बुधवार, 16 अगस्त 2017

‘एक रात का शौहर’: गंदा है पर धंधा है ये...खुशदीप

 सामाजिक मुद्दों और क़ानून के बारीक पहलुओं पर जिस तरह की बेहतरीन फिल्में निर्माता-निर्देशक बलदेव राज चोपड़ा ने बनाईं, बॉलिवुड में वैसी मिसाल और कोई नहीं मिलती....आज से करीब 35 साल पहले चोपड़ा ने मुस्लिम समाज से जुड़े ऐसे विषय पर फिल्म 'निकाह' बनाई जिसे छूने की पहले शायद किसी ने हिम्मत नहीं दिखाई थी...ये विषय था निकाह-ए-हलाला... 
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निकाह-ए-हलाला पर और ज़िक्र करने से पहले आपको 'निकाह' की शॉर्ट में स्टोरी बता देता हूं...शरिया क़ानून पर आधारित निकाह के तीन अहम किरदार हैं...हैदर (राज बब्बर), निलोफर (सलमा आग़ा) और वसीम (दीपक पराशर)...हैदर और निलोफर कॉलेज में साथ-साथ पढ़ते है...हैदर एक जाना माना शायर है...हैदर दिल ही दिल निलोफर को चाहता है...लेकिन उसे ये नहीं पता कि निलोफर की मुहब्बत वसीम है...नवाब वसीम से निलोफर की जल्द ही शादी हो जाती है...उधर हैदर एक मैग्जीन का सम्पादक बन जाता है....

वसीम अपने नये बिजनेस में काफी बिजी हो जाता है...शादी की पहली सालगिरह पर निलोफर एक पार्टी रखती है...सारे मेहमान आ जाते है लेकिन वसीम ही नहीं आ पाता है...मेहमानों के सवालों से तंग आकर निलोफर खुद को एक कमरे में बंद कर लेती है...मेहमान इसे अपनी तौहीन समझ कर वहां से चले जाते हैं...वसीम जब घर पहुंचता है तो घर खाली होता है...इस बात को लेकर निलोफर और वसीम में तकरार शुरू हो जाती है...तैश में आकर वसीम निलोफर को तीन बार तलाक कह देता हैजिसके बाद शरियत के अनुसार निलोफर का वसीम से तलाक हो जाता है...

बाद में वसीम को अपनी गलती का एहसास होता है...तलाकशुदा निलोफर को हैदर अपनी मैग्जीन में जॉब ऑफर करता है...इसी दौरान निलोफर को एहसास होता है कि हैदर अब भी उससे मुहब्बत करता है...

उधर, वसीम चाहता है कि निलोफर दोबारा उसकी ज़िंदगी मे आ जाए, इसके लिए वो इमाम से सलाह लेने जाता है...इमाम वसीम को शरिया क़ानून की जटिलता के बारे में बताते हैं कि किस तरह एक महिला को तलाक देने के बाद उससे दोबारा निकाह करना मुश्किल हो जाता है...इसके लिए महिला को पहले किसी और शख्स से शादी करनी होगी, फिर वो शख्स उसे तलाक देगा, उसी के बाद महिला पहले पति से शादी करने की इजाज़त होगी...इसे निकाह-ए- हलाला कहते हैं...   

इसी बीच हैदर की ओर से निलोफर से शादी की इच्छा जताई जाती है...दोनों अपने अभिभावकों की रज़ामंदी मिलने के बाद निकाह कर लेते हैं...इसी दौरान निलोफर को वसीम चिट्ठी भेजता है जिसमें दोबारा निकाह की इच्छा जताता है...हैदर ये चिट्ठी पढ़ लेता है और समझता है कि निलोफर और वसीम अब भी मुहब्बत करते हैं...हैदर फिर वसीम को बुलाता है और निलोफर के सामने तलाक देने की पेशकश करता है...हैदर की इस पेशकश को ठुकराते हुए निलोफर की ओर से हैदर और वसीम दोनों से सवाल किए जाते हैं...निलोफर कहती है कि दोनों ही ऐसे पेश आ रहे हैं कि जैसे कोई वो औरत नहीं बल्कि कोई प्रॉपर्टी है...निलोफर फिर अपना फैसला सुनाती है कि वो हैदर के साथ ही रहना चाहती है...वसीम फिर निलोफर की भावनाओं को सम्मान देते हुए उसे और हैदर को शुभकामनाएं देता है और दोनों की ज़िंदगी से दूर चला जाता है...

खैर ये तो रही फिल्म की बात...

अब बात असल जिंदगी में निकाह-ए-हलाला के एक स्याह पहलू की...किस तरह चंद लोग जिनसे उम्मीद की जाती है कि वो औरों को नेकी और ईमानदारी के रास्ते पर ले जाएंगे, वही खुद निकाह-ए-हलाला के नाम पर दूसरों की मजबूरी का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं...ना सिर्फ़ पैसे के लिए बल्कि ये तलाकशुदा महिलाओं की मजबूरी का फायदा उठाते हुए उनके साथ एक रात गुजारते हैं...इन मुस्लिम महिलाओं का कसूर इतना है कि वे इस्लामी कानून के तहत अपनी शादियों को बचाना चाहती हैं...

इंडिया टुडे की स्पेशल इंवेस्टीगेटिव टीम की तहकीकात से ये सब सामने आया है...इससे जुड़े स्टिंग ऑपरेशन को बुधवार को 'इंडिया टुडे' और 'आज तक' चैनलों पर प्रसारित किया गया...

अंडर कवर रिपोर्टर्स ने छुपे कैमरे से दिखाया कि ये लोग निकाह-ए- हलाला की विवादित प्रक्रिया का हिस्सा बनने के लिए 20,000 से लेकर डेढ़ लाख रुपए तक की रकम चार्ज भी करते हैं...जो खुद ये काम करने के लिए तैयार दिखे उनमें मुरादाबाद से सटे लालबाग में मदीना मस्जिद के इमाम मोहम्मद नदीम, दिल्ली के जामिया नगर में मौलाना की काबिलियत रखने वाले ज़ुबेर कासमी, दिल्ली के दारूल उलूम महमूदिया मदरसे से जुड़े मोहम्मद मुस्तकीम और हापुड़ ज़िले के सिखेड़ा गांव में मदरसा चलाने वाले मोहम्मद जाहिद शामिल हैं...   

बुलंदशहर के तिलगांव में मेवातियन मस्जिद के इमाम जहीरूल्लाह ने इंडिया टुडे के अंडर कवर रिपोर्टर्स के सामने निकाह-ए-हलाला के लिए प्रस्तावित दूल्हे के तौर पर एक शख्स को पेश किया...आरिफ़ नाम के इस शख्स ने बड़ी उम्र के बावजूद अपनी मर्दानगी को लेकर ढींगे हांकने में कमी नहीं की...आरिफ़ ने सर्विस देने के लिए अपनी फीस 25000 रुपए बताई...

ये पोस्ट लिखने का मतलब यही है कि धर्म कोई भी हो अगर उसमें कुछ लोग उजला चोला पहन कर स्याह कामों में लगे हैं तो उन्हें बेनकाब करने के लिए उसी धर्म के जागरूक लोगों को सामने आना चाहिए...कोई धर्म किसी शख्स को ये अनुमति नहीं देता कि दूसरे की मजबूरी का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करे...मुस्लिम समाज के युवा वर्ग को खास तौर पर ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़नी चाहिए...

निकाह-ए-हलाला : क्या है हक़ीक़त, क्या है फ़साना?

शरिया क़ानून के मुताबिक अगर पति की ओर से पत्नी के लिए तलाक’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, होशोहवास में या तैश के वश में आकर, तो वो इद्दत’ की तीन महीने की मुद्दत में तलाक को रद्द कर सकता है...इद्दत की मुद्दत सिर्फ एक ही सूरत में बढ़ाया जा सकता है अगर महिला पत्नी गर्भवती हो...इद्दाह की मुद्दत तब तक रहती है जब तक महिला बच्चे को जन्म नहीं दे देती...

तलाक-इद्दत का प्रावधान पति के लिए चेतावनी की तरह होता है कि वो पत्नी को स्थायी तौर पर तलाक ना दे...अगर पति की ओर से पत्नी की ओर मुखातिब होते हुए तीन बार तलाक लगातार कहा जाता है तो वो तलाक पूरा माना जाता है...फिर ऐसा जोड़ा ना तो इद्दत की मुद्दत से दोबारा शादी कर सकता है और ना ही अपनी दोनों की रज़ामंदी से...

अगर फिर वो दोनों दोबारा साथ रहना चाहते हैं तो उन्हें निकाह-ए-हलाला का अमल करना होता है...इसके तहत महिला को किसी दूसरे शख्स से शादी कर उससे तलाक लेना होता है...निकाह-ए-हलाला का प्रावधान शरिया कानून में इसीलिए किया गया है कि कोई पति तलाक को हल्के में ना ले और कोई पत्नी ऐसी स्थिति ना आने दे जिससे कि तलाक की नौबत आए...

हालांकि निकाह-ए-हलाला को लेकर कई तरह की भ्रांतियां भी हैं...कई लोग समझते हैं कि निकाह-ए-हलाला तीन लोगों के बीच का अरेंजमेंट (जोड़ा और अन्य शख्स) है...जिसके जरिए पत्नी कानूनी तौर पर अपने पति से दोबारा शादी कर सकती है...

ये सबसे बड़ी भ्रांति है...इस्लाम हलाला को अरेंजमेंट प्रेक्टिस के तौर पर नहीं देखता...किसी महिला के पहले पति के लिए उससे दोबारा शादी करने की सख्त शर्त होती है कि या तो उसका दूसरा पति अपनी मर्जी से तलाक दे या दूसरे पति की मौत हो जाए...सिर्फ यही सूरत है कि एक महिला अपने पहले पति से दोबारा शादी कर सकती है...इस मामले में किसी भी तरह के अरेंजमेंट को इजाज़त नहीं दी जा सकती...

दूसरा बड़ा मिथक भी पहले से ही जुड़ा है...कई मर्द समझते हैं कि वो अपनी पत्नी के खिलाफ तलाक शब्द का इस्तेमाल अपने हिसाब से जब चाहे, जैसे चाहे कर सकते हैं...ऐसा करते हुए उन्हें कोई परिणाम भुगतने नहीं पड़ेंगे...यहां इस्लामी प्रावधान साफ़ है...इसके मुताबिक अरेंज्ड हलाला गैर क़ानूनी, पाप और बड़ी भूल है...जायज़ हलाला वही माना जाएगा कि जब महिला और उसके दूसरे पति के बीच शारीरिक संबंध स्थापित हुए हों...अगर महिला का पहला पति उसे दोबारा अपनी पत्नी के तौर पर स्वीकार करता है तो ये प्रावधान हमेशा पहले पति के लिए भावनात्मक आघात रहेगा...क्यों उसने तलाक को हल्के में लेते हुए तीन बार उसे बोला था...

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

शनिवार, 12 अगस्त 2017

गऊ माता के नाम पर...In The Name Of Mother...खुशदीप

गोरखपुर के सरकारी बीआरडी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में क्या हुआ, क्या नहीं होना चाहिए था, इन सब बातों का पोस्टमार्टम चल रहा है...कितने बच्चे मरे...कितने दिन में मरे...औसतन कितने रोज मरते हैं...ये सब सवाल और इन पर सरकार की ओर से आ रहे जवाब बेमायने है... 

मासूमों की जान जाने के लिए ऑक्सीजन सप्लाई रुकना कारण था या नहीं ये राजनीतिक बहस का विषय हो सकता है...न्यूज चैनलों की डिबेट्स का बौद्धिक चारा हो सकता है...लेकिन इसका नतीजा क्या निकलेगा, हम सब जानते हैं...ये पहली बार नहीं कि देश में ऐसी घटनाएं हुई हैं...हाल में मध्य प्रदेश में भी ऐसा ही मामला हुआ था लेकिन वो वहां की सरकार के पुख्ता मीडिया मैनेजमेंट की वजह से अधिक सुर्खियां नहीं बटोर सका था...

गोरखपुर जैसी घटनाएं भविष्य में ना हो इसके ठोस उपाय ढूंढने की जगह मौतों के आंकड़े को ज्यादा तूल दिया जा रहा है...चलिए मान लीजिए कि इन जैसे हालात में सिर्फ एक ही बच्चे की मौत होती तो क्या मामला कम गंभीर हो जाता...लापरवाही से हुई एक भी ऐसी मौत पूरी की पूरी सरकारी चिकित्सा व्यवस्था पर तमाचा है...

ये सब देखकर यही लगता है कि सरकारें आती जाती रहती हैं लेकिन सिस्टम अपने ढर्रे से ही चलता है...गरीब-गुरबों के लिए कोई फर्क नहीं पड़ता...उनके हालात नहीं बदलते...सरकारी अस्पतालों में वहीं जाता है जिसके पास निजी डॉक्टरों की महंगी फीस, दवा, टेस्ट आदि का खर्च उठाने की क्षमता नहीं होती...वो सरकारी अस्पताल में इस भरोसे के साथ जाते हैं कि उनका सही से इलाज होगा...लेकिन इस भरोसे का क़त्ल होता रहता है जब जब गोरखपुर जैसी घटनाएं सामने आती हैं...ऐसे में वेलफेयर स्टेट की धारणा क्या सिर्फ कागज़ी शोभा बढ़ाने के लिए है...क्या चुनाव से पहले किए जाने वाले सारे लंबे चौड़े वादे सिर्फ जुबानी जुगाली के लिए होते हैं...

आज कुछ और लिखने के लिए बैठा था, लेकिन गोरखपुर जैसी दिल को दुखाने वाली घटना का ज़िक्र खुद-ब-खुद आ गया...दरअसल, आज मुझे आपको एक डॉक्यूमेंट्री ‘In The Name Of Mother’ के बारे में बताना था...

ये डॉक्यूमेंट्री युवा पत्रकार अल्पयु सिंह ने बनाई है...अल्पयु के साथ मैं दो न्यूज चैनल्स में काम कर चुका हूं...मुझे उनकी क्रिएटिविटी ने शुरु से ही बहुत प्रभावित किया...साथ ही अल्पयु में मुझे सार्थक पत्रकारिता के लिए हमेशा एक ललक दिखी...पत्रकारिता के इस टीआरपी युग में कुछ सकारात्मक करने की छटपटाहट ने ही अल्पयु को कुछ अलग करने के लिए प्रेरित किया...इसी का नतीजा है उनकी ये पहली डॉक्यूमेंट्री...और इस डॉक्यूमेंट्री को देखकर मैं ताल ठोक कर कह सकता हूं कि मुझे इस युवा पत्रकार पर गर्व है...

अल्पयु ने अपनी पहली डॉक्यूमेंट्री के लिए पहलू खान को आधार बनाया...पहलू खान को आप भूले तो नहीं होंगे...वही पहलू खान जिन्हें 1 अप्रैल को कथित गोरक्षकों ने राजस्थान के अलवर में पीट-पीट कर मार डाला था...अल्पयु ने पहलू के घर जाकर उनके घर के एक-एक सदस्य की मनोदशा को बारीकी से पकड़ा...और भी बहुत कुछ है इस डॉक्यूमेंट्री में, जिसे आप खुद देखने के बाद ही अच्छी तरह समझ पाएंगे...अल्पयु के साथ इस डॉक्यूमेंट्री को बनाने में उज्ज्वल गांगुली (कैमरा), अभिनव दीक्षित (एडिटिंग) और आरती सहगल (सब टाइटल्स) का योगदान भी प्रशंसनीय है...मुझे उम्मीद ही नहीं पूरा यकीन है कि अल्पयु और उनकी टीम आगे भी इसी तरह सच को उजागर करने वाले सकारात्मक और सार्थक प्रयास करती रहेगी...

अब और कुछ नहीं कहता, आप खुद ही देखिए-

‘In The Name Of Mother’





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शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

1962 युद्ध में भारत ने चीन को हराया था!!!…खुशदीप


चीन और भारत में 1962 में युद्ध हुआ था तो मेरा जन्म भी नहीं हुआ था...एक साल बाद मैं इस दुनिया में आया...1964 में प्रख्यात निर्देशक चेतन आनंद ने इसी युद्ध की विभीषिका को बयां करने वाली बेहतरीन फिल्म बनाई- हक़ीक़त’…जब 8-9 साल का था तब पहली बार हक़ीक़त देखी...ज़्यादा समझ ना होने के बावजूद इस फिल्म के माध्यम से जाना कि युद्ध का क्या मतलब होता है...जाना कि देश की ड्यूटी के लिए समर्पित जवान भी हमारी तरह ही हाड-मांस के इऩसान होते हैं...उनकी भी अपने प्रियजनों के लिए वैसी ही भावनाएं होती हैं जैसे कि आपकी-हमारी...


हक़ीक़तबेशक ब्लैक एंड व्हाईट थी लेकिन चेतन आनंद साहब ने इसमें युद्ध की पृष्ठभूमि में इनसानी रिश्तों के जज़्बात को बड़ी शिद्दत के साथ पर्दे पर उकेरा था...हक़ीक़तको यादगार फिल्म बनाने में कैफ़ी आज़मी के गीतों और मदन मोहन के संगीत ने भी अहम योगदान दिया...

हक़ीक़तके माध्यम से ही जाना कि चीन के साथ युद्ध में भारत को किस पैमाने की हार का सामना करना पड़ा था...इस हार ने ही तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भीतर से तोड़ कर रख दिया था...युद्ध के दो महीने के बाद लता मंगेशकर ने दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में 27 जनवरी 1963 को कवि प्रदीप के लिखे गीत ए मेरे वतन के लोगों, ज़रा आंख में भर लो पानी , जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो कुर्बानीको गाया तो पूरे देश के साथ पंडित नेहरू की आंखों से भी झर झर आंसू बह निकले...

भारत-चीन युद्ध के 55 साल बाद एक बार फिर डोकलाम विवाद को लेकर ड्रैगन के साथ संबंधों को तनावपूर्ण बताया जा रहा है...चीन की ओर से सिक्किम सेक्टर के डोकलाम में सड़क बनाने की कोशिशों पर भारत के साथ भूटान ने आपत्ति दर्ज़ कराई है. इसी को लेकर बीते कुछ समय से गतिरोध बना हुआ है. अब कूटनीति क्या कर रही है, क्या नहीं, मीडिया के लिए ये मायने नहीं रखता...उसके लिए युद्धोन्माद टीआरपी है तो वो इसके लिए कोई कसर नहीं छोड़ता...ऐसे में तर्क और विवेक के लिए गुंजाइश ही कहां बचती है...     

खैर इसे छोड़िए, अगर आप से कोई ये कहे कि भारत ने 1962 युद्ध में चीन को शिकस्त दी थी तो आपकी क्या प्रतिक्रिया रहेगी? तथ्यों को ताक पर रख कर सीबीएसई से मान्यता प्राप्त मध्य प्रदेश के स्कूलों में बच्चों को यही पढ़ाया जा रहा है…कक्षा 8 की संस्कृत की पाठ्य पुस्तक में यही लिखा है कि 1962 युद्ध में भारत ने चीन को हराया था... 
                               
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पाठ्य पुस्तक में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पर लिखे अध्याय सुकृतिकामें कहा गया है कि नेहरू के प्रयासों से भारत ने चीन को हराया था…   

श्री जवाहर लाल नेहरूशीर्षक वाले अध्याय में पहले प्रधानमंत्री और कांग्रेसी दिग्गज की उपलब्धियों का बखान किया गया है… साथ ही चीन के 1962 में आक्रमण के दौरान उनकी सूझबूझ को भी सराहा गया है. लिखा है- जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान चीन ने 1962 में भारत के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ा, नेहरू के प्रयासों से भारत ने चीन को हरा दिया…

पाठ्य पुस्तक को छापने वाले कृति प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड ने अपनी गलतीको मानते हुए इसे मानवीय भूलबताया है… प्रकाशन संस्थान के मुताबिक गलती को बीते महीने पकड़ा गया और इस संबंध में अपनी वेबसाइट पर शुद्धिपत्र भी जारी कर दिया गया है…   
प्रकाशन संस्थान का कहना है कि सुकृतिकाको विभिन्न राज्यों में विभिन्न कक्षाओं में पढ़ाया जा रहा है…मध्य प्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग ने इस त्रुटि को लेकर सीबीएसई को पत्र लिखा है…

अब देश के सबसे बड़े स्कूली बोर्ड के संचालित स्कूलों में पाठ्य पुस्तकों में बच्चों को इस तरह का इतिहास पढ़ाया जाएगा तो कैसे कह सकते हैं- पढ़ेगा इंडिया तभी तो आगे बढ़ेगा इंडिया

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बुधवार, 9 अगस्त 2017

द साइड इफैक्ट्स ऑफ ‘सुबह की सैर’…खुशदीप


सतीश सक्सेना भाई जी ने दुनिया को दिखा दिया है कि इनसान चाहे तो क्या नहीं कर सकता...रिटायरमेंट के बाद जब बूट उतार कर घर में आराम करने की बातें कही जाती हैं...वहीं अपने सतीश भाई ने जॉगिंग शूज कस कर दौड़ना शुरू किया...ऐसा दौड़े, ऐसा दौड़े कि देश की सभी जानी-मानी मैराथन दौड़ों में शानदार मौजूदगी दर्ज करा डाली...ये सिलसिला बदस्तूर जारी है...दुआ यही है कि इस क्षेत्र में अनगिनत उपलब्धियां सतीश भाई के नाम के साथ आने वाले दशकों में जुड़ें...

सतीश सक्सेना भाई जी की फेसबुक वॉल से साभार 

 सतीश भाई खुद तो दौड़ ही रहे हैं, औरों को भी इसके लिए लगातार प्रेरित कर रहे हैं...मैं पहले नोएडा में रहता था...सतीश भाई का सेक्टर भी मेरे सेक्टर के पास ही था...अब उनका जज़्बा देखिए...मुझे फिट करने के इरादे से पहले वे सुबह मेरे घर तक आते...फिर मुझे साथ लेकर ब्रिस्क वॉक के लिए पार्क ले जाते...सतीश भाई अच्छी तरह जानते थे कि मेरे जैसा जीव जो रात देर तक जागता है, उसके लिए खुद सुबह उठना आसान काम नहीं था...खैर सतीश भाई ने मेरा सुबह पार्क जाने का सिलसिला शुरू करा दिया...लेकिन फिर मैं नोएडा से घर बदल कर दिल्ली आ गया...अब सतीश भाई यहां तो सुबह आ नहीं सकते थे...इसलिए सुबह सैर पर जाने की फिर छुट्टी हो गई...लेकिन फेसबुक पर ये ज़रूर पढ़ता रहता था कि सतीश भाई के कहने पर कितने ही लोगों ने सुबह दौड़ को दिनचर्या का हिस्सा बना लिया है...कुछ ने जिम का रास्ता पकड़ लिया...ये देख खुद की सुस्ती पर कोफ्त होती थी...फिर एक दिन झटके में सुबह उठ कर पार्क पहुंच गया...अब बीते दो महीने से अभ्यास में हो गया है पार्क में 45 मिनट तक ब्रिस्क वॉक करना...इसका असर भी महसूस कर रहा हूं...

खैर ये तो रही अपनी बात...अब पार्क में क्या क्या होता है, वहां क्या क्या ऑब्सर्व किया वो बयां करने के लिए अपने आप में ही मज़ेदार किस्सा है...लगभग हर पॉर्क में ही एक वॉकिंग ट्रैक होता है...अब इस वॉकिंग ट्रैक पर ब्रिस्क वॉक करना या दौड़ना अपने आप में ही कला है...इसके लिए हर शख्स की अपनी स्पीड होती है, अपने नियम कायदे होते हैं...कुछ क्लॉक वाइस चलते हैं तो कुछ एंटी क्लॉक वाइस...अब ऐसे में कदम कदम पर क्लोज एनकाउंटर होना तो लाजमी है...

पार्कों में आपने ये भी नोटिस किया होगा कि युवा पीढ़ी कम ही दिखाई देती है...शायद इसलिए कि उनकी पहली पसंद जिम ही होते होंगे...पार्कों में अधेड़ों और बुजुर्गों का ही बोलबाला दिखता है...जिस पार्क में मैं जाता हूं, वहां सुबह एक कोने में पांच छह बेंचों पर बुजुर्ग पुरुषों का जमावड़ा रहता है...रोज उनके वैसे ही हंसी ठहाके गूंजते रहते हैं जैसे कि स्कूल-कॉलेजों के छात्र साथ बैठने पर होता है...हमउम्र होने की वजह से इनमें ज़रूर कुछ नॉटी बातें भी होती होंगी...अच्छा इनका एक रूटीन और भी है...इनके लिए वहीं बेंच पर हर दिन केतली में चाय आती है...प्लास्टिक के कपों में इनका चाय पीना तो ठीक है लेकिन ये साथ में ब्रेड पकौड़े भी साफ करते दिखते हैं...अब ये इनकी सेहत के लिए कितना बेहतर है यही बता सकते हैं....

पार्क के एक और कोने में इसी तरह बेंचों पर महिलाओं का भी डेरा होता है...ये कभी तालियां बजातीं राम राम करती दिखती हैं तो कभी घर-पड़ोस की बातों में मशगूल रहती हैं...

हां, कुछ महिलाएं और पुरुष खानापूर्ति के लिए पार्क के चक्कर भी लगाते हैं...लेकिन इनका भी उद्देश्य सैर से ज्यादा बतरस होता है...अब ये दो, तीन, चार के झुंड में वॉकिंग ट्रैक को पूरा घेर कर अपनी ही चाल से चलते हैं...अब पीछे वाला कितने ही पैर पटकता रहे...एक दिन तो गजब हुआ, मैं अपनी चाल से चल रहा था, ऐसे ही सामने से दो बुजुर्ग बाते करते हुए आते दिखे...अब मैं भी अपनी चाल चलता रहा, रूका नहीं...ऐसे में बुजुर्ग को रुकना पड़ गया...अब उलटे वो मुझ पर ही ताव खाने लगे कि मैं साइड में होकर नहीं जा सकता था क्या...अब मैंने उन्हें बताया कि मैंने जानबूझ कर ऐसा किया....सिर्फ इसलिए कि वो हर दिन जो करते आ रहे थे, वो कैसे गलत था...उस दिन के बाद अब ये जरूर हो गया कि वो बुजुर्ग बातें करते रहने के बावजूद मुझे देखकर रास्ता जरूर छोड़ देते हैं...

अब इसी पार्क में कुछ लोग कुत्ते लेकर भी घुमाने लाते हैं...अब ये बात दूसरी है कुछ भीमकाय कुत्ते अपने मालिकों को ही कई बार घसीटते साथ ले जाते हैं...कुछ लोग इतने निश्चिंत होते हैं कि कुत्तों का पट्टा भी छोड़ देते हैं...अब भले ही उन्हें देखकर दूसरे लोगों के प्राण सूखते रहें...ये तय करना भी कुत्तों का ही काम होता है कि उन्हें वॉकिंग ट्रैक पर शिट करनी है या पार्क की घास पर...अब ये कोई विदेश तो है नहीं जहां कुत्ता मालिकों को हाथ में थैली चढ़ाकर घूमना पड़ता है...जहां कुत्ता शिट करे वहीं हाथों हाथों उसे उठाना भी पड़ता है...स्वच्छ भारत की स्वच्छ तस्वीर में ऐसा होना अभी बहुत दूर की कौड़ी लगती है...

ये सब चल ही रहा होता है कि देश के कुछ भावी क्रिकेटर भी रबड़ की बॉल, बैट और विकेट लेकर पार्क के बीचोंबीच हाथ आजमाने पहुंच जाते हैं...अब आप को वॉकिंग ट्रैक पर चलते चलते पूरी तरह सतर्क हो कर चलना पड़ता है कि कहीं सुबह सुबह कोई होनहार आपके चेहरे पर ही बॉल ना चेप दे...

अब बताइए इतना सब कुछ होते हुए भी हर सुबह पार्क के 15 तेज चक्कर लगा देना मेरे जैसे आरामपंसद आदमी के लिए बड़ी उपलब्धि है या नहीं...

#हिन्दी_ब्लॉगिंग




शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

लो जी...लौट आया आपका मक्खन...खुशदीप

एक दौर ऐसा था जब हर पोस्ट पर स्लॉग ओवर ज़रूर देता था...ब्लॉगिंग के सिलसिले में विराम आया लेकिन स्लॉग ओवर का मक्खन हर किसी को याद रहा...साथ ही उसकी पत्नी मक्खनीबेटा गुल्ली और दोस्त ढक्कन भी...अब भी कई जगह से शिकायत मिलती रहती हैं कि मक्खन को कहां भेज दिया... 
आज उसी शिकायत को दूर करने की कोशिश कर रहा हूंमक्खन की हैट्रिक के साथ....





1. दूध के पैकेट और अंडे

मक्खनी पति मक्खन से...बाजार जाओ और दूध का एक पैकेट लेकर आना...हां, अगर अंडे दिखें तो 6 ले आना...

थोड़ी देर बाद मक्खन लौट आया...हाथों में दूध के 6 पैकेट थे...

मक्खनी गुस्से से...तुम जाहिल आदमी! दूध के 6 पैकेट क्यों लाए?”

मक्खनमुझे एक दुकान में अंडे दिखाई दिए थेइसीलिए....
(पक्का ऊपर वाले किस्से को आप दोबारा पढ़ रहे हैं)

2. मक्खन की डेली डोज़

मक्खन चेक अप के बाद डॉक्टर से बोला...

डॉक्टर साहब ड्रिंक तो कर सकता हूं ना...

डॉक्टर को मक्खन के भोलेपन पर तरस आ गया और उसने डेली 2 पैग की इजाज़त दे दी...

अगले दिन मक्खन ने 2 पैग लिए...2 के बाद तीसरा भी बनाने लगा तो दोस्त ढक्कन चिल्ला पड़ा...

ये क्या तीसरा कैसे ले रहा है?”

मक्खन मासूमियत के साथ...

2 पैग की पर्ची मैंने दूसरे डॉक्टर से भी ली है...

3. मक्खन तो मक्खन है....

बेरोज़गारी से मक्खन तंग आ गया तो उसने मोहल्ले में जरनल स्टोर खोल लिया...बदकिस्मती देखिए कि मक्खन के स्टोर खुलने के कुछ ही दिन बाद बड़ी कम्पनी का स्टोर भी सामने ही खुल गया...

बड़ी कंपनी के स्टोर ने बाहर बड़ा सा बैनर लगा दिया....मक्खन 100 रुपए

मक्खन ने ये देख एक बड़े से कागज़ पर लिख दिया....मक्खन 90 रुपए

अगले दिन कंपनी के स्टोर के बाहर बैनर था...मक्खन 80 रुपए

इसी चक्कर में दो दिन बाद कंपनी के स्टोर के बाहर टंगा था...मक्खन 60 रुपए

मॉर्निंग वॉक करने वाले एक बुजुर्ग सज्जन ये नज़ारा रोज़ देख रहे थे...उन्होंने मक्खन के स्टोर के पास रुक कर समझाना शुरू किया...

भाई मेरे, वो बड़ी कंपनी है...वो बिक्री बढ़ाने के लिए इस तरह के हथकंडे आजमाते हैं...वो घाटा झेलकर भी मक्खन बेच सकते हैं...लेकिन तू क्यों मक्खन के चक्कर में खुद को लुटाने पर तुला है...


मक्खन बुज़ुर्गवार के कान के पास झुका और पेटेंट स्माइल के साथ बोला...

चचा! मैं तो मक्खन बेचता ही नहीं...’  

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

क्या कांग्रेस को डिसमेंटल करने का वक्त आ गया है...खुशदीप


पड़ोस के देश पाकिस्तान में एक घटना हुई...मियां नवाज़ शरीफ़ को पनामा लीक मामले में कुनबे की कथित करतूतों को लेकर आख़िरकार इस्तीफ़ा देना पड़ा...ऐसी नौबत क्यों आई? ये इसलिए मुमकिन हुआ कि वहां क्रिकेट से राजनीति के कप्तान बने इमरान ख़ान ने शरीफ़ परिवार के कथित भ्रष्टाचार को लेकर लगातार आसमान सिर पर उठा रखा था...मजबूत विपक्ष की घेराबंदी के सामने घाघ राजनेता शरीफ़ की एक नहीं चली...आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट ने भी शरीफ़ को प्रधानमंत्री पद के लिए अयोग्य क़रार दे डाला...

यहां इस घटना का उल्लेख सिर्फ इसलिए किया कि विपक्ष मज़बूत हो तो क्या नहीं कर सकता...चलिए पाकिस्तान को छोड़िए, दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका की बात कीजिए...अमेरिका में बीते राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन डोनल्ड ट्रम्प और डेमोक्रेट हिलेरी क्लिंटन के बीच मुकाबले में आखिर तक कोई दावे के साथ नहीं कह सकता था कि जीत किसके हाथ लगेगी...अधिकतर सर्वे हिलेरी क्लिंटन के राष्ट्रपति बनने की संभावना जता रहे थे...नतीजे आए तो सब उलट गया...तमाम नेगेटिव बातों के बावजूद ट्रम्प व्हाइट हाउस में काबिज होने में कामयाब रहे...

अमेरिका के हाल-फिलहाल के चुनावी इतिहास पर नजर डाले तो वहां डेमोक्रेटिक पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी, दोनों के बीच ही हमेशा दिलचस्प लड़ाई होती रही है...हिलेरी क्लिंटन-डोनल्ड ट्रम्प मुकाबले को छोड़िए, 2000 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को याद कीजिए...तब डेमोक्रेट प्रत्याशी अल गोर लोकप्रिय वोट जीतने के बावजूद रिपब्लिकन जॉर्ज बुश से चुनाव हार गए थे...इस चुनाव में वोटों की गिनती कई दिन तक चलती रही थी...फ्लोरिडा प्रांत में वोटों की दोबारा गिनती पर क़ानूनी विवाद हुआ...अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने जॉर्ज बुश के हक़ में फैसला दिया...इस चुनाव को अमेरिकी इतिहास का सबसे विवादास्पद चुनाव माना जाता है...

यूं ही नहीं कहा जाता कि स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष का मजबूत होना अति आवश्यक होता है...विपक्ष ताकतवर रहे तो सत्ता पक्ष के निरंकुश होने की संभावना कम रहती है...दुर्भाग्य से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र यानि भारत में इस वक्त जो परिस्थितियां हैं, उसमें विपक्ष गौण होता जा रहा है...इसके लिए सत्ता पक्ष की साम-दाम-दंड-भेद की नीतियों से कहीं ज़्यादा ज़िम्मेदार खुद विपक्ष का रवैया है...विपक्ष के लुंजपुंज होने के लिए देश में अगर सबसे अधिक ज़िम्मेदार किसी पार्टी को ठहराया जा सकता है तो वो है ग्रैंड ओल्ड पार्टी यानि कांग्रेस...



1984 लोकसभा चुनाव में 415 सीट जीतने वाली कांग्रेस 30 साल बाद 2014 में निचले सदन में क्यों महज 44 सीटों पर सिमट गई...होना तो ये चाहिए था कि कांग्रेस गहराई से आत्मावलोकन करती और जहां जहां पार्टी संगठन में खामियां थीं, उन्हें दूर करती...

ऐसा नहीं कि कांग्रेस के पास ज़मीन से जुड़े नेता या कुशाग्र दिमाग नहीं हैं...ऐसा नहीं होता तो अमरिंदर सिंह पंजाब के कैप्टन नहीं बन पाते...या कपिल सिब्बल जैसे दिग्गज वकील जो अपने तर्कों से अब भी सुप्रीम कोर्ट में कई मुद्दों पर सरकार को बैकफुट पर जाने को मजबूर कर देते हैं...कांग्रेस की ओर से अपनी शाख पर खुद ही कुल्हाड़ी मारने की क्लासिक मिसाल 2012 में दी गई...तब प्रणब मुखर्जी जैसे तमाम प्रशासनिक अनुभव वाले संकट-मोचकनेता को राष्ट्रपति भवन भेज दिया गया...अब कांग्रेस के लिए ये दुर्योग ही है कि प्रणब दा के राजनीतिक पटल से अलग होते ही कांग्रेस की दुर्दशा का ऐसा दौर शुरू हुआ जो इमरजेंसी के बाद इंदिरा गांधी की हार में भी नहीं देखा गया था...खैर इंदिरा गांधी तो तीन साल बाद ही फिर सत्ता में आ गई थीं...लेकिन क्या अब ऐसा हो पाएगा? इसका सीधा जवाब देने की स्थिति में कांग्रेस का कोई नेता भी नहीं है...

पहले उत्तराखंड में, फिर गोवा में, मणिपुर में, अब गुजरात में कांग्रेस के विधायक पाला बदल कर बीजेपी का दामन थाम रहे हैं तो ये किसका कसूर हैअहमद पटेल जैसे दिग्गज कांग्रेसी को गुजरात से राज्यसभा में पहुंचने के लिए लाले पड़े हुए हैं तो इसका जवाब खुद कांग्रेस को ही ढूंढना है...इसके लिए विधायकों को दूसरे राज्य में ले जाकर रिसॉर्ट में ठहराने या राज्यसभा चुनाव में नोटा जैसे प्रस्ताव पर हाय तौबा मचाने से कुछ नहीं होगा...ना ही बीजेपी को घर में सेंध लगाने के लिए दोष देते रहने से स्थिति में बदलाव होगा...अगर राजनीति में कोई विरोधी है तो वो तो अपनी लकीर बड़ी करने के लिए आपकी जड़ें काटने की कोशिश करेगा ही...ये तो आप पर है कि कैसे अपने किले को बचाए रखते हैं...

कांग्रेस को ये नहीं भूलना चाहिए कि देश को आज़ादी मिलने से पहले उसका क्या स्वरूप था? ये एक मास मूवमेंट (जन आंदोलन) था, तब इसके नेताओं का अपना खुद का कोई स्वार्थ नहीं था...शायद इसीलिए बापू ने देश को आजादी मिलने के बाद कहा था कि कांग्रेस को अब डिसमेंटल (खत्म) कर देना चाहिए...बापू को पता था कि सत्ता ऐसा ज़हर है जो अपने साथ भ्रष्टाचार की बीमारी को भी साथ लाएगा...

कांग्रेस में एक ही शख्स दोबारा जान फूंक सकता है और वो है...

कांग्रेस को रिवाइव करना है तो एक बात याद रखनी चाहिए कि अब भी ये करने का मादा एक शख्स में ही है...और वो हैं महात्मा गांधी...गांधी बेशक 69 साल पहले इस दुनिया को अलविदा कह गए...लेकिन गांधी जो विचार है वो अमर अजर है...कांग्रेस को देश के लोगों के दिलों में खोई हुई जगह वापस पानी है तो गांधीगीरी से अच्छा रास्ता और कोई नहीं हो सकता...चुनावी राजनीति को भूल कांग्रेस को सिर्फ इसी रणनीति पर काम करना चाहिए कि कैसे वो लोगों के दुख-दर्द को कम कर सकती है...गंगा जमुनी तहजीब, जो भारतीयता का सार रहा है, कैसे उसे मजबूत करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देती है...

अगर कांग्रेस ये सोचती है कि बीजेपी की खामियां, जनविरोधी नीतियां उसे खुद ही सत्ता में वापस ला देगी तो ये उसके मुगालते के सिवा और कुछ नहीं है...अब कोई दूसरे को हराने के लिए आपको वोट नहीं देगा...बल्कि वोट देने वाला पूछेगा कि आप में खुद ऐसा क्या है जो आपको जिताया जाए...

इस फ़र्क को जितनी जल्दी समझ लिया जाएगा उतना ही इस ग्रैंड ओल्ड पार्टी के लिए अच्छा रहेगा...जितना वो सड़क पर गरीब-गुरबों, किसान-मजदूरों, मध्यम वर्ग, नौकरीपेशा लोगों के लिए लड़ाई लड़ती दिखेगी, भ्रष्टाचारियों का गांधीगीरी से नाक में दम करेगी, बिग ब्रदर वाली अकड़ छोड़ सभी विरोधी दलों को एकजुट करेगी, उतनी ही उसके लिए संभावनाएं बढ़ेंगी...अगर ऐसा नहीं किया और पार्टी मौजूदा ढर्रे पर ही चलती रही तो ये ठीक वैसा ही है जैसे कि कोई संथारा ले लेता है...और अगर कोई खुदकुशी करने की ठान ही ले तो फिर उसका ऊपर वाला ही मालिक है...

स्लॉग ओवर

(नोट- 2009 लोकसभा चुनाव और कई राज्यों में बीजेपी की हार के बाद ये स्लॉग ओवर लिखा था लेकिन अब परिस्थितियां ऐसी हैं कि बीजेपी की जगह कांग्रेस ने ले ली है)


जिस तरह कांग्रेस ने खुद को बुरे दौर में फंसा लिया है, उस पर हरियाणा का एक किस्सा याद आ रहा है...एक बार एक लड़की छत से गिर गयी, लड़की दर्द से बुरी तरह छटपटा रही थी, उसे कोई घरेलु नुस्खे बता रहा था तो कोई डॉक्टर को बुलाने की सलाह दे रहा था, तभी सरपंच जी भी वहां आ गए...उन्होंने हिंग लगे न फिटकरी वाली तर्ज़ पर सुझाया कि लड़की को दर्द तो हो ही रहा है लगे हाथ इसके नाक-कान भी छिदवा दो, बड़े दर्द में बच्ची को इस दर्द का पता भी नहीं चलेगा, वही हाल फिलहाल कांग्रेस का है... 2014 लोकसभा चुनाव के बाद से इतने झटके लग रहे है कि इससे ज्यादा बुरे दौर कि और क्या सोची जा सकती है...ऐसे में पार्टी कि शायद यही मानसिकता हो गयी है कि जो भी सितम ढहने है वो अभी ही ढह जायें, कल तो फिर उठना ही उठना है...आखिर उम्मीद पर दुनिया कायम है...

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