गुरुवार, 31 अगस्त 2017

खुश रहना इतना आसान है, करके तो देखिए...खुशदीप


सफलता = खुशी

अधिकतर लोग ऐसा ही समझते हैं...लेकिन वो ग़लत हैं...खुशी का विज्ञान हमें बताता है कि सही इसका उलट है...यानि

खुशी सफलता

सफलता आपके हाथ में नहीं होती...पूरे प्रयास करने के बाद ये आपको मिल सकती है और नहीं भी मिल सकती...लेकिन खुशी आपके हाथ में होती है...बस आस-पास थोड़ा ढ़ूंढने की कोशिश करनी होती है...छोटी छोटी बातों में आप खुशियां ढूंढने (या चुराने) का अभ्यस्त होना तो सीखिए...फिर देखिए आपका जीने का अंदाज़ ही कैसे बदल जाएगा...


ये करना कितना आसान है जानिए हैप्पीनेस के प्रोफेसर डॉ ताल बेन शहर से...बेन शहर अमेरिका की प्रतिष्ठित हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी में कार्यरत हैं...उनका पॉजिटिव साइकोलॉजी का कोर्स छात्रों में कितना लोकप्रिय है, ये इसी से अंदाज़ लगा लीजिए कि हर सेमेस्टर में 1400 छात्र इसके लिए एनरोल करते हैं...हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी के 20 फ़ीसदी ग्रेजुएट्स इसे इलेक्टिव कोर्स के तौर पर चुनते हैं...


47 वर्षीय इस हैप्पीनेस गुरु के मुताबिक खुशी, आत्म सम्मान और प्रेरणा पर केंद्रित क्लास छात्रों को जीवन अधिक आनंद के साथ जीने के लिए सक्षम करती है...

बेन अपनी क्लास में छात्रों को 14 विशेष टिप्स पर फोकस करने के लिए कहते हैं...इससे ना सिर्फ उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार आता है बल्कि वो आसपास के लोगों में भी सकारात्मकता का संचार करते हैं...

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आपको वो 14 टिप बताने से पहले खुशी सिखाने वाले इस प्रोफेसर के बारे में कुछ और बातें भी बता दूं...

-इस्राइली मूल के अमेरिकी नागरिक बेन कई बेस्टसेलर्स पुस्तकों के लेखक हैं...उनकी दो पुस्तकों  Happier (2007)  और Being Happy (2010)  दुनिया की 25 से ज़्यादा भाषाओं में अनुवादित हो चुकी हैं...

-उन्होंने हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी से ही मनोविज्ञान और दर्शनशास्त्र में ग्रेजुएशन करने के बाद ऑर्गेनाइजेशनल बिहेवियर में पीएचडी कर रखी है...

-बेन को दुनिया भर में मोटिवेशनल लेक्चर के लिए आमंत्रित किया जाता है...वो लीडरशिप, शिक्षा, मूल्यों, खुशी, आत्म सम्मान, लक्ष्य निर्धारण, लचीलेपन, ऊर्जावान मस्तिष्क आदि विषयों पर समान अधिकार के साथ बोलते हैं...

-यू ट्यूब पर उनके मोटिवेशनल वीडियो भी दुनिया भर में देखे जाते हैं...

-2011 में बेन ने एंगस रिगवे के साथ पोटेंशियालाइफकी स्थापना की....इसका मकसद दुनिया को खुशहाली के विज्ञान से समृद्ध करना है...

 चलिए अब लौटता हूं हैप्पीनेस गुरु की 14 टिप्स पर-

टिप नंबर 1 
ईश्वर का आभार

आपके पास जो कुछ भी है उसके लिए ईश्वर का आभार व्यक्त कीजिए...अपने जीवन की 10 उन चीज़ों को कागज़ पर लिखिए जो आपको खुशी देती हैं...सिर्फ अच्छी चीज़ों पर केंद्रित करें...

टिप नंबर 2  
30 मिनट का शारीरिक श्रम

शारीरिक श्रम या व्यायाम का अभ्यास कीजिए...विशेषज्ञों का कहना है कि व्यायाम से मूड बेहतर होता है...30 मिनट का व्यायाम दु:ख और दबाव की सबसे अच्छी काट है...

टिप नंबर 3  
नाश्ता

कुछ लोग समय की कमी या वजन बढ़ने की आशंका के चलते नाश्ता नहीं करते...अध्ययन से ये प्रमाणित हुआ है कि नाश्ता आपको ऊर्जा देता है जो आपके सोचने की शक्ति को बेहतर करता है और आपको सफलतापूर्वक अपनी गतिविधियों को संपन्न करने में सहायक होता है...

टिप नंबर 4 
मुखर होना

आप जो चाहते हैं उसके लिए कहिए...आप जो सोचते हैं उसे कहिए...मुखर होना आपके आत्म-सम्मान को बेहतर करेगा...अलग थलग और ख़ामोश रहने से दुख और नाउम्मीदी बढ़ती है...

टिप नंबर 5 
अनुभवों पर निवेश

अनुभवों पर धन खर्च करो...एक अध्ययन बताता है कि 75 फ़ीसदी लोग जब यात्रा, कोर्स या ट्रेनिंग पर अपने पैसे का निवेश करते हैं तो उन्हें खुशी महसूस होती है...बाक़ी सिर्फ 25 फ़ीसदी का मानना था कि जब वे चीज़ें खरीदते हैं तो उन्हें प्रसन्नता मिलती है.


टिप नंबर 6 
चुनौतियों का सामना करना सीखिए

अध्ययन बताते हैं कि जब आप किसी चीज़ को जितना आगे के लिए लटकाए रखते हैं उतना ही वो आपकी बेचैनी और तनाव को बढ़ाता है...हर हफ्ते कुछ कामों का लक्ष्य तय कर एक छोटी लिस्ट पर लिखिए और उन्हें यथाशक्ति पूरा करने की कोशिश कीजिए...

टिप नंबर 7  
खुशनुमा यादों को सहेजना

अपने आसपास जीवन के सभी यादगार पलों को तस्वीरों, संदेशों के माध्यम से सहेज कर रखिए...इन्हें कंप्यूटर, डेस्क, कमरे, फ्रिज आदि सभी जगह किया जा सकता है...खूबसूरत यादों से भरी ज़िंदगी...

टिप नंबर 8  
मुस्कान ही काफ़ी

दूसरों का अभिवादन कीजिए...यथा संभव सभी से अच्छा बना रहने की कोशिश कीजिए...सिर्फ़ एक प्यारी सी मुस्कान से किसी का मूड बदला जा सकता है

टिप नंबर 9  
जूतों से मूड का नाता

आरामदायक जूते पहनिए...अगर आपका पैर आपको तकलीफ़ देता है तो आप मूडी हो जाते हैं...ये कहना है अमेरिकी ऑर्थोपेडिक्स एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ केंथ वापनर का...

टिप नंबर 10
उठने-बैठने. चलने-फिरने का अंदाज़

सीधा चलिए और अपने कंधों को थोड़ा पीछे की तरफ रखिए...ये आत्मविश्वास की पहचान है...शरीर को ढीला छोड़ कर रखने से आपको गंभीरता से लिए जाने की संभावना कम होती है...

टिप नंबर 11
संगीत से आनंद 

ये साबित हुआ है कि संगीत सुनने से आप गाने के लिए प्रेरित होते हैं...ये आपको आनंदित करता है...

टिप नंबर 12
खान-पान का असर

अपने भोजन का नागा मत कीजिए...हर 3-4 घंटे बाद कुछ हल्का खाइए...अपने ग्लूकोज़ लेवल को स्थिर रखिए...ज़्यादा मैदा और चीनी से बचिए...जो भी चीज़ स्वास्थ्यवर्धक हैं उन्हें बदल बदल कर खाइए...

टिप नंबर 13
अपनी फ़िक़्र कीजिए और स्मार्ट दिखिए

70 फ़ीसदी लोगों का मानना है कि वे जब समझते हैं कि आकर्षक दिख रहे हैं तो आनंदित अनुभव करते हैं....


टिप नंबर 14
उत्साह के साथ आस्था

भगवान में अगर आपका विश्वास है तो उसके बिना कुछ भी संभव नहीं है...अगर आप नास्तिक हैं तो अनास्था में भी एक तरह का आपका विश्वास ही होता है...


अंत में सौ बातों की एक बात...

खुशी एक रिमोट कंट्रोल की तरह है...जिसे हम अक्सर गुमा देते हैं...कई बार इसे ढूंढते ढूंढते हम दीवानगी की हद तक पहुंच जाते हैं...बिना जाने कि हम उसी के ऊपर बैठे हुए हैं...

It is very simple to be happy but it is very difficult to be simple...

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

(नोट- स्कूल के दोस्त दीपक कपूर के एक संदेश से ये लेख लिखने को प्रेरित हुआ...आभार दीपक...)

सोमवार, 28 अगस्त 2017

गुरमीत राम रहीम : तेरे जीवन का है कर्मों से नाता...खुशदीप


डेरा सच्चा सौदा के मुखिया को राम रहीम के नाम से बुलाना अब कितना जायज़ है...क्या सिर्फ गुरमीत कहना सही नहीं होगा...रोहतक की जेल में सोमवार को अस्थायी तौर पर लगाई गई सीबीआई की विशेष अदालत ने गुरमीत को दो साध्वियों से रेप के लिए 20 साल की सज़ा सुनाई तो उसकी हालत देखने लायक थी...जो खुद को मैसेंजर ऑफ गॉड’ बताता था...सर्वशक्तिमान दिखाने के लिए खुद ही फिल्में बनाकर सुपरमैन जैसे करतब दिखाता था...महल जैसे डेरे में तमाम आधुनिक सुविधाएं जुटा कर इतराते नहीं समाता था...अर्श पर उड़ने वाला ये शख्स भूल गया था कि जिस दिन फर्श पर गिरेगा तो क्या होगा...


18 साल पहले गुरमीत ने पिता की माफ़ी के नाम से दो लड़कियों के साथ जो किया, उसका नतीजा अब सामने आ गया...गुरमीत को 20 साल अब जेल में गुजारने होंगे...साथ ही 30 लाख रुपया जुर्माना भी देना होगा...इसमें 14-14 लाख रुपए दोनों पीड़ितों को मिलेंगे और 2 लाख रुपए कोर्ट में जमा होंगे...

गुरमीत के वकील ने विशेष अदालत के जज जगदीप सिंह से उसके डेरे के सामाजिक कार्यों का हवाला देते हुए नर्मी बरतने की अपील की...वकील ने गिनाया कि डेरे ने ना जाने कितने लोगों का नशा छुड़ाया, स्वच्छता का अभियान चलाया...जज ने इस पर कहा कि जो अपराध किया, उसकी सज़ा भी तो भुगतनी होगी...गुरमीत ने तबीयत खराब होने की बात भी कही, ये दांव भी कोई काम नहीं आया...डॉक्टरों ने तत्काल उसका मुआयना कर उसे फिट बताया.

जज ने जब सज़ा सुनाई तो गुरमीत ने गिड़गिड़ाना शुरू कर दिया...ज़मीन पर बैठ कर बिलखता रहा- मुझे माफ़ कर दो...खुद में अलौकिक शक्तियों का दावा करने वाले गुरमीत के सामने आज 18 साल पहले का वो दृश्य आ गया होगा, जिसमें गुफ़ा में एक मासूम लड़की उसके सामने रोती-बिलखती रही, वहां से जाने देने के लिए गुहार लगाती रही...लेकिन गुरमीत ने तब कोई रहम नहीं किया था...उसकी आंखों पर हवस की पट्टी जो बंधी थी...

रोहतक में सज़ा सुनाए जाने के बाद गुरमीत लाख पैर पटकता रहा...कहता रहा कि वो वहां से हिलेगा नहीं..लेकिन सुरक्षाकर्मियों ने इस कैदी नंबर 1997 को लगभग घसीटते हुए जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया...सिर्फ दो दिन जेल में रहने से ही गुरमीत को समझ आ गया होगा कि सज़ा सुनाए जाने के बाद उस पर क्या बीतने वाली है...तमाम सुख सुविधाओं को भोगने का आदि रहा गुरमीत एक साधारण कैदी के तौर पर काम करते हुए पसीना बहाएगा तो ज़रूर उसे याद आएगा कि समय कितना बलवान होता है...

गुरमीत के इस हाल पर मुझे करीब 39 साल पहले रिलीज हुई फिल्म कर्मयोगी का गाना याद आ रहा है...मन्ना डे के गाए गाने को दिग्गज अभिनेता राज कुमार पर फिल्माया गया था...वर्मा मलिक के लिखे इस गीत को कल्याणजी आनंदजी ने संगीतबद्ध किया था...  



तेरे जीवन का है कर्मों से नाता,
तू ही अपना भाग्य विधाता,
जैसी लिखेगा कर्मों की रेखा,
देना होगा तिल तिल का लेखा,
तेरे जीवन का है कर्मों से नाता ...

आज तू जिसको अच्छा समझे,
जान ले उसका कल क्या है,
सोच ले चलने से पहले,
तू उन राहों की मंज़िल क्या है,
जो भी किया है आगे आता,
तू इतना भी सोच न पाता,
जैसी लिखेगा कर्मों की रेखा,
देना होगा तिल तिल का लेखा,
तेरे जीवन का है कर्मों से नाता...

माना के काले कर्मों से,
तुझको खुशियां और सुख मिलता है,
आसमान को छूने वाले,
ये कितने दिन चलता है,
काहे रेत के महल बनाता,
झूठे बल से तू क्यूं इतराता,
जैसी लिखेगा कर्मों की रेखा,
देना होगा तिल तिल का लेखा,
तेरे जीवन का है कर्मों से नाता...

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

रविवार, 27 अगस्त 2017

कोर्ट फैसले के बाद ही ‘राम रहीमों’ पर क्यों जागता है नेशनल मीडिया...खुशदीप


गुरमीत राम रहीम सिंह और उनके डेरे को लेकर अब मेनस्ट्रीम मीडिया में तरह तरह के किस्से आ रहे हैं...गुफा, ब्लू फिल्म, यौन शोषण, रिवॉल्वर, मारे जा चुके आतंकी गुरजंट सिंह से करीबी, किस तरह डेरा सच्चा सौदा की गद्दी पाई आदि आदि...लेकिन यहां सवाल बनता है कि ये सब पंचकूला में सीबीआई की विशेष अदालत की ओर से राम रहीम को यौन शोषण मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद क्यों शुरू हुआ...ये वारदात 1999 में हुई और 2002 में पीड़ित साध्वी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को गुमनाम चिट्ठी लिखकर अपनी व्यथा को दुनिया के सामने जाहिर किया...मेनस्ट्रीम मीडिया आखिर अब ही क्यों राम रहीम को लेकर जागा...15 साल तक वो क्यों कुंभकर्णी नींद सोया रहा...


15 साल पहले सिरसा से स्थानीय सांध्य दैनिक पूरा सच निकालने वाले पत्रकार रामचंद्र छत्रपति ने साध्वी की चिट्ठी को ज्योंकी त्यों छापने की हिम्मत ना दिखाई होती तो राम रहीम का सलाखों के पीछे होना कभी हक़ीक़त नहीं बन पाता...उस वक्त छत्रपति ने राम रहीम के गढ़ सिरसा में ही पत्रकारिता का धर्म निभाते हुए साहस दिखाया... चिट्ठी के पूरा सच में छपने के कुछ ही दिन बाद छत्रपति पर 24 अक्टूबर 2002 को कातिलाना हमला हुआ...रिपोर्ट के मुताबिक, छत्रपति को घर से बुलाकर पांच गोलियां मारी गई थीं...21 नवंबर 2002 को छत्रपति की दिल्ली के अपोलो अस्पताल में मौत हो गई थी...ये केस भी कोर्ट में चल रहा है...इस पर 16 सितंबर को सुनवाई होनी है...


छत्रपति ने जैसी हिम्मत दिखाई थी, अगर नेशनल मेनस्ट्रीम मीडिया ने उस वक्त वो किया होता तो शायद हो सकता था कि राम रहीम के पापों का घड़ा बहुत पहले ही फूट गया होता...ये भी हो सकता था कि शायद छत्रपति हमारे बीच जीवित होते...सवाल सिर्फ राम रहीम का नहीं है...आसाराम के मामले में भी हम पहले ये देख चुके हैं...

ये बाबा टाइप के लोग क्यों और कैसे फलते-फूलते रहते हैंकौन इन्हें इतना आदमकद बनाने में मदद करता है कि ये संविधान और क़ानून को ही चुनौती देने की स्थिति में आ जाते हैंभीड़तंत्र को ये अपनी ऐसी ताक़त बना लेते हैं कि सारी क़ानून-व्यवस्था ही इनके सामने पंगु बन कर रह जाती है...इनके ख़िलाफ़ कार्रवाई तभी होती है जब कोर्ट संज्ञान लेता है...राम रहीम के मामले में हमने अभी देखा कि कुछ सुरक्षाकर्मी (पुलिसवाले) जो शासन की ओर से ही उपलब्ध कराए गए थे, उन्होंने संवैधानिक कर्तव्य को ही दरकिनार कर दिया...उनकी लॉयल्टी अब राम रहीम के लिए हो चुकी थी...इन पुलिसवालों को ज़रूर ये पता होगा कि वो इस हरकत के लिए डिसमिस भी किए जा सकते हैं...लेकिन उन्होंने फिर भी ये ख़तरा मोल लिया...क्योंबताया जा रहा है कि ये पुलिसवाले पिछले 6-7 साल से राम-रहीम की सिक्योरिटी में थे...ज़ाहिर है कि इतने वर्षों में ये इतने संतृप्त हो चुके होंगे कि इन्हें राम रहीम के लिए वफ़ादारी दिखाना ही बेहतर लगा...

इन पुलिसवालों को भी छोड़ो, राम रहीम को सिक्योरिटी सुरक्षा मुहैया कराने वाले तो दिल्ली में बैठे कर्णधार ही हैं...स्वच्छता अभियान में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर खुद राम रहीम के साथ झाड़ू पकड़े दिखते हैं....2014 में सिरसा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनावी भाषण देने गए थे तो उन्होंने भी डेरे और इसके प्रमुख की शान में कसीदे गढ़े थे...बीजेपी ही नहीं कांग्रेस, आम आदमी पार्टी समेत तमाम राजनीतिक दल ही वोटों की चाहत में डेरे में हाजिरी लगाते रहे हैं...डेरे के कथित प्रेमियों की इतनी तादाद है कि पंजाब और हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में चुनाव नतीजा किसी के पक्ष में भी पलट देने की ताकत रखते हैं...

चुनावी गुणाभाग और डेरे के पैसे की ताक़त इतनी बड़ी रही कि मेनस्ट्रीम मीडिया ने भी कोर्ट के फैसले से पहले कभी उनके कारनामों को किसी स्टिंग के जरिए सामने लाने की कोशिश नहीं की...सुना तो ये भी है कि डेरे का एक मीडिया रिलेशन सेल भी था जो पत्रकारों को डेरे में बुलाकर उपकृत करता रहता...ऐसे में 15 साल पहले छोटा सा अखबार चलाने वाले और पत्रकारिता धर्म निभाते जान देने वाले रामचंद्र छत्रपति के लिए सम्मान और भी बढ़ जाता है... Courage in Journalism Awards देने वालों को  इस प्रस्ताव पर गौर करना चाहिए कि इस अवार्ड को रामचंद्र छत्रपति के नाम पर कर दिया जाए..

रामचंद्र छत्रपति ने ना सिर्फ साध्वी यौन शोषण मामले में बल्कि साध्वी के भाई व सेवादार रणजीत की हत्या और डेरे की अन्य गतिविधयों को लेकर भी खुलासा किया था...पंचकूला में सीबीआई कोर्ट की ओर से राम रहीम पर फैसला सुनाए जाने के बाद छत्रपति के बेटे अंशुल और अन्य परिजनों ने राहत की सांस ली है...साथ ही उन्हें अपने लिए भी इनसाफ़ की भी उम्मीद बंधी है जिसका वो शिद्दत से इंतज़ार कर रहे हैं...अंशुल का कहना है कि 15 साल बाद अब रात को चैन से सो सकेंगे...पिता की हत्या के वक्त अंशुल महज़ 21 साल के थे...अंशुल पूरा सच अखबार के माध्यम से ही पिता की छोड़ी मुहिम को आगे बढ़ा रहे हैं...साध्वी यौन शोषण मामले में तो कोर्ट ने राम रहीम को दोषी करार दे दिया है लेकिन रामचंद्र छत्रपति की हत्या का पूरा सचनहीं अभी अर्धसत्य ही सामने आ सका है...


हैरत की बात है कि साक्षी महाराज जैसे सांसद-नेता भी देश में है जो खुले आम राम रहीम की वकालत कर रहे हैं...कह रहे हैं कि एक शिकायतकर्ता की बात तो सुन ली लेकिन डेरे के पांच करोड़ समर्थकों की नहीं सुनी जो राम रहीम को भगवान मानते हैं...फ़र्क इतना है कि साक्षी महाराज खुल कर जो कह रहे हैं वही बात कई नेताओं के मन में है...अंदरखाने उन्हें भी चिंता है कि राम रहीम के ख़िलाफ़ कुछ बोला तो उनके समर्थकों की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है...ये भी दलीलें दी जा रही हैं कि बड़ी संख्या में लोगों का राम रहीम ने नशा छुड़ाया इसलिए शराब लॉबी डेरे के ख़िलाफ़ काम कर रही है...स्वच्छता अभियान में डेरे की सक्रियता का हवाला दिया जा रहा है...जाहिर है कि राम रहीम और उनके डेरे को लेकर राजनेताओं के मन में सॉफ्ट कॉर्नर नहीं होता तो वैसी नौबत नहीं आती जैसी 25 अगस्त को कोर्ट के फैसले के बाद आई...तमाम सुरक्षा उपायों और कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद पंचकूला, सिरसा समेत कई जगहों पर हिंसा और अराजकता का नंगा नाच देखा गया..दिल्ली के कुछ हिस्से भी इससे अछूते नहीं रहे...ट्रेनें कैंसल, बसें कैंसल, फ्लाइट के किराए आसमान पर...जो यात्री जहां थे वहीं फंस गए...ट्रेनें, रोड ट्रांसपोर्ट के साधन नहीं होने से वैष्णो देवी (कटरा) में 50,000 से ज्यादा श्रद्धालुओं के फंसे होने की ख़बर आई...

अब उम्मीद यही करनी चाहिए कि 28 अगस्त को राम रहीम को सजा सुनाए जाने के बाद वैसी स्थिति नहीं बनने दी जाएगी...अब तो कम से कम हरियाणा, पंजाब और केंद्र सरकार को इस दिशा में पहले से ही सख्त कदम उठा लेने चाहिएं.... 

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

‘सच्चा सौदा’ है क्या ये तो जान लेते...खुशदीप

गुरमीत राम रहीम सिंह को यौन उत्पीड़न के 15 साल पुराने मामले में दोषी ठहराए जाने पर हरियाणा-पंजाब-चंडीगढ़ में स्थिति बेकाबू हो गई...इसकी आंच दिल्ली तक महसूस की गई...पंचकूला में सीबीआई की विशेष अदालत की ओर से फैसला सुनाए जाते ही उनके कथित अनुयायियों ने सड़कों पर उत्पात मचाना शुरू कर दिया...आते-जाते निर्दोष लोगों को निशाना बनाया गया...वाहनों में आग लगा दी गई...मीडियाकर्मियों पर हमले किए गए...यहां ये नहीं भूलना चाहिए कि एहतियातन संवेदनशील स्थानों पर पहले से ही बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों को तैनात रखा गया था...सिरसा और पंचकूला में तो सेना तक को मदद के लिए बुलाया गया था...
दुख: की बात है कि हिंसा और अराजकता का जो नंगा नाच कर रहे हैं वो खुद को डेरा सच्चा सौदाका प्रेमी बताते हैं...ये समझ नहीं आता कि राम रहीम का जुड़ाव जिस डेरे से है, उसका क्या सोच कर नाम डेरा सच्चा सौदा रखा गया था...राम रहीम और डेरे को अलग रखिए और जानिए कि सच्चा सौदा सही मायने में है क्या? गुरु नानक देव जी ने सच्चा सौदा कर दुनिया को क्या संदेश दिया था? अगर सही अर्थों में ये जान लिया जाए तो दुनिया भर में भूखे, बीमार लोगों के कष्ट काफी हद तक कम हो जाएं...
गुरु नानक देव जी जब 18 वर्ष के थे तो उनके पिता मेहता कालू जी ने उन्हें कारोबार के लिए घर से बाहर भेजा...उनके पिता निराश थे कि गुरु साहब का मन खेती और अन्य सांसारिक कामों में नहीं रमता था...उन्होंने सोचा कि कारोबार में गुरु नानक देव जी को शायद लगाने से दो फायदे हो सकते हैं- एक तो मुनाफ़े वाला कारोबार शुरू हो जाएगा और दूसरा गुरु नानक देव जी पूरा दिन ग्राहकों से बात करते हुए खुश रहेंगे.    
यही सब सोचते हुए पिता मेहता कालू जी ने एक शुभ दिन चुना और भाई मरदाना जी को बुलाया जिससे कि उन्हें गुरु साहिब के साथ भेजा जा सके...उन्होंने 20 रुपए गुरु साहिब और भाई मरदाना जी को दिए...साथ ही मरदाना जी से कहा,  नानक के साथ जाओ, कुछ विशुद्ध चीज़ें खरीद कर लाओ...जिन्हें बेच कर मुनाफ़ा कमाया जा सके...इस तरह अगर तुम मुनाफे वाला लेनदेन करने में कामयाब रहे तो अगली बार मैं तुम्हें और ज़्यादा पैसे देकर चीज़ें खऱीदने के लिए भेजूंगा...  
गुरु साहिब और भाई मरदाना जी ने तलवंडी से चूहड़खाना की ओर बढ़ना शुरू किया जिससे कि वहां से कारोबार के लिए कुछ चीज़ें खरीदी जा सकें...वो अभी 10-12 मील ही चले होंगे कि ऐसे गांव में पहुंच गए जहां लोग भूख-प्यास से बेहाल थे...पानी की किल्लत की वजह से बीमारी फैली हुई थी...
ये सब देख गुरु साहिब ने भाई मरदाना जी से कहा, पिता जी ने हमें कोई मुनाफ़े वाला काम करने के लिए कहा था...कोई भी सौदा इससे ज़्यादा मुनाफ़े वाला नहीं हो सकता कि जरूरतमंदों को खाना खिलाया जाए और तन ढकने के लिए कपड़ा दिया जाए...मैं इस सच्चे सौदे को नहीं छोड़ सकता...ऐसा कम ही होगा कि हमें इस तरह का मुनाफ़े वाला कारोबार करने का मौका मिले’…
गुरु साहब जितने पैसे भी उनके पास थे वो सब लेकर अगले गांव पहुंचे और वहां से इस गांव के बीमार लोगों के लिए बहुत सा खाने का सामान और पानी ले आए... गुरु साहिब ने जिस काम में 20 रुपए का निवेश किया उसी को आज लंगर कहा जाता है...
इसु भेखे थावहु गिरहो भला जिथहु को वरसाई  (गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 587-2)

इन भिखारियों का चोला पहनने से बेहतर है कि घर-गृहस्थी वाला होकर दूसरों को दिया जाए...

गुरुदेव साहिब और भाई मरदाना जी गांव वालों के लिए खाना और पानी लाने के साथ जो पैसे बचे थे, उससे उनके लिए कपड़े ले आए...फिर गांव वालों से छुट्टी लेकर वापस चले तो बिल्कुल खाली हाथ थे...

जब दोनों तलवंडी पहुंचे तो गुरु नानक देव जी ने भाई मरदाना जी से कहा, आप गांव अकेले जाओ...मैं इस कुएं पर बैठा हूं...भाई मरदाना जी ने गांव जाकर पिता मेहता कालू जी को सब कुछ बताया....साथ ही ये भी बताया कि गुरु नानक देव जी कहां बैठे हैं...मेहता कालू जी ये सब सुन बहुत क्रोधित हुए कि उन्होंने सारे पैसे जरूरतमंद लोगों के लिए खाना, कपड़े खरीदने पर खर्च दिए और कोई मुनाफ़ा नहीं कमाया...पिता मेहता कालू जी अपना सारा काम बीच में छोड़ कर भाई मरदाना जी के साथ वहां पहुंचे जहां गुरु नानक देव जी बैठे थे...
गुरु नानक देव जी ने पिता से कहा कि वो उन पर क्रोधित ना हों...गुरु साहिब ने ये समझाने की कोशिश की कि उन्होंने उनके पैसे के साथ कुछ ग़लत नहीं किया बल्कि सही मायने में सच्चा सौदा किया…

पिता मेहता कालू के लिए पूंजी जुटाना ही सही सौदा था क्योंकि इस दुनिया में पैसे को ही उत्तमता की पहचान माना जाता है. ये धनवान ही होता है जिसे बुद्धिमान माना जाता है...सिर्फ अमीरों को सज्जन, ईमानदार, पवित्र और मानवता का प्रेमी माना जाता है...अब ये पैसा किस तरह कमाया गया, इस और कोई ध्यान नहीं दिया जाता...
गुरु नानक देव ने जिस जगह सच्चा सौदा किया था वहां गुरुद्वारा सच्चा सौदा का निर्माण किया गया...गुरुद्वारा सच्चा सौदा फारूकाबाद (पाकिस्तान) में स्थित है...सिख धर्म का आधार ही दूसरों की भलाई करना है...जरूरतमंदों के साथ चीज़ें बांटना ही एक सिख का दिन बना देता है...जीवन का सच्चा सौदा यही है कि अपनी कमाई का सदुपयोग जरूरतमंदों के साथ बांट कर किया जाए...जिस तरीके से भी उनकी मदद की जा सके, की जाए...
सच्चा सौदा को लेकर कुछ और कहानियां भी हैं कि गुरु नानक देव जी ने पिता के दिए हुए पैसे से भूखे साधुओं का पेट भरा था...हालांकि गुरु नानक देव जी ने साधुओं को खाना खिलाया या भूखे ग्रामीणों को, इस पर मत भिन्नता को लेकर इन तथ्यों पर गौर किया जाना चाहिए...गुरु नानक देव जी खुद अपने पुत्र की उदासी साधु के तौर पर जीवन शैली के समर्थक नहीं थे...इसीलिए उन्होंने भाई लहणा को दूसरा गुरु (श्री गुरु अंगद साहिब जी) बनाया...ये जिन दिनों की बात है उन दिनों 20 रुपए बहुत बड़ी रकम होती थी...इतनी बड़ी कि पूरे गांव की मदद की जा सके...ये राशि निश्चित तौर पर उस राशि से कहीं ज्यादा होती जो कुछ साधुओं का पेट भरने के लिए चाहिए होती...
गुरुद्वारा सच्चा सौदा साहिब, पाकिस्तान के जिस फारूकाबाद में स्थित है, वहां प्रचलित कहानियां भी यही कहती हैं कि गुरु नानक देव जी ने गांव के भूखे बीमार लोगों की मदद के लिए पिता की दी हुई सारी रकम खर्च की थी...फारूकाबाद के एक बुजुर्ग मुस्लिम ने कहा कि अपने पूर्वजों की संकट के समय मदद के लिए ये क्षेत्र गुरु नानक देव जी के लिए हमेशा शुक्रगुज़ार रहेगा...  
गुरु नानक देव जी ने जो सच्चा सौदा किया उसी से गुरु के लंगर की परंपरा की नींव पड़ी...गुरु नानक देव जी ने जिस 20 रुपए का निवेश किया उसी ने दुनिया भर में सिखों को जरूरतमंदों, गरीबों और बीमारों की सेवा के लिए प्रेरित किया...साथ ही जैसा कि गुरु अमर दास जी ने संदेश दिया, उसी का पालन किया कि घर गृहस्थी में रहते हुए भी दूसरों की मदद के लिए कभी पीछे ना रहो...
#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

राम रहीम के आगे सब कुछ बौना क्यों...खुशदीप



देश में एक शख्स कितना ताकतवर हो सकता है ये डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह ने दिखा दिया है...राम रहीम पर यौन उत्पीड़न के आरोप से जुड़े मामले में सीबीआई की विशेष अदालत को शुक्रवार को फैसला सुनाना है...इसको लेकर हरियाणा और पंजाब में जो हालात बने हैं, उसी पर आज तक फेसबुक लाइव डिबेट में मैंने भी हिस्सा लिया...इसका वीडियो आप इस लिंक पर देख सकते हैं...


लौटते हैं राम रहीम पर...कहने को देश में क़ानून का शासन है...कोई भी व्यक्ति देश के संविधान और क़ानून से ऊपर नहीं है...राम रहीम अपने स्टाइल के सिनेमा में बड़े पर्दे पर खुद को रक्षक के तौर पर दिखाते हैं...हिंद का नापाक को जवाब में भारतीय सीक्रेट एजेंट बनते हैं...लेकिन विडंबना देखिए इन्हीं राम रहीम पर स्थिति को काबू में रखने के लिए शासन को खुद फौज का सहारा लेना पड़ रहा है...राम रहीम के अनुयायियों ने पूरी व्यवस्था को पंगु बना कर रख दिया है...

सवाल ये उठता है कि कोई शख्स इतना आदमकद कैसे हो सकता है कि बाकी सब कुछ उसके सामने बौना नज़र आने लगा...ये देश के संविधान, क़ानून, सरकारी मशीनरी सभी के लिए चुनौती है...ये अदालत का काम है कि वो राम रहीम से जुड़े इस मामले में क्या फैसला सुनाती है...जो भी फैसला सुनाया जाए उस पर पालन कराना पुलिस, प्रशासन की संवैधानिक ड्यूटी है...अगर वो इसमें विफल रहती है तो ये सीधे शासन की नाकामी होगी...हरियाणा में बीजेपी सरकार के लिए ये बड़ी अग्निपरीक्षा के समान है...पंजाब में कांग्रेस सरकार को भी फूंक-फूंक कर कदम उठाने होगे...

डेरा सच्चा सौदा के 5 करोड़ समर्थक बताए जाते हैं...डेरा प्रमुख राम रहीम पर विशेष अदालत के फैसला सुनाने से पहले ही उनके अनुयायी इतनी बड़ी संख्या में पंचकूला पहुंच गए हैं कि पुलिस, प्रशासन और शासन सभी की नाक में दम हो गया है...बताया जा रहा है कि गुरुवार रात से ही पंचकूला शहर को आर्मी के हवाले कर दिया गया है...सिरसा, जहां डेरा सच्चा सौदा का हेडक्वार्टर है वहां गुरुवार रात 10 बजे के बाद कर्प्यू लगाए जाने की ख़बर है...

हरियाणा-पंजाब में बस सेवाएं, ट्रेन सेवाएं ठप...चंडीगढ़ से दिल्ली की फ्लाइट की टिकट की कीमत 20,000 रुपए पार कर चुकी हैं...25 अगस्त को चंडीगढ़, पंचकूला समेत कई शहरों में स्कूल, कॉलेज, कारोबार ठप रहेंगे...पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में 72 घंटे के लिए मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं भी स्थगित किए जाने के समाचार हैं...पंजाब सरकार ने शुक्रवार को चंडीगढ़ में सभी सरकारी कार्यालयों में अवकाश का ऐलान किया है...

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट सवाल कर रहा है कि आखिर कैसे राम रहीम के अनुयायियों के इतनी बड़ी संख्या में एकत्र होने की स्थिति बनने दी गई...धारा 144 के बावजूद राम रहीम के 6-7 लाख अनुयायियों का कैसे जमावड़ा होने दिया गया...हाईकोर्ट ने ये सवाल भी किया है कि क्यों ना हरियाणा के डीजीपी को सस्पेंड कर दिया जाए...

हरियाणा के ही हिसार जिले में सतलोक आश्रम वाले रामपाल की गिरफ्तारी के समय नवंबर 2014 में कैसा उत्पात हुआ था, अब भी सब के जेहन में ताजा है...रामपाल के मुकाबले राम रहीम के अनुयायियों का आधार बहुत बड़ा और व्यापक तौर पर फैला हुआ है...

राम रहीम को लेकर कानून व्यवस्था से अलग हट कर ये विश्लेषण भी करना जरूरी है कि किन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हालात ने उन्हें और उनके डेरे को इतना मजबूत बनाया...दरअसल ऐसे कई छोटे-बड़े डेरे पंजाब या उसी की सीमा से सटे हरियाणा के इलाकों में मौजूद हैं...पंजाब ऐसा राज्य है जहां आबादी की आनुपातिक दृष्टि से दलितों की संख्या देश में सबसे ज्यादा है...

दलितों के मसीहा कहे जाने वाले दिवंगत नेता कांशीराम की जन्मभूमि भी पंजाब ही है...पंजाब में ऊंची जाति, विशेष कर जाट सिखों का राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से हमेशा दबदबा रहा है...ऐसे में मजहबी सिख जैसे दलित खुद को उपेक्षित और हाशिए पर समझते रहे हैं...ऐसे ही लोग बड़ी संख्या में डेरों या राम रहीम जैसे बाबाओं के साथ जुड़ते हैं...डेरों से संरक्षण मिलने पर ये खुद को सुरक्षित समझते हैं...मुख्य धारा में सामाजिक मान्यता ना मिलने की वजह से आहत ये लोग डेरों में सामूहिक तौर पर जुट कर बड़ी राहत महसूस करते हैं...ये डेरा प्रमुख के एक इशारे पर कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं...चुनाव में वोट किसे देना है, डेरा प्रमुख जिस पार्टी को कहते हैं, अनुयायी आंख मूंद कर उसके चुनाव निशान पर ही बटन दबा देते हैं...

यही वजह है कि पंजाब और हरियाणा में चुनाव विधानसभा के हों या लोकसभा के, हर पार्टी, हर नेता डेरे के आगे नतमस्तक नजर आता है...यानि ऐसे बाबाओं को फलने फूलने के लिए खाद पानी राजनीति ही मुहैया कराती है...अब ये बात अलग है कि इन बाबाओं के लार्जर दैन लाइफ हो जाने पर उन पर कंट्रोल करना राजनीतिक पार्टियों की सरकारों के लिए ही टेढ़ी खीर बन जाता है...

इसे कुछ ऐसे समझा जा सकता है कि जिन जब तक बोतल में रहे तभी तक काबू में रहता है...लेकिन बोतल के बाहर आते ही उस पर नियंत्रण रखना नामुमकिन हो जाता है...

#हिन्दी_ब्लॉगिंग


बुधवार, 23 अगस्त 2017

गैया चराएंगे भावी पत्रकार...खुशदीप



पत्रकारिता के छात्रों के लिए करियर बनाने के लिए प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल हर तरह के माध्यम आज मौजूद हैं...इंटरनेट और मोबाइल ने पत्रकारिता का स्वरूप ही बदल दिया है...अब घटना घटते ही उसकी जानकारी दुनिया के कोने-कोने में पहुंच जाती है...ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सअप, ब्लॉग का भी न्यूज़ की दुनिया में जमकर इस्तेमाल किया जाता है...ऐसा भी देखने में आता है कि जल्दी से जल्दी ब्रेक करने के चक्कर में कई बार आधे-अधूरे तथ्यों के साथ ही ख़बर प्रसारित कर दी जाती है...अब सब कुछ इतना फास्ट है कि दबाव में ये भी इंतजार नहीं किया जाता कि ख़बर की ठोक बजाकर पुष्टि हो गई है या नहीं...पत्रकारिता इतनी चुनौतीपूर्ण हो गई है कि इसके छात्रों को अच्छी तरह ट्रेंड करने के लिए पत्रकारिता के बुनियादी पहलू सिखाने के साथ-साथ आधुनिक तकनीक से भी अवगत कराना बहुत जरूरी हो गया है...

आपने ये सब पढ़ लिया...अब आपको बताते हैं कि भोपाल की माखनलाल चतुर्वेदी नेशनल यूनिर्सिटी ऑफ जर्नलिस्म एंड कम्युनिकेशन ने क्या फैसला लिया है...भोपाल के बांसखेड़ी में इस यूनिवर्सिटी के नए परिसर का निर्माण हो रहा है... अगले साल अप्रैल से पत्रकारिता की पढ़ाई का नया सत्र नए परिसर में ही शुरू होगा...विश्वविद्यालय प्रबंधन ने फैसला किया है कि नए परिसर में गोशाला भी बनाई जाएगी...अब आप सवाल करेंगे कि पत्रकारिता की पढ़ाई वाले विश्वविद्यालय में भला गोशाला का क्या काम?  

ठहरिए जनाब ठहरिए...किसी नतीजे पर मत पहुंचिए...विश्वविद्यालय के कर्ताधर्ताओं के पास इसके लिए भी खूब तर्क मौजूद हैं...विश्वविद्यालय के कुलपति बी के कुठियाला हों या रजिस्ट्रार दीपक शर्मा, दोनों का ही कहना है कि 50 एकड़ वाले परिसर में 2 एकड़ जगह ऐसी है जिसका कोई उपयोग नहीं था...इसके लिए कई सुझाव सामने आए...इनमें से एक सुझाव गोशाला बनाने का भी था...

पत्रकारिता के छात्रों और गोशाला के बीच क्या कनेक्ट है, इसका जवाब भी विश्वविद्यालय के पदाधिकारियों के पास मौजूद है..उनका कहना है कि इससे विश्वविद्यालय के हॉस्टल में रहने वाले छात्रों को खालिस दूध, घी, मक्खन उपलब्ध कराया जाएगा...साथ ही ऑर्गेनिक खेती की जाएगी जिसमें गाय के गोबर का खाद के तौर पर इस्तेमाल होगा...इसके अलावा छात्रों के पास भी गौसेवा के साथ गोशाला का प्रबंधन सीखने का विकल्प मौजूद रहेगा...  

विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार के मुताबिक निश्चित तौर पर ये नया प्रयोग है..नालंदा में पहले ऐसा होता था...रजिस्ट्रार के मुताबिक विश्वविद्यालय को ये फैसला लेने का अधिकार है कि वो अपनी अतिरिक्त जमीन का किस प्रायोजन के लिए इस्तेमाल करें...

जहां तक छात्रों का सवाल है, कुछ इस फैसले का विरोध कर रहे हैं. वहीं कुछ का कहना है कि उन्हें इस फैसले से कोई दिक्कत नहीं है बशर्ते कि पत्रकारिता की शिक्षा की समुचित सुविधाएं उन्हें मिलती रहनी चाहिएं...


अब नया दौर है...नए इंडिया में ऐसे प्रयोग तो बनते हैं बॉस...

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

मोदी मुखौटा हैं, कॉरपोरेट के हिसाब से तय हो रहा है सब...खुशदीप



भाई काजल कुमार ने फेसबुक वॉल पर एक पोस्ट लिखी है...पोस्ट हिला देने वाली है नौकरीपेशा लोगों के लिए...या यूं कहिए केंद्र और राज्य सरकार के कर्मचारियों को छोड़ हर नौकरीपेशा व्यक्ति के लिए...10 अगस्त 2017 को केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने लोकसभा में The Code on Wages Bill, 2017 पेश किया...इसका उद्देश्य बताया जा रहा है कि असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए पूरे देश में न्यूनतम भत्ता’  निर्धारित करना है...केंद्र सरकार एक बार न्यूनतम भत्ता तय कर देगी तो राज्य सरकार उससे कम भत्ता तय नहीं कर सकेंगी....बताया जा रहा है कि इससे 40 करोड़ से ज़्यादा कामगारों को लाभ मिलेगा...सुनने में ये बड़ा अच्छा लगता है...न्यूनतम भत्ते पर ही सरकार ने सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया...मीडिया ने इसका प्रसार भी खूब किया...

किसी ने ये जानने कि कोशिश नहीं की कि ‘The Code on Wages’  में और है क्या क्या...

अगर ये लागू हो जाता है तो इसके ये-ये असर भी होंगे-

1.ये सारे एक्ट्स खत्म हो जाएंगे- The Payment of Wages Act, 1936, the Minimum Wages Act, 1948, the Payment of Bonus Act, 1965 and the Equal Remuneration Act, 1976 (Clause 60)...

2. इसके मुताबिक़ महीने के हिसाब से मेहनताना (पारिश्रमिक) दिए जाने की कोई बाध्यता नहीं रह जाएगी.  अब मेहनताना घंटे या दिन या महीने के हिसाब से तय किया जा सकेगा...यानि अब नौकरी घंटों या दिन के हिसाब से भी दी जा सकेगी...  

3. पे-कमीशन या wage-revision आदि ख़त्म किए जा रहे हैं...सरकार एक 'सलाहकार बोर्ड' बनाएगी जो पारिश्रमिक तय करेगा...कोड के हिसाब से हर पांच साल बाद न्यूनतम भत्ता तय किया जाएगा...

4. 15 साल से नीचे की उम्र के किसी भी कर्मचारी को लेकर जुर्माना नहीं लगाया जाएगा... यानि 15 साल से कम उम्र के लोग भी काम पर रखे जा सकेंगे....

5.  किसी को भी केवल 2 दिन के नोटिस पर काम से निकाला जा सकेगा...अगर कोई नौकरी छोड़ता है या बर्खास्त किया जाता है तो दो दिन में उसका भुगतान कर दिया जाएगा...

6. दिन में 8 घंटे की बाध्यता की जगह काम के कुछ घंटे भी तय किए जा सकते हैं...
7. हफ्ते में 6 दिन कामकाजी रहेंगे और 1 दिन छुट्टी का...

अगर किसी को ‘The Code on Wages’  विस्तार से पढ़ना है तो इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं...

श्रम सुधार का पेंच हमेशा से इतना पेचीदा रहा है कि सभी सरकारें इससे बचती रही हैं...1992 में शुरू 'ग्रेट ग्रेट' सुधारों में भी इससे बचा गया था...जटिल श्रम कानूनों को आसान बनाना सही दिशा में कदम माना जाता है लेकिन दुर्भाग्य से ये एक समान न्यूनतम भत्तेके पेंच पर ही उलझ कर रह जाता है...क्या इसी पेंच को आगे रखकर ये सरकार ऐसे प्रावधान बिना शोरशराबे के कर रही है जिससे कॉरपोरेट के हित साधे जा सकें...  

चलिए अब जिस न्यूनतम भत्ते पर इतना जोर दिया जा रहा है उसके एक साइड इफैक्ट पर भी बात कर ली जाए...इससे छटनी में तेजी आ सकती है, नई भर्ती पर रोक लग सकती है या ये दोनों ही काम एक साथ हो सकते हैं...नतीजा बेरोजगारी और बढ़ने के तौर भी सामने आ सकता है...वो भी ऐसी स्थिति में जब भारत में नये रोजगारों का सृजन पहले से ही समस्या बना हुआ है...

कंपनियां कामगारों को अधिक भत्ता देने की जगह अब मशीनों पर ज्यादा दांव खेल सकती हैं जो दीर्घकालिक दृष्टि से उनके लिए फायदे का सौदा रहेगा...अमेरिका में वाल मार्ट स्टोर्स इंक ने कैशियर की पोस्ट पर इंसानों को रखने की जगह सेल्फ चेकआउट मशीन का इस्तेमाल शुरू कर दिया है...मैक्डॉनल्ड जैसी फूड चेन्स ने भी कैशियर की जगह ऐप्स और ऑर्डिरिंग कियोस्क का इस्तेमाल शुरू कर दिया है...

नोटबंदी हो या सब्सिडी हटाने के ताबड़तोड़ फैसले, या ‘The Code on Wages’  ये सब क्या दर्शाता है... दरअसल, नव उदारवादी नीतियों को लागू करना मोदी सरकार की मजबूरी है...अभी हाल में एक घटनाक्रम हुआ...नीति आयोग के उपाध्यक्ष पद से अरविंद पनगढ़िया ने ये कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि वे 31 अगस्त के बाद इस पद पर नहीं बने रह सकते...पनगढ़िया ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी में दोबारा पढ़ाने को अधिक तरजीह दी...अरविंद पनगढ़िया के स्थान पर मोदी सरकार ने अर्थशास्त्री डॉ राजीव कुमार चुना है...अगले महीने से वे सरकार के शीर्ष थिंक टैंक की अगुआई करेंगे...रिटेल सेक्टर में विदेशी निवेश के प्रबल समर्थक रहे डॉ राजीव कुमार एयर इंडिया के निजीकरण की भी जोरदार वकालत करते रहे हैं...

आर्थिक मुद्दों पर गहरी पकड़ रखने वाले वरिष्ठ स्तंभकार राजेश रपरिया ने डॉ राजीव कुमार के बारे में अपने एक लेख में लिखा- कई टीवी बहसों में राजीव कुमार का सान्निध्य मिला है. पर उनका दिल कभी गरीबों के लिए नहीं धड़कता है...गरीबों को मिलने वाली सब्सिडी पर उनसे कभी मतैक्य नहीं हो पाया. उन्हें कॉरपोरेट सेक्टर को मिलने वाली औसतन पांच लाख करोड़ रुपए की सब्सिडी से कभी कोई ऐतराज नहीं रहा...

मोदी सरकार के केंद्र में सत्ता में आने से करीब एक महीना पहले 21 अप्रैल 2014 को नवभारत टाइम्स में मेरा एक लेख प्रकाशित हुआ था- 'आख़िर किसके अच्छे दिन आने वाले हैं?' उसी लेख का एक अंश यहां उद्धृत कर रहा हूं-

मोदी के मददग़ारों में सबसे बड़ा नाम भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के कॉरपोरेट मॉडल का लिया जा सकता है...कॉरपोरेट जगत के बड़े खिलाड़ियों का एकसुर में मोदी की शान में कसीदे पढ़ना संयोग नहीं है...नव उदारवादी नीतियों को देश पर थोपने के लिए कारोबारियों को मोदी से ज़्यादा मुफ़ीद नेता अब और कोई नही दिख रहा... वेलफेयर स्टेट की धारणा के तहत चलने वाले महंगे सामाजिक कार्यक्रम अब कॉरपोरेट जगत की आंख की किरकिरी बन गए हैं...

अब उस लेख के करीब साढ़े तीन साल बाद देश में जिस तरह की परिस्थितियां हैं उस पर गौर कीजिए...2014 में मोदी की जीत में कॉरपोरेट शक्तियों के समर्थन ने भी अहम भूमिका निभाई थी...अब इन्हीं शक्तियों का जोर है कि आर्थिक सुधारों के दूसरे चरण को जोरशोर से शुरू किया जाए जिसमें वेलफेयर सब्सिडी जैसा कोई प्रावधान शेष ना रहे...

ऐसा करते हुए ये भूला जा रहा है कि सब कुछ मैनेज किया जा सकता है लेकिन जन-भावनाओं के अंडर करंट को नहीं...2004 के इंडिया शाइनिंग से अच्छी मिसाल और क्या हो सकती है?