बुधवार, 2 मई 2018

AMU में 'जिन्ना'...माहौल चार्ज करने का पूरा मसाला...खुशदीप

AMU में 'जिन्ना'...
यानी माहौल को चार्ज करने का पूरा मसाला...
बस वही सब सुना जाएगा जिसे सुनने के मकसद से अलीगढ़ के बीजेपी सांसद सतीश गौतम ने AMU के VC को चिट्ठी लिखी कि यूनिवर्सिटी में जिन्ना की तस्वीर क्यों लगी है?...
अब कोई तथ्य बताने की कोशिश करेगा तो उसे देशद्रोही’,  ‘जिन्ना समर्थक’, ‘पाक परस्तक़रार देने मे पलक झपकने मे देर नहीं लगाई जाएगी...क्योंकि ये सवाल उठाया ही इसलिए गया लगता है...
लेकिन तथ्य तथ्य ही रहेंगे और इतिहास इतिहास ही रहेगा...
हां, राजनीतिक मंशा ज़रूर इन तथ्यों को सुनने से इनकार करेगी...
AMU के छात्र संघ के हॉल में लगी जिन्ना की तस्वीर को हटाने या ना हटाने का फैसला सरकार-प्रशासन का होना चाहिए, वही ये फैसला ले और AMU मैनेजमेंट को इस बारे में सूचित कर दे. शासन-प्रशासन ये भी सुनिश्चित करे कि इस मुद्दे पर किसी को राजनीतिक रोटियां सेकने का मौका ना मिले...
अब कुछ ये सवाल...
जिन्ना की तस्वीर AMU छात्र संघ के हॉल में 1938 से लगी है, इसे हटाने की मांग अचानक अब क्यों?
AMU छात्रसंघ स्वतंत्र संस्था है, जिस वक्त ये तस्वीर सेंट्रल हॉल मेंलगी थी, उस वक्त भारत अविभाजित था...उस दौर की कई नामचीन हस्तियों को उस दौर के समाज और देश में योगदान देने के लिए छात्र संघ की ओर से अपनी आजीवन सदस्यता से नवाजा गया...इनमें सर सैयद अहमद खान (AMU के संस्थापक), महात्मा गांधी, मोहम्मद अली जिन्ना, जवाहर लाल नेहरू, रबीन्द्र नाथ टैगोर, डॉ बी आर अंबेडकर, सीवी रमन आदि शामिल थे...ये जिस समय हुआ उस समय की परिस्थितियों को देखते हुआ था...उस वक्त ना देश का बंटवारा हुआ था और ना ही पाकिस्तान अस्तित्व में आया था...
बीजेपी सांसद ने जिन्ना को बंटवारे का सूत्रधार बताते हुए तस्वीर का अभी तक लगे रहने का औचित्य पूछा है...यही तर्क है तो इस मांग को तो 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान के अस्तित्व में आते ही उठा दिया जाना चाहिए था...देश की आज़ादी के 71वें साल में ये मांग क्यों?
इन 71 साल में करीब 13 साल केंद्र की सत्ता में वो पार्टी भीरही है जो अब भी देश की बागडोर संभाले हुए है...उसने पहले क्यों नहीं जिन्ना की इस तस्वीर को हटाने के लिए कदम उठाया...
अब ये बात दूसरी है कि जिन्ना की तस्वीर हटाने की मांग को बीजेपी नेता और यूपी की योगी सरकार में मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने ही बेतुका बता दिया है...मौर्य के क्या शब्द हैं उन्हे भी जान लीजिए...जिन महापुरुषों का देश के निर्माण में हाथ रहा है उन पर कोई उंगली उठाता है तो यह बेहद घटिया बात है. देश के बंटवारे से पहले जिन्ना का योगदान भी इस देश में था. इस प्रकार के बकवास बयान, चाहे उनके दल के सांसद-विधायक दें या दूसरे दलों के, उनकी लोकतंत्र में मान्यता नहीं है.
ये कहा जा सकता है कि स्वामी प्रसाद मौर्य बहुजन समाज पार्टी छोड़ बीजेपी में आए हैं इसलिए पार्टी की मूल विचारधारा से अलग बयान दे रहे हैं...ऐसे में जिन्होंने भी जिन्ना की तस्वीर को हटाने की मांग की है वो पहले मौर्य को ही मंत्री पद से हटाने और बीजेपी से बाहर करने की मांग करें...आखिर वो कैसे जिन्ना के लिए बात करते समय महापुरुष जैसा शब्द इस्तेमाल कर सकते हैं...
चलिए मौर्य को छोड़िए, लाल कृष्ण आडवाणी तो बीजेपी के लौहपुरुष रहे हैं...पार्टी को 2 सीटों से सैकड़े की संख्या पार कराने में उनका महत्ती योगदान रहा है...वो क्यों नेता, विपक्ष होते हुए 2005 में पाकिस्तान में जिन्ना की मजार पर जाकर उन्हें धर्मनिरपेक्ष होने का सर्टिफिकेट दे आए थे...देश के पूर्व वित्त, रक्षा, विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने 2009 में विमोचित अपनी किताब 'जिन्ना: इंडिया, पार्टीशन, इंडिपेंडेंस' में नेहरु-पटेल की आलोचना की थी और जिन्ना की प्रशंसा...जसवंत सिंह तो बीते 4 साल से बीमार हैं और जवाब देने की स्थिति में नहीं है लेकिन जिन्ना की तस्वीर हटाने की मांग करने वाले बीजेपी सांसद सतीश गौतम को आडवाणी से जरूर सवाल करना चाहिए कि वो क्यों जिन्ना की मजार पर गए थे....
जिन्ना की तस्वीर हटाने की मांग के साथ ही मुंबई के मालाबार हिल्स में स्थित अरबों रुपए के जिन्ना हाउस (साउथ कोर्ट) को भी ज़मींदोज़ करने की मांग करनी चाहिए, जिसका कब्ज़ा इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिसर्च (ICCR)  के पास है. ढाई एकड़ में बने इस बंगले पर मुंबई के जमीन माफिया की नजर रही है. लेकिन आखिरकार यहां दक्षिण एशियाई संस्कृति का संग्रहालय बनाने का फैसला लिया गया...लेकिन अभी इस दिशा में ICCR कोकदम उठाना है...
मुझे यहां 1999 का एक प्रकरण भी याद आ रहा है...अभिनेता दिलीप कुमार को 1998 में पाकिस्तान सरकार ने अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाजसे नवाजा था...1999 में करगिल युद्ध हुआ, जो पाकिस्तान के तत्कालीन जनरल परवेजमुशर्रफ की हिमाकत का नतीजा था और जिसमें भारत की जांबाज़ सेना के शौर्य के आगे पाकिस्तानी सैनिकों को ऊंचे रणनीतिक स्थानों पर होने के बावजूद मुंह की खानी पड़ी थी...उस वक्त शिवसेना ने दिलीप कुमार पर बहुत दबाव बनाया था कि वो निशान-ए-इम्तियाज पाकिस्तान को वापस करें...उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे...दिलीप कुमार ने तब कहा था कि वे प्रधानमंत्री वाजपेयी पर ही छोड़ते हैं वो जो भी फैसला लेंगे वो उन्हें मंजूर होगा...
तब वाजपेयी ने कहा था कि अभिनेता दिलीप कुमार के देशभक्त होने और उनकी राष्ट्र को लेकर प्रतिबद्धता पर किसी तरह का संदेह नहीं किया जा सकता...वाजपेयी ने साथ ही कहा था कि ये अवार्ड आपका है और आप जैसा ठीक समझें वैसा करें...दिलीप कुमार ने वाजपेयी के इन शब्दों के बाद निशान-ए-इम्तियाज को वापस नहीं करने का फैसला किया था.
कभी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय तो कभी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को सवालों के घेरे में लाया जा रहा है...दोनों विश्वविद्यालयों में अगर कुछ ग़लत तत्व रहे हैं या हैं तो उन्हें वहां से हटाने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए...इन विश्वविद्यालयोंके छात्रों को भी ऐसे तत्वों से दूरी बनाते हुए उनका बहिष्कार करना चाहिए...लेकिन चंद गलत तत्व कुछ गलत कर रहे हैं तो उसकी सजा पूरे के पूरे संस्थान को क्यों, यहां पढ़ने वाले सारे छात्रों को क्यों?...JNU हो या AMU, संस्थान की छवि खराब करने की कोशिश कोई भी करता है तो उसका नुकसान यहां के सभी छात्रों को उठाना पड़ता है...ये नहीं भूलना चाहिए कि उच्च कोटि की शिक्षा प्रदान करने में इन दोनों संस्थानों का जो योगदान है वो कभी नहीं मिटाया जा सकेगा...
#हिन्दी_ब्लागिंग

मंगलवार, 10 अप्रैल 2018

हिन्दी, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और चमत्कार...खुशदीप




क्या ऐसा हो सकता है कि दुनिया की किसी भी भाषा की किताब या अखबार आपके सामने हो और आप उसे हिन्दी में फर्राटे के साथ पढ़ सकें?

क्या ऐसा हो सकता है कि आप दिल्ली में बैठकर फोन पर पेरिस में बैठे किसी ऐसे व्यक्ति से हिन्दी में बात करें जिसे हिन्दी बिल्कुल नहीं आती हो. आपको भी फ्रेंच का एक अक्षर नहीं आता हो. फिर भी दोनों एक दूसरे की पूरी बात को अच्छी तरह सुन सकें, समझ सकें?

क्या ऐसा हो सकता है टीचर क्लास में अंग्रेज़ी में बोले और बच्चे को साथ ही साथ सब कुछ अपनी भाषा में समझ आता चला जाए?

क्या ऐसा हो सकता है आप खास चश्मा पहन कर न्यूयॉर्क या लंदन घूमने जाएं और वहां आपको सब साइनबोर्ड, प्रिंटेड सामग्री सब कुछ हिन्दी में ही दिखाई दे?

क्या ऐसा हो सकता है कि आप अपने लैपटॉप या कंप्यूटर के पास आए और वो आपकी उम्र, लिंग के साथ-साथ आपका मूड कैसा है, ये सब भी बता दे.

क्या ऐसा हो सकता है कि खास चश्मे से किसी व्यक्ति को देखें और आपको उसका नाम, उम्र, पिता का नाम, पता सब कुछ साइड में पढ़ने को मिल जाएं.

आपको ये सारे सवाल कल्पना की उड़ान लग रहे होंगे?  लेकिन ये अब सब मुमकिन होने जा रहा है. माइक्रोसॉफ्ट में निदेशक, स्थानीयकरण (Director, Localisation)  बालेन्दु शर्मा दाधीच से हिन्दी और इसके इंटरनेट  से मेल (adaptation)  पर अक्सर अपनी जिज्ञासाओं का निवारण करता रहता हूं. बालेन्दु भाई राजभाषा तकनीक के विकास के साथ साथ हिन्दी को इंटरनेट पर प्रसारित-प्रचारित करने के लिए चुपचाप जो योगदान दे रहे हैं वो बहुत ही महत्वपूर्ण है. सभी हिन्दीभाषियों और भारत की अन्य भाषाएं बोलने वालों के जीवन पर इसका सकारात्मक असर पड़ेगा.

मान लीजिए कि कोई हिन्दी अंचल का छात्र बहुत मेधावी है लेकिन अंग्रेज़ी अच्छी ना जान पाने की वजह से उसका यूपीएससी या अन्य बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में चयन नहीं हो पाता. लेकिन अब तकनीक ऐसे छात्रों के जीवन में क्रांतिकारी भूमिका निभाने जा रही है. यानि ज्ञान की परीक्षा के लिए किसी दूसरी भाषा को जानने की बाध्यता निकट भविष्य में समाप्त होने जा रही है.

मैं भारत में अक्सर ये सवाल भी सुनता रहता हूं कि क्या हिन्दी भी संस्कृत की तरह विलुप्त होने की दिशा में बढ़ रही है?  आख़िर क्यों होती है किसी भाषा या ज़ुबान को लेकर ऐसी फ़िक्र? हिन्दीभाषी भारत समेत दुनिया में कहीं भी हैं उन्हें अपनी इस भाषा से बहुत प्रेम है. विदेश में रहने वाले हिन्दीभाषियों को ये चिंता है कि उनकी अगली पीढ़ी अंग्रेज़ी में इतनी रच बस गई है कि भविष्य में हिन्दी का नामलेवा भी कोई नहीं रहेगा.

ये तो रही विदेश की बात. आप अपने ही देश में देखिए कि ग़रीब से ग़रीब माता-पिता भी यही चाहते हैं कि उनकी संतान अंग्रेज़ी मीडियम स्कूल में पढ़े. इसके पीछे कहीं ना कहीं यही सोच है कि बच्चों के सुनहरे करियर के लिए उन्हें अच्छी अंग्रेज़ी आना बहुत ज़रूरी है. अगर वो सिर्फ़ हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाएं ही जानेंगे तो वे ऊंचे पदों तक नहीं पहुंच सकते.

अंग्रेज़ी को लेकर इतना क्रेज़ इसलिए भी ज़्यादा है क्योंकि इसे विश्व भर में संपर्क की भाषा माना जाता है. ये फ़िक्र भी रहती है कि संतान को बड़े होकर विदेश जाने का मौका मिलता है तो अच्छी अग्रेंजी जाने बिना वो कैसे दुनिया के दूसरे लोगों से संवाद (बातचीत) कर पाएगी? 

ऐसे ही सब सवालों के बीच मैं आपसे कहूं कि निकट भविष्य में ऐसी फ़िक्र करने की आपको कोई ज़रूरत नहीं रहेगी तो आपको अजीब लगेगा. जी हां, अब ना तो किसी भाषा के मृत होने का ख़तरा रहेगा और ना ही आपके लिए अंग्रेज़ी जैसी दूसरी भाषा को जानना मजबूरी रहेगा?  हां, आप शौक के लिए इसे सीखना चाहते हैं तो बात दूसरी है लेकिन ये आपके लिए अब अनिवार्यता नहीं रहेगा.

कैसे...आख़िर कैसे होगा ये सब?  इसका सीधा जवाब है तकनीक या टेक्नोलॉजी. आने वाले 50 वर्षों में तकनीक आपको ऐसी स्थिति में ले आएगी कि आपको अपनी भाषा के अलावा और किसी भाषा को सीखने की ज़रूरत नहीं रहेगी.

अपनी भाषा के हक में हम जब बात करते हैं, उसके अस्तित्व पर ख़तरा जताते हैं तो ये भूल जाते हैं कि तकनीक किस तरह चुपचाप दुनिया की तमाम भाषाओं के संरक्षण में लगी हुई है. बालेन्दु भाई के मुताबिक भारतीय भाषाओं के संरक्षण के लिए तीन चीज़ें बहुत अहम हैं और जिनका आज दुनिया में बहुत ज़ोर है और वो हैं-
1.     आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI)
2.     क्लाउड टेक्नोलॉजी
3.     बिग डेटा एनालिसिस  

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और बिग डेटा एनालिसिस के बारे में आपने सुना होगा. वहीं क्लाउड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल इंटरनेट पर रखी हुई गई सामग्री के लिए होता है.

महान विचारक आर्थर सी क्लार्क के मुताबिक अगर कोई तकनीक समुचित रूप से विकसित हो जाती है तो वो किसी जादू या चमत्कार के समान ही होती है.

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के साथ भी कुछ ऐसा ही है. इसी से संभव हो पाया है कि मशीन या कंप्यूटर में बोली हुई भाषा को समझने की क्षमता विकसित हो गई है. (जैसे कि अब मोबाइल पर आप बोलते हैं और वो खुद ही टाइप होता जाता है)

सीधी सी बात है कि कंप्यूटर आपके निर्देशों को समझने लगा है. WINDOWS में CORTANA नाम का एक सहायक आ गया है जिससे आप बात कर सकते हैं. किसी सवाल का जवाब जान सकते हैं जैसे कि आगरा में अभी कितना तापमान है और वो आपको जवाब देगा.

इसके मायने ये हैं कि कंप्यूटर से संवाद करने की दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं.

लिखी हुई पंक्तियों को बोलने की क्षमता के अलावा कंप्यूटर की देखने की क्षमता बहुत बढ़ गई है. वो अब लिखी हुई, छपी हुई, चित्रों के भीतर मौजूद शब्दों को समझने की क्षमता रखता है. माइक्रोसॉफ्ट ने ऐसी टेक्नोलॉजी बना ली है कि आपका कंप्यूटर बोलेगा तो आपकी आवाज़ में ही बोलेगा.

कंप्यूटर में आसपास की वस्तुओं और लोगों को पहचानने के साथ उनकी भावनाओं, उम्र, लिंग और हैंडराइटिंग तक को सही सही भांपने की क्षमता आ गई है. इसके लिए माइकोसॉफ्ट ने ही Video seeing AI नाम का ऐप विकसित किया है. जैसे कि एक महिला कंप्यूटर के पास आती है तो वो बता देगा कि 28 वर्षीय महिला चश्मा पहने हुए खुश दिखाई दे रही है.

जहां तक अनुवाद का सवाल है तो कंप्यूटर दुनिया की किसी भी भाषा का किसी दूसरी भाषा में अनुवाद करने लगा है. और ये वैसा मशीनी अनुवाद नहीं होता जैसा कि अभी तक आप मशीनी अनुवाद के दौरान कई हास्यास्पद स्थितियों को देखते रहे हैं...जैसे कि Around the clock को घड़ी के चारों ओर लिखा जाए.

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के माध्यम से कंप्यूटर अपने आसपास के माहौल को समझने के बाद दूसरी भाषा में अनुवाद करेगा जिससे कि त्रुटियों की गुंजाइश ना के बराबर हो जाएगी और इनसान की तरह ही अनुवाद संभव हो सकेगा.

निष्कर्ष यही है कि तकनीक हमारी भाषाओं के लिए हौवा नहीं बल्कि उन्हें हमेशा हमेशा के लिए बचाने का काम कर सकती है. साथ ही ये दुनिया की सभी भाषाओं के बीच दूरियां खत्म करने के लिए सेतु का काम भी करेगी.

कितनी तेजी से ये काम हो रहा है इसका अंदाज इसी से लगाइए कि 2006 में गूगल ट्रांसलेटर और 2007 में माइक्रोसॉफ्ट ट्रांसलेटर शुरू हुआ और हम 10 साल में हम यहां तक पहुंच गए हैं. इसी से समझिए कि किस रफ्तार से तकनीक बढ़ रही है, भाषाओं के क्षेत्र में काम कर रही है. आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के लिए चार चीज़ें अहम हैं-

1.     ज्ञान यानि Knowledge- इसमें  80 फीसदी स्तर तक सफलता मिल चुकी है.
2.      दृष्टि यानि Vision-  96 फीसदी स्तर तक सफलता
3.      बोलना यानि Speech- 93 फीसदी स्तर तक सफलता
4.      भाषा यानि Language-  65 फीसदी स्तर तक सफलता

कंप्यूटर पर अनुवाद के दौरान जो त्रुटियां अभी दिखाई देती हैं वो इसी वजह से कि हम भाषा के क्षेत्र में 65 फीसदी स्तर तक ही पहुंचे हैं. जैसे जैसे ये स्तर बढ़ता जाएगा ये त्रुटियां कम होती जाएंगी. और जो ये लोग अभी कहते हैं कि कंप्यूटर कभी अनुवाद में इनसान की बराबरी नहीं कर सकता, उन्हें भी जवाब मिल जाएगा.

कंप्यूटर साइंस के जनक ऐलन टूरिंग का कहना है कि ये जरूरी नहीं कि इनसान किसी चीज़ के बारे में पहले से जानता हो, तभी उसे बना पाए. इससे ऐसे समझिए कि कंप्यूटर मशीन अंकगणित को जाने बिना ही बड़ी से बड़ी गणना बिना किसी त्रुटि कर सकता है. वो भी तब जब कि ये सिर्फ 0, 1 दो ही सिम्बल्स को पहचानता है.
इसी तरह कंप्यूटर किसी भाषा को जाने बिना दो भाषाओं के बीच परफेक्ट अनुवाद भी कर सकता है. इसके लिए वो सहारा लेता है Statistical Translation का जो  ग्रामर, भाषा ज्ञान पर आधारित नहीं बल्कि गणित पर आधारित होता है.

इसके लिए करोड़ों वाक्य एक भाषा में और करोड़ों अनुवाद दूसरी भाषा में तैयार किए जाते है. कंप्यूटर Parallel Corpus के आधार पर सीखता है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल करते हुए अनुवाद कैसे होता है. हम अब क्लाउड की की दुनिया में हैं. जिस तरह से हम डेटा पैदा कर रहे हैं, हम अपने इंटरनेट, मेल, सर्च इंजन, अनुवाद में डेटा पैदा करते हैं वो सारा का सारा डेटा इंटरनेट पर इस्तेमाल किया जा सकता है यदि आपने उसकी अनुमति दी है.
इतने सारे डेटा का ही parallel corpus की तरह इस्तेमाल किया जाएगा तो कंप्यूटर बहुत तेजी से सीखने लगेगा. वही आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस है. एक वक्त ऐसा भी आएगा कि कंप्यूटर अच्छे से अच्छे व्याकरणाचार्य से बेहतर अनुवाद करने लगेगा. आज नहीं तो कल वो करके दिखाएगा.

अब ये सब पढ़ने के बाद आप बताइए कि तकनीक भाषा के क्षेत्र में दुनिया के लोगों के बीच दूरियां घटाएगी या बढ़ाएगी?
बालेन्दु भाई अपनी बात पर केदारनाथ सिंह की इन पंक्तियों का सहारा लेते हुए विराम लगाते हैं-

मैं लौटता हूं तुम में, ओ मेरी भाषा
जैसे चीटिंयां लौटती हैं बिलों में,
जैसे कठफोड़वा लौटता है काठ पर,
जैसे विमान लौटते हैं सारे के सारे,
एक साथ डैने पसारे हुए
हवाई अड्डे की तरफ़,
उसी तरह मैं तुममें लौटता हूं मेरी भाषा,
जब चुप रहते रहते अकड़ जाती है मेरी जीभ,
और दुखने लगती है मेरी आत्मा...

इस वीडियो में बालेन्दु भाई को खुद ही सुनिए...





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