बुधवार, 27 अगस्त 2014

क्या आप अब भी 'कुत्ते' को गाली समझेंगे...खुशदीप

अभी हाल में कुत्ते को लीड में रखकर एक फिल्म आई थी- इट्स एंटरटेनमेंट। इस फिल्म में कुत्ते के साथ साइड रोल करने वाले अभिनेता अक्षय कुमार इतने अभिभूत थे कि उन्होंने कहा कि वो अब कुत्ता  कहने  को गाली नही समझेंगे। खैर ये  तो  रही फिल्म की बात। लेकिन चेन्नई में वाकई एक ऐसा  वाक्या हुआ है कि  आप भी अक्षय से इत्तेफ़ाक रखने लगेंगे। बहुत दिन से कहीं कुछ लिख नहीं रहा था, लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया में कुत्ते पर एक स्टोरी  पढने के बाद लिखने को  मजबूर हो  गया। इसे पढ़कर आप भी मानेंगे कि ये कुत्ता ज़रूर है लेकिन इसका कद तथाकथित इनसानों से कहीं ऊंचा है।



चेन्नई में अवादी ब्रिज के पास खुले कब्रिस्तान में एक ताज़ा खुदी कब्र के पास एक कुत्ता 15 दिन तक  भूखा-प्यासा कड़ी धूप-बरसात की  परवाह किए बिना खुले में  बैठा रहा। कुत्ते पर ब्लू क्रॉस संस्था के वॉलंटियर्स की नज़र पड़ी तो उन्होंने उसे खिलाने-पिलाने की कोशिश की। साथ  ही सुरक्षित स्थान पर ले जाना चाहा। लेकिन कुत्ता टस से मस नहीं हुआ। बल्कि जो उसके पास आता,  वो उस पर गुर्राता। साथ ही कब्र की मिट्टी पर पंजे मारता।

Blue Cross of India के जनरल मैनेजर Dawn Williams के मुताबिक जब आस-पास के लोगों से कुत्ते के बारे में पूछा गया तो सारा माज़रा समझ आया। दरअसल टॉमी नाम का ये कुत्ता 18 साल के किशोर भास्कर का था। भास्कर को बीती 2 अगस्त को एक तेज़ रफ्तार वाहन ने टक्कर मार दी  थी, जिससे उसकी मौत हो गई। भास्कर की 50 वर्षीय मां सुंदरी के बारे में भी  पता चला।

एक निर्माणाधीन इमारत में मजदूरी करने वाली भास्कर की मां साइट पर ही एक झुग्गी में बेटे के साथ रहती थी। जब सुंदरी को कब्र के पास लाया गया तो कुत्ता उसके पास आकर पांव चाटने लगा। सुंदरी ने कुत्ते को गले से लगा लिया। सुंदरी के मुताबिक टॉमी पिछले पांच साल से उसके बेटे के साथ खूब हिला हुआ था। जिस दिन  से बेटे भास्कर की मौत हुई, उस दिन से ये कुत्ता भी कहीं नहीं  दिख रहा था।

विधवा सुंदरी के मुताबिक बेटे के मौत की बाद उसे अपनी ज़िंदगी बेमायने लगने लगी थी। लेकिन अब टॉमी ने फिर उसे जीने का मकसद दिया है। सुंदरी फिर टॉमी को अपने साथ ले गई। जब टाइम्स ऑफ इडिया ने निर्माणाधीन  इमारत के पास सुंदरी को  ढूंढने की कोशिश की तो पता चला कि वो टॉमी को लेकर अपने मूल स्थान तिरुवन्नामलाई चली गई है।

बताइए अब आप टॉमी को क्या कहेंगे? कुत्ता या इनसानों से भी बढ़कर 'इनसान'....




शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

डॉ अमर कुमार की तीसरी पुण्यतिथि...खुशदीप

अमर ब्लॉगर डॉ अमर कुमार की 23 अगस्त को तीसरी पुण्यतिथि है...

तीन साल बीत गए डॉ अमर कुमार को हमसे जुदा हुए...लेकिन यकीन मानिए इस अर्से में एक दिन भी ऐसा नहीं बीता होगा जिस दिन मैंने उन्हें याद ना किया हो....सुबह प्रार्थना करता हूं तो अपने दिवंगत पिता को याद करने के साथ डॉ अमर कुमार स्वत: ही मस्तिष्क में आकर आशीर्वाद दे जाते हैं...ठीक वैसे ही जैसे वो कभी मेरी पोस्टों पर अपनी टिप्पणियों का प्रसाद दिया करते थे...

एक ऐसी विभूति जिनसे साक्षात मिलने का कभी मुझे मौका नहीं मिला, लेकिन वो ब्लॉगिंग में संवाद के ज़रिए ही मेरे दिल--दिमाग पर छाते चले गए...



27 फरवरी 2010 को मेरी इस पोस्ट पर डॉक्टर साहब की ये टिप्पणी मिली थी-
डा० अमर कुमार February 27, 2010 at 10:49 AM
वर्ष के पहले हफ़्ते में मैंने गलत तो नहीं कहा था,
कि अक्सर तुम मेरी सोच को स्वर दे ही देते हो,
सो मैं आलसी हो गया हूँ । लिखना ऊखना कुछ नहीं बस बैठे बैठे टिप्पणियाँ फ़ेंकते रहो ।
इस पोस्ट ने एक बार फिर तसल्ली दी है,
मैंनें मसिजीवी की वह पोस्ट पढ़ी तो थी, टिप्पणी देकर उनकी टी.आर.पी. बढ़ाना नहीं चाहा । मुझ सा अहमी कोय, सो मैं स्वयँ ही अहँवादियों से बचता हूँ ।
GHETTO; इसका अपने साथियों के सँदर्भ में प्रयोग किया जाना मुझे भी नागवार गुज़रा । मूलतः स्पैनिश से उपजा यह शब्द नाज़ीयों ने अपना लिया क्योंकि यह परिभाषित करता था कि A slum inhabitated by minority group isolated due to social or economic pressures. ज़ाहिर है कि नाज़ी इसे जिस सँदर्भ में उपयोग किया करते थे वह तिरस्कारात्मक ही था ।
इस शब्द ने अमरीका तक की यात्रा में अपना चरित्र और भी मुखर किया । आज भी यह अपने तिरस्कारात्मक चरित्र को ही जी रहा है ।
हड़काऊ तर्ज़ पर यदि मात्र फ़ैशन के तौर पर इसे उछाला जाता है, तो भी कौन कहता है कि फासीवाद मर चुका है, या कि शब्दों में जान नहीं होती ?
तुस्सी साणूँ दिल खुश कित्ता खुशदीपे !

डॉक्टर साहब को याद करते हुए ये गीत सुन रहा हूं, आप भी सुनिए...

दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहां...


शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

गूगल और हिंदी : नए युग का आरंभ

दोस्तों, 

हिंदी और गूगल के रिश्ते पर आप से कुछ अति आवश्यक बातों के लिए ये पोस्ट लिख रहा हूं।



जैसा कि आप जानते हैं कि पिछले कुछ समय से ये अनुभव किया जा रहा है कि हिंदी ब्लॉगिंग के लिए लोगों का उत्साह कम होता जा रहा है। हिंदी ब्लॉगिंग ने आज से चार-पांच साल पहले जो स्वर्णिम काल देखा था वो कहीं पीछे छूट सा गया लगता है। अगर हम में से अधिकतर ऐसा सोचते हैं तो ये अकारण नहीं हैं। ब्लॉगवाणी या चिट्ठाजगत जैसे एग्रीगेटर की कमी, ब्लॉगर्स  का  फेसबुक, ट्विटर में अधिक रुचि  लेना, नामचीन ब्लॉगर्स का लिखना बंद करना या बहुत कम लिखना, टिप्पणियों का अभाव, आर्थिक रूप से कोई प्रोत्साहन ना मिलना, गुटबंदी, नए ब्लॉगर्स  का उत्साहवर्धन ना  होना आदि ऐसी अनेक वजहें रहीं जिन्होंने ब्लॉग के मंच को विरक्त कर दिया। दूसरों  की क्या कहूं, प्रतिदिन एक पोस्ट लिखने वाला मेरे जैसा व्यक्ति भी अब ब्लॉग पर यदा-कदा ही लिखता है।

लेकिन ये स्थिति अब अधिक दिन नहीं रहने वाली है। इसके लिए पहल की है गूगल ने। वही गूगल जो हमारे जीवन का ऐसा अहम हिस्सा बन गया है, जिसके सर्च इंजन के बिना हम स्वयं  को अधूरा समझने लगते हैं। अब इसी गूगल ने हिंदी उत्साहियों को समुदाय के रूप में अपने साथ जोड़ने  के लिए एक वृहत्ती योजना को हाथ में लिया है। बीती 4 अगस्त को ये देखकर आपको सुखद आश्चर्य हुआ होगा कि गूगल ने हिंदी सिनेमा के महान गायक किशोर कुमार  को उनकी 85वीं जयंती पर श्रद्धांजलि देने के लिए भारत में अपने मुखपृष्ठ पर उनका चित्र लगाया।
अभी कुछ दिन पहले  हिंदी उत्साहियों को अपने साथ जोड़ने के लिए गूगल ने एक फॉर्म उपलब्ध कराया। गूगल के इस नए मंच से जो लोग जुड़ चुके हैं, उन्होंने अनुभव किया होगा कि अब  वो अपनी समस्याओं या सुझावों के लिए गूगल टीम से सीधे संवाद कर सकते हैं। हिंदी ब्लॉगर्स ऐसे मंच के लिए लंबे समय से प्रतीक्षा कर रहे थे।

गूगल इसी दिशा में अब कई और महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रहा है। लेकिन जैसा कि आप जानते हैं कि ऐसे सार्थक प्रयासों को ठोस और मूर्त रूप देने में कुछ समय लगता है, इसलिए हम सभी हिंदी उत्साहियों को थोड़े धैर्य से काम लेना होगा। यहां मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि गूगल स्वयं के किसी आर्थिक लाभ के लिए हिंदी उत्साहियों को अपने साथ नहीं जोड़ना चाह रहा। ऐसे में किसी के मस्तिष्क में भी ये प्रश्न उठ सकता है कि गूगल फिर ये सब क्यों कर रहा है?

जैसा कि आप जानते हैं  कि ऑनलाइन प्लेटफार्म को भारत में एक अंग्रेज़ी समृद्ध प्लेटफार्म के हिसाब से जाना जाता है। हालांकि बाकी देशो में लोग ऑनलाइन अंग्रेज़ी के अलावा अपनी मातृभाषा में भी बातें करते हैं।  लेकिन भाषा और क्षेत्र के हिसाब से भारत इतनी विविधताओं वाला देश है कि यहां ऐसा होना कठिन चुनौती है। लेकिन अब समय आ  गया है इस स्थिति को बदलने का। एक अनुसंधान के परिणाम के अनुसार देश में अंग्रेज़ी के बाद तक़रीबन 80% लोग ऑनलाइन हिंदी का प्रयोग करते हैं। निकट भविष्य में ऑनलाइन आने वाले 30 करोड़ लोग और ऑनलाइन अंग्रेज़ी का प्रयोग नहीं करेंगे। इसलिए पूरा भरोसा है कि शीघ्र ही अधिक से अधिक लोग ऑनलाइन हिंदी का प्रयोग करने लगेंगे।

भविष्य की इसी सुखद आशा के साथ गूगल ऐसा प्लेटफॉर्म बनाना चाहता है कि जिसमें हिंदी के अधिक से अधिक रचनाकार जुड़ सकें। सब के साथ मिलकर अधिक से अधिक गुणवत्तापूर्ण हिंदी ऑनलाइन कंटेट का सृजन किया जा सके। हिंदी को देश-विदेश में प्रचारित करने के उद्देश्य से मैं आपसे अपील करता हूं कि इस भागीरथ कार्य  को सफल बनाने में गूगल  का साथ दें। मुझे भरोसा है कि गूगल अच्छे दोस्त की तरह हर घड़ी आपके साथ रहेगा।

यहां मैं ये जानकारी देना भी अपना दायित्व समझता हूं कि गूगल के साथ काम करने से  हिंदी ब्लॉगर्स को क्या-क्या मिलने  जा रहा  है-

1.  हिंदी ब्लॉगिंग से जुड़ी किसी भी समस्या या शंका  की स्थिति में गूगल टीम से सीधी सहायता।

2. एक ऐसा व्यवस्थित और समर्पित प्लेटफॉर्म जहां सभी हिंदी उत्साही आपस  में और गूगल से बात कर सकते हैं।

3. गूगल + की ओर से आपके ब्लॉग की दृश्यता (पहुंच) को बढ़ाना

4. गूगल जानता है कि हिंदी ब्लॉगर्स की हिंदी में एडसेंस को लेकर बहुत  जिज्ञासाएं  हैं। गूगल आपको आश्वस्त करता है कि हिंदी के लिए एडसेंस जब भी आरंभ होगा, सबसे पहले आपको ये जानकारी मिलेगी, साथ  ही  इसका उपभोग करने की सुविधा

5. Open Source Rich देवनागरी  फॉन्ट के बारे में जानकारी 

पोस्ट के अंत में आप से फिर अनुरोध करता हूं कि आप या आपके परिचितों  में से जो कोई भी गूगल के इस समूह का  हिस्सा बनना चाहता है वो कृपया यह फॉर्म भरे। गूगल शीघ्र उनसे संपर्क करने की कोशिश करेगा।

(नोट- फॉर्म भरते समय ये ध्यान रखें कि वहां आपको समूह में उत्सुकता रखने वाले के नाम की जगह अपना नाम लिखना है और जहां आपका नाम लिखा है वहां मेरा नाम यानि खुशदीप सहगल लिखना है।)

आपका
खुशदीप सहगल