शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

बोले तो 'लव जिहाद'...खुशदीप


एक बालिग़ लड़का, एक बालिग़ लड़की. दोनों अगर साथ रहना चाहें, शादी करना चाहें तो... 

बिल्कुल कर सकते हैं. मियां बीवी राजी तो क्या करेगा काजी.

देश का क़ानून तो यही कहता है कि उन्हें ऐसा करने से कोई रोक नहीं सकता. उनके घर वाले भी नहीं. क़ानून ये भी कहता है कि अगर दो बालिग मर्जी से शादी करना चाहते हैं और उनके रास्ते में कोई रुकावटें खड़ी करता है तो ऐसा करने वाला दंडात्मक कार्रवाई का हक़दार होगा. साथ ही अगर जोड़े को किसी तरह का कोई ख़तरा हो तो उसे सुरक्षा प्रदान करना भी पुलिस की ज़िम्मेदारी है.

देश में कोई ऐसा भी क़ानून नहीं जो दो बालिग़ लोगों को अलग धर्म, अलग जाति, अलग प्रांतीयता, अलग भाषा की वजह से शादी से रोकता हो. साथ रहने से रोकता हो.

ये तो रही क़ानून की बातें. क़ानून की किताबों, क़ानून की धाराओं से कहीं अहम होता है क़ानून का अमल. अब ये अमल कराने की पहली कड़ी तो हमारे देश में पुलिस ही है.

चलिए क़ानून की थ्योरी से निकल एक प्रैक्टीकल किस्से पर आते हैं. मामला ताज़ा यानि 27 सितंबर का ही है. दो अलग-अलग समुदायों के युवक और युवती मेरठ कचहरी में कोर्ट मैरिज के लिए पहुंचते हैं. अब यहां अलग-अलग समुदाय की जगह सीधे सीधे लिख देते हैं हिन्दू युवती और मुस्लिम युवक.

युवक यूपी के शामली का रहने वाला और युवती गौतमबुद्धनगर जिले की. दोनों के मेऱठ कचहरी में कोर्ट मैरिज के लिए पहुंचने की भनक बजरंग दल के कार्यकर्ताओं तक पहुंची तो वे दनादन मौके पर पहुंच गए. अब यहां ये जानना भी दिलचस्प है कि बजरंग दल तक ये जानकारी कोर्ट परिसर से किसने पहुंचाई. 

बजरंग दल पदाधिकारी और उनकी टीम ने मौके पर पहुंचते ही एलान कर दिया कि लड़की नाबालिग लगती है और उसे बहला फुसला कर शादी की जा रही है यानि 'लव जिहाद' का मामला. पुलिस को भी बुला लिया गया. हंगामा बढ़ता गया, युवक के ख़िलाफ़ कार्रवाई और युवती के घरवालों को बुलाने के लिए पुलिस पर दबाव दिया जाने लगा.

पुलिस युवक-युवती को जांच की बात कह कर साथ ले जाने लगी तो खींचातानी कर उन्हें जीप से उतारने की कोशिश की गई. इस पूरे घटनाक्रम को देखने वाले वकील भी दो खेमों में बंटे नजर आए.   

अब इस कहानी का पेंच भी सुनिए. गौतमबुद्धनगर की रहने वाली युवती फरीदाबाद में अपने चाचा के पास बीते दो साल से रह कर पढ़ाई कर रही थी. युवती के चाचा दिल्ली पुलिस में हवलदार हैं. युवती बीए सेकेंड इयर की छात्रा है. 26 सितंबर को युवती के घरवालों की ओर से फरीदाबाद में उसके लापता होने की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई गई. पुलिस ने गुमशुदगी का केस दर्ज कर लिया. 27 सितंबर को फरीदाबाद पुलिस को मेरठ पुलिस से युवती के मेरठ में होने की जानकारी मिली. फरीदाबाद पुलिस मेऱठ जाकर उसे फरीदाबाद ले आई.

क़ानून के मुताबिक पुलिस ने युवती का 28 दिसंबर को मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 CRPC  के तहत बयान दर्ज कराया. इस बयान में युवती ने कहा कि वो बालिग़ है और अपनी मर्ज़ी से युवक के साथ गई थी. साथ ही उस पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं था.

फरीदाबाद पुलिस का कहना है कि जो भी कार्रवाई होगी वो युवती के इस बयान के आधार पर ही होगी. फरीदाबाद पुलिस के मुताबिक उसे युवती की गुमशुदगी की शिकायत मिली थी. युवती को मेरठ से ले आया गया. युवती के बयान से गुमशुदगी वाला एंगल अपने आप ही खत्म हो गया. मेरठ में हुए हंगामे को फरीदाबाद पुलिस ने मेरठ पुलिस के अधिकार क्षेत्र में बता कर कुछ भी कहने से इनकार किया. 

मैं ये नहीं जानता कि इस केस मेें आगे क्या होगा. इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि युवती आगे चल कर अपना बयान ही ना पलट दे. लेकिन फिलहाल जो स्थिति है उसमें युवती के मजिस्ट्रेट के सामने 28 सितंबर को दिए बयान के मुताबिक ही पुलिस को चलना होगा और उसकी इच्छा का पालन सुनिश्चित कराना होगा. क़ानून यही कहता है.

एंगल ढूंढने को आए तो इस कहानी में भी कई एंगल ढूंढे जा सकते है. जिसे जो अपने हिसाब से सुविधाजनक लगे वो वैसा ही इसे मोड़ दे देगा. क़ानून जो कहता है, उसका मेरठ में हंगामे से उल्लंघन हुआ. उल्लंघन करने वालों पर, क़ानून हाथ में लेने वालों पर क्या कार्रवाई होगी, होगी भी या नहीं, देखना दिलचस्प होगा.

The Indian Blogger Awards 2017

मैं इन प्रसिद्ध लोगों को खुशकिस्मत मानता हूं जिन्होंने दूसरे समुदाय से जीवनसाथी चुना और शादी कर घर बसाने में भी कामयाबी पाई. 

सोचिए अगर इन्हें भी 'लव जिहाद' के कटघरे में खड़ा कर दिया जाता तो...

शाहनवाज़ हुसैन (बीजेपी नेता)- रेणु शर्मा
मुख्तार अब्बास नक़वी (बीजेपी नेता)- सीमा   
दिवंगत सिकंदर बख़्त (बीजेपी नेता)- राज शर्मा
शाहरुख ख़ान (एक्टर)-गौरी छिब्बर
इरफ़ान ख़ान (एक्टर)- सुतापा सिकदर
अनु (अनवर) मलिक (संगीतकार)- अंजू
कबीर ख़ान (फिल्म निर्देशक)-मिनी माथुर (वीजे-एंकर)
दिवंगत फ़ारूक शेख़ (एक्टर)- रूपा
अमजद अली ख़ान (सरोद वादक)-सुब्बालक्ष्मी
मुज़फ्फर अली (फिल्म निर्देशक)-सुभाषिनी सहगल (अब तलाक)
इम्तियाज़ अली (फिल्म निर्देशक)- प्रीति
ज़ाएद ख़ान (एक्टर)- मलाएका पारेख
मीरा नायर (फिल्म निर्देशक)- प्रोफेसर महमूद ममदानी
 नसीरूद्दीन शाह (एक्टर)- रत्ना पाठक
 सैफ़ अली ख़ान (एक्टर)- करीना कपूर
सलीम ख़ान (लेखक)- सुशीला (पहली पत्नी)
इस्माइल दरबार (संगीत निर्देशक)- प्रीति सिन्हा
हुसैन कुवाजेरवाला (टीवी एक्टर)- टीना
आमिर ख़ान (एक्टर)- किरण राव
दिवंगत मंसूर अली ख़ान पटौदी (क्रिकेटर)- शर्मिला टैगोर

सुहासिनी हैदर (बीजेपी नेता सुब्रामण्यम स्वामी की बेटी, टीवी एंकर)- नदीम (पूर्व नौकरशाह सलमान हैदर के बेटे)

अमीन सयानी (रेडियो एनाउंसर)- रमा
तलत अज़ीज़ (गज़ल गायक)- बीना अडवाणी 
दिवंगत फिरोज़ ख़ान (एक्टर)- सुंदरी
सबा करीम (क्रिकेटर)- रश्मि रॉय
मोहम्मद कैफ़ (क्रिकेटर)- पूजा यादव
दिवंगत मोहम्मद हिदायतुल्ला (पूर्व उपराष्ट्रपति)- पुष्पा शाह

और इन्हें 'रिवर्स लव जिहाद' के कटघरे में तो...

दिवंगत सुनील दत्त- नर्गिस 
राज बब्बर- नादिरा बब्बर
दिया मिर्ज़ा (एक्ट्रेस)- साहिल सांगा
कुणाल खेमू-सोहा अली ख़ान
रंजीत (विलेन)-नाज़नीन
पंकज उधास (गायक)- फ़रीदा
फराह ख़ान- शिरीष कुंदर
दिवंगत किशोर कुमार (गायक)-मधुबाला (असली नाम मुमताज बेगम)
मनोज वाजपेयी-शबाना रज़ा
सचिन पायलट (कांग्रेस नेता)- साराह अब्दुल्ला
अजित अगरकर (क्रिकेटर)- फातिमा घाडियाली
आदित्य पंचोली- ज़रीना वहाब
अतुल अग्निहोत्री- अलवीरा ख़ान
सुनील शेट्टी-माना कादरी
ऋतिक रोशन- सुजैन ख़ान (तलाक हो चुका है)
संजय दत्त- मान्यता (असली नाम दिलनवाज़ शेख़)

बुधवार, 27 सितंबर 2017

रोहिंग्या पर फ़र्जी ट्वीट्स की खुली पोल…खुशदीप


रोहिंग्या को लेकर वैसे तो पूरी दुनिया भर में बात हो रही है लेकिन भारत में इनके बारे में ज्यादा ही चर्चा है. रोहिंग्या म्यामांर के राखिन प्रांत में रहने वाले वो लोग हैं जिन्हें म्यांमार ने ही नागरिकता के अधिकार से वंचित रखा हुआ है. रोहिंग्या में नाममात्र के हिंदुओं को छोड़ बाकी सभी मुसलमान हैं. करीब दस लाख रोहिंग्या म्यामांर में रहते हैं तो करीब इतने ही रोहिंग्या पलायन के बाद दूसरे देशों में रह रहे हैं. सबसे अधिक 5-6 लाख रोहिंग्या शरणार्थी के तौर पर बांग्लादेश में शिविरों में रह रहे हैं. 

40,000 रोहिंग्या भारत में भी है. ये बीते 5-6 साल में भारत आए हैं. ये रोहिंग्या गुहार लगा रहे हैं कि उन्हें भारत से डिपोर्ट कर म्यांमार ना भेजा जाए क्योंकि म्यांमार में उन्हें जान का खतरा है. भारत सरकार का रोहिंग्या को लेकर कड़ा रुख है. दो रोहिंग्या लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा है कि उन्हें शरणार्थी के रूप में भारत में ही रहने दिया जाए. वहीं सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट मे हलफनामा दाखिल कर कहा है कि रोहिंग्या अवैध प्रवासी हैं और उनका देश में रहना राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में नहीं है. ये भी कहा जा रहा है कि रोहिंग्या के जेहादी आतंकियों से करीबी संबंध हैं. अभी इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना बाकी है.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख जाएद राद अल हुसैन रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर भारत सरकार के रुख से सहमत नहीं है. उनका कहना है कि वे रोहिंग्या को भारत से निकालने के लिए उठाए जा रहे कदमों की निंदा करते हैं, वो भी ऐसे वक्त में जब उन्हें अपने देश में भीषण हिंसा का सामना करना पड़ रहा है. इसी बीच म्यामांर फौज की ओर से ऐसा दावा भी सामने आया कि रखाइन में 28 हिंदुओं की सामूहिक कब्र मिली है जिनकी हत्या ARSA (अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी) के अतिवादियों ने की. म्यांमार स्टेट काउंसलर इंफॉर्मेशन ऑफिस की ओर से ये भी दावा किया गया कि 25 अगस्त को रखाइन प्रांत में रोहिंग्या ने करीब 100 हिंदुओं का अपहरण कर लिया था, जिनमें से 92 को मार दिया गया. जो 8 औरतें बचीं उनका धर्मांतरण कर मुस्लिम बना दिया गया और बांग्लादेश शरणार्थी शिविर में ले जाया गया.

म्यांमार का रखाइन प्रांत बीते काफी समय से घरेलू हिंसा की चपेट में है. जहां रोहिंग्याओं का आरोप है कि उन्हें म्यांमार की फौज के साथ बहुसंख्यक बौद्धों के अतिवादी वर्ग के जुल्मों का सामना करना पड़ता है. रोहिंग्याओं का ये भी कहना है कि म्यांमार की फौज उनके जातीय सफायेमें लगी है. वहीं म्यांमार की फौज ARSA के तार जिहादी नेटवर्क से जुड़े बता कर रोहिंग्याओं के सारे आरोपों को खारिज करती है. दावे-प्रतिदावे हर तरफ से आ रहे हैं. म्यांमार से आ रहे दावों की सच्चाई का यहां बैठ कर पता लगाना मुश्किल है.

लेकिन हां यहां भारत में सोशल मीडिया पर कुछ तत्वों की ओर से जरूर फर्जी तस्वीरों के जरिए कुछ का कुछ बता कर पेश करने की कोशिश की जा रही है. फैक्ट फाइंड करने वाली कुछ वेबसाइट्स जैसे कि आल्ट न्यूज, बूम न्यूज ने ऐसे तत्वों के झूठ का पर्दाफाश किया है.      

बीते दो-तीन दिन मे कुछ बच्चों की तस्वीरों के जरिए रोहिंग्या के संबंध में फर्जी कहानियां पेश करने की कोशिश की गईं. रविंद्र सांगवान का @Shanknaad से ट्विटर हैंडल है. इसे रेल मंत्री पीयूष गोयल भी फॉलो करते हैं. इस ट्विटर हैंडल पर एक छोटी बच्ची का फोटो अपलोड किया गया जिसके हाथ में एक नवजात है. असल में ये फोटो बीबीसी न्यूज़ वीडियो का एक स्क्रीनशॉट है. सांगवान ने फोटो के साथ ट्वीट किया-

उसकी मासूमियत को देखिए!!

रोहिंग्या लड़की, 14 साल की उम्र में दो बच्चे हैं, इसका पति 56 साल का है. उसकी 6 पत्नियां और 18 बच्चे हैं.

सांगवान ने जो लड़की के साथ कहानी लिखी है वो महज उनके दिमाग की उपज है. ये स्क्रीनशॉट बीबीसी न्यूज़वीडियो – ‘In the jungle with Rohingya refugees feeling Myanmar ‘ से लिया गया है जो यू ट्यूब पर अपलोड किया गया था. वीडियो में बीबीसी संवाददाता संजॉय मजूमदार म्यांमार से बांग्लादेश पलायन कर रहे रोहिंग्या के साथ ट्रैक कर रहे हैं. इस लड़की को वीडियो में 2 मिनट 6 सेकेंड पर देखा जा सकता है. 



हद तो ये है कि फिर ऐसे फर्जी ट्वीट्स को रीट्वीट भी धड़ल्ले से किया जाता है. 


   



सांगवान जैसा ही कारनामा पेशे से वकील प्रशांत उमराव पटेल नाम के वकील ने भी किया. इन जनाब ने अपने ट्वीटर हैंडल पर एक बच्ची का फोटो शेयर किया. साथ ही लिखा

ये 9-12 साल की प्रेग्नेंट लड़की म्यांमार के राखिन प्रांत के शरणार्थी शिविर से है. ये संयुक्त राष्ट्र क्लीनिक में है और जल्द ही शिशु को जन्म देने वाली है.



अब ये जान लीजिए कि इस तस्वीर और इस लड़की की सच्चाई क्या है.

इस लड़की से जुड़ी नवंबर 2016 की एक फेसबुक पोस्ट है. जिसमें इस लड़की की कई फोटो हैं.साथ ही पुर्तगाली में लिखा हुआ है कि सैंडी ब्रांडो (12 वर्षीय) गैराफो डो नोर्टे, पारा (ब्राजील)  की रहने वाली है और बीलेम के बरोस बारेटो अस्पताल में भर्ती है. गैराफाओ डो नोर्टे जहां सैंडी रहती है, उस जगह के फेसबुक पेज पर सैंडी की मजबूती और इच्छाशक्ति के बारे में लिखा गया है और मदद की अपील की गई है. साथ ही उसकी लिवर की बीमारी जैसी कई स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में बताया गया है. फेसबुक पर अपलोड हुए वीडियो में सैंडी अपने अस्पताल के बैड से बात कर रही दिखती है बीमारी की वजह से सैंडी के फूले हुए पेट को भी देखा जा सकता है.  सैंडी पुर्तगाली में बात करते हुए ब्राजील के एंटरटेनर रोड्रिगो फारो से मिलने की इच्छा भी जाहिर करती है. म्यामांर या रोहिंग्या से उसका दूर दूर का कोई नाता नजर नहीं आता. हैरानी है कि ऐसी बच्ची के बारे में भी कोई फर्जी कहानी गढ़ने की सोच भी कैसे सकता है और उसे प्रेग्नेंट रोहिंग्या लड़की बता सकता है.



पटेल की फर्जी कहानी पकड़ी गई तो झट से ट्वीट को डिलीट कर दिया. लेकिन ऐसा करते हुए अपने किए के लिए कोई माफ़ी नहीं मांगी. पटेल की ओर से पहले भी इस तरह के कई कारनामे किए जा चुके हैं.

The Indian Blogger Awards 2017

कौन क्या है, क्या नहीं, इस पर बहस से बड़ा सवाल सच का है. सोशल मीडिया पर ऐसा कुछ भी देख कर कोई राय बनाने से पहले सच की परख करना भी जरूरी है. पहले कहा जाता था कानों सुनी बात गलत भी हो सकती है. सोशल मीडिया के इस दौर में आंखों देखीकी भी स्क्रीनिंग करना ज़रूरी है. कुछ समय पहले आने वाला एक विज्ञापन याद आ गया...'दावों पर ना जाएं, अपनी अक्ल भी लड़ाएं.'  


#हिन्दी_ब्लॉगिंग

मंगलवार, 26 सितंबर 2017

वीसी की मुस्कान हर बेटी के पिता के कलेजे पर चोट...खुशदीप



माफ़ कीजिएगा गिरीश चंद्र त्रिपाठी महोदय, आज आपको टेलीविजन पर बोलते सुना तो कुलपति पद को लेकर बचपन से दिमाग़ में जो एक छवि थी वो तार-तार हो गई. आप हर वक्त मेरी बात सुनिए, मेरी बात सुनिए ही करते रहते हैं. ऐसे में आप अपने संस्थान बीएचयू की उन बच्चियों की कहां से सुनते जो कि बस यही मांग कर रही थीं कि दो घड़ी उनके बीच आ कर दिल का दर्द सुन लें.

नहीं आप को तो उस बच्ची की शिकायत भी पहले लिखित में चाहिए थी, जिसके कपड़े में हाथ डाल कर दो शोहदों ने पूरी इंसानियत को शर्मसार किया. होना तो ये चाहिए था कि घटना का पता लगते ही आपकी नींद वैसे ही उड़ जानी चाहिए थी जैसे कि किसी जवान बेटी के साथ ऊंच-नीच होने पर उसके पिता की उड़ जाती है. आपको तो गुरुवार शाम 6.20 पर हुई घटना की जानकारी ही कई घंटे बाद मिलती है. गजब आपकी सुरक्षा और सूचना व्यवस्था है.

आपको रात को आपके मातहत अधिकारी बताते हैं कि मामला सुलझा लिया गया है और आप उन पर आंख मूंद कर भरोसा कर लेते हैं और सोने चले जाते हैं. ये भी नहीं पूछते कि मामला सुलझा कैसे? क्या दोषियों को पकड़ लिया गया? क्या पीड़ित छात्रा को ही उलटे नसीहत देने वाले गार्ड, वार्डन के ख़िलाफ़ तत्काल कोई कार्रवाई की गई?

बकौल आपके कुछ बाहरी तत्व छात्राओं को भड़काते हैं और वो सुबह साढ़े छह बजे ही धरने के लिए कॉलेज के गेट पर आ जाती हैं. लेकिन आप ये भी कहते हैं कि इस बात की जानकारी भी आपको सुबह साढ़े दस बजे मिली. अगर इतनी अहम जानकारी भी आप तक पहुंचने में चार घंटे लग जाते हैं तो उसी से अंदाज़ लगाया जा सकता है कि आपके मातहत अधिकारियों का रवैया कितना गैर ज़िम्मेदाराना है.

आप मेरी बात सुनिए, मेरी बात सुनिए करते हुए सबसे अधिक ज़ोर इसी बात पर देते हैं कि सब बाहरी तत्वों का किया कराया था. आप कहते हैं वो पेट्रोल बम चला रहे थे. आग़जनी कर रहे थे. गेट तोड़ रहे थे. इसलिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा. घटना के वीडियो पूरे देश ने देखे कि किस तरह छात्राओं पर (ना)मर्द पुलिसवालों ने डंडे बरसाए. देश भर को छात्राओं की चोटें नज़र आ गईं, नहीं आईं तो बस आपको ही नहीं आईं. आप फिर भी यही कह रहे हैं कि पुलिसवाले लड़कियों को बस गेट के अंदर कर रहे थे.

आपने इस पूरे प्रकरण को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के दौरे के साथ जोड़ कर पेश किया. आपके मुताबिक विश्वविद्यालय के बाहर के लोगों ने, राजनीतिक शक्तियों ने, असामाजिक तत्वों ने ये सब सोच समझ कर साज़िश के तहत किया जिससे कि विश्वविद्यालय के नाम पर बट्टा लगे. जान बूझ कर इसकी टाइमिंग प्रधानमंत्री के दौरे के साथ रखी गई. आप तो छेड़खानी की घटना के भी प्रायोजित होने का इशारा देकर संवेदनहीनता की सारी हदों को पार कर गए.

बीते तीन-चार दिन में ही सब कुछ घटित हुआ होता तो आपकी बाहरी और राजनीतिक साजिश़ की थ्योरी को मान भी लिया जाता. लेकिन विश्वविद्यालय की लड़कियां तो कई महीने पहले से ही असुरक्षा और भेदभाव की मांग उठाती रही हैं. क्यों लड़कियों के लिए आठ बजे के बाद नाइट कर्फ्यू लग जाता है. क्यों लड़कों को लाइब्रेरी में रात 10 बजे तक पढ़ने की इजाज़त है और लड़कियों को नहीं? क्यों लड़कियों के नॉन वेज खाने पर रोक हैक्यों उन्हें पहनावे के लिए फरमान दिए जाते हैं. यहां ये बताना ज़रूरी है कि जिस छात्रा के साथ 21 सितंबर को छेड़खानी की घटना हुई वो सलवार सूट पहने हुए थी.

आप बाहरी-बाहरी कहे जा रहे हैं तो ये भी तो बताइए कि उन्हें विश्वविद्यालय परिसर में आने-जाने के लिए मनचाही छूट है तो इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है. परिसर की सुरक्षा में छेद हैं तो उन्हें भरने की ज़िम्मेदारी भी कुलपति के नाते आपकी नहीं.

चलिए इन सब बातों को जाने दीजिए. आख़िर में बस एक बात का जवाब दीजिए. जब आपके घर में इतना सब कुछ हो जाए. किसी छात्रा के साथ दो बाइक सवार शैतान बेहूदगी की सारी हदें पार कर जाएं. कुछ कुंठित और मानसिक विकृति के शिकार लड़के अंधेरा डलते ही लड़कियों के हॉस्टल के बाहर आकर ऐसी हरकतें करें जिन्हें यहां लिखना भी मुश्किल है, ऐसे हालात के ख़िलाफ़ लड़कियां आवाज़ उठाएं तो उन पर पुलिस वाले डंडे बरसा दे. ये सब कुछ होने के बाद भी आप टीवी पर आए तो गमगीन क्यों नज़र नहीं आए. आपके माथे पर शिकन नाम की कोई चीज़ तक क्यों नज़र नहीं आई. उलटे आप मुस्कुराते नज़र आए, दिल्ली आकर चाय पीने का न्योता स्वीकार करते दिखे, जैसे बीएचयू में सब कुछ सामान्य हो, ऐसा कुछ भी ना घटा हो जिससे आपका चैन उड़ा दिखे.

आप 40 साल से शिक्षक होने का दंभ भरते हैं. लेकिन आपने एक बार भी नहीं सोचा कि इतना कुछ होने के बाद भी आपको नेशनल टेलीविजन पर मुस्कुराते हुए देख बीएचयू की छात्राओं के दिल पर क्या बीती होगी. वही बेटियां, जिनके माता-पिता ने उन्हें आपको उनका पितातुल्य संरक्षक मानते हुए, आपकी सुरक्षा पर भरोसा जताते हुए बीएचयू परिसर के हॉस्टल्स में रहने के लिए छोड़ा था. 

पुन: माफ़ी के साथ वीसी साहब, आपकी टीवी पर ज़हरीली मुस्कान देश में हर बेटी के पिता के कलेजे को चीर गई...



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रविवार, 24 सितंबर 2017

कहीं लंका ना लगा दे BHU का ये ‘कन्या पूजन...खुशदीप



नवरात्र चल रहे हैं. गुरुवार 28 सितंबर को अष्टमी पर कन्या पूजन होना है. लेकिन बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में शनिवार रात को पुलिस के ‘पुरुष शूरवीरोंने एक अलग तरह का ही कन्या पूजनकिया, छात्राओं पर लाठियां बरसा कर. विडंबना देखिए, एक तरफ हज़ारों किलोमीटर दूर संयुक्त राष्ट्र में सुषमा स्वराज दुर्गा की तरह गरज रही थीं, ठीक उसी वक्त बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के मुख्य गेट पर लाठी चलाओ, बेटी भगाओ' का पराक्रमदिखाया जा रहा था. ये दृश्य देखकर महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की आत्मा भी धन्य हो गई होगी जिन्होंने 101 साल पहले वसंत पंचमी के दिन बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की नींव रखी थी. 


सबसे पहले शनिवार रात को क्या हुआ, इसका ज़िक्र कर लिया जाए. यहां बीते दो दिन से सुरक्षा की मांग को लेकर छात्राएं बीएचयू के मुख्य द्वार लंका गेट पर धरना दे रही थीं. उनकी मांग थी कि बीएचयू के कुलपति गिरीश चंद्र त्रिपाठी खुद धरना स्थल पर आकर उनसे बात करें और सुरक्षा का आश्वासन दें. कुलपति की ओर से इस मांग पर ध्यान ना दिए जाने की वजह से छात्राओं का आक्रोश बढ़ता जा रहा था.

बीएचयू के कुलपति गिरीश चंद्र त्रिपाठी


वहीं, कुलपति महोदय यही ज़ोर देते रहे कि धरना राजनीति से प्रेरित है. द हिन्दूकी रिपोर्ट के मुताबिक कुलपति ने अखबार से बातचीत में कहा कि कुछ को छोड़कर सभी धरना देने वाले बाहरी लोग थे. इस धरने का आयोजन ऐसे वक्त किया गया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी दौरे पर थे. कुलपति के मुताबिक सनसनीखेज़ पुट देने के लिए इससे बेहतर उनके लिए और क्या वक्त हो सकता था.

जिस तरह की रिपोर्ट आ रही हैं, उनके मुताबिक शनिवार को धरना दे रही छात्राओं के बीच छात्र भी पहुंच गए. इनमें से कुछ की राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से इनकार नहीं किया जा सकता. कुछ छात्रों की ओर से प्रदर्शनकारी छात्राओं से धरना समाप्त करने की अपील के साथ ये आश्वासन दिया गया कि वे खुद छात्राओं की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे. लेकिन छात्राओं का साफ़ कहना था कि जब तक कुलपति उनके बीच आकर आश्वासन नहीं देंगे, वे धरने से नहीं उठेंगी. यहां इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि जिस तरह हर स्थिति का फायदा उठाने के लिए असामाजिक तत्व ताक में रहते हैं, वो यहां भी सक्रिय हो गए. उन्हीं में से किसी ने एक चारपहिया वाहन को आग़ लगा दी. कुछ मोटरसाइकिलों को फूंकने और पथराव की भी ख़बर आई. इसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज किया. एक छात्रा के सिर और टांग में चोट आई. ऐसी भी ख़बर है कि कुछ छात्राओं को इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया.

चलिए मान लेते हैं कि असामाजिक तत्वों की वजह से स्थिति बिगड़ी और पुलिस को छात्राओं पर लाठीचार्ज करना पड़ा. लेकिन ऐसी नौबत आने ही क्यों दी गई. क्या घिस जाता अगर कुलपति खुद छात्राओं के बीच आकर उनकी बात सुन लेते. कुलपति ने हठधर्मी रवैया छोड़ सूझ-बूझ से काम लिया होता तो चिंगारी को शोले बनने से पहले ही बुझाया जा सकता था.

मौजूदा स्थिति विस्फोटक क्यों बनी, इसके पीछे छेड़खानी की एक घटना है. बताया जा रहा है कि बीएफए सेकेंड इयर की एक छात्रा गुरुवार शाम 6.20 बजे अपने विभाग से हॉस्टल की ओर जा रही थी. तभी भारत कला भवन के पास पीछे से बाइक पर दो अज्ञात बदमाश आए और छात्रा से छेड़खानी करने के बाद भाग गए. जिस जगह ये सब हुआ वहां लाइटिंग की व्यवस्था सही नहीं होने की वजह से अंधेरा था. छात्रा का कहना है कि वो चिल्लाई, पास ही सुरक्षा गार्ड खड़े थे लेकिन उसकी मदद के लिए आगे नहीं आए. छात्रा ने हॉस्टल में जाकर अन्य छात्राओं को सब बताया. इसके बाद हॉस्टल की छात्राओं ने सुरक्षा गार्डों से आकर पूछा तो उन्होंने महिला विरोधी टिप्पणी की. साथ ही पीड़ित छात्रा को ही नसीहत दी कि अंधेरे में चलते वक्त उसने सावधानी क्यों नहीं बरती.

छात्राओं ने इस प्रकरण की चीफ प्रॉक्टर और वॉर्डन से शिकायत की. कुल मिलाकर सभी का रवैया दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की जगह पीड़ित छात्रा को ही कटघरे में खड़ा करने वाला रहा. मसलन देर से क्यों हॉस्टल से निकलती हो. कपड़े कैसे पहनती हो. यहां बता दे कि घटना के वक्त छात्रा ने सलवार सूट पहन रखा था. पहनावे पर सवाल उठाना वाकई विचित्र है. सुरक्षा व्यवस्था को मज़बूत करने की जगह पीड़ित से सवाल करना अपने आप में ही कैसी मानसिकता का प्रतीक है, समझा जा सकता है.

चीफ प्रॉक्टर और वॉर्डन से निराशा मिलने के बाद छात्राओं ने भी तय कर लिया कि कुलपति उनके बीच आकर उनकी बात सुने और दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करें. कुलपति ने छात्राओं की इस मांग पर कान धरना गवारा नहीं समझा. कहने को कुलपति ने शिक्षकों का एक प्रतिनिधिमंडल छात्राओं के बीच भेजा. कुलपति धरना स्थल पर नहीं पहुंचे लेकिन त्रिवेणी हॉस्टल जाकर छात्राओं से बात करनी चाही. इस पर वहां मौजूद छात्राओं ने कहा कि जो भी बात होगी मुख्य धरना स्थल पर सबसे सामने होगी. छात्राओं के ये कहने पर कुलपति भड़क गए. इस पर छात्राओं ने भी हंगामा कर दिया. आखिरकार कुलपति को वहां से जाना पड़ा.

अब यहां ये भी गौर कर लिया जाए कि आखिर प्रदर्शनकारी छात्राएं कुलपति से मांग ही क्या रही थीं- छात्राओं के लिए 24 घंटे सुरक्षा, कोताही बरतने वाले सुरक्षाकर्मियों को जवाबदेह बनाना, महिला सुरक्षाकर्मियों की तैनाती, हॉस्टल आने-जाने के मार्ग पर माकूल लाइटिंग व्यवस्था और यूनिवर्सिटी परिसर में सीसीटीवी कैमरे. 

बताइए इनमें से ऐसी कौन सी मांगें हैं जो 800 करोड़ रुपए के बजट वाली यूनिवर्सिटी पूरी नहीं कर सकती. कुलपति महोदय इसी बात पर अड़े रहे कि पीड़ित छात्रा लिखित में आकर पहले उन्हें शिकायत करे, उसी के बाद वो दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करेंगे. मान लीजिए कि कुलपति या किसी शिक्षक की बेटी के साथ ऐसी घटना हो जाती तो भी क्या उनका रवैया ऐसा ही रहता. कुलपति विश्वविद्यालय के सभी छात्र-छात्राओं के लिए पितातुल्य होता है, कुलपति से सभी विशेष तौर पर हॉस्टल में रहने वाली छात्राओं के लिए संरक्षक की भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती है.

The Indian Blogger Awards 2017

गिरीश चंद्र त्रिपाठी की कुलपति पद पर नियुक्ति 14 नवंबर 2014 को हुई. उसके बाद से ही उनके नाम के साथ कई विवाद जुड़ चुके हैं. जैसे कि परिसर में स्थित 40 साल पुरानी कलात्मक प्रतिमा को अश्लील बता कर पहले कपड़े पहनवा देना और फिर विरोध पर उन्हें हटवाना, 24 घंटे लाइब्रेरी खोलने की मांग करने वाले छात्रों पर लाठीचार्ज, नक्सल समर्थक बता कर प्रोफेसर संदीप पांडेय की बर्खास्तगी (जिसे बाद में हाईकोर्ट ने अपने आदेश से रद्द कर दिया) आदि.

छात्राओं की ओर से बीएचयू प्रशासन पर लैंगिक भेदभाव की शिकायतें पहले से ही आती रही हैं. सुप्रीम कोर्ट में इसी साल एक याचिका दाखिल की जो अभी तक लंबित है. याचिका में कहा गया है कि वो रात 8 बजे के बाद हॉस्टल नहीं छोड़ सकतीं इसलिए वो लाइब्रेरी भी नहीं जा सकतीं. लाइब्रेरी रात 10 बजे तक खुलती है, इसलिए 8 बजे के बाद छात्र तो वहां जा सकते हैं लेकिन छात्राएं नहीं. छात्राओं को हॉस्टल के कमरों में वाई-फाई लगाने की अनुमति नहीं है. यहीं नहीं छात्राओं को हॉस्टल में नॉन वेज खाने की इजाजत नहीं है. ना ही वो रात 10 बजे के बाद मोबाइल पर किसी से बात कर सकती है. छात्राओं को पहनावे संबंधी भी कई तरह के निर्देश हैं. बता दें कि इन सभी नियमों को कुलपति का अनुमोदन प्राप्त है.

इस घटना को छोड़ भी दिया जाए तो बीएचयू में पिछले कुछ महीनों से ही माहौल खराब चल रहा है. छेड़खानी की घटनाएं बढ़ रही हैं. प्रोफेसरों तक को धमकियों का सामना करना पड़ता है. हालात कैसे चिंताजनक है ये वही की प्रीति कुसुम की इस फेसबुक पोस्ट में पढ़िए. पढ़ कर ही सिर शर्म से झुक जाता है कि कुछ शैतान किस तरह खिड़कियों के पास आकर अश्लील हरकतें करते हैं.


और तो और वाराणसी के डीएम तक का मानना है कि लंका थाने की पुलिस का अधिकतर टाइम बीएचयू के टंटे निपटाने में ही निकल जाता है. जब भी विवाद होते हैं, बहुत कम ही होता है कि कुलपति मौके पर पहुंच कर स्थिति को बेकाबू होने से बचाते हैं.

बीएचयू की स्थिति पर यहां के प्रशासन की ओर से तर्क दिए जाते हैं कि विश्वविद्यालय की छवि को खराब करने की साज़िश चल रही है. राजनीति को इसकी वजह बताया जाता है. सुरक्षा जैसी जायज़ मांग करने वाली लड़कियों पर ही आरोप लगा दिए जाते हैं कि वो गलत लोगों के इशारों पर काम कर रही है. ये कुछ कुछ वैसा ही है जैसे कि जेएनयू प्रकरण के दौरान हुआ था. जेएनयू के छात्र-छात्राओं की छवि गलत पेंट करने के लिए एक नेता महोदय तो वहां इस्तेमाल कंडोम का भी आकंड़ा गिनाने लगे थे, जैसे कि खुद उन्होंने उनकी गिनती की हो. ज़रूरत इस वक्त विश्वविद्यालयों में ऐसा माहौल बनाए रखने की है जिससे कि छात्र वहां पढ़ाई और शोध को शांति से अंजाम दे सकें. देश में जिन गिने-चुने विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता को लेकर साख है, उन्हें इस तरह के प्रकरणों से बट्टा नहीं लगने देना चाहिए. युवा शक्ति कैसे देश की राजनीति की दशा और दिशा बदल सकती है ये हमने सत्तर के दशक में जेपी आंदोलन के दौरान भी देखा और हाल ही में निर्भया से हुई दरिंदगी से उपजे जनाक्रोश के दौरान भी.



बीएचयू में 23 सितंबर की रात का वीडियो-






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बेटा तुम से ना होगा, गांधीगीरी से होगा- पार्ट 3...खुशदीप



स्वच्छता और खुले में शौच की समस्या पर पिछली दो पोस्ट पर विस्तार से लिख चुका हूं. आज उसी विषय की ये तीसरी और अंतिम कड़ी है. कुछ लिखूं, इससे पहले पिछली पोस्ट पर आई एक टिप्पणी का ज़िक्र करना चाहूंगा. भाई चौहान अजय ने ये टिप्पणी भेजी-
मेरे गाँव मे समस्या ये है की पीने का पानी तक मुहैया नहीं कर पा रही है सरकार। विदर्भ मे इस वर्ष भी सूखा पडा है। यहां जीने का संघर्ष है और सरकार की सोच सडांध मारते शौचालय जैसी हो गई है

समस्या वाकई विकराल है. गांव में पानी जैसी बुनियादी चीज़ ही उपलब्ध नहीं है, ऐसे में भारत जैसे विशाल ग्रामीण आबादी वाले देश को दो साल में ODF (खुले में शौच से मुक्त) बनाने का लक्ष्य रखना कितना व्यावहारिक है, कह नहीं सकता. 50-60 करोड़ लोगों को खुले में शौच से रोकने के लिए मनाना भागीरथ कार्य से कम नहीं है. जैसे कि मैंने पिछली पोस्ट में उदाहरण दिए कि कुछ जगह अधिकारी अति उत्साह में इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अमानवीय कृत्य करने से भी गुरेज नहीं कर रहे.
ये कहने-सुनने में बड़ा अच्छा लगता है कि शहर-गांव में घर-घर में शौचालय होना चाहिए. बिल्कुल होना चाहिए. शहरों में मलीन बस्तियों को छोड़ दिया जाए तो करीब-करीब हर घर में शौचालय उपलब्ध है. शहरों में समस्या घरों में नहीं बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर साफ़-सुथरे शौचालयों की कमी की है. अगर कहीं हैं भी तो वो या तो इतने गंदे हैं कि कोई उनमें जाने की हिम्मत नहीं कर सकता. या फिर कुछ गैर सरकारी संगठनों के हवाले हैं, जो देश-विदेश से बड़े अनुदान मिलने के बावजूद इन्हें दुकानों की तरह चला रहे हैं. किसी गरीब आदमी को एक बार हल्के होने के लिए पांच रुपए कीमत देना ज़रूर अखरता होगा. यही वजह है कि जब ट्रेन से सफ़र किया जाए तो सुबह-सुबह शहरों के बाह्य क्षेत्रों में पटरियों, नालों के किनारे ऐसे दृश्य देखने को मिल जाते हैं कि खिड़कियों को बंद रखना ही बेहतर रहता है.
गांवों पर जाने से पहले शहरों की ही बात कर ली जाए. क्या यहां स्थानीय प्रशासन पर्याप्त संख्या में साफ़-सुथरे पब्लिक टॉयलेट्स उपलब्ध करा पा रहे हैं. स्लम्स की बात छोड़िए, अच्छी रिहाइशी बस्तियों या बाज़ारों में भी इनकी भारी कमी है. नोएडा के सेक्टर 16-ए में स्थित फिल्म सिटी की ही बात कीजिए. यहां तमाम बड़े न्यूज चैनल्स और मीडिया संस्थानों के दफ्तर हैं. लेकिन पूरी फिल्म सिटी में एक भी पब्लिक टॉयलेट नहीं हैं. यहां सिर्फ दफ्तरों में काम करने वाले ही नहीं बड़ी संख्या में दूसरे लोग भी आते हैं. अब ऐसे में अचानक नेचर कॉल आना किसी मुसीबत से कम नहीं.
चलिए मायानगरी मुंबई की बात की जाए. यहां बैंड स्टैंड पर शाहरुख़ ख़ान और सलमान ख़ान जैसे सुपरस्टार्स के आशियाने हैं. समुद्र का किनारा होने की वजह से यहां बड़ी संख्या में लोग रोज़ पहुंचते हैं. पास ही मछुआरों की बस्ती भी है. पिछले दिनों यहां सलमान ख़ान जिस गैलेक्सी अपार्टमेंट बिल्डिंग में रहते हैं, उसी से कुछ दूरी पर बीएमसी ने पोर्टेबल टॉयलेट्स की व्यवस्था की. अब सलमान ख़ान के घर के सामने सी-व्यू के साथ टॉयलेट का दृश्य कैसे बर्दाश्त किया जाता. सलमान ख़ान के पिता सलीम ख़ान ने इस पर कड़ा ऐतराज़ जताते हुए बीएमसी को खड़का डाला. आखिरकार मेयर को बीएमसी को वहां टॉयलेट हटाने का निर्देश देना पड़ा.
ख़ैर ये तो रही शहरों की बात, अब आते हैं गांवों पर, जहां अब भी करोड़ों लोग खुले में शौच के लिए खेतों में जाते हैं. स्वच्छ भारत अभियान के तहत मध्य प्रदेश में भी खुले में शौच से रोकने के लिए सरकार की ओर से बड़ी कोशिशें की जा रही हैं. सीहोर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का गृह जिला है. यहीं के एक गांव में 8 से 13 साल के कुछ बच्चे सुबह ही उठ जाते हैं. ये खुद को डिब्बा डोल गैंग के सदस्य बताते हैं. इनका काम जहां भी नितकर्म करता कोई दिखाई दे या जाता दिखाई दे तो उसके डिब्बे से पानी गिराने का होता है.

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यहां ये नहीं भूलना चाहिए कि सरकार की ओर से की जाने वाली सख्ती से जो नतीजे आएंगे, वो दीर्घकालिक नहीं होंगे. इसके लिए सूझ-बूझ और गांव समुदायों को साथ लेकर चलने की आवश्यकता है. वैसी ही सूझ-बूझ जैसे कि देश में पोलियो उन्मूलन अभियान के दौरान अपनाई गई. स्वच्छ भारत मिशन की री-ब्रैंडिंग और री-लॉन्चिंग में अगर कुछ सबसे कारगर हो सकता हैं तो वो है- सामुदायिक नेतृत्व में पूर्ण सेनिटेशन (Community Led Total Sanitation-CLTS).  

सामुदायिक और सहकार की भावना कितना क्रांतिकारी बदलाव कर सकती है, ये हमने वर्गीज़ कुरियन जैसे प्रणेता के नेतृत्व में आणंद में अमूल दुग्ध क्रांति के दौरान देखा. दूध की मार्केटिंग तो सरकारी स्तर पर कई और राज्यों में भी होती है, लेकिन वो अमूल की तरह एक राष्ट्रीय मिशन का रूप क्यों नहीं ले पाई. फर्क कुरियन की ईमानदारी के साथ भ्रष्टाचार रहित उस सामूहिक भावना का है, जहां हर घरेलू दुग्ध उत्पादक ने अमूल मिशन को सफल बनाना अपनी खुद की ज़िम्मेदारी समझा. ऐसा ही कुछ देश में स्वच्छता अभियान के साथ भी होना चाहिए.

यहां ये भी समझना चाहिए कि गांवों में खुले में शौच जाने वाले लोगों को ये आदत सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी विरासत में मिली है. ये आधारभूत से ज्यादा व्यावहारिक और सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश वाली समस्या है. इसके लिए करोड़ों लोगों को तैयार करने के लिए जोर जबरदस्ती नहीं बल्कि अभिनव तरीकों का प्रयोग किया जाना चाहिए.

इसे ऐसे भी समझना चाहिए जब देश में कंप्यूटर आया था तो सब इसे अजूबा समझते थे. दरअसल, भौतिक विज्ञान के जड़त्व के नियम के मुताबिक जो चीज़ जैसी है, वो वैसी ही रहना चाहती है. इसलिए लोगों का बरसों से चला आ रहा व्यवहार बदलना भी टेढ़ी खीर से कम नहीं. कंप्यूटर आने से पहले सरकारी दफ्तरों में टाइप राइटर से ही काम होता था. कर्मचारियों को टाइप राइटर से काम करने की आदत पड़ी हुई थी. उन्हें जब पहली बार कंप्यूटर पर काम करने के लिए कहा गया तो उन्होंने कहा कि नहीं उनके लिए तो टाइप राइटर ही ठीक है. तब देश में कंप्यूटर क्रांति के प्रणेता सैम पित्रोदा ने एक सुझाव कर्मचारियों के सामने रखा. उन्होंने कर्मचारियों से कहा कि आप एक महीना बस कंप्यूटर पर काम करके देखो. अगर आप इसे फिर भी सुविधाजनक ना समझो तो इन्हें वापस लेकर आपको दोबारा टाइपराइटर लौटा दिए जाएंगे. एक महीने तक कर्मचारियों ने कंप्यूटर पर मजबूरन काम करना स्वीकार कर लिया. एक महीने बाद उनसे पूछा गया कि क्या कंप्यूटर की जगह फिर टाइप राइटर पर लौटना पसंद करेंगे, तो सभी ने मना कर दिया. क्योंकि तब तक उन्हें कंप्यूटर की सुविधा और आराम समझ आने लगा था. अब उसी का नतीजा देखिए, देश भर में किसी दफ्तर की कल्पना क्या बिना कंप्यूटर के की जा सकती है.

कुछ कुछ ऐसे ही तरीके भारत को स्वच्छ करने या खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए भी अपनाए जाने चाहिएं. Community Led Total Sanitation- CLTS  भी ऐसा ही कदम है. इसके तहत किसी समुदाय (ग्राम सभा, पंचायत, गांव के लोग) को एकत्र किया जाता है. फिर किसी फील्ड को-ऑर्डिनेटर के जरिए उन्हें खुले में शौच से जुड़े स्वास्थ्य संबंधी तमाम पहलुओं के बारे में समझाया जाता है. उन्हें आसान भाषा में समझाया जा सकता है कि खुले में शौच नहीं जाने से कितनी बीमारियों से खुद को और बच्चों को बचाया जा सकता है. साथ ही अस्पताल, दवाइयों पर होने वाला खर्च बचाकर कितना आर्थिक लाभ भी हो सकता है.



लेकिन यहां लगातार समुदाय के साथ संवाद की जरूरत है. उन्हें सेलेब्रिटीज का सहयोग लेकर इस दिशा में एजुकेशन फिल्में प्रोजेक्टर पर दिखाई जा सकती है. कैसे ये मुद्दा महिलाओं के सम्मान से भी जुड़ा है. कैसे हर साल स्वच्छता की कमी से डायरिया जैसी बीमारियों से लाखों शिशुओं को मौत के मुंह में जाने से रोका जा सकता है?  

कोशिश रहे कि ऐसा संदेश हर जगह हवा में तैरने लगे कि घर में शौचालय होना सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल है. और जब इसके लिए सरकार भी सब्सिडी दे रही है तो फिर इसे बनाने में हर्ज भी क्या है.

CLTS  में लगातार संवाद से पूरा समुदाय सामूहिक रूप से फैसला करता है कि खुले में शौच करने को रोकना उसकी अपनी ज़िम्मेदारी है. फिर समुदाय खुद ही देखता है कि गांव के हर सदस्य को अच्छी तरह समझ आ जाए कि शौचालय का इस्तेमाल कितना लाभकारी है. जहां तक सरकार का सवाल है वो अपने स्तर पर समुदाय को इस काम में अपनी तरफ से पूरा प्रोत्साहन दे. साथ ही ये भी देखे कि उस गांव में पानी जैसे बुनियादी चीज़ की कमी है तो उसे दूर करने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास किए जाएं. सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट को कैसे गांव के ही आर्थिक लाभ में तब्दील किया जाए, इस पर भी काम किया जाए. जो समुदाय इस दिशा में त्वरित और अच्छा काम करके दिखाए, उसे जिला, राज्य, देश स्तर पर सम्मानित भी किया जाए. जिससे दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरणा मिले.

CLTS के तहत जो भी बदलाव होगा वो टिकाऊ और दीर्घकालिक होगा. इसमें समुदाय खुद ही निगरानी समितियां बना सकता है. जो लोग बहुत समझाने पर भी नहीं मानते उन्हें फूल देना या माला पहनाने जैसे गांधीगीरी के रास्तों को भी अपनाया जा सकता है. खुले में शौच जाने वालों के नामों को नोटिस बोर्ड पर लिखना या लाउड स्पीकर पर उनके नामों का एलान करना. ये सभी अहिंसावादी तरीके हैं लेकिन इनमें नेमिंग एंड शेमिंग का भी पुट है. ये खुद समुदाय की ओर से ही किया जाता है और अंतिम निर्णय व्यक्ति पर ही छोड़ दिया जाता है.

मोदी सरकार ने 2 अक्टूबर, 2019 (महात्मा गांधी की 150वीं जयंती) तक देश को खुले में शौच से पूरी तरह मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा हुआ है. कुछ राज्य ये डेडलाइन पाने के साथ ही ऐसे बाध्यकारी तरीके अपना रहे हैं जो CLTS की भावना के विपरीत हैं. जैसे कि हरियाणा सरकार ने हाल में घोषणा की है कि लोगों पर निगरानी रखने के लिए ड्रोन्स का इस्तेमाल किया जाएगा. मध्य प्रदेश में क़ानून के तहत घर में शौचालय नहीं होने पर पंचायत चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं होगी. पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में एक सरपंच ने आदेश दिया कि जो लोग घर में शौचालय नहीं बनाएंगे वो सरकारी राशन की दुकानों से सामान लेने के हक़दार नहीं रहेंगे.

बिग ब्रदर जैसा बर्ताव जो कि अधिकतर सरकारी नीतियों और निर्देशों में झलकता है, दूसरे शब्दों में कहें तो सरकारी ज़ोर ज़बरदस्ती का उल्टा असर भी हो सकता है. सुरक्षित स्वच्छता के लाभ की ओर मुड़ने की जगह लोग इसके बैरी भी बन सकते है. ये स्थिति वाकई चिंताजनक होगी. ऐसे बैकलेश से बचना चाहिए क्योंकि हम जानते हैं कि स्वच्छ भारत अभियान अपने सबसे निर्णायक फेस में है. सत्तर के दशक में जबरन नसबंदी का लोगों में क्या प्रतिकूल असर हुआ था, किसी से छुपा नहीं है. समझदारी इसी में है कि समुदायों को आगे बढ़कर खुद ज़िम्मेदारी लेने दी जाए. ऐसा बदलाव पोलियो अभियान जैसे ही शत प्रतिशत अच्छे परिणाम लाएगा, भले ही इसमें वक्त कुछ ज़्यादा लगे.

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