शुक्रवार, 26 जून 2015

जापानी बुलेट ट्रेन की सफ़ाई, हमारी ट्रेन की धुलाई...खुशदीप

अगर सब सही रहा तो भारत की पहली बुलेट ट्रेन यात्रियों के साथ 2023 तक दौड़ने लगेगी। मुंबई-अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन कॉरिडोर बनाने में एक लाख करोड़ रुपये खर्च होंगे। अभी दोनों शहरों के बीच 534 किलोमीटर की दूरी नापने में सबसे फास्ट ट्रेन शताब्दी एक्सप्रेस को 7 घंटे लगते हैं। बुलेट ट्रेन की अधिकतम स्पीड 320 किलोमीटर होगी। यानी पौने दो घंटे से भी कम समय में मुंबई से अहमदाबाद पहुंचा जा सकेगा। किराया एसी 1 सफ़र के किराये से बस डेढ़ गुणा होगा। आज के हिसाब से देखा जाए तो 2800 रुपये। अमीर आदमी चाहें तो दोनों शहरों के बीच विमान की जगह बुलेट ट्रेन से ही डेली पैसेन्जरी भी कर सकेंगे। मंथली पास बनवा लेंगे तो और सस्ता पड़ेगा।

जापान में बुलेट ट्रेन को तोहोकू शिन्कान्सेन (हायाबूसा ट्रेन) कहा जाता है। इन ट्रेनों को जापान की प्रगति और कुशलता का पर्याय माना जाता है। जापान में ये ट्रेन ही फास्ट नहीं है बल्कि इनकी देखरेख और साफ़-सफ़ाई से जुड़ा स्टाफ भी इतनी द्रुत गति से काम करता है कि आप की आंखें खुली की खुली रह जाएंगी। इस संबंध में एक विडियो आजकल वायरल हो रहा है।

अमेरिकी पत्रकार चार्ली जेम्स के तैयार किए इस विडियो में देखा जा सकता है कि एक ट्रेन का सफ़र खत्म होने के बाद दूसरा सफ़र शुरू करने में सिर्फ 7 मिनट मिलते हैं। इन 7 मिनट में ही ट्रेन को कैसे चकाचक कर दिया जाता है, आप इस विडियो में देख सकते हैं। जापान के तोक्यो स्टेशन से हर दिन 300 बुलेट ट्रेन रवाना होती हैं, जिनसे 4 लाख यात्री यात्रा करते हैं।

ये विडियो यू ट्यूब पर जनवरी में डाला गया था। तोक्यो मेट्रोपॉलिटन गर्वंमेंट ने जेम्स और कई अंग्रेज़ी भाषी पत्रकारों को शहर आने का न्योता दिया था। लेकिन ये विडियो हाल में वायरल हुआ, जब भारतीय और फ्रेंच वेबसाइट ने इसे शेयर किया। अब तक बीस लाख से ज़्यादा लोग इस विडियो को देख चुके हैं।

विडियो अपलोड करने वाले पत्रकार जेम्स का कहना है कि मैं ये पकड़ना चाहता था कि जापानी लोग अपने काम में कितना आनंद और कितना गर्व महसूस करते हैं। कितनी बारीकी और कितनी तेज़ी से ये सुनिश्चित करते हैं कि लोगों को ट्रेन में सफ़र करना सुखद लगे। समयबद्ध ढंग से काम पूरा होने के बाद कतार में लग कर क्लीनिंग स्टाफ का झुकना अपने आप में ही उनके समर्पण की गवाही देता है। देखिए ये विडियो-



आशा करता हूं कि हम भारतीयों में भी काम के लिए ऐसा समर्पण और तेज़ी शीघ्र देखने को मिलेगी। फिलहाल तो ये स्लॉग ओवर मुलाहिजा फरमाइए।

स्लॉग ओवर 

भारतीय रेल में सफ़र के साथ-साथ मुफ़्त स्नान की भी सुविधा-


उम्मीद करता हूं कि हमारे देश में भी ये तस्वीर शीघ्र ही पलटेगी। क्यों...सुन रहें हैं ना प्रभु। मेरा आशय रेल मंत्री सुरेश प्रभु से है। ये वही सुरेश प्रभु हैं जिन्हें 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर कोच्चि में शवासन करते-करते झपकी लग गई थी। और इस नज़ारे की फोटो किसी ने ट्वीटर पर डाल दी और वो सोशल मीडिया पर वायरल भी हो गई।



प्रभु चैन से सोना है तो जाग जाइए... 

मंगलवार, 23 जून 2015

योगा इज़ रॉकिंग...इट्स न्यू फिनॉमनन...इट्स रिइन्वेन्टेड...खुशदीप



योग अब योगा हो गया है। योग जो कभी ऋषि-मुनियों तक सीमित था। अब मैंगो मैन (आम आदमी) की पहुंच में आ गया है। ये बात अलग है कि लालू प्रसाद कहते हैं कि योग की ज़रूरत गरीबों को कतई नहीं है। लालू के मुताबिक योग की ज़रूरत उन लोगों को है जिनके शरीर पर चर्बी चढ़ी हुई है। जो गरीबों का पैसा खाकर तोंद वाले हो गए हैं। सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी तो एक कदम और आगे बढ़ गए। उन्होंने योग के आसनों की तुलना कुत्ते की हरकतों से कर डाली। उन्होंने रविवार को भुवनेश्वर में कहा, जब कुत्ता उठता है तो शरीर के अगले हिस्से को खींचता है और पैर को बढ़ाता है। इसके साथ ही वह गहरी सांस लेता है।येचुरी को इस तरह की टिप्पणी के लिए ट्विटर पर बहुत बुरा-भला भी सुनना पड़ा।

लालू हों या येचुरी, दोनों का कहने का लबोलुआब यही था कि वे योग के विरोधी नहीं है। योग जीवन को संवारने में मदद करता है। लेकिन इससे पहले ज़रूरी है कि भूख और अकाल को दूर किया जाए। योग के फायदों को कोई नकार नहीं सकता। ये सिर्फ देश में ही नहीं विदेश में भी माना जाने लगा है। लेकिन योग से बड़ी कुछ और भी प्राथमिकताएं हैं समस्याओं से भरे इस देश में। योग का राजनीतिकरण जितना ग़लत है, उतना ही ग़लत है योग को एक धर्म विशेष से जोड़ कर देखना। हां इतना ज़रूर सच है कि योग प्राचीन भारत की देन था। योगा आधुनिक इंडिया की विषयवस्तु है। 

ख़ैर ये तो रहा योग का गंभीर पहलू। अब आइए कुछ काल्पनिक चीज़ों पर विचार किया जाए। जैसे कि-

शहरों और योजनाओं के नाम जैसे किसी पार्टी विशेष के राज में उसके नेताओं पर रख दिए जाते हैं, ऐसा ही योग  के आसनों के साथ होने लगे तो...मसलन कांग्रेस के राज में जवाहरासन, इंदिरासन, राजीवासन आदि आदि...एनडीए के राज में नमामि योगा, अटलासन आदि। कुछ आसन दिवंगत महापुरुषों जैसे कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय को भी समर्पित किए जा सकते हैं।

आम आदमी पार्टी का योग अपने करेक्टर के मुताबिक अलग छाप लिए होगा। धरने के लिए इस पार्टी के हर सदस्य के पास चटाई पहले से ही तैयार रहती है। आप के नेताओं के आसन अलग तरह होंगे। ये गुस्से में नाक में हवा भर कर निकालने में माहिर हैं। ये साथ ही बिना बोले हवा में भी हाथ-पैर चलाएंगे। ये ऐसा कर विरोध जाहिर करेंगे कि केंद्र सरकार के कहने पर एलजी ने उन्हें योग के लिए जगह देने में पक्षपात किया। इन्होंने योग वाली जगह पर तख्तियां भी साथ टांग लीं। जिन पर लिखा था...यही तो स्कैम है, ऐसे नहीं चलेगा।

मुलायम सिंह यादव की पार्टी का योग समाजवादी होगा लेकिन यहां योग के लिए चटाई हासिल करने की सिर्फ एक योग्यता ज़रूरी होगी...मुलायम सिंह के परिवार का सदस्य होना।

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की पार्टी के सदस्य योग सिर्फ एक आसन का ही प्रयोग करेंगे। साष्टांग दंडवत आसन।

ये तो पढ़े आपने योग के राजनीतिक पहलू। अब जानिए योग को लेकर खुफ़िया पत्रकारों की टीम की ओर से कुछ ऐसी जानकारियां, जिन्हें जानकर अर्णब गोस्वामी की इन्वेस्टिंग टीम भी रश्क करने लगेगी कि वो अपने सूत्रों से ऐसी ब्रेकिंग न्यूज़ क्यों नहीं जुटा पाए।

रिपोर्ट नंबर 1

योग रंगभेदी साज़िश है। सदियों श्वेतों ने इस दुनिया पर राज किया है। अब गेहूंआ और अश्वेतों ने इसका तोड़ निकाला है। सूर्य के साथ इसे जोड़ कर पेश किया। सूर्य के नीचे योग किया जाएगा तो रंग काला होगा। योग का प्रचार जैसे जैसे दुनिया में होगा, श्वेतों की संख्या कम होती जाएगी और गेहूंआ-अश्वेतों का एक दिन दुनिया में बोलबाला हो जाएगा।

(नोट- फेयर एंड लवली क्रीम के निर्माताओं ने इस प्रोजेक्ट को बैक करने का फैसला किया है। जितने लोग श्याम वर्ण के होंगे, उतनी ही उनकी क्रीम की बिक्री ज़्यादा होने की संभावनाएं बनेंगी।)

रिपोर्ट नंबर 2
आडवाणी जी बहुत खुश हैं। खुश भी क्यों ना हों, आख़िर आपातकाल के लौटने की उनकी आशंका सच जो साबित होती जा रही है। आडवाणी ने इसके लिए मोदी सरकार के योग दिवस कार्यक्रम का हवाला दिया। बीजेपी के ओरिजनल लौहपुरुष ने कहा कि आपातकाल में घुटनों पर झुकने के लिए कहा जाता तो हुक्मरानों के विश्वासपात्र झुकने की जगह धरती पर रेंगने लगते थे। योग के ज़रिए भी ऐसा ही अभ्यास कराया जा रहा है।

रिपोर्ट नंबर 3
योग दिवस पर राजपथ पर योग के लिए 35,985 लोग जुटे। इस कारनामे का गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में एंट्री पाना निश्चित है। इससे पहले 19 नवंबर 2005 को ग्वालियर में 29,973 छात्रों ने सामूहिक योग कर गिन्नीज़ बुक में जगह पाई थी। राजपथ पर सामूहिक योग जैसे कार्यक्रम के पीछे सत्ता पक्ष का एक और मकसद है। इस तरह के कार्यक्रमों से बल्क में ऑक्सीजन खींच कर विरोधियों की सांस बंद की जा सकती है।


(डिस्क्लेमर- ये पोस्ट योग का निर्मल हास्य आसन है, कोई इसे गंभीरता से लेता है तो ये उसके अपने रिस्क पर होगा)

रविवार, 21 जून 2015

नेताजी की इमेज ब्रैंडिंग के मायने....खुशदीप



Early to bed, early to rise, work like hell and advertise…

(जल्दी सोओ, जल्दी उठो, जहन्नुम की तरह काम करो और प्रचार करो...)

अब ये चाहे Laurence J. Peter ने कहा हो या केबल न्यूज़ नेटवर्क (सीएनएन) के संस्थापक Ted Turner III ने, लेकिन ये मंत्र है अनमोल। आप किसी भी फील्ड में हों, यदि इस मंत्र का पालन करते हैं तो सफलता निश्चित है। इस वाक्य में work like hell  सबसे अहम है। यानी जहन्नुम की तरह हाड़तोड़ मेहनत। लेकिन देश की राजनीति में अब कुछ और ही नज़ारा देखने को मिल रहा है।

यहां काम तो जो हो रहा है, सो हो रहा है। लेकिन प्रचार में दिन-रात कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। अब चाहे ये केंद्र सरकार हो या किसी और राज्य की सरकार। अपना ढिंढोरा पीटने में कोई पीछे नहीं है। ढिंढोरा भी पार्टी का नहीं, व्यक्ति-विशेष का ही पीटा जाता है।

आपको याद होगा कि हाल में सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी विज्ञापनों को लेकर आदेश जारी किया था। इस आदेश में  कहा गया था सरकारी विज्ञापन लोगों तक जानकारी पहुंचाने के लिए हैं ना कि किसी नेता की छवि बनाने के लिए। सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी विज्ञापनों में नेताओं के फोटो के इस्तेमाल पर भी पाबंदी लगा दी। सिर्फ राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और देश के मुख्य न्यायाधीश को ही इस आदेश से अलग रखा गया। हालांकि ये तय करना इन तीनों पर ही छोड़ दिया गया कि किसी विज्ञापन में उनकी तस्वीर छपे या नहीं। ये बात अलग है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद भी तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इसका उल्लंघन करते दिखे। इनकी फोटो के साथ इनका गुणगान करने वाले कई-कई पन्नों के विज्ञापन छपे। हालांकि अब विज्ञापनों में फोटो तो नहीं दिख रही है। लेकिन इसका भी तोड़ ढूंढ लिया गया है। जैसे कि नोएडा के व्यस्तम इलाके जीआईपी मॉल के पास उत्तर प्रदेश सरकार का बड़ा सा सिनेमा के स्क्रीन जितना होर्डिंग लगा है। जिस पर लगातार अखिलेश और उनकी सरकार के कामकाज का गुणगान करने वाली फिल्में चलती रहती हैं। इससे वाहन चलाने वालों का ध्यान बंटने से दुर्घटना का कितना ख़तरा है, इसकी ओर किसी का ध्यान नहीं है।

दिल्ली की केजरीवाल सरकार का आजकल टीवी चैनलों पर दिखाया जा रहा, एक विज्ञापन भी विवाद के घेरे में है। इस विज्ञापन में बेशक केजरीवाल का चेहरा नहीं दिखाया गया हो, लेकिन इसके पात्र 11 बार केजरीवाल का नाम लेते हैं। ज़ाहिर है कि ये व्यक्ति विशेष की छवि चमकाने की कवायद ही है। बीजेपी इस विज्ञापन को वापस ना लिए जाने पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने की बात कर रही है। अब ये बात दूसरी है कि बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार का सबसे बड़ा हथियार ही प्रचार है।

केंद्र सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी का अंदाज़ थोड़ा जुदा है। सब जानते हैं कि मोदी से बड़ा इवेंट मैनेजर इस देश में कोई और नेता नहीं है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन इसकी बानगी है। मोदी सरकार का एक साल पूरा हुआ तो किस तरह ताबड़तोड़ रैलियां और मीडिया पर प्रचार हुआ, ये भी किसी से छुपा नहीं है। मीडिया मैनेजमेंट भी मोदी सरकार की बड़ी खूबी है। इस मामले में केजरीवाल अनाड़ी साबित हुए हैं। केजरीवाल की टीम में कुछ  अनुभवी पत्रकारों के होने के बावजूद मीडिया से संबंधों में तल्खी घटी नहीं बल्कि और बढ़ी। अब यही वजह है कि केजरीवाल सरकार जनता तक जो बात पहुंचाना चाहते हैं उसके लिए सरकारी खर्च पर धुंआधार प्रचार का सहारा लेना पड़ रहा है।

ये प्रचार ठीक उसी तरह का है जैसे कि चुनावी साल में सत्तारूढ़ पार्टियां इस देश में बरसों से करती रही हैं। चुनाव के दौरान सत्तारूढ़ दल ही नहीं विपक्ष भी किस तरह कॉरपोरेट के दम पर प्रचार पर बेतहाशा पैसा खर्च कर सकता है ये हमने पिछले साल लोकसभा चुनाव में देखा था। राजनीतिक दलों को कॉरपोरेट फंडिंग होती है, ये शाश्वत सत्य है। ये कॉरपोरट किस तरह फिर इसे भुनाते हैं, ये समझना भी कोई रॉकेट साइंस नहीं है।

लेकिन अब चुनाव बेशक चार-साढ़े चार साल दूर हो फिर भी सत्तारूढ़ दलों का ज़ोरदार प्रचार का ये नया ट्रेंड है। इमेज बिल्डिंग पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है...वो भी हमारे-आप जैसे टैक्सपेयर्स का पैसा...दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच इगो की लड़ाई के बीच दिल्ली के आम आदमी की हालत ऐसी है जैसे कि चक्की के दो पाटों में उसे पीसा जा रहा है। जितना ध्यान मूंछ की इस लड़ाई पर दिया जा रहा है, इतना ही ध्यान अगर आम लोगों के हालात सुधारने पर दिया जाए तो यकीन मानिए इस तरह प्रचार की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। बस सबको याद रखना होगा-

Work like hell to make the country a paradise (for its people)

स्लॉग ओवर

मक्खन घड़ी खरीदने के लिए बाज़ार गया।
दुकानदार से उसने घड़ी के दाम पूछे।
दुकानदार ने कहा....25 रुपये।
मक्खन...इतनी सस्ती, तुम इसमें कमाओगे क्या?

दुकानदार...एक बार ले तो जाओ, कमाऊंगा तो बाद में, जब बार-बार यहां आओगे।

गुरुवार, 18 जून 2015

राजदीप ने एमएसजी प्रकरण में ग़लती मानी...खुशदीप

राजदीप सरदेसाई। वो पत्रकार जो किसी परिचय के मोहताज नहीं है।

सुधीर एस रावल। वो पत्रकार जिनके नाम से गुजरात में हर कोई वाकिफ़ है।



राजदीप को मैं पत्रकारिता के नाते ही जानता हूं, कभी रू-ब-रू होने का मौका नहीं मिला। सुधीर एस रावल से मैं बहुत अच्छी तरह परिचित हूं। वे बड़े भाई की तरह मेरा मार्गदर्शन करते हैं। पेशे से जुड़ा सवाल हो या पारिवारिक समस्या, मैं बिना किसी हिचक उन्हें बताता हूं। मुझे ये कहने में तनिक भी संकोच नहीं कि मेरे कठिनाई के वक्त में जिस तरह उन्होंने मेरा साथ दिया, उसे ताउम्र नहीं भुला सकता। विपरीत परिस्थितियों में भी किस तरह मनोबल ऊँचा रखा जाता है, ये मैंने उनसे सीखा। सुधीर एस रावल से मैंने सीखा कि मुश्किल हालात में होने के बावजूद उसूलों से कभी समझौता नहीं करना चाहिए।

राजदीप पिछले दिनों अहमदाबाद में थे तो सुधीर एस रावल ने उन्हें घेर लिया। राजदीप जो खुद तमाम बड़ी हस्तियों का इंटरव्यू लेते हैं, बड़ी मुश्किल से अपना इंटरव्यू देने के लिए तैयार हुए। वी टीवी के ऑफ द रिकॉर्ड’  कार्यक्रम के लिए ये इंटरव्यू हुआ। राजदीप ने साफ़गोई से तमाम सवालों का जवाब दिया। इस इंटरव्यू में हर मुद्दे को छुआ गया...

राजदीप का गुजरात कनेक्शन, देश में पत्रकारिता का परिदृश्य, नरेंद्र मोदी, मेडिसन स्क्वेयर गार्डन (एमएसजी) की घटना, गुजरात दंगे, मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल का मूल्यांकन, राजदीप की पारिवारिक बातें(पिता टेस्ट क्रिकेटर दिलीप सरदेसाई, पत्नी सागरिका घोष, डॉक्टरी और लॉ कर रहे बच्चे), किशोर-रफ़ी के गानों के लिए दीवानगी और राजदीप का अब क्रिकेट पर किताब लिखने का इरादा।

ये इंटरव्यू गुजराती-हिंदी में लिया गया लेकिन किसी भी हिंदीभाषी को आसानी से समझ आ सकता है। इंटरव्यू में हिंदी और अंग्रेज़ी में सब-टाइटल भी दिए गए हैं। आज पत्रकारिता जिस दौर से गुज़र रही है उसमें हर युवा पत्रकार को ये इंटरव्यू ज़रूर देखना चाहिए। सीखना चाहिए कि बिना शोर मचाए, कितनी सरलता और सहजता से सवाल पूछे जा सकते हैं। जवाब दिए जा सकते हैं। इस तरह कि हर देखने-सुनने वाले को नदी के सुगम प्रवाह की तरह सब समझ आता चला जाए।

शुक्रिया राजदीप। शुक्रिया सुधीर एस रावल।


बुधवार, 17 जून 2015

किस्सा तानाशाही के मिज़ाज का...खुशदीप



तानाशाही का एक मिज़ाज होता है। तानाशाह के सवाल पूछने पर या डांटने पर चुप रहने की ही रिवायत होती है। इसके ख़िलाफ़ जाकर कोई जवाब देने की हिमाकत कर देता है तो उसे भारी क़ीमत तो चुकानी ही पड़ेगी। इस पर आपको एक मज़ेदार किस्सा सुनाऊं उससे पहले मौजूदा वक्त के सबसे क्रूर तानाशाह किम जोंग उन का ज़िक्र करना चाहूंगा।

जी हां, सही पकड़े हैं। उत्तर कोरिया के मौजूदा शासक किम जोंग उन। इस तानाशाह ने अपने रक्षा मंत्री ह्यॉन योंग चोल को इसी साल 30 अप्रैल को सरेआम तोप (एंटी एयर क्राफ् गन) से उड़ा दिया। चोल का कसूर था तो इतना कि तानाशाह शासक की मौजूदगी में उन्हें झपकी आ गई थी। इसके बाद चोल से कुछ पूछा गया तो उन्होंने जवाब देने का भी कसूर कर डाला। क्या हश्र हुआ, पूरी दुनिया ने देखा। 66 वर्षीय चोल वो व्यक्ति थे जो किम जोंग उन ही नहीं बल्कि उनके पिता किम जोंग इल के भी बरसों तक विश्वासपात्र रहे थे।

किम जोंग उन ने 12 दिसंबर 2013 को अपने फूफा जैंग सोंग थाएक को भी उनके 5 सहयोगियों के साथ गद्दारी' के आरोप में नंगा करके 120  शिकारी कुत्तों के सामने डलवा दिया था। इन कुत्तों को तीन दिन से भूखा रखा गया था।

अब सुनाता हूं वो किस्सा जिसका पोस्ट के शुरू में वादा किया था। एक तानाशाह राजा ने 10 जंगली कुत्ते पाल रखे थे। राजा को अपने किसी मंत्री की बात पसंद नहीं आती थी तो उस मंत्री को कुत्तों के सामने डाल दिया जाता था। ऐसे ही एक बार एक मंत्री की राय तानाशाह को पसंद नहीं आई। तानाशाह ने मंत्री को फौरन कुत्तों के आगे डालने का फ़रमान सुना डाला। मंत्री ने तानाशाह से कहा, मैंने 10 साल आपकी खिदमत की और आपने ये सिला दिया। मंत्री ने साथ ही गुहार लगाई कि सज़ा देने से पहले उसे कम से कम 10 दिन की मोहलत तो दी जाए।

तानाशाह मान गया। इसके बाद मंत्री उस बाड़े के प्रभारी के पास गया जहां जंगली कुत्तों को रखा गया था। मंत्री ने प्रभारी से कहा कि वे इन कुत्तों की दस दिन सेवा करना चाहता है। प्रभारी ये सुनकर हैरान हुआ। लेकिन मंत्री के बहुत आग्रह करने पर मान गया। मंत्री ने कुत्तों को खाना देने के साथ उनकी 10 दिन तक हर तरीके से देखभाल की। 10 दिन बीत गए तो मंत्री को सज़ा देने का वक्त आ गया।

तानाशाह राजा ने मंत्री को कुत्तों के आगे डालने का आदेश दिया। लेकिन खचाखच भरे सभागृह में जो हुआ उसे देखकर राजा समेत सब हैरान रह गए। सभी 10 जंगली कुत्ते मंत्री पर हमला करने की जगह उसके आगे पीछे दुम हिला रहे थे। कुछ प्यार से उसके पैर चाट रहे थे। परेशान राजा ने जानना चाहा कि माज़रा क्या है। खूंखार कुत्ते ऐसा बर्ताव क्यों कर रहे हैं?  इस पर मंत्री ने कहा...मैंने सिर्फ 10 दिन इन कुत्तों की सेवा की और इन्होंने उसे याद रखा। लेकिन आपकी मैंने 10 साल जी-जान से खिदमत की लेकिन मेरी एक ग़लती के आगे वो सब कुछ भुला दिया गया।

आख़िर तानाशाह को अपनी ग़लती का अहसास हो ही गया...

तानाशाह ने आदेश दिया कि मंत्री को भूखे भेड़ियों के सामने डाला जाए।

मॉरल ऑफ द स्टोरी- एक बार शासक वर्ग जो सोच लेता है, चाहे वो ग़लत ही सही, उसे अमली जामा पहनाकर ही छोड़ता है।





 

मंगलवार, 16 जून 2015

‘मन का लैंडस्केप' एक बार पढ़ें ज़रूर...खुशदीप


ब्लॉगिंग में मेरे छह साल पूरे होने को आ गए हैं। सोशल मीडिया के कई मंचों को आज़माने के बाद मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि खुद को व्यक्त करने के लिए ब्लॉगिंग से अच्छा मंच और कोई नहीं है। लेकिन इसका ये अर्थ भी नहीं कि फेसबुक और ट्विटर जैसे मंचों की उपयोगिता नहीं है। ये भी सशक्त माध्यम हैं। आपको इन सभी माध्यमों का उचित सामंजस्य के साथ इस्तेमाल करना आना चाहिए।


ख़ैर यहां मैं ब्लॉगिंग की बात कर रहा हूं। विशेष तौर पर हिंदी ब्लॉगिंग की। छह साल की ब्लॉगिंग के बाद मैं कह सकता हूं कि यहां अब भी अधिकतर वही लोग लिख रहे हैं, पढ़े जा रहे हैं, जो इस सदी के पहले दशक में यहां प्रतिस्थापित हो चुके थे। हिंदी ब्लॉगिंग को धार देने के लिए ज़रुरी है कि बड़ी संख्या में नवहस्ताक्षर भी इसके साथ जुड़ें। 

मुझे खुशी है कि मैंने पहले हिंदी ब्लॉगिंग के तीन नवहस्ताक्षरों http://ishwarkipehchan.blogspot.in/   

http://rasbatiya.blogspot.in/ 

और

http://www.nayidiary.com/

का परिचय कराया था और अब वे तीनों ही अपनी सशक्त लेखनी से विशिष्ट पहचान बना चुके हैं। 

ऐसे ही अब एक और नवहस्ताक्षर का परिचय हिंदी ब्लॉग जगत से कराने जा रहा हूं। मुझे उम्मीद ही नहीं पूरा भरोसा है कि ये ब्लॉग भी अपने लेखन की सहज शैली से हिंदी ब्लॉगिंग में शीघ्र ही अपना एक अलग स्थान बना लेगा। मेरे कहने पर एक बार इस ब्लॉग को पढ़ें अवश्य। ब्लॉग का नाम ही अपने आप में बहुत कुछ कहता है- 



कृपया इस ब्लॉग पर अपनी टिप्पणी से मार्गदर्शन करना नहीं भूलिएगा।


  

रविवार, 14 जून 2015

क्या दाढ़ी और टोपी से ही कोई ‘सच्चा मुसलमान’…खुशदीप


दोस्तों, मैं धर्म पर कुछ कहने से अक्सर बचता हूं। मेरा मानना है कि इस दुनिया में सिर्फ़ दो तरह के इनसान होते हैं- अच्छे और बुरे। और ये दोनों तरह के ही इनसान किसी भी धर्म में हो सकते हैं। मेरे जितने मित्र हिंदू हैं उतने ही मुस्लिम भी हैं। कट्टरवादिता किसी भी धर्म में हो, मैं उसका समर्थन नहीं करता। इनसान धर्म, जाति, नस्ल, क्षेत्र के आधार पर नहीं बल्कि उसके कर्म के आधार पर पहचाना जाना चाहिए। ऐसा कोई धर्म नहीं जो इनसानियत का पाठ नहीं पढ़ाता हो। दूसरों का भला करना ना सिखाता हो। दूसरे धर्म के लोगों का सम्मान नहीं करने की बात कहता हो। मैं हिंदू हूं और इससे सही परिप्रेक्ष्य में मिले संस्कारों को आत्मसात कर पाया, इसके लिए स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूं। मैं प्रार्थना इसलिए करता हूं कि प्रलोभनों से बचा रहा हूं और मुझसे कोई ग़लत काम ना हो। किसी दूसरे का मन ना दुखाऊं। हर इनसान को बराबर मानूं। किसी की मदद कर सकूं बशर्ते कि ऐसा करने की स्थिति में हूं।

आज इस पोस्ट को लिखने का एक ख़ास मक़सद है। मैं राजनीतिक व्यक्ति नहीं हूं लेकिन देश और समाज की स्थिति पर अपने ब्लॉग और फेसबुक पर विचार लिखता रहा हूं। कई बार मुझे ऐसा सुनने को भी मिला कि मेरे मित्रों में मुस्लिम भी काफ़ी हैं, इसलिए लेखन में बैलेंस का विशेष ध्यान रखता हूं। सच पूछो तो मैंने इस नज़रिए से कभी सोचा ही नहीं। कौन मुस्लिम है और कौन हिंदू या किसी और धर्म का। मुझे इस बात की भी खुशी है कि मेरे अधिकतर मित्र उदारवादी हैं। वे सही को सही और ग़लत को ग़लत कहते हैं। कट्टरता अगर ये अपने धर्म में भी देखते हैं तो उसका विरोध करते हैं।

आज ऐसा कुछ पढ़ने को मिला जिस पर सब मित्रों की राय जानने की जिज्ञासा हुई। दरअसल मामला कोलकाता के मुस्लिम बहुल इलाके मेटियाब्रुज से जुड़ा है। यहां सरकारी अनुदान की मदद से चलने वाले तालपुकुर आरा हाई मदरसा  के हेडमास्टर काज़ी मासूम अख्तर को अपनी ड्यूटी को अंजाम देने से रोक दिया गया है। उनकी पत्नी रेफ़िका अख़्तर का कहना है कि स्थानीय  कट्टरपंथियोंके दबाव में मदरसा प्रबंधन कमेटी ने फ़ैसला सुनाया है कि जब तक काज़ी मासूम दाढ़ी नहीं बढ़ाते और सिर पर स्कल कैप (मुस्लिम टोपी) नहीं पहनते, मदरसे में अपनी ड्यूटी नहीं दे सकते। रेफ़िका के मुताबिक प्रबंधन कमेटी ने ये भी कहा है कि काज़ी मासूम दाढ़ी बढ़ाने के बाद इस्लामिक पोशाक और टोपी में अपनी फोटो भेजें जिससे कि धार्मिक प्रमुख ये फैसला ले सकें कि वो मदरसे में पढ़ाने के लिए पर्याप्त तौर पर धार्मिकहैं या नहीं।



रेफ़िका के मुताबिक बीती 26 मार्च को उनके पति पर हमला भी हुआ था। वजह ये बताई गई थी कि उन्होंने बिना दाढ़ी और टोपी मदरसे में बच्चों को पढ़ाकर धार्मिक भावनाओं को आहत’  किया। स्थानीय कट्टरपंथियों का मानना है कि काज़ी मासूम की सोच बहुत प्रगतिशील और गैर-अनुसारक (non-conformist)  वाली है। हालांकि मदरसे की प्रबंधन कमेटी के सचिव सिराजुल इस्लाम मोंडल ने क़ाजी की पत्नी के आरोप को ख़ारिज किया है। मोंडल का कहना है कि काज़ी मासूम को इस्लाम की जानकारी नहीं है, जो कि इस नौकरी में बने रहने के लिए ज़रूरी है। मोंडल ने ये भी कहा कि अगर वो (काज़ी मासूम) हमारे क्षेत्र में आते हैं तो इससे समस्याएं उत्पन्न होंगी जो उनके लिए भी सही नहीं होंगी।


काज़ी के परिवार के एक सदस्य का कहना है कि प्रगतिशील सोच की वजह से काज़ी मासूम को निशाना बनाया जा रहा है। वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के साथ काज़ी ने बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए सांस्कृतिक गतिविधियों को शुरू कराया। इसके अलावा काज़ी मासूम ने मदरसे में हर दिन बच्चों की कक्षाएं शुरू होने से पहले राष्ट्रगान गाना अनिवार्य करने की कोशिश की।
काज़ी मासूम लड़कियों की कम उम्र में ही शादी का भी मुखर होकर विरोध करते रहे हैं। वो स्थानीय बांग्ला अख़बारों में भी लिखते रहे हैं। उनके एक लेख पर बहुत विवाद हुआ था जिसमें उन्होंने लिखा था कि ऐसे सभी मदरसों को गिरा देना चाहिए जो आतंकवाद को प्रश्रय देते हैं।

हैरानी की बात है कि जिस मदरसा प्रबंधन कमेटी ने काज़ी मासूम को ड्यूटी देने से रोका है उसी ने कुछ महीने पहले शिक्षा के लिए उनके समर्पण को देखते हुए राज्य सरकार से उन्हें शिक्षा रत्नअवॉर्ड देने की सिफ़ारिश की थी। राज्य सरकार के शिक्षा विभाग और अल्पसंख्यक आयोग तक ये मामला पहुंचा तो तदर्थ उपाय के तौर पर काज़ी मासूम को ज़िला इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स में हाज़िरी दर्ज़ कराने के लिए कहा गया है। शिक्षा विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक इस मसले का कोई समाधान नज़र नहीं आ रहा। विभाग काज़ी मासूम के तबादले की अर्ज़ी पर विचार कर रहा है। उधर, शहर के पुलिस प्रमुख सुरजीत कार पुरकायस्थ ने अल्पसंख्यक आयोग को लिखकर भेजा है कि अगर काज़ी मासूम को मदरसे आने-जाने के लिए सुरक्षा दे भी दी जाए तो भी उन पर हमले की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। काज़ी मासूम ने खुद सरकार की नीति पर ख़ामोश रहना ही बेहतर समझा है। बस इतना कहा- "यही उम्मीद कर सकता हूं कि बंगाल के लोगों को सद्बुद्धि आएगी।"

आपने विस्तार से सब कुछ पढ़ लिया। इससे पहले कि आपकी राय जानूं अपनी बस एक छोटी सी बात कहना चाहूंगा। अहम क्या है- कोई व्यक्ति मन से क्या है या ये कि उसका हुलिया क्या है, उसके तन पर चोला क्या है। क्या सिर्फ पोशाक से ही ये तय किया जा सकता है कि वो व्यक्ति अंदर से क्या है। क्या किसी भ्रष्ट नेता के दाग़ इसलिए धुल सकते हैं कि वो चकाचक सफ़ेद धोती-कुर्ता पहनता है। क्या ‘सच्चा-अच्छा मुसलमान होने के लिए सिर्फ़ दाढ़ी बढ़ाना और टोपी पहनना ही काफ़ी है? क्या 'सच्चा-अच्छा' हिन्दू होने के लिए सिर्फ़ भगवा पहनना और माथे पर तिलक लगाना ही पर्याप्त है?

इस मुद्दे पर लिखना मैंने इसलिए ज़रूरी समझा क्योंकि मैं अच्छी और गुणवत्तापरक शिक्षा पर देश के हर बच्चे का हक़ समझता हूं। वो भी समान सुविधा और समान अवसर के साथ। सरकार को अगर किसी क्षेत्र पर सबसे अधिक ध्यान देने की ज़रुरत है तो वो शिक्षा ही है। महंगे प्राइवेट स्कूलों और सरकारी शिक्षण संस्थानों (सरकारी सहायता प्राप्त मदरसे भी शामिल) के बीच शिक्षा के स्तर में जितना अंतर रहेगा, उतनी ही इंडिया और भारत के बीच खाई भी चौड़ी होती जाएगी। और सब बातों को भुलाकर हमें ये सोचना चाहिए कि हमारा हर बच्चा...रिपीट...हर बच्चा किस तरह दुनिया के साथ कदमताल करता हुआ देश का नाम रौशन कर सके। यक़ीन मान लीजिए, जिस दिन ये मुमकिन हो गया, उस दिन हमारी हर समस्या का समाधान हो जाएगा और भारत दुनिया का सिरमौर बन जाएगा।

तथास्तु और आमीन एकसाथ

रविवार, 7 जून 2015

प्राइम टाइम देश सेवा में, रिटायरमेंट के बाद मिलती है मौत...खुशदीप


एक ख़बर पढ़ कर मन व्यथित है। ताज्जुब भी है कि इस ख़बर पर अधिक लोगों का ध्यान क्यों नहीं गया। ख़बर भारतीय सेना में शामिल प्रशिक्षित कुत्तो के बारे में है। बम हो या नशीले पदार्थ, सूंघ कर पहचानना। घुसपैठ की कोशिशों को नाकाम करना। युद्धकाल हो या शांतिकाल या फिर कोई प्राकृतिक आपदा, ये ट्रेंड डॉग्स पूरे जी-जान से देश सेवा में लगे रहते हैं। ये दायित्व निभाने में सेना के घोड़े भी पीछे नहीं रहते। लेकिन जैसे ही ये कुत्ते या घोड़े सेवा से रिटायर होते हैं तो इनके साथ जो होता है, वो बहुत हिला देने वाला है।

सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में सेना ने कहा है कि कुत्तों और घोड़ों को रिटायरमेंट के बाद इच्छामृत्यु (?) दे दी जाती है। यानी बिना दर्द के मौत की नींद सुला देना। यही बर्ताव उनके साथ ड्यूटी में रहते हुए  तब भी किया जाता है जब ये पता चल जाए कि वे एक महीना से अधिक समय तक अनफिट रहेंगे।

सेना के जवाब में ये कहा गया है- सेना के घोड़ों और कुत्तों को ड्यूटी में प्रदर्शन के दौरान उनकी फिटनेस से आंका जाता है। जो पशु एक महीने से अधिक समय तक सक्रिय सेवा के लिए फिट नहीं पाए जाते उन्हें मानवीय Euthanasia (इच्छामृत्यु) से हमेशा के लिए सुला दिया जाता है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि कुत्तों को इस तरह मारने की दो वजह हो सकती हैं- एक तो इनके सेवा में रहते हुए इनका रखरखाव बहुत खर्चीला होता है। दूसरा इन्हें संवेदनशील ठिकानों की जानकारी होती है, इसलिए उनके दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इन्हें आम नागरिकों के हवाले कर दिया जाए तो इनकी क्षमताओं का ग़लत इस्तेमाल भी हो सकता है।

भारतीय सेना लेब्राडोर, जर्मन शेफर्ड और बेल्जियन शेफर्ड डॉग्‍स को कमीशन करती है। वेटेनरी कॉर्प्‍स मेरठ तथा चंडीगढ़ स्थित नेशनल ट्रेनिंग सेंटर फॉर डॉग्‍स एंड एनिमल में ट्रेनिंग के बाद इन्‍हें सेना में शामिल किया जाता है।

अब कुत्तों और घोड़ों के साथ रिटायरमेंट या अनफिट होने पर इस तरह का बर्ताव हैरान करने वाला है। पशु अधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से भी इस पर सवाल उठाए जा रहे हैं। उनका कहना है कि इन बेजुबानों के साथ गोलाबारूद के खाली खोलों जैसा व्यवहार करना अति दुर्भाग्यपूर्ण है।

कुत्तों और घोड़ों को इस तरह की इच्छामृत्यु’  देने पर कुछ सवाल ज़ेहन में उठना लाज़मी है-

1.  प्रीवेंशन ऑफ क्रूएल्टी टू एनीमल एक्ट कहता है कि किसी भी पशु को तब तक नहीं मारा जा सकता है जब तक कि उसे बचाने की संभावना पूरी तरह खत्म हो गई हो और वो अत्यधिक पीड़ा में हो। सेना के कुत्तों और घोड़ों को रिटायरमेंट के बाद मौत की नींद सुला देने पर ये एक्ट क्या कहता है?

2.   ये दलील कि इन को बाहर छोड़ने या आम नागरिकों को सौंपने से इनके ग़लत इस्तेमाल का ख़तरा हो सकता है। इस संभावना से बचने के लिए इन्हें मार देने की जगह क्या और कोई विकल्प नहीं ढूंढा जा सकता है। क्या कोई ऐसा सेंटर नहीं बनाया जा सकता जहां इन बेज़ुबानों को रिटायरमेंट के बाद रखा जा सके। जहां वे अपनी प्राकृतिक मौत तक जी सकें। बेशक ये सेंटर सेना की निगरानी में ही रहे। क्या सिर्फ खर्च की वजह से इस विकल्प पर काम नहीं किया जा सकता। क्या इनके लिए हमारा कोई दायित्व नहीं जिन्होंने अपने प्राइम टाइम में पूरी मुस्तैदी के साथ सरहद और देश के भीतर अपनी ड्यूटी को अंजाम दिया। रिटायर या अनफिट होते ही दूध की मक्खी जैसा व्यवहार क्यों?

3.  Euthanasia (इच्छामृत्यु) जैसे शब्द का इस्तेमाल क्यों? क्या ये बेज़ुबान खुद ऐसी इच्छा जताते  हैं?

4.  ये पशु विशेष तरह के दक्ष होते हैं, इन्हें सवेदनशील ठिकानों की जानकारी होती है, इसलिए इनके ग़लत इस्तेमाल की संभावना हो सकती है। अगर ये दलील इन बेज़ुबानों के लिए दी जा सकती है तो ये संभावना तो इनसानों के मामले में भी हो सकती है।

5. जिन्होंने अपना प्राइम टाइम ड्यूटी को पूरी मुस्तैदी से दिया, क्या रिटायरमेंट  या अनफिट होने के बाद उनकी सम्मानजनक देखभाल देश का कर्तव्य नहीं

    आखिर में एक सवाल केंद्रीय मंत्री और पशु कल्याण पुरोधा मेनका गांधी से, आपका इस मुद्दे पर क्या  कहना है?