बुधवार, 31 अक्तूबर 2018

सरदार का सम्मान या मोदी का अहम...खुशदीप





सरदार वल्लभ भाई पटेल आज धन्य हुए. आख़िर जिस विचारधारा के वो विरोधी रहे, उस विचारधारा के वंशज भी उनकी मूर्ति के उद्घाटन के बाद लहालोट हो रहे हैं. मूर्ति भी कोई ऐसी वैसी नहीं, 182 मीटर यानि दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति. अहमदाबाद से 200 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ प्रोजेक्ट पर प्रत्यक्ष तौर पर 3000 करोड़ रुपए से अधिक खर्च हुए हैं.

भारतीय लोहा बनाम चीनी कांसा

आइए इस मूर्ति के प्रोजेक्ट को लेकर थोड़ा अतीत में चलते हैं. आपको याद होगा कि पिछले लोकसभा चुनाव से पहले गुजरात सरकार की ओर से 2013 में सरदार पटेल की मूर्ति के प्रोजेक्ट को बहुत ज़ोरशोर से प्रचारित किया गया था. देश की एकता के प्रतीक सरदार पटेल की मूर्ति के लिए देश के गांव गांव से लोहा इकट्ठा करने का बात कही गई. लोहा इकट्ठा भी हुआ. लेकिन वो लोहा मूर्ति में कहीं नहीं लगा. इंजीनियरों की ओर से कहा गया कि इस तरह के लोहे से मूर्ति नहीं बनाई जा सकती. फिर कहा गया कि इकट्ठा किए गए लोहे का स्मारक में ही कहीं और इस्तेमाल होगा. वैसे जिन्होंने लोहा दिया, उनका अब ये सवाल करने का हक़ तो बनता है कि भाई ये तो बता दो कि उनके लोहे का आख़िर इस्तेमाल कहां हुआ? बताते हैं कि इस तरह के बिना इस्तेमाल किए लोहे का ढेर लगा हुआ है.   

31 अक्टूबर 2013 को सरदार पटेल की मूर्ति के लिए भूमि पूजन गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी ने किया. ये प्रोजेक्ट सरदार सरोवर बांध से 3.5 किलोमीटर दूर पानी के बीचोंबीच बनना था इसलिए पर्यावरणविदों ने इसका शुरुआती दौर में ही विरोध किया.

खैर मूर्ति के प्रोजेक्ट का ठेका लार्सन एंड टुब्रो कंपनी को दिया गया. इस कंपनी ने फिर चीन में ऐसे प्रोजेक्ट में एक्सपर्ट लोगों से संपर्क किया. वहीं से ब्रॉन्ज़ प्लेट बन कर आईं जिन्हें भारत में लाकर मूर्ति के लिए असेंबल किया गया.

गुजरात में सरदार, महाराष्ट्र में शिवाजी

बताया जा रहा है कि 1700 टन वजनी स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का निर्माण जानेमाने शिल्पकार राम वी. सुतार की देखरेख में हुआ है. सुतार इन दिनों मुंबई के समंदर में लगने वाली शिवाजी की मूर्ति की डिजाइन भी तैयार करने में जुटे हैं. महाराष्ट्र सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि शिवाजी की ये मूर्ति ऊंचाई के मामले में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी को भी पीछे छोड़ देगी.

सरदार पटेल से मोदी इतने अभिभूत क्यों?

आख़िर नरेंद्र मोदी को आज़ाद भारत के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल से इतना लगाव क्यों दोनों का ताल्लुक गुजरात से होना ज्यादा मायने नहीं रखता. वजह कुछ और है. देश का ओरिजनल लौह-पुरुष सरदार पटेल को ही माना जाता है. रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के बाद बीजेपी की ओर से लालकृष्ण आडवाणी के नाम से पहले भी लौह-पुरुष जोड़ा जाने लगा. इक्कीसवीं सदी के आगाज के साथ ही मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने. शुरुआती एक-दो वर्ष गोधरा कांड के बाद गुजरात में दंगों के बाद बनी स्थिति की वजह से काफी उथल-पुथल वाले रहे.

2003 तक राजनीतिक स्थिरता और प्रशासन पर पकड़ मजबूत होने के बाद मोदी ने जोरशोर से पटेल का नाम लेना शुरू किया. दरअसल मोदी खुद की छवि ऐसे मज़बूत नेता के तौर पर पेश करना चाहते थे जो कि कुशल प्रशासक होने के साथ कठोर फैसले लेना जानता है. इसके लिए उन्होंने सरदार पटेल को अपने आदर्श के तौर पर पेश करना शुरू किया. मोदी जानते थे कि पटेल का नाम गुजरात के जन-जन के मन में बसा हुआ है. 2004 में इंडिया शाइनिंग के नारे के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को आम चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा.

2005 के बाद मोदी ने केंद्र की यूपीए सरकार पर गुजरात के साथ सौतेला बर्ताव करने का आरोप लगाना शुरू किया. साथ ही ये कहना भी शुरू किया कि सरदार पटेल के साथ भी नेहरू परिवार की ओर से हमेशा अन्याय किया गया.

आख़िर मोदी क्यों कह रहे थे ये सब?  क्या ये रणनीति थी पटेल की लौह-पुरूष वाली विरासत पर अपना दावा ठोकने की?  2009 का आम चुनाव बेशक बीजेपी ने आडवाणी को आगे रख कर लड़ा लेकिन पार्टी की हार ने मोदी को ये जताने का मौका दे दिया कि केंद्र की राजनीति के लिए बीजेपी को आडवाणी की नहीं बल्कि सरदार पटेल सरीखे लौह-पुरुष की ज़रूरत है, जिसके खांचे में सिर्फ वो ही फिट बैठते हैं. मोदी की कोशिश ये भी रही है कि आने वाली पीढ़ी उन्हें पटेल की तरह ही मजबूत नेता के तौर पर याद करे.

सरदार पटेल मुसलमानों को हिन्दुओं की तरह ही देश का एकसमान नागरिक मानते थे. सरदार पटेल धार्मिक आधार पर देश का विभाजन भी नहीं चाहते थे. यानि वो कभी हिन्दू राष्ट्र बनाने के पक्ष में नहीं थे. सरदार पटेल ने महात्मा गांधी की हत्या के बाद कुछ जगह जश्न मनाने की ख़बरें मिलने के बाद गृह मंत्री के नाते आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया.

स्थानीय किसानों, आदिवासियों का क्या फायदा? 

आप और हम जैसे टैक्स पेयर्स के 3000 करोड़ रुपए सरदार पटेल की भव्य मूर्ति बनाने पर खर्च किए गए. इससे आखिर क्षेत्र के किसानों और आदिवासी समुदाय को क्या लाभ हुआ?  वहीं लोग जिनके हितों के लिए सरदार पटेल हमेशा खड़े होते थे. किसानों, आदिवासियों, दिहाड़ी मज़दूरों और श्रमिकों की मुश्किलें दूर करने के लिए मोदी सरकार ने आखिर क्या किया? दक्षिणी गुजरात के नर्मदा ज़िले में इस मूर्ति के आसपास रहने वाले लोग मानते हैं कि 3000 करोड़ रुपए अगर ज़रूरतमंदों पर लगाए जाते, तो उनके हालात काफी बेहतर हो सकते थे. हालत ये है कि नर्मदा नदी के किनारे रह रहे किसान ही अपने खेतों में पानी की बूंद बूंद के लिए तरस रहे हैं. नर्मदा ज़िला गुजरात के सबसे ग़रीबपिछड़े और आदिवासियों की बहुलता वाले नर्मदा ज़िले में स्थित है.

स्थानीय किसान बताते हैं कि नर्मदा नदी का पानी गुजरात के अंदरूनी इलाक़ों में तो पहुँच जाता हैलेकिन मूर्ति स्थल के पास के किसी गाँव में नहीं पहुँचता. हालत ये है कि कुछ किसानों ने मजबूर होकर बांध तक चोरी से पाइप बिछाए हैं जिससे कि वो अपने खेतों तक पानी ला सकें. किसानों का कहना है कि बांध से पानी लेना गैर कानूनी है लेकिन वो ज़िंदा रहने के लिए और क्या करें?

पानी का संकट, जिन किसानों की जमीन ली गई, उनकी दिक्कतें? कौन ध्यान देगा इन पर? क्या दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति स्थापित करने का अहम ही सब कुछ है?
गुजरात और केंद्र सरकार के दावे हैं कि मूर्ति से पर्यटन की अपार संभावनाएं होंगी और नर्मदा ज़िले की आर्थिक स्थिति सुधरेगी. रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और स्थानीय लोगों की माली हालत मजबूत होगी.

2014 का दांव क्या 2019 में भी चलेगा?

देखना है कि 2014 लोकसभा चुनाव से पहले सरदार धाम के भूमिपूजन के बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे. अब देखना होगा कि सरदार पटेल की जयंती पर उनकी मूर्ति का अनावरण 2019 लोकसभा चुनाव में मोदी के लिए कितना मददगार साबित होगा?

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सोमवार, 29 अक्तूबर 2018

काश सारे डॉ रामेश्वर की तरह हो जाएं...खुशदीप


जीना इसी का नाम है...

सेल्फी युग में किसी मरीज या गरीब को केला, अमरूद तक देते हुए अपनी फोटो फेसबुक पेज पर डाल दी जाती है, खुद को धर्मात्मा दिखाने के लिए, ऐसे में राजस्थान के शिशुरोग विशेषज्ञ डॉ रामेशवर प्रसाद यादव ने जो किया, उसके लिए उन्हें सैल्यूट ...जो उन्होंने किया, उसे बताने से पहले उनका थोड़ा परिचय करा दूं...

डॉ रामेश्वर की छोटी उम्र में ही तारावती से शादी हो गई थी. बेटी भी हो गई. 1976 में वो मेडिकल एंट्रेस एग्जाम की तैयारी कर रहे थे तो उनकी छह महीने की बेटी हेमलता को तेज बुखार हो गया. डॉक्टर के इंजेक्शन देने के बाद हेमलता का शरीर नीला हो गया और उसकी मौत हो गई.   

फोटो साभार: नवभारत टाइम्स

इस घटना के 40 साल बाद डॉ रामेश्वर एक दिन पत्नी के साथ अपने गावं चुरी जा रहे थे तो रास्ते में भीगती चार छात्राओं को देखा. दंपती ने उन्हें अपनी कार में लिफ्ट दी.  

छात्राओं ने बताया कि उन्हें रोज़ अपने कॉलेज तक पहुंचने के लिए बहुत विषम स्थितियों का सामना करना पड़ता है. बस स्टॉप तक पहुंचने के लिए ही 3 से 6 किलोमीटर तक उबड़-खाबड़ रास्तों पर पैदल चल कर आना होता है. फिर 18 किलोमीटर दूर कोटपुतली में स्थित कॉलेज जाने के लिए बस में भी लड़के उनसे अक्सर बुरा बर्ताव करते हैं. इसी वजह से कई लड़कियां कॉलेज जाना पसंद नहीं करती और उनकी कॉलेज में उपस्थिति कम हो जाती है.

छात्राओं की इस बात ने डॉ रामेश्वर और उनकी पत्नी को बेचैन कर दिया. घर पहुंचने के बाद डॉ रामेश्वर की पत्नी ने उनसे पूछा कि हम इन बच्चियों के लिए क्या कर सकते हैं...  

सरकारी सेवा से रिटायर्ड हुए डॉ रामेश्वर अब अपना क्लिनिक चलाते हैं. डॉ रामेश्वर ने अपने पीएफ का करीब 75 फीसदी हिस्सा (17 लाख रुपए) निकाला. निजी सेविंग्स से और दो लाख रुपए डाले. और छात्राओं के लिए 19 लाख रुपए में 40 सीटों वाली बस खरीदी. यह जयपुर जिले के चुरी, पावला, कायमपुरा बास और बनेती गांवों की लड़कियों को कॉलेज तक पिक और ड्रॉप करती है. डॉ रामेश्वर ने जिन चार छात्राओं को कभी कार में लिफ्ट दी थी, उन्हीं से बस सेवा का उद्घाटन कराया. 

फोटो साभार:  नवभारत टाइम्स


इस बस सेवा का नाम उन्होंने निशुल्क बेटी वाहिनी रखा. अब इस बस को चलते हुए एक साल हो गया है. इस बस पर ड्राइवर के अलावा कोई पुरुष नहीं चढ़ सकता. डॉ रामेश्वर ने छेड़खानी जैसी कोई घटना ना हो इसलिए ड्राइवर की ज़िम्मेदारी भी बहुत सोच समझ कर लक्ष्मण सिंह नाम के शख्स को दी. डॉ रामेश्वर खुद भी इस बस पर नहीं चढ़ते. वे खुद 12 साल पुरानी मारुति 800 से चलते हैं.  

जब से ये बस सेवा शुरू हुई है, कोटपुतली के पाना देवी गर्ल्स कॉलेज में छात्राओं की उपस्थिति बढ़ी है. छात्राओं का कहना है कि इस बस से उनके रोज 40 रुपए के साथ-साथ एक घंटे का टाइम भी बचता है. अब इलाके में बच्चियों के अभिभावक भी बच्चियों की सुरक्षा को लेकर निश्चिंत हो गए हैं.  

डॉ रामेश्वर पिछले साल जुलाई में सरकारी सेवा से रिटायर हुए. वे नीम का थाना से करीब 50 किमी दूर एक प्राइवेट क्लीनिक चलाते हैं. टोल तो माफ हो गया लेकिन उन्हें हर महीने 5,000 रुपए रोड टैक्स देना पड़ता है. डॉ रामेश्वर ने इसके लिए अथॉरिटी को चिट्ठी भी भेजी लेकिन अभी तक कोई नतीजा नहीं निकला है.

बस सेवा का इस्तेमाल करने वाली लड़कियों का अब कॉलेज में पढ़ाई में भी अच्छा प्रदर्शन हो रहा है. कोई लड़की सेना में जाना चाहती है तो कोई दिल्ली पुलिस में. एक लड़की नर्स बन कर दूसरों की सेवा करना चाहती है.

वैसे तो दान-पुण्य बड़े बड़े धन कुबेर भी करते हैं लेकिन डॉ रामेश्वर ने जो किया, वैसी मिसाल देश में बहुत कम होंगी. ईमानदारी से नौकरी में पीएफ से जीवन भर जो पैसा जोड़ा वो उन बेटियों के भले के लिए लगा दिया, जिनका उनसे कोई नाता नहीं था. लेकिन डॉ रामेश्वर और उनकी पत्नी तारावती ऐसा नहीं समझते. वो कहते हैं कि पहले हमारी एक ही बेटी हेमलता थी, अब हमें लगता है कि हमारी पचास हेमलताएं हैं.

वाकई, अपने लिए जिए तो क्या जिए, तू जी ऐ दिल ज़माने के लिए...डॉ रामेश्वर आपको शत शत नमन...

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रविवार, 28 अक्तूबर 2018

आस्था पर BJP डबल स्टैंडर्ड क्यों...खुशदीप


इसे कहते हैं डबल स्टैंडर्ड...

केरल के सबरीमाला के अयप्पा मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बावजूद बीजेपी इसका विरोध कर रही है...'बीजेपी के शाह' कह रहे हैं कि कोर्ट ऐसे फैसले सुनाए कि जिनका पालन हो सके...

 
फोटो साभार...द हिन्दू


केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकार है...वहां की चुनावी राजनीति में सिवाय एक विधानसभा सीट जीतने के बीजेपी का कोई वजूद नहीं रहा...जैसे कि पश्चिम बंगाल वैसे ही केरल में भी बीजेपी साम्प्रदायिकता के कार्ड को निर्लज्जता के साथ खेल कर हिन्दू वोटों में पैठ बनाने की कोशिश कर रही है..इस रास्ते में उसे कोर्ट के फ़ैसलों की भी परवाह नहीं...

मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर इसी बीजेपी का रुख़ महाराष्ट्र में बिल्कुल दूसरा हो जाता है...क्योंकि वहां उसकी खुद की सरकार है...हाल के वर्षों में अहमदनगर का शनि शिंगणापुर मंदिर हो या कोल्हापुर का महालक्ष्मी देवी मंदिर, वहां क्या हुआ वो भी जान लीजिए...

कोर्ट के आदेश के बाद महिलाओं को शनि शिंगणापुर में शनिदेव पर तेल चढ़ाने और महालक्ष्मी देवी मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश की इजाज़त मिली...यहां कोर्ट के आदेश को बीजेपी वाली फडणवीस सरकार ने ही लागू कराया...यहां वो भक्तों की आस्था का वो सवाल आड़े नहीं आया जिसका हवाला अमित शाह केरल में जाकर दे रहे हैं और उलटे सुप्रीम कोर्ट को ही नसीहत दे रहे हैं...

इसी तरह का कुछ मामला मुंबई में हाजी अली दरगाह का था...वहां भी दो साल पहले तक अंदरूनी हिस्से में प्रवेश पर पाबंदी थी, जो कोर्ट के आदेश के बाद हटी...

सवाल ये कि राजनीतिक सुविधा के मुताबिक कोर्ट के आदेशों पर स्टैंड क्यों? संविधान कहता है कि कोर्ट के फ़ैसलों को लागू कराना सरकारों की ज़िम्मेदारी है...फिर यहां आस्था के तर्क देकर ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश क्यों?


मान लीजिए कल को अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बीजेपी की राजनीति के प्रतिकूल आया तो क्या अमित शाह फिर ये तर्क देंगे कि कोर्ट वही फैसले सुनाएं कि जिनका पालन हो सके...सबरीमाला पर ऐसा बयान दे कर क्या शाह ने अयोध्या पर कोर्ट को एडवांस में नसीहत देने की कोशिश की?

चलिए बीजेपी का स्टैंड तो उसकी राजनीति के आधार पर समझ आता है लेकिन मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को क्या हुआ है?

 खुद को सेकुलरिज्म का अलम्बरदार बताने वाली कांग्रेस पर इन दिनों सॉफ्ट हिन्दुत्व तारी है...इसी वजह से वो केरल में सबरीमाला जैसे मुद्दों पर खुल कर नहीं बोल रही है...केरल में फिलहाल सीपीएम की अगुआई वाला LDF और कांग्रेस के नेतृत्व वाला UDF, दो ही अहम पॉलिटिकल प्लेयर है...लेकिन कांग्रेस ने बीजेपी का सेकुलरिज्म के मोर्चे पर डट कर सामना नहीं किया तो इसका वहां भी बंगाल जैसा हाल ना हो जाए...

सॉफ्ट हिन्दुत्व का कार्ड कांग्रेस के लिए कहीं ऐसा साबित ना हो...."चौबे जी छब्बे जी बनने चले और दूबे जी भी नहीं रह गए."


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शनिवार, 20 अक्तूबर 2018

परंपरा के नाम पर अमृतसर जैसे हादसों को न्योता कब तक...खुशदीप



अमृतसर दशहरा हादसे में जिन्होंने अपनों को खोया, वो भरपाई किसी जांच, किसी मुआवजे से पूरी नहीं होगी. लेकिन अपने अंदर झांक कर हम ये तो सोच ही सकते हैं कि परंपराओं के नाम पर ऐसे खतरे हम कब तक मोल लेते रहेंगे?

अमृतसर में दशहरे पर जो हादसा हुआ, वो हर किसी को अंदर तक हिला देने वाला है. ठीक रावण दहन के वक्त पटरियों पर खड़ी भीड़ को रफ्तार से आई ट्रेन ने रौंद दिया. हादसे में कितनी बेशकीमती जानें गईं. कितनों ने हाथ-पैर खोए, ये अभी साफ़ नहीं. भूकंप, बाढ़, सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले जान-माल के नुकसान पर किसी का बस नहीं. लेकिन इनसानों की लापरवाही से खुद बने हालात से ऐसे दिल दहला देने वाले हादसे को न्योता देना बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर देता है. 

   

हादसा क्यों हुआ?  फिर कभी ऐसा ना हो, इस पर फोकस करने की जगह हमेशा की तरह राजनीति हावी है. कौन दोषी है? दशहरे पर रावण दहन के आयोजक?  कार्यक्रम की मुख्य अतिथि नवजोत कौर सिद्धू समेत रसूखदार दर्शक? भीड़ को नियंत्रित करने की जगह वीआईपी ड्यूटी बजाते पुलिसवाले? आयोजकों से सूचना ना मिलने की दलील देता प्रशासन?  और प्रशासन से सूचना ना मिलने की दलील देते रेलवे राज्य मंत्री मनोज सिन्हा? बड़ी लापरवाही की बात कहते स्थानीय विधायक और मंत्री नवजोत सिद्धू? या जांच की बात कह कर तमाम सवालों से बचने वाले मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह?

हादसा कितना भी बड़ा क्यों ना हो राजनीति की ट्रेन अवसरवादिता के ट्रैक पर पूरी रफ्तार से दौड़ती रहती है. पंजाब में कांग्रेस की सरकार है. अमृतसर की राजनीति में कांग्रेस के नवजोत सिद्धू और उनकी पत्नी डॉ नवजोत कौर सिद्धू बड़े नाम हैं. बताया जा रहा है कि कार्यक्रम के आयोजक सौरभ मिट्ठू मदान कांग्रेस पार्षद विजय मदान के पति हैं और सिद्धू परिवार के करीबी हैं. मिट्ठू मदान का कहना है कि उन्होंने समारोह की जानकारी डीसीपी और संबंधित थाने को दी थी. आयोजकों का कहना है कि पुलिस से मिला लिखित अनुमति पत्र उनके पास मौजूद है. वहीं, अमृतसर निगम कमिश्नर सोनाली गिरी ने कहा कि आयोजन के लिए कोई अनुमति नहीं ली गई.

चलिए ये छोड़िए कि अनुमति ली गई या नहीं ली गई, लेकिन क्या पुलिस-प्रशासन आंखें मूंद कर बैठे थे कि रेलवे ट्रैक के बिल्कुल पास इतना बड़ा आयोजन हो रहा था और उसने समय रहते जरूरी कदम नहीं उठाए?  पहले तो वहां रावण दहन होने ही नहीं देना चाहिए था. क्या इसलिए प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठे रहा कि नवजौत कौर सिद्धू कार्यक्रम की मुख्य अतिथि थीं?

अकाली दल बादल और बीजेपी को विपक्ष के नाते हादसे ने अमरिंदर सरकार और सिद्धू दंपती पर निशाना साधने का मौका फरमान कर दिया है. नवजोत कौर सिद्धू पर सवाल उठाया जा रहा है कि वे हादसा होने के बावजूद कार्यक्रम स्थल से रवाना हो गईं? वहीं नवजोत कौर सिद्धू का दावा है कि उन्हें घर पहुंचने के बाद हादसे की जानकारी मिली. नवजोत कौर खुद डॉक्टर हैं. वो रात में ही अस्पताल पहुंची और घायलों के इलाज में हाथ भी बंटाया. टांके लगाए. लेकिन इस पर भी विपक्ष ने सवाल उठाए कि सरकारी अस्पताल में किस हैसियत से नवजोत कौर टांके लगा रही थीं? 

नवजोत कौर सिद्धू का अपनी सफाई में कहना है कि ये कार्यक्रम इसी जगह पर 40 साल से होता आ रहा है, इसलिए हादसे पर राजनीति करने वालों को शर्म आनी चाहिए.   

ये तो रही हादसे को लेकर राजनीति की बातें. राजनीति को अलग रखें, अब आते हैं एक एक कर हादसे से जुड़े अहम पहलुओं पर. पहले आते हैं रेलवे पर. रेलवे की ओर से कहा गया कि ड्राईवर को धुएं और घुमावदार मोड़ की वजह से रेलवे ट्रेक पर लोगों के खड़े होने का समय रहते नहीं पता चला. रेलवे बोर्ड के चेयरमैन अश्विनी लोहानी के मुताबिक ट्रैक पर अचानक खड़े लोगों को देखकर ड्राइवर ने ट्रेन की स्पीड 90 किमी प्रति घंटा से घटाकर 65 किमी/घंटा कर दी. ट्रेन में अचानक इमरजेंसी ब्रेक लगाई जाती तो ट्रेन पलट भी सकती थी, जिससे मरने वालों की संख्या कहीं ज्यादा होती.  

जालंधर-अमृसर डीेएमयू ट्रेन (JUC-ASR DMU – 74643) से ये हादसा हुआ. इसका 19 अक्टूबर का रनिंग स्टेटस देखें तो ये जालंधर सिटी स्टेशन से निर्धारित समय 5.10 पर रवाना हुई और अमृतसर स्टेशन पर बिना किसी विलंब तय समय 7.00 बजे पहुंच गई. 79 किलोमीटर का ये सफर 1 घंटा 50 मिनट में तय होता है. ये हादसा मनानवाला स्टेशन और अमृतसर के बीच हुआ. 

मनानवाला स्टेशन और अमृतसर स्टेशन के बीच की दूरी 10 किलोमीटर है..मनानवाला स्टेशन पर ट्रेन शुक्रवार को 9 मिनट लेट पहुंची थी. इस स्टेशन से शेड्यूल्ड टाइम 18.37 की 18.45 पर ट्रेन अमृतसर के लिए रवाना हुई जो निर्धारित समय से 8 मिनट लेट थी. तो क्या ट्रेन ड्राइवर राइट टाइम पर अमृतसर में सफर खत्म करने की जल्दी में था. ड्राइवर का यही कहना है कि उसे ग्रीन सिग्नल था और कोई संकेत पटरी पर लोगों की मौजूदगी की वजह से रफ्तार कम करने के लिए नहीं था?  सवाल ये भी है कि आयोजन स्थल के पास गेटमैन वाला फाटक था?  गेटमैन कहां सोया हुआ था? उसने अलर्ट क्यों नहीं किया?     

हादसे की कमिश्नर स्तरीय जांच में साफ हो जाएगा कि इतनी सारी मौतों का सबब बनने के लिए कौन-कौन दोषी है? लेकिन उससे पहले इन बातों पर सोचना हम सब का फर्ज बनता है कि भविष्य में अमृतसर जैसा हादसा फिर कभी ना हो?

सबसे पहली बात तो इनसान की सुरक्षा के बारे में सबसे ज्यादा वो खुद ही सोच सकता है. फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम के चलते और मोबाइल फोन की सहज उपलब्धता के चलते सेल्फी, वीडियो और लाइव तक अब हर किसी की पहुंच है. लेकिन ऐसा करते हुए इतना भी बेसुध नहीं होना चाहिए कि आसपास का बिल्कुल ख्याल ही ना रहे. ये भी भुला दिया जाए कि जिस रेलवे ट्रैक पर खड़े हैं, वहां से कभी भी ट्रेन गुजर सकती है.

पहली बात तो ये कि क्या भीड़ भाड़ वाले और रेलवे ट्रैक के पास मौजूद असुरक्षित जगह पर रावण दहन जैसे कार्यक्रम होने चाहिए? ये बात सरकार-प्रशासन-नेताओं के साथ-साथ हम आम लोगों को भी सोचना चाहिए?  साथ ही उन्हें भी जो धर्म और परंपरा की बात-बात पर दुहाई देते हैं?

ऐसे आयोजन रेलवे ट्रैक्स से दूर सिर्फ बड़े खुले मैदान में हों, ऐसी बाध्यता नहीं होनी चाहिए?  खुले बड़े मैदान में भी पुतलों के आसपास बड़े क्षेत्र में किसी व्यक्ति के जाने की इजाजत नहीं होनी चाहिए, जिससे कि दहन के वक्त किसी तरह के हादसे से बचा जा सके?  

पिछले कुछ वर्षों से ये प्रचलन भी देखने में आ रहा है कि कुछ जगहों पर रावण का बड़े से बड़ा पुतला लगाने की होड़ होती है?  जाहिर है जितना बड़ा पुतला होगा, उतना ही उसमें ज्यादा आतिशबाज़ी और पटाखों का इस्तेमाल किया जाएगा? यानि जोखिम भी उसी हिसाब से बढ़ता जाएगा. क्या किसी और सुरक्षित तरीके से रावण का दहन नहीं किया जा सकता?

यहां एक सवाल ये भी है कि त्योहारों धार्मिक आयोजनों, शादी-ब्याहों या अन्य कार्यक्रमों में आखिर पटाखों और आतिशबाजी की अनुमति ही क्यों दी जाए?  क्यों नहीं देश में पटाखों और आतिशबाजी पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जाता?  इससे नुकसान ही नुकसान है. परंपराओं के नाम पर ऐसी कुरीतियों को आखिर कब तक पालन किया जाता रहेगा. वो भी ये जानते हुए कि इनसे नुकसान ही नुकसान है.

दशहरा हो या दिवाली या फिर शबेबरात किसी को भी पटाखों या आतिशबाजी की इजाजत नहीं होनी चाहिए. हर साल इनसे आग लगने की घटनाओं में जानमाल के नुकसान की सूचना मिलती है. पटाखों से हर साल दिवाली पर हवा में जहर घुलने से सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है. 2017 में दिवाली पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश और दिल्ली पुलिस की सख्ती के बावजूद पटाखों से दिल्ली में आग लगने की 204 घटनाएं हुईं. उससे पहले छह साल पर नजर डाली जाएं तो दिवाली पर दिल्ली में 2016 में 243, 2015 में 290, 2014 में 211, 2013 में 177, 2012 में 184 और 2011 में 206 घटनाएं हुई थीं. पुलिस के मुताबिक वैसे आम दिनों में दिल्ली में औसतन हर दिन आग लगने की 60 घटनाओं की सूचना मिलती है.    

धार्मिक आयोजनों में पटाखों और आतिशबाज़ी से इतर भी बात की जाए तो यहां भीड़ नियंत्रण के लिए भी सुरक्षा उपायों का करना बहुत ज़रूरी है. ऐसी जगहों पर भगदड़ का भी खतरा रहता है. 

दिल्ली जैसे महानगर में कई रामलीला कमेटियां बड़े बड़े राजनेताओं, फिल्मी सितारों को मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाती हैं. जाहिर है वीवीआईपी आते हैं तो पुलिस और प्रशासन के बड़े अमले का ध्यान उनकी सुरक्षा पर ही सबसे ज्यादा लग जाता है जिससे उन्हें कोई असुविधा नहीं हो. उनके लिए गेट भी खास होते हैं और बैठने की जगह भी खास. ऐसे में भीड़ को उस के हाल पर छोड़ देना खतरे से खाली नहीं होता. ऐसे में इन कार्यक्रमों में जाने वाले वीवीआईपी मेहमानों को भी आम लोगों की सुरक्षा को लेकर आयोजकों से पहले ही आश्वस्त होना चाहिए तभी वहां जाने की हामी भरनी चाहिए.

पिछले कुछ वर्षों से ये प्रचलन भी देखने में आ रहा है कि कुछ जगहों पर रावण का बड़े से बड़ा पुतला लगाने की होड़ होती है?  जाहिर है जितना बड़ा पुतला होगा, उतना ही उसमें ज्यादा आतिशबाज़ी और पटाखों का इस्तेमाल किया जाएगा? यानि जोखिम भी उसी हिसाब से बढ़ता जाएगा. क्या किसी और सुरक्षित तरीके से रावण का दहन नहीं किया जा सकता?

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बुधवार, 17 अक्तूबर 2018

#MeToo: जितेंद्र वाला केस क्या नज़ीर बनेगा...खुशदीप



आभार: अक्षिता मोंगा (Arre.co.in)

क्या #MeToo के साथ भी वैसा ही होने वाला है जैसे कि विदेश से आयातित कैम्पेनों के साथ अतीत में होता रहा है. किस-किस ने क्या-क्या कहा?  किस-किस के खिलाफ कहापलटवार में क्या-क्या कहा गया?  एक्शन-रीएक्शन में क्या क्या हुआ?  इस पर बहुत कुछ कहा जा चुका है इसलिए उसे यहां दोहराने की कोई तुक नहीं.

कहते हैं कि बिना आग़ धुआं नहीं उठता. इसलिए कुछ महिलाओं ने आरोप लगाए तो ज़रूर सोच समझ कर ही लगाए होंगेउनकी समझ से उनके पास इसकी वजह भी रही होंगी. रिप्पल इफेक्ट की तरह एक को देख कर दूसरे में जिस तरह हिम्मत आती हैवैसे ही #MeToo में भी हुआ. जिन पर आरोप लगे उनमें से अधिकतर अपने-अपने क्षेत्र में बड़े नाम हैं या कभी बड़े नाम रह चुके हैं.

आरोप सच्चे हैं या झूठेये कोई तय नहीं कर सकता सिवाए अदालत के. लेकिन धारणा है कि बिना किसी वजह आखिर कोई महिला किसी शख्स (वो भी रसूखदार) के खिलाफ आरोप लगाने का जोखिम क्यों मोल लेगी लेकिन अदालतें धारणाओं या परसेप्शन पर नहीं चलतीवो सबूतों के आधार पर फैसले देती हैं.

ये सही है कि इस कैम्पेन से यौन उत्पीड़न के आरोपों के घेरे में आए बड़े नाम वाले लोगों का मान-मर्दन (Naming & Shaming) हुआ. ये अपने आप में ही ‘बड़ी सज़ा’ है. लेकिन जिन्होंने आरोप लगाएक्या वो आश्वस्त हैं कि वो क़ानूनन भी इन्हें सज़ा दिला पाएंगी?  क्या इसके लिए उनके पास पर्याप्त सबूत हैं?

ये भी तय है कि जिन पर आरोप लगे हैं वो खुद को पाक-साफ़ साबित करने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेंगे. बड़े से बड़े वकीलों की मदद लेंगे. अवमानना के नोटिस भी भेजें जाएंगे. ये कोई कम खर्चीला काम नहीं है. उन्हें ऐसा करने का हक़ है. देश का कानून हर नागरिक को खुद के बचाव में सफाई का मौका देता है.

ये सच है कि किसी भी महिला को वर्कप्लेस हो या कोई और जगहसुरक्षा का पूरा माहौल मिलना चाहिए...अगर कोई उनके साथ Misconduct (Verbal or Physical)  करता है तो उसे क़ानून के मुताबिक सज़ा मिलनी चाहिए. ऐसा नहीं कि इस सबंध में प्रावधान नहीं है, कानून नहीं है, कमेटियां नहीं हैं. सब कुछ हैं लेकिन फिर भी ऐसी घटनाएं होती हैं, शोषण होता है.

ये सब कैसे रुके?  #MeToo कैम्पेन को सराहा जाना चाहिए कि इसकी वजह से इस संवेदनशील मुद्दे पर देश भर में बहस तो छिड़ी. केंद्र में महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी की ओर से ऐसी शिकायतों पर गौर करने के लिए कमेटी बनाने का एलान भी करना पड़ा. मेनका गांधी के मुताबिक मी टू मामलों की जन सुनवाई के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की चार सदस्यीय समिति बनाई जाएगी. नया घटनाक्रम ये है कि सरकार की ओर से मेनका गांधी के इस प्रस्ताव को हरी झंडी नहीं दी गई है. सूत्रों के मुताबिक केंद्र सरकार इस मसले पर मंत्रियों का समूह (GOM) बनाने पर विचार कर रही है. इस समूह की अध्यक्षता वरिष्ठ महिला मंत्री करेंगी. ये मंत्रियों का समूह मी टू अभियान में उठे सवालों को देखेगा. साथ ही वर्कप्लेस पर महिलाओं के उत्पीड़न को रोकने के लिए मौजूदा कानून-नियमों की खामियों को दूर करने के उपाय सुझाएगा.   


#MeToo के इस दौर में एक केस की ओर ज्यादा लोगों का ध्यान नहीं गया. इस साल के शुरू में 75 वर्षीय अभिनेता जितेंद्र पर उनकी फुफेरी बहन ने ही यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया. आरोप लगाने वाली महिला ने कहा था कि 47 साल पहले 1971 में जितेंद्र एक फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में हिमाचल प्रदेश आए थे तो उन्होंने शिमला के एक होटल में उनका यौन उत्पीड़न किया था. महिला के मुताबिक उस वक्त जितेंद्र की उम्र 28 साल और महिला की 18 साल थी. 47 साल तक महिला क्यों चुप रहीइस सवाल के जवाब में महिला का कहना था कि उस वक्त उसके माता-पिता जीवित थे और वो उन्हें दुखी नहीं करना चाहती थी.   

जितेंद्र के वकील ने इन आरोपों के खिलाफ हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. जितेंद्र के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल के खिलाफ ये केस साजिशन किया गया. शिमला के महिला पुलिस थाने में 16 फरवरी 2018 को आईपीसी की धारा 354 के तहत एफआईआर दर्ज की गई.


जितेंद्र की ओर से दलील दी गई कि FIR उन्हें ब्लैकमेल करने के इरादे से दर्ज की गई. जितेंद्र की ओर से ये भी कहा गया कि आरोप लगाने वाली महिला ने ना तो शिमला के होटल का नाम बतायाना ही फिल्म का नाम बताया और ना ही फिल्म में उनके साथ काम करने वाले किसी सह-कलाकार का नाम बताया. जितेंद्र की ओर से ये तर्क भी दिया गया कि आम आदमी को पुलिस में एफआईआर दर्ज करने में काफी मशक्कत का सामना करना पड़ता हैफिर ये एफआईआर कैसे आननफानन में दर्ज कर ली गई वो भी बिना सबूत और बिना कोई पड़ताल किए.     

हाईकोर्ट ने इस मामले में सुनवाई के बाद आगे जांच या किसी तरह की भी कार्रवाई पर रोक लगा दी. महिला ने माता-पिता को दुख ना पहुंचाने का हवाला देकर शिकायत में इतने साल की देरी की जो वजह बताई, उसे नहीं माना गया.
बता दें कि जितेंद्र के वकील ने कोर्ट में लिमिटेशन एक्ट का हवाला भी दिया था. यानि किसी अपराध के लिए किसी निश्चित समय अवधि तक ही शिकायत दर्ज कराई जा सकती है. जितेंद्र के खिलाफ केस में शिकायत 47 साल बाद दर्ज कराई गई.

यौन अपराधों को लेकर क्या भारत में भी कोई समय अवधि निर्धारित हैऔर क्या उन अपराधों में समय अवधि बीत जाने के बाद शिकायत दर्ज नहीं कराई जा सकतीइस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर है कि उस अपराध में कितनी अधिकतम सजा का प्रावधान है. मान लीजिए कि स्टॉकिंग (पीछा करना) में तीन साल की अधिकतम सजा है. ऐसे में तीन साल के भीतर अपराध की शिकायत करना जरूरी है. तीन साल बीत जाने पर शिकायत नहीं की जा सकती. हालांकि जिन अपराधों में अधिकतम सजा का प्रावधान तीन साल से ज्यादा है वहां ये लिमिट नहीं लागू होती. ऐसे अपराधों में कभी भी शिकायत दर्ज कराई जा सकती है.

भारत समेत दुनिया भर में बच्चों से Sex Abuse (यौन उत्पीड़न) के अधिकतर मामले रिपोर्ट ही नहीं होते. ऐसे में क्या हमारे देश में ये प्रावधान नहीं हो सकता कि ऐसे किसी भी अपराध के लिए जीवन में आगे चलकर पीड़ित कभी भी शिकायत दर्ज करा सके. इस साल फरवरी में राष्ट्रीय महिला आयोग की रजत जयंती के मौके पर केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने कहा था कि सरकार ऐसे प्रस्ताव पर विचार करेगी जिसमें अपराध हुए काफी साल बीतने के बाद भी शिकायत दर्ज कराई जा सके. महिला और बाल कल्याण मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक ये मामला नेशनल कमिशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स को सौंप दिया गया है.

बहरहाल #MeToo जब तक सुर्खियों में है तब तक है. जब ये सुर्खियों में नहीं रहेगा तब की स्थिति पर गौर कीजिए. जिन्होंने आरोप लगाए हैं, उन्हें खुद ही अपनी लड़ाई लड़नी होगी. दूसरी तरफ महंगे वकीलों की फौज होगी. असहज करने वाले सवाल होंगे. सच आपके साथ है तो पूरा दम लगाकर लड़िए. जो दोषी हैं, उन्हें उनके अंजाम तक पहुंचा कर छोड़िए. तमाम मुश्किलात का सामना करने के बावजूद देश की न्याय व्यवस्था पर भरोसा रखिए. एक दोषी को भी सज़ा मिली तो #MeToo से #JusticePrevails का ये सफ़र देश के लिए डिफाइनिंग मोमेंट बनेगा. 

आमीन...


शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2018

#MeToo का शोर, एक गंगापुत्र की मौत और राज कपूर...खुशदीप

2018:  स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद (प्रोफेसर जी डी अग्रवाल)






 2011:  स्वामी निगमानंद


गंगा की धारा को अविरल और निर्मल देखने के लिए दोनों ने प्राणों की आहुति दे दी...ऐसा करने से पहले दोनों ने आमरण अनशन किया...जो देश के कथित कर्णधार हैं, उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंगी...2011 में भी और अब 2018 में भी...

 जो 2014 में गंगा मैया ने बुलाया हैजैसे बोल देकर, गंगा को साफ करने के बड़े बड़े वायदे कर सत्ता में आए, उन्होंने भी अनशन पर बैठे गंगापुत्रस्वामी सानंद की सुध लेना आवश्यक नहीं समझा... 111 दिन के अनशन के बाद स्वामी सानंद ने ऋषिकेश के एम्स में 11 अक्टूबर की दोपहर दम तोड़ दिया...

22 जून से हरिद्वार के उपनगर कनखल में अनशन पर बैठे स्वामी सानंद ने 9 अक्टूबर से जल का भी त्याग कर दिया था...उनका स्वास्थ्य तेजी से गिरने पर पुलिस-प्रशासन ने उन्हें अनशन स्थल से उठाकर ऋषिकेश के एम्स अस्पताल में भर्ती करा दिया था...



स्वामी सानंद की तपस्या के साथ जैसा हुआ वैसा ही कुछ स्वामी निगमानंद के साथ भी हरिद्वार में ही 2011 में हुआ था...(उस पर मैंने 'देशनामा' पर 14 जून 2011 को लिखा था, वो आप यहां विस्तार से पढ़ सकते हैं)...

गंगा के लिए स्वामी सानंद के प्राणों के बलिदान के बाद एक-दो दिन शोर मचेगा ठीक वैसे ही जैसे कि 2011 में स्वामी निगमानंद के दुनिया से जाने के बाद मचा था...फिर सब ढर्रे पर आ जाएगा...

#MeToo के खुलासों के बीच स्वामी सानंद के अनशन पर हमारे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की नज़र भी जाती तो जाती कैसे...आखिर ये कौन सोचता कि स्वामी सानंद के अनशन के दौरान ही उनकी बातो को सुनने के लिए सरकार पर दबाव बनाया जाता...

7 साल पहले स्वामी निगमानंद चले गए...अब स्वामी सानंद चले गए...गंगा वैसी ही मैली की मैली है...सरकार के करोड़ों करोड़ खर्चने के दावों के बाद भी...

ये संयोग है या दुर्योग, राज कपूर ने अस्सी के दशक में अपने निर्देशन में जो आखिरी फिल्म ‘’राम तेरी गंगा मैली’’ बनाई थी, उसका थीम आज देश में गंगा और नारी को लेकर जो मौजूदा परिदृश्य है, उसमें बड़ा प्रासंगिक नज़र आता है....

राज कपूर खुद निर्विवाद नहीं रहे...अपनी फिल्मों की हीरोइनों से उनके कथित संबंधों को लेकर बॉलिवुड की फिजा में कई तरह के किस्से तैरते रहे...लेकिन राज कपूर ने ‘’राम तेरी गंगा मैली’’ में नारी के शोषण की जो तुलना गंगा के मैली होने से की, वो बेमिसाल थी...गंगा अपने उद्गम स्थल गोमुख (गंगोत्री) से निकलती है तो दूध की तरह उजली होती है...लेकिन बंगाल में गंगा सागर में आकर मिलने से पहले इनसानों के पाप धोते धोते इतनी मैली हो जाती है कि किसी बड़े नाले के समान हो जाती है..

राज कपूर ने इसकी अनेलजी (Analogy)  के लिए फिल्म की नायिका मंदाकिनी का नाम फिल्म में 'गंगा रखा''...देवभूमि की रहने वाली नायिका को मैदानी इलाके में आने पर किस किस तरह के शोषण का सामना करना पड़ता है, इसे राज कपूर ने गंगा नदी के गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक के प्रवाह से जोड़ा था...

#MeToo  पर चिंतन के इस दौर में ये भी शाश्वत सत्य है....गंगा वैसे ही मैली है...इलाके ग्रामीण हों या शहरी, नारी को अब भी शोषण और भेदभाव का सामना करना पड़ता है...

और गंगा को अविरल और निर्मल देखने की चाहत में निगमानंदों और सानंदों को अनशन के बाद ऐसे ही मौत को गले लगाना होता है...

#हिन्दी_ब्लॉगिंग