शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

ड्रामा चालू आहे...खुशदीप


मेरे एक मित्र हैं। पत्रकार रह चुके हैं। अब राजनीति में हैं। देश के एक बड़े राजनेता की कोर टीम से जुड़े हैं। मुझे खुशी है कि राजनीति में होते हुए भी मेरे मित्र के अंदर दिल धड़कता है। इनसान को अब भी इनसान समझते हैं, महज़ वोट नहीं। मेरे मित्र ने अपने राजनेता की सोच को एक बार मेरे साथ शेयर किया। मित्र के मुताबिक उस राजनेता का विज़न है, चुपचाप अपना काम करते रहो। कोई क्या कहता है, उसकी परवाह किए बिना लक्ष्य की ओर बढ़ते रहो। शार्टकट पर चलने की जगह लॉन्गटर्म अप्रोच। क्या देश के लिए बेहतर है, बस उसकी फ़िक्र की जाए। बिना कोई ड्रामा किए।

बिना कोई ड्रामा किए को मैंने जानबूझकर अंडरलाइन किया है। इस राजनेता का ये विज़न पश्चिम के किसी विकसित और पूर्णत: साक्षर देश के लिए तो फिट हो सकता है। भारत जैसे नाटकीयता प्रिय देश के लिए कतई नहीं। आप शांति से लाख अच्छे काम कर रहे हों लेकिन आपका कोई नोटिस नहीं लेगा। नोटिस तभी लेगा जब आप अपने काम को तड़का लगाना सीख जाएं। तड़के से मेरा अभिप्राय ड्रामा से ही है। ये तड़का जरूरत के हिसाब से तय किया जा सकता है। दाल में तड़का लगाया जाता है। लेकिन आप चाहें तो तड़के में दाल भी लगा सकते हैं।

इस देश में ड्रामे के बिना कोई काम चल ही नहीं सकता। बस आपको ये अदा आनी चाहिए कि हर वक्त आपके ऊपर फोकस कैसे रहे? सुर्खियों में कैसे बने रहा जाए? आपको ये कला नहीं आती तो आप औरों के लिए प्रासंगिक ही नहीं रहेंगे। प्रचार की ताकत अपार है।

मैं अपनी बात को एक और उदाहरण से समझाता हूं। देश अगर एक रंगकर्म हैं तो दिल्ली इसका सबसे बड़ा मंच। आप को औरों की नज़रों में आना है तो इस मंच पर आकर अपनी प्रस्तुति देनी ही होगी। वो भी पूरे तामझाम के साथ। किसान की खुदकुशी कोई ऐसी घटना नहीं है जो देश में पहली बार हुई हो। बीते दो दशक में इसी देश में करीब पौने तीन लाख किसान खुद ही अपनी जीवनलीला समाप्त कर चुके हैं। महाराष्ट्र का विदर्भ तो विशेष तौर पर किसानों की कब्रगाह सा ही बन गया है। वहां तो किसान खेत में जाकर पहले अपनी चिता सजाता है और फिर उस पर लेटकर खुद को भस्म कर लेता है। नितकर्म की तरह ये चलता रहता है लेकिन दिल्ली में किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती।

लेकिन अब देखिए। राजस्थान के दौसा से आकर गजेंद्र सिंह ने पेड़ पर साफ़े से फंदा तैयार कर अपनी जान दी तो मानो पूरा देश ही हिल गया। यहां किसान से ज़्यादा उसकी जान देने की जगह, तरीका और टाइमिंग अहम है। दिल्ली का जंतर मंतर। राजनीतिक दल की रैली। ज़मीन अधिग्रहण का मुद्दा। पीएम को ललकारते सीएम। मीडिया का पूरा लाव-लश्कर। लेकिन गजेंद्र ने यहां जो किया उसके आगे और सब गौण हो गया। गजेंद्र खुद सो गया, किसानों की दुर्दशा पर देश को जगाने के लिए। होना तो चाहिए था, इस घड़ी तमाम मतभेदों को भुलाकर सारे राजनीतिक दल कंधे से कंधा जोड़कर बैठते। मंथन करते कि देश का अन्नदाता अपनी जान अपने हाथों से लेने के लिए क्यों मजबूर है। सियासी नफ़े-नुकसान को पीछे़ छोड़़ ईमानदारी से किसान के लिए राहत का कोई रास्ता निकालते। यहां मीडिया को भी संवेदनशीलता का परिचय देना चाहिए था। निरर्थक तू-तू, मैं-मैं के इस खेल से दिल्ली के स्टेज-एक्टर्स को फौरी फायदा हो सकता है, लेकिन किसान का हर्गिज़ नहीं। देश का हर्गिज नहीं। कोई ये नहीं भूले कि देश हैं तो हम सब हैं। देश की रीढ़ किसान खड़ा नहीं होगा तो ये देश भी कभी खड़ा नहीं हो पाएगा।

गजेंद्र सिंह की मौत को लेकर जो  हो रहा है, वो हम सब देख रहे हैं। दिल्ली में निर्भया गैंगरेप को लेकर जिस तरह का आक्रोश सड़कों पर फूटा था, वो भी हम सबने देखा था। लेकिन क्या बलात्कार या महिलाओं पर अत्याचार की घटनाएं देश के दूर-दराज़ के इलाकों में नहीं होतीं। इनसाफ़ तो दूर वहां थाने में रिपोर्ट तक दर्ज़ नहीं कराई जाती।

गजेंद्र सिंह जैसी दु:खद घटना का संदेश पूरे देश को क्या जाता है। विदर्भ के किसी गांव में कोई किसान खुद जान देता है तो दिल्ली या मुंबई के सियासी गलियारों में पत्ता तक नहीं खड़कता। तो क्या उस किसान को भी ऐसी जगह ही पहुंचकर जान देनी चाहिए जहां सुर्खियां मिलने की पूरी संभावना हो। सवाल पीड़ा देने वाला है लेकिन है देश की कड़वी हक़ीक़त। खैर....ड्रामा चालू आहे।