रविवार, 27 अप्रैल 2014

भगाणा की चार बेटियों का दर्द...खुशदीप

मूलत: प्रकाशित- जनसत्ता, 26 अप्रैल, 2014


 खबर, खबर होती है। खबर का कोई मजहब नहीं होता। न ही खबर की कोई जात या क्षेत्र होता है। खबर में शहरी-देहाती का भेद भी नहीं किया जा सकता। बीस साल पहले पत्रकारिता शुरू की थी तो वरिष्ठों से यही सीखा था। लेकिन अब देखता हूं कि खबर के मायने ही बदल गए हैं। आज बाजार पहले खबर, फिर उसके जरिए समाज को प्रभावित कर रहा है। आज सबसे पहले देखा जाता है कि ग्राहक कौन है और उसकी जेब की ताकत कितनी है। वह खबर के साथ विज्ञापनों में दिखाई जाने वाली जरूरत-बेजरूरत की चीजों को खरीदने की हैसियत रखता है या नहीं। फिर उसी के हिसाब से खबर तैयार की जाती है।
दरअसल, दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक ‘कैंडल मार्च’ में हिस्सा लेने के बाद मैं यह लिखने को प्रेरित हुआ हूं। इसकी रिपोर्ट आपको खबरिया चैनलों पर नहीं दिखी होगी। कुछ अखबारों ने जरूर इसे छापने की हिम्मत दिखाई होगी। वह भी ऐसे अखबार, जो अब भी सरोकार की अहमियत समझते हैं। मेरा एक सवाल है! दिल्ली या मुंबई में एक सामूहिक बलात्कार और देश के दूरदराज के एक गांव में इसी तरह की घटना। क्या अपराध में कोई फर्क है? अगर ऐसा नहीं है तो ऐसी घटनाओं की कवरेज में फर्क क्यों?
हरियाणा के हिसार जिले के भगाणा गांव में सामूहिक बलात्कार की शिकार हुई चार नाबालिग लड़कियां सोलह अप्रैल से दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरने पर बैठी हुई हैं। इंसाफ  के लिए इनकी जंग में परिजनों के अलावा कुछ ऐसे लोग भी साथ दे रहे हैं, जिनका अब से पहले इनसे परिचय तक नहीं था। लड़कियों का संबंध दलित परिवारों से है। जाति या समूह का जिक्र करने से अपराध की भयावहता घट या बढ़ नहीं जाती। देश की चार बेटियों के साथ दरिंदगी हुई है, हम सबके लिए अपराध को देखने का बस यही नजरिया जरूरी है। हमारा खून तब तक खौलता रहना चाहिए, जब तक इन बेटियों के गुनहगारों को कानून उनके अंजाम तक पहुंचा नहीं देता।
जंतर मंतर पर बेटियों के लिए इंसाफ  की मुहिम की कमान सर्व समाज संघर्ष समिति ने संभाल रखी है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र भी कंधे से कंधा मिला कर साथ खड़े हैं। सर्व समाज संघर्ष समिति के अध्यक्ष वेदपाल सिंह तंवर के मुताबिक पीड़ित चारों लड़कियां आठवीं और नौवीं कक्षा में पढ़ती हैं। इनका संबंध उन परिवारों से हैं जिन्होंने जाटों की ओर से किए गए सामाजिक बहिष्कार के बावजूद भगाणा गांव छोड़ने से इनकार कर दिया था। आरोप है कि बीती तेईस मार्च की रात दस से ज्यादा लोगों ने इन लड़कियों को उनके घरों से उठा लिया और दो दिन तक उनसे सामूहिक बलात्कार करते रहे। बड़ी मशक्कत और विरोध के बाद पुलिस ने एफआइआर दर्ज की और पांच लोगों को गिरफ्तार किया। लेकिन ऊंची राजनीतिक पहुंच की वजह से बाकी आरोपी अभी तक पकड़ से बाहर हैं। भगाणा गांव में जाट बिरादरी ने खाप पंचायत के संरक्षण में पिछले दो वर्षों से दलित-पिछड़ी जातियों का बहिष्कार कर रखा है। न्यायपालिका, मानवाधिकार आयोग और अनूसूचित जाति आयोग के निर्देश भी बेअसर हैं। हरियाणा में दलित-पिछड़ी जाति की महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार और उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। भगाणा गांव की चारों पीड़ित लड़कियां और उनके परिवार इतने आतंकित हैं कि अब वे गांव में अपने घरों में लौटना नहीं चाहते।
हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा सरकार से इंसाफ की सभी गुहार अनसुनी रहने के बाद ही भगाणा के करीब सौ दलित गरीब परिवारों ने सामूहिक बलात्कार की शिकार चारों लड़कियों के साथ दिल्ली के जंतर मंतर पर धरने का फैसला किया। इस उम्मीद के साथ कि जिस तरह निर्भया को इंसाफ दिलाने के लिए दिल्ली में लोग सड़कों पर उमड़ आए थे, वैसे ही उन्हें भी समर्थन मिलेगा। मीडिया से भी इन्हें बड़ी आस थी कि वह धरने की खबर देने के लिए आगे आएगा। लेकिन सोलह अप्रैल को धरना शुरू करने के बाद तीन दिन तक उनके पास कोई नहीं आया। तब जाकर उन्होंने जेएनयू के विद्यार्थियों से संपर्क किया। चौबीस अप्रैल की शाम को पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए कैंडल मार्च निकला और उसी दिन सुबह वाराणसी में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने पर्चा भरा। खबरिया चैनलों ने सारे तामझाम के साथ मोदी के जुलूस से लेकर पर्चा भरने तक के एक-एक लम्हे को दर्शकों तक पहुंचाया।
इधर सामूहिक बलात्कार की शिकार इन लड़कियों के साथ उनके परिवार बाट जोह रहे हैं कि कब पूरी दिल्ली उनके साथ आ खड़ी होगी, जैसे निर्भया के साथ हुई थी! कब उसी तरह मीडिया अपना धर्म निभाएगा! चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव है। लेकिन देश की चार बेटियों की अस्मिता का सवाल भी कम छोटा नहीं है। अब देखना है कि चुनाव के बाजार में उलझा मीडिया सरोकार की सुध लेने के लिए कब जागता है?







Keywords:Bhagana, Gang Rape, Nirbhaya

EVM व्यवस्था में खामियां पर खोट नहीं...खुशदीप

मूलत: प्रकाशित- हिन्दुस्तान, 24 अप्रैल 2014




आधे से ज्यादा आम चुनाव संपन्न हो जाने के बाद कई पुराने सवाल फिर सिर उठा रहे हैं। क्या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से मतदान फुलप्रूफ हैं? हालांकि चुनाव आयोग कई मौकों पर साफ कर चुका है कि ईवीएम में गड़बड़ी नहीं की जा सकती? दिल्ली हाईकोर्ट ईवीएम की उपयोगिता को मानते हुए इन्हें देश के चुनाव-तंत्र का अभिन्न हिस्सा बता चुका है। सभी राजनीतिक दल इसे स्वीकार भी कर चुके हैं। मतदाताओं को भी इससे कोई दिक्कत नहीं। बैलेट पेपर के बेतहाशा खर्च से भी छुटकारा मिला है। नतीजे भी तेजी से मिलते हैं। यह सही है कि इस बार लोकसभा चुनाव में ईवीएम के मॉक टेस्ट के दौरान कुछ मशीनों में गड़बड़ी पकड़ी गई। कुछ जगह मतदान के समय भी शिकायतें मिलीं। चुनाव आयोग के लिए भौगोलिक रूप से इतने विशाल देश में निष्पक्ष और साफ-सुथरे चुनाव कराना कितनी बड़ी चुनौती है, इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।

जहां मतदान के लिए लाखों ईवीएम का इस्तेमाल किया जा रहा है, वहां कुछेक मशीनों में तकनीकी गड़बड़ी मिलना स्वाभाविक बात है। हां, अगर ईवीएम को लेकर सवाल उठाया ही जाना है, तो वो यह है कि कैसे इससे वोटिंग को और बेहतर बनाया जाए। बेशक, ईवीएम व्यवस्था जबसे शुरू हुई है, मतदान की गोपनीयता को लेकर जरूर कुछ समझौता करना पड़ा है। जब बैलेट पेपर से मतदान होता था, तो गिनती के वक्त पहले सभी मतपत्रों को मिक्स किया जाता था। चुनाव आचार संहिता ऐक्ट-1961 के नियम 59 ए के तहत ऐसा करना जरूरी है। मतपत्रों को इसलिए मिलाया जाता था कि किसी को अंदाज न हो कि किस पोलिंग बूथ से किस उम्मीदवार को कितने मत मिले। ईवीएम आने के बाद मिक्सिंग की परंपरा खत्म हो गई। हालांकि विशेषज्ञों ने अब इसका भी समाधान निकाल लिया है, जिसमें ईवीएम को एक केबल से जोड़ दिया जाएगा। अभी हर पोलिंग बूथ के लिए ईवीएम के मतों की अलग-अलग गिनती होती है। पिछले अक्तूबर में अन्ना हजारे ने मांग की थी कि 2014 के लोकसभा चुनाव में टोटलाइजर के साथ ही ईवीएम से गिनती की व्यवस्था हो। लेकिन इस बार यह नहीं किया गया।

ईवीएम में गड़बड़ी की आशंका को पूरी तरह खारिज करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल अक्तूबर में चुनाव आयोग से पर्ची की व्यवस्था (वोटर वेरीफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल) करने के लिए कहा। इसमें ईवीएम से वोट देने के बाद वोटर को मशीन में एक पर्ची दिखती है, जिस पर बटन दबाए गए उम्मीदवार का नाम, नंबर और चुनाव चिन्ह दिखता है। यह पर्ची एक बॉक्स में गिर जाती है। गिनती को लेकर कोई विवाद होता है, तो इन पर्चियों को गिना जा सकता है। इस बार चुने हुए मतदान केंद्रों पर इसका इस्तेमाल भी हो रहा है। तकनीक की समस्या का समाधान भी ऐसी तकनीक से ही निकलेगा, इसके कारण पुरानी व्यवस्था पर लौटने का कोई अर्थ नहीं।






Keywords: EVM

सोमवार, 21 अप्रैल 2014

आखिर किसके अच्छे दिन आने वाले हैं...खुशदीप


मूूलत: प्रकाशित - नवभारत टाइम्स, 21 अप्रैल 2014...


“2014 का संदेश कमल और मोदी का है। कमल पर दबाये बटन से आपका हर वोट सीधे मोदी को मिलेगा। ये शब्द किसी ओर के नहीं बल्कि खुद नरेंद्र मोदी के हैं। एक ऑडियो-वीडियो विज्ञापन में भी मोदी खुद की आवाज़ में दहाड़ते देखे जा सकते हैं- सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं मिटने दूंगा, मैं देश नहीं झुकने दूंगा। प्रख्यात फिल्मी गीतकार प्रसून जोशी को मोटी फीस दे कर लिखे गए इस गीत में पूरा ज़ोर मोदी को लार्जर दैन लाइफ़छवि देने पर है। यानि देश को झुकने ना देने के लिए अकेले मोदी ही काफ़ी हैं।

यही नहीं मोदी के प्रचार में और भी गीत सुने जा सकते हैं। अच्छे दिन आने वाले हैं, मोदी जी आने वाले हैं।“ “इंद्र है, इंद्र है, नरों में इंद्र है।हर जगह मोदी की कोशिश बेशक बीजेपी से पहले खुद को बताने की है। अब ये बात दूसरी है कि मुरली मनोहर जोशी देश में मोदी की नहीं बीजेपी की हवा बता रहे हैं। आडवाणी मोदी को अच्छा इवेंट मैनेजरकह रहे हैं। उमा भारती मोदी को अच्छा वक्तानहीं भीड़जुटाऊ नेता करार दे रही हैं।

ज़ाहिर है कि मोदी के बीजेपी में स्वयंभू सर्वशक्तिमान होने से पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के कई नेता हैरान-परेशान हैं। इन नेताओं को पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के ज़रिए मोदी का साफ़ संदेश है- बीजेपी में रहना होगा तो मोदी-मोदी कहना होगा। कुछ-कुछ फिल्म शोले के हिट डॉयलॉग की तर्ज़ पर- अगर गब्बर के ताप से तुम्हे कोई शख्स बचा सकता है तो वो है खुद गब्बर।

मोदी की राजनीति की ये विशिष्ट शैली है। गुजरात में भी मोदी ने अपना राजनीतिक कद इसी तरह बड़ा किया। इस दर्द को गुजरात के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों- सुरेश मेहता, शंकर सिंह वाघेला और केशुभाई पटेल से ज़्यादा अच्छी तरह और कौन समझता होगा। मोदी अब बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व में भी अपनी लाइऩ से अलग बोलने वाले नेताओं को जिस तरह हाशिए पर ले जा रहे हैं, उस कार्यशैली से एक सवाल उठता है। अगर मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो देशवासियों को किस तरह का भारत मिलेगा?

अधिनायकवादी नेता के हाथ में अगर केंद्र की सत्ता की कमान आती है तो देश किस दिशा में अग्रसर होगा?  भारतीय लोकतंत्र की अवधारणा जिस संसदीय जनवाद पर टिकी है, क्या देश उससे इतर नरम फासीवाद की लाइन पकड़ेगा? भारत भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टि से जितना विशाल और विविध है, उसे देखते हुए यहां कठोर फासीवाद के तत्काल जड़े जमा लेने की संभावना बहुत कम है। ऐसा कोई भी अजेंडा बहुलतावादी इस देश पर थोपना आसान नहीं है।

हां, ये ख़तरा ज़रूर है कि केंद्र में कोई अधिनायकवादी प्रधानमंत्री बनता है और कई राज्यों में उसके कठपुतली मुख्यमंत्री बनते हैं तो फिर कट्टर फासीवाद भी दूर की कौड़ी नहीं रहेगा। ऐसा माहौल जहां दबंगई और धौंसपट्टी के ज़रिए शासन चलता है। ऐसी स्थिति, जहां दक्षिणपंथी अजेंडे से अलग मत रखने वालों के सामने समर्पण या मौन के सिवा कोई विकल्प ही नहीं बचता।

ये किसी से छुपा नहीं है कि पिछले कुछ वर्षों से एक रणनीति के तहत मोदी की खास छवि बनाने की कोशिश की गई। ये जमकर प्रचारित किया गया कि मोदी ही इकलौते नेता है जो देश को बचा सकते हैं, मोदी ईमानदार है, कुशल प्रशासक हैं, त्वरित निर्णय लेते हैं, आदि आदि। सवाल ये है कि मोदी क्या अकेले दम पर अपनी ये छवि गढ़ सकते थे। मोदी के अलावा आख़िर और कौन सी वो परिस्थितियां रहीं जिन्होंने मोदी के व्यक्तित्व को इतना तिलिस्मी बना दिया?

मोदी के मददग़ारों में सबसे बड़ा नाम भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के कॉरपोरेट मॉडल का लिया जा सकता है। कॉरपोरेट जगत के बड़े खिलाड़ियों का एकसुर में मोदी की शान में कसीदे पढ़ना संयोग नहीं है। नव उदारवादी नीतियों को देश पर थोपने के लिए कारोबारियों को मोदी से ज़्यादा मुफ़ीद नेता अब और कोई नही दिख रहा। वेलफेयर स्टेट की धारणा के तहत चलने वाले महंगे सामाजिक कार्यक्रम अब कॉरपोरेट जगत की आंख की किरकिरी बन गए हैं। यही हाल देश के दूसरे छोटे-मोटे कारोबारियों का भी है। मोदी की सुपरमैन सरीखी छवि के लिए मीडिया का भी सहारा लिया जा रहा है। मीडिया बड़े कारोबारियों से प्रभावित रहता है क्योंकि उनके विज्ञापनों से ही उसे अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा मिलता है।

मोदी की मसीहा की छवि गढ़ने वाले देश के मध्यम वर्ग की नाराज़गी को भुनाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। दरअसल मध्यम वर्ग मानने लगा है कि देश की मौजूदा आर्थिक नीतियां धन्ना सेठों को और अमीर बनाने वाली हैं। और सामाजिक कल्याण के नाम पर सारी मदद गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों के लिए है। मध्यम वर्ग नाराज़ है कि अपनी कमाई से पूरा टैक्स देने के बावजूद उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।


ये तो रहे वो कारण जिनकी वजह से आज मोदी सुपरब्रैंड बने नज़र आ रहे हैं। लेकिन इन कारणों पर ही पूरा देश सीमित नहीं हो जाता। कर्नाटक को छोड़ दें तो दक्षिण और पूर्व भारत में अभी तक बीजेपी की नाम की ही मौजूदगी रही है। केंद्र में दमदार नेता होना ज़रूरी है लेकिन देश की सामूहिकता भी बहुत मायने रखती है। देश के अल्पसंख्यक दिल्ली की गद्दी पर ऐसे नेता को देखना चाहते हैं, जिससे उन्हें अपनी सुरक्षा की पूरी गारंटी मिले। बीजेपी लोकसभा चुनाव में बहुमत के आंकड़े से अगर दूर रह जाती है तो उसके पोस्टरबॉय मोदी उसके लिए कमज़ोरी भी बन सकते हैं। और ऐसा हुआ तो बीजेपी को सबसे ज्यादा याद मोदी को कभी राजधर्म की नसीहत देने वाले अटल बिहारी वाजपेयी की आएगी।






Keywords:Fascism, Narendra Modi

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

पुरुषों की ज़िप पर ताला? Zip Lock...(खुशबतिया 12-04-14)




हर पुरुष की ज़िप पर ताला लगा दिया जाए और चाभी घर पर छोड़ दी जाए, बस यही आदेश देना बाकी रह गया है...दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को ये बेशक लाइटर टोन में कहा, लेकिन उसका आशय यही था कि पुरुषों की सार्वजनिक जगहों पर पेशाब करने की बुरी आदत को लेकर वो भी ज़्यादा कुछ नही कर सकता...दिल्ली हाईकोर्ट से एक याचिका में प्रशासनिक अधिकारियों को ये सुनिश्चित करने का निर्देश देने की मांग की गई थी कि दीवारों को लोग गंदा ना करें...जस्टिस प्रदीप नद्राजोग और जस्टिस दीपा मेहता की बेंच ने याचिका को खारिज़ करते हुए कहा कि अदालत इस तरह के निर्देश नहीं दे सकती...सार्वजनिक स्थलों पर पेशाब करने की समस्या को कही ओर सुलझाया जाना चाहिए...अदालत ऐसा आदमी नहीं बना सकती जो घर से बाहर निकले और अपनी ज़िप पर ताला लगाए रखे... अदालत ने कहा कि कुछ घरों के बाहर की दीवारों पर देवी-देवताओं की मूर्तियां लगा दी जाती हैं, लेकिन फिर भी लोग दीवारों को गंदा करने से बाज़ नहीं आते...अदालत ने कहा कि वो उम्मीद करते हैं कि पुरुष जो अनंत कलाकार की महानतम रचना है, वो अपने स्वामी (रचनाकार) के आगे अपनी गुप्तता (प्राइवीज़) को बेनक़ाब नहीं करेंगे और सड़कों पर पेशाब नहीं करेंगे...याचिकाकर्ता मनोज शर्मा ने याचिका में मांग की थी कि एक आवासीय परिसर के बाहर की दीवार से देवी-देवताओं की तस्वीरें हटाने का आदेश दिया जाए...ये तस्वीरें सिर्फ इसी उद्देश्य से लगाई गईं कि लोग दीवारों को गंदा ना करें...अदालत ने कहा कि वो ग्रुप हाउसिंग सोसायटी के सदस्यों को ये तस्वीरें हटाने का निर्देश नहीं दे सकती...अदालत ने ये भी कहा कि पुरुष तब भी ऐसी हरकत करना नहीं छोड़ते जब दीवार पर लिखा होता है- देखो गधा (या कुत्ता) पेशाब कर रहा है”…



ख़बर आपने पढ़ ली...परेशानी सच में कितनी मुश्किल है...अदालत भी कुछ कर पाने में खुद को असहाय पा रही है...दिल्ली हाईकोर्ट ने बेशक लाइटर टोन में ज़िप पर ताले की बात कही...लेकिन मैं सोच रहा हूं कि अगर सच में ही ऐसा होने की नौबत कभी आई तो क्या-क्या बदल जाएगा...लेकिन उद्देश्य तभी पूरा होगा जब ज़िप के साथ पैंट की बेल्ट पर भी लॉक लगा कर उसकी चाभी भी घर में ही रखी जाए...

फायदे-
    1. शहर भर की दीवारें, सड़कें और गलियां गंदी होने से बच जाएंगी...
    2.  बेल्ट और जिप लॉक का नया धंधा फलेगा-फूलेगा यानि नया रोज़गार सृजन होगा...
    3. पुरुषों को लघु-शंका के लिए कई बार घर की दौड़ लगानी होगी, इससे वो फिट रहेंगे...
    4. घर ज़्यादा दूर है तो ऑटो-टैक्सी वालों का भला होगा...बस या मेट्रो से घर गए तो सरकार का राजस्व बढ़ेगा...
    
  और सबसे अहम- 
  5.बेवफ़ाई की भी कोई संभावना ही नहीं रहेगी...

नुकसान-
नुकसान तो मुझे एक ही दिखता है, पुरुषों को कई बार काम छोड़कर घर जाना पड़ सकता है...यानि सीधे-सीधे Work-Hours का नुकसान...








Keywords:Urination, Defacation, Zip lock

बुधवार, 9 अप्रैल 2014

Youth will govern 2019 Election...खुशदीप

राजनीति को नई दिशा-परिभाषा देता युवा...

मूलतः प्रकाशित- नई दुनिया-जागरण आई नेक्स्ट, 9 अप्रैल 2014



यंगिस्तान जाग चुका है। अब उसे सिर्फ भविष्य का भारतकह कर ही टरकाया नहीं जा सकता। देश का युवा वर्ग आज के भारत को बदलने के लिए भी अधिक से अधिक भूमिका चाहता है। युवाओं के महत्व को अब देश के राजनीतिक दल भी अच्छी तरह समझ रहे हैं। शायद यही वजह है कि 2014 लोकसभा चुनाव में युवा मतदाताओं को लुभाने के लिए सभी सियासी पार्टियां एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाए हुए हैं। इस लोकसभा चुनाव में कुल 81 करोड़ 45 लाख मतदाता हैं। इन मतदाताओं में से 23 करोड़ दस लाख ऐसे युवा हैं जो पहली बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे।  

2011 की जनगणना के मुताबिक देश के 55 करोड़ लोग 35 साल या उससे नीचे की उम्र के हैं। इनमें 15 से 35 साल के बीच की आयु के युवाओं की हिस्सेदारी 42 करोड़ 20 लाख है। ये देश की कुल आबादी का 34.8 फीसदी है। संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार 2020 तक भारत के लोगों की आयु का मध्यमान सिर्फ 29 साल होगा। यानि भारत पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा युवा लोगों का देश होगा। यहां कुल आबादी के 64 फीसदी लोग काम करने लायक आयु वर्ग के होंगे।

 भारत की तेज़ी से बढ़ती आबादी लंबे समय से बहस का विषय रही है। पिछली सदी के नौवें दशक तक बड़ी आबादी को देश के लिए बोझ माना जाता रहा। सिकुड़ते संसाधन, कुपोषण, बदहाल शिक्षा जैसी चुनौतियां का सामना करने में सरकारी तंत्र के हमेशा पसीने छूटते रहे। लेकिन पिछली सदी के अंतिम दशक में उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद देश की आबादी को लेकर दृष्टिकोण बदलने लगा। सेवा क्षेत्र के तेज़ी से बढ़ने की वजह से देश की बड़ी आबादी को कमजोरी की जगह खूबी माना जाने लगा। देश की आबादी में बड़ा हिस्सा युवा होने का ही कमाल है कि 2004 में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) जो सिर्फ 687 डॉलर था वो 2013 मे बढ़कर 1107 डॉलर हो गया।

अमेरिका, चीन और जापान विकास की दृष्टि से दुनिया में आज अग्रणी माने जाते हैं। लेकिन तीनों ही देशों की आबादी तेज़ी से बुढ़ाती जा रही है। ऐसे में युवाशक्ति के बूते भारत को आज सबसे ज़्यादा संभावनाओं वाला देश माना जा रहा है। देश में अर्थव्यवस्था के खुलने का ही नतीजा है कि देश के युवा वर्ग के सपनों को पंख लग गए है। आज के युवा के मिजाज को समझने के लिए उसकी तीन आकांक्षाओं को समझना ज़रूरी है। 1- युवा अपने लिए अच्छी शिक्षा और अच्छे रोज़गार के ज़रिए खुशहाल जिंदगी सुनिश्चित करना चाहता है। 2- युवा वर्ग खुद को किसी भी बंदिश में नहीं बंधते नहीं देखना चाहता। उसको धर्म की दुहाई या जात-पात के पचड़ो से भरमाया नहीं जा सकता। 3- युवा पीढ़ी के लिए भ्रष्टाचार का मतलब ये नहीं है कि किसी कर्मचारी को कुछ रुपये रिश्वत में देने पड़ते हैं। युवाओं के लिए भ्रष्टाचार ये है कि उन्हें किसी काम के लिए लाइन में लगकर अपना कीमती वक्त बर्बाद करना पड़ता है। युवा वर्ग सरकारी दफ्तरों में सिंगल विंडो से त्वरित ढंग से अपना काम होता देखना चाहता है।

युवाओं की बढ़ती उम्मीदों की वजह से राजनीतिक दलों को भी इस लोकसभा चुनाव में अपनी रणनीतियों को बदलने के लिए विवश होना पड़ा है। देश में, खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में, अब तक चुनाव की जो धुरी धर्म और जात-पात पर टिकी होती थी, वो अब बदल कर विकास पर केंद्रित हो गई है। ये युवावर्ग की आकांक्षाओं के दबाव की वजह से ही हुआ है।

देश के युवा और नए मतदाता का ज़ोर आज समावेशी राजनीतिक संवाद पर है। राजनेताओं तक अपनी बात पहुंचाने के लिए युवा मतदाता के पास आज सोशल मीडिया जैसा मज़बूत साधन मौजूद है। अभिव्यक्ति के इस माध्यम के सशक्त होने की वजह से राजनीतिक दलों के हर कृत्य पर आज देशवासियों की पैनी नज़र है। आज़ादी के बाद ये सुखद बदलाव है कि आम आदमी को केंद्र में रखकर अब शासन की नीतियां बनाई जाने लगी हैं। सभी राजनीतिक दल शासन को अधिक से अधिक पारदर्शी बनाने की बात करने लगे हैं।

बीते तीन साल में देश में कई मौकों पर देखा गया कि जनाक्रोश को युवावर्ग ने धार दी। भ्रष्टाचार के ख़िलाफ अन्ना हज़ारे की अगुवाई में आंदोलन हो या दिल्ली में निर्भया के साथ हुई बर्बरता पर रोष जताने के लिए सड़क पर उमड़ा जनसैलाब, हर जगह युवा सबसे आगे दिखे। यहां तक कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को मिली कामयाबी में भी युवा मतदाताओं का खासा हाथ रहा।

देश की युवा पीढ़ी को अब समस्याओं के समाधान के लिए वर्षों तक इंतज़ार नहीं कराया जा सकता। उसे तुरंत नतीजा चाहिए। शायद यही वजह है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी के 49 दिन के राज के बाद ही उसकी लोकप्रियता का ग्राफ़ नीचे आ गया। ज्यादा साल नहीं हुए, नब्बे के दशक तक युवा वर्ग को चुनाव की दृष्टि से अप्रासंगिक माना जाता था। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। अब वो लोकतांत्रिक प्रकिया में अपनी ज़्यादा से ज़्यादा भागीदारी के लिए आगे आ रहा है। लोकतंत्र का ये समावेशी रूप आश्वस्त करता है कि भारतीय राजनीति आज नहीं तो कल वंशवाद और वीआईपी वर्चस्व की बेड़ियों से मुक्त होगी।
- खुशदीप सहगल






Keywords:Youth,Election, Politics

सोमवार, 7 अप्रैल 2014

Election : Food of Leaders...खुशदीप

नमो खिचड़ी, रागा चॉकलेट, केजरी चना...



अरे ओ सांभा, ये रामगढ़ वाले कौन सी चक्की का आटा खाते हैं रे...लेकिन आज सवाल ये है कि हमारे देश की पॉलिटिकल पार्टियों के नेता कौन सी चक्की का आटा खा रहे हैं...दिन भर देश में जगह जगह जाकर पूरी ताकत से शब्दों के बाण चलाते हैं...अगले दिन फिर तरोताजा होकर वही काम...क्या है इनकी इस ऊर्जा का राज़? कैसा है इनका खानपान? कैसे रखते हैं ये खुद को फिट? 

वेबदुनिया पर इसी विषय पर है आज मेरा लेख।

अगर आप अपनी पार्टी के शीर्ष नेता हैं तो चुनाव प्रचार के लिए देश के कोने-कोने की खाक छाननी ही पड़ती है लेकिन इतनी ऊर्जा आख़िर कहां से आती है। ये नेता इतने टाइट शैड्यूल में खाते क्या हैं। हर नेता का खान-पान का अपना अंदाज़ है। बीजेपी के ‘पीएम उम्मीदवार’ नरेंद्र मोदी खिचड़ी के मुरीद हैं तो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के लिए चॉकलेट पहली पसंद है। आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल को डॉयबिटीज़ है, इसलिए वो डाइजेस्टिव बिस्किट और भुने चनों से भूख मिटाते हैं।

मोदी इन दिनों नवरात्र के नौ दिन के उपवास पर हैं। इसलिए नींबू और गर्म पानी का सेवन कर रहे हैं। मोदी वैसे भी अल्पाहारी हैं। नई जगहों पर वो खाने से बचते हैं। उनका खाना बनाने के लिए रसोइया उनके साथ रहता है। आम दिनों में वो गुजराती खाना, खास तौर पर शाम को खिचड़ी खाना ही पसंद करते हैं।

दूसरी ओर, राहुल गांधी अक्सर अपना नाश्ता नहीं लेते। उन्हें व्यस्त कार्यक्रम के दौरान ‘रेडी टू ईट’ नूडल्स खाते देखा जा सकता है। ‘मिंट’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार राहुल अधिक यात्रा वाले दिनों में डाइट कोला और लेमन जूस के सिप लेते रहते हैं। ये उन्हें डिहाइड्रेशन से बचाता है, लेकिन राहुल को चॉकलेट बहुत पसंद हैं। उनके मुताबिक चॉकलेट एनर्जी-लेवल बनाए रखने में मदद करती है। इसके अलावा राहुल सी-फूड भी पसंद करते हैं।

अरविंद केजरीवाल मिर्च-मसाले वाले खाने से पूरी तरह परहेज़ करते हैं। जब वो दिल्ली में होते हैं तो उनकी पत्नी लंच-बॉक्स तैयार कर उन्हें देती हैं। व्यस्त दिनचर्या के दौरान केजरीवाल के सहयोगी ध्यान रखते हैं कि वो वक्त-वक्त पर फल या जूस लेते रहें। अक्सर उन्हें पार्टी के कार्यकर्ताओं के घरों पर भोजन के लिए रुकना पड़ता है। लेकिन साधारण खाना बनाने की पहले से ही हिदायत रहती है।

46 साल के केजरीवाल शुगर-लेवल कंट्रोल में रखने के लिए डाइजेस्टिव बिस्किट और भुने चनों से भूख मिटाते हैं। भोजन में मूंग की दाल उन्हें पसंद है। कोल्ड ड्रिंक्स से केजरीवाल बचते हैं। लेकिन कभी ठंडा पीना भी हो तो डाइट-कोला ही लेते हैं।

खुद को फिट रखने के लिए क्या करते हैं ये नेता... 

मोदी, राहुल और केजरीवाल तीनों के अपनी काया के अनुसार स्वास्थ्य मानदंड अलग-अलग हैं। 63 साल के मोदी वजन के हिसाब से ओवरवेट (90 किलोग्राम) हैं। लेकिन वो अपनी फिटनेस को लेकर बहुत सजग हैं। उनके दिन की शुरुआत सुबह 5 बजे प्राणायम, योग और अपने गांधीनगर के आवास के बगीचे में टहलने से होती है। सुबह साढ़े सात बजे तक वो घर से निकलने के लिए तैयार हो जाते हैं। आजकल दिन में चार-चार रैलियों को संबोधित करने की वजह से मोदी ज़रूरी फाइल्स यात्रा के दौरान ही देखते हैं। दौरे पर वो कहीं भी जाएं लेकिन रात को वो घर आना ही पसंद करते हैं। उनका दिन अममून रात को डेढ़ बजे तक ख़त्म होता है।

केजरीवाल खाली वक्त मिलने पर योग और विपासना करते हैं। प्रचार के वक्त उनका दिन सुबह 6 बजे शुरू होता है। आधी रात तक उनकी व्यस्तता बरकरार रहती है। 44 साल के राहुल गांधी कितने भी व्यस्त हों, शाम को दौड़ के लिए ज़रूर वक्त निकालते हैं। कहीं चुनावी दौरे पर भी हो तो उनके लिए दौड़ने का मार्ग पहले से ही निर्धारित रहता है। दिल्ली में राहुल साइकिलिंग और स्विमिंग से भी खुद को फिट रखते हैं। इसके अलावा उन्हें बैडमिंटन और आइकिडो (जापानी मार्शल आर्ट की एक किस्म) का भी शौक है।








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शनिवार, 5 अप्रैल 2014

The myth of muslim vote bank...खुशदीप

मुस्लिम वोट बैंक क्या हक़ीक़त है या सिर्फ़ एक भ्रम, इस मुद्दे पर आज मेरा एक लेख अमर उजाला कॉम्पैक्ट में छपा है।

इस लेख को इस लिंक पर जाकर पढ़ा जा सकता है-

मुस्लिम वोट बैंक का मिथक

लेख की मूल प्रति ये है-

16वीं लोकसभा के चुनाव में मुसलमान वोट किस पार्टी के खाते में जाएंगे?क्या मुस्लिम वोट बैंक राष्ट्रीय स्तर पर एक वास्तविकता है या सिर्फ मिथक? क्या मुस्लिमों को अन्य धर्मों के मुकाबले किसी पार्टी विशेष के पक्ष में एकमुश्त वोट करने के लिए आसानी से तैयार किया जा सकता है? मुस्लिम वोटों की इस पहेली को साधने की कोशिश करने में कोई भी सियासी दल पीछे नहीं है। यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी भी मुस्लिमों का सच्चा हितैषी होने का दावा कर रही है। नरेंद्र मोदी एक बुकलेट के माध्यम से दावे कर रहे हैं कि किस तरह गुजरात में मुस्लिमों की आर्थिक-सामाजिक स्थिति दूसरे राज्यों की तुलना में बेहतर है।
मुस्लिम वोट बैंक के पीछे थ्योरी दी जाती है कि मुसलमान अपने बड़े धार्मिक संस्थानों या धार्मिक गुरुओं की अपील के हिसाब से वोट करते हैं। जिस पार्टी या प्रत्याशी के पक्ष में ये अपील जारी हो जाती है, उसे मुस्लिम थोक के भाव से मतदान करते हैं। शायद यही वजह है कि कांग्रेस हो या समाजवादी पार्टी, बीजपी से छिटका जेडीयू  हो या राष्ट्रीय जनता दल या फिर बामुश्किल डेढ़ साल पुरानी आम आदमी पार्टी, सभी मुस्लिम धार्मिक नेताओं का समर्थन हासिल करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाए रखते हैं। ये भी एक हक़ीक़त है कि मुसलमानों के कुछ कथित रहनुमा भी निजी फायदे के लिए इस भ्रम को टूटने नहीं देना चाहते कि मुस्लिम समुदाय को किसी दिशा में भी एकतरफा मोड़ा जा सकता है।
दरअसल, देश के सब मुसलमानों की सोच को एक तराजू में रखकर तौलना एक भ्रांति के सिवा और कुछ नहीं है। भारत में मुसलमानों की आबादी 13 फीसदी, यानि 16 करोड़ है। भारत भौगोलिक रूप से जितना विशाल है सांस्कृतिक स्तर पर उतना विविध भी। देश के अलग-अलग इलाकों में रहने वाले मुसलमानों का रहन-सहन भी उसी इलाके की ज़रूरतों के हिसाब से प्रभावित होता है। स्थानीय मुददे मुसलमानों को भी उतना ही उद्वेलित करते हैं जितना कि अन्य समुदायों को। ऐसे में मुसलमान भी क्षेत्र के हिसाब से पार्टी और उम्मीदवार को चुनते हैं तो आश्चर्य कैसा? मुस्लिम वोटर तात्कालिक परिस्थिति के अनुसार लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव का फर्क भी अच्छी तरह समझता है। 2009 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस पर भरपूर भरोसा जताया। वही राज्य में 2012 में विधानसभा चुनाव के दौरान मुस्लिमों ने कांग्रेस को पूरी तरह नकार मुलायम सिंह यादव की झोली वोटों से भर दी।

मुस्लिम वोट बैंक का तर्क देने वालों के लिए मुस्लिम समाज को अटूट इकाई के तौर पर देखना भी गलतफहमी है। ये समाज सदियों पहले से ही शिया और सुन्नी, दो वर्गों में बंटा हुआ है। इसके अलावा हिदू समाज जैसे ही ऊंच-नीच का भेदभाव मुस्लिम समाज में भी पाया जाता है। मध्ययुगीन भारतीय समाज में इस्लाम को एक धार्मिक समुदाय के नही बल्कि जाति समुदाय के रूप में स्वीकार किया गया था। मुगल, पठान, तुर्क, शेख और सैयद को मूल उप-जातियों के तौर पर लिया गया। इन सभी ने खुद को हमेशा अगड़े वर्ग में माना। इनके अलावा भारत में जो भी दूसरे लोग धर्म परिवर्तन के बाद मुसलमान बने, उनसे बराबरी का बर्ताव न करते हुए पिछड़े दर्जे में ही रखा गया।
आज़ादी के बाद चुनावी राजनीति ने मुस्लिम समाज में जातिगत बंटवारे को और तेज़ किया। सियासत के मंडलीकरण के बाद तो कहीं-कहीं ये टकराव इतना तीक्ष्ण है कि कुरैशी अगर एक पार्टी को वोट करते हैं तो अंसारी दूसरी प्रतिद्वन्द्वी पार्टी के प्रत्याशी को वोट देते हैं। यहां ये मायने नहीं रखता कि प्रत्याशी मुस्लिम है या किसी और धर्म का।

आखिर देश के मुसलमान किस पैट्रन से वोट करते हैं? इसके लिए पिछले तीन लोकसभा चुनाव नतीजों के आधार पर एक हालिया अध्ययन में दिलचस्प नतीजे सामने आए। इनसे साफ़ हुआ है कि 1999, 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों में हिंदुओं ने जिस आधार पर अपना वोट दिया, कमोवेश वैसा ही आधार मुसलमानों ने भी चुना। 1999 में पार्टी को मुख्य आधार मान कर वोट करने वाले हिंदू मतदाता 55.50% तो मुसलमान 52.70% थे। 2004 में पार्टी के आधार पर वोट करने वालों हिंदुओं का प्रतिशत गिर कर 45.70 पर आया तो मुस्लिमों में भी ये 43.50% ही रह गया। 2009 में पार्टी के आधार पर हिंदू मतदाताओं की वोटिंग का प्रतिशत 61.80 तक चढ़ा तो मुसलमानों में भी 59.10% तक पहुंच गया।

जहां तक उम्मीदवार को मुख्य आधार मान कर वोटिंग का सवाल है तो हिंदू मतदाताओं में 1999 मे 26.30%, 2004 में 31.50% और 2009 में 24.30% ने इसे और सभी कारणों पर तरजीह दी। उम्मीदवार को मुख्य आधार मान कर वोट करने वाले मुस्लिम मतदाताओं का भी समान पैट्रन दिखा। 1999 में 25.00%, 2004 में 32.10 और 2009 में 24% मुस्लिम मतदाताओं ने पसंद के उम्मीदवार के आधार पर वोट दिया।


मुस्लिम समुदाय भी विकास, शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य आदि बुनियादी मुद्दों पर वैसे ही सोच रखता है जैसे कि देश के बाक़ी नागरिक। लेकिन इसके साथ ही मुस्लिमों के लिए एक और बड़ा सवाल है- सुरक्षा की गारंटी। जो भी राजनीतिक दल इस मामले में उसे ईमानदारी से काम करता दिखता है, मुस्लिम समुदाय उसके पीछे एकजुट होने में देर नहीं लगाता। गुजरात में 2002 की हिंसा हो या हाल में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में दंगा, मुस्लिम मतदातों के लिए सुरक्षा भी चुनाव के वक्त अहम मुद्दा होता है। 






Keywords:Muslim Vote Bank, Secularism

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

Slogans, Patel Rap, Crackers...खुशबतिया (04.04.14)


(खुशबतिया की तीसरी कड़ी आपके लिए हाज़िर है, मेरे इस प्रयास पर अपनी राय ज़रूर दीजिएगा)


मजबूरी का नाम...

भारत की राजनीति नारा-प्रधान है। सियासी दल हों या इनके शीर्ष नेता सभी को हमेशा रामबाण नारों की तलाश रहती है। ऐसे नारे जो तत्काल लोगों की ज़ुबान पर चढ़ जाएं और चुनावी नैया पार लगा दें। नेता जी की नज़रों में आने के लिए उनके लगुए-भगुए भी नारों को गढ़ने में अपनी पूरी रचनात्मक उढ़ेल देते हैं। चंडीगढ़ में 29 मार्च को नरेंद्र मोदी की रैली के दौरान बीजेपी की शहर प्रभारी आरती मेहरा को ऐसी ही एक कोशिश भारी पड़ी। आरती मेहरा ने जोश में नारा लगाया था...मजबूरी का नाम महात्मा गांधी और मज़बूती का नाम नरेंद्र मोदी। चंडीगढ़ क्षेत्र कांग्रेस कमेटी (सीटीसीसी) को ये नारा नागवार गुज़रा। सीसीटीसी के उपाध्यक्ष डी डी जिंदल ने इसे राष्ट्रपिता का अपमान मानते हुए चंडीगढ़ के सेक्टर 34 पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज़ करा दी। आरती मेहरा के साथ बीजेपी के पोस्टरबॉय नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ भी शिकायत दर्ज़ कराई गई है। लेकिन यहां आधार दूसरा बताया गया। मोदी के ख़िलाफ़ शिकायत में कहा गया कि उन्होंने चंडीगढ़ लोकसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी पवन कुमार बंसल को लेकर झूठी, अपमानजनक और अवांछित भाषा का प्रयोग किया। शिकायत के मुताबिक मोदी ने रेलगेटका उल्लेख किया, जिसका पवन कुमार बंसल से कोई लेनादेना नहीं है। मोदी के बयान को आचार-संहिता का उल्लंघन बताते हुए शिकायत में कहा गया है कि इस मामले में बंसल को पहले ही क्लीन-चिट मिल चुकी है। सीबीआई की एक अदालत एक एनजीओ की उस याचिका को भी ठुकरा चुकी है जिसमें बंसल के ख़िलाफ़ दोबारा जांच करने की मांग की गई थी। शिकायत के अनुसार मोदी ने 29 मार्च को रैली में कहा था- भ्रष्टाचार के पवन को यहीं गाढ़ दो, उसे जाने मत दो, यहीं पर रोक दो

पटेल रैप...

आप मॉडर्न संगीत के शौकीन है तो आपने गुजरात के दिबांग पटेल का 'पटेल रैप' सुना होगा। लेकिन यहां मैं गुजरात के एक और पटेल का ज़िक्र कर रहा हूं। ये पटेल साहब है गुजरात के ऊर्जा और पेट्रोकैमिकल्स मंत्री सौरभ पटेल। मोदी के ख़ासम-म-ख़ास माने जाते हैं। यहां तक कि अगर मोदी के प्रधानमंत्री बनने की स्थिति आती है तो सौरभ पटेल का नाम गुजरात के मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदारों में शुमार होता है। लेकिन सौरभ पटेल को चुनाव आयोग से आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल के ख़िलाफ़ शिकायत करना उलटा पड़ गया। सौरभ पटेल रिलायंस इंडस्ट्री लिमिटेड के सीनियर डायरेक्टर रमणीक लाल अंबानी के दामाद हैं। रमणीक लाल रिलायंस इंडस्ट्री के संस्थापक धीरूभाई अंबानी के बड़े भाई है। केजरीवाल मार्च में गुजरात के तीन दिन के दौरे पर आए थे तो उन्होंने आरोप लगाया था कि सौरभ पटेल का कुछ चुनींदा उद्योगपतियों से घनिष्ठ नाता है। केजरीवाल का ये भी आरोप था कि सौरभ पटेल को ऊर्जा और पेट्रोकैमिकल्स मंत्रालय का दिया जाना और रिलायंस पेट्रोकैमिकल्स का यहां फलना-फूलना मात्र संयोग नहीं कहा जा सकता। सौरभ पटेल की पहचान सभी विवादित मुद्दों पर चुप्पी बरतने की रही है। लेकिन इस बार केजरीवाल के आरोप के बाद वो तमतमा गए। उन्होंने सीधे चुनाव आयोग में केजरीवाल के ख़िलाफ़ गैर जिम्मेदार और अपमानजनक बयानके लिए कार्रवाई के लिए शिकायत कर दी। चुनाव आयोग ने केजरीवाल से तो कोई स्पष्टीकरण नहीं मांगा लेकिन गुजरात के मुख्य चुनाव अधिकारी से सौरभ पटेल का लेखा-जोखा ज़रूर मंगा लिया है। इसमें पटेल के विभाग और उनके अंबानी परिवार से रिश्ते के बारे जानकारी मांगी गई है। सौरभ पटेल का कहना है कि उनका अंबानी परिवार से रिश्ता 25 साल पुराना है। पटेल के मुताबिक वो जल्दी ही चुनाव आयोग को अपना जवाब भेज देंगे।

पटाख़ा पॉलिटिक्स...

चुनावी रैलियों के दौरान पटाखे ना फोड़े जाएं तो क्या मज़ा? ना तो अपनी पार्टी के दिग्गज़ नेताओं को कुछ पता चलेगा और ना ही विरोधी दलों के कानों तक धमक पहुंचाई जा सकेगी। लेकिन अब पार्टी के टॉप नेताओं की रैलियों के दौरान ऐसा करना संभव नहीं होगा। दरअसल, इंटेलीजेंस ब्यूरो ने सभी राज्यों के डायरेक्टर जनरल पुलिस को एक एडवायज़री भेजी है। इस एडवायज़री के मुताबिक डायरेक्टर जनरल स्तर के अधिकारियों को ये सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि पार्टी के दिग्गज नेताओं के आसपास कहीं पटाख़े ना बजने दिए जाए। आईबी ने ये कदम अमृतसर में बीजेपी उम्मीदवार अरुण जेटली के एक रोड-शो के दौरान हुए हादसे के बाद उठाया है। 18 मार्च को इस रोड शो के लिए बीजेपी समर्थकों ने हीलियम के गुब्बारों और पटाखों का इंतज़ाम कर रखा था। जेटली जब जीप पर चढ़े हुए थे तो एक पटाखे से गुब्बारा फट गया। ज़ोरदार धमाके के साथ गैस का रिसाव हुआ। इस हादसे में जेटली और कुछ पुलिसवालों को मामूली चोटें आईं। आईबी ने राज्यों के डायरेक्टर जनरल पुलिस को भेजी एडवायज़री में पिछले साल आंध्र प्रदेश के पश्चिम गोदावरी ज़िले में हुए एक हादसे का भी उल्लेख किया। इस हादसे में पटाखों से ही एक वाहन में आग़ लग गई थी। आईबी ने ऐसी ही एडवायज़री वीवीआईपी की सुरक्षा व्यवस्था देखने वाले स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) और नेशनल सिक्योरिटी गार्ड्स (एनएसजी) को भी भेजी है।

स्लॉग ओवर

सूबेदार लहना सिंह और सूबेदार इमामदीन ब्रिटिश इंडियन आर्मी की एक ही रेजीमेंट में तैनात थे। दोनों जिगरी यार थे और रोज शाम को साथ जाम टकराया करते थे। देश के बंटवारे ने दोनों को अलग कर दिया। सूबेदार इमामदीन को पाकिस्तानी सेना में जाना पड़ा। अपने यार की याद को हमेशा ज़िंदा रखने के लिए सूबेदार लहना सिंह रोज़ शाम रम के दो गिलास तैयार करता। फिर एक-एक बार दोनों से सिप करता। कोई पूछता तो कहता कि- एक मेरा है और एक सूबेदार इमामदीन का। कई साल बीतने के बाद लहना सिंह सिर्फ एक गिलास से रम सिप करता दिखा। रोज़ सूबेदार लहना सिंह को देखने वाले एक शख्स ने पूछा- क्यों भाई आज दूसरा गिलास कहां है?” इस पर सूबेदार लहना सिंह का जवाब था- आज से मैंने पीना छोड़ दिया है, लेकिन मेरे यार ने नहीं।
(Contributed by Dr Dhanul Haq Haqqi, Karachi)








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बुधवार, 2 अप्रैल 2014

Husband, Wife and ? ...खुशदीप




पति, पत्नी और 'वो'...

चुनावी ख़बरों की बमबारी...पतियों की मगज़मारी...पत्नियों की दुश्वारी...नेताओं की ज़ुबानी जंग ज़्यादा दिलचस्प या सास-बहू सीरियल्स का मेलोड्रामा...ऐसा ही ऑफबीट पढ़ सकते हैं आप वेबदुनिया पोर्टल के इस लिंक पर-






Keywords:Election, Husband, Wife