शुक्रवार, 28 मार्च 2014

अटल और मोदी का फ़र्क़...(खुशबतिया 29-03-14)

(वादे के मुताबिक खुशवंत सिंह के कॉलम की प्रेरणा से खुशबतिया का दूसरा संस्करण आपकी पेश-ए-नज़र है, अपनी राय से ज़रूर अवगत कराइएगा।)





अटल और मोदी का फ़र्क़...



बीजेपी की ओर से अभी तक एक ही प्रधानमंत्री देश को मिले हैं- अटल बिहारी वाजपेयी। बीजेपी की तरफ़ से ये गौरव हासिल करने वाले दूसरे शख्स नरेंद्र मोदी बन पाते हैं या नहीं, ये तो अगली 16 मई के बाद ही साफ़ होगा। हां, फिलहाल मोदी ने अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रखा है। अटल बीजेपी तो क्या गठबंधन धर्म के नाते पूरे एनडीए को साथ लेकर चलने में विश्वास रखते थे। मोदी अपने कद के आगे पूरी बीजेपी को ही कुछ नहीं समझते। गुजरात दंगों के बाद मोदी को राजधर्म की नसीहत देने वाले अटल की पहचान नैसर्गिक कवि की रही है। वहीं मोदी उधार के शब्दों के साथ आज प्रचार के हर माध्यम पर दहाड़ते दिख रहे हैं- सौगन्ध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं मिटने दूंगा, मैं देश नहीं झुकने दूंगा। प्रसून जोशी जैसे महंगे फिल्मी गीतकार ने ज़रूर इस गीत को लिखने के लिए मोटी फीस वसूली होगी। प्रसून की पहचान एडवरटाइज़िंग की दुनिया से भी जुड़ी है। प्रसून और पीयूष पांडे की टीम बीजेपी के प्रचार अभियान को देख रही है। ख़ैर जिसे बीजेपी की एंथम कह कर प्रचारित किया जा रहा है, उसमें बीजेपी का तो कोई ज़िक्र नहीं सिर्फ़ मोदी की ही हुंकार सुनाई देती है। गीत में 20 जगह मोदी ने मैं, मेरा या मुझसे का इस्तेमाल किया है। अटल राजनीति के लिए कभी कविता नहीं करते थे। मोदी सिर्फ अपने को चमकाने की राजनीति के लिए दूसरे के लिखे शब्दों को अपनी आवाज़ दे रहे हैं। शायद यही फ़र्क है अटल के अटल और मोदी के मोदी होने का...

केजरीवाल का गेमप्लान...

अरविंद केजरीवाल का कहना है कि वो जीतने के लिए नहीं, मोदी को हराने के लिए वाराणसी से चुनाव लड़ रहे हैं। सवाल ये उठता है कि केजरीवाल का गेमप्लान क्या हैकेजरीवाल ने जिस तरह अब मोदी के ख़िलाफ़ ताल ठोकी है ठीक वैसे ही उन्होंने पिछले साल दिल्ली विधानसभा चुनाव में शीला दीक्षित के साथ किया था। तब उन्होंने दिल्ली में 15 साल से राज कर रही शीला दीक्षित को उन्हीं के गढ़ में धूल भी चटा दी। इस बार केजरीवाल को पता है कि ना तो वाराणसी दिल्ली है और ना ही मोदी शीला दीक्षित हैं। वाराणसी में केजरीवाल भी जानते हैं कि हार निश्चित है। फिर ये जोख़िम उन्होंने क्यों मोल लिया? दिल्ली में केजरीवाल ने 49 दिन के राज के बाद अपनी सरकार की बलि चढ़ाई थी तो लोकसभा चुनाव की जंग उनके दिमाग़ में थी। ऐसे वक्त में जब उन्हें अपनी पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा होने की वजह से प्रचार के लिए देश में जगह-जगह जाने की दरकार थी, उन्होंने खुद को वाराणसी के युद्ध में उलझा लिया। दरअसल मोदी को सीधे चुनौती देकर केजरीवाल कुछ और ही साधना चाहते हैं। केजरीवाल का मकसद कांग्रेस को हाशिए पर ले जाकर अपनी पार्टी की लकीर को उससे बड़ा करना है। केजरीवाल देश को, खास तौर पर मुसलमानों को संदेश देना चाहते हैं कि मोदी को ज़ोरदार टक्कर देने का माद्दा उन्हीं में है, कांग्रेस में नहीं। केजरीवाल की कोशिश यही है कि मोदी के सबसे बड़े विरोधी के तौर पर उन्हें देखा जाए, कांग्रेस को नहीं। केजरीवाल की ये रणनीति तो ठीक लेकिन उनकी अब तक कर्मभूमि रही दिल्ली में जो ताज़ा सियासी हवा बह रही है, वो उनकी परेशानियों का नज़ला बढ़ाने वाली है। एक न्यूज़ चैनल के सर्वेक्षण के मुताबिक दिल्ली विधानसभा चुनाव के मुकाबले कांग्रेस ने तेज़ी से अपनी खोई हुई ज़मीन को दोबारा हासिल किया है। ऐसे में केजरीवाल के लिए कहीं ये कहावत सही ना साबित हो जाए...चौबे जी छब्बे जी बनने चले थे और दूबे भी नहीं रह गए।

बेचारी नगमा...

बॉलीवुड, साउथ और भोजपुरी सिनेमा में खासा नाम (?) कमाने वाली अभिनेत्री नग़मा इन दिनों परेशान हैं। दस साल तक कांग्रेस के प्रचार के लिए देश भर में धूल फांकने वाली नगमा को आखिर उनकी तपस्या का इनाम मिला। नगमा को कांग्रेस ने मेरठ-हापुड़ लोकसभा सीट से अपना प्रत्याशी बनाया है। नगमा प्रचार के लिए जहां जाती है, लोगों का अच्छा खासा मज़मा जुट जाता है। नगमा का खुद का कहना है कि उन्हें नहीं पता कि उनके चारों ओर क्या हो रहा है। यानि उनके प्रचार की अभियान के लिए पार्टी का कोई बड़ा नेता उनके साथ मौजूद नहीं है। नगमा गुरुवार रात को मेरठ के जली कोठी क्षेत्र में प्रचार के लिए गई थीं। वहां उन्हें देखने वाली भीड़ ऐसी बेक़ाबू हुई कि नगमा को एक युवक को थप्पड़ भी जड़ना पड़ा। मुश्किल से सुरक्षाकर्मियों ने नगमा को भीड़ से निकाला। 22 मार्च को हापुड़ में भी नगमा को रोड-शो के दौरान अप्रिय स्थिति का सामना करना पड़ा था। हापुड़ के कांग्रेस विधायक गजराज सिंह उस वक्त नगमा के एक कान पर हाथ रखकर अपनी ओर खींचते हुए नज़र आए थे। न्यूज़ चैनल्स पर जारी तस्वीरों में नगमा गजराज सिंह का हाथ झटकते हुए साफ़ नज़र आईं। हालांकि बाद में गजराज सिंह की ओर से सफ़ाई दी गई कि नगमा उनकी बेटी के समान हैं और उनकी कोई ग़लत मंशा नहीं थी। नगमा को 2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान भी बदसलूकी का सामना करना पड़ा था। तब बिजनौर सीट से कांग्रेस प्रत्याशी रहे हुसैन अहमद अंसारी ने तो हद कर दी थी। प्रचार के लिए तब नगमा मंच पर पहुंची थीं तो कांग्रेस प्रत्याशी ने माला पहनाते हुए उनके कंधे पर हाथ रखने की कोशिश की। नगमा के हाथ झटकने पर भी आशिक मिज़ाज प्रत्याशी नहीं रुका। सारी मर्यादा ताक पर रखते हुए उसने नगमा के लिए ये तुकबंदी भी सुना डाली- कौन सा गम जो ये हाल बना रखा है, ना मेकअप है ना बालों को सजा रखा है, ख़ामोखां छेड़ती रहती हैं रुख़सारों को।" ये सुनकर नगमा ने कहा कि क्या बकवास कर रहे हो? इस पर भी कांग्रेस प्रत्याशी नहीं चेता।फिर बोला वो बकवास नहीं कर रहा। आख़िरकार नगमा गुस्से में पैर पटकते हुए मंच छोड़ कर चली गई थीं। बेचारी नगमा को विरोधियों से ज़्यादा उनकी पार्टी वालों ने ही परेशान कर रखा है।

स्लॉग ओवर

मक्खन उदास बैठा था। उसके दोस्त ढक्कन ने उदास होने का कारण पूछा। 
मक्खन ने कहा- "यार वो कल भारत-पाकिस्तान के क्रिकेट मैच में 800 रुपये का नुकसान हो गया।" 
ढक्कन- "क्या शर्त लगाई थी?" 
मक्खन- "हां, भारत की जीत पर मैंने 500 रुपये की शर्त लगाई थी, लेकिन भारत हार गया।" 
ढक्कन- "फिर 800 रुपये का नुकसान कैसे हो गया?" 
मक्खन- "यार, वो...300 रुपये हाईलाइट्स पर भी लगाए थे।" 

(Contributed by Ainit Kachnt, Washington DC)








Keywords:Khushwant Singh, Nagma

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

खुशवंत सिंह को समर्पित खुशबतिया...खुशदीप

(खुशवंत सिंह का मैं हमेशा बहुत बड़ा मुरीद रहा हूं...खुद को बड़ा सौभाग्यशाली समझता हूं कि मेरे नाम भी उनकी तरह खुश से ही शुरू होता है...उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए मैंने तय किया है कि अपने ब्लॉग पर हर शुक्रवार रात को खुशबतिया नाम से एक कॉलम लिखूं...प्रयास पसंद आए तो बताइएगा...आप से एक निवेदन और है कि आप इस कॉलम में शामिल करने के लिए मेरे ई-मेल sehgalkd@gmail.com पर चुटकुले या मज़ेदार बातें भेजनें का कष्ट करें...आप के नाम के साथ उन्हें प्रकाशित करने में मैं खुद को खुशकिस्मत समझूंगा...)

अलविदा! बेबाक़ी के सरदार...
खुशवंत सिंह सेंचुरी मारने से एक साल पहले आउट हो गए...उम्र के इस पड़ाव तक पहुंचने के बाद भी ज़िंदादिली ने उनका साथ नहीं छोड़ा...लेखन में साफ़गोई और बेबाकी...यही थी वो बात जिसके लिए उनके मुरीद उनसे मुहब्बत करते थे...शायद यही वजह है कि खुशवंत सिंह के जाने के बाद सोशल मीडिया पर उन्हें अपनी तरह से याद करने वालों का तांता लग गया...उनके लोकप्रिय स्तंभ का नाम बेशक रहा हो- ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर...लेकिन खुशवंत सिंह के देहांत के बाद उनसे बैर रखने वाले सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालने से नहीं चूके...उनके पिता शोभा सिंह का नाम ले-ले कर उन्हें कोसा गया...खुशवंत सिंह को देशद्रोही का पुत्र बताते हुए यहां तक कहा गया कि उन्हें नर्क में ही जगह मिलेगी...ये सही है कि खुशवंत सिंह के पिता शोभा सिंह ने सेंट्रल असेम्बली में 8 अप्रैल 1929 को बम फेंकने के मामले में शहीद भगत सिंह और शहीद बटुकेश्वर दत्त के ख़िलाफ़ गवाही दी थी...खुशवंत सिंह ने भी इस बात को स्वीकार करने से कभी इनकार नहीं किया...लेकिन खुशवंत ये भी कहते रहे कि शोभा सिंह की इस गवाही की वजह से भगत सिंह को फांसी नहीं हुई थी...शहीद भगत सिंह, शहीद सुखदेव और शहीद राजगुरू को लाहौर षड्यंत्र केस (मुख्यत: ब्रिटिश पुलिस अधीक्षक जे पी साण्डर्स की हत्या) में संलिप्तता के चलते फांसी दी गई थी...शोभा सिंह के लिए ये तर्क भी दिया जाता है कि असेम्बली बम मामले में उन्होंने जो अपनी आंखों से देखा था, वही उन्होंने गवाही में बयां किया था...यहां एक प्रश्न उठता है कि शोभा सिंह ने ग़लत कृत्य किया भी था तो उसके लिए उनके पुत्र को भी ज़िम्मेदार मानना कौन सा इनसाफ़ है...किसी की मृत्यु के बाद भी उसे ऐसे कृत्य के लिए बुरा-भला कहना, जो उसने किया ही नहीं, ये कौन सी भारतीय संस्कृति है....
हर हर मोदी...
कहते है राजनीति में जिस सीढ़ी से चढ़ा जाता है, ऊपर पहुंचने के बाद सबसे पहला काम उसी सीढ़ी को लात मारने का किया जाता है...बीजेपी अब पूरी तरह मोदीत्व को प्राप्त हो गई है...ऐसे में लौहपुरुषलालकृष्ण आडवाणी की स्थिति सबसे दयनीय हो गई है...बेचारे जो इच्छा जताते है, होता ठीक उसके उलट है...मोदी इज़ बीजेपी एंड बीजेपी इज़ मोदी’…दीवार पर लिखी इस इबारत को आडवाणी जितनी जल्दी आत्मसात कर लेंगे, उतना ही उनकी बची-खुची राजनीतिक सेहत के लिए अच्छा रहेगा...वैसे भी नरेंद्र मोदी को लेकर बीजेपी इतनी आश्वस्त हो चली है कि अब उसे भगवान का भी डर नहीं रह गया है...तभी तो दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष डॉ हर्षवर्धन ताल ठोक कर कह रहे हैं कि अब भगवान भी चाहें तो मोदी को जीतने से नहीं रोक सकते...बीजेपी की तरफ़ से नारा भी उछाला गया है...हर हर मोदी, घर घर मोदी’…कभी जय श्रीराम के उद्घोष से चुनावी सियासत के उत्कर्ष पर पहुंचने वाली बीजेपी इतनी निश्चिंत है कि उसे अब मोदी का नाम ही चुनावी वैतरणी पार करने के लिए पर्याप्त नज़र आता है...फिल्म उपकार का गाना ना जाने क्यों याद आ रहा है...'देते हैं भगवान को धोखा, इन्सां को क्या छोड़ेंगे'...
राहुल और 'रिटायरमेंट'...
18 मार्च को उत्तर-पूर्व में चुनावी प्रचार का आगाज़ करने के लिए राहुल गांधी अरुणाचल प्रदेश में थे...वहां हपोली में उनकी जनसभा थी...हपोली के नैसर्गिक सौंदर्य से राहुल इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने यहां तक कह दिया कि रिटायरमेंट के बाद वो यहीं बसना पसंद करेंगे...इस पर बीजेपी के समर्थकों की ओर से सोशल मीडिया पर चुटकी भी ली गई कि 16 मई को लोकसभा चुनाव की मतगणना के बाद राहुल अपनी इस इच्छा को पूरा कर सकते हैं...राहुल का फोकस लोकसभा चुनाव के साथ पार्टी का चेहरा-मोहरा बदलने पर है...युवाओं को तरज़ीह देकर राहुल की कोशिश कांग्रेस को गतिवान बनाने की है...राहुल यथास्थिति को तोड़ने की बात कर रहे हैं, लेकिन पार्टी के ओल्ड गार्ड्स को उनकी ये शैली हज़म नहीं हो पा रही है...कई दिग्गज़ नेताओं ने चुनाव से अलग रहने की ही इच्छा जताई...तो वहीं दिग्विजय सिंह और आनंद शर्मा जैसे नेता भी हैं जो स्वेच्छा से मोदी के ख़िलाफ़ काशी के चुनावी रण में उतरना चाहते हैं...सही कहा है कि जो दूरदर्शी होते हैं वो वक्त की नज़ाकत के मुताबिक अपने को ढालने में देर नहीं लगाते...
स्लॉग ओवर...

जब बॉबी डॉर्लिंग पैदा हुआ तो डॉक्टर घरवालों से बोला- बधाई हो, धोखा हुआ है...

जब एकता कपूर पैदा हुई तो डॉक्टर घरवालों से बोला- बधाई हो, कौन हुआ जानने के लिए देखिए, अगला एपिसोड...

जब प्रभू देवा पैदा हुआ तो डॉक्टर घरवालों से बोला- बधाई हो, बच्चा जब हिलना बन्द करेगा तो चेक करके बताएगें कि क्या हुआ है...

जब दया (CID) पैदा हुआ तो सारे डॉक्टरो ने भागकर हॉस्पिटल के सारे गेट बन्द कर दिए...
जब सुरेश कलमाड़ी पैदा हुआ तो डॉक्टर घरवालों से बोला- बधाई हो, घोटाला हुआ है...जांच जारी है...
जब दिग्विजय सिंह का जन्म हुआ तो डॉक्टर घरवालों से बोला- बधाई हो, आपके साथ मज़ाक हुआ है...

केजरीवाल के पैदा होने से पहले डॉक्टर घरवालों से बोला- बच्चा आ नही रहा है, अन्दर धरने पर बैठा है... 
(पागलपंती के फेसबुक वॉल से साभार)






Keywords:Khushwant Singh, Khushbatiya

शनिवार, 15 मार्च 2014

अनस को पढ़िए, लत ना लगे तो कहिएगा...खुशदीप

लेखन की एक खास शैली है...बेबाकी से अपनी बात सच सरासर सच कहना...ठेठ और अक्खड़ स्टाइल में...ये लेखन सीधे दिल से निकला होता है, सोलह आने खरा होता है, इसलिए गहरी मार करता है...कलम की रवानगी ऐसी होती है कि बस पूछो नहीं...एक बार कोई पढ़ना शुरू करता है तो फिर आख़री फुलस्टॉप पर ही जाकर रुकता है...

ब्लॉग जगत में ऐसा 24 कैरट लिखने वाले कई हैं...लेकिन मैं यहां दो ब्लॉगर्स का खास तौर पर नाम लेना चाहूंगा...महफूज़ अली और अनिल पुसदकर....इसी कड़ी में ताज़ा एक और नाम जुड़ा है...मोहम्मद अनस...इनके ब्लॉग का नाम है- नई डायरी...टैगलाइन है- मेरे हिस्से की दुनिया जो सबसे होकर गुज़रती है...

मेरे लिए इस पोस्ट लिखने का मकसद ही यही है कि मोहम्मद अनस को हिंदी ब्लॉग जगत से रू-ब-रू कराना...फेसबुक पर जनाब का पहले से ही बहुत जलवा है...हाल ही में अनस ने ब्लॉगिंग में दस्तक दी है...कुल जमा अभी तक तीन पोस्ट लिखी हैं...लेकिन इन तीन पोस्ट से ही इन्होंने बता दिया है कि इनकी लेखनी क्या क़यामत ढा सकती है...

मोहम्मद अनस


मोहम्मद अनस पर अभी लौटता हूं, पहले जिस खास लेखन की बात कर रहा था, उसकी झलक महफूज़ अली और अनिल पुसदकर भाई की इन दो पोस्ट के ज़रिए आप तक पहुंचा देता हूं...पुरानी पोस्ट हैं- लेकिन आज भी वैसा ही मज़ा देती है जैसे कि पहली बार पढ़े जाने के वक्त दिया था...

महफूज़ अली
महफूज़ अली-












अनिल पुसदकर
अनिल पुसदकर-












अब ये इस तरह के लेखन का कमाल ही है कि महफूज़ और अनिल भाई की हिंदी ब्लॉगिंग में हमेशा ज़बरदस्त फैन-फॉलोइंग रही है...

अब आता हूं मोहम्मद अनस पर...मेस्मेराइज़ कर देने वाले इनके लेखन की ये बानगी देखिए...

"जब छोटा था तो सबसे ज्यादा घबराहट जिस चीज़ से होती थी वह थी स्कूल जा कर आठ घंटे एक ही बेंच पर ,एक ही कमरे में ,एक ही ब्लैकबोर्ड को देखना . पांच साल का हो गया तो सजा धजा ,काजल पाउडर और सर में पचास ग्राम तेल चपोड़ घर में काम करने वाले दस्सू चच्चा इलाहबाद मांटेसरी स्कूल छोड़ आते ।पढ़ता कम और रोता ज्यादा था इसलिए क्लास से बाहर निकाल प्ले ग्राउंड भेज दिया जाता ।लेकिन स्कूल के टीचर जल्दी ही समझ गए की लड़का पहुंचा हुआ है ,रोज़ रोज़ का नाटक है इसका न पढ़ने का।" 

पूरी पोस्ट इस लिक पर पढ़ी जा सकती है-


इसके अलावा अनस ने दो और पोस्ट लिखी हैं-
अगर आप सिर्फ़ एक बार अनस को पढ़ लेंगे तो इनके बारे में कुछ और कहने की गुंजाइश ही ख़त्म हो जाएगी...फिर मेरी तरह आपको भी इनका लिखा पढ़ने की लत लग जाएगी...

(नोट- मोहम्मद अनस से पहले मैं मनसा वाचा कर्मणा वाले राकेश कुमार जी का हिंदी ब्लॉग जगत से परिचय कराने का ज़रिया बना था...राकेश जी भगवदगीता, उपनिषद, रामायण, भागवत आदि ग्रंथो की वैज्ञानिक आधार पर जिस तरह व्य़ाख्या करते हैं, उसने देश-विदेश में उनके असंख्य मुरीद बना दिए...अब मुझे उम्मीद ही नहीं पक्का यक़ीन है कि मोहम्मद अनस के लेखन को भी ऐसे ही हाथों-हाथ लिया जाएगा...)






Keywords:Mohammad Anas

बुधवार, 12 मार्च 2014

जस्सी जैसा कोई नहीं...खुशदीप


ये 11 मार्च बड़ी खास थी...इस तारीख़ की शाम समर्पित थी मेरे हीरो को...वो शख्स जिसे मैंने ज़िंदगी में कभी देखा नहीं...लेकिन उसकी शख्सीयत के बारे में मैंने जितना सुना, वो उतना ही मेरे दिल-ओ-दिमाग़ पर छाता गया...उसके बारे में मैंने जाना नहीं होता तो शायद आज मैं वो नहीं होता जो मैं हूं...उसके किस्सों को नहीं सुना होता तो आज मैं अपने पारिवारिक कारोबार को ही संभाल रहा होता...मैं जिस शख्स की बात कर रहा हूं, उसका नाम है- जसविंदर सिंह...हम सबका प्यारा जस्सी...वो जस्सी जिसे 31 दिसंबर 1993 को काल के क्रूर हाथों ने हम से छीन लिया था...महज़ 33 साल की उम्र में...

जस्सी आज होता तो तीन दिन बाद 15 मार्च को अपना 54वां जन्मदिन मना रहा होता...बीबीसी के पूर्व संवाददाता जस्सी के बारे में ज़्यादा जानना चाहते हैं तो बीस साल पहले छपे मेरे इस लेख को पढ़ सकते हैं...

'अन्याय को देख मर्माहत हो उठता था जस्सी'

(परवेज़ आलम भाई के फेसबुक वॉल से जस्सी का फोटो साभार)
बहरहाल आता हूं 11 मार्च पर...इस दिन जसविंदर सिंह मेमोरियल ट्रस्ट की ओर से भारतीय जन-संचार संस्थान (IIMC), दिल्ली में प्रथम वार्षिक व्याख्यान का आयोजन किया गया...संस्थान के मिनी ऑडिटोरियम में हुए इस कार्यक्रम में बीबीसी से जुड़े रहे और मीडिया प्रशिक्षक निकोलस न्यूजेंट  मुख्य वक्ता के तौर पर बोले...विषय था- ब्रिटेन में फोन हैकिंग के बाद न्यूज मीडिया के क्रियाकलापों की जांच के लिए गठित लेवेसन जांच आयोग की रिपोर्ट के भारतीय न्यूज मीडिया के लिए क्या मायने हैं ?

व्याख्यान का विषय बड़ा गंभीर था...खास तौर पर भारतीय मीडिया जिस दौर से गुज़र रहा है उसे देखते हुए...मीडिया का स्वतंत्र होना भारतीय लोकतंत्र की ख़ूबसूरती है...लेकिन मीडिया बिना किसी निगरानी के निरकुंश हो जाता है तो ये लोकतंत्र के लिए किसी त्रासदी से कम भी नहीं...सरकार के हस्तक्षेप के बिना आत्म-नियमन की बात की जाती है...लेकिन मीडिया, खास तौर पर इलैक्ट्रोनिक मीडिया ने आत्म-नियमन का जो चोला पहन रखा है, क्या वो अपेक्षित परिणाम दे पा रहा है...

इस विषय पर मुख्य वक्ता निकोलस न्यूजेंट से पहले प्रधानमंत्री के संचार सलाहकार पंकज पचौरी ने अपनी बात रखी...पंकज पचौरी ने भारत में मीडिया को गंभीर संकट में बताया...उनके मुताबिक बिज़नेस मॉडल फेल हो रहा है...अखबारों की प्रसार संख्या में गिरावट आ रही है...मीडिया संस्थानों का मुनाफ़ा तेज़ी से घट रहा है...विज्ञापनों से होने वाली कमाई लगातार घट रही है...ऐसे में छदम रेवेन्यू सिस्टम का सहारा लिया जा रहा है...प्रिंट मीडिया में सर्कुलेशन को साबित करने वाले IRS के आंकड़ों पर उंगली उठ रही है तो इलैक्ट्रोनिक मीडिया के लिए टीआरपी की गणना करने वाले TAM सिस्टम की विश्वसनीयता भी संदेह के घेरे में है... पंकज ने एक और दिलचस्प बात बताई कि आज भी दूरदर्शन दूसरे चैनलों के मुकाबले सात गुणा ज़्यादा देखा जाता है....

प्रधानमंत्री के संचार सलाहकार पंकज पचौरी ने बताया कि संसदीय स्थाई समिति ने लेवेसन जांच आयोग की रिपोर्ट पर भारतीय मीडिया के संदर्भ में विचार किया है...एक वर्किंग पेपर तैयार किया गया है...पेड न्यूज़ जैसे अनैतिक आचरणों के संदर्भ में मीडिया के नियमन ज़रूरत जताई जाती है...लेकिन इसके लिए कोई तैयार नहीं है...आत्म नियमन की दुहाई दी जाती है..दिल्ली हाईकोर्ट, भारतीय प्रेस परिषद और संसदीय स्थायी समिति सब कह चुके हैं कि आत्म नियमन की व्यवस्था काम नहीं कर रही है...फिर क्या रास्ता निकाला जाए...पंकज ने कहा कि वह खुद भी मीडिया पर निगरानी के लिए आत्म-नियमन के पक्ष में हैं...लेकिन इस आत्म-नियमन की जवाबदेही के लिए कोई मज़बूत सिस्टम बनना ज़रूरी है...इस संदर्भ में पंकज ने भारतीय निर्वाचन आयोग और सेबी जैसी संस्थाओं का हवाला दिया...पंकज के मुताबिक देश में नेता सबसे ज़्यादा निर्वाचन आयोग से और कारपोरेट सेबी से डरते हैं...

पंकज पचौरी के बाद मुख्य वक्ता निकोलस न्यूजेंट ने बोलना शुरू किया...बेबाक अंदाज़ में उन्होंने पहले ही साफ़ कर दिया कि वो भारतीय प्रिंट मीडिया को तो लगातार फॉलो करते रहे हैं लेकिन इलैक्ट्रोनिक मीडिया के बारे में वो ज़्यादा अवगत नहीं है...इसलिए लेवेसन जांच आयोग की रिपोर्ट को लेकर भारतीय मीडिया के संदर्भ के मायने में ज़्यादा अधिकार से कुछ नहीं कह सकते...हां उन्होंने ये ज़रूर कहा कि प्रधानमंत्री की स्पीच को कितना स्थान देना है, ये तय करना मीडिया का काम है और ये उस पर ही छोड़ देना चाहिए...

निकोलस न्यूजेंट ने ब्रिटेन के संदर्भ में कहा कि वहां प्रिंट मीडिया दम तोड़ने की ओर अग्रसर है...बिजनेस मॉडल को जबरदस्त खतरा है...प्रिंट मीडिया का सर्कुलेशन लगातार घटता जा रहा है...स्पेस सेलिंग के नए तरीके ढूंढे जा रहे हैं...ऐसे में गॉसिप और सनसनी के ज़रिए कारोबार करने वाली टेबलायड कल्चर हावी हो रही है...जानकारी के लिए पब्लिक सर्वेन्ट्स को रिश्वत दी जा रही है...न्यूज़ ऑफ द वर्ल्ड प्रकरण के बाद मीडिया की इन अनैतिक गतिविधियों की जांच के लिए ही लेवेसन जांच आयोग का गठन किया गया...खास तौर पर मीडिया और राजनेताओं के बीच बन गए रिश्तों पर लेवेसन जांच आयोग ने चिंता ज़ाहिर की...यानि वहां भी आत्म नियमन के लिए बनी प्रेस कम्पलेंट कमीशन कारगर नहीं रही...लेकिन सरकारी नियमन की व्यवस्था हो तो वो खुद बड़ी समस्या साबित हो सकती है...ऐसे में संवैधानिक तौर पर समर्थित आत्म-नियमन की व्यवस्था ही सबसे अच्छा विकल्प है...

खैर ये तो सब वो बातें हैं जो व्याख्यान से संबंधित थीं...लेकिन अब फिर उस शख्स की ओर लौटता हूं जिसके नाम पर ये सारा आयोजन हो रहा था...इस कार्यक्रम के आयोजन में ज़्यादातर लोग वही शामिल थे, जिन्होंने जस्सी के साथ बीबीसी में काम किया था...उसकी ज़िंदादिली के बारे में सुनाने के लिए सबके पास इतने किस्से थे कि पूरा दिन भी सुनाते रहते तो कम रहते...
बीबीसी की हिंदी सेवा की पूर्व प्रमुख अचला शर्मा ने शुरुआत में कार्यक्रम की रूपरेखा रखते हुए जस्सी के पसंदीदा पंजाबी कवि पाश की एक कविता का हवाला दिया...उनके भावुक शब्द ही ये गवाही देने के लिए काफ़ी थे कि जस्सी के जाने के बीस साल बाद भी उसकी ज़िंदादिली को वो कितनी शिद्दत के साथ महसूस करती है...

कार्यक्रम के मॉडरेटर (वरिष्ठ पत्रकार-प्रशिक्षक) परवेज़ आलम ने जस्सी को फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की इस नज़्म के साथ याद किया...

हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो: दिन के जिसका वादा है
जो लौह-ए-अजल में लिक्खा है
जब जुल्म-औ-सितम सितम के कोह-ए-गरां
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महकूमों के पाँव-तले
जब धरती धड़ धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हिकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी
जब अर्ज़ ए-खुदा के काबे से 
सब बुत उठवाये जायेंगे
हम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख्त गिराए जाएंगे

जस्सी के पत्रकारिता की शुरुआत के दिनों के साथी एम के वेणु (द हिंदू के पूर्व वरिष्ठ संपादक)....या फिर बीबीसी में जस्सी की नियुक्ति के सूत्रधार सतीश जैकब या विपुल मुद्गल...सभी के पास जस्सी के बारे में सुनाने के लिए बहुत कुछ था...इस मौके पर बीबीसी से बरसों तक जुड़े रहे रामदत्त त्रिपाठी और सुधा माहेश्वरी भी मौजूद रहे...बीबीसी में पिछले सात साल से कार्यरत इकबाल अहमद की शिरकत भी खास रही...

कार्यक्रम में सबसे महत्वपूर्ण उपस्थिति जस्सी की मां महेंद्र कौर, बहन डॉ.परमजीत कौर और बहनोई डॉ.ओंकार सिंह की रही...इस मौके पर जसविंदर सिंह मेमोरियल ट्रस्ट की तरफ से IIMC के दो छात्रों को हर साल छात्रवृत्ति देने का ऐलान किया गया...पहले साल के लिए चुनीं गईं  दो छात्राओं- सिंधुवासिनी (हिंदी पत्रकारिता) और हर्षिता (प्रसारण पत्रकारिता) को जस्सी की माताजी ने खुद अपने हाथों से आधिकारिक-पत्र देकर आशीर्वाद दिया...

(फोटो : आनंद प्रधान सर के फेसबुक वॉल से साभार)

इस अवसर पर बड़ी संख्या में उपस्थित IIMC के छात्रों को वक्ताओं से सवाल पूछने का भी मौका मिला...कार्यक्रम को सफल बनाने में IIMC के कुलसचिव जयदीप भटनागर और प्रोफेसर आनंद प्रधान के सहयोग को भी भुलाया नहीं जा सकता...IIMC से लौटते वक्त मैं यही सोच रहा था कि आज की शाम कितनी सार्थक रही...और रहती भी क्यों नहीं...पूरे कार्यक्रम की धुरी जस्सी जो था...जस्सी मेरा हीरो...

Keywords:Jasvinder Memorial Trust

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

ये मंत्र अपनाइए, हमेशा खुश रहेंगे...खुशदीप

हर हाल में खुशदीप हूं, इसलिए आज आप से खुश रहने का मंत्र साझा करना चाहता हूं...ये सच है कि ज़िंदगी हर कदम इक नई जंग है...अब ये हम पर निर्भर करता है कि हम इस जंग के लिए किस तरह अपने को हमेशा तैयार रखते हैं...

अपने तज़ुर्बे से आज आप को एक बात बताता हूं...इससे पहले आप से एक सवाल करना चाहता हूं कि हमें सबसे ज़्यादा दुख कब होता है?  दुख सबसे ज़्यादा तब होता है, जब आप किसी से बहुत ज़्यादा उम्मीद रखते हैं और वो शख्स आपके भरोसे पर खरा नहीं उतरता...दुख उस वक्त और ज़्यादा होता है जब आपका कोई अपना इस तरह का रुख दिखाता है...ज़ाहिर है कि जिन्हें आप अपना समझते हैं उन्हीं से उम्मीद रखते हैं...

अब आप इससे विपरीत चल कर देखिए...दुनिया में कोई भी शख्स क्यों ना हो, उससे उम्मीद मत रखिए...जब आप उम्मीद ही नहीं रखेंगे तो उसका टूटने का डर भी नहीं रहेगा...भरोसा रखना है तो बस अपने कर्म पर रखिए...देर हो सकती है लेकिन इस तरह की सोच आपको एक-ना-एक दिन फल ज़रूर देगी...

दूसरों से आप उम्मीद ना रखें...लेकिन अगर आप ऐसी स्थिति में है कि किसी के कोई काम आ सकते हैं तो ज़रूर ऐसा कीजिए...ऐसा करके देखिए आपको कितना फीलगुड होगा...और अगर आपको लगता है कि आप किसी का काम करने में समर्थ नहीं है तो उसे तत्काल मना कर दीजिए...हो सकता है सामने वाले को कुछ बुरा लगे लेकिन यही उसके लिए सबसे बेहतर है...कम से कम उसका समय तो व्यर्थ नहीं होगा...



आप भी इस सोच को अपना कर देखिए, यक़ीन मानिए, जीवन का अर्थ ही बदल जाएगा...इसी संदर्भ में आपको आज का एक उदाहरण बताता हूं...

मेरी बिटिया पूजन नौवीं क्लास में पढ़ती है, उसकी आजकल वार्षिक परीक्षाएं चल रही हैं...हर बच्चे की तरह उस पर भी हर सब्जेक्ट में A-1 ग्रेड लाने का प्रैशर है...ये बात दूसरी है कि ना तो मैंने और ना ही पत्नीश्री ने उस पर कभी इसके लिए दबाव डाला है...लेकिन पूजन खुद ही अपनी ज़िम्मेदारी समझती है...पूजन अपनी तैयारी में लगी हुई है लेकिन कल उसके स्कूल से क्लास टीचर का फोन आया...क्लास टीचर ने बताया कि दसवीं की परीक्षा देने वाली किसी लड़की के हाथ में फ्रैक्चर हो गया है, और उसकी परीक्षा देने के लिए राइटर की ज़रूरत है...प्रिंसिपल ने इसके लिए पूजन का नाम सजेस्ट किया है...

पूजन को जब ये बताया तो वो खुद ही अपने अगले पेपर देने की तैयारी में लगी थी...हमने पूजन से कुछ कहने की बजाय उस पर ही छोड़ दिया कि वो क्या फैसला लेती है...उसे ये बता दिया कि अगर उसे लगता है कि उसकी तैयारी में फर्क पड़ेगा तो वो मना कर सकती है...लेकिन पूजन ने बिना देर लगाए फैसला ले लिया कि वो राइटर बनेगी...राइटर उस बच्ची के लिए जिसे वो जानती भी नहीं....आज वो राइटर के तौर पर ही किसी और के लिए चार घंटे परीक्षा देने गई हुई है...

अब बताइए कि पूजन ने ऐसा करके मुझे और पत्नीश्री को जो खुशी दी है वो किसी और बात से क्या मिल सकती थी...मेरे लिए बिटिया के अच्छे मार्क्स आने से ज़्यादा ये खुशी मायने रखती है...क्योंकि GIVING IS LIVING


बड़े दिन हो गए आपको स्लॉग ओवर में मक्खन से मिलवाए, चलिए आज ये काम भी कर देता हूं...

स्लॉग ओवर
ढक्कन... मक्खन भाई, बड़े दिन से दिखे नहीं थे, कहां चले गए थे...

मक्खन...अरे कहीं नहीं यार...वो दुकान खोली थी ना...छह महीने जेल में रहना पड़ा...

ढक्कन... दुकान खोली थी !!! जेल में रहना पड़ा....बात कुछ समझ नहीं आ रही...

मक्खन...अरे कुछ नहीं...किसी की दुकान हथौड़े से खोली थी ना...






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