सोमवार, 22 जुलाई 2019

क्या बला है टिकटॉक? क्यों सरकार को फ़िक्र...खुशदीप



सोशल मीडिया पर टिकटॉक ऐप के जरिए आपके किसी दोस्त की ओर से शेयर किए गए वीडियो से आपके चेहरे पर कभी मुस्कान आई होगी. हो सकता है कि आपने भी उसे अपने फ्रेंड सर्किल में शेयर किया हो. लेकिन ठहरिए, इस ऐप का हंसने-हंसाने के लिए ही इस्तेमाल नहीं हो रहा. चीन से संचालित इन ऐप के जरिए भारत विरोधी कंटेंट’  और अश्लील वीडियो क्लिप्स शेयर किए जाने के खतरे को लेकर भारत सरकार ने गंभीर रुख अपनाया है.


भारत में टिकटॉक ऐप पर बैन की तलवार लटक रही है. भारत सरकार ने टिकटॉक के साथ ही हेलो ऐप को नोटिस जारी कर 22 जुलाई तक 24 सवालों पर जवाब तलब किए हैं. साथ ही चेतावनी दी है कि अगर संतोषजनक जवाब नहीं मिले तो इन दोनों ऐप को बैन किया जा सकता है. सरकार की ओर से तय मियाद ख़त्म होने से पहले टिकटॉक ने रव बड़ा एलान किया है. टिकटॉक का कहना है कि ये भारतीय यूजर्स का डेटा अब भारत में ही स्टोर करेगी और यहां सेंटर खोला जाएगा. कंपनी अभी तक सिंगापुर और अमेरिका में ऐसा डेटा स्टोर कर रही थी. टिकटॉक और हेलो ऐप को चीन की कंपनी बाइटडॉन्स (ByteDance) संचालित करती है. टिकटॉक शॉर्ट ड़्यूरेशन वीडियो ऐप है जिसमें लोग ह्यूमर या अपनी अन्य टेलेंट दिखाने के लिए वीडियो बनाते हैं.    

सरकार ने 24 सवालों पर मांगा था जवाब
बता दें इलेक्ट्रोनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के साइबर ल़ॉ और ई-सिक्योरिटी विंग (MeitY) ने टिकटॉक और हेलो ऐप प्लेटफॉर्म्स के ऑपरेटर्स को बुधवार को सख्त नोटिस भेज कर 22 जुलाई तक जवाब मांगा है.

मंत्रालय ने टिकटॉक और हेलो को भेजे नोटिस के साथ 24 सवालों की फेहरिस्त भेजी है. दोनों ऐप के ऑपरेटर्स से उन आशंकाओं पर विस्तार से जवाब देने के लिए कहा है जिनके मुताबिक इन ऐप के जरिए भारत विरोधी कंटेट और अन्य गैर कानूनी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा है.         

सूत्रों के मुताबिक दोनो ऐप से पूछा गया है कि

-आपत्तिजनक कंटेंट पर कैसे नज़र रखी जाती है?  और अगर ऐसा कोई कंटेंट मिलता है तो उसे कैसे हटाया जाता है.
- अंडरऐज यूजर्स को लेकर क्या प्रावधान हैं  
- कैसे यूजर्स का डेटा इकट्ठा किया जाता है और उसे कहां शेयर किया जाता है?
-  क्या भारतीय यूजर्स के डेटा को चीन में भी स्टोर किया जा रहा है?
कैसे आश्वस्त करेंगे कि भारतीय यूज़र्स का डेटा किसी विदेशी सरकार, किसी तीसरे पक्ष या निजी संस्था को भविष्य में नहीं बेचा जाएगा  


स्वदेशी जागरण मंच ने लिखी थी पीएम को चिट्ठी
मंत्रालय ने ये सख्त कदम कुछ एजेंसियों की तरफ से लिखित शिकायत के बाद उठाया है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े संगठन स्वदेशी जागरण मंच (SJM) के सह-संयोजक अश्विनी महाजन ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिख कर टिकटॉक और हेलो’ समेत सभी चीनी एप्प पर  प्रतिबंध लगाने की मांग की है.

महाजन ने चिट्ठी में लिखा है“ हाल के हफ्तों में टिकटॉक राष्ट्रविरोधी कंटेंट के लिए हब बन चुका है जिसे एप्प पर धड़ल्ले से शेयर किया जा रहा है जो हमारे समाज के तानेबाने को बिगाड सकता है. ये भी गौर करने लायक है कि हेलो ने अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 11,000 मॉर्फ्ड राजनीतिक विज्ञापनों के लिए 7 करोड़ रुपए खर्च किए.   

महाजन ने शिकायत की कि इनमें से कुछ विज्ञापनों में वरिष्ठ भारतीय राजनेताओं की मॉर्फ्ड तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया. दिलचस्प है कि कुछ बीजेपी नेताओं ने भी हालिया लोकसभा चुनाव के दौरान ऐप के कंटेंट को लेकर चुनाव आयोग से शिकायत की थी.

महाजन की चिट्टी टिकटॉक पर उस वीडियो के शेयर किए जाने के बाद आई, जिसमें तीन यूजर्स लिंचिंग की घटनाओं की वजह से मुस्लिम युवकों के आतंकवाद की ओर मुड़ने जैसी बात कर रहे थे. हालांकि टिकटॉक ने इन तीनों यूजर्स को सस्पेंड कर दिया और वीडियो को अपने प्लेटफॉर्म से हटा लिया.

टिकटॉक के दुनिया में 80 करोड़ यूजर्स
टिकटॉक के दुनिया भर में 80 करोड़ यूजर्स हैं. भारत में भी इनकी अच्छी खासी तादाद है. इस ऐप में लोगों को कुछ ही सेकेंड लंबे वीडियो शेयर करने की अनुमति दी जाती है. ये ऐप हाल ही में तेजी से लोकप्रिय हुआ है. लेकिन साथ ही इसकी पेरेंट कंपनी बाइटडांस के लिए यूसेज गाईड को फाइन ट्यून करना और ऐप के गलत इस्तेमाल को रोकना भी चुनौती बन गया है. यूजर्स टिकटॉक का इस्तेमाल तमाम तरह के वीडियो अपलोड करने और शेयरिंग में कर रहे हैं. इनमें चुटकुलों से लेकर गंभीर राजनीतिक और सामाजिक कमेंट्री जैसा कंटेंट भी होता है.

सरकार से पूरा सहयोग करेंगे टिकटॉक
टिकटॉक ने एक बयान में कहा हैहम अपनी जिम्मेदारियों को समझते हैं और टिकटॉक समुदाय तक इन्हें गंभीरता से ले जाते हैं. हम अपने दायित्वों की पूर्ति के लिए सरकार से पूरा सहयोग करेंगे.  
टिकटॉक ने ये भी कहा है वो भारत के लिए प्रतिबद्ध है और वो यहां एक अरब  डॉलर का निवेश कर रही है.

कोर्ट के आदेश पर टिकटॉक पर पहले भी हो चुकी है कार्रवाई
ये पहली बार नहीं है कि टिकटॉक को लेकर भारत में सवाल उठे हैं. इसी वर्ष अप्रैल में मद्रास हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश पर एंड्रॉयड और आईफोन ऐप स्टोर से हटा दिया गया था. इसे तभी बहाल किया गया जब टिकटॉक ने विस्तार से बताया कि वो ऐप पर आपत्तिजनक कंटेंट से जुड़ी चिंताओं को दूर करने  के लिए क्या क्या कर रहा है.

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गुरुवार, 11 जुलाई 2019

कपिल देव जैसा कोई नहीं, न्यूज़ीलैंड से भारत की हार से समझिए...खुशदीप



 10 जुलाई 2019, मानचेस्टर, इंग्लैंड

भारत बनाम न्यूज़ीलैंड, सेमीफाइनल

18 जून 1983टनब्रिज, वेल्स 

भारत बनाम ज़िम्बाब्वे, ग्रुप मैच

इन दोनों तारीखों के बीच 36 साल का वक्त गुज़र चुका है. लेकिन ये दोनों तारीख़ें गवाह है भारतीय क्रिकेट के अहम पड़ावों की. भारतीय क्रिकेट की जब भी बात की जाएगी तो इन दोनों मैचों को ज़रूर याद किया जाएगा.  इन दोनों मैचों में ही भारत की पारी की शुरुआत बेहद ख़राब हुई. हाल में न्यूज़ीलैंड के खिलाफ़ खेले गए मैच में भारत 5 रन पर तीन विकेट गंवा चुका था. 24 रन पर चौथा विकेट गिरा. वहीं 36 साल पहले ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ़ मैच में भारत 17 रन पर पांच विकेट गंवा चुका था.

न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ इस मैच में रविंद्र जडेजा और एमएस धोनी के अथक प्रयासों के बावजूद हम लक्ष्य तक नहीं पहुंच सके और मैच आखिरकार 18 रन से हार कर वर्ल्ड कप से बाहर हो गए. लेकिन 36 साल पहले ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ़ मैच में भारत की ओर से अकेले दम पर एक शख्स ने हार के जबड़े से जीत खींची थी और वो थे भारत के तत्कालीन युवा कप्तान कपिल देव.



इंग्लैंड के मानचेस्टर में गुरुवार (10 जुलाई) को वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में न्यूज़ीलैंड से हारने के बाद सवा अरब से ज़्यादा भारतीयों के दिल टूट गए. उनका सपना टूट गया कि विराट कोहली को भी 36 साल पहले जैसे कपिल देव की तरह लॉर्ड्स की गैलरी से वर्ल्ड कप ट्रॉफी के साथ दर्शकों का अभिवादन करते देखें. कपिल देव ने तब कैसे नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया था, इस कहानी पर आने से पहले थोड़ी बात भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच हुए हालिया सेमीफाइनल की कर ली जाए.

बारिश की वजह से ये वनडे सेमीफाइनल दो दिन तक चला. न्यूज़ीलैंड ने 50 ओवर खेलकर 8 विकेट पर 239 रन का स्कोर खड़ा किया. लेकिन भारत की शुरुआत इतनी ख़राब रही कि आखिर तक नहीं संभल सका. हालत ये थी कि स्कोरबोर्ड पर 5 रन ही टंगे थे कि रोहित शर्मा, केएल राहुल और कप्तान विराट कोहली तीनों ही 1-1-1 रन बना कर पवेलियन लौट चुके थे.

स्कोर 24 तक ही पहुंचा कि दिनेश कार्तिक भी 6 के निजी स्कोर पर कैच थमा कर चलते बने. अब विकेट पर ऋषभ पंत का स्थान देने आए आलराउंडर हार्दिक पांड्या. दोनों ने स्कोर 71 रन पहुंचाया. इसी स्कोर पर पंत (32) का विकेट गिरा. स्कोर 71 रन पर 5 विकेट.

पांड्या का साथ देने अब आए अनुभवी और मिस्टर फिनिशर की पहचान रखने वाले विकेटकीपर महेंद्र सिंह धोनी. धोनी और पांड्या ने स्कोर 92 तक पहुंचाया कि पांड्या भी गैर जिम्मेदाराना शॉट खेल कर 32 के निजी स्कोर पर आउट. स्कोर 92 रन पर 6 विकेट.

ऐसे में रविंद्र जडेजा पवेलियन से निकल कर धोनी का साथ देने के लिए पहुंचे. बैटिंग की पहचान रखने वाली ये आखिरी जोड़ी क्रीज़ पर थी. इसके बाद बोलर्स ही पवेलियन में बचे थे. लगने लगा कि भारत की पारी अब लंबी नहीं चलेगी. लेकिन मिस्टर कूल धोनी और जोशीले सर जडेजा मैदान में थे तो तब भी भारतीय क्रिकेट प्रेमियों की आस बाक़ी थी.

धोनी ने संभल संभल कर और जडेजा को समझाते हुए पारी को बढ़ाना शुरू किया. जडेजा ने फिर ताबड़तोड़ न्यूज़ीलैंड की बोलिंग पर प्रहार करने भी शुरू किए. भारतीय फैंस को लगा कि चमत्कार हो सकता है और भारत फाइनल में पहुंच सकता है.

स्कोर 208 पर पहुंचा कि जडेजा 77 रन की शानदार पारी (59 गेंद, 4 चौके, 4 छक्के) खेलने के बाद न्यूज़ीलैंड के कप्तान विलियमसन को कैच थमा कर आउट हो गए. ये 48वें ओवर की 5 वीं गेंद थी. इसके बाद 13 गेंद ही बची थी. अब भी भारत से जीत 32 रन दूर थी. सबको उम्मीद थी कि धोनी का पराक्रम ही अब भारत के लिए मैच जिता सकता है. लेकिन भारत का स्कोर 216 रन तक ही पहुंचा कि गुप्टिल के शानदार थ्रो ने धोनी को रन आउट कर दिया. धोनी ने 72 गेंद खेल कर एक चौके और एक छक्के के साथ 50 रन बनाए. धोनी के आउट होते ही भारत की पारी का अंत होने में देर नहीं लगी. 49.3 ओवर में भारत 221 रन बनाकर आल आउट हो गया. साथ ही 18 रन से हार कर फाइनल की जगह घर वापसी का टिकट कटा बैठा.

ये तो रही मौजूदा वर्ल्ड कप की बात. आइए अब चलते हैं अतीत में झांकते हुए 36 साल पहले इंग्लैंड में ही हुए तीसरे वर्ल्ड कप की ओर. ये वो दौर था जब वेस्ट इंडीज़ को क्रिकेट में चुनौती देने वाला कोई नहीं था. 1975 और 1979 में हुए पहले और दूसरे वर्ल्ड कप में वेस्ट इंडीज़ ने ही ट्रॉफी पर विजेता के तौर पर अपना नाम लिखाया था. इन दोनों वर्ल्ड कप में भारत का प्रदर्शन बेहद खराब रहा और ऐसी कोई बात नहीं जिसे भारतीय क्रिकेट फैंस याद रख पाते.

1983 में तीसरे वर्ल्ड कप में खेलने के लिए भारतीय टीम इंग्लैंड पहुंची तो सभी उन्हें सिर्फ़ सैलानियों की तरह ले रहे थे. टूर्नामेंट शुरू होने से पहले किसी को उम्मीद नहीं थी कि भारत इसमें कोई विशेष प्रदर्शन दिखा सके. लेकिन तब 24 वर्षीय कप्तान कपिल देव के दिल में कुछ और ही चल रहा था. तब शक्तिशाली वेस्ट इंडीज़ को भारत ने ग्रुप मैच में हराया तो उम्मीद जगी कि टीम इंडिया सैलानियों की तरह नहीं बल्कि सच में क्रिकेट खेलने आई है.

उस टूर्नामेंट में ज़िम्बाब्वे की नौसीखिया टीम भी हिस्सा ले रही थी. सब को उम्मीद थी कि ज़िम्बाब्वे को भारत आसानी से मात दे देगा और सेमीफाइनल की ओर कदम बढ़ाएगा. लेकिन होनी को कुछ और ही मंज़ूर था. 18 जून 1983 को टनब्रिज वेल्स में भारत और ज़िम्बाब्वे एक दूसरे के ख़िलाफ़ मैदान में उतरे.

भारत ने पहले बैटिंग करना शुरू किया. सुनील गावस्कर और कृष्णमाचारी श्रीकांत ओपनिंग करने आए. गावस्कर भारत की पारी की दूसरी ही गेंद पर बिना खाते खोले एलबीडब्लू आउट होकर पवेलियन वापस. स्कोर शून्य पर 1 विकेट. तब मोहिंदर अमरनाथ श्रीकांत का साथ देने आए. स्कोर 6 तक पहुंचा, श्रीकांत भी अपना खाता खोले बिना कैच थमा कर आउट...स्कोर- 6 रन पर 2 विकेट. इसी स्कोर पर ही अमरनाथ भी 5 रन बनाकर कैच आउट. स्कोर- 6 रन पर 3 विकेट. 

भारत के स्कोर में 3 रन और जुड़े और संदीप पाटिल भी 1 रन के निजी स्कोर पर चलते बने. स्कोर 9 रन पर 4 विकेट. संयोग की बात है कि भारत की पारी शुरू होने के कुछ ही देर बाद कपिल देव नहाने चले गए थे. उन्हें बॉथरूम के बाहर से ही बताया जा रहा था कि ये भी आउट, वो भी आउट. कपिल हड़बड़ाहट में बॉथरूम से निकले और जल्दी से पैड्स पहनकर क्रीज़ पर पहुंचे.

भारत का सारा टॉप आर्डर पवेलियन वापस हो चुका था. सिर्फ खालिस बैट्समैन की पहचान रखने वाले यशपाल शर्मा क्रीज़ पर कपिल के साथ थे. 17 रन तक स्कोर पहुंचा तो यशपाल भी 9 के निजी स्कोर पर पवेलियन लौट गए. 17 रन पर पांच विकेट के स्कोर के साथ लगने लगा कि भारत का वर्ल्ड कप में आगे बढ़ने का रास्ता यहीं ख़त्म हो जाएगा. साथ ही ये ख़तरा भी कहीं भारत न्यूनतम स्कोर का रिकॉर्ड ही ना बना दे.

लेकिन मैच के इसी मोड़ से शुरू हुई वो कहानी जिसे वर्ल्ड कप क्रिकेट इतिहास की सबसे बड़ी वन मैन फाइट कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं...

भारत के 17 रन के स्कोर पर कपिल के साथ दूसरे छोर पर साथ देने के लिए अब खड़े थे रोज़र बिन्नी. कपिल ने जहां अपने शाट्स लेना शुरू किया वहीं बिन्नी संभल कर खेलते हुए साथ दे रहे थे. दोनों ने 60 रन साथ जोड़े. लेकिन 77 के स्कोर पर रोज़र बिन्नी भी 22 के निजी स्कोर पर आउट हो गए. स्कोर 77 रन पर 6 विकेट.

बिन्नी का स्थान लेने आए रवि शास्त्री. लेकिन ये क्या 1 रन ही और जुड़ा कि शास्त्री भी 1 रन के निजी स्कोर पर आउट. स्कोर अब 78 रन पर 7 विकेट.

अब ये चिंता होने लगी कि भारत 100 रन का स्कोर पार करेगा या नहीं. लेकिन कपिल देव इस सब से अविचलित वन मैन आर्मी की तरह मैदान में डटे थे. अब मदन लाल कप्तान का साथ देने आए. पवेलियन में अब विकेट कीपर सैयद किरमानी और बोलर बलविंदर सिंह संधू ही बचे थे.

कपिल और मदन स्कोर को 110 तक ले गए. लेकिन मदन भी 17 के निजी स्कोर पर कैच थमा कर चलते बने. स्कोर 110 पर 8 विकेट. इसके बाद विकेटकीपर किरमानी मैदान में उतरे.     

इसके बाद जो हुआ वो सब कुछ सपने सरीखा ही था. कपिल शाट्स भी लेते रहे और साथ ही किरमानी को शील्ड भी करते रहे. जब भारत की पारी के 60 ओवर ख़त्म हुए तो बोर्ड पर भारत का स्कोर था. 8 विकेट पर 266 रन. जैसे भारत की पारी शुरू हुई थी तो इतने स्कोर तक पहुंच पाने की किसी ने उम्मीद भी नहीं की थी.

भारत की पारी के 60 ओवर पूरे होने पर कपिल देव का निजी स्कोर था- 175 रन नॉट आउट. इसके लिए उन्होंने कुल 138 गेंद (23 ओवर) खेलीं. कपिल ने इस पारी में 16 चौके और 6 छक्के लगाए. दूसरे छोर पर कपिल देव का शानदार साथ देने वाले किरमानी 56 गेंद पर 24 रन बनाकर नॉट आउट पवेलियन लौटे.

फिर भारत ने ज़िम्बाब्वे का 235 रन पर ही 57 ओवर में पुलिंदा बांध कर मैच 31 रन से जीत लिया और सेमीफाइनल में पहुंचने का रास्ता आसान किया. बोलिंग में जहां कपिल ने बेस्ट इकॉनमी के साथ 11 ओवर में सिर्फ़ 32 रन खर्च कर एक विकेट लिया वहीं फील्डिंग में भी दो कैच लिए.

कपिल देव क्यों कपिल देव थे, उनकी इस ऐतिहासिक पारी ने पूरी दुनिया को दिखा दिया.

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सोमवार, 8 जुलाई 2019

पाक की वर्ल्ड कप हार और सरफ़राज़ का सब्र...खुशदीप


आईसीसी वर्ल्ड कप 2019 के दौरान पाकिस्तान टीम के कप्तान सरफ़राज़ अहमद को जितना अपमान सहना पड़ा, आलोचना में जितने कठोर शब्द सुनने पड़े ऐसा शायद हाल फिलहाल में किसी भी टीम के कप्तान के साथ नहीं हुआ. यहां तक कि उनके शरीर को लेकर भी उनकी पत्नी और मासूम बच्चे के सामने अपशब्द कहे गए.

सोशल मीडिया से साभार



पाकिस्तान टीम वर्ल्ड कप से बाहर होने के बाद अपने मुल्क़ लौट चुकी है. रविवार को सरफ़राज़ ने कराची में मीडिया कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया. सरफ़राज़ ने पाकिस्तान लौटने के बाद भारत के लिए जो कहा, उसे सुनकर भारतीय भी उनकी तारीफ़ किए बिना नहीं रहेंगे.  

सरफ़राज़ ने पाकिस्तान लौटने पर कराची एयरपोर्ट पर मीडिया कान्फ्रेंस में दो बातें कहीं जिन पर सभी को ग़ौर करना चाहिए. पहले उन्होंने कहा- भारत पर शक़ करने की कोई वजह नहीं है. उसने इंग्लैंड से जानबूझकर मैच नहीं हारा जिससे कि पाकिस्तान सेमीफाइनल में नहीं पहुंच सके. सरफ़राज़ के मुताबिक उस मैच में इंग्लैंड वाकई बेहतर खेलकर जीता.

मीडिया कॉन्फ्रेंस में एक और बात हुई. एक महिला पत्रकार ने सरफ़राज़ से पूछा कि आपको नहीं लगा कि 'बंगालियों' के ख़िलाफ़ आख़िरी मैच में शोएब मलिक को खिला कर फेयरवेल मैच का मौका दिया जाना चाहिए था. इस पर सरफ़राज ने पत्रकार से कहा कि आपको किसी देश के लिए ऐसा शब्द प्रयोग नहीं करना चाहिए, उस देश का नाम 'बांग्लादेश' है और उसे वैसे ही सम्मान से बुलाया जाना चाहिए.

वर्ल्ड कप में पाकिस्तान टीम और इसके कप्तान सरफ़राज़ के लिए सबसे ज़्यादा दुश्वारियां 16 जून को भारत के साथ मैच में हार के बाद शुरू हुईं. इस हार के बाद सरफ़राज़ को क्या क्या नहीं सुनना पड़ा. लेकिन दाद देनी होगी कि सरफ़राज़ ने सब कुछ सहने के बावजूद अपना संयम नहीं खोया. इसकी जगह उन्होंने खेल पर फोकस रखा और लीग स्टेज के आख़िरी दौर में इंग्लैंड और न्यूज़ीलैंड जैसी मज़बूत टीमों को शिकस्त दी. ये दोनों ही टीमें आख़िरकार सेमीफाइनल में जगह बनाने में कामयाब रहीं.

मैनचेस्टर के ओल्ड ट्रैफर्ड मैदान पर भारत से मिली हार के बाद फैंस से लेकर पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर्स तक सरफ़राज़ पर शब्दबाण चलाने में पीछे नहीं रहे. किसी ने  उनकी शारीरिक बनावट तो किसी ने विकेट के पीछे उबासी लेने का मखौल उड़ाया.

हद तो तब हुई जब एक मॉल में सरफ़राज़ परिवार के साथ पहुंचे. उसी वक्त का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ. इसमें एक शख्स सरफराज को उनकी फैमिली के सामने अपमानित करता दिखा. वीडियो में दिखता है कि सरफराज अपने बेटे को गोद में लिए घूम रहे हैं तभी यह शख्स फोटो की फरमाइश करता है जिसे वे मान लेते हैं. यह शख्स फोटो की बजाए वीडियो बनाने लगता है तो सरफराज आगे चल देते हैं. इस पर यह फैन उनके खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग करता है। वो कहता है कि आप *** जैसे मोटे क्यों हो,  कम डाइट किया करो. सरफराज ऐसे कमेंट से नाराज होकर पलटकर देखते हैं लेकिन उस शख्स को बिना कुछ कहे आगे बढ़ जाते हैं.

सरफ़राज़ जब होटल रूम पहुंचे तो अपनी पत्नी खुशबख़्त को रोता हुआ देखा. सरफराज ने पत्नी को समझाया कि ये महज एक वीडियो है और उन्हें इसे इतनी गंभीरता से नहीं लेना चाहिए. सरफराज़ ने साथ ही कहा कि हमें यह सब सहन करना होता है क्योंकि हमारे क्रिकेट प्रशंसक काफी भावुक होते हैं.
हालांकि वीडियो वायरल होने के बाद इसे बनाने वाले शख़्स को सोशल मीडिया पर लोगों ने जमकर सुनाई. बाद में इस शख़्स को कहना पड़ा कि अपनी इस हरकत के लिए वो सरफ़राज़ से माफ़ी मांगता है.  

सरफ़राज़ ने रविवार को कराची में कहा, वर्ल्ड कप से बाहर होने पर जैसे पाकिस्तान के अवाम को बुरा लग रहा है वैसे ही उन्हें और टीम को भी लग रहा है, कोई भी हारने के लिए नहीं जाता है.

सरफ़राज ने कहा, 16 जून को भारत से हार के बाद अगले 7 दिन हमारे लिए बहुत मुश्किल रहे. हमने दो दिन का ब्रेक लिया और मैंने मैनेजमेंट के बिना सभी 15 खिलाड़ियों के साथ बैठक की. मैंने उनसे हर उस चीज़ पर बात की जो पहले पांच मैचों में महसूस की थीं. वो क्या क्या था जो हम ग़लत कर रहे थे. सभी खिलाड़ियों ने अच्छी प्रतिक्रिया दी और अपना अपना फीडबैक दिया. उसके बाद बाक़ी सभी मैचों में टीम ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया. जूनियर हो या सीनियर ने अपनी ज़िम्मेदारी निभाई.

पहले कहा जा रहा था कि सरफ़राज़ और पाकिस्तान टीम के अन्य सदस्यों को लौटने पर फैंस के गुस्से का सामना करना पड़ेगा. लेकिन कराची एयरपोर्ट पर रविवार को सरफ़राज़ का गर्मजोशी से स्वागत हुआ. यही सरफ़राज़ के लिए शायद सबसे ज़्यादा राहत रही होगी.

पाकिस्तान टीम का मौजूदा वर्ल्ड कप में आगाज़ ही बहुत ख़राब रहा. 31 मई को पाकिस्तान का वेस्ट इंडीज़ से मुक़ाबला था. इस मैच में वेस्ट इंडीज़ ने पाकिस्तान का सिर्फ 105 रन पर ही पुलिंदा बांध दिया और फिर 7 विकेट से मैच जीत लिया. इसी मैच से जो पाकिस्तान की रन रेट ख़राब हुई, उसके सदमे से पाकिस्तान लीग स्टेज के आखिर तक नहीं उभर सका और सेमीफाइनल की दौड़ में न्यूज़ीलैंड से बराबर 11 अंक होने के बावजूद बाहर हो गया.

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रविवार, 7 जुलाई 2019

वर्ल्ड कप फाइनल मे भारत की जर्सी नीली या नारंगी?...खुशदीप

क्या नारंगी (कथित भगवा) जर्सी का भारत की आईसीसी 2019 वर्ल्ड कप में लीग मुक़ाबलों में इकलौती हार से वाकई कोई संबंध था? क्या ये सच में अपशकुन है जैसा कि सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स बता रहे हैं.  अगर फाइनल में इंग्लैंड और भारत के भिड़ने की तस्वीर बनी तो भारत को फिर नारंगी जर्सी में ही खेलना पड़ेगा. अगर भारत सेमीफाइनल में न्यूज़ीलैंड को हरा देता है और दूसरे सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया इंग्लैंड को हरा देता है तो टीम इंडिया को फाइनल में नारंगी जर्सी पहनने की नौबत नहीं आएगी.

आइए नारंगी पर आने से पहले इस वर्ल्ड कप के 6 जुलाई तक संपन्न हो चुके लीग स्टेज को लेकर कुछ बात करते हैं. 

आईसीसी वर्ल्ड कप 2019 को शुरुआत में कई मैच बारिश से धुलने की वजह से सबसे नीरस वर्ल्ड कप माना जा रहा था. अचानक वो लीग स्टेज मैच खत्म होते होते बहुत रोचक हो गया. वजह ये रही कि वर्ल्ड कप में सेमीफाइनल स्टेज में पहुंचने वाली तीसरी और चौथी टीम कौन सी रहेंगी, ये रोमांच आख़िर तक बना रहा.

शनिवार 6 जुलाई को भारत बनाम श्रीलंका और ऑस्ट्रेलिया बनाम दक्षिण अफ्रीका मुक़ाबलों से साफ हो गया कि सेमीफाइनल स्टेज में कौन सी टीम किस टीम से भिड़ेगी. अंक तालिका में नंबर 1 पर रहे भारत का मुक़ाबला चौथे नंबर पर रहे न्यूज़ीलैंड से शुक्रवार 9 जुलाई को पहले सेमीफाइनल में होगा. इसी तरह 11 जुलाई को नंबर 2 ऑस्ट्रेलिया और नंबर 3 इंग्लैंड आपस में भिड़ेंगे.

सेमीफाइनल स्टेज में पहुंची टीमों में मौजूदा वर्ल्ड कप चैंपियन ऑस्ट्रेलिया अभी तक पांच बार इस ट्रॉफी पर कब्ज़ा कर चुका है. वहीं भारत ने 1983 और 2011 में वर्ल्ड कप पर विजेता के तौर पर अपना नाम लिखवाया. बड़ा सवाल ये है कि क्या विराट कोहली भी वर्ल्ड कप के विजेता भारतीय कप्तानों- कपिल देव (1983) और महेंद्र सिंह धोनी (2011) के इलीट क्लब में 14 जुलाई को फाइनल जीत कर अपना नाम शामिल करा पाएंगे.

अंक तालिका ही बता रही है कि इस वर्ल्ड कप में लीग स्टेज में सबसे शानदार प्रदर्शन टीम इंडिया ने ही किया है. भारत को लीग स्टेज के कुल 9 मैचों में से 7 में जीत हासिल हुई. बस इंग्लैंड के ख़िलाफ़ मुकाबले में भारत को हार का मुंह देखना पड़ा. न्यूज़ीलैंड के साथ लीग मैच धुल जाने की वजह से भारत को एक-एक अंक बांटना पड़ा. वहीं अंक तालिका में दूसरे नंबर पर ऑस्ट्रेलिया की बात की जाए तो उसे 9 में से 2 मैचों में हार का मुंह देखना पड़ा. पहले भारत के हाथों और फिर शनिवार को दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ टूर्नामेंट के आख़िरी लीग मैच में.

ऐसे में लीग स्टेज में प्रदर्शन के आधार पर देखा जाए तो कायदे से फाइनल में भारत और ऑस्ट्रेलिया को ही भिड़ना चाहिए. लेकिन मेज़बान देश इंग्लैंड और न्यूज़ीलैंड भी अपना दिन अच्छा होने पर किसी भी टीम को तारे दिखाने में सक्षम हैं. इंग्लैंड को तो वर्ल्ड कप अब तक ना जीत पाने की ख़ास तौर पर कसक है. ऐसे में अपने होम ग्राउंड्स पर वर्ल्ड कप जीतने में इंग्लैंड कोई कसर नहीं छोड़ेगा. न्यूज़ीलैंड भी अभी तक वर्ल्ड कप नहीं जीत सका है, इसलिए वो भी मंगलवार को सेमीफाइनल में भारत के ख़िलाफ़ पूरे जी-जान से खेलेगा जिससे कि लॉर्ड्स में 14 जुलाई को फाइनल का टिकट कटा सके.

आइए अब बात करते हैं टीम इंडिया की वैकल्पिक नारंगी जर्सी की.
टीम की जर्सी के मुद्दे का क्रिकेट से कोई संबंध नहीं हो लेकिन देश के सोशल मीडिया में ये ज़ोर-शोर से चर्चा का विषय बना रहा. वनडे मैचों में टीम इंडिया की पारंपरिक ड्रेस नीली ही रही है. लेकिन 30 जून को मेज़बान इंग्लैंड के ख़िलाफ़ मुक़ाबले में भारतीय टीम को नारंगी (कथित भगवा) जर्सी में उतरना पड़ा. इसका कारण ये था कि इंग्लैंड की जर्सी भी नीली है. ऐसे में आईसीसी का नियम है कि मेज़बान देश की जर्सी वही रहती है और मुक़ाबला करने वाले दूसरे देश को जर्सी बदलनी पड़ती है.

जब देश में पता चला कि भारत को इंग्लैंड के ख़िलाफ़ नारंगी जर्सी में मैच खेलना है तो इसने सोशल मीडिया पर विवाद की शक्ल ले ली. कुछ राजनेताओं ने भी इस मुद्दे को उठाया. साथ ही जर्सी बदले जाना केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी के भगवा से जुड़ाव का परिणाम भी बताया. हक़ीक़त में ये आईसीसी और बीसीसीआई के बीच का विषय था और इसका सत्ताधारी पार्टी से कोई लेनादेना नहीं था.

सोशल मीडिया पर नारंगी जर्सी को सोशल मीडिया पर अपशकुन से भी जोड़ कर पेश करने की कोशिश की गई. दरअसल, नियम के मुताबिक इंग्लैंड के ख़िलाफ़ ही टीम इंडिया नीली जर्सी छोड़ कर नारंगी जर्सी में खेली और उसे हार का मुंह देखना पड़ा. 30 जून को हुए इस मैच में इंग्लैंड ने टॉस जीतकर पहले बैटिंग की और निर्धारित 50 ओवर में 7 विकेट खोकर 337 रन का विशाल स्कोर खड़ा किया. भारत पीछा करते हुए 50 ओवर में 5 विकेट खोकर 306 रन ही बना सका और 37 रन से मैच हार गया. इस मैच में पीछा करते हुए भी धोनी और केदार जाधव की धीमी बैटिंग की खास तौर पर काफ़ी आलोचना हुई.

भारत बनाम इंग्लैंड के इस मुक़ाबले पर पाकिस्तान के दर्शकों की भी पैनी नज़र थी. क्योंकि इस मैच में अगर भारत जीतता तो पाकिस्तान की सेमीफाइनल में पहुंचने की राह आसान हो जाती. लेकिन इस मैच में भारत की इंग्लैंड से हार के बाद पाकिस्तान की संभावना बहुत कम हो गई. पाकिस्तानी मीडिया ने ऐसे आरोप भी लगाए कि पाकिस्तान को वर्ल्ड कप से बाहर करने के लिए भारत इंग्लैंड से जानबूझ कर हारा. फिर इंग्लैंड ने एक और लीग मैच में न्यूज़ीलैंड को हराया तो पाकिस्तान के लिए सेमीफाइनल का दरवाज़ा प्रैक्टीकल तौर पर बंद हो गया.

राजनीतिक बहसबाज़ी के लिए नारंगी (कथित भगवा) के मुद्दे को बेशक उछाला जाए लेकिन खेल के मैदान पर ऐसे अंधविश्वास के लिए कोई जगह नहीं होती. ऐसे में टीम इंडिया नारंगी में खेले या नीली जर्सी में, हर भारतीय की यही दुआ है कि क्रिकेट के मक्का लॉर्ड्स की बॉलकनी से 14  जुलाई को वर्ल्ड कप ट्रॉफी लेकर वैसे ही दर्शकों का अभिवादन करें जैसा कि 36 साल पहले कपिल देव ने किया था. 

ये ठीक है कि कई ख़िलाड़ी भी अंधविश्वास के चलते बढ़िया प्रदर्शन के लिए कुछ टोटके आज़माते हैं जैसे कि मोहिंदर अमरनाथ बैटिंग करते वक्त लाल रूमाल हमेशा ज़ेब में रखा करते थे. या जब मैदान पर कोई अपने खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन कर रहे हों तो ड्रैसिंग रूम की गैलरी में जिस मुद्रा में बैठे हों, वैसे ही बैठे रहते हैं ताकि टशन ख़राब ना हो. लेकिन ये सिर्फ़ खिलाड़ी विशेष के ज़ेहन से ही जुड़ा होता है इसका खेल की दुनिया से जुड़े होने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता.

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मंगलवार, 2 जुलाई 2019

क्या वाकई फ़ासीवाद की ओर देश?...खुशदीप


लोकसभा चुनाव 2014 के नतीजे आने से पहले राष्ट्रीय स्तर के एक अख़बार में मेरा लेख प्रकाशित हुआ. तब चुनाव के दौरान माहौल से ही साफ़ था कि नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं. उस वक्त कुछ सुधिजन सवाल करते थे कि कोई अधिनायकवादी नेता दिल्ली की गद्दी संभालता है तो उसका देश के राजनीतिक परिदृश्य पर क्या असर पड़ेगा? विदेश में उसकी कैसी गूंज सुनाई देगी?



पहले अपने उसी लेख से कुछ पंक्तियां यहां अक्षरक्ष:-  

अधिनायकवादी नेता के हाथ में अगर केंद्र की सत्ता की कमान आती है तो देश किस दिशा में अग्रसर होगा?  भारतीय लोकतंत्र की अवधारणा जिस संसदीय जनवाद पर टिकी है, क्या देश उससे इतर नरम फ़ासीवाद की लाइन पकड़ेगा? भारत भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टि से जितना विशाल और विविध है, उसे देखते हुए यहां कठोर फासीवाद के तत्काल जड़े जमा लेने की संभावना बहुत कम है. ऐसा कोई भी एजेंडा बहुलतावादी इस देश पर थोपना आसान नहीं है. हां, ये ख़तरा ज़रूर है कि केंद्र में कोई अधिनायकवादी प्रधानमंत्री बनता है और कई राज्यों में उसके कठपुतली मुख्यमंत्री बनते हैं तो फिर कट्टर फ़ासीवाद भी दूर की कौड़ी नहीं रहेगा. ऐसा माहौल जहां दबंगई और धौंसपट्टी के ज़रिए शासन चलता है. ऐसी स्थिति, जहां दक्षिणपंथी एजेंडे से अलग मत रखने वालों के सामने समर्पण या मौन के सिवा कोई विकल्प ही नहीं बचता.”

मुझे इस लेख की याद अब क्यों आई. दरअसल,  तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की नवनिर्वाचित सांसद महुआ मोइत्रा का लोकसभा में 25 जून को दिया पहला भाषण चर्चा का विषय बना हुआ है. ये भाषण सोशल मीडिया पर वायरल होने के साथ देश-विदेश में सुर्खियां बटोर रहा है.
मोइत्रा ने जो कहा, उस पर बाद में आऊंगा. पहले उनका संक्षिप्त परिचय दे दिया जाए. 2017 लोकसभा चुनाव में महुआ ने पश्चिम बंगाल के कृष्णानगर लोकसभा क्षेत्र से जीत हासिल की. राजनीति में आने से पहले मोइत्रा लंदन में प्रख्यात बहुराष्ट्रीय कंपनी में इंवेस्टमेंट बैंकर थीं. 2009 में नौकरी छोड़कर मोइत्रा भारत आईं और राजनीति से जुड़ गईं. 2016 में पश्चिम बंगाल की करीमनगर विधानसभा सीट से टीएमसी के टिकट पर ही विधायक बनीं. मोइत्रा टीएमसी के राष्ट्रीय प्रवक्ता के तौर पर टीवी डिबेट्स में पार्टी का पक्ष रखती रही हैं.

भाषण में मोइत्रा ने देश के संविधान को ख़तरे में बताते हुए बांटने की कोशिशों को लेकर सात संकेत गिनाए.

पहले संकेत में मोइत्रा ने कहा, जिस राष्ट्रवाद को आज परोसा और बढ़ावा दिया जा रहा है वो छिछला है और हमारी राष्ट्रीय पहचान को नोचने वाला है. इसका मकसद जोड़ना नहीं, बांटना है.

मोइत्रा ने दूसरा संकेत गिनाया कि सरकार के हर स्तर पर मानवाधिकारों की अनदेखी की मंशा नज़र आती है. इसके लिए उन्होंने बढ़ते हेट क्राइम्स, मॉब लिंचिंग की घटनाओं का हवाला दिया.

तीसरे संकेत में मोइत्रा ने कहा कि देश के मास मीडिया को कंट्रोल किया जा रहा है. मोइत्रा के मुताबिक इसका इस्तेमाल सत्ताधारी पार्टी के लिए प्रोपगेंडा फैलाने में हो रहा है और दूसरी तरफ सारे विपक्षी दलों की कवरेज काट दी जाती है. इसके लिए मोइत्रा ने विज्ञापन को सरकार का हथियार बताया.

चौथे संकेत में मोइत्रा ने देश को अनजाने ख़ौफ़ में रखा जाना बताया. मोइत्रा के मुताबिक सेना की उपलब्धियों को एक व्यक्ति के नाम पर भुनाया और इस्तेमाल किया जा रहा है. हर दिन नए दुश्मन गढ़े जा रहे हैं.

मोइत्रा ने पांचवें संकेत में कहा कि अब इस देश में धर्म और सरकार एक-दूसरे में घुलमिल गए हैं. मोइत्रा ने कहा कि इस संसद के सदस्य अब 2.77 एकड़ ज़मीन (राम जन्मभूमि के संदर्भ में) के भविष्य को लेकर चिंतित हैं, न कि भारत की बाकी 80 करोड़ एकड़ ज़मीन को लेकर.

छठे संकेत में मोइत्रा ने बुद्धिजीवियों और कला के क्षेत्र में काम करने वालों के लिए तिरस्कार, विरोध और असमहति को दबाना, साइंटिफिक टेम्परामेंट के विपरीत स्कूली सिलेबस से छेड़छाड़ आदि को गिनाया. मोइत्रा के मुताबिक ये देश को अतीत के अंधेरे की ओर ले जाना है.

सातवें और आख़िरी संकेत में मोइत्रा ने चुनाव तंत्र की आज़ादी घटने का उल्लेख किया. इसके लिए मोइत्रा ने चुनाव पर होने वाले बेतहाशा खर्च (खास तौर पर सत्ताधारी पार्टी की ओर से) को गिनाया.
मोइत्रा ने 2017 में अमेरिका के होलोकास्ट मेमोरियल म्यूजियम की मुख्य लॉबी में लगे एक पोस्टर का भी हवाला दिया. इस पोस्टर में फासीवाद आने के शुरुआती संकेतों को दर्शाया गया था. मोइत्रा के मुताबिक जिन सात संकेतों को उन्होंने अपने भाषण में गिनाया वो उस पोस्टर का भी हिस्सा थे. ये पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि वो पोस्टर अब भी होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूज़ियम या उसकी गिफ़्ट शॉप में लगा है या नहीं. 2017 में पोस्टर की तस्वीर किसी यूज़र की ओर से ट्विटर पर शेयर किए जाने की वजह से ये चर्चा में आया.

उस पोस्टर में फासीवाद के शुरुआती संकेत जो बताए गए वो थे- ताकतवर और सतत राष्ट्रवाद, मानवाधिकारों की अनदेखी, समान कारण के लिए शत्रुओं की पहचान, सेना का प्रभुत्व, व्यापक लैंगिकवाद, नियंत्रित मास मीडिया, राष्ट्रीय सुरक्षा की धुन, धर्म और सरकार का आपस में गूंथा होना, कॉरपोरेट ताकत का संरक्षण, श्रम ताकत को दबाना, बुद्धिजीवियों और कला का तिरस्कार, अपराध और दंड की सनक.
ज़ाहिर है पोस्टर में फ़ासीवाद के जो कारण गिनाए गए वो कोई हाल-फिलहाल में सामने नहीं आए. ये पुरानी लिस्ट है जो अब सबके सामने है. फ़ासीवाद या मेजोरिटेरियनिज़म में यही माना जाता है कि हम जो सोचते हैं वही सही है बाक़ि सब ग़लत. यानि बहुसंख्यकवाद का प्रभुत्व.
मोइत्रा ने जो अपने भाषण में कहा सोशल मीडिया पर उसे कुछ यूजर्स ने उसे स्पीच ऑफ द ईयरबताया. मोइत्रा मोदी सरकार पर तीखे प्रहार करने में मुखर रहीं. ये भी सच है कि उन्होंने जो भी कहा, उसमें कुछ हद तक देश की सच्चाई भी है. लेकिन मोइत्रा जिस टीएमसी का प्रतिनिधित्व करती है उसी का बंगाल में राज है. ममता बनर्जी के शासन वाले बंगाल में टीएमसी का सिंडीकेट फलने फूलने और प्रोटेक्शन मनी वसूले जाने के आरोप सामने आते रहे हैं. पॉन्जी स्कीम घोटाले भी टीएमसी के शासन में हुए.
मोइत्रा संसद में पहली बार बोलीं, बहुत अच्छा बोलीं. लेकिन उन्हें अपनी पार्टी में भी ये आवाज़ उठानी चाहिए कि हमें केंद्र सरकार के खिलाफ बोलने का पूरा नैतिक आधार तभी होगा जब हम बंगाल में आदर्श शासन व्यवस्था की मिसाल पूरे देश के सामने पेश करें. मां, माटी और मानुष के जिस नारे  को आगे कर ममता लेफ्ट के ज़मींदोज़ शासन को उखाड़ कर बंगाल की सत्ता में आई, उस नारे को पूरी तरह हक़ीक़त में भी बदल कर दिखाएं.
आख़िर में उसी बात पर आता हूं, जहां से इस लेख की शुरुआत की थी. क्या अब वाकई भारत में नरम फ़ासीवाद जैसे हालात बन रहे हैं. एक देश, एक चुनावक्या उसी दिशा में बढ़ाया जाने वाला कदम है? पांच साल पहले मैंने यही लिखा था कि संघवाद के चलते फ़ासीवाद के देश में सिर उठाने की संभावना कम ही है. ये तभी संभव हो सकता है कि केंद्र के साथ करीब करीब सभी राज्यों में एक ही पार्टी या गठबंधन की सरकार स्थापित हो जाएं.

 ऐसे में राज्यों में कठपुतली मुख्यमंत्री होने की वजह से किसी भी एजेंडे को लागू करना बाएं हाथ का खेल हो जाएगा. हां जब तक कई राज्यों में विपक्षी पार्टियों या विरोधी विचारधाराओं की सरकारें हैं और राज्यसभा में विपक्ष का हाथ ऊपर है, केंद्र में सत्तारूढ पार्टी के लिए अपना एजेंडा थोपना टेढ़ी खीर ही रहेगा. हां, जिस दिन इन बाधाओं को भी साध लिया जाएगा तो कट्टर फ़ासीवाद भी दूर की कौड़ी नहीं रहेगा.