गुरुवार, 30 अक्तूबर 2014

सिक्किम में हो रही है नए युग की शुरुआत...खुशदीप

देश में खेती ने एक चक्र पूरा किया है और अब यह अपना रूप बदल रही है। यह सही है कि आधी सदी पहले देश में शुरू हुई हरित क्रांति ने खाद्यान्न के क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाया। अब ठहरकर यह सोचने का वक्त है कि पिछले पांच दशक में हमने क्या पाया, क्या खोया? अधिक से अधिक उपज पाने की हमारी सनक आखिर हमें कहां ले आई है? रसायनों और जहरीले कीटनाशकों के दम पर हुई इस क्रांति ने जमीन की माटी और पानी को कितना नुकसान पहुंचाया?



पश्चिमी देशों में सन 1850 से ही रासायनिक खादों का इस्तेमाल प्रारंभ हुआ। लेकिन भारत में रासायनिक खादों से खेती की शुरुआत सन 1965 में हरित क्रांति के साथ हुई थी। तब रसायनों के बुरे प्रभाव के तर्कों को नजरंदाज किया गया। उपज तो बढ़ी, लेकिन जब कीट व कई रोग फसलों पर आक्रमण करने लगे, तो कीटनाशकों का प्रयोग होने लगा। एक ही मौसम में गोभी के लिए कीटनाशकों के आठ से दस छिड़काव, कपास के लिए 13 से 15 छिड़काव और अंगूर के लिए 30-40 छिड़काव। कीटनाशक अवशेषों के कारण ऊपरी नरम मिट्टी कड़क होने लगी। भू-जल सल्फाइड, नाइट्रेट और अन्य रसायनों से प्रदूषित हुआ। प्राकृतिक संतुलन खो गया और कीटों का प्रकोप बना रहा। इनका छिड़काव करने वाले किसान दमा, एलर्जी, कैंसर और अन्य समस्याओं के कहीं ज्यादा शिकार होने लगे। इसके मुकाबले उपज देखें, तो 1965 से 2010 तक रसायनों का इस्तेमाल कई गुना बढ़ा, लेकिन उपज सिर्फ चार गुना ही बढ़ी। यह बढ़ोतरी भी केवल रासायनों के दम पर नहीं हुई। खेती वाली जमीन में वृद्धि और सिंचाई की बेहतर व्यवस्था ने इसमें महत्वपूर्ण योगदान दिया।
अब इसकी उल्टी धारा चलाने का समय है। सिक्किम जैसा राज्य इसका रास्ता दिखा रहा है। सिक्किम 2015 में शत-प्रतिशत ऑर्गेनिक फार्मिंग का लक्ष्य हासिल करने जा रहा है। ऐसा दुनिया में कहीं नहीं हो सका, पर सिक्किम ने इसे कर दिखाया है। सिक्किम ने दिखाया है कि ठान लिया जाए, तो रसायनों और जहरीले कीटनाशकों से पूरी तरह तौबा कर पौधे, पशु, कम स्टार्च वाले पदार्थ, ग्रीन हाउस जैसे ऑर्गेनिक उपायों का इस्तेमाल कर पर्याप्त कृषि उत्पाद हासिल किए जा सकते हैं। इतना ही नहीं, खेती की कमाई के एक बड़े हिस्से को रासायनिक उद्योग के हवाले हो जाने पर भी रोक लगाई जा सकती है। 

सिक्किम जैसे राज्य के लिए इसका अर्थ हुआ खेती की कमाई को राज्य के बाहर जाने से रोकना। उसने इसके लिए नौजवानों और किसानों को तैयार किया। इसका इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाया और किसानों को तकनीक दी। अब सिक्किम जाने वालों को सिर्फ यहां के कुदरती नजारे नहीं मिलेंगे, बल्कि वे जो खाएंगे या पिएंगे, वे भी कुदरती ही होंगे। देश के बाकी राज्य इस ओर कब बढ़ेंगे? कुछ भी हो, देर-सवेर उन्हें यह रास्ता अपनाना होगा।

मूलत: प्रकाशित हिन्दुस्तान, 30 अक्टूबर 2014

मंगलवार, 28 अक्तूबर 2014

मोदी मैजिक की जेके-झारखंड में असली परीक्षा...खुशदीप

ब्रह्मास्त्र के लिए भी मुश्किल मोर्चे...

जम्मू-कश्मीर और झारखंड में चुनाव का बिगुल बज चुका है। इन दोनों राज्यों में 25 नवंबर से 20 दिसंबर तक पांच चरणों में चुनाव होंगे। वोटों की गिनती 23 दिसंबर को होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव कार्यक्रम की घोषणा से दो दिन पहले दीपावली के दिन श्रीनगर पहुंच कर जता दिया था कि उनका अगला निशाना कहां है। मोदी और उनके ‘भाग्यशाली सिपहसालार’ अमित शाह जम्मू-कश्मीर और झारखंड फतह करने के लिए अपने तरकश का हर तीर आजमाएंगे।

शायद यही वजह है कि बीजेपी जब हरियाणा-महाराष्ट्र की जीत पर जश्न में डूबी थी, मोदी ने जम्मू-कश्मीर जाने का ‘मास्टरस्ट्रोक’ खेला। कहा गया कि वह बाढ़ की आपदा से गुजरे घाटी के लोगों के बीच जाकर उनका दर्द बांटना चाहते हैं। यह अलग बात है किश्रीनगर में वे कुल जमा चार घंटे ही रुके और राजभवन में राजनीतिक दलों के प्रतिनिधिमंडलों से अलग-अलग मुलाकात करने के बाद दिल्ली लौट आए। राहत-शिविरों में रह रहे हजारों लोग इंतजार ही करते रह गए कि पीएम उनके आंसू पोंछने आएंगे।



कसौटी पर छवि
घाटी में सैलाब ने सब कुछ तबाह कर दिया है। गरीबों की बात छोड़िए, श्रीनगर के पॉश इलाकों में भी कुदरत की मार ने लोगों को कहीं का नहीं छोड़ा है। ऐसे में वहां प्राथमिकता राहत और पुनर्वास के काम को युद्धस्तर पर आगे बढ़ाने की है। संवैधानिक बाध्यता के चलते चुनाव को अधिक समय तक टाला नहीं जा सकता था। लेकिन लोकतंत्र के इस पर्व में व्यापक हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए ‘लोक’ को सबसे पहले त्रासदी के अवसाद से निकाला जाना चाहिए था।

बहरहाल, जम्मू-कश्मीर में सत्तारूढ़ नैशनल कॉन्फ्रेंस को छोड़कर मुख्यधारा के सभी राजनीतिक दलों ने चुनाव कार्यक्रम का स्वागत किया है। नैशनल कॉन्फ्रेंस ने कहा है कि लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए वह चुनाव में हिस्सा लेगी, लेकिन यह वक्त इलेक्शन के लिए उपयुक्त नहीं है। जहां तक अलगाववादी संगठनों का सवाल है तो उनके लिए जम्मू-कश्मीर के लोगों के हित से ऊपर हमेशा अपना अजेंडा ही रहता है। इसलिए हर बार की तरह वे इस बार भी बहिष्कार का हथकंडा अपनाएंगे।

जम्मू-कश्मीर और झारखंड में एक साथ चुनाव कराना सुरक्षा एजेंसियों के लिए बेहद चुनौतीपू्र्ण होगा। जम्मू-कश्मीर लंबे समय से अलगाववादी आतंकवाद से ग्रस्त है, जबकि झारखंड के अधिकतर हिस्से नक्सलवाद की चपेट में हैं। इसे देखते हुए पांच चरणों में मतदान के चुनाव आयोग के फैसले को ठीक ही कहा जाएगा। दोनों राज्यों के राजनीतिक समीकरणों की बात की जाए तो बीजेपी की कोशिश रहेगी कि यहां भी महाराष्ट्र-हरियाणा की तर्ज पर नरेंद्र मोदी की छवि को आगे रखकर चुनाव लड़ा जाए।

दोनों जगह किसी नेता को मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करने से बीजेपी परहेज ही करेगी। वह जानती है कि जम्मू-कश्मीर की 87 सीटों वाले विधानसभा चुनाव की चुनौती अधिक मुश्किल है। इसीलिए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने यहां मिशन 44 के तहत पिछले कई महीनों से आक्रामक चुनावी अभियान छेड़ रखा है। राज्य में बीजेपी का सबसे अच्छा प्रदर्शन 2008 विधानसभा में रहा था, जब पार्टी ने 11 सीटें जीती थीं। पांच महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में जम्मू और लद्दाख में 41 विधानसभा क्षेत्रों में से 27 पर बीजेपी ने बढ़त कायम की थी। लेकिन घाटी की 46 सीटों में एक पर भी बीजेपी को बढ़त नहीं मिल सकी थी। घाटी में वोट पारंपरिक तौर पर नैशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस और पीडीपी में बंटते रहे हैं। इस बार अगर वहां नेशनल कॉन्फ्रेंस के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर चलती है, तो इसका सबसे ज्यादा फायदा पीडीपी को मिलने की उम्मीद है।

चंद महीने पहले तक कांग्रेस राज्य की सत्ता में नैशनल कॉन्फ्रेंस के साथ थी। इसलिए राज्य में भ्रष्टाचार, कुशासन और बेरोजगारी को लेकर लोगों की नाराज़गी का खामियाजा कांग्रेस को भी भुगतना पड़ सकता है। बीजेपी जम्मू-लद्दाख में अपनी पूरी ताकत झोंकने के साथ घाटी में भी इस बार अपनी दमदार दस्तक देना चाहती है। मोदी का मैजिक यहां कारगर रहता है या नहीं, यह तो 23 दिसंबर को वोटों की गिनती के बाद ही साफ होगा। जहां तक झारखंड का सवाल है तो वहां स्थिरता एक बड़ा चुनावी मुद्दा है। वर्ष 2000 में राज्य बनने के बाद यहां 12 बार सरकारें बनी और बिगड़ी हैं। मौजूदा झारखंड मुक्ति मोर्चा सरकार भी कांग्रेस की बैसाखियों पर चल रही है।

महागठबंधन की आस
केंद्र में जिस तरह बीजेपी को अकेले अपने बूते बहुमत की सरकार बनाने में सफलता मिली, स्थिरता का वही नुस्खा वह झारखंड के लोगों के सामने भी पेश कर रही है। उसने बिना किसी गठबंधन के राज्य की सभी 81 सीटों पर उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया है। दूसरी पार्टियां भी बीजेपी को कड़ी चुनौती देने के लिए बिहार की तर्ज पर महागठजोड़ के लिए कमर कस रही हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस, आरजेडी और जेडीयू साथ मिलकर अपनी चुनावी नैया पार लगाने की कोशिश में हैं। बीजेपी बनाम सेकुलर राजनीतिक दलों का यह प्रयोग बिहार उपचुनाव की दस सीटों पर कामयाब रहा था, लेकिन समूचे राज्य के लिए इसका इस्तेमाल पहली बार झारखंड में हो रहा है। देखना होगा कि झारखंड में यह अस्त्र कारगर रहता है या नरेंद्र मोदी का जादू चलता है?

मूलत: प्रकाशित- नवभारत टाइम्स, 28 अक्टूबर 2014

शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2014

कूल है गूगल हिंदी इनपुट टूल...खुशदीप



हर तरफ गूगल हिंदी इनपुट और एंड्रॉयड वन फोन की चर्चा है। खास तौर पर हिंदीभाषियों के लिए। अधिकतर हिंदीभाषी अभी तक मोबाइल पर कोई एसएमएस भेजना हो या ईमेल करना हो अथवा सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपडेट करना हो, Whatsapp पर चैट करना हो तो हिंदी को रोमन भाषा में ही लिखते रहे हैं जैसे कि...Namaskar, Aap kaise hain?। इस विधि से काम तो चल जाता है लेकिन संवाद करने में अटपटा ज़रूर लगता है। साथ ही अपनी भाषा की आत्मीयता (फील) भी नहीं आ पाती।

एंड्रॉयड मोबाइल पर गूगल हिंदी इनपुट की सुविधा से इस समस्या का काफ़ी हद तक समाधान हो गया है। ये टूल हिंदी में टाइप करने के लिए ये सबसे लोकप्रिय कीबोर्ड है। ये फोनेटिक टाइपिंग टूल है। यानि ये महत्व नहीं रखता कि आपको हिंदी टाइपिंग आती है या नहीं। आप अंग्रेज़ी कीबोर्ड पर टाइप करना शुरू करें और ये टूल उसे खुद--खुद देवनागरी हिंदी में बदलता जाता है।

जैसा कि आप सभी ने नोट किया होगा कि गूगल पिछले कुछ समय से भारत में अपनी योजनाओं के लिए हिंदी पर बहुत ज़ोर दे रहा है। इसी उद्देश्य से हाल ही में गूगल ने कम दाम पर एंड्रॉयड वन स्मार्टफोन लॉन्च किए हैं। इन फोनों में गूगल हिंदी इनपुट टूल के अलावा और क्या स्पेसिफिकेशन्सहैं, इस पर आगे बात करेंगे। इस सेगमेंट के दूसरे फोन की भी चर्चा करेंगे। 

पहले ये देखा जाए कि एंड्रॉयड मोबाइल पर गूगल हिंदी इनपुट टूल की मदद से कैसे हिंदी टाइपिंग की जा सकती है। लेकिन ऐसा करने से पहले ये ध्यान रखना ज़रूरी है कि ये टूल एंड्रॉयड 4.0 से पहले के वर्जन पर काम नहीं करता। अगर आपका एंड्रॉयड 4.0 से ऊपर के वर्जन का है तो इस टूल को गूगल प्ले से डाउनलोड करना होगा। 

फिर Settings में Language & Input पर जाकर Google Hindi Input से इस टूल को अपने एंड्रॉयड फोन पर एक्टिव करना होगा। टाइपिंग शुरू करने से पहले फोन के टॉप पर नोटिफिकेशन एरिया में Choose Input method को चुनकर टूल बदल लें। अब जो लेआउट दिखेगा, उस पर टाइप करना शुरू करेंगे तो हिंदी इनपुट मिल जाएगा। इसे नीचे वीडियो से अच्छी तरह समझा जा सकता है।



अगर आपको 'सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा' लिखना है तो आपको 'Saare Jahan Se Achcha Hindustan Hamara' टाइप करना होगा। कीबोर्ड के ऊपर एक पट्टी में आपको हिंदी शब्द दिखने लगेंगे।

अब बात गूगल के एंड्रॉयड वन फोनों की। गूगल ने तीन मोबाइल निर्माता कंपनियों की मदद से ये फोन देश में उपलब्ध कराए जा रहे हैं। माइक्रोमैक्स कैनवस ए1, कार्बन स्पॉर्क वी और स्पाइस ड्रीम उनो। 




मोबाइल बाज़ार के जानकारों के मुताबिक इस सेगमेंट में अभी तक मोटो ई की डिमांड सबसे अधिक रही है। इसकी बिक्री भारत में मई 2014 से शूरू हुई थी।


मोटो ई और गूगल एंड्रॉयड वन फोनों का मिलान किया जाए तो मज़बूत बैट्री के मामले में मोटो ई बेहतर है। मोटो ई में बैट्री Li-Ion 1980 mAh है। वहीं तीनों एंड्रॉयड वन फोनों में ये Li-Ion 1700 mAh है। लेकिन मोटो ई की कीमत को देखा जाए तो उससे कम दाम में एंड्रायड वन फोनों में उससे मिलते स्पेसिफ़िकेशन्स मौजूद हैं। यही नहीं एन्ड्रॉयड वन में 2 MP फ्रंट कैमरा है जो मोटो ई में नहीं है। कैमरा एंड्रॉयड फोनों और मोटो ई में एक समान 5 MP है। कोर प्रोसेसर में भी एंड्रायड वन फोन मोटो ई से आगे हैं। एंड्रॉयड वन में 1.3 GHz क्वैड कोर प्रोसेसर है, वहीं मोटो ई में 1.2 GHz डुअल कोर प्रोसेसर है। डिस्पले स्क्रीन भी एंड्रॉयड वन में बड़ा है। मोटो ई में डिस्पले स्क्रीन 4.3 इंच है, वहीं एंड्रॉयड वन में 4.5 इंच है। हालांकि स्क्रीन रेसोल्यूशन में मोटो ई आगे है। मोटो ई की स्क्रीन रेसोल्यूशन 540X960 पिक्सल है। एंड्रॉयड वन में ये रेसोल्यूशन 480X854 पिक्सल है।

 रैम मोटो ई और एंड्रॉयड वन फोनों में एक समान यानि 1 GB है। मेमोरी सब फोनों में 4 GB इसे 32 GB तक बढ़ाया जा सकता है।OS एन्ड्रॉयड फोनों में Android OS v4.4.4 KitKat है। मोटो ई में ये Android OS v4.4.2 KitKat जिसे 4.4.4 तक अपग्रेड किया जा सकता है।



एंड्रॉयड के चीफ़ सुंदर पिचाई भारत में ही जन्मे हैं। गूगल के एंड्रॉयड वन फोनों के लॉन्च के वक्त वो भारत आए थे। पिचाई के मुताबिक उनका लक्ष्य विश्व के पांच अरब लोग हैं जो बिना स्मार्ट फोन के रह रहे हैं। एंड्रॉयड वन में हिंदी के अलावा सात और भारतीय भाषाओं के लिए भी सपोर्ट हासिल है। इस सारी कवायद का मकसद यही दिखता है कि कीमत को लेकर काफ़ी सजग भारतीयों के लिए ही खास तौर परर एंड्रॉयड वन को बनाया गया है। यहां ये बताना भी ज़रूरी है कि एंड्रॉयड वन फोनों को अगले दो साल के लिए एंड्रॉयड से सभी अपग्रेड मिलते रहेंगे।

Android का नवीनतम संस्करण (4.4 किटकैट) चलाता है और नया ऑपरेटिंग सिस्टम रिलीज़ होते ही स्वचालित रूप से मिल जाता है मददगार नई चीजें जैसे ध्वनि आदेश और चतुराईपूर्ण इंजीनियरिंग से फ़ोन को तेजी से चलाने में, अधिक समय चलने, और अधिक आकर्षक फ़ोटो लेने में मदद करती हैं। इसे अपने अनुकूल बनाने के लिए एक ताजा होम स्क्रीन के साथ शुरू करें और उसे ठीक वैसा बनाने के लिए जैसा आप चाहते हैं अपने पसंदीदा Android ऐप्स और वॉलपेपर के साथ अनुकूलित कर लें। इनबिल्ट सिक्योरिटी इसकी एक और खासियत है। अपने फ़ोन को एक पासवर्ड, पैटर्न या यहां तक कि अपने चेहरे की छवि का उपयोग करते हुए अनलॉक करें। यदि आप अपना फ़ोन खो देते हैं, तो आप Android उपकरण प्रबंधक का उपयोग करके उसे खोज सकते हैं, लॉक कर सकते हैं, या दूरस्थ रूप से अपनी सामग्री को हटा सकते हैं

बुधवार, 1 अक्तूबर 2014

कुंडली देखेंं या प्रेम...या फिर मेडिकल साइंस की ज़रूरतें...खुशदीप

प्रेम पर भरोसा करें या कुंडली देखें...एक जोड़ा दिलोजान से एक दूसरे से प्यार करता है...लेकिन कुंडली उनके अरमानों पर कुंडली मार कर बैठ जाती है...अब क्या करें...क्या कुंडली ही सब कुछ है...या उपाय-शुपाय कर कोई रास्ता निकाला जा सकता है..ज्योतिष विज्ञान के अलावा भी क्या कुछ बातें हैं जिनका शादी-ब्याह से पहले ध्यान रखा जाना चाहिए...क्या कहती है इस बारे में मेडिकल साइंस...


(मूलत: प्रकाशित- नवभारत टाइम्स, 1 अक्टूबर 2014)

ज्योतिष से अलग, मेडिकल साइंस में ऐसा बहुत कुछ है जो शादी से पहले जान लेना जरूरी है। हमारे देश में शादी-ब्याह को जीवन का नहीं बल्कि जन्म जन्मांतर का साथ माना जाता है। इसलिए लड़के-लड़कियों के ब्याह के मामले में खास तौर पर हमारे बुजुर्ग कोई जोखिम नहीं लेना चाहते। अब ये अलग बात है कि ज्योतिषियों से सभी गुण मिलने का भरोसा मिलने के बाद भी कई शादियां टूट जाती हैं। हमारे महानगरों में भी पश्चिमी देशों की तर्ज पर अब तलाक के मामले बढ़ने लगे हैं। 

हमारे समाज में जो तबका प्रगतिशील माना जाता है वह भी शादी-ब्याह के मामलों में आगे बढ़ने से पहले ज्योतिषियों से सारी आशंकाओं को दूर कर लेना चाहता है। अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय की शादी के वक्त ऐसा ही कुछ देखने को मिला था। ऐश्वर्या की कुंडली के मंगलदोष को दूर करने के लिए लिए उनकी अभिषेक से पहले एक पेड़ से शादी कराने का समाचार मिला था।

वैसे गृह नक्षत्र, लग्न आदि को मानना या ना मानना किसी का निजी विषय है। लेकिन ज्योतिष से इतर लोग ये जानने में भी दिलचस्पी रख सकते हैं कि क्या विज्ञान भी शादी-ब्याह से पहले कुछ सावधानियां बरतने की मांग करता है? जापान की बात की जाए तो वहां लोग एक दूसरे का ब्लड ग्रुप जानने में बड़ी रुचि रखते हैं। वहां वर या वधू की तलाश के वक्त हर किसी को इस सवाल का सामना करना पड़ता है कि आपका ब्लड ग्रुप क्या है? वहां आम धारणा है कि ब्लड ग्रुप से आपके स्वभाव और व्यक्तित्व का पता लग सकता है।

जहां तक मेडिकल साइंस की बात है, उसके अनुसार शादी से पहले ब्लड ग्रुप मैच करने की जरूरत नहीं होती। लेकिन भावी जीवन साथी के एबीओ और आरएच ब्लड ग्रुप के बारे में जानना अहम रहता है। अगर एक आरएच नेगेटिव महिला का विवाह एक आरएच पॉजिटिव पुरुष से होता है तो उनका शिशु भी आरएच पॉजिटिव हो सकता है। इससे आइसोइम्युनाइजेशन की स्थिति बन सकती है। इसका मतलब ये है कि कोख में शिशु के विकास या प्रसव के वक्त शिशु का रक्त मां के रक्त में प्रवेश करता है तो मां के रक्त में एंटीबॉडीज का निर्माण होने लगता है।

ये इसलिए होता है कि मां का इम्युन सिस्टम आरएच नेगेटिव होने की वजह से आरएच पॉजिटिव रक्त का प्रतिरोध करता है। अब यही एंटीबॉडीज प्लासेंटा के जरिए शिशु के रक्त में प्रवेश करते हैं और उसकी आरएच पॉजिटिव लाल रक्त कोशिकाओं को नष्ट कर देता है। इससे शिशु को एनीमिया या जॉंडिस हो सकता है। अगर शादी से पहले आरएच नेगिटिव या आरएच पॉजिटिव का पता हो तो इस स्थिति से बचा जा सकता है। डॉक्टर प्रसव के वक्त सारी ऐहतियात बरतते हैं कि ऐसी नौबत ना आए।

एक सवाल और भी है। विश्व में 3 करोड़ 40 लाख लोग एचआईवी पॉजिटिव हैं। हालांकि भारत में कुल आबादी में 0.34 फीसदी लोग ही एचआईवी पॉजिटिव हैं। ये संख्या बेशक कम है लेकिन पति-पत्नी के संबंधों में भी ये खतरा हो सकता है। यदि दोनों में से एक भी एचआईवी पॉजिटिव है। एड्स/एचआईवी का संक्रमण 5 फीसदी में बच्चों को माता-पिता से होता है।

अगर किसी युवक या युवती की शादी होने जा रही है और वो एचआईवी पॉजिटिव होने की बात होने वाले जीवन साथी से छुपाता है तो वो आईपीसी की धारा 269 और 270 के तहत दंड का भागीदारी है। ऐसी सूरत में क्या युवक या युवती को शादी से पहले अपना एचआईवी टेस्ट कराना चाहिए? क्या ये हमारे समाज में मान्य होगा? अब बताइए, कुंडली देखें या मेडिकल साइंस की जरूरतें?