शनिवार, 14 मार्च 2015

दिल्ली के 'बूबी ट्रैप' में 'आप'...खुशदीप


आपने बूबी ट्रैप के बारे में सुना होगा? किस तरह उसमें दुश्मन को फंसाया जाता है। चलिए वो भी छोड़िए। आपने घर में चूहे का पिंजरा तो ज़रूर देखा होगा। कैसे रोटी का टुकड़ा रखकर चूहे को ललचाया जाता है। मैं समझता हूं दिल्ली की राजनीति में भी यही हो रहा है। भला कैसे? आप ये जानना चाहेंगे?

'आप' को दिल्ली की सत्ता में दोबारा आए महज़ एक महीना ही हुआ है। पिछली बार दिल्ली में 'आप'  सत्ता में आई थी तो 49 दिन में बोरिया-बिस्तर समेट कर चलती भी बनी थी। अल्पमत की जो सरकार बनाई थी। लेकिन इस बार 'आप' ये भी नहीं कर सकती। प्रचंड बहुमत की जो सरकार है।

एक महीना होते ही आम आदमी पार्टी की सरकार की 'चीड़फ़ाड़' होने लगी है। एक एक मंत्री, एक एक विधायक का रिपोर्ट कार्ड मीडिया दिखाने लगा है। एक एक विधायक के इलाके में जाकर सवाल करने लगा है कि 'आप' सरकार आने के बाद क्या बदलाव हुआ है? विधायक-मंत्री दिन में कितने घंटे आम लोगों से मिलते हैं? बुनियादी सुविधाएं मिलने की स्थिति क्या है?

ज़ाहिर है लोगों ने 'आप' के नेताओं पर सत्ता मिल जाने के बाद बदल जाने की शिकायतें करना भी शुरू कर दिया है। कहने लगे है कि 'आप' के नेताओं ने भी दूसरे राजनीतिक दलों की तरह बर्ताव करना शुरू कर दिया है। इसके अलावा 'आप' के अंदरुनी घमासान ने भी आम लोगों के साथ पार्टी के वॉलन्टियर्स को भी निराश किया है।

लेकिन दिल्ली में 'आप' के ख़िलाफ़ इसी चिल्ला चिल्ली में किसी ने ध्यान दिया कि केंद्र की सत्ता में बीजेपी सरकार को आए कितने दिन हो गए। मैं एनडीए सरकार नहीं कह रहा क्योंकि सहयोगी दल बीजेपी पर किसी तरह का दबाव डालने की स्थिति में नहीं है। ख़ैर, मेरा सवाल दूसरा है। केंद्र में सत्ता परिवर्तन हुए 9 महीने, 20 दिन हो गए हैं। 'आप' से तो एक महीने में ही मीडिया सवाल करने लगा है, क्या किसी ने केंद्र की सरकार को लेकर भी बीजेपी से ऐसे चुभते सवाल किए हैं। किसी बीजेपी सांसद के इलाके में जाकर उसका रिपोर्ट कॉर्ड पेश किया है।

आज मीडिया का पूरा फोकस कहां है? अरविंद केजरीवाल बेंगलुरू में अपना प्रिय गाना गा रहे हैं। छींक रहे हैं। दिल्ली में 'आप' नेता झगड़ रहे हैं। केजरीवाल समेत 'आप' नेताओं के ख़िलाफ़ स्टिंग्स की भरमार है। एक साल पहले के गढ़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं। कांग्रेस के तत्कालीन विधायकों को पटा कर दोबारा सरकार बनाने की कोशिश की गई थीं। मुसलमानों को 'आप' को वोट देना मजबूरी बताया गया था...वगैरहा...वगैरहा...

लेकिन इसी आपाधापी में किसी ने ध्यान दिया कि 'आप'  पर मैग्नीफाइंग ग्लास होने से सबसे ज़्यादा राहत किसको मिली? साफ़  है कि अब किसी का इस बात पर ध्यान नहीं है कि 2014 में केंद्र की सत्ता में आने से पहले चुनाव में बीजेपी ने लोगों से क्या क्या वादे किए थे। उन पर अब तक कितना अमल हुआ है।

चाणक्य नीति कहती है कि बड़ी बाज़ी जीतने के लिए कभी कभी छोटी बाज़ी हारनी भी पड़ती है। क्या दिल्ली में भी ऐसा ही हुआ था? पिछले महीने दिल्ली के नतीजे आने के फौरन बाद लिखे गए इस लेख में शायद आपको कुछ सवालों के जवाब मिल जाए।


क्या बीजेपी दिल्ली में जानबूझकर हारी?

गुरुवार, 12 मार्च 2015

'सफ़ेद' और 'रंगीन' क्रिकेट का फ़र्क़...खुशदीप


हमने बचपन में सफ़ेद क्रिकेट देखी हैखेली है। अब क्रिकेट रंगीन है। इसलिए इसकी हर बात रंगीन है।

पहले रेडियो पर क्रिकेट को सुना जाता था। आज टीवी पर क्रिकेट को देखा जाता है। टीवी पर आज क्रिकेट देखने के साथ सुना भी जाता हैये जानकर नहीं लिख रहा। क्योंकि इसमें सुनने जैसी कोई बात नहीं है। ना भी सुना जाए तो देखने और स्क्रीन पर स्कोर बोर्ड पढ़ने से भी काम चल सकता है। 

मैं विशेष तौर पर आजकल टीवी पर की जाने वाली उस हिेंंदी कमेंट्री की बात कर रहा हूंजो मैदान से नहीं होती। विश्व कप के मैच ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में हो रहे हैं। लेकिन ये हिंदी कमेंट्री दिल्ली-मुंबई के स्टूडियोज़ से ही की जाती है। इस कमेंट्री का ज़िम्मा कुछ पूर्व क्रिकेटर्स पर है। ये भी हमारी तरह टीवी स्क्रीन पर मैच  देखकर ही कमेंट्री करते हैं। ये क्या बोलते हैंकैसा बोलते हैंजिन्होंने भी इन्हें सुना हैवो बेहतर बता सकते हैं। मैं इस पर कोई कमेंट नहीं करूंगा।

हांउस दौर का ज़िक्र ज़रूर करना चाहूंगा जब जसदेव सिंहसुशील दोषीमुरली मनोहर मंजुल और रवि चतुर्वेदी हिंदी में रेडियो पर कमेंट्री करते थे। ये जब 'आंंखों देखा हालसुनाते थे तो शब्दों और आवाज़ के उतार चढाव से ही सुनने वालों के ज़ेहन में क्रिकेट के मैदान की हर फील को उकेर देते थे। क्रिकेट का वो रोमांच अद्भुत था।  इसे नोस्टेलजिया भी कह सकते है। इसे वही जान सकते हैं जिन्होंने उस कमेंट्री को पॉकेट ट्राज़िस्टर स्कूल या दफ्तर छुपा कर ले जाकर सुना है।  

तकनीक विकसित होने के साथ क्रिकेट मैचों का प्रसारण भी उन्नत हुआ है। टीवी पर ब्लैक एंड व्हाइट प्रसारण के दिनों से आज वो दौर भी आ गया है जब स्टम्प्स पर ही कैमरे लगे होते हैं। स्टम्प पर बॉल छूते ही लाइट जल जाती है। कई-कई कोणों से मैच दिखाया जाता है। ब्लैक एंड व्हाइट प्रसारण के दौर में विकेट के एक तरफ ही टीवी कैमरे लगे होते थे। उस वक्त एक ओवर बैट्समैन को सामने की तरफ से बैटिंग करते देखा जाता था यानि उसका मुंह कैमरे की तरफ रहता था। फिर अगले ओवर में बैट्समैन के बैटिंग करते वक्त उसकी पीठ दिखाई देती  थी।


क्रिकेट पहले जिस तरह कंट्री सैन्ट्रिक था वैसा आज नहीं दिखता। इसका एक कारण ये भी हो सकता है कि उस वक्त आज की तरह पूरा साल क्रिकेट नहीं होता था। आईपीएलचीयरलीडर्सनाइट पार्टीज़ ने आज क्रिकेट को तमाशा अधिक बना दिया है। अब इसकी हर बात कॉमर्शियल है। सत्तर के दशक के शुरू तक क्रिकेट खिलाड़ियों का मेहनताना प्रति दिन के हिसाब से कुछ सौ रुपये में ही होता था। आज क्रिकेटर की कमाई के स्रोत अनंत है। मैं किसी स्याह स्रोत की नहींसफेद स्रोतों की ही बात कर रहा हूं।

देश में सत्तर के दशक तक क्रिकेट और हॉकी समान तौर पर लोकप्रिय थे।1975 में कुआलालंपुर में भारत ने हॉकी का विश्व कप जीता था तो हॉकी खिलाड़ियों को देश ने वैसे ही हाथों हाथ लिया था जैसे कि क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीतने पर क्रिकेटर्स को 1983 और 2011 में लिया था। उस वक्त अजीत पाल सिंहसुरजीत सिंहगोविंदाअसलम शेर ख़ान और अशोक कुमार (मेजर ध्यानचंद के सुपुत्र) समेत हॉकी टीम के सभी सदस्यों का सम्मान नायकों की तरह किया गया था। लेकिन 1983 में इंग्लैंड में कपिल देव के डेविल्स ने वर्ल्ड कप जीता तो उसी के साथ क्रिकेट का कॉमर्शियलाइज़ेशन शुरू हुआ। ये वही दौर था जब देश में कलर टेलीविज़न नया नया आया था। 

क्रिकेट से जैसे जैसे पैसा जुड़ता गया वैसे वैसे इसके उत्थान के साथ भारत में हॉकी का पतन भी होता गया।अस्सी के दशक के मध्य में ही शारजाह में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों का आयोजन शुरू हुआ। क्रिकेट पर सट्टेबाज़ी बड़े पैमाने पर की जाने लगी। उन्हीं दिनों में ऐसी तस्वीरें भी सामने आईं जिसमें शारजाह में अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम को मैच देखते हुए ही फोन पर बातें करते देखा जा सकता था। आगे चलकर क्रिकेट के सफेद दामन पर फिक्सिंग के दाग़ भी लगे। 

क्रिकेट को दुनिया भर में गवर्न करने वाली संस्था आईसीसी की कमान जहां पहले इंग्लैंड जैसे देश के क्रिकेट बोर्डों के हाथ में रहती थी वो भी भारत जैसे उपमहाद्वीप के देशों के हाथ में आ गई। आईसीसी का हेडक्वार्टर भी लंदन की जगह दुबई हो गया। भारत का क्रिकेट बोर्ड (बीसीसीआई) आज दुनिया के सभी क्रिकेट बोर्डों में सबसे अमीर और सबसे शक्तिशाली माना जाता है। क्रिकेट मैचों के टीवी प्रसारण अधिकार बेचने से ही बोर्ड को अरबों की कमाई होती है। लेकिन इतना सब होने के बाद भी क्रिकेट से आज उसकी आत्मा गायब नज़र आती है। शायद मेरे ये विचार जेनेरेशन गैप भी हो सकते हैं।

स्लॉग ओवर

हर्षा भोगले को छोड़ दिया जाए तो आज टीवी पर कमेंट्री अधिकतर पूर्व क्रिकेटर ही करते हैं। लेकिन जब रेडियो पर कमेंट्री का ज़माना था तो कमेंटेटर्स के साथ एक्सपर्ट कमेंट्स के लिए एक पूर्व क्रिकेटर को बुलाया जाता था। इस काम के लिए लाला अमरनाथ को बहुत याद किया जाता था। लाला अुमरनाथ बेबाकी से अपनी बात कहते थे। कई बार वे सवाल पूछने वाले कमेंटेटर को भी लाजवाब कर दिया करते थे। ऐसे ही एक बार टेस्ट मैच के शुरू होने पर एक कमेंटेटर लालाजी से सवाल कर बैठा-  "लालाजी आज कोटला के मैदान पर घास भी हरी नज़र आ रही हैआप इस पर क्या कहते हैं?"  इस पर लालाजी का एक्सपर्ट कमेंट था-  "मैंने तो घास हमेशा हरी ही देखी हैआपने शायद दूसरे रंग की भी देख रखी होगी।"









शुक्रवार, 6 मार्च 2015

तसल्ली है कि अच्छी ख़बर भी पढ़ी जाती है...खुशदीप


ख़बरों की दुनिया में रहता हूं। जिस तरह टीवी की दुनिया में टीआरपी और अख़बार की दुनिया में सर्कुलेशन के आंकड़े महत्व रखते हैं उसी तरह आज डिजिटल मीडिया या न्यू मीडिया में पेज व्यू काउंट की अहमियत है। ये मेरा सौभाग्य है कि तीनों तरह के माध्यम में मुझे काम करने का अनुभव है। इन दिनों डिजिटल मीडिया (न्यूज़ वेबसाइट) से कदमताल कर रहा हूं। सोशल मीडिया में ब्लॉगिंग, फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से भी आप मुझे जानते हैं।

डिजिटल न्यूज़ बिज़नेस में आपकी किसी पोस्ट को कितने हिट मिले या पाठक मिले। ये कॉमर्शियल मॉडल है। यानि खबरों का अर्थशास्त्र है। स्वाभाविक है कि जिस तरह की ख़बरों को हिट, लाइक या पाठक मिलते हैं, उसी तरह की ख़बरों को अधिक से अधिक पेश करने की कोशिश की जाती है। इनका पेश करने का तरीका भी अख़बारों से अलग होता है। यहां पाठकों को आकर्षित करने के लिए चटपटी हैडिंग या शीर्षक लगाए जाते हैं। भड़कीले या उत्तेजक फोटो लगाए जाते हैं।

डिजिटल न्यूज़ यानि इंटरनेटी ख़बरों के आप तक पहुंचने के दो माध्यम है- डेस्कटॉप (लैपटॉप)  अथवा मोबाइल। खास तौर पर आज का युवा वर्ग मोबाइल से ही फेसबुक, ट्विटर पर रहने के साथ अपने मतलब की ख़बरों से भी टच में रहता है। इस तरह के पाठकों की पसंद हार्डकोर न्यूज़ से अधिक लाइट न्यूज़ होती है। यानि सिनेमा, क्रिकेट, गैज़ेट्स, करियर, हेल्थ,गॉसिप, बोल्ड (इंटीमेट) विषयों से जु़डी ताज़ा ख़बरें। पॉलिटिक्स में भी इनकी रुचि है लेकिन सैटायर और डॉर्क ह्यूमर के साथ।

सिनेमा, क्रिकेट, सेक्स से जुड़ी पोस्ट को सबसे ज्यादा लाइक मिलते देखकर मैं सोचने को मजबूर हो गया कि कि भविष्य का न्यू़ज़ मीडिया यानि डिजिटल मीडिया किस दिशा में जा रहा है? क्या  यहां अच्छी ख़बरों को पढ़ने वालों का अकाल हो जाएगा। क्या पॉजिटिव न्यूज़ को स्पेस मिलना बिल्कुल ही बंद हो जाएगा। कॉमर्शियल कारणों के हावी रहने से मसाला ख़बरों को अधिक से अधिक तरजीह देने से युवा वर्ग की सोच कैसी होती जाएगी। वो भी उस देश में जिसमें दुनिया में सबसे अधिक युवा बसते हैं।

इसी द्वन्द्व से गुज़रते हुए आज मेरे सामने पाकिस्तान से एक स्टोरी का डिस्पैच अंग्रेज़ी में आया। ये स्टोरी मेरे दिल को छू गई। इसलिए मैंने इसे हिंदी में बनाया। स्टोरी कराची से थी। वहां नेशनल स्टूडेंट फेडरेशन के आह्वान पर लोगों ने स्वामीनारायण मंदिर के बाहर मानव-घेरा बनाया। इसलिए कि मंदिर में हिंदू बिना किसी असुरक्षा के भावना के होली का त्योहार मना सके। वहां एनएसएफ के युवा फवाद हसन ने जो कुछ भी कहा, अगर उसी सोच पर सब चलें तो यक़ीन मानिए सरहद के इस पार या उस पार सारे फ़साद ही ख़त्म हो जाएंगे। खैर इस स्टोरी का लिंक मैं सबसे आख़िर में दे दूंगा। लेकिन मुझसे सबसे ज़्यादा खुशी हुई इस स्टोरी को मिले रिस्पॉन्स से। खास तौर पर युवा वर्ग से।

स्टोरी को रिट्वीट और लाइक किए जाने से। धर्म को लेकर मैं एक दूसरे पर छींटाकशी वाले कमेंट्स ही सोशल मीडिया पर अधिकतर पढ़ता आया हूं। लेकिन इस स्टोरी पर जो कमेंट आए, उससे युवा वर्ग के लिए मेरे दिल में सम्मान और बढ़ गया है। आप लिंक पर जाकर देखेंगे कि कमेंट करने वालों में हिंदू और मुस्लिम बराबर है...एक भी नकारात्मक टिप्पणी नहीं...यही पॉजिटिव सोच अगर हम ऱखेंगे, सहअस्तित्व की भावना रखेंगे तो हमें दुनिया में आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकेगा। एक बात और जिससे मुझे सबसे तसल्ली मिली कि अच्छी ख़बरों के कद्रदान आज भी बहुत है। बस ज़रूरत है ऐसी ख़बरोे को ढूंढ कर सामने लाने की...

मेरे कहने से नीचे के लिंक वाली ख़बर को एक बार पढ़िए ज़रूर....

पाकिस्तान में होली पर हिंदुओं का साथ देने के लिए मंदिर के बाहर मानव-घेरा 

सोमवार, 2 मार्च 2015

हिंदी ब्लॉगिंग, अच्छे दिन और गूगल हैंगआउट...खुशदीप

(2 मार्च 2015 को गुड़गांव में गूगल के ऑफिस में हैंगआउट)...
दोस्तों, करीब तीन महीने के अंतराल के बाद कोई पोस्ट लिख रहा हूं...क्षमाप्रार्थी हूं, अपनी व्यस्तताओं की वजह से नियमित ब्लॉगिंग नहीं कर सका...अब प्रयत्न करूंगा कि कुछ ना कुछ लिखता रहूं....अतीत की तरह प्रति दिन नहीं लिख पाऊं तो दो-तीन के अंतराल पर सही...मेरा आप सब से भी अनुरोध है कि हिंदी ब्लॉगिंग का सुनहरा दौर लौटाने के लिए प्रयास करें, जैसा कि आज से 5-6 साल पहले था...
जैसा कि आप जानते हैं कि पिछले 6-7 महीने में गूगल ने हिंदी को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक कदम उठाए हैं...इनमें हिंदी के लिए एडसेंस शुरू करना भी शामिल है...हालांकि इस दिशा में  गूगल से अब भी बहुत कुछ अपेक्षित है...लेकिन गूगल ने पहल की है इसलिए उसका स्वागत किया जाना चाहिए...मुझे याद है जब मैंने 2009 में ब्लॉगिंग शुरू की थी तब ब्लॉगर्स में बहुत उत्साह था...इसकी एक वजह चिट्ठा-जगत और ब्लॉगवाणी जैसे अच्छे एग्रीगेटर्स (संकलक) की उपस्थिति थी...चिट्ठा जगत में ब्लॉगर्स की रैंकिंग की वजह से ब्लॉगर्स में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा रहती थी...

ब्लॉग्स पर टिप्पणियां भी खूब आती थीं, जो ब्लॉगर्स के लिए ट़ॉनिक की तरह काम करती थी...उस वक्त हिंदी ब्लॉगर्स को ये उम्मीद भी थी कि हिंदी के लिए गूगल शीघ्र एडसेंस की सुविधा प्रारंभ करेगा...लेकिन ये प्रतीक्षा बनी ही रही...एक और वजह ये भी रही कि फेसबुक का प्रादुर्भाव...ब्लॉग्स पर जो टिप्पणियां आती थीं वो फेसबुक की तरफ़ शिफ्ट हो गईं...फेसबुक कंटेंट की वजह से नहीं अधिकतर दोस्त-रिश्तेदारों के बीच हल्के-फुल्के संवाद, एक-दो पक्तियों की पोस्ट्स, फोटो पर लाइक्स और कमेंट्स की भरमार की वजह से तेज़ी से लोकप्रिय हुआ...ट्विटर ने भी अपनी अच्छी स्पेस बनाई...इससे ऐसा आभास हुआ कि हिंदी ब्लॉगिंग आईसीयू में पहुंच गई है...
डॉक्टर साहब का ऐसा मानना ग़लत नहीं है...निश्चित रूप से इस उदासीनता के लिए हम उत्तरदायी हैं...लेकिन मैंने ये भी देखा कि कुछ ब्लॉगर्स टिप्पणियों या पाठकों की घटती संख्या से विचलित हुए बिना भी लगातार ब्लॉग लेखन करते रहे...उनके लिए अच्छा कंटेंट महत्वपूर्ण था...उन्हें पाठक भी मिलते रहे...दरअसल ब्लॉगर्स को यही समझना चाहिए...Content is King...आपका लेखन यूज़र्स फ्रेंडली होना चाहिए....अगर आपकी किसी पोस्ट से पाठकों को कोई नई बात, नई जानकारी या किसी जिज्ञासा का निवारण होता है, तो उस पोस्ट को वर्षों बाद भी सर्च इंजन से आने वाले पाठक मिलते रहेंगे...
गूगल से पिछले कुछ अर्से से मुझे संवाद करने का अवसर मिला है...जहां तक मैं समझ पाया हूं कि गूगल यही चाहता है हिंदी में अच्छा और ओरिज़नल कंटेट अधिक से अधिक सामने आए...अगर आप ऐसा करते हैं तो गूगल को भी आपके ब्लॉग्स को प्रोत्साहित करने में प्रसन्नता होगी...आर्गेनिक सर्च में रैंकिंग में आपका पेज़ ऊपर दिखाई दे तो इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण यही है कि आप किस तरह कंटेंट उपलब्ध कराते हैं...

यहां कुछ ऐसी भ्रांतियां हैं कि आप एसईओ (सर्च इंज़न ऑप्टिमाइज़ेशन) को हायर कर घटिया कंटेंट के ज़रिए भी सर्च में ऊपर आ सकते हैं...ऐसा कुछ नहीं हैं...बल्कि गलत तरीके अपनाने वालों को गूगल बहुत ज़ल्दी पकड़ लेता है...हो सकता है कि ऐसा करने वालों के ब्लॉग और साइट गूगल सर्च में बिल्कुल दिखने ही बंद हो जाएं...ऐसे में सलाह यही है कि आप खुद एसईओ के बारे में जानकारी लें...गूगल ने इसके लिए दिशानिर्देश तैयार कर रखे हैं...इसे आसानी से समझने के लिए विडियो भी बना रखे हैं...गूगल अब नियमित तौर पर हैंगआउट्स के ज़रिए भी वेबमास्टर्स (वेबसाइट संचालक, ब्लॉगर्स) से संवाद कायम कर रहा है...आप में से अधिकतर को ज्ञात होगा कि गूगल ने हिंदी के लिए एक कम्युनिटी भी बनाई है..जहां आप अपने सवालों के जवाब जान सकते हैं...
हिंदी ब्लॉगर्स से संवाद की कड़ी में ही गूगल ने हैंगआउट में हिस्सा लेने के लिए आज गुड़गांव में अपने ऑफिस में आमंत्रित किया...नवभारत टाइम्स के संपादक (संपादकीय पृष्ठ) चंद्रभूषण जी, भाई सतीश सक्सेनाजी, भाई राजीव तनेजा, प्रतिभा कुशवाहा के साथ तकनीकी ब्लॉग और एसईओ फर्म चलाने वाले रमेश कुमार और सत्येंद्र के साथ मुझे भी  इसमें हिस्सा लेने का अवसर मिला...हैंगआउट का संचालन हैदराबाद से गूगल सर्च क्वालिटी टीम के दिग्गज सैयद मलिक ने किया...सैयद मलिक ने हिंदी में पारंगत ना होने के बावजूद इतनी सरल और धाराप्रवाह हिंदी में सब कुछ समझाया कि हैरान होने की हमारी बारी थी...मैं हैंगआउट का लिंक देने से पहले गूगल टीम से दो और सदस्यों का उल्लेख करना चाहूंगा...ये नाम है बेंगलुरु से मिथिलेश मिश्रा और गुड़गांव से मुकुट चक्रवर्ती...इन्होंने इस हैंगआउट को सफल बनाने के  लिए तो अथक परिश्रम किया ही, साथ ही ये हिंदी कम्युनिटी को भी मज़बूत बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे...

हैंगआउट में एसईओ, एडसेंस, एग्रीगेटर्स समेत अनेक मुद्दों पर विचार हुआ जो आपके ब्लॉग या वेबसाइट की सार्थकता बढाने में बहुत सहायक हो सकते हैं...अब मैं और फुटेज नहीं खाता...आप खुद ही लीजिए गूगल हैंगआउट के संवाद का आनंद इस विडियो में...