बुधवार, 17 अक्तूबर 2018

#MeToo: जितेंद्र वाला केस क्या नज़ीर बनेगा...खुशदीप



आभार: अक्षिता मोंगा (Arre.co.in)

क्या #MeToo के साथ भी वैसा ही होने वाला है जैसे कि विदेश से आयातित कैम्पेनों के साथ अतीत में होता रहा है. किस-किस ने क्या-क्या कहा?  किस-किस के खिलाफ कहापलटवार में क्या-क्या कहा गया?  एक्शन-रीएक्शन में क्या क्या हुआ?  इस पर बहुत कुछ कहा जा चुका है इसलिए उसे यहां दोहराने की कोई तुक नहीं.

कहते हैं कि बिना आग़ धुआं नहीं उठता. इसलिए कुछ महिलाओं ने आरोप लगाए तो ज़रूर सोच समझ कर ही लगाए होंगेउनकी समझ से उनके पास इसकी वजह भी रही होंगी. रिप्पल इफेक्ट की तरह एक को देख कर दूसरे में जिस तरह हिम्मत आती हैवैसे ही #MeToo में भी हुआ. जिन पर आरोप लगे उनमें से अधिकतर अपने-अपने क्षेत्र में बड़े नाम हैं या कभी बड़े नाम रह चुके हैं.

आरोप सच्चे हैं या झूठेये कोई तय नहीं कर सकता सिवाए अदालत के. लेकिन धारणा है कि बिना किसी वजह आखिर कोई महिला किसी शख्स (वो भी रसूखदार) के खिलाफ आरोप लगाने का जोखिम क्यों मोल लेगी लेकिन अदालतें धारणाओं या परसेप्शन पर नहीं चलतीवो सबूतों के आधार पर फैसले देती हैं.

ये सही है कि इस कैम्पेन से यौन उत्पीड़न के आरोपों के घेरे में आए बड़े नाम वाले लोगों का मान-मर्दन (Naming & Shaming) हुआ. ये अपने आप में ही ‘बड़ी सज़ा’ है. लेकिन जिन्होंने आरोप लगाएक्या वो आश्वस्त हैं कि वो क़ानूनन भी इन्हें सज़ा दिला पाएंगी?  क्या इसके लिए उनके पास पर्याप्त सबूत हैं?

ये भी तय है कि जिन पर आरोप लगे हैं वो खुद को पाक-साफ़ साबित करने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेंगे. बड़े से बड़े वकीलों की मदद लेंगे. अवमानना के नोटिस भी भेजें जाएंगे. ये कोई कम खर्चीला काम नहीं है. उन्हें ऐसा करने का हक़ है. देश का कानून हर नागरिक को खुद के बचाव में सफाई का मौका देता है.

ये सच है कि किसी भी महिला को वर्कप्लेस हो या कोई और जगहसुरक्षा का पूरा माहौल मिलना चाहिए...अगर कोई उनके साथ Misconduct (Verbal or Physical)  करता है तो उसे क़ानून के मुताबिक सज़ा मिलनी चाहिए. ऐसा नहीं कि इस सबंध में प्रावधान नहीं है, कानून नहीं है, कमेटियां नहीं हैं. सब कुछ हैं लेकिन फिर भी ऐसी घटनाएं होती हैं, शोषण होता है.

ये सब कैसे रुके?  #MeToo कैम्पेन को सराहा जाना चाहिए कि इसकी वजह से इस संवेदनशील मुद्दे पर देश भर में बहस तो छिड़ी. केंद्र में महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी की ओर से ऐसी शिकायतों पर गौर करने के लिए कमेटी बनाने का एलान भी करना पड़ा. मेनका गांधी के मुताबिक मी टू मामलों की जन सुनवाई के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की चार सदस्यीय समिति बनाई जाएगी. नया घटनाक्रम ये है कि सरकार की ओर से मेनका गांधी के इस प्रस्ताव को हरी झंडी नहीं दी गई है. सूत्रों के मुताबिक केंद्र सरकार इस मसले पर मंत्रियों का समूह (GOM) बनाने पर विचार कर रही है. इस समूह की अध्यक्षता वरिष्ठ महिला मंत्री करेंगी. ये मंत्रियों का समूह मी टू अभियान में उठे सवालों को देखेगा. साथ ही वर्कप्लेस पर महिलाओं के उत्पीड़न को रोकने के लिए मौजूदा कानून-नियमों की खामियों को दूर करने के उपाय सुझाएगा.   


#MeToo के इस दौर में एक केस की ओर ज्यादा लोगों का ध्यान नहीं गया. इस साल के शुरू में 75 वर्षीय अभिनेता जितेंद्र पर उनकी फुफेरी बहन ने ही यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया. आरोप लगाने वाली महिला ने कहा था कि 47 साल पहले 1971 में जितेंद्र एक फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में हिमाचल प्रदेश आए थे तो उन्होंने शिमला के एक होटल में उनका यौन उत्पीड़न किया था. महिला के मुताबिक उस वक्त जितेंद्र की उम्र 28 साल और महिला की 18 साल थी. 47 साल तक महिला क्यों चुप रहीइस सवाल के जवाब में महिला का कहना था कि उस वक्त उसके माता-पिता जीवित थे और वो उन्हें दुखी नहीं करना चाहती थी.   

जितेंद्र के वकील ने इन आरोपों के खिलाफ हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. जितेंद्र के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल के खिलाफ ये केस साजिशन किया गया. शिमला के महिला पुलिस थाने में 16 फरवरी 2018 को आईपीसी की धारा 354 के तहत एफआईआर दर्ज की गई.


जितेंद्र की ओर से दलील दी गई कि FIR उन्हें ब्लैकमेल करने के इरादे से दर्ज की गई. जितेंद्र की ओर से ये भी कहा गया कि आरोप लगाने वाली महिला ने ना तो शिमला के होटल का नाम बतायाना ही फिल्म का नाम बताया और ना ही फिल्म में उनके साथ काम करने वाले किसी सह-कलाकार का नाम बताया. जितेंद्र की ओर से ये तर्क भी दिया गया कि आम आदमी को पुलिस में एफआईआर दर्ज करने में काफी मशक्कत का सामना करना पड़ता हैफिर ये एफआईआर कैसे आननफानन में दर्ज कर ली गई वो भी बिना सबूत और बिना कोई पड़ताल किए.     

हाईकोर्ट ने इस मामले में सुनवाई के बाद आगे जांच या किसी तरह की भी कार्रवाई पर रोक लगा दी. महिला ने माता-पिता को दुख ना पहुंचाने का हवाला देकर शिकायत में इतने साल की देरी की जो वजह बताई, उसे नहीं माना गया.
बता दें कि जितेंद्र के वकील ने कोर्ट में लिमिटेशन एक्ट का हवाला भी दिया था. यानि किसी अपराध के लिए किसी निश्चित समय अवधि तक ही शिकायत दर्ज कराई जा सकती है. जितेंद्र के खिलाफ केस में शिकायत 47 साल बाद दर्ज कराई गई.

यौन अपराधों को लेकर क्या भारत में भी कोई समय अवधि निर्धारित हैऔर क्या उन अपराधों में समय अवधि बीत जाने के बाद शिकायत दर्ज नहीं कराई जा सकतीइस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर है कि उस अपराध में कितनी अधिकतम सजा का प्रावधान है. मान लीजिए कि स्टॉकिंग (पीछा करना) में तीन साल की अधिकतम सजा है. ऐसे में तीन साल के भीतर अपराध की शिकायत करना जरूरी है. तीन साल बीत जाने पर शिकायत नहीं की जा सकती. हालांकि जिन अपराधों में अधिकतम सजा का प्रावधान तीन साल से ज्यादा है वहां ये लिमिट नहीं लागू होती. ऐसे अपराधों में कभी भी शिकायत दर्ज कराई जा सकती है.

भारत समेत दुनिया भर में बच्चों से Sex Abuse (यौन उत्पीड़न) के अधिकतर मामले रिपोर्ट ही नहीं होते. ऐसे में क्या हमारे देश में ये प्रावधान नहीं हो सकता कि ऐसे किसी भी अपराध के लिए जीवन में आगे चलकर पीड़ित कभी भी शिकायत दर्ज करा सके. इस साल फरवरी में राष्ट्रीय महिला आयोग की रजत जयंती के मौके पर केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने कहा था कि सरकार ऐसे प्रस्ताव पर विचार करेगी जिसमें अपराध हुए काफी साल बीतने के बाद भी शिकायत दर्ज कराई जा सके. महिला और बाल कल्याण मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक ये मामला नेशनल कमिशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स को सौंप दिया गया है.

बहरहाल #MeToo जब तक सुर्खियों में है तब तक है. जब ये सुर्खियों में नहीं रहेगा तब की स्थिति पर गौर कीजिए. जिन्होंने आरोप लगाए हैं, उन्हें खुद ही अपनी लड़ाई लड़नी होगी. दूसरी तरफ महंगे वकीलों की फौज होगी. असहज करने वाले सवाल होंगे. सच आपके साथ है तो पूरा दम लगाकर लड़िए. जो दोषी हैं, उन्हें उनके अंजाम तक पहुंचा कर छोड़िए. तमाम मुश्किलात का सामना करने के बावजूद देश की न्याय व्यवस्था पर भरोसा रखिए. एक दोषी को भी सज़ा मिली तो #MeToo से #JusticePrevails का ये सफ़र देश के लिए डिफाइनिंग मोमेंट बनेगा. 

आमीन...


शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2018

#MeToo का शोर, एक गंगापुत्र की मौत और राज कपूर...खुशदीप

2018:  स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद (प्रोफेसर जी डी अग्रवाल)






 2011:  स्वामी निगमानंद


गंगा की धारा को अविरल और निर्मल देखने के लिए दोनों ने प्राणों की आहुति दे दी...ऐसा करने से पहले दोनों ने आमरण अनशन किया...जो देश के कथित कर्णधार हैं, उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंगी...2011 में भी और अब 2018 में भी...

 जो 2014 में गंगा मैया ने बुलाया हैजैसे बोल देकर, गंगा को साफ करने के बड़े बड़े वायदे कर सत्ता में आए, उन्होंने भी अनशन पर बैठे गंगापुत्रस्वामी सानंद की सुध लेना आवश्यक नहीं समझा... 111 दिन के अनशन के बाद स्वामी सानंद ने ऋषिकेश के एम्स में 11 अक्टूबर की दोपहर दम तोड़ दिया...

22 जून से हरिद्वार के उपनगर कनखल में अनशन पर बैठे स्वामी सानंद ने 9 अक्टूबर से जल का भी त्याग कर दिया था...उनका स्वास्थ्य तेजी से गिरने पर पुलिस-प्रशासन ने उन्हें अनशन स्थल से उठाकर ऋषिकेश के एम्स अस्पताल में भर्ती करा दिया था...



स्वामी सानंद की तपस्या के साथ जैसा हुआ वैसा ही कुछ स्वामी निगमानंद के साथ भी हरिद्वार में ही 2011 में हुआ था...(उस पर मैंने 'देशनामा' पर 14 जून 2011 को लिखा था, वो आप यहां विस्तार से पढ़ सकते हैं)...

गंगा के लिए स्वामी सानंद के प्राणों के बलिदान के बाद एक-दो दिन शोर मचेगा ठीक वैसे ही जैसे कि 2011 में स्वामी निगमानंद के दुनिया से जाने के बाद मचा था...फिर सब ढर्रे पर आ जाएगा...

#MeToo के खुलासों के बीच स्वामी सानंद के अनशन पर हमारे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की नज़र भी जाती तो जाती कैसे...आखिर ये कौन सोचता कि स्वामी सानंद के अनशन के दौरान ही उनकी बातो को सुनने के लिए सरकार पर दबाव बनाया जाता...

7 साल पहले स्वामी निगमानंद चले गए...अब स्वामी सानंद चले गए...गंगा वैसी ही मैली की मैली है...सरकार के करोड़ों करोड़ खर्चने के दावों के बाद भी...

ये संयोग है या दुर्योग, राज कपूर ने अस्सी के दशक में अपने निर्देशन में जो आखिरी फिल्म ‘’राम तेरी गंगा मैली’’ बनाई थी, उसका थीम आज देश में गंगा और नारी को लेकर जो मौजूदा परिदृश्य है, उसमें बड़ा प्रासंगिक नज़र आता है....

राज कपूर खुद निर्विवाद नहीं रहे...अपनी फिल्मों की हीरोइनों से उनके कथित संबंधों को लेकर बॉलिवुड की फिजा में कई तरह के किस्से तैरते रहे...लेकिन राज कपूर ने ‘’राम तेरी गंगा मैली’’ में नारी के शोषण की जो तुलना गंगा के मैली होने से की, वो बेमिसाल थी...गंगा अपने उद्गम स्थल गोमुख (गंगोत्री) से निकलती है तो दूध की तरह उजली होती है...लेकिन बंगाल में गंगा सागर में आकर मिलने से पहले इनसानों के पाप धोते धोते इतनी मैली हो जाती है कि किसी बड़े नाले के समान हो जाती है..

राज कपूर ने इसकी अनेलजी (Analogy)  के लिए फिल्म की नायिका मंदाकिनी का नाम फिल्म में 'गंगा रखा''...देवभूमि की रहने वाली नायिका को मैदानी इलाके में आने पर किस किस तरह के शोषण का सामना करना पड़ता है, इसे राज कपूर ने गंगा नदी के गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक के प्रवाह से जोड़ा था...

#MeToo  पर चिंतन के इस दौर में ये भी शाश्वत सत्य है....गंगा वैसे ही मैली है...इलाके ग्रामीण हों या शहरी, नारी को अब भी शोषण और भेदभाव का सामना करना पड़ता है...

और गंगा को अविरल और निर्मल देखने की चाहत में निगमानंदों और सानंदों को अनशन के बाद ऐसे ही मौत को गले लगाना होता है...

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

गरीबों से मज़ाक है रसोई गैस योजना...खुशदीप



महंगे LPG  सिलेंडर को दोबारा भरवाने के लिए पैसे कहां से लाएं  गरीब?

धूल फांक रहे हैं कनेक्शन, माताएं-बहनें लकड़ी और गोबर के उपलों पर खाना बनाने को मजबूर

फोटो आभार- अरविंद गुप्ता/HT


प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY)  को मोदी सरकार की क्रांतिकारी योजना के तौर पर प्रचारित किया गया. कहा गया कि इससे माताओं और बहनों को लकड़ी और गोबर के उपलों के धुएं में खाना बनाने से छुटकारा मिल जाएगा. दावा किया गया कि योजना गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले यानि BPL परिवारों  की बेहतरी के लिए बनाई गई. 

प्रधानमंत्री उज्जवला योजना की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक देश के 715 जिलों में 20 सितंबर 2018 तक 5,52,75,806 कनेक्शन बांटे जा चुके हैं. 1 मई 2016 को उत्तर प्रदेश के बलिया में योजना को लॉन्च करते वक्त कहा गया था कि तीन साल में पांच करोड़ PMUY  कनेक्शन वितरित करने का लक्ष्य रखा गया है. इस तरह मोदी सरकार ढाई साल में ही लक्ष्य से आगे निकल गई. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या ये योजना अपने उद्देश्य को पूरा कर रही है?  क्या वाकई ये योजना उज्ज्वल है?  या इसमें धुआं अधिक भरा है?


सच्चाई जाननी है तो देश के किसी भी ग्रामीण इलाके में जाकर योजना की कथित लाभार्थी महिलाओं से पूछिए. पूछना छोड़िए उन्हें बस खाना बनाते ही देख लीजिए. PMUY कनेक्शन किसी कोने में पड़ा धूल खा रहा है और महिलाएं लकड़ी या गोबर के उपलों पर खाना बनाने के लिए मजबूर हैं. चूल्हे में फूंक मारते उनकी आंखों में आंसू देखे जा सकते हैं.

योजनाओं को अगर बिना सोचे समझे अमल में लाया जाता है तो उनका यही हाल होता है. सरकार धड़ाधड़ लक्ष्य पूरा होता दिखाने में ही सारा ज़ोर लगा रही है. उसे ये जानने की सुध नहीं कि जिन परिवारों के लिए ये योजना लाई गई, वो इसका कोई फायदा ले भी पा रहे हैं या नहीं

PMUY  में सरकार से आख़िर मिलता क्या है?

आइए पहले जानते हैं कि PMUY  के आवेदक को सरकार की ओर से मिलता क्या हैइसमें सरकार की ओर से एक रसोई गैस कनेक्शन देने पर 1600 रुपए की नकद सहायता दी जाती है. इस राशि में शामिल हैं-
-14.2 किग्रा/5 किग्रा सिलेंडर की ज़मानत राशि
-रेग्युलेटर की ज़मानत राशि
-1.2 मीटर की पाइप (जिससे सिलेंडर से चूल्हे को जोड़ा जाता है)
-इंस्टालेशन चार्ज
-DGCC बुकलेट जारी करने की लागत  

ये तो हुआ सिर्फ कनेक्शन. लेकिन इसके अलावा चूल्हा, पहले सिलेंडर में भरी  LPG के दाम के लिए भी तो पैसे चुकाने होते हैं. तो इसके लिए ये प्रावधान किया गया कि जो आवेदक चूल्हे और पहले सिलेंडर में भरी LPG  के दाम चुकाने की स्थिति में नहीं हैं वो EMI का विकल्प अपना सकते हैं. ये सुविधा ऑयल मार्केट कंपनियों (OMCs)  की ओर से दी जाती है. इसके तहत लाभार्थी को कनेक्शन लेते वक्त चूल्हे और पहले सिलेंडर में भरी LPG  के लिए भी कुछ नहीं देना होता. लेकिन ये पैसा ऑयल मार्केटिंग कंपनियां उसे आगे LPG  सिलेंडर पर मिलने वाली सब्सिडी में से काटती हैं. 

इसे ऐसे समझिए कि जब आवेदक पहला LPG सिलेंडर खत्म होने पर दूसरा सिलेंडर लेगा तो उसे उस पर मिलने वाली सरकारी सब्सिडी नहीं मिलेगी. ये सब्सिडी ऑयल मार्केटिंग कपंनियों तब तक लेंगी जब तक चूल्हे और पहले सिलेंडर में भरी LPG के दाम वसूल नहीं हो जाते.

अब यही से पता चलता है कि योजना को लागू करते समय दूरदर्शिता से काम नहीं लिया गया. ये नहीं सोचा गया कि BPL परिवार को कनेक्शन तो मिल गया लेकिन हर महीने मंहगे सिलेंडर रीफिल के लिए वो पैसे कहां से लाएगा.  अगर उसके पास 850-900 रुपए का सिलेंडर रीफिल हर महीने लेने की ताकत होती तो वो 1600 रुपए कनेक्शन लेते वक्त भी दे देता. सरकार को अपने ऊपर ये अहसान करने का मौका ही क्यों देता?  ऐसा करके वो अपना स्वाभिमान तो बचाए रखता.

PMUY कनेक्शन लेने वाले दोबारा LPG सिलेंडर रीफिल कराने के लिए कम ही सामने आए तो सरकार ने अप्रैल 2018 से ट्रैक कुछ बदला. कहा गया कि छह सिलेंडर रीफिल कराने तक उस पर दी जाने वाली सब्सिडी नही कटेगी. यानि चूल्हे और पहले सिलेंडर की LPG के दाम जो लाभार्थी से ऑयल मार्केटिंग कपंनियों ने वसूलने थे वो छह रीफिल पूरे होने के बाद सब्सिडी काट कर वसूले जा सकेंगे. लेकिन इस एलान से भी स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया. 
हिन्दुस्तान टाइम्स डॉट कॉम की एक हालिया रिपोर्ट  से PMUY की वस्तुस्थिति का अंदाज लगाया जा सकता है . इस रिपोर्ट के मुताबिक देश के सबसे बड़े सूबे यानि उत्तर प्रदेश में योजना के एक तिहाई लाभार्थी  दोबारा LPG  सिलेंडर रीफिल लेने नहीं आए. बाकी लाभार्थियों ने साल में औसतन दो-तीन बार ही रीफिल कराया. जबकि हर कनेक्शन साल में 12 सिलेंडर लेने का हकदार है. कमोवेश उत्तर प्रदेश जैसे ही हालात देश के अन्य राज्यों में भी हैं.
सरकार के पास ये आंकड़े तो हैं कि किस राज्य में, किस जिले में कितने PMUY  कनेक्शन बांट दिए गए. लेकिन ऐसे कोई आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं कि कितने लाभार्थी ड्रॉप आउट कर गए हैं और दोबारा LPG रीफिल लेने के लिए नहीं आ रहे हैं. बुंदेलखंड और पूर्वांचल जैसे आर्थिक दृष्टि से पिछड़े इलाकों में स्थिति ज्यादा विकट है. ऐसे इलाकों में लकड़ी और गोबर के उपलों पर खाना बनाते दिखने वाली महिलाओं से बात की जाए तो वो कहती हैं कि भइया पहले बच्चों की खिलाई, दवाई, पढ़ाई देखें या रसोई गैस सिलेंडर की महंगी भराई कराएं.
बहरहाल, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत मिलने वाला रसोई गैस  कनेक्शन BPL परिवारों के साथ किसी मज़ाक से कम नहीं. ये ठीक वैसे ही है जैसे किसी को कार तो दे दी गई लेकिन वो उसे चला नहीं सकता क्योंकि पेट्रोल भरवाने के लिए उसके पास पैसे ही नहीं है. इस तरह की योजनाओं के लक्ष्य पूरा करने की बाज़ीगरी से जरूरतमंदों का कोई भला नहीं होने वाला. 

बेहतर यही होगा कि आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति की क्रय शक्ति (Purchasing Power)  बढ़ाने के उपाय किए जाएं. वो आर्थिक दृष्टि से इतना सक्षम बने कि सिर उठा कर कहे- मैं रसोई गैस कनेक्शन भी खुद ले सकता हूं और सिलेंडर भी खुद भरा सकता है. इसके लिए उज्ज्वला योजना जैसी किसी सरकारी बैसाखी की मुझे जरूरत नहीं. यही स्वाभिमान उसके लिए भी उज्ज्वल होगा और देश के भविष्य के लिए भी.

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 


5,52,75,806



शनिवार, 1 सितंबर 2018

आलोचना का चॉपर पाक में उड़ सकता है, हमारे यहां क्यों नहीं...खुशदीप


क्रिकेटर से नेता बने इमरान ख़ान को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बने जुम्मा जुम्मा दो हफ्ते ही हुए हैं...लेकिन वहां कुछ घटनाएं ऐसी हुई हैं जिन्हें लेकर नई नवेली सरकार आलोचनाओं के घेरे में हैं...मीडिया में भी इन घटनाओं को जमकर तूल दिया जा रहा है...वहां के टीवी चैनलों पर प्रसिद्ध कॉमेडी शोज में भी इमरान और उनके मंत्रियों पर खूब चुटकियां ली जा रही हैं...


आइए पहले उन दो प्रमुख घटनाओं के बारे में आपको बता दें जिन्हें लेकर पाकिस्तान में बवाल मचा है..

पहली घटना है इमरान की तीसरी पत्नी बुशरा बीबी के पहले पति खावर मनेका का एक पुलिस अधिकारी से उलझना और फिर उस अधिकारी का पलक झपकते ट्रांसफर होना...

दूसरी घटना है इमरान खान का इस्लामाबाद में बानी गला स्थित अपने निजी आवास से हेलीकॉप्टर के जरिए प्रधानमंत्री आवास तक आना-जाना...

साभार- GEO TV
याद रहे कि इमरान ख़ान ने चुनाव जीतते ही कहा था कि पाकिस्तान की माली हालत बहुत ख़राब है इसलिए सबसे पहले सरकारी फिजूलखर्ची पर वो लगाम लगाएंगे...इमरान ने एलान किया कि वो इसकी शुरुआत खुद से करेंगे और भव्य प्रधानमंत्री आवास में ना रहकर उसी परिसर में स्थित तीन बेडरूम वाले अपार्टमेंट में रहेंगे...

इमरान ने पीएम हाउस को इंटरनेशनल स्टैंडर्ड के एजुकेशनल हब में तब्दील करने का एलान किया ताकि पाकिस्तान के छात्रों को विश्वस्तरीय शिक्षा सुविधाएं मिल सकें...इमरान ने पीएम आवास के 500 से ज्यादा कर्मचारियों के लंबे चौड़े लश्कर में से सिर्फ दो की सेवाएं लेने की बात कही. साथ ही कहा कि पीएम के 80 आलीशान गाड़ियों के बेड़े में से सिर्फ दो ही अपने पास रखेंगे...बाकी सभी गाड़ियों को ऑक्शन कर दिया जाएगा जिनमें अधिकतर 5 करोड़ से ऊपर की बुलेटप्रूफ हैं...

इमरान ने ये भी कहा था कि वो तो पीएम आवास स्थित 3 बेडरूम वाला अपार्टमेंट भी नहीं लेना चाहते थे बल्कि बनी गला स्थित अपने घर पर ही रहना चाहते थे लेकिन उन्हें बताया गया कि सिक्योरिटी कारणों से ऐसा नहीं किया जा सकता...

अब हुआ ये कि इमरान ने बनी गला स्थित अपने निजी घर से पीएम हाउस तक हेलीकॉप्टर से आना-जाना शुरू किया तो वहां सवाल उठने लगे कि ये कैसी फिजूलखर्ची पर लगाम है?

इमरान के बचाव में झट उनके विश्वासपात्र और नए सूचना और प्रसारण (l&B) मंत्री फवाद चौधरी मैदान में उतरे...कभी पत्रकार रह चुके चौधरी ने मुशर्रफ सरकार में भी इसी महकमे की जिम्मेदारी संभाली थी...

चौधरी का कहना है हेलीकॉप्टर से खर्च सिर्फ़ 55 रु प्रति किमी बैठता है...कहां मिलता है ऐसा हेलीकॉप्टर भाई? जब चौधरी से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि गूगल से सर्च किया है...तब से सोशल मीडिया पर उन्हें 'गूगल चौधरी' कह कर तंज कसे जा रहे हैं...

इमरान के हेलीकॉप्टर के जरिए आने जाने के पीछे ये भी तर्क दिया गया कि बनी गला स्थित घर से पीएम हाउस के बीच दूरी 15 किलोमीटर है...आने जाने में 30 किलोमीटर का सफ़र करना पड़ता है...ऐसे में इमरान नहीं चाहते कि सड़क से उनके आने जाने से और लोगों को किसी तरह की असुविधा हो...इस सड़क पर वाहनों की भारी आवाजाही रहती है...

अच्छा चलिए, अब आते हैं फवाद चौधरी की हेलीकॉप्टर से सफ़र पर 55 रूपए प्रति किलोमीटर खर्च आने की कथित गूगल थ्योरी पर...अगर 55 नहीं तो प्रति किलोमीटर हेलीकॉप्टर यात्रा पर वास्तव में कितना खर्च आता है?

पाकिस्तानी चैनल GEO.TV की रिपोर्ट के मुताबिक इमरान प्राइवेट कंपनी प्रिंसली जेट्स के हेलीकॉप्टर की सेवाएं लेते हैं...इस कंपनी के सिंगल इंजन हेलीकॉप्टर 4000 डॉलर प्रति घंटा ( करीब पांच लाख पाकिस्तानी रुपए) के हिसाब से लिए जा सकते हैं...ये प्रति मिनट 66.66 डॉलर (8198 पाकिस्तानी रुपए) बैठता है...एविएशन एक्सपर्ट्स के मुताबिक सिंगल इंजन हेलीकॉप्टर एक मिनट में करीब 3 किलोमीटर उड़ता है...इस तरह हेलीकॉप्टर प्रति किलोमीटर यात्रा का खर्च 2,670 रुपए (पाकिस्तानी करंसी) बैठता है...

यानी इमरान के बानी गला स्थित घर से पीएम हाउस तक एक बार आने जाने में सिंगल इंजन 6 सीटर हेलीकॉप्टर से 80,100 पाकिस्तानी रुपए का खर्च आता है...इमरान डबल इंजन 15 सीटर AW139 हेलीकॉप्टर इस्तेमाल करते हैं...विशेषज्ञों के मुताबिक इस तरह के हेलीकॉप्टर का प्रति किलोमीटर खर्च 6,666 पाकिस्तानी रुपए बैठता है...(अगर आप भारतीय रुपए में ये खर्च जानने के इच्छुक हैं तो आज की तारीख में भारत के एक रुपए की कीमत पाकिस्तानी मुद्रा में 1 रुपए 74 पैसे है...)

चलिए ये तो हो गई हेलीकॉप्टर गाथा...अब आते हैं इमरान की तीसरी पत्नी और आध्यात्मिक गुरु बुशरा बीबी के पूर्व पति खावर फ़रीद मनेका से जुड़े विवाद पर...बताया जा रहा है कि 23 अगस्त की रात को खावर लाहौर से पाकपट्टन जा रहे थे तभी उन्हें रात एक बजे जांच नाके पर रोका गया...पुलिस ने खावर को रुकने का इशारा किया तो वो नहीं रुके. पुलिस ने कार का कुछ किलोमीटर पीछा कर उन्हें पकड़ लिया...खावर ने बताया कि वो कौन हैं, इसके बावजूद नहीं छोड़े जाने पर उन्होंने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल किया...पाकपट्टन के डीपीओ (डिस्ट्रिक्ट पुलिस ऑफिसर) रिज़वान गोंडाल हैं...

रिजवान गोंडाल और खावर फ़रीद मनेका (फोटो आभार-डेली टाइम्स)

मामला ऊपर तक गया तो पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के नए मुख्यमंत्री और पीटीआई नेता उस्मान बुजदार ने डीपीओ गोंडाल को पिछले शुक्रवार को तलब किया...गोंडाल को बताया गया कि खावर ने शिकायत की है कि उनके साथ बदसलूकी की गई, इसलिए गोंडाल को उनके घर जाकर माफी मांगनी चाहिए...

गोंडाल ने माफी मांगने से इनकार करते हुए कहा कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया है. इसके बाद पंजाब के आईजीपी सईद कलीम इमाम ने सज़ा के तौर पर गोंडाल के ट्रांसफर आदेश जारी कर कर दिए...

पाकिस्तान में मीडिया और विपक्ष में यही आरोप लग रहे हैं कि बुशरा बीबी ने खावर मनेका से बदसलूकी की शिकायत इमरान से की थी और इमरान ने ही इस संबंध में पंजाब के मुख्यमंत्री को निर्देश दिए...

वहीं पंजाब पुलिस डीजी पब्लिक रिलेशन नायब हैदर ने एक प्रेस रिलीज जारी कर कहा कि गोंडाल का तबादला किसी राजनीतिक दबाव की वजह से नहीं बल्कि दुराचार और झूठे दावे करने के आरोप में किया गया है...

अभी कहानी में ट्विस्ट आना बाकी है...पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस मियां साकिब नसीर ने इस घटना का स्वत: संज्ञान लेते हुए बुशरा बीबी के पूर्व पति खावर मनेका को 3 सितंबर को समन किया है...सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने पंजाब के आला पुलिस अधिकारियों और मुख्यमंत्री बुज़दार के निजी सचिव और मुख्य सुरक्षा अधिकारी को भी समन किया है...

कोर्ट ने 31 अगस्त को इस मामले की सुनवाई के दौरान ये भी पूछा कि डीपीओ गोंडाल को क्यों मनेका के घर जाकर माफ़ी मांगने के लिए कहा गया और क्यों उनका ट्रांसफर किया गया...बेंच के सदस्य जस्टिस इजाज़ुल अहसान ने ये भी कहा, ‘’हम राजनीतिक दखल या दबाव को बर्दाश्त नहीं करेंगे.’’

पाकिस्तानी मीडिया में इन दोनों मुद्दों पर चटखारे लेने के साथ इमरान सरकार पर जमकर निशाना साधा जा रहा है...सोशल मीडिया पर भी सादगी के दावे करने वाली इमरान सरकार पर खूब मज़े लिए जा रहे हैं...ये जानते हुए भी कि सरकार को आए बामुश्किल चंद दिन ही हुए हैं...

चुनाव के दौरान ये कहा जाता रहा है कि इमरान पाकिस्तानी फौज की कठपुतली हैं...लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान में मीडिया में इमरान सरकार को बख्शा नहीं जा रहा है...जमकर आलोचना की जा रही है...

इमरान ने शुक्रवार को पाकिस्तान के टीवी एंकर्स के साथ बैठक में कहा कि वो आलोचनाओं का स्वागत करते हैं जिससे उन्ह़े सरकार का कामकाज दुरूस्त करने में मदद मिलेगी... इमरान ने अपनी सरकार के कामकाज का मूल्यांकन करने के लिए मीडिया से कहा कि वो उन्हें बस 100 दिन दे...

चलिए पाकिस्तान की बात छोड़िए, अब अपने देश पर लौटते हैं...उस सरकार का क्या जो खुद भी मानती है और चाहती है कि सभी मानें कि वो जो भी करती है सब चकाचक करती है...यहां जनविरोधी नीतियों की आलोचना के लिए क्या कोई गुंजाइश नहीं?

देश में ऐसा आभास देने का माहौल बनाने की कोशिश क्यों कि सरकार दूध की धुली है और तमाम खोट विपक्षी नेताओं में ही हैं...

जय भारत...जय लोकतंत्र...




रविवार, 26 अगस्त 2018

‘दुश्मन’ इमरान से क्या हम ये सीखेंगे...खुशदीप



कभी किसी ने सोचा कि हमारे देश से अंग्रेज़ राज चला गया, वायसराय चले गए...लेकिन जो लाट साहब वाली व्यवस्था उनके वक्त लागू थी वो कई मामलों में आज़ादी के 72वें साल में भी देश में जारी है...क्यों आज भी तमाम कलेक्टर जिलों में महलनुमा सरकारी कोठियों में नौकर-चाकरों के हुजूम के साथ शान-ओ-शौकत वाली ज़िंदगी जीते हैं...क्यों भव्य राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री आवास, लुटियंस जोन में मंत्रियों, जजों और नौकरशाहों के बड़े बड़े बंगले, राज्यों में सीएम हाउस, गवर्नर हाउस और मंत्रियों के रहन-सहन के लिए दिल्ली जैसी ही समानांतर व्यवस्था...आखिर भारत जैसे देश जहां करोड़ों करोड़ों लोगों को हर रोज़ आज भी आधा पेट कर ही सोने को विवश होना पड़ता है...वहां ये विलासिता का भौंडा प्रदर्शन कहां तक न्यायोचित है...

इस मामले में पड़ोसी मुल्क़ पाकिस्तान में नए प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कुछ अच्छी पहल की हैं...अच्छा कुछ दुश्मन भी करे तो उससे सीखने में कोई बुराई नहीं...इमरान ने सरकारी फिजूलखर्ची रोकने के लिए खुद को आगे किया है...उन्होंने पीएम हाउस में ना रह कर 3 बेडरूम अपार्टमेंट में रहने का फैसला किया है...पीएम हाउस को इंटरनेशनल एजुकेशन हब में तब्दील किया जाएगा जिससे छात्रों को विश्व स्तरीय शिक्षा सुविधाएं मिल सकें...इसी तरह पाकिस्तान के राज्यों में स्थित गवर्नर हाउसेज को होटल-रिसॉर्ट्स में तब्दील करने के विचार पर काम किया जा रहा है जिससे वहां से होने वाली कमाई को गरीबों के कल्याण पर खर्च किया जा सके...

पाकिस्तान के नवेले कप्तान इमरान ख़ान वहां प्रधानमंत्री के तौर पर कितनी लंबी पारी खेल पाते हैं ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा...

लेकिन इमरान ने जिस तरह अपनी पारी का आगाज़ किया है वो उम्मीद जगाने वाला है...इमरान को अच्छी तरह पता है कि उनके मुल्क़ के माली हालात कितने ख़राब है...सालाना कर्ज़ चुकाने के लिए भी कर्ज़ लेने वाला पाकिस्तान...इमरान ये सूरत बदलना चाहते हैं...इसके लिए सरकारी फिजूलखर्ची पर लगाम, एक्सपोर्ट बढ़ाना, दुनिया भर में रहने वाले पाकिस्तानियों से देश में घरेलू बैंकों के जरिए निवेश की अपील, विदेश में काला धन भेजने वालों पर लगाम और उसे वापस लाने की कोशिश, भ्रष्ट कमाई की सूचना देने वाले को पकड़ी संपत्ति या रकम में से 25 फीसदी तक इनाम आदि तमाम वो बातें हैं जिन पर इमरान ने फौरी कदम उठाने की बात कही है...

इमरान ने कहा है कि 20 करोड़ पाकिस्तानियों में सिर्फ 8 लाख पाकिस्तानी टैक्स देते हैं...इमरान ने पाकिस्तानियों को टैक्स को जकात की तरह समझने के लिए कहा है...जिससे कि वो पैसा उन गरीबों पर सरकार खर्च कर सके जिन्हें सबसे ज्यादा सेहत आदि मसलों के लिए इनकी जरूरत है...दो करोड़ पाकिस्तानी बच्चे स्कूल नहीं जाते....आधे से ज्यादा वहां बच्चे कुपोषण के शिकार हैं...इमरान ने पाकिस्तान के लोगों वादा किया है कि वो एक भी सरकारी पैसे का दुरुपयोग नहीं होने देंगे...एडवाइजर इशरत हुसैन की अध्यक्षता में सरकारी फिजूलखर्ची पर रोक लगाने के लिए बाकायदा एक विभाग बनाया गया है जो सरकार के हर महकमे में खर्च कम करने के लिए सुझाव देगा...

इमरान ने पाकिस्तान के लोगों से साथ देने की अपील की है...साथ ही उन्होंने लोगों को भरोसा दिलाया है कि तब्दीली के लिए सबसे पहले वो खुद अपने पर कई बातें अमल करने जा रहे हैं...

मसलन इमरान इस्लामाबाद में आलीशान प्राइममिनिस्टर हाउस में ना रह कर इसी के एक थ्री बेडरूम अपार्टमेंट को अपने सरकारी आवास के तौर पर इस्तेमाल करेंगे...इस अपार्टमेंट का इस्तेमाल पहले प्रधानमंत्री के मिलिट्री सेक्रेटरी अपने आवास के तौर पर किया करते थे....इमरान तो बनी गला स्थित खुद के आवास में ही रहना चाहते थे लेकिन सिक्योरिटी कारणों से उन्हें सरकारी थ्री बेडरूम में रहने का फैसला लेना पड़ा....इमरान प्राइममिनिस्टर हाउस की जगह एक इंटरनेशनल क्वालिटी के एजुकेशन सेंटर को शुरू करने का एलान कर चुके हैं, जिससे कि वहां छात्रों को ऊंचे दर्जे की शिक्षा दिलाई जा सके....

इमरान ने प्राइममिनिस्टर हाउस के 524 कर्मचारियों में से सिर्फ दो को अपने साथ रखने का फैसला किया है...साथ ही प्राइम मिनिस्टर के बेड़े में जो 84 गाड़ियां थीं, सिर्फ उनमें से 2 को अपने इस्तेमाल के लिए रखने की घोषणा की है...बाकी सभी गाड़ियों का ऑक्शन किया जाएगा...इनमें से अधिकतर बुलेटप्रूफ और 5 करोड़ से ऊपर की गाड़ियां हैं...

तमाम गवर्नर हाउस को लेकर भी इमरान नई पॉलिसी का एलान जल्द कर सकते हैं...
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  राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री समेत तमाम नेताओं और अधिकारियों के विवेकाधीन कोटे से सरकारी पैसा खर्च करने पर तत्काल प्रभाव से रोक (इमरान सरकार के सूचना मंत्री फवाद चौधरी का दावा है कि पूर्व पीएम नवाज शरीफ ने एक साल में 51 अरब रुपए का विवेकाधीन कोटे के तौर पर इस्तेमाल किया).
-   राष्ट्रपति, पीएम, चीफ जस्टिस, सीनेट चेयरमैन, स्पीकर नेशनल असेम्बली, सभी सीएम अब फर्स्ट क्लास से हवाई यात्रा नहीं कर सकेंगे...सभी को क्लब/बिजनेस में ही यात्रा करनी होगी...
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  प्रधानमंत्री इमरान ने विदेश या घरेलू यात्राओं के लिए विशेष विमान का इस्तेमाल नहीं करने का फैसला किया है. वे बिजनेस क्लास से ही यात्रा करेंगे.
-   इमरान अपने लिए आधिकारिक प्रोटोकॉल का इस्तेमाल भी नहीं करेंगे...
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  इमरान सरकारी दफ्तरों में पांच दिन के काम की जगह छह दिन का रूटीन लाना चाहते थे...इसके लिए वो शुक्रवार और शनिवार में से शनिवार की छुट्टी खत्म करना चाहते थे...पाकिस्तान में 5 डे वीक की शुरुआत 2011 में हुई थी...कैबिनेट की बैठक में ये तय हुआ कि 5 डे वीक से काम पर असर नहीं हुआ इसलिए इस व्यवस्था को फिलहाल जारी रखा जाए...साथ ही इससे सरकारी कर्मचारियों की नाराजगी का भी खतरा है...पाकिस्तान में अब सरकारी दफ्तरों के काम का वक्त सुबह 8 से शाम 4 की जगह अब सुबह 9 से शाम 5 बजे तक कर दिया गया है...

बुधवार, 2 मई 2018

AMU में 'जिन्ना'...माहौल चार्ज करने का पूरा मसाला...खुशदीप

AMU में 'जिन्ना'...
यानी माहौल को चार्ज करने का पूरा मसाला...
बस वही सब सुना जाएगा जिसे सुनने के मकसद से अलीगढ़ के बीजेपी सांसद सतीश गौतम ने AMU के VC को चिट्ठी लिखी कि यूनिवर्सिटी में जिन्ना की तस्वीर क्यों लगी है?...
अब कोई तथ्य बताने की कोशिश करेगा तो उसे देशद्रोही’,  ‘जिन्ना समर्थक’, ‘पाक परस्तक़रार देने मे पलक झपकने मे देर नहीं लगाई जाएगी...क्योंकि ये सवाल उठाया ही इसलिए गया लगता है...
लेकिन तथ्य तथ्य ही रहेंगे और इतिहास इतिहास ही रहेगा...
हां, राजनीतिक मंशा ज़रूर इन तथ्यों को सुनने से इनकार करेगी...
AMU के छात्र संघ के हॉल में लगी जिन्ना की तस्वीर को हटाने या ना हटाने का फैसला सरकार-प्रशासन का होना चाहिए, वही ये फैसला ले और AMU मैनेजमेंट को इस बारे में सूचित कर दे. शासन-प्रशासन ये भी सुनिश्चित करे कि इस मुद्दे पर किसी को राजनीतिक रोटियां सेकने का मौका ना मिले...
अब कुछ ये सवाल...
जिन्ना की तस्वीर AMU छात्र संघ के हॉल में 1938 से लगी है, इसे हटाने की मांग अचानक अब क्यों?
AMU छात्रसंघ स्वतंत्र संस्था है, जिस वक्त ये तस्वीर सेंट्रल हॉल मेंलगी थी, उस वक्त भारत अविभाजित था...उस दौर की कई नामचीन हस्तियों को उस दौर के समाज और देश में योगदान देने के लिए छात्र संघ की ओर से अपनी आजीवन सदस्यता से नवाजा गया...इनमें सर सैयद अहमद खान (AMU के संस्थापक), महात्मा गांधी, मोहम्मद अली जिन्ना, जवाहर लाल नेहरू, रबीन्द्र नाथ टैगोर, डॉ बी आर अंबेडकर, सीवी रमन आदि शामिल थे...ये जिस समय हुआ उस समय की परिस्थितियों को देखते हुआ था...उस वक्त ना देश का बंटवारा हुआ था और ना ही पाकिस्तान अस्तित्व में आया था...
बीजेपी सांसद ने जिन्ना को बंटवारे का सूत्रधार बताते हुए तस्वीर का अभी तक लगे रहने का औचित्य पूछा है...यही तर्क है तो इस मांग को तो 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान के अस्तित्व में आते ही उठा दिया जाना चाहिए था...देश की आज़ादी के 71वें साल में ये मांग क्यों?
इन 71 साल में करीब 13 साल केंद्र की सत्ता में वो पार्टी भीरही है जो अब भी देश की बागडोर संभाले हुए है...उसने पहले क्यों नहीं जिन्ना की इस तस्वीर को हटाने के लिए कदम उठाया...
अब ये बात दूसरी है कि जिन्ना की तस्वीर हटाने की मांग को बीजेपी नेता और यूपी की योगी सरकार में मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने ही बेतुका बता दिया है...मौर्य के क्या शब्द हैं उन्हे भी जान लीजिए...जिन महापुरुषों का देश के निर्माण में हाथ रहा है उन पर कोई उंगली उठाता है तो यह बेहद घटिया बात है. देश के बंटवारे से पहले जिन्ना का योगदान भी इस देश में था. इस प्रकार के बकवास बयान, चाहे उनके दल के सांसद-विधायक दें या दूसरे दलों के, उनकी लोकतंत्र में मान्यता नहीं है.
ये कहा जा सकता है कि स्वामी प्रसाद मौर्य बहुजन समाज पार्टी छोड़ बीजेपी में आए हैं इसलिए पार्टी की मूल विचारधारा से अलग बयान दे रहे हैं...ऐसे में जिन्होंने भी जिन्ना की तस्वीर को हटाने की मांग की है वो पहले मौर्य को ही मंत्री पद से हटाने और बीजेपी से बाहर करने की मांग करें...आखिर वो कैसे जिन्ना के लिए बात करते समय महापुरुष जैसा शब्द इस्तेमाल कर सकते हैं...
चलिए मौर्य को छोड़िए, लाल कृष्ण आडवाणी तो बीजेपी के लौहपुरुष रहे हैं...पार्टी को 2 सीटों से सैकड़े की संख्या पार कराने में उनका महत्ती योगदान रहा है...वो क्यों नेता, विपक्ष होते हुए 2005 में पाकिस्तान में जिन्ना की मजार पर जाकर उन्हें धर्मनिरपेक्ष होने का सर्टिफिकेट दे आए थे...देश के पूर्व वित्त, रक्षा, विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने 2009 में विमोचित अपनी किताब 'जिन्ना: इंडिया, पार्टीशन, इंडिपेंडेंस' में नेहरु-पटेल की आलोचना की थी और जिन्ना की प्रशंसा...जसवंत सिंह तो बीते 4 साल से बीमार हैं और जवाब देने की स्थिति में नहीं है लेकिन जिन्ना की तस्वीर हटाने की मांग करने वाले बीजेपी सांसद सतीश गौतम को आडवाणी से जरूर सवाल करना चाहिए कि वो क्यों जिन्ना की मजार पर गए थे....
जिन्ना की तस्वीर हटाने की मांग के साथ ही मुंबई के मालाबार हिल्स में स्थित अरबों रुपए के जिन्ना हाउस (साउथ कोर्ट) को भी ज़मींदोज़ करने की मांग करनी चाहिए, जिसका कब्ज़ा इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिसर्च (ICCR)  के पास है. ढाई एकड़ में बने इस बंगले पर मुंबई के जमीन माफिया की नजर रही है. लेकिन आखिरकार यहां दक्षिण एशियाई संस्कृति का संग्रहालय बनाने का फैसला लिया गया...लेकिन अभी इस दिशा में ICCR कोकदम उठाना है...
मुझे यहां 1999 का एक प्रकरण भी याद आ रहा है...अभिनेता दिलीप कुमार को 1998 में पाकिस्तान सरकार ने अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाजसे नवाजा था...1999 में करगिल युद्ध हुआ, जो पाकिस्तान के तत्कालीन जनरल परवेजमुशर्रफ की हिमाकत का नतीजा था और जिसमें भारत की जांबाज़ सेना के शौर्य के आगे पाकिस्तानी सैनिकों को ऊंचे रणनीतिक स्थानों पर होने के बावजूद मुंह की खानी पड़ी थी...उस वक्त शिवसेना ने दिलीप कुमार पर बहुत दबाव बनाया था कि वो निशान-ए-इम्तियाज पाकिस्तान को वापस करें...उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे...दिलीप कुमार ने तब कहा था कि वे प्रधानमंत्री वाजपेयी पर ही छोड़ते हैं वो जो भी फैसला लेंगे वो उन्हें मंजूर होगा...
तब वाजपेयी ने कहा था कि अभिनेता दिलीप कुमार के देशभक्त होने और उनकी राष्ट्र को लेकर प्रतिबद्धता पर किसी तरह का संदेह नहीं किया जा सकता...वाजपेयी ने साथ ही कहा था कि ये अवार्ड आपका है और आप जैसा ठीक समझें वैसा करें...दिलीप कुमार ने वाजपेयी के इन शब्दों के बाद निशान-ए-इम्तियाज को वापस नहीं करने का फैसला किया था.
कभी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय तो कभी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को सवालों के घेरे में लाया जा रहा है...दोनों विश्वविद्यालयों में अगर कुछ ग़लत तत्व रहे हैं या हैं तो उन्हें वहां से हटाने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए...इन विश्वविद्यालयोंके छात्रों को भी ऐसे तत्वों से दूरी बनाते हुए उनका बहिष्कार करना चाहिए...लेकिन चंद गलत तत्व कुछ गलत कर रहे हैं तो उसकी सजा पूरे के पूरे संस्थान को क्यों, यहां पढ़ने वाले सारे छात्रों को क्यों?...JNU हो या AMU, संस्थान की छवि खराब करने की कोशिश कोई भी करता है तो उसका नुकसान यहां के सभी छात्रों को उठाना पड़ता है...ये नहीं भूलना चाहिए कि उच्च कोटि की शिक्षा प्रदान करने में इन दोनों संस्थानों का जो योगदान है वो कभी नहीं मिटाया जा सकेगा...
#हिन्दी_ब्लागिंग