयाब एंकर बनने के लिए कैसे दिन-रात एक करना होता है...देश दुनिया के तमाम ताजा घटनाक्रमों की जानकारी रखनी होती है...अब वो दूरदर्शन जैसे पहले दिन नहीं है जब ख़बरों को वाचक की तरह सिर्फ पढ़ना होता था...

अगर आप बिना पढ़ने लिखने की ज़ेहमत उठाए सिर्फ़ ग्लैमर के वशीभूत पत्रकारिता से जुड़ना चाहते हैं तो मुआफ़ कीजिएगा,ये लाइन आपके लिए नहीं है...ये पेशा जो कड़ी मेहनत मांगता है, वो आप करने के लिए तैयार नहीं हैं तो जल्दी ही हताश हो जाएंगे...आपका पहला लक्ष्य ग्लैमर हैं तो फिर एंटरटेंमेंट की दुनिया को अपनाएं, पत्रकारिता को नहीं...

ऐसे में होगा ये कि दो-तीन साल इस लाइन में रहने के बाद आपका मोहभंग हो जाएगा और आप इस लाइन से निकलना चाहेंगे...लेकिन तब तक आप बेशकीमती समय और मीडिया स्कूल की पढ़ाई पर खर्च किया हुआ पैसा व्यर्थ कर चुके होंगे...इसलिए बेहतर है कि आप सोच समझ कर ही इस लाइन में आएं...जो समय यहां आप इससे निकलने से पहले लगा चुके होंगे उसका सदुपयोग आप कहीं और करियर बनाने में लगा सकते थे...

हां अगर आप पत्रकारिता में नाम बनाने के लिए दिन-रात जी तोड़ मेहनत करने को तैयार हैं, शुरू में काफ़ी कुछ सुनने को मानसिक तौर पर मज़बूत हैं तो आपका स्वागत है...एक बात गांठ बांध लीजिए कुआं आपके पास कभी नहीं आएगा, आपको ही अपनी प्यास बुझाने के लिए कुएं पर जाना होगा...वर्क प्लेस पर हर कोई इतना व्यस्त हैं कि उसके पास आपको सिखाने के लिए वक्त नहीं होता...वो एक बार ही आपको समझाएगा...दोबारा पूछेंगे तो उसे खीझ होगी...इसलिए जो कुछ भी सीखना है वो आपको बहुत धैर्य से और बहुत शांत रहते सीखना होगा...

 ये तो बात रही उन युवाओं के लिए जो पत्रकारिता में करियर बनाना चाहते हैं...अब उन पत्रकार साथियों के लिए बात जो पहले से ही इस लाइन में एंट्री कर चुके हैं...ये बात मैंने आजतक/इंडिया टुडे ग्रुप से 15 जुलाई 2021 को अपनी फेयरवेल स्पीच में भी बोली...


(सही तरह से सुनने के लिए ईयरफोन का इस्तेमाल कीजिए, वॉल्यूम  कम है)

पत्रकारों के लिए मेरी बात

मैंने कहा कि पत्रकार को किसी भी स्टोरी को डील करते वक्त एक अच्छे शेफ को ध्यान में रखना चाहिए...अच्छा शेफ बस डिश को तैयार कर देने में ही अपने काम की इतिश्री नहीं करता... उसका काम डिश के लिए रॉ मैटीरियल से ही शुरू हो जाता है. वो चेक करता है कि ये बढ़िया क्वालिटी का हो... डिश तैयार हो जाने के बाद भी शेफ की पैनी नजर रहती है कि डाइनिंग टेबल पर उसे किस सलीके के साथ पेश किया जा रहा है क्योंकि प्रेजेंटेशन भी बहुत मायने रखता है... इसी तरह पत्रकार को अपनी स्टोरी को शुरू से आखिर तक ओन (Own) करना चाहिए...

न्यूज-रूम को डेली मैनेज करने वाले बॉसेज के लिए भी मैंने फेयरवेल स्पीच में दो शब्द कहे-




(सही तरह से सुनने के लिए ईयरफोन का इस्तेमाल कीजिए, वॉल्यूम इसमें कम है)

बॉसेज के लिए मेरा आग्रह

मैंने कहा, कोयला और हीरा दोनों कैमिकल एलीमेंट कार्बन (‘C’) के बने होते हैं बस दोनों में कार्बन की सीक्वेंस का अंतर होता है... इसे बदल दिया जाए तो कोयला हीरा और हीरा कोयला में बदला जा सकता है. हर आदमी में प्लस और माइनस दोनों होते हैं...अब ये काम लेने वाले पर है कि वो कैसे प्लस अधिक निकलवा सकता है. अगर आप मछली से कहें कि पेड़ पर चढ़ जाए तो ये संभव नहीं है...

आज हर वक्त अपने केबिन में बैठे रहने वाले मैनेजर्स की नहीं बल्कि वॉक एंड टॉक मैनेजर्स की ज़रूरत है...आपको अपनी टीम के हर सदस्य का दिल जीतने की कोशिश करनी चाहिए...टीम के जूनियर से जूनियर सदस्य को ये भरोसा होना चाहिए कि कहीं फंस जाऊं तो बॉस से सही गाइडेंस ले सकता हूं...आप जिस काम की अपेक्षा अपने टीम के सदस्यों से रखते हैं, वही काम करने की आप में खुद भी काबिलियत होनी चाहिए…

मुझे खुशी है कि आज तक/इंडिया टुडे में काम करते हुए मैंने अपने युवा बॉस राहुल कंवल में ये सारी खूबियां देखींयही वजह है कि इतनी युवावस्था में ही राहुल कंवल ने इंडस्ट्री में उस मुकाम को छुआ है, जिसके बस सपने ही देखे जा सकते हैं…कभी ताज्जुब होता था कि राहुल कंवल सोते कब हैं…सुबह 6 बजे जो वॉट्सऐप पर टीम के साथ संवाद का सिलसिला शुरू होता है वो देर रात तक जारी रहता है…एंकरिंग, स्पेशल प्रोगामिंग, टीम मीटिंग्स हर दिन अलग…सातों दिन यही रूटीन रहता हैइसके साथ ही टीम के हर सदस्य की भी हर वक्त फ़िक्र रखनासाथ ही इनोवेशन्स के लिए नए-नए एक्सपेरिमेंट करते रहना और खुद को दुनिया की नई टेक्नोलॉजी से अपडेट करना...राहुल कंवल के ब्रेनचाइल्ड कुछ नायाब और बेहद कामयाब हालिया प्रोजेक्ट्स के नाम गिनाऊंगा- फैक्ट चेक ब्यूरो, DIU (डेटा इंटेलिजेंस यूनिट), OSINT (ओपन सोर्स इंटेलिजेंस) आदि…ये सब करने के लिए कितनी ऊर्जा और समर्पण की ज़रूरत होती है…जो लोग दूर रह कर देखते हैं, उन्हें ये सही से समझ नहीं आ सकता…राहुल कंवल के लिए आज कहना चाहूंगा- Well done Chief, Keep Rocking!! 

बहरहाल, अपनी पोस्ट को आज यही विराम देता हूं, इस वादे के साथ कि ऐसे युवा जो पत्रकारिता में करियर बनाना चाहते हैं या इस लाइन में नए-नए आए हैं, उनके हित के लिए अगली पोस्ट में कुछ एलान करूंगा...लेकिन फिलहाल कुछ दिन अज्ञातवास में जाना चाहता हूं...बस थोड़ा इंतज़ार कीजिए...

 

 

गुरुवार, 15 जुलाई 2021

Goodbye आजतक/ इंडिया टुडे...Love You...खुशदीप



जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-ओ-शाम...

यही जीवन है... किसी आरंभ के बाद अंत...और किसी अंत के बाद आरंभ...

आजतक/इंडिया टुडे के साथ मेरी 5 साल की पारी का अंत ग्रुप से न्यूज़ एडिटर के तौर पर रिटायरमेंट के साथ गुरुवार को बड़े खुशनुमा माहौल में हुआ.

किसी संस्थान के साथ काम करते करते जुड़ाव हो जाना स्वाभाविक है. जो आपका लंबे समय से रूटीन चला आ रहा हो, उससे एक झटके में अलग हो जाना आसान नहीं होता. जिन साथियों से दिन-रात का उठना बैठना हो, ख़बरों के लिए गरमा-गरम बहस करना हो, फिर अगले ही पल माहौल को हल्का करते हुए एक दूसरे से चुटकी लेना हो, सब दिनचर्या का हिस्सा हो जाता है.

फिर एक दिन आपको पता चलता है कि आप जिस माहौल को दिन-रात जीते चले आ रहे थे, आप उसका हिस्सा नहीं रहे. फिर विदाई का वक्त आता है. उसी वक्त आप सही तरह से जान पाते हैं कि आपके साथियों के मन में आपके लिए क्या राय थी. आपके बॉसेज आपके बारे में क्या सोचते थे. ये सब आप तब नहीं जान पाते जब आप रोज़ साथ काम कर रहे होते हैं.

गुरुवार को मुझे ऐसा ही सुखद अनुभव हुआ. फिल्म सिटी नोएडा में मीडियाप्लेक्स में मेरी विदाई पर बॉस राहुल कंवल ( न्यूज डायरेक्टर आजतक/ इंडिया टुडे) की अगुआई में साथियों ने मेरे सम्मान में लंच रखा.


 

सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ध्यान रखा गया बस खाते हुए ही चेहरे से मास्क उतारे गए.





अभिजीत सर, सीमा गुप्ता, स्नेहांशु शेखर, हरमीत शाह सिंह, पाणिनि आनंद समेत वरिष्ठ साथियों ने मेरे बारे में जो भी कहा, उसके लिए दिल से उनका शुक्रिया.


इस अवसर मुझे भी बोलने के लिए कहा गया. मैंने सबसे पहले अपनी टैगलाइन का जिक्र किया. दिल की बात दिल से कही जाए तो लोगों के दिलों तक जाती है.

युवा पत्रकारों के लिए मेरी बात

फिर मैंने युवा पत्रकार साथियों के लिए कहा कि किसी भी स्टोरी को डील करते वक्त एक अच्छे शेफ को ध्यान में रखना चाहिए. अच्छा शेफ बस डिश को तैयार कर देने में ही अपने काम की इतिश्री नहीं करता. उसका काम डिश के लिए रॉ मैटीरियल से ही शुरू हो जाता है. वो चेक करता है कि ये बढ़िया क्वालिटी का हो. डिश तैयार हो जाने के बाद भी शेफ की पैनी नजर रहती है कि डाइनिंग टेबल पर उसे किस सलीके के साथ पेश किया जा रहा है क्योंकि प्रेजेंटेशन भी बहुत मायने रखता है. इसी तरह पत्रकार को अपनी स्टोरी को शुरू से आखिर तक ओन (Own) करना चाहिए.

वरिष्ठों के लिए मेरा आग्रह

इसके बाद मैनेजिंग पोजिशन वाले बॉसेज के लिए भी मैंने एक बात रखी. कहा- कोयला और हीरा दोनों कार्बन (C’) कैमिकल एलीमेंट के बने होते हैं बस दोनों में कार्बन की सीक्वेंस यानि कार्बन चक्र का अंतर होता है. इसे बदल दिया जाए तो कोयला हीरा और हीरा कोयला में बदला जा सकता है. हर आदमी में प्लस और माइनस दोनों होते हैं. अब ये काम लेने वाले पर है कि वो कैसे प्लस अधिक निकलवा सकता है. अगर आप मछली से कहें कि पेड़ पर चढ़ जाए तो ये संभव नहीं है.

इस लंच के आयोजन से पहले ही सीनियर्स और साथी सहयोगियों के मुझ तक मैसेज आ चुके थे जिन्हें पढ़ कर लगा कि मेहनत सफल रही और ग्रुप में अपने काम को ठीक ठाक अंजाम दे सका. चंद ऐसे ही मैसेज-

राहुल कंवल, न्यूज़ डायरेक्टर, आजतक/इंडिया टुडे

 


 सुप्रिय प्रसाद, न्यूज़ डायरेक्टर, TVTN

 


राहुल श्रीवास्तव, नेशनल अफेयर्स एडिटर , इंडिया टुडे टीवी



सचिन सिंह, सीनियर एडिटर, TVTN




 श्रीनारायण झा, सीनियर प्रोड्यूसर, TVTN

 


 

जैसे कि मैंने ऊपर कहा कि हर आरंभ के बाद अंत होता है और हर अंत के बाद आरंभ. 

अब मेरा आरंभ क्या?

ऐसे में 1984 में आई फिल्म मशालके लिए जावेद अख्तर का लिखा और किशोर कुमार का गाया गाना याद आ रहा है.

लिए सपने निगाहों में,

चला हूँ तेरी राहों में,

ज़िन्दगी आ रहा हूँ मैं...

 

कई यादों के चेहरे हैं, कई किस्से पुराने हैं,

तेरी सौ दास्तानें हैं, तेरे कितने फसाने हैं,

मगर इक वो कहानी है, जो अब मुझको सुनानी है

ज़िंदगी आ रहा हूँ मैं...




सोमवार, 12 जुलाई 2021

महापुरुषों की मूर्तियों से जुड़ा मानक धार्मिक भावनाएं आहत होने पर लागू क्यों नहीं...खुशदीप



(फोटो Stu: Engerland's Greatest Patriot के ट्विटर हैंडल से साभार) 

इतिहास की किसी हस्ती की पत्थर या धातु से बनी मूर्ति को निशाना बनाया जाए, उसमें तोड़फोड़ की जाए? अब एक और सूरत ली जाए, ऐसा ही हमला अगर पत्थर की किसी आम दीवार पर किया जाए या लोहे के किसी साधारण गेट को निशाना बनाया जाए, उसे नष्ट कर दिया जाए? इन दोनों हालात में क्या फ़र्क है? है तो दोनों जगह ही पत्थर या धातु से हुए किसी निर्माण पर हमला. भौतिक स्थिति कहती है दोनों सूरतों में अपराध एक जैसा है इसलिए सज़ा भी एक जैसी ही होनी चाहिए.

नामचीन लोगों या महापुरुषों की मूर्तियों पर तोड़फोड़ और साधारण दीवार या गेट पर तोड़फोड़ में सबसे बड़ा फ़र्क़ है भावनाओं का. जी हां, मूर्तियों की स्थिति में जिस तरह महापुरुषों या चर्चित हस्तियों के साथ बड़ी संख्या में लोगों की भावनाएं जुड़ी होती है, वैसा जुड़ाव पत्थर या लोहे के किसी साधारण निर्माण के साथ नहीं हो सकता.

ऐसा ही कुछ दिलचस्प सवाल ब्रिटेन की संसद में उठा है. दरअसल ब्रिटेन में एक ऐसा कानून प्रस्तावित है जिसमें मूर्तियों में तोड़फोड़ किए जाने को अपराध की श्रेणी में लाने का प्रावधान है. कानून का मकसद इस तरह की हरकतों से होने वाले भावनात्मक नुकसान को रोकना है. अगर ये कानून पास होता है तो मूर्तियों पर हमला या तोड़फोड़ का किसी पर दोष साबित होने पर उसे 10 साल जेल तक की सजा दी जा सकेगी. ब्रिटेन में विपक्षी लेबर पार्टी की सांसद नाज शाह ने हाउस ऑफ कॉमन्स में अपने भाषण में इस प्रस्तावित कानून का हवाला देते हुए 10 साल की सजा को खासा सख्त बताया.

 


(ब्रिटिश लेबर पार्टी सांसद नाज शाह के ट्विटर हैंडल से साभार)

नाज शाह ने इस मौके पर कहा कि ब्रिटिश लोगों के विंस्टन चर्चिल और ओलिवर क्रोमवैल जैसी हस्तियों के साथ जुड़ाव को समझा जा सकता है. उनकी भावनाओं को समझ कर उनकी कद्र की जानी चाहिए. नाज शाह ने यूके इतिहास के स्मारकों के महत्व और प्रतीकात्मकता का समर्थन किया. सांसद ने जोर देकर कहा कि किसी भी ऐतिहासिक स्मारक की अवमानना किए जाना गलत और लोगों को बांटने वाला है. हालांकि नाज शाह ने किसी ऐतिहासिक हस्ती के महत्व को लेकर बहस या असहमति के अधिकार का भी बचाव किया.

लेबर पार्टी MP ने आगे कहा कि जिस तरह यहां भावनाओं को समझते हुए दस साल जेल की सजा वाला कानून लाने के बारे में सोचा गया, ऐसी ही सोच इस बात पर भी अपनाई जानी चाहिए कि यूरोप में हाल में ऐसे कुछ अपमानजनक कार्टून और रेखाचित्र प्रकाशित किए गए, जिनसे दुनिया भर के मुस्लिमों की भावनाएं आहत हुईं. नाज शाह ने पैगम्बर मोहम्मद को लेकर मुस्लिमों की भावनाओं का हवाला दिया. उन्होंने कहा, “मुस्लिम दुनिया की आबादी का करीब एक चौथाई हिस्सा है, उन मुद्दों की तरफ भी सोचा जाना चाहिए जो मुस्लिमों को उनके पवित्रों की अवमानना किए जाने से पेश आते हैं, जब कट्टरपंथी और नस्लवादी हमारे पैगम्बर की अवमानना करते हैं या अपशब्द कहते हैं तो इससे हमारे दिलों को होने वाला भावनात्मक नुकसान असहनीय होता है.

नाज शाह ने कहा कि जिस तरह ब्रिटेन का प्रस्तावित कानून चर्चिल जैसी ऐतिहासिक हस्तियों की मूर्तियों की सुरक्षा के लिए है, वैसा ही संरक्षण अन्य समुदायों के सम्मानितों की सुरक्षा के लिए भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए. सांसद ने पैगम्बर मोहम्मद के सम्मान की रक्षा के लिए कानून लाने पर भी जोर दिया.

यूरोप में पैगम्बर मोहम्मद की अवमानना वाले कार्टून प्रकाशित किए जाने का हवाला देते हुए नाज शाह ने कहा, “उन जैसों कि तरह जिनके लिए ये सिर्फ कार्टून हैं, मैं ये नहीं कहूंगी कि ये सिर्फ मूर्तियां हैं क्योंकि मैं उस ब्रिटिश भावना को अच्छी तरह समझती हूं जो यहां के इतिहास, संस्कृति और पहचान से जुड़ी है. ये सिर्फ कार्टून नहीं हैं और वो सिर्फ मूर्तियां नहीं हैं. ये हमारे जैसे इनसानों के लिए बहुत अधिक महत्व रखते हैं.

बता दें कि फ्रांस की व्यंग्यात्मक पत्रिका शार्ली हेब्दो का नाम इस तरह के कार्टून छापने को लेकर बहुत विवादों में रहा है. पिछले साल अक्टूबर महीने में शार्ली हेब्दो में छपे पैगंबर मोहम्मद के एक कार्टून को दिखाने वाले टीचर सैमुअल पेटी की एक व्यक्ति ने हत्या कर दी थी.

शार्ली हेब्दो ने हाल में भारत में कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान तंज कसते हुए भी एक कार्टून छापा था. 28 अप्रैल को प्रकाशित इस कार्टून में मेडिकल ऑक्सीजन की कमी का हवाला देते हुए तंज कसा गया था भारत में करोड़ों देवी देवता है लेकिन कोई ऑक्सीजन की कमी को पूरा नहीं कर पा रहा.

ब्रिटिश सांसद नाज शाह के भावनाओं को लेकर अहम सवाल उठाया. अगर हम ऐतिहासिक हस्तियों की मूर्तियों को लेकर इतने संवेदनशील हो सकते हैं, तो दूसरे समुदायों की भावनाएं आहत होने को लेकर क्यों नहीं हो सकते. क्यों उस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए भी सख्त कानून नहीं बना सकते. क्यों शार्ली हेब्दो इस तरह के कार्टून छाप कर बड़ी संख्या में लोगों की भावनाओं को आहत करने की गुस्ताखी करता है. क्यों अकबरुद्दीन ओवैसी जैसा शख्स हिन्दू देवी देवताओं की अवमानना का बयान देने से पहले सौ बार नहीं सोचता. क्यों पंजाब में श्री गुरु ग्रंथ साहिब की अवमानना करने वालों को छह साल बीत जाने के बाद भी कटघरे में नहीं खड़ा किया जा सका जबकि इसी मुद्दे पर 2017 में पंजाब में सरकार भी बदल गई.

बहरहाल ब्रिटिश सांसद नाज शाह के इस सवाल में दम है कि अगर ऐतिहासिक हस्तियों की मूर्तियों को लेकर भावना का हवाला देकर सख्त कानून बनाया जा सकता है तो यही मापदंड असंख्य लोगों की भावनाएं आहत करने वाली धार्मिक प्रतीकों की अवमानना की घटनाओं पर क्यों नहीं अपनाया जा सकता. 


शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

जो अमेरिका में किसानों के साथ हुआ, वही क्या अब भारत में होगा...खुशदीप

किसानों से जुड़े मुद्दे पर बीजेपी की सबसे पुरानी सहयोगी और बादल परिवार की सरपरस्ती वाली पार्टी शिरोमणि अकाली दल ने बगावत का बिगुल बजा दिया है...गुरुवार रात को बादल परिवार की बहू और इस पार्टी की सांसद हरसिमरत कौर बादल ने मोदी सरकार से इस्तीफा दे दिया....वे खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रही थीं...इस्तीफा मंजूर हो गया है और कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर को इस मंत्रालय की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई है...

आठ साल पहले का फाइल फोटो- अमेरिका के एक खेत में सड़ते छोटे साइज के प्याज क्योंकि बड़ी रिटेल स्टोर चेन को बड़े साइज के प्याज ही चाहिए होते हैं...


दरअसल, अकाली दल के लिए ऐसा करना मजबूरी थी...पंजाब और हरियाणा में किसानों ने आंदोलन छेड़ रखा है...अकाली दल का कोर वोट बैंक किसानों में ही रहा है...पंजाब में किसान एकजुट हैं और उन्होंने साफ कर दिया है कि जो केंद्र सरकार के किसानों से जुड़े बिलों का समर्थन करेगा, उसे गांवों में घुसने भी नहीं दिया जाएगा...100 साल पुरानी पार्टी पहले ही अपने सबसे बुरे राजनीतिक दौर से गुजर रही है...2017 विधानसभा चुनाव में ये पार्टी सिर्फ 15 सीटों पर सिमट गई और पंजाब में दूसरे नंबर पर भी नहीं आ सकी...आम आदमी पार्टी पंजाब मे मुख्य विपक्षी दल बन गई...

दरअसल, अकाली दल के पंजाब की सत्ता में रहते हुए 2015 में श्री गुरु ग्रंथ साहब बेअदबी मामले को लेकर बादलों और उनकी पार्टी को लेकर पंजाब के लोगों में जो गुस्सा था वो 2017 विधानसभा चुनाव के नतीजों में देखने को मिला....अब किसानों के मुद्दों पर अकाली दल ने बीजेपी के खिलाफ जो तेवर अपनाए हैं, वो 2022 पंजाब विधानसभा चुनाव की रणनीति के तहत ही उठाया कदम है....अकाली दल अब कह रहा है- हर किसान अकाली है और हर अकाली किसान है.

तकनीकी भाषा में मोदी सरकार के किन अध्यादेशों/बिलों पर विरोध है, इस पर जाएंगे तो समझना मुश्किल होगा...यही मोदी सरकार की दिक्कत है वो भारत जैसे कृषि प्रधान देश में किसानों से जुड़े बड़े बड़े फैसले ले रही है लेकिन ये साफ संदेश नहीं दे पा रही कि उससे किसानों की ज़िंदगी में क्या बदलाव आएगा...किसानों को तो छोड़ अपने सबसे पुराने सहयोगी दल को ही बीजेपी विश्वास में नहीं ले पाई...

आसान भाषा में बात करें, इससे पहले तीन अध्यादेश/बिलों के नाम जान लीजिए जिन पर अकाली दल ने अपना विरोध व्यक्त किया है-

1.  किसान उत्पाद, व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा)- The Farmers Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation)

2.  किसान सशक्तीकरण और संरक्षण

The Farmers (Empowerment and Protection) Agreement

3.  अध्यादेश और आवश्यक वस्तु (संशोधन)

The Essential Commodities (Amendment)

इनमें से तीसरा वाला बिल लोकसभा में पास भी हो चुका है...

मोटे तौर पर किसानों को जो डर है वो ये है कि उन्हें सरकार की ओर से मिलने वाला न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) बंद हो जाएगा, साथ ही मंडी व्यवस्था खत्म हो जाएगी, जहां वो अपने घरों के पास जाकर अभी तक अपने उत्पाद बेचते रहे हैंं. इसके अलावा कॉन्ट्रेक्ट फॉर्मिंग के जरिए देश का पूरा कृषि सिस्टम उन्हें प्राइवेट सेक्टर के हाथों में जाने का अंदेशा है...ऐसे में किसानों को डर है कि बड़े प्लेयर्स के आने पर उनकी स्थिति सिर्फ मजदूरों जैसी हो जाएगी...

रिटेल सेक्टर में एफडीआई और किसानों से सीधी खरीद का मुद्दा कोई नया नहीं है...इसकी शुरुआत यूपीए सरकार के दौरान ही हो गई थी...मैंने 6 दिसंबर 2012 को इस मुद्दे पर ब्लॉग लिखा था...उसमें वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ के एक लेख का हवाला दिया था...अमेरिका में जो कृषि सेक्टर में पहले ही हो चुका है, वैसा ही सब कुछ अब भारत में भी होता दिखे तो कोई नई बात नहीं...इस मामले में यूपीए और एनडीए की नीतियों में कोई फर्क नहीं है...प्राइवेट सेक्टर को ही हर चीज में आगे करने पर पूरा जोर है...

 आठ साल पहले साईनाथ ने अमेरिका के किसानों के हवाले से जो आगाह किया था...क्या अब वो भारत में भी होने जा रहा है...उन्होंने प्याज को स्टोरी का आधार बनाया था...जब कोई बड़े रिटेल स्टोर चेन किसानों से सीधे प्याज खरीदता है तो उसे बड़े साइज के ही प्याज चाहिए होते है...ऐसे में छोटे साइज के प्याज किसानो को पहले ही अलग कर देने होते हैं जिनका कोई भाव नहीं मिलता और वो खेतों में सड़ते रहते हैं...

पढ़िए 6 दिसंबर 2012 को मैंने देशनामा पर क्या लिखा था, तब कांग्रेस केंद्र की सत्ता में थी और बीजेपी विपक्ष में....  

रिटेल सेक्टर में एफडीआई (विदेशी प्रत्यक्ष निवेश) पर लोकसभा की मंज़ूरी मिलने से सत्ता पक्ष फूले नहीं समा रहा....वहीं विपक्ष का कहना है कि आंकड़ों में बेशक उनकी हार हो गई लेकिन नैतिक तौर पर उनकी जीत हुई...इस चक्कर में दोनों पक्षों के सांसदों को पूरे देश के सामने टेलीविज़न पर गला साफ़ करने का मौका ज़रूर मिल गया...वालमार्ट देश में आया तो क्या क्या होगा...सरकारी पक्ष का तर्क था कि किसानों से सीधे खरीद होगी तो उन्हें फायदा मिलेगा...उपभोक्ताओं को भी सस्ता सामान मिलेगा...मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी का तर्क था कि इससे छोटे दुकानदारों का धंधा चौपट हो जाएगा...सबने बातें तो बहुत बड़ी-बड़ी की लेकिन इतनी अहम बहस के लिए बिना किसी खास तैयारी के...काश ये लोग बहस से पहले पी. साईनाथ का ये लेख ही पढ़ लेते...ये लेख अमेरिका के एक किसान पर आधारित है...अब भारत में जो ये तर्क दे रहे हैं कि छोटे किसानों को विदेशी स्टोरों के आने से फायदा होगा, उनकी आंखें  इस लेख को पढ़ने के बाद ज़रूर खुल जानी चाहिए...इस लेख के लिए मेरी ओर से साईनाथ साहब को ज़ोरदार सैल्यूट....

क्रिस पावेलस्की

मेरे प्याज बड़े हैं, क्या नहीं है?" न्यूयॉर्क सिटी से 60 किलोमीटर बाहर क्रिस पावेलस्की ने हम आगंतुकों के समूह से ये सवाल किया... "क्या आप जानते हैं क्यों?" क्योंकि उपभोक्ताओं की ये मांग है, शायद? शायद बड़े प्याज ग्राहकों की नज़र में जल्दी चढ़ते हैं? पावेलस्की का जवाब था "नहीं "...पावेलस्की के पड़दादा 1903 में पोलेंड से आकर यहां बसे थे...एक सदी से ज़्यादा इसी ज़मीन पर ये परिवार फार्मिंग करता आया है...

 

पावेलस्की का कहना है कि आकार रिटेल चेन स्टोर तय करते हैं... "हर चीज़" उनके फ़रमान के अनुसार होती है... "हर चीज़" में कीमतें भी शामिल हैं...वालमार्ट, शॉप राइट और दूसरे चेन स्टोर पावेलस्की जैसे उत्पादित प्याजों को 1.49 डॉलर से लेकर 1.89 डॉलर प्रति पाउंड (करीब 453 ग्राम) में बेचते हैं...लेकिन पावेलस्की के हिस्से में एक पाउंड प्याज के लिए सिर्फ 17 सेंट (1 डॉलर=100 सेंट) ही आते हैं...ये स्थिति भी पिछले दो साल से ही बेहतर हुई है...1983 से 2010 के बीच पावेलस्की को एक पाउंड प्याज के सिर्फ 12 सेंट ही मिलते थे।

 

पावेलस्की का कहना है कि खाद, कीटनाशक समेत खेती की हर तरह की लागत बढ़ी है...अगर कुछ नहीं बढ़ा है तो वो हमें मिलने वाली कीमतें...हमें 50 पाउंड के बोरे के करीब छह डॉलर ही मिलते हैं...हां इसी दौरान प्याज की रिटेल कीमतों में ज़रूर  इज़ाफ़ा हुआ है...फिर पावेलस्की ने सवाल किया कि क्या कोई खाना पकाता है...हिचकते हुए कुछ हाथ ऊपर खड़े हुए...पावेलस्की ने एक प्याज हाथ  में लेकर कहा कि वो इतना बड़ा ही प्याज चाहते हैं, क्योंकि वो जानते हैं कि आप खाना बनाते वक्त इसका आधा हिस्सा ही इस्तेमाल करेंगे...और बचा आधा हिस्सा आप फेंक दोगे...जितना ज़्यादा आप बर्बाद करोगे, उतना ही ज़्यादा आप खरीदोगे...स्टोर ये अच्छी तरह जानते हैं...इसलिए यहां बर्बादी रणनीति है, बाइ-प्रोडक्ट नहीं...

 

पावेलस्की के मुताबिक  पीले प्याज के लिए सामान्यतया दो इंच या उससे थोड़ा बड़ा ही आकार चलता है...जबकि तीन दशक पहले एक इंच के आसपास ही मानक आकार माना जाता था...पावेलस्की के अनुसार छोटे किसान वालमार्ट के साथ मोल-भाव नहीं कर सकते...इसी वजह से उनके खेतों के पास छोटे प्याज़ों के पहाड़ सड़ते मिल जाते हैं...


पावेलस्की के फार्म को छोटा फार्म माना जाता है...अमेरिकी कृषि विभाग के मुताबिक जिन फार्म की सालाना आय ढाई लाख डॉलर से कम हैं, उन्हें छोटा ही माना जाता है...ये बात अलग है कि अमेरिका के कुल फार्म में 91 फीसदी हिस्सेदारी इन छोटे फार्म की ही है...इनमें से भी 60 फीसदी ऐसे फार्म हैं जिनकी सालाना आय दस हज़ार डॉलर से कम है...पावेलस्की, उनके पिता और उनके भाई संयुक्त रूप से 100 एकड़ में खेती  करते हैं...इस ज़मीन में से 60 फीसदी के ये मालिक हैं और 40 फीसदी ज़मीन किराये की है...

 

पावेलस्की का कहना है कि सिर्फ चेनस्टोर ही छोटे किसानों के हितों के खिलाफ काम नहीं करते...बाढ़ और आइरीन तूफ़ान जैसी प्राकृतिक आपदाओं की भी मार उन्हें सहनी पड़ती है...पावेलस्की को 2009 में फसल नष्ट होने से एक लाख पंद्रह हज़ार डॉलर का नुकसान हुआ था...लेकिन उन्हें फसल बीमे से सिर्फ छह हज़ार डॉलर की भरपाई हुई...जबकि बीमे के प्रीमियम पर ही उनके दस हज़ार डॉलर जेब से खर्च हुए थे...

 

पूरा कृषिगत ढ़ांचा और नीतियां पिछले कुछ दशकों में छोटे किसानों के खिलाफ होती गई हैं....पावेलस्की खुद कम्युनिकेशन्स स्टडीज़ में पोस्ट ग्रेजुएट हैं...उनके पड़दादा ने जब अमेरिका में पहली बार कदम रखा था तो उनकी जेब में सिर्फ पांच डॉलर थे...आज उऩका पडपोता तीन लाख बीस हज़ार डॉलर का कर्ज़दार है...अमेरिकी कृषि का पूरा ढ़ाचा छोटे किसानों की जगह कारपोरेट सेक्टर के हित साधने वाला है...

 

पावेलस्की की पत्नी एक स्कूल में असिस्टेंट लाइब्रेरियन हैं...वो इसलिए ये नौकरी करती हैं कि परिवार को आर्थिक सहारा मिलता रहे...पावेलस्की के मुताबिक पिछले साल उन्होंने पचास एकड़ के फार्म पर कृषि लागत पर एक लाख साठ हज़़ार डॉलर खर्च किए और बदले में उन्हें दो लाख डॉलर मिले....यानी चालीस हज़ार डॉलर की कमाई पर उन्हें टैक्स देना पड़ा...इससे दोबारा निवेश के लिए उनके पास बहुत कम बचा...

 

एसोसिएटेड प्रेस की  2001 में कराई एक जांच से सामने आया था कि सार्वजनिक पैसा सबसे ज़्यादा कहां जाता है...जबकि तब हालात काफ़ी अलग थे, लेकिन  तब भी कारपोरेट जगत और बहुत अमीर कंपनियों की पकड़ बहुत मज़बूत थी...एसोसिएटेड  प्रेस ने अमेरिकी कृषि विभाग के दो करोड बीस लाख चेकों की जांच की तो उनमें से 63 फीसदी रकम इस क्षेत्र के सिर्फ दस बड़े खिलाड़यों को ही मिली...डेविड रॉकफेलर, टेड टर्नर, स्कॉटी पिपेन जैसे धनकुबेरों को भी उनके फार्म्स के लिए सब्सिडी मिली... पी. साईनाथ

 

क्या यही होने जा रहा है अब भारत में भी....

गुरुवार, 17 सितंबर 2020

नंगा सच नहीं सजा-संवरा झूठ पसंद...खुशदीप

दो जुड़वा भाई शहर के बाहर एक नदी के किनारे खड़े थे...

एक का नाम था सचऔर दूसरे का झूठ’...


फोटो आभार- फेसबुक पेज TruthandLiesComedy


झूठ ने सच को नदी में तैरने का चैलेंज दिया...साथ ही कहा कि वो सच से पहले तैर कर नदी के दूसरे किनारे को छू कर वापस आ जाएगा...

फिर झूठ ने ही इस खेल के नियम बताए...इसके मुताबिक दोनों को अपने सारे कपड़े उतार कर तीन तक गिनती के बाद बर्फीले पानी में कूद जाना होगा...

फिर झूठ ने गिनती शुरू की....1...2...3...

झूठ के कहते ही सच पानी में कूद गया...लेकिन झूठ वहीं खड़ा रहा...

सच तैरते हुए नदी का दूसरा किनारा छू कर जल्दी से वापस आने में लग गया...

इस बीच झूठ ने सच के कपड़े पहने और शहर में वापस आ गया...सच बन कर ही वो गर्व से सब लोगों के साथ मिलता रहा...

सच नदी का दूसरा किनारा छू कर वापस आया तो वहां उसे अपना कोई कपड़ा नहीं मिला...झूठ भी नहीं था लेकिन उसके कपड़े वहां पड़े थे...सच ने झूठ के कपड़े पहनना मंज़ूर नहीं किया...वो निर्वस्त्र ही शहर की ओर वापस चल दिया...

लोगों ने सच को इस अवस्था में देखा तो मुंह फेरना शुरू कर दिया...सच ने लोगों को अपनी असल पहचान के बारे में बहुत समझाने की कोशिश की...लेकिन वो निर्वस्त्र था, लोग उसकी तरफ देखने में असहज महसूस कर रहे थे...लोग या उसका मखौल उड़ाते या पास से भगा देते...कोई मानने को तैयार नहीं हुआ कि वही सच है...

लोग झूठ को ही सच मानने लगे क्योंकि उसने टिप-टॉप कपड़े पहने हुए थे और उसकी तरफ देखना आसान था...

वो दिन है और आज का दिन...लोगों ने नंगे सच की जगह सजे-संवरे झूठ पर विश्वास करना शुरू कर दिया...

(Parker Simpson के लेख The Story of Truth & Lie के एक अंश का अनुवाद) 

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