शुक्रवार, 3 जनवरी 2020

हंगामा है क्यूं बरपा फ़ैज़ की नज़्म ही तो पढ़ ली है...खुशदीप



हम देखेंगेनज़्म क्या वाकई हिन्दू विरोधी या इससे डर की वजह कुछ और?


फ़ैज़ अहमद फ़ैज- फोटो आभार: विकीमीडिया 



फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म ‘’व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे)में बुत हटाने के मायने क्या वाकई हिन्दू धर्म और उसे मानने वालों के ख़िलाफ़ थे? क्या इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, कानपुर (IIT-K) में फ़ैज़ की इस नज़्म गाए जाने का विरोध करने वालों ने इसका यही मतलब लगाया तो सही किया?

इन सवालों के जवाब जानने से पहले ये समझना ज़रूरी है कि आख़िर फ़ैज़ की 1979 में लिखी ये नज़्म अब क्यों भारत में सुर्खियों में है? इसके लिए आपको इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी- कानपुर (IIT-K) के परिसर में 17 दिसंबर 2019 को हुई एक घटना पर गौर करना होगा. उस दिन IIT-K में करीब 300 स्टूडेंट्स इकट्ठा हुए. उन्होंने जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी (दिल्ली) में नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) का विरोध करने वाले छात्र-छात्राओं के ख़िलाफ़ पुलिस की कार्रवाई पर नाराज़गी जताई. इस मौके पर एक छात्र ने फ़ैज़ की हम देखेंगे नज़्म भी सुनाई.

IIT-K के उपनिदेशक मनींद्र अग्रवाल के मुताबिक इस मामले की जांच के लिए कमेटी बनाई गई है. मनींद्र अग्रवाल ने इस विषय में कहा- ‘’ऐसी कुछ मीडिया रिपोर्ट आईं कि IIT-K  ने जांच इसलिए बिठाई है कि फ़ैज़ की नज़्म हिन्दू विरोधी है या नहीं.  इस तरह की रिपोर्ट भ्रामक हैं. असलियत ये है कि इंस्टीट्यूट को समुदाय के कुछ वर्गों से शिकायत मिली थीं कि स्टूडेंट्स के विरोध मार्च के दौरान कुछ खास कविताएं (नज़्म) पढ़ी गईं. बाद में सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट भी ऐसी आईं जो भड़काऊ थीं. ऐसे में इंस्टीट्यूट ने इन सारी शिकायतों को देखने के लिए एक कमेटी बनाई है.’’

फ़ैज़ की ज़िस नज़्म पर इतना हंगामा बरपा है, पहले उसे पढ़ लेना ज़रूरी है- 

हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिस का वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिखा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिरां
रूई की तरह उड़ जाएंगे
हम महकूमों के पांव-तले
जब धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हक़म के सर-ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख़्त गिराए जाएंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो गायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उठेगा अनल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्क़-ऐ-ख़ुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो

नज़्म में कुछ ऐसे शब्द हैं, जिनका मतलब जाने बिना इसे ठीक से नहीं समझा जा सकता. मसलन,

लौह-ए-अज़ल: क़यामत तक का जहां सारा ज़िक्र है, वो तख़्ती, स्लेट  या दस्तावेज़
कोह-ए-गिरां: बड़े पहाड़
महकूमों: रियाआ, प्रजा
अहल-ए-हकम: हुक़ूमत चलाने वाले
अर्ज़-ए-ख़ुदा: सारी ज़मीन
अहल-ए-सफ़ा: पवित्र लोग
मरदूद-ए-हरम: वे लोग जिन्हें पाक़ जगहों पर जाने की इजाज़त नहीं
हाज़िर: मौजूद
मंज़र: नज़ारा
नाज़िर: देखने वाला
अनल-हक़: मैं ही ब्रहम हूं या मैं ही खुदा हूं या मैं ही सच हूं
ख़ल्क़ए-ख़ुदा: इनसान समेत खुदा की बनाईं सभी चीज़ें

क्या वाकई इस नज़्म में कुछ ऐसे शब्द हैं जिनसे हिन्दू समुदाय की भावनाएं आहत हो सकती हैं? फ़ैज़ तमाम उम्र फिरकापरस्ती, कट्टरपंथ, तानाशाही और पीछे की ओर ले जाने वाले कदमों का विरोध करते रहें. इसलिए उन्हें अपने ही मुल्क़ में एंटी-इस्लाम, एंटी-पाकिस्तान का तमगा देने वालों की कमी नहीं रही. उनसे सबसे ज्यादा परेशानी पाकिस्तान के फौजी हुक्मरान जिया उल हक़ को हुई. इसलिए उनके दौर में हम देखेंगे नज्म पर ही बैन लगा दिया गया था.

ये फ़ैज़ का ही कमाल था कि उन्होंने तानाशाही, ज़ुल्म करने वाली हुकूमत पर प्रहार करने के लिए हम देखेंगेनज़्म में प्रतीकों के तौर पर ऐसे कई शब्दों का सहारा लिया जिनका कट्टरपंथी ख़ूब इस्तेमाल करते रहे थे.

हम देखेंगेनज़्म को ठीक से समझने से पहले फ़ैज़ के बारे में ये जानना ज़रूरी है कि फ़ैज़ का मुल्क़ पाकिस्तान ज़रूर रहा लेकिन उन्होंने अपनी उम्र का आधा हिस्सा पाकिस्तान के बाहर ही बिताया. पचास के दशक में वो पांच साल तक जेल में भी रहे. जिस नज़्म विशेष हम देखेंगेकी बात की जा रही है, वो उन्होंने 4 दशक पहले 1979 में पाकिस्तान के फौजी हुक्मरान जिया उल हक़ के तानाशाह दौर के ख़िलाफ़ लिखी थी. फ़ैज़ का इंतकाल 20 नवंबर 1984 को लाहौर में हुआ. फ़ैज़ की हम देखेंगेनज़्म शख्स-शख्स की ज़ुबान पर तब चढ़ी जब मशहूर गायिका इक़बाल बानो ने इसे अपनी आवाज़ बख़्शी. इक़बाल बानो ने 13 फरवरी, 1986 को फ़ैज़ के जन्मदिन वाले दिन इस नज़्म को लाहौर के अल-हमरा आर्ट काउंसिल परिसर में करीब 50,000 लोगों के सामने गाया. जिया उल हक़ के तमाम ख़ौफ़ से बेपरवाह इस आयोजन को फ़ैज़ मेले का नाम दिया गया.

दरअसल तब जिया उल हक़ ने अपने एक फ़रमान के तहत औरतों के साड़ी पहनने पर पाबंदी लगा दी थी. इसी पर ऐतराज़ जताने के लिए इकबाल बानो ने काली साड़ी पहन कर ये नज़्म गाई.  
आइए अब जानते हैं कि फ़ैज़ इस नज़्म के जरिए कहना क्या चाहते थे-

हम देखेंगे, हमारा वो दिन देखना तय है जिसका कि वादा है, जो अनंतकाल तक की तख़्ती पर लिखा है. जब ज़ुल्म और सितम के घने पहाड़ रूई की तरह उड़ जाएंगे. तब हम रियाआ (प्रजा) के पैरों के नीचे धरती धड़ धड़ धड़केगी और हम पर राज करने वाले लोगों के सिर पर बिजली कड़ कड़ कड़केगी. जब इस दुनिया से झूठ की पहचान वाले सारे लोग (जो खुद को खुदा समझ बैठे हैं) हटाए जाएंगे. फिर हम जैसे साफ़ लोग जिन्हें पाक़ जगहों से दूर रखा गया, उन्हें बड़े गद्दों पर बिठाया जाएगा. सब ताज उछाले जाएंगे. सब तख़्त गिराए जाएंगे. नाम रहेगा अल्लाह का जो गायब भी है और हाज़िर भी. दृश्य भी है और इसे देखने वाला भी. यहां अल्लाह शब्द का इस्तेमाल ख़ालिस या पवित्रता के लिए हुआ. इसे किसी एक मज़हब से से जोड़ कर देखना बेतुका है. यहां किसी भी धर्म के ईष्ट का इस्तेमाल किया जा सकता था. फ़ैज़ खुद नास्तिक थे और वो अपने लिखे में आवाम को ही सबसे ऊपर बताते थे. अगर उनकी ये नज़्म एक ही मज़हब से जुड़ी होती तो 41 साल बाद भी ताकतवरों की मनमानी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए इतना बड़ा ज़रिया नहीं बनी होती.   

हम देखेंगे नज़्म की सबसे अहम पंक्तियां आगे हैं और इन्हें ठीक से समझना बहुत ज़रूरी है.

उठेगा अनल हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्क़-ऐ-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

मशहूर लेखक-गीतकार जावेद अख़्तर का कहना है कि इस नज्म में 'अनल हक़' का ज़िक्र है. इसका शाब्दिक अर्थ है- अहम ब्रह्म यानि मैं ही खुदा हूं या मैं ही सच हूं. अनल हक़ सूफ़ी परम्परा या भक्ति की कबीर जैसी निर्गुण धारा के करीब है. जावेद अख्तर के मुताबिक ये अद्वैतवाद है. जिसमें क्रिएटर और क्रिएशन यानि सृष्टिकर्ता और उसकी बनाई गई चीज़ों को एक ही माना गया है. जबकि इस्लाम, ईसाई और यहूदी धर्मों में क्रिएटर और क्रिएशन को अलग माना जाता है. अनल हक़ का नारा बुलंद करने की वजह से ही मुगल तानाशाह शासक औरंगजेब ने सूफी सरमद का सिर कटवा दिया था. जिस 'अनल हक़' को औरंगजेब ने इस्लाम और अपनी हुकूमत के खिलाफ माना वो अब भला हिन्दू भावनाओं को आहत करने वाला कैसे हो सकता है?

अनल-हक़ का नारा जब उठेगा यानि रियाआ के लोग भी खुद को हुकूमत करने वालों के बराबर ही मानेंगे. और फिर राज खुदा की बनाई हुई चीज़ें ही करेंगी जो मैं और तुम सब हो.

फ़ैज़ की ये नज़्म तानाशाही, शासकों की मनमानी के ख़िलाफ़ है और लोकतंत्र (जम्हूरियत) की सच्ची आवाज़ है. यही वजह है कि जिया उल हक़ जैसे हुक्मरान ने इसकी ताक़त को समझ कर इस पर बैन लगा दिया था. सीधी सी बात फ़ैज़ की ये नज़्म किसी मज़हब ख़ास के लिए नहीं है और ना ही फ़िरक़ापरस्ती से इसका कोई ताल्लुक़ है.

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शनिवार, 21 दिसंबर 2019

प्रोटेस्ट का हक़ इनसानों को ही क्यों, सांडों को क्यों नहीं...खुशदीप

(सांड कह रहा है, कूद जाऊंगा, फांद जाऊंगा, मगर क्यों...)


देश में हर तरफ विरोध की बयार चल रही है. कुछ लोग जन्मजात विरोधी होते हैं. उनका काम हर बात का विरोध करना होता है. 2014 से पहले अरविंद केजरीवाल में भी विरोध की इन-बिल्ट चिप थी. लेकिन उन्होंने दिल्ली की सत्ता में आने पर पहले कार्यकाल में इसे कुछ दिन तक संभाले रखा और इसी की खातिर महज़ कुछ हफ्तों में ही इस्तीफा दे डाला. ये बात अलग है कि दूसरे कार्यकाल में सत्ता का स्वाद उन्हें भा गया और उन्होंने विरोध की चिप को शरीर से बाहर निकाल फेंका.
ख़ैर हम बात कर रहे हैं विरोध की. और विरोध जताने का हमारे देश में सबसे मशहूर तरीका टंकी पर चढ़ना रहा है. लोकतंत्र में विरोध जताने के इस तरीके को पॉपुलर करने के लिए धर्मेंद्र पाजी भारत रत्न  के हक़दार हैं. 1975 में जब देश में एमरजेंसी के जरिए अभिव्यक्ति की आज़ादी का गला घोटा जा रहा था, तब उसी साल रिलीज़ हुई फिल्म शोले  में वीरू बने धर्म पाजी ने विरोध जताने के लिए टंकी का रुख किया. अब बसंती (हेमा मालिनी) का हाथ देने के लिए मौसी तैयार नहीं हो रही थी तो धर्म पाजी विरोध जताने के लिए और क्या करते?  
ये तो रही धर्म पाजी की बात. इसे छोड़िए आपको यूपी के लखीमपुर खीरी लिए चलते हैं. इस ज़िले के पलिया कस्बे में 19 दिसंबर को सुबह लोग सुबह उठे तो उन्हें अजब नज़ारा देखने को मिला. यहां पोस्ट ऑफिस वाली नगरपालिका की बनी दो मंज़िला मार्केट की छत के बिल्कुल मुहाने पर खड़ा सांड नीचे ताकता मिला. बिल्कुल शोले टंकी स्टाइल में. अब ये तो पता नहीं कि सांड ने विरोध जताने के लिए इमारत की छत पर चढ़ने से पहले वीरू बने धर्म पाजी की तरह दारू की बोतल गटकी थी नहीं.

  

सांडाधिकारों की रक्षा कौन करेगा?
लोगों ने सांड को इमारत से उतारने के लिए बड़ी मान-मनुहार की. लेकिन सांड मानने को तैयार ही नहीं. सांड का इरादा साफ़ था जब तक उसकी मांगें पूरी नहीं हो जातीं वो हर्गिज़ नीचे नहीं उतरेगा. उसका सवाल था कि मानवाधिकारों की हर कोई फ़िक्र करता है लेकिन सांडाधिकारों पर भी कोई सुनवाई करेगा या नहीं.
आखिर बड़ी मुश्किल से सांड अपनी चार मांगे बताने को तैयार हुआ. मसलन,
1.              इन दिनों पता नहीं चलता कि सड़क पर कहां विरोध जताने वाले प्रदर्शनकारी पत्थर-पेट्रोल बम चलाना शुरू कर दें. फिर पुलिस भी लाठी-डंडे से उनकी खासी ख़बर लेती है. कहीं कहीं पानी की बौछार, आंसू गैस, गोलियां तक चल जाती हैं. ऐसे में सांडों को सड़क पर स्वच्छंदता से विचरण करने में बड़ी तकलीफ़ होती है. ऐसे में शासन-प्रशासन से मांग है कि सांडों को सेफ पैसेज देने के लिए तत्काल प्रभाव से डेडिकेटेड ट्रैक्स का निर्माण किया जाए.   

2.              सांडों को विरोध जताने के लिए ऊंची इमारतों की संकरी सीढ़ियों पर चढ़ने-उतरने में बहुत दिक्कत होती है, इसलिए या तो सीढ़ियों को चौड़ा बनवाया जाए या फिर हर इमारत में हेवी कैपेसिटी लिफ्ट लगवाई जाएं.
3.              गायों की हर कोई बात करता है. योगी सरकार ने उनके लिए जाड़ों में सर्दियों से बचाने के लिए कोट पहनाने तक का एलान कर डाला. तो सांड क्या ठंडप्रूफ होते हैं. उन्हें सर्दी नहीं लगती क्या? इसलिए योगी सरकार तत्काल प्रभाव से सांडों के लिए भी चेस्टर या लॉन्ग कोट मुहैया कराने की व्यवस्था करे.
4.              मानवाधिकार आयोग की तर्ज़ पर अलग से सांडाधिकार आयोग बनाया जाए.

 
जो भी हो लखीमपुर-खीरी में गुरुवार को सांड महाराज को इमारत से नीचे उतारने में पुलिस-प्रशासन और लोगों के पसीने छूट गए. चार घंटे की मशक्कत के बाद सांड को चारा दिखाते दिखाते नीचे उतारा गया. लेकिन सांड ने चेतावनी दी है कि अगर दो दिन में उसकी मांगें नहीं मानी गईं तो वो दिल्ली की किसी बहुमंजिली इमारत पर चढ़ने के लिए कूच कर जाएगा.

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रविवार, 10 नवंबर 2019

राम मंदिर पर फ़ैसला और करतारपुर कॉरिडोर खुलना एक ही दिन क्यों...खुशदीप



9 नवंबर 2019
राम मंदिर निर्माण के लिए रास्ता साफ़ होना...
करतारपुर कॉरिडोर का खुलना...
संयोग है कि ये दोनों बातें एक ही दिन, एक साथ हुईं...(30 साल पहले इसी तारीख को बर्लिन की दीवार भी गिरी थी)
राम मंदिर हिन्दुओं की आस्था का प्रतीक है तो करतारपुर में दरबार साहिब गुरद्वारा ‘गुरसेवकों’ के लिए 'पिता' के आखिरी वास की जगह के दर्शन करना है,..यहीं गुरु नानक देव जी ने जीवन के आख़िरी 18 साल गुज़ारे थे... गुरसेवक से यहां मायने सिर्फ़ सिख ही नहीं बल्कि हर वो इनसान है जो बाबा नानक के ‘सर्वत्र भाईचारे’ के संदेश में यकीन रखता है...
अब ज़रा सोचिए नियति ने ऐसा क्यों लिखा हुआ था कि ये दोनों घटनाएं एक ही दिन होंगी...ये संदेश बहुत बड़ा है...विचार कीजिए कि करतारपुर कॉरिडोर क्या खुल सकता था अगर एक मुसलमान लीडर तमाम विरोधाभास होने के बावजूद 10 महीने पहले इसका फैसला नहीं लेता...पीएम मोदी ने शनिवार को इसके लिए पाकिस्तान के पीएम इमरान ख़ान को शुक्रिया भी कहा...
अब बात राम मंदिर की...अयोध्या की ज़मीन के मालिकाना हक़ पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की...जिस तरह की परिस्थितियां थीं, उसमें यही फ़ैसला सबसे बेहतर हो सकता था...पांच जज साहिबान चाहें भी तो इतिहास की गलतियों को नहीं सुधार सकते थे...लेकिन वर्तमान और भविष्य में क्या सबके लिए सबसे अच्छा रहेगा, ये ज़रूर उनके ज़ेहन में रहा होगा...
सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा है कि 1934 में दंगे के बाद बाबरी मस्जिद के गुंबदों को नुकसान पहुंचाना, 22 दिसंबर 1949 की रात को मूर्तियां रखना और 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को तोड़ना अवैध कृत्य थे. बाबरी मस्जिद तोड़े जाने की घटना को सुप्रीम कोर्ट ने ‘क़ानून के राज का धार्मिक उल्लंघन’ क़रार दिया...
कोर्ट आस्था से अधिक भौतिक साक्ष्यों की रौशनी में फ़ैसला करता है...यहां एएसआई की रिपोर्ट उसके फ़ैसले का आधार बनी...इसी से जज साहिबान इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि विवादित ढांचे के नीचे मिले अवशेष इस्लामिक मूल के नहीं थे, मंदिर के थे...
ये अच्छी बात है कि मुस्लिम पक्ष की ओर से पहले ही कह दिया गया था कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जो भी फ़ैसला आएगा वो मंज़ूर होगा क्योंकि वो भारतीय संविधान को सर्वोच्च मानते हैं...वहीं दूसरी तरफ़ सरकार में बैठे ज़िम्मेदार लोगों की तरफ़ से ऐसे बयान भी आते रहे कि आस्था के सवाल पर कोर्ट फैसले नहीं ले सकता...
ख़ैर जो हुआ सो हुआ...अब सभी को सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सम्मान करना चाहिए, जैसा कि हो भी रहा है...अयोध्या में भव्य राम मंदिर बने, ये हर हिन्दू की इच्छा है...लेकिन साथ ही वहां 5 एकड़ जो मुस्लिम पक्ष को दी गई, वहां भी ऐसी मस्जिद की तामीर हो जिसे दुनिया देखने आए...
ये तो रही धर्म और आस्था की बात...अब जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया है तो ये भी सोचना हम सबका कर्तव्य है कि न्याय और मानवता के लिए अब आगे क्या क्या किया जा सकता है...
पहली बात, राम मंदिर निर्माण में मुसलमान और मस्जिद की तामीर में  हिन्दू सच्चे मन से हाथ बंटाए...मंदिर के लिए जो ट्रस्ट बने या मस्जिद की देखरेख जिसे मिले, वो अयोध्या और आसपास के विकास पर भी ध्यान दें...किसी भी धर्म के बच्चे हों उन्हें बेहतर से बेहतर शिक्षा दिलाने का प्रबंध करें...ऐसे अस्पताल भी बनवाएं जहां सभी का अच्छा इलाज़ हो सके...अयोध्या को आस्था के केंद्र के साथ गंगा-जमुनी तहज़ीब की ऐसी मिसाल बनाया जाए जिसके लिए भारत को पूरे विश्व में जाना जाता रहा है...
मैं इसके लिए बचपन में अपने मेरठ शहर में लगने वाले नौचंदी मेले की मिसाल देना चाहता हूं...वहां दुर्गा मंदिर और बाले मियां की मज़ार ठीक आमने सामने थे...दुर्गा मंदिर में भेंटे गाईं जाती थीं...तो बाले मियां के मज़ार पर सूफियाना कलाम और कव्वालियां सुनने को मिलती थीं...दोनों जगह ही जाने पर रूहानी सक़ून मिलता था...सब कुछ सद्भाव के साथ...आने वाले वर्षों में अयोध्या में भी ऐसा देखने को मिले तो क्या बात...
आख़िर में फिर आता हूं बाबा नानक पर...उनके इस संदेश पर कि इनसानी भाईचारे से बड़ा दुनिया में कुछ और नहीं...मुश्किल में कोई दिखे तो उसकी मदद से बड़ी सेवा और कोई नहीं...और इससे अधिक कुछ नहीं जिससे रब को खुश किया जा सके... यही ‘सिखी’ का एक लाइन का संदेश है...
ऐहो जेहिया खुशियां लेआवें बाबा नानका ऐहो जेहिया...
सारी दुनिया दे विच कोई ना गरीब होवे
ऐसा ना होवे जिनू रोटी ना नसीब होवे
रूकी मिसी सब नूं खवाईं बाबा नानका
ऐहो जेहिया खुशियां लेआवें बाबा नानका ऐहो जेहिया...
(इस तरह की खुशियां लाना बाबा नानक, इस तरह की खुशियां, सारी दुनिया में कोई गरीब नहीं हो, ऐसा कोई ना हो जिसे रोटी ना नसीब हो, जैसा भी हो सबका पेट भरना बाबा नानक, इस तरह की खुशियां लाना बाबा नानक...)



शनिवार, 5 अक्तूबर 2019

सनकी मंत्री, बिनाका गीतमाला और रेडियो सीलोन...खुशदीप

सरकार तुगलकी फ़ैसले ले ले तो उसका नतीजा क्या होता है. या संस्कृति के नाम पर कोई अपना एजेंडा चलाने की कोशिश करे तो उसके दीर्घकालीन परिणाम क्या आते है. ये जानने के लिए आइए करीब सात दशक पहले चलते हैं जब देश को आज़ाद हुए पांच साल ही हुए थे.

ये वो ज़माना था जब 1952 में आज़ाद भारत के पहले पहले लोकसभा चुनाव संपन्न हुए थे. इंडियन नेशनल कांग्रेस को प्रचंड बहुमत मिला. पीएम जवाहर लाल नेहरू ने सूचना और प्रसारण का अहम मंत्रालय डॉ बालकृष्ण विश्वनाथ केसकर को सौंपा. केसकर पक्के ब्राह्मण और भारतीय शास्त्रीय संगीत के समर्पित समर्थक थे.

बी वी केसकर



केसकर का मानना था कि फिल्मों के गाने लोगों में राष्ट्रीय गौरव भरने की ज़िम्मेदारी पूरी नहीं कर रहे. ये भी सोच थी कि इन गानों में उर्दू की भरमार होती है और वो कामुक (इरोटिक) होते हैं. इसके अलावा उनका ये भी कहना था कि गानों में पश्चिमी साजों और धुनों का समावेश बढ़ता जा रहा है. केसर इनकी पहचान मानव विकास के निम्न स्तरके तौर पर करते थे.

केसकर चाहते थे कि गानों में पश्चिमी इंस्ट्रूमेंट्स की जगह बांसुरी, तानपुरा और सितार का इस्तेमाल किया जाए. केसकर का मत था कि रेडियो के ज़रिए देश की संगीत विरासत को बचा कर रखा जा सकता है. केसकर 1952 से 1962 तक देश के सूचना और प्रसारण मंत्री रहे.

शुरुआत में केसकर ने आदेश दिया कि ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित होने वाले सारे गानों की स्क्रीनिंग की जाएगी. उन्होंने साथ ही टोटल प्रोग्राम टाइम का 10 फीसदी कोटा इसके लिए फिक्स किया. केसकर ने ये भी सुनिश्चित किया कि गाना बजाते समय उसकी फिल्म का नाम ना बता जाए, सिर्फ गायक का नाम दिया जाए. केसकर के मुताबिक फिल्म का नाम देने से उसका विज्ञापन होता था...

मध्य में बी वी केसकर
केसकर के इस रवैए के ख़िलाफ़ पूरी फिल्म इंडस्ट्री एकजुट हो गई. इंडस्ट्री का कहना था कि केसकर का फैसला बाज़ार से फिल्म संगीत को गायब करने की रणनीति है और फिल्म उद्योग की साख को धक्का पहुंचाने वाला है.  विरोध में जिन फिल्म निर्माताओं के पास गानों के अधिकार थे उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के साथ ब्रॉडकास्ट लाइसेंस रद्द करने का फैसला किया. जैसे कि केसकर ने अनुमान लगाया था, फिल्म संगीत तीन महीने में ही रेडियो से पूरी तरह गायब हो गया. इसकी जगह ऑल इंडिया रेडियो शास्त्रीय संगीत का प्रसारण करने लगा.

भारत के लोग हिन्दी फिल्म संगीत को कितना पसंद करते थे, इस ज़रूरत को तब रेडियो सीलोन ने समझा. रेडियो सीलोन 1951 से ही स्पॉन्सर्ड प्रोग्राम बनाने लगा था. वहां डायरेक्टर हमीद सयानी थे.

रेडियो सीलोन के कमर्शियल प्रोग्राम तब मुंबई के सेंट ज़ेवियर कॉलेज के टेक्नीकल इंस्टीट्यूट में बनते थे. उस समय अमीन सयानी उसी कॉलेज में पढ़ रहे थे. उनके बड़े भाई हमीद सयानी तब तक स्थापित ब्रॉडकास्टर बन चुके थे. तभी बिनाका टूथपेस्ट बनाने वाली कंपनी सीबा गाइगी के लिए हिन्दी फिल्मी गानों के काउंटडाउन के आधे घंटे के स्पॉन्सर्ड प्रोग्राम की योजना बनी. इसकी ज़िम्मेदारी किसी युवा को देने की सोची गई, जो प्रोग्राम को लिखे भी, गाने भी चुने, रेडियो पर प्रेजेंट भी करे और श्रोताओं के पत्र चुनकर उनके जवाब भी दे. ये ज़िम्मेदारी तब 19 साल के अमीन सयानी को सौंप दी गई.
अमीन सयानी


इस प्रोग्राम को हिन्दी सिनेमा प्रेमियों ने हाथों हाथ लिया. देखते ही देखते अमीन सयानी अपनी जादुई आवाज़, रिसर्च और प्रोग्राम पर पकड़ की वजह से घर-घर में पहचाने जाने लगे. रेडियो सीलोन पर ये सिलसिला करीब 36 साल (1952-1988) चला. शुरू में ये प्रोग्राम आधे घंटे का होता था, बाद में इसे बढ़ाकर एक घंटे का कर दिया गया.

हर बुधवार रात 8 बजे लोग शॉर्ट वेव पर रेडियो सीलोन से चिपक कर बैठते. ये जानने के लिए कौन सा गीत उस हफ्ते सरताज बना. साल के आखिरी बुधवार वार्षिक गीतमाला में साल के सरताज गीत को जानने के लिए तो लोगों का क्रेज़ देखते ही बनता था...इसके लिए श्रोता गानों की हिट परेड को नोट करने के लिए कागज-पेन साथ लेकर बैठते थे. बुधवार को इस प्रोग्राम की तब दीवानगी ठीक कुछ ऐसे ही थी जैसे रामायण और महाभारत सीरियल्स के दूरदर्शन पर प्रसारण के समय सड़कें-गलियां खाली हो जाती थीं.

प्रोग्राम मुंबई (तब बंबई) में बनता था तो रेडियो सीलोन से कैसे प्रसारित होता था?, इसका जवाब अमीन सयानी ने 2010 में एक इंटरव्यू में दिया. उनके मुताबिक उनकी टीम हर दिन टेप पर शो को रिकॉर्ड करती थी. और फिर हर हफ्ते का कोटा स्विस एयर, एयर सीलोन या एयर इंडिया की फ्लाइट से कोलंबो भेजा जाता.

जैसे जैसे रेडियो सीलोन की भारत में लोकप्रियता बढ़ती गई, सूचना और प्रसारण मंत्री केसकर का प्रभाव घटता गया. आखिर सरकार को रेडियो से हिन्दी गानों पर लगा प्रतिबंध हटाना पड़ा.

1957 में ऑल इंडिया रेडियो पर नॉन स्टॉप फिल्मी संगीत की अवधारणा पर ऑल इंडिया वैरायटी प्रोग्राम (AIVP)  शुरू करने की योजना बनी. पंडित नरेंद्र शर्मा तब ऑल इंडिया रेडियो से जुड़े थे. उन्होंने इस अलग चैनल के लिए विविध भारती नाम सुझाया जिसे तत्काल स्वीकार कर लिया गया. 1967 में विविध भारती कमर्शियल हो गया और विज्ञापन लेने लगा. सत्तर के दशक में विविध भारती भी काफी लोकप्रिय हो गया.

इस पूरे एपिसोड से ये समझा जाना चाहिए कि कैसे केसकर के एक फैसले, जिसे निजी सनक कहना ज्यादा सही रहेगा, ने ऑल इंडिया रेडियो की कीमत पर दूसरे देश के रेडियो को भारत में लोकप्रिय होने और कमर्शियल होने की वजह से पैसे कमाने का मौका दिया. केसकर को पचास के दशक के शुरू में हिन्दी फिल्मी गाने बर्दाश्त नहीं थे तो आज अगर वो होते, और आज के गानों के बोल सुनते तो क्या करते...

निष्कर्ष यही है कि सब कुछ बदल रहा हो तो दुनिया के साथ कदमताल के लिए आप अपनी पसंदीदा विचारधारा दूसरों पर नहीं थोप सकते. आप बंदिशें लगाते हैं तो वैसे ही नतीजे सामने आते हैं जैसे केसकर के फैसले पर आए और नुकसान ऑल इंडिया रेडियो को भुगतने पड़े. ये कुछ वैसा ही है कि जैसे जिन राज्यों में शराब प्रतिबंधित है, वहां पीने वालों को शराब मिल ही जाती है...

 #हिन्दी_ब्लॉगिंग

शनिवार, 3 अगस्त 2019

डॉक्टरों में हंगामा है क्यूं बरपा...खुशदीप


डॉक्टरों में हंगामा क्यूं है बरपा,
सरकार NMC बिल जो लाई है...

नेशनल मेडिकल कमीशन यानि राष्ट्रीय मेडिकल आयोग (NMC) बिल, 2019 को लेकर सरकार और देश भर के डॉक्टरों-मेडिकल छात्रों में ठनी हुई है. मेडिकल बिरादरी को बिल के कुछ प्रावधानों को लेकर सख़्त ऐतराज़ है, वही सरकार का कहना है कि बिल के प्रावधान वर्ल्ड मेडिकल स्टैंडर्ड्स के मुताबिक है. देश की राजधानी डॉक्टरों के विरोध का सेंटर बनी हुई है. यहां एम्स, सफदरजंग, आरएमएल समेत तमाम बड़े अस्पतालों के डॉक्टर बीते तीन दिन से हड़ताल पर हैं. मरीज़ों और उनके तीमारदारों का बुरा हाल है. सरकार ने सफदरजंग अस्पताल के डॉक्टरों को चेतावनी दी है कि तत्काल काम पर लौटें वरना उनके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जाएगी.
डॉक्टरों के काम ठप करने से दिल्ली के अस्पताल में परेशान बीमार बच्चे की मा


वहीं, डॉक्टरों की देश भर में नुमाइंदगी करने वाली संस्था इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने रविवार, 4 अगस्त को दिल्ली में बैठक बुलाई है, इसमें आगे की रणनीति पर विचार किया जाएगा.

बता दें कि एनएमसी बिल संसद के दोनों सदनों से पास हो चुका है. राज्यसभा में बहस के दौरान सुझाए गए दो संशोधनों को लेकर ये बिल फिर लोकसभा में पास होने के लिए जाना है. ये दोनों संशोधन नेशनल मेडिकल कमीशन में स्टेट मेडिकल काउंसिल और मेडिकल यूनवर्सिटीज के कुलपतियों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने से संबंधित हैं. 

क्या है NMC बिल, 2019?

NMC बिल, 2019 का अहम उद्देश्य इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट 1956 को निरस्त करना और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) की जगह राष्ट्रीय मेडिकल आयोग (नेशनल मेडिकल कमीशन) को लाना है. बता दें कि MCI को 2010 में ही भंग किया जा चुका है. तब MCI के तत्कालीन अध्यक्ष केतन देसाई पर भ्रष्टाचार के आरोप सीबीआई ने लगाए थे.

बिल के मुताबिक राष्ट्रीय मेडिकल कमीशन (NMC) की जिम्मेदारियों में नए मेडिकल कॉलेजों को मंजूरी देना और मेडिकल कॉलेजों का आकलन होगा. इसके अलावा एमबीबीएस में दाखिले की परीक्षा और फाइनल इयर में एग्जिट परीक्षाओं को संचालित करना, साथ ही मेडिकल कोर्सेज की फीस को रेग्युलेट भी NMC की जिम्मेदारियों में रहेगा.

मोदी सरकार का दावा है कि बिल के जरिए ऐसा मेडिकल शिक्षा सिस्टम बनाया जाएगा जिसमें गुणवत्ता पर ध्यान देने के साथ अफोर्डेबल मेडिकल शिक्षा तक पहुंच को बेहतर बनाया जाएगा. साथ ही इसके ज़रिए देश के सभी हिस्सों में पर्याप्त मात्रा में और उच्च गुणवत्ता वाले मेडिकल प्रोफेशनल्स की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकेगी.  सरकार की ओर से इस बिल को सबसे बड़े मेडिकल शिक्षा सुधार के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है.                

पुराने NMC बिल, 2018 में क्या था? 

NMC बिल, 2018 में  ब्रिज कोर्स का प्रावधान था जिसका डॉक्टर्स और हेल्थ प्रैक्टिशनर्स ने विरोध किया था. इस ब्रिज कोर्स के जरिए होम्योपैथी, आयुर्वेद  वाले आयुष प्रैक्टिशनर्स को एक साल का ब्रिज कोर्स करने पर ऐलोपैथी की प्रैक्टिस करने की अनुमति मिल सकती थी. डॉक्टर समुदाय के विरोध और तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा से कई बैठकों के दौर के बाद संसदीय पैनल को भेजा गया. पैनल ने इस प्रावधान को अनिवार्य ना बनाने की सिफारिश की. पैनल ने उन लोगों के लिए सख्त सजा की भी सिफारिश की जो बिना ज़रूरी योग्यता के मेडिसिन की प्रैक्टिस करते हैं.      

देशभर का डॉक्टर समुदाय नए NMC बिल के विरोध में क्यों?

देश भर में डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों ने पहले ही साफ कर दिया था कि ये बिल अगर मौजूदा ही स्वरूप में संसद में पास भी हो गया तो भी इसका देश भर में पुरज़ोर विरोध किया जाएगा. दरअसल, बिल के कई ऐसे प्रावधान है जिन पर मेडिकल बिरादरी को सख्त ऐतराज़ है. मसलन-

1. कम्युनिटी हेल्थ प्रोवाइडर्स को एलोपैथी प्रैक्टिस का लाइसेंस

यही वो प्रावधान है जिसको लेकर डॉक्टर्स सबसे ज़्यादा नाराज़ हैं.
देश भर के डॉक्टरों की नुमाइंदगी करने वाली इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) का कहना है कि बिल के सेक्शन 32 को किसी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा. इसके जरिए सरकार मेडिकल बैकग्राउंड से बाहर के साढे तीन लाख लोगों को मॉडर्न मेडिसिन (एलोपैथी) की प्रैक्टिस का लाइसेंस देना चाहती है. IMA के  महासचिव आर वी अशोकन ने कहा, “नई धारा 32 जोड़ी गई है जिसमें कि CHP जैसे कि  कम्पाउंडर्स, पैथोलॉजिस्ट, लैब टैक्निशियंस, रेडियोलॉजिस्ट्स, खून के नमूने लेने वाले आदि मेडिसिन की प्रैक्टिस का लाइसेंस हासिल कर सकते हैं, वो भी बिना किसी योग्यता प्राप्त डाक्टर की निगरानी के. 

आईएमए के पूर्व अध्यक्ष रविंद्र वानखेडकर कहते हैं, ये ऐसा है जैसे कि भारत में कानूनी रजिस्टर्ड नीम हकीम खड़े करना. अगर सरकार का विचार मरीजों की संख्या और अस्पताल-क्लिनिक में डाक्टर्स की संख्या के अंतर को पाटने की है, जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्टॉफ की कमी की वजह से है तो मैं कहना चाहूंगा कि क्या ग्रामीण भारत में अच्छे डाक्टर्स नहीं होने चाहिए?  क्या ग्रामीण भारत में रहने वाले लोग दोयम दर्जे के हैं?  क्या उनकी जान को जोखिम में डाला जाना चाहिए ऐसे  लोगों के जरिए जो सही से मर्ज को भी नहीं पहचान सकें.

धारा 31 की उपधारा (1) के तहत रजिस्टर्ड कुल लाइसेंसधारी मेडिकल प्रैक्टिशनर्स की संख्या के एक तिहाई से अधिक नहीं होने चाहिए. एक्ट की धारा 31 सभी मान्यताप्राप्त मेडिकल प्रैक्टिशनर्स का राष्ट्रीय रजिस्टर बनाने से संबंधित हैं जिसका रखरखाव एथिक्स एंड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड की ओर से किया जाएगा.

आंकड़ों के मुताबिक भारत में 11 लाख रजिस्टर्ड एलोपैथ्स हैं. इसका मतलब बिल में एक तिहाई के प्रावधान के मुताबिक करीब 3.5 लाख कम्युनिटी हेल्थ प्रोवाइडर्स  को प्राथमिक स्तर पर मरीजों को स्वास्थ्य सुरक्षा देने के लिए लाइसेंस जारी किए जाएंगे.

IMA ने आधिकारिक बयान जारी कर इस प्रावधान पर कड़ी आपत्ति जताई है. बयान मे कहा गया कि बिल में CHP की अस्पष्ट परिभाषा दी गई है. इसके मुताबिक किसी भी शख्स को जो माडर्न मेडिसिन से जुड़ा है, एनएमसी में रजिस्टर्ड किया जा सकता है और म़ॉडर्न मेडिसिन की प्रैक्टिस के लिए लाइसेंस दिया जा सकता है.

2. नेशनल एग्ज़िट टेस्ट (NEXT)

देश भर के मेडिकल छात्रों को बिल में इस टेस्ट के प्रावधान को लेकर विरोध है. बिल के सेक्शन 15 (1) के मुताबिक नेशनल एग्जिट टेस्ट (NEXT) एमबीबीएस के फाइऩल इयर में कराया जाएगा. ये मेडिसिन प्रैक्टिस शुरू करने, पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल कोर्सेज में दाखिला लेने और राज्य स्तरीय रजिस्टर या राष्ट्रीय स्तर रजिस्टर में खुद को एनरोल करने के लिए जरूरी होगा. विदेश से एमबीबीएस की पढ़ाई करके आने वालों के लिए भी ये स्क्रीनिंग टेस्ट के तौर पर काम करेगा.

मेडिकल छात्र बिरादरी ने NEXT को मौजूदा स्वरूप में पूरी तरह ठुकराते हुए कहा है कि पोस्ट ग्रेजुएट सीट हासिल करने के लिए मेरिट ही आधार होना चाहिए और मौजूदा NEET-PG की व्यवस्था को ही जारी रखना चाहिए. एम्स जैसे अग्रणी मेडिकल कॉलेज के साथ सभी रेजिडेंट्स डॉक्टर्स एसोसिएशन ने साझा बयान जारी कर एनएमसी बिल के मौजूदा स्वरूप का विरोध किया है. उनका कहना है कि ये बिल दिन रात काम करने वाले मेडिकल प्रोफेशनल्स का मखौल उड़ाने जैसा है.   

3. प्राइवेट कॉलेजों की फीस का रेग्युलेशन  

ये मेडिकल बिरादरी के विरोध की तीसरी बड़ी वजह है. बिल में कहा गया एनएमसी प्राइवेट मेडिकल कालेजों और डीम्ड यूनिवर्सिटीज में 50% सीटों पर फीस और अन्य शुल्कों का नियमन (रेग्युलेशन) करेगा. यानि प्राइवेट मेडिकल कालेजों और डीम्ड यूनिवर्सिटीज (जो इस एक्ट के प्रावधानों से निर्देशित होंगे) में 50 फीसदी सीटों पर फीस और अन्य शुल्कों के निर्धारण के लिए गाइडलाइन तय करेगा. बिल के आलोचकों का कहना है कि ये साफ नहीं है कि बाकी 50 फीसदी सीटों का क्या होगा. क्या बिना निगरानी के इन सीटो पर निजी मेडिकल कॉलेज मनमानी फीस नहीं वसूल करेंगे.  

मेडिकल बिरादरी का कहना है कि बिना सरकारी सहायता प्राप्त मेडिकल इंस्टीट्यूट्स में फीस पर कैपिंग होनी चाहिए. इसलिए अभी जो फीस रेग्युलेटिंग अथारिटी की ओर से रेग्युलेशन का सिस्टम है वही रहना चाहिए. इसके लिए बिल के सेक्शन 10(1) (i) को संशोधित करना चाहिए.

4. कमीशन में प्रतिनिधित्व का मामला

25 सदस्यीय राष्ट्रीय मेडिकल कमीशन के चेयरपर्सन और अन्य पार्ट टाइम सदस्यों के लिए सर्च कमेटी केंद्र सरकार को नाम सुझाएगी. एनएमसी के तहत चार स्वायत्त बोर्ड बनाए जाएंगे. ये बोर्ड अंडरग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन, असेसमेंट, रेटिंग और ऐथिकल कंडक्ट पर फोकस करेंगे. 

मेडिकल बिरादरी का ऐतराज है कि बिल के मुताबिक एनएमसी के लिए प्रस्तावित  25 सदस्यों में से सिर्फ 5 निर्वाचित होंगे. बाकी या तो सरकार के अधिकारी होंगे या वो जो सरकार की ओर से नामित किए जाएंगे. मेडिकल बिरादरी के मुताबिक आयोग में लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने गए सदस्यों की नुमाइंदगी अधिक होनी चाहिए ना कि सरकार की ओर से नामित किए गए लोगों की.

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