गुरुवार, 28 मई 2015

12वीं का रिज़ल्ट, डीयू दाखिला और IIN...खुशदीप

अनार एक, बीमार अनेक। कुछ यही कहा जा सकता है दिल्ली यूनिवर्सिटी के अच्छे कॉलेजों में दाखिले के लिए। कट-ऑफ लिस्ट, पर्सन्टेज़, ऑनलाइन फार्म, ओरिएन्टेशन  प्रोग्राम, सब्जेक्ट का चुनाव। ये बातें बच्चों की नींद तो  उड़ाए रखती हैं लेकिन बड़ों को भी तनाव कम नहीं होता। इस सारी टेंशन से मुक्त होने के लिए देश की शिक्षा के कर्णधारों ने अब रामबाण इलाज निकाला है।

आखिर डिग्रियों पर इतना ज़ोर क्यों? केंद्र में शिक्षा के महकमे के सीनियर-जूनियर मंत्री हों या दिल्ली की केजरीवाल सरकार के क़ानून मंत्री वो आपको डिग्री (?) विषयक मुद्दों पर ज़्यादा अच्छी तरह प्रकाश डाल सकते हैं।

और अब ज़्यादा फ़िक्र की ज़रूरत ही क्या है। ऑनलाइन पर हर मर्ज़ की दवा आईआईएन जो आ गया है। बच्चों को भविष्य के लिए कैसे तैयार किया जाए, ये जानना है  तो आपको इस लिंक पर जाकर पढ़ना होगा।

12वीं के बाद अब नहीं होगी दाखिले की चिंता…

शनिवार, 23 मई 2015

एक साल पूरा, दुख भरे दिन बीते रे भईया...खुशदीप

दुख भरे दिन बीते रे भईया...
अब सुख आयो रे...
रंग जीवन में नया छायो रे...

एक साल पहले देशवासियों के अच्छे दिन आ गए थे...मोदी जी आ गए थे...क्या कहा...अभी नहीं आए अच्छे दिन...एक तो आप सब ना बेसब्रे बहुत हैं...बस चाहते हैं कि पलक झपके और सब हो जाए...आपके लिए सरकार दिन-रात एक करे दे रही है और आप हैं कि केजरीवाल हुए जा रहे हैंं...एक साल पूरा होने पर मोदी सरकार ने जो 10 संकल्प लिए है, उससे बस ये समझो कि आपका उद्धार निश्चित है...इनके अमल में आने से अच्छे दिन तो क्या अच्छी रात भी आ जाएंगी...नहीं विश्वास होता तो इस लिंक पर खुद ही पढ़ कर देख लीजिए....
एक साल पूरा होने पर मोदी सरकार के 10 संकल्प

रविवार, 17 मई 2015

काश ये बच्चा इस देश का पीएम बने...खुशदीप


कुमार राज (या राजेश चौरसिया)...शायद आज आपने इस बच्चे के प्रखर विचारों को मीडिया के ज़रिए जाना होगा। पटना में शुक्रवार को एक कार्यक्रम में ये बच्चा देश की शिक्षा व्यवस्था पर बोल रहा था। मंच पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी विराजमान थे। लेकिन कुमार राज की मासूम वाणी के सामने और सब निस्तेज था। इस बच्चे ने सीधी, सरल भाषा में जो कुछ भी कहा, उसी में इस देश की अधिकतर समस्याओं का समाधान छुपा है। कैसे वो आपको इस पोस्ट में आगे बताता हूं, लेकिन पहले इस बच्चे के बारे में थोड़ा और जान लीजिए। 

आरा में पान की दुकान चलाने वाले शैलेंद्र चौरसिया के बेटे कुमार राज ने पूरे देश को आइना दिखाया है। अब देखना है कि देश के कर्णधार इस आइने में झांकते हैं या नहीं। कार्यक्रम में ये बच्चा हाथ में एक तख्ती लिए खड़ा था। जिस पर लिखा था...मुझे भी कुछ कहना है। नीतीश कुमार की बच्चे पर नज़र पढ़ी और मंच पर बुला कर बोलने का मौका दिया। 


बच्चे ने सबसे पहली बात कही- चौरसिया समाज को अति पिछड़ा वर्ग में शामिल करने के लिए मुख्यमंत्री जी को सलाम। फिर अपने चौरसिया समाज से ही सवाल किया कि क्या अति पिछड़ा में शामिल करने से ही चौरसिया समाज का कल्याण हो जाएगा? फिर कहा, नहीं! इससे तो कुछ नौकरियों में प्राथमिकता मिलेगी। क्या चौरसिया समाज अपने बच्चों को इस काबिल बना पाए हैं? क्या आपने कभी अपने गांव के विद्यालय में झांकने की कोशिश की है? यह पता करने की कोशिश की है कि शिक्षक आते हैं कि नहीं, आते हैं तो पढ़ाते हैं कि नहीं और पढ़ाते हैं तो क्या पढ़ाते हैं? गांव के सरकारी स्कूलों की निगरानी करनी होगी, तभी आएगा सुधार। बच्चों को इस लायक बनाइए कि उन्हें आरक्षण की जरूरत ही नहीं पड़े। कुमार राज ने लोगों को आइना दिखाया, 'आप लोगों ने गांव में ऑर्केस्ट्रा और रासलीला का तो आयोजन कई बार किया। लेकिन बच्चों के मानसिक विकास के लिए बाल महोत्सव का आयोजन कभी नहीं किया।'

कुमार राज ने फिर सवाल किया कि राज्य देश में दो तरह की शिक्षा व्यवस्था क्यों है? अमीरों के लिए अलग जिनके बच्चे नामी प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने जाते हैं और गरीबों के लिए अलग जिनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने जाते हैं। इससे साफ मालूम चलता है कि प्राइवेट स्कूलों की अपेक्षा सरकारी स्कूलों में शिक्षा और सुविधाओं का घोर अभाव है। आखिर क्या कारण है कि कोई भी डॉक्टर, इंजीनियर, वकील यहां तक कि उस स्कूल के शिक्षक भी अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में पढ़ाना नहीं चाहते। यही वजह है कि हम बच्चे हीन भावना का शिकार हो जाते हैं।'

कुमार राज ने फिर एक समाधान भी सुझाया-, 'बड़ा होकर संयोग से इस देश का प्रधानमंत्री बन गया तो सबसे पहले पूरे देश के प्राइवेट स्कूलों को बंद करवा दूंगा ताकि सभी बच्चे सरकारी स्कूलों में एक साथ पढ़े सकें। चाहे वह डॉक्टर का बच्चा हो या किसान का। चाहे वह इंजीनियर का बच्चा हो या मजदूर का। तभी इस देश में समान शिक्षा लागू होगी।' कुमार राज ने आख़िर में अपनी कही बातों पर निर्णय करने का अधिकार जनता को देते हुए कहा, 'अब मैं क्या बोलूं। मैंने क्या सही बोला, क्या गलत मुझे नहीं मालूम। इसका निर्णय तो आप लोग कर सकते हैं। एक बात जरूर है कि मेरे दिल में जितनी भी बात थी मैंने कह दी। अब मैं अपने आप को बहुत हल्का महसूस कर रहा हूं।'

कुमार राज ने जो कहना था, कह दिया। अब उसके कहे अनुसार निर्णय इस देश के कर्णधारों को करना है, शिक्षाविदों को करना है, योजनाकारों को करना है, हम-आप सबको करना है। कैसे करना है। इस विषय पर मैंने पाँच साल पहले 23 जुलाई 2010 को एक पोस्ट लिखी थी। उसी के कुछ अंशों को लेकर फिर कुछ कहना चाहता हूं।

सबसे पहले ये समझना होगा जब तक शिक्षा को देश का सबसे अहम मुद्दा नहीं माना जाएगा, इस देश में बुनियादी रूप से ज़्यादा कुछ नहीं बदलने वाला। मेरी नज़र में भारत की हर बड़ी समस्या (गरीबी, भूख, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, नक्सलवाद, आतंकवाद) का मूल देश की शिक्षा व्यवस्था में ही निहित है। आज इस दिशा में हम सही निवेश करेंगे तो एक-दो दशक बाद उसका सही फल मिलना शुरू होगा। अच्छा यही है कि जितनी जल्दी हम जाग जाएं, उतना ही अच्छा।

अर्थशास्त्रियों का मत कुछ भी हो लेकिन मेरी सोच से शिक्षा से अच्छा निवेश और कोई नहीं हो सकता। इसलिए शिक्षा के लिए जितना ज़्यादा से ज़्यादा हो सके बजट रखा जाना चाहिए। शिक्षा का राष्ट्रीयकरण  हो और देश के हर बच्चे को शिक्षा दिलाने की ज़िम्मेदारी सरकार ले। इसके लिए व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया जाए। शिक्षा का ये मतलब नहीं कि हर बच्चे को ग्रेजुएट बनाया जाए। ग्रेजुएट बनाने वाली शिक्षा से अधिक ज़रूरी है कि बच्चे को स्वावलम्बी बनाया जाए। देश के शिक्षा के मज़बूत ढांचे के लिए सबसे ठोस कदम होगा कि ऐसा मॉनिटरिंग सिस्टम बनाया जाए जो बच्चे के पांचवी-छठी क्लास तक आते-आते ही उसका असली पोटेंशियल पहचान लिया जाए। ये देख लिया जाए कि उसकी रूचि क्या है, और किस क्षेत्र में उसके सबसे अधिक सफल होने की संभावनाएं हैं। 

मान लीजिए ये तय हो गया कि किसी बच्चे में अच्छा एथलीट बनने के लिए नैसर्गिक प्रतिभा है, तो फिर उसे उसी दिशा में सारी सुविधाएं देकर अच्छे से अच्छा करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। किताबी शिक्षा उसे उतनी ही दी जाए जितनी उसके सामान्य कामकाज के लिए ज़रूरी हो। उसका मुख्य ध्येय अपने खेल में ही अव्वल बनने का होना चाहिए। 

मिडिल-सीनियर स्कूल तक अगर कोई बच्चा पढ़ाई में अच्छा नहीं कर पा रहा तो उस पर ज़बर्दस्ती शिक्षा नहीं थोपी जानी चाहिए। इसके बजाए उसे हाथ के हुनर वाला कोई काम सिखाया जाना चाहिए। जिससे कि वो आगे चलकर अपनी और अपने परिवार के लिए आजीविका कमा सके। उच्च शिक्षा सिर्फ  उन्हीं बच्चों को मिलनी चाहिए, जो वाकई इसके लिए सुयोग्य हों। 

बच्चों की छोटी उम्र में स्क्रीनिंग होगी तो उच्च शिक्षा तक कम बच्चे पहुंचेंगे। ऐसे में उन पर अधिक ध्यान दिया जा सकेगा और हमारी यूनिवर्सिटीज़ का स्तर भी सुधरेगा। अभी हमारी कितनी यूनिवर्सिटीज़ या कॉलेज हैं जो पश्चिम जगत के समझ टिकते हैं। अभी जो हमारे देश में व्यवस्था है, उसमें ग्रेजुएशन की डिग्री मिलने तक ही शिक्षा का महत्व माना जाता है। ऐसी खोखली यूनिवर्सिटीज़ और खोखली डिग्रियों से देश का क्या भला होता है, ये आप समझ सकते हैं।

निष्कर्ष
इस पूरे मंथन का मेरी दृष्टि में निष्कर्ष यही है कि बच्चा गरीब का हो या अमीर का, किसी भी जाति  का हो, किसी भी धर्म का हो, सबको बिना किसी भेदभाव एक-समान गुणवत्तापरक शिक्षा मिलनी चाहिए। पूरे देश में एक सिलेबस और शिक्षा का एक जैसा स्तर। अगर किसी बच्चे के माता-पिता आर्थिक दृष्टि से सक्षम हैं तो अपने बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाएं। जो माता-पिता ये खर्च उठाने की स्थिति में नहीं है, वो लिख कर दे दें। ऐसे बच्चों की पढ़ाई का सारा खर्च सरकार उठाए। जब ये बच्चा बढ़ा हो कर अपने पैरों पर खड़ा हो जाए तो उसकी शिक्षा पर हुआ खर्च सरकार किस्तों में वापस ले। इससे ये धन फिर गरीब परिवारों के बच्चों की शिक्षा पर खर्च हो सकेगा। शिक्षा को दुरुस्त करने के काम के लिए अगर सरकार को कोई टैक्स भी लगाना हो हिचिकिचाए नहीं। विशेष तौर पर उच्च आय वर्ग वाले लोगों पर। काश देश में कोई तो ऐसा नेता आए जो शिक्षा के महत्व को ठीक से समझे। ये माने कि शिक्षा पर आज किया निवेश देश के कल के सुनहरे भविष्य की नींव होगा।

शुक्रवार, 15 मई 2015

भारत का ग़लत नक्शा दिखाने की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता?...खुशदीप


 क्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के ग़लत नक्शे को दिखाने की कोई प्रतियोगिता चल रही है या भारत के नक्शे को विदेशियों ने सच में ही बिना सिर वाले धड़ के रूप में ही मान्यता दे दी है...

गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब चीन के ऐतिहासिक शहर शियान के दौरे पर थे, तो उसी दिन चीन के सरकारी स्वामित्तव वाले चाइना सेंट्रल टेलीविजन (सीसीटीवी) पर भारत का नक्शा दिखाया जा रहा था। ऐसा नक्शा जिसमें जम्मू-कश्मीर पूरा का पूरा गायब था। साथ ही अरुणाचल प्रदेश का भी नक्शे पर कोई अता-पता नहीं था। चीनी-हिंदी भाई-भाई जितना भी किया जाए लेकिन चीन भारत को लेकर क्या सोचता है, वो उसने इस नक्शे के ज़रिए ज़ाहिर कर दिया है।



चीन तो ख़ैर चीन है लेकिन ये फेसबुक के सीईओ मार्क ज़ुकरबर्ग महोदय को क्या हुआइन्होंने आख़िर क्यों फेसबुक पर अपनी एक पोस्ट में इन्फो-ग्राफ़िक में भारत का नक्शा दिखाते हुए सिर को धड़ से अलग कर दिया। इन जनाब ने भी जम्मू-कश्मीर को पूरी तरह से ही भारत से साफ़ कर देने की हिमाकत दिखाई।


मार्क ने Internet.org के बारे में जानकारी देते हुए फेसबुक पर अपनी पोस्ट में लिखा था कि अब दक्षिण अफ्रीकी देश मलावी में फ्री इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है। मार्क ने साथ में एक इन्फो-ग्राफिक भी पोस्ट किया। लेकिन भारतीयों ने शीघ्र ही नोट कर लिया कि इन्फो-ग्राफ़िक में क्या गड़बड़ है। मार्क के पोस्ट डालते ही अखिल देव ने टिप्पणी की- 'बढ़िया काम, कृपा करके तस्वीर में भारत का नक्शा ठीक कर दें। कश्मीर नक्शे से गायब है।' इसके बाद तो पोस्ट पर कमेंट्स की झड़ी लग गई। साथ ही भारत और पाकिस्तान के यूजर्स की ज़ुबानी जंग भी इन कमेंट्स के ज़रिए शुरू हो गई। लेकिन मार्क ज़ुकरबर्ग ने किसी भी कमेंट का जवाब देने से परहेज़ किया। दिलचस्प बात ये है कि गुरुवार को ही मार्क ने अपना 32वां जन्मदिन मनाया। लेकिन शुक्रवार को मार्क ने अपनी इस पोस्ट को डिलीट कर दिया।

ये है वो इन्फो-ग्राफिक जिसे मार्क ज़ुकरबर्ग ने अपनी पोस्ट में इस्तेमाल किया था, गौर से देखने पर भारत का ग़लत नक्शा इसमें देखा जा सकता है। विवाद के तूल पकड़ने पर मार्क ने अपनी पूरी पोस्ट पर डिलीट मारना ही बेहतर समझा।

 चीन और मार्क ज़ुकरबर्ग से पहले अल जज़ीरा टेलीविजन चैनल भी भारत का ग़लत नक्शा दिखा चुका है। इस पर भारत सरकार की और से कार्रवाई भी की गई। अप्रैल के आखिरी हफ्ते में अल जज़ीरा के भारत में प्रसारण पर पाँच दिन के लिए रोक लगा दी गई थी। अल जज़ीरा चैनल ने 2013 एवं 2014 में भारत का गलत नक्शा दिखाया था, जिसके बाद सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने मामले को भारत के महासर्वेक्षक (एसजीआई) के पास भेज दिया था।

एसजीआई ने महसूस किया कि अल जजीरा द्वारा प्रदर्शित किए गए कुछ नक्शों में जम्मू कश्मीर में भारतीय भूमि के एक अंश (पाक अधिकृत कश्मीर एवं अक्साई चिन) को भारत की भूमि के अंग के रूप में नहीं दिखाया गया था।

अल जज़ीरा पर भारत सरकार कार्रवाई कर सकती है तो फिर चीन और फेसबुक के सीईओ मार्क ज़ुकरबर्ग के ख़िलाफ़ भी ऐसा ही कोई सख़्त कदम क्यों नहीं उठा सकती। दुनिया को क्या ये संदेश देना ज़रूरी नहीं कि भारत का ग़लत नक्शा दिखाना एक तरह से उसकी सम्प्रभुता को चुनौती देना है। और ऐसी हरकत किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी और जो भी ऐसा करेगा, उसे अंजाम भुगतने के लिए भी तैयार रहना होगा।


मंगलवार, 12 मई 2015

‘सूट-बूट की, सूट-बूट द्वारा, सूट-बूट के लिए’...खुशदीप



अब्राहम लिंकन साहब ख़ामख़्वाह ही डेमोक्रेसी के लिए कह गए...of the people, by the people, for the people…लिंकन महोदय आज ज़िंदा होते तो शुक्र कर रहे होते कि वो उस देश में पैदा हुए जिसकी खोज क्रिस्टोफर कोलम्बस ने की थी...खुदा-ना-खास्ता यदि कहीं वास्को-डि-गामा के खोजे देश में पैदा हुए होते तो आज उनके ख़्याल भी पलट गए होते...

वो भी भारत का ‘लोकतंत्र’ देख कर कह रहे होते...of the suited booted, by the suited booted, for the suited booted… हैरत है कि अभी तक राहुल गांधी की इस जुमले पर नज़र क्यों नहीं पड़ी?  राहुल ने पहले कहा- 'ये सूटबूट की सरकार है'...सरकार से पहला जवाब संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद की ओर से आया...'ये सूटकेस की सरकार नहीं है'...

फिर वित्त मंत्री बोले...'ये सूझ-बूझ की सरकार है'...मंगलवार को लोकसभा में राहुल ने सरकार पर फिर वार किया... 'सुना था कि चोर सिर्फ रात को आते हैं, छुपकर आते हैं, खिड़की के अंदर से कूद कर आते हैं, लेकिन सबसे बड़े चोर दिन दहाड़े आते हैं, सबके सामने आते हैं, और सूट पहनकर आते हैं'...

ये सारी राजनीतिक जुमलेबाज़ी है और इसका महत्व भी वही ख़त्म हो जाता है...दो कम सत्तर साल होने को आए इस देश को आज़ाद हुए...इस देश ने और देखा क्या है...नेता लोक के हित की बात करते हुए तंत्र में आते हैं...तंत्र में आते ही लोक को भूल जाते हैं...फिर याद रहता है तो बस ‘सूट-बूट वालों’ का हित…और हो भी क्यों ना...संविधान ने बेशक लोक को सर्वोपरि माना है...लेकिन तंत्र सूट-बूट वालों का ही है... of the suited booted, by the suited booted, for the suited booted...

ये व्यवस्था आख़िर क्यों ना हो...कौन नहीं जानता कि राजनीतिक दलों की फंडिंग होती कहां से है...सूट-बूट वाले बिना किसी भेदभाव के सभी राजनीतिक दलों पर ख़ून-पसीने (अपना नहीं मज़दूरों का) से कमाया हुआ धन लुटाते हैं...अब भईया...धंधे में पैसा तभी लगाया जाता है जब मोटे रिटर्न की उम्मीद हो...इसलिए जो घोड़ा फॉर्म में होता है उसी पर सबसे अधिक दांव लगाया जाता है...लेकिन यहां दूसरे घोड़ों की अनदेखी भी नहीं की जाती है...उन्हें भी ख़ुराक दी जाती रहती है...क्या पता कल वो फिर रेस में आगे आ जाए....

ये सियासत का रेसकोर्स है जनाब...यहां घोड़े कोई भी दौड़ें, कभी भी दौड़ें, उनका रिमोट ‘सूट-बूट’ के हाथ में ही रहेगा।

स्लॉग ओवर

दृश्य 1
एक दीन-हीन किसान मात्र एक लँगोटी में अपने ख़ेत में खड़ा होता है...तभी नेता एक इंची-टेप लेकर उसकी तरफ़ आता है...आकर उससे कहता है...फ़िक्र मत कर तेरा बढ़िया वक्त आ गया है...हम तुझे सूट सिलवाकर देंगे...इसलिए तेरा नाप लेना पड़ेगा...किसान बहकावे में आकर नाप देने को तैयार हो जाता है...

दृश्य 2
नेता इंची-टेप लेकर उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाता है....और...और...ये क्या...

दृश्य 3
नेता उस किसान की लँगोटी लेकर भागा जा रहा है...सामने दो सूट-बूट वाले खड़े हैं...नेता उन्हें जाकर वो लँगोटी देते हुए कहता है...लो ये भी ले आया तुम्हारे लिए...

दृश्य 4
किसान बेचारा दोनों हाथ आगे कर अपनी लाज छुपाने की कोशिश कर रहा है...आंखों के आगे घूमते तारे लिए...

सोमवार, 11 मई 2015

घण्टा न्यूज़ : अम्मा के भक्त ने की खुदकुशी की कोशिश...खुशदीप


अम्मा के भक्त भावविभोर हैं। करीब दो दशक तक बेचारी अम्मा को नाहक परेशान किया गया। कर्नाटक हाईकोर्ट के जज को 10 सेकंड नहीं लगे अम्मा को ‘दोषी नहीं’ क़रार देने में।  तमिलनाडु में कहीं पटाख़े छोड़े जा रहे हैं। कोई अम्मा के पोस्टर को दूध से नहला रहा है। अगर फ़ैसला अम्मा के हक़ में नहीं आता तो आंसुओं का ऐसा सैलाब उमड़ता कि कावेरी के पानी लिए कर्नाटक से तमिलनाडु का बरसों से चल रहा विवाद एक झटके में ख़त्म हो जाता। लेकिन जहां तमिलनाडु में जश्न का माहौल है, वहीं बेंगलुरू जेल में अम्मा के मुरीद कैदी जयाभक्त ने खुदकुशी की कोशिश भी की।

आप कहेंगे ये भक्त कैसा है, जो खुदकुशी को खुशकुशी मानते हुए जान देने पर तुल गया। जी नहीं, ऐसा कुछ नहीं हुआ। इस कैदी ने खुशी में नहीं वियोग में ही ये अतिवादी कदम  उठाने का फ़ैसला किया।




चलिए अब ज़्यादा नहीं उलझाते। बता ही देते हैं कि माज़रा क्या है। दरअसल जयाभक्त उसी जेल में था जहां अम्मा ने पिछले साल 27 सितंबर से 18 अक्तूबर तक तीन हफ्ते बिताए थे। अम्मा की ज़मानत पर तब रिहाई होने पर जयाभक्त बहुत परेशान हुआ था। उसे ये ग़म ही खाए जा रहा था कि वो अब जेल में रोज़ अम्मा के दर्शन नहीं कर पाएगा। तब किसी तरह जयाभक्त को समझाया गया कि अम्मा सिर्फ ज़मानत पर रिहा हुई हैं। ऊपरी अदालत ने अम्मा को कसूरवार माना तो फिर जेल आ सकती हैं। बेचारे जयाभक्त ने किसी तरह कलेजे पर पत्थर रखकर खुद को मनाया।

वो एक-एक दिन का इंतज़ार करने लगा कि कब अम्मा जेल में वापस आएंगी और वो हर दिन उनके दर्शन कर अपने जीवन को कृतार्थ  कर सकेगा। लेकिन सोमवार को जैसे ही अम्मा को हाईकोर्ट ने बरी किया तो जयाभक्त का रहा-सहा हौसला जवाब दे गया। अम्मा के दोबारा जेल आने की कोई संभावना ना देखकर जयाभक्त दहाड़ें मार-मार कर रोने लगा। इसी संताप ने जयाभक्त को मानसिक अवसाद की स्थिति में ला दिया।

जयाभक्त को जब अम्मा के बरी होने की जानकारी मिली, उस वक्त वो अपनी बैरक से बाहर था। ख़बर मिलते ही वो बदहवासी में इधर से उधर दौड़ने लगा। अंतत: उसने आठ पायदान वाली सीढ़ी की ऊँचाई से छलांग लगा दी। अम्मा के प्रताप से जयाभक्त की जान बच गई। उसे पैर में ‘मामूली फ्रैक्चर’ ही हुआ। जयाभक्त की अवस्था के बारे में ये सारी बातें तमिलनाडु के निवर्तमान मुख्यमंत्री जब पत्रकारों को बता रहे थे तो उनकी आंखों से गंगा-जमुना की धारा बहते हुए साफ़ देखी जा सकती थी।

हालांकि जेल से जुड़े सूत्रों का कहना है कि प्रथम द़ृष्टया ये दुर्घटना का मामला लगता है। इन सूत्रों के मुताबिक सीढ़ियों पर जयाभक्त के शारीरिक संतुलन(मानसिक नहीं) खोने की वजह से ये हादसा हुआ।

जेल की सुरक्षा से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि घटना के करीब दो घंटे बाद बाहर से आए कुछ लोग जयाभक्त से मिले थे। उसी के बाद एक सुइसाइड नोट सामने आया। इस नोट में जयाभक्त ने साफ़ किया था कि उसने क्यों आठ सीढ़ियों वाली पाँच फीट की जानलेवा ऊँचाई से कूद कर जान देने की कोशिश की। हालांकि अम्मा की पार्टी के नेताओं ने जयाभक्त को आत्महत्या के लिए उकसाने जैसी किसी बात से साफ़ इनकार किया। इन नेताओं के मुताबिक जयाभक्त जैसे अम्मा के हज़ारों भक्त हैं, जो उनके लिए कभी भी जान देने को तैयार रहते हैं।

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने ‘घंटा न्यूज़’ को बताया कि अम्मा के भक्त जेल में इसलिए जान दे रहे हैं कि वो उन्हें हमेशा अपनी आंखों के सामने रखना चाहते हैं। यही जन-जन के नेता की पहचान है। लोग अम्मा को भगवान की तरह सर्वत्र देखना चाहते हैं। पार्टी नेताओं के मुताबिक वो जेल में अम्मा की एक प्रतिमा स्थापित करने पर विचार कर रहे हैं, जिससे कि वहां फिर खुदकुशी की कोशिश जैसी नौबत ना आए।

(डिस्क्लेमर- व्यक्तिपूजा की इस ख़बर के 100 फ़ीसदी झूठ होने की 'घंटा न्यूज़' गारंटी देता है, ये प्रयास आपको शायद न्यूज़ रूपी उस कचरे से ज़्यादा अच्छा लगे, जहां सच को तोड़मरोड़ कर पेश करने की कोशिश की जाती है।)

शुक्रवार, 8 मई 2015

सलमान को सब जानते हैं, सरिता को कोई नहीं...खुशदीप


पिछले तीन दिन से सलमान सुनामी ने पूरे देश को हिला रखा है। रिपोर्टिंग करते वक्त मीडिया का व्यवहार ऐसा रहा, जैसे चीन युद्ध से भी बड़ा संकट देश पर आ गया हो। सलमान अब अपने घर पर है। अपने घर की बॉलकनी से दो उंगलियों से विक्टरी का निशान बनाकर अपने भक्तों को कृतार्थ करते हुए। बॉम्बे हाईकोर्ट में जब तक मामले की सुनवाई पूरी नहीं हो जाती कम से कम तब तक सलमान को जेल जाने का कोई ख़तरा नहीं है। हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट तक क्या-क्या हो सकता है, ये देखने की दिव्यदृष्टि या तो सिद्ध ज्योतिषियों के पास हो सकती है या टीवी चैनल्स के एंकर्स के पास।

वैसे सलमान पर कुलजमा तीन तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं....


1. सलमान को सेलेब्रिटी होने का खामियाज़ा भुगतना पड़ रहा है...इतने लोगों की मदद करने वाला सलमान, बीमारियों से जूझता सलमान...बेचारा सलमान...


2.  मैनेज कर लिया गया...इस देश में पैसे वाले सब मैनेज कर लेते हैं भाई...देश में दो क़ानून है...एक पैसे वालों के लिए...दूसरा औरों के लिए...


3. तीसरे किस्म की प्रतिक्रिया देने वाले बुद्धिजीवी टाइप के लोग होते हैं...ये ऐसा मिश्रित बयान देते हैं कि किसी के पल्ले कुछ पड़े ही ना...और कोई नाराज़ भी ना हो....ये पीड़ितों का भला करने की बात करते हैं...कहते हैं जो हुआ ग़लत हुआ...नहीं होना चाहिए था...फिर ये सरकार पर आ जाते हैं...फुटपाथ पर लोग सोते हैं तो इसके लिए सरकार जिम्मेदार है...वो क्यों रहने के लिए सब के सिर पर छत मुहैया क्यों नहीं कराती...मुंबई में जैसे हर एक के लिए घर उपलब्ध कराना सरकार के लिए खाला जी का घर हो...दबे शब्दों में सलमान के लिए सॉफ्ट कार्नर भी दिखा जाते हैं....

खैर छोड़िए सलमान गाथा। तीन दिन से ये नाम सुन सुन कर आप पहले से ही पके हुए हैं, मैं और पकाने आ गया। ऊपर शीर्षक में मैंने सलमान के साथ सरिता का ज़िक्र किया है। आप कहेंगे, कौन सरिता? सरिता पर आने से पहले एक छोटी सी जानकारी और...बॉलिवुड के एक और सुपरस्टार आमिर ख़ान को भी आज गुजरात हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिल गई। फिल्म लगान में संरक्षित जीव चिंकारा का गोली लगने से मरने का एक दृश्य था। गुजरात हाईकोर्ट ने इस मामले में आपराधिक शिकायत को रद्द करते हुए आमिर खान के खिलाफ़ आपराधिक कार्यवाही खत्म कर दी।


चलिए दो स्टार्स की बात हो गई। अब आता हूं असली मुद्दे पर। सरिता पर। सलमान गैर इरादतन ही सही एक शख्स की हत्या के अब दोषी है। दूसरी और सरिता ने खुद ही अपनी जान दे दी है। मेरी नज़र में सरिता की स्टोरी सलमान से बहुत बड़ी है। सरिता ने सिस्टम से हार कर गले में फंदा डालकर खुद ही मौत को गले लगाया। 22 वर्षीय सरिता एक किसान की बेटी थी। एमए तक पढ़ी थी। एक ही सपना था पुलिस में भर्ती होने का। उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती बोर्ड की शारीरिक परीक्षा (2014-15) में कामयाबी भी हासिल कर ली। लेकिन चयन फिर भी नहीं हो सका। आखिरकार उसका हौसला जवाब दे गया और उसने गुरुवार सुबह पेड़ से लटक कर खुदकुशी कर ली।




लखनऊ के काकोरी के मलाहा गांव के सवर्ण किसान गिरीश द्विवेदी की 22 वर्षीय बेटी सरिता ने सुइसाइड नोट भी छोड़ा है। घरवालों के मुताबिक सरिता पुलिस भर्ती घोटाले से परेशान थी। पढ़ाई के दौरान एनसीसी कैडेट रह चुकी सरिता ने सुइसाइड नोट में उत्तर प्रदेश सरकार और आरक्षण व्यवस्था के ख़िलाफ़ नाराज़गी का इजहार किया है।

सरिता ने सुइसाइड नोट में जो जो लिखा वो हिला देने वाला है-


सामान्य वर्ग में जन्म लेने का यह अभिशाप या सजा है। सभी जगह आरक्षण, अभिशाप। यदि हम कोई फार्म भरते हैं तो उसके पैसे कहां से लाएं। पापा, आपके पास भी तो इतनी ताकत नहीं रही।

मम्मी मेरा सपना था वर्दी पहनने इंसाफ की लड़ाई लडऩे का इसलिए मैं दौड़-दौड़कर पेट की मरीज बन गई 100 नंबर दौड़ में पाने के बाद मैं और आप लोग बहुत खुश थे।

पापा मैंने हार नहीं मानी क्योंकि हमें सामान्य जाति के होने का अभिशाप था। कहीं लंबाई, कहीं पढ़ाई, कहीं आरक्षण तो क्या करें जी कर। क्योंकि ज्यादा पढ़ाई यहां प्रोफेशनल कोर्स करना या कराना हम लोगों की क्षमता से बाहर है।

पापा मैं तो जा रही। पापा इन हत्यारों से ये पूछना कि जब सामान्य वालों के लिए कहीं जगह नहीं है तो हर हास्पिटल में ये बोर्ड न लगवा दें कि सामान्य वर्ग के स्त्री के शिशु जन्म लेने से पहले ही मार डालें। ...अपना-अपना जातिवाद फैला लें। समाज की क्या स्थिति होती जा रही है। लड़कियों के 20-20 टुकड़े करके फेंके जा रहे हैं।

पापा, लोग लड़कों को पढऩे के लिए भेजते हैं पर आपने भरोसे के साथ भेजा। मैं बार-बार कह रही थी मैं हार नहीं मानूंगी। बस, आरक्षण अभिशाप के कारण मैं जीना नहीं चाहती।

 मम्मी इतना जरूर पूछना कि जब मेरिट रिलीज हुई थी तब जनरल लड़की की कोई मेरिट नहीं बनी।


जय धरती माता की मुझे गोद में स्थान दो। जय भारत माता की।...हम पुलिस, हम पुलिस, हम पुलिस, ..खत्म इंतजार।

सरिता भी ख़त्म हो गई और सरिता का इंतज़ार भी। कुछ कहने वाले कह सकते हैं कि सरिता को पुलिस में भर्ती का सपना पूरा ना होने पर कोई और रास्ता अपनाना था। पढ़ी लिखी थी जीविका का कोई और साधन भी ढूंढ सकती थी। बहादुरी से चुनौतियों का सामना करना चाहिए था। मैं भी यही कहता हूं कि जीवन अनमोल है, इसे लेने का किसी को भी हक़ नहीं। लेकिन ऐसा कहते वक्त हमें ये भी सोचना होगा कि सरिता ऐसा अतिवादी कदम उठाने से पहले किस मनोदशा से गुज़र रही होगी। वो लड़की जो पुलिस में भर्ती की शारीरिक परीक्षा पास करने के लिए दौड़ दौड़ कर पेट दुखा लेती थी। सब कुछ करने के बाद भी उसके हाथ आई तो सिर्फ निराशा।

सरिता का केस एक साथ देश के कई ज्वलंत सवालों पर सोचने को मज़बूर कर देता है। बेशक इन सवालों में सलमान जैसा ग्लैमर नहीं जुड़ा है। भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, आरक्षण, शिक्षा की उपयोगिता, बेरोज़गारी। इन मुद्दों में आरक्षण सबसे संवेदनशील है। आप इसके विरोधी हो या समर्थक, लेकिन सरिता जैसी घटनाएं ये सोचने को तो मजबूर करती हैं कि क्या ऐसा कोई रास्ता नहीं निकाला जा सकता कि फिर किसी युवा प्रतिभा को खुद ही अपनी जान ना लेनी पड़े। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव युवा है। उन्हें मलाल है कि समाज के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएं चलाने के बाद भी प्रदेश के कई लोग उन्हें नहीं पहचानते। अखिलेश जी आप जिस दिन भाई-भतीजावाद को पीछे धकेल कर सरिता जैसी युवा प्रतिभाओं का दर्द सच्चे मन से खुद महसूस करना शुरू कर देंगे, आपको हर कोई अपने आप पहचान लेगा।

आख़िर में एक सवाल उस मीडिया बिरादरी से जिससे मैं खुद भी आता हूं....सलमान पर 24X7 लाइव रिपोर्टिंग से आप लोकतंत्र के चौथे स्तंभ होने का दायित्व पूरा कर सकते हैं या सरिता से जुड़े सवालों पर सार्थक बहस कराने से....