सोमवार, 18 दिसंबर 2017

गुजरात नतीजे : दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ें बीेजेपी और कांग्रेस ...खुशदीप




गुजरात-हिमाचल प्रदेश जीतने के लिए बीजेपी के वन मैन शो (मोदी मैजिक) और टू मैन आर्मी’ (नरेंद्र मोदी-अमित शाह जुगलबंदी) को सबसे बड़ा कारण माना जा सकता है. हिमाचल में बीजेपी के मुख्यमंत्री चेहरे प्रेम कुमार धूमल के चुनाव हार जाने के बावजूद पार्टी ने शानदार प्रदर्शन कर इस पर्वतीय राज्य में कांग्रेस से सत्ता झटकी है. लेकिन हिमाचल से कई बड़े मायने गुजरात से निकले जनादेश के हैं. ये तय है कि मोदी-शाह की जोड़ी केंद्र की पूरी सरकार के साथ गृह राज्य के चुनाव में खुद को नहीं झोंकती तो बाज़ी पलट भी सकती थी. गुजरात में बीजेपी छठी बार सत्ता संभालने जा रही है, लेकिन विपक्ष के तौर पर कांग्रेस इस बार जितनी मज़बूत है उतनी पिछले दो दशक में राज्य में कभी नहीं रही.

स्वस्थ लोकतंत्र के लिए विपक्ष का मजबूत होना अहम माना जाता है. ये इसलिए जरूरी है कि कहीं सत्ता पक्ष प्रचंड बहुमत की वजह से मनमानी पर ना उतर आए. गुजरात में इस बार ऐसा ही हुआ है.गुजरात से जो जनादेश निकला है, वो क्षेत्रवार ढंग से विभाजित है. सौराष्ट्र-कच्छ में कांग्रेस का हाथ बीजेपी के ऊपर रहा है तो अन्य क्षेत्रों में बीजेपी का कमल पूरी चमक के साथ खिला है, हां उत्तरी गुजरात में बीजेपी आगे जरूर रही लेकिन कांग्रेस और उसके बीच जीत का अंतर ज्यादा बड़ा नहीं रहा.  

गुजरात ने एक और संदेश दिया है. राज्य के युवा वर्ग, ग्रामीण और गरीब तबके ने कांग्रेस को पसंद किया है. 18 से 25 आयु वर्ग के युवाओं को छोड़ बाकी सभी आयु वर्गों के मतदाताओं ने बीजेपी पर ही भरोसा करना बेहतर समझा. गुजरात के किले को मोदी-शाह की जोड़ी राहुल गांधी-हार्दिक पटेल-अल्पेश ठाकोर-जिग्नेश मेवाणी के आक्रमण से बचा पाई तो इसकी सबसे बड़ी वजह है शहरी क्षेत्र के मतदाताओं का चट्टान की तरह कमल के साथ खड़े रहना. गुजरात कारोबारी बहुल राज्य माना जाता है. नोटबंदी और जीएसटी को अपने दोनों पैरों पर कुल्हाड़ी मानने वाले कारोबारियों ने आखिरकार बीजेपी के साथ चिपके रहना ही बेहतर समझा. आखिर फेविकोल का जोड़ जो है, इतनी आसानी से कोई छूट सकता था. दरअसल वो कारोबारी जिन्होंने अस्सी-नब्बे के दशक का दौर देखा है, वो अहमदाबाद के गैंगस्टर अब्दुल लतीफ का ख़ौफ़ अभी तक नहीं भूले हैं. कारोबारियों को लगा कि कहीं वहीं असुरक्षा का दौर वापस ना आ जाए, इसलिए वो जीएसटी-नोटबंदी का दंश झेलने के बावजूद मतदान के दिन कमल पर वोट दबाने गए. इस भावुक पैंतरे ने भी बड़ा काम किया कि दिल्ली की गद्दी पर बैठे गुजराती भाई की साख का सवाल है.

कारोबारियों के साथ अन्य शहरी मतदाता, उच्च शिक्षित वर्ग भी बीजेपी के साथ जुड़ा रहा. वहीं अशिक्षित वर्ग का कांग्रेस को समर्थन मिला. बीजेपी के लिए इस बार एक और प्लस-पाइंट रहा और वो ये कि जिस तरह आदिवासियों का पारम्परिक रूप से राज्य में कांग्रेस को जैसा एकजुट समर्थन मिलता रहा है, वैसा इस बार ग्रैंड ओल्ड पार्टी को नहीं मिला. संघ की ओर से आदिवासियों के कल्याण के लिए किए जाने वाले काम का बीजेपी को लाभ मिला है. माना जा सकता है कि गुजरात के कुछ क्षेत्रों में हार्दिक पटेल फैक्टर की वजह पाटीदार समुदाय के जो वोट बीजेपी ने खोए, उसकी कुछ भरपाई दूसरे क्षेत्रों में आदिवासियों के अतिरिक्त वोट हासिल करने से हुई.  

जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो पार्टी ने पिछले चुनाव की तुलना में करीब 20 सीट अधिक हासिल की तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी की खुद की कड़ी मेहनत रहा है. इसके अलावा हार्दिक पटेल (पाटीदार), अल्पेश ठाकोर (ओबीसी) और जिग्नेश मेवाणी (दलित) का मतदान से कुछ हफ्ते पहले ही कांग्रेस के साथ तालमेल करना रहा. अल्पेश तो खुद ही कांग्रेस में शामिल हो गए. इसके साथ ही अशोक गहलोत जैसे नेता के लोगों से समन्वय बनाने के हुनर ने भी कांग्रेस के ग्राफ को पहले की तुलना में ऊंचा करने में मदद की.

गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी का बार-बार मंदिरों में जाना बहुत सुर्खियों में रहा. सॉफ्ट हिंदुत्व की लाइन पकड़ कांग्रेस की कोशिश यही थी कि बीजेपी को कहीं ध्रुवीकरण का मौका ना मिले. ऐसे में अल्पसंख्यकों से रणनीति के तहत कांग्रेस ने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान दूरी बनाए रखी. ऐसे में इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि अल्पसंख्यकों ने खुद को अनदेखा महसूस किया हो और मतदान को लेकर उन्होंने वैसा जोश नहीं दिखाया जैसा कि वे पहले दिखाते रहे हैं.

ये ठीक है कि चुनावी राजनीति में अंत में जीत ही मायने रखती है. लेकिन बीजेपी को प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष के गृह राज्य में बामुश्किल मिली जीत के बाद कई चीज़ों पर गौर करना होगा. क्यों युवा मतदाता जिन्हें बीजेपी चुम्बक की तरह खींचती थी, वो पार्टी से छिटक रहे हैं. क्यों गरीब-गुरबे पार्टी को अमीर-शहरियों-कारोबारियों की पार्टी मानते हुए उसके पास आऩे से हिचक रहे हैं.

वहीं, कांग्रेस के लिए भी दीवार पर लिखी इबारत साफ है. केंद्र में यूपीए 1 कार्यकाल में मनरेगा और किसानों के कर्ज माफी जैसी योजनाओं ने 2009 में कांग्रेस के केंद्र की सत्ता में दोबारा आने का रास्ता साफ किया था. कांग्रेस की कोर पहचान गरीब, मजदूर, किसानों, अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जाति- जनजातियों की हितैषी की रही है. कांग्रेस को इस पहचान को मज़बूती से पकड़े रखना ज़रूरी है. सॉफ्ट हिंदुत्व की लाइन वहीं तक सही है जहां तक अल्पसंख्यकों में आशंकाएं और असुरक्षा बोध पैदा ना हो.

2014 लोकसभा चुनाव में लोगों ने जो मोदी सरकार से उम्मीदों का पहाड़ लगाया था, उस पर अब गंभीरता से काम करने का वक्त आ गया है. महज जुमलों से दाल नहीं गलने वाली. अगर एक करोड़ रोजगार देने का वादा किया था तो उसे पूरा करके भी दिखाएं. सी-प्लेन और बुलेट ट्रेन चलाने से कॉरपोरेट और अमीर तबका तो खुश हो सकता है लेकिन गरीब, किसान, मजदूरों के आंसू इससे नहीं पोंछे जा सकते. सत्ता पक्ष के लिए गुजरात के साथ साथ केंद्र में भी संदेश साफ है तो दूसरी तरफ विपक्ष को भी समझना चाहिए कि उसे जनहित के मुद्दे उठाने के लिए 24X7 काम करना होगा. ये देश युवा प्रधान देश है. देश का युवा तमाशा नहीं चाहता वो सच सुनना चाहता है. गंभीरता के साथ काम होते देखना चाहता है. देश के विकास का लाभ समाज के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचे. भारत सही मायने में विकसित तभी बन सकता है जब यहां के युवा वर्ग को सम्मानजक रोजगार के साथ खुशहाल होने के अवसर मिलें और उस युवा का दिल गरीब-वंचितों के लिए दर्द महसूस करे. ये बात देश के राजनीतिक कर्णधार जितनी जल्दी समझ लेंगे उतना ही उनके लिए बेहतर होगा. अन्यथा ये युवा वर्ग खुद ही राजनीतिक विकल्प बन कर अपना रास्ता तलाश लेगा. 

बहरहाल, गुजरात से बात निकली है तो दूर तलक तक जाएगी.