सोमवार, 21 अप्रैल 2014

आखिर किसके अच्छे दिन आने वाले हैं...खुशदीप


मूूलत: प्रकाशित - नवभारत टाइम्स, 21 अप्रैल 2014...


“2014 का संदेश कमल और मोदी का है। कमल पर दबाये बटन से आपका हर वोट सीधे मोदी को मिलेगा। ये शब्द किसी ओर के नहीं बल्कि खुद नरेंद्र मोदी के हैं। एक ऑडियो-वीडियो विज्ञापन में भी मोदी खुद की आवाज़ में दहाड़ते देखे जा सकते हैं- सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं मिटने दूंगा, मैं देश नहीं झुकने दूंगा। प्रख्यात फिल्मी गीतकार प्रसून जोशी को मोटी फीस दे कर लिखे गए इस गीत में पूरा ज़ोर मोदी को लार्जर दैन लाइफ़छवि देने पर है। यानि देश को झुकने ना देने के लिए अकेले मोदी ही काफ़ी हैं।

यही नहीं मोदी के प्रचार में और भी गीत सुने जा सकते हैं। अच्छे दिन आने वाले हैं, मोदी जी आने वाले हैं।“ “इंद्र है, इंद्र है, नरों में इंद्र है।हर जगह मोदी की कोशिश बेशक बीजेपी से पहले खुद को बताने की है। अब ये बात दूसरी है कि मुरली मनोहर जोशी देश में मोदी की नहीं बीजेपी की हवा बता रहे हैं। आडवाणी मोदी को अच्छा इवेंट मैनेजरकह रहे हैं। उमा भारती मोदी को अच्छा वक्तानहीं भीड़जुटाऊ नेता करार दे रही हैं।

ज़ाहिर है कि मोदी के बीजेपी में स्वयंभू सर्वशक्तिमान होने से पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के कई नेता हैरान-परेशान हैं। इन नेताओं को पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के ज़रिए मोदी का साफ़ संदेश है- बीजेपी में रहना होगा तो मोदी-मोदी कहना होगा। कुछ-कुछ फिल्म शोले के हिट डॉयलॉग की तर्ज़ पर- अगर गब्बर के ताप से तुम्हे कोई शख्स बचा सकता है तो वो है खुद गब्बर।

मोदी की राजनीति की ये विशिष्ट शैली है। गुजरात में भी मोदी ने अपना राजनीतिक कद इसी तरह बड़ा किया। इस दर्द को गुजरात के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों- सुरेश मेहता, शंकर सिंह वाघेला और केशुभाई पटेल से ज़्यादा अच्छी तरह और कौन समझता होगा। मोदी अब बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व में भी अपनी लाइऩ से अलग बोलने वाले नेताओं को जिस तरह हाशिए पर ले जा रहे हैं, उस कार्यशैली से एक सवाल उठता है। अगर मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो देशवासियों को किस तरह का भारत मिलेगा?

अधिनायकवादी नेता के हाथ में अगर केंद्र की सत्ता की कमान आती है तो देश किस दिशा में अग्रसर होगा?  भारतीय लोकतंत्र की अवधारणा जिस संसदीय जनवाद पर टिकी है, क्या देश उससे इतर नरम फासीवाद की लाइन पकड़ेगा? भारत भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टि से जितना विशाल और विविध है, उसे देखते हुए यहां कठोर फासीवाद के तत्काल जड़े जमा लेने की संभावना बहुत कम है। ऐसा कोई भी अजेंडा बहुलतावादी इस देश पर थोपना आसान नहीं है।

हां, ये ख़तरा ज़रूर है कि केंद्र में कोई अधिनायकवादी प्रधानमंत्री बनता है और कई राज्यों में उसके कठपुतली मुख्यमंत्री बनते हैं तो फिर कट्टर फासीवाद भी दूर की कौड़ी नहीं रहेगा। ऐसा माहौल जहां दबंगई और धौंसपट्टी के ज़रिए शासन चलता है। ऐसी स्थिति, जहां दक्षिणपंथी अजेंडे से अलग मत रखने वालों के सामने समर्पण या मौन के सिवा कोई विकल्प ही नहीं बचता।

ये किसी से छुपा नहीं है कि पिछले कुछ वर्षों से एक रणनीति के तहत मोदी की खास छवि बनाने की कोशिश की गई। ये जमकर प्रचारित किया गया कि मोदी ही इकलौते नेता है जो देश को बचा सकते हैं, मोदी ईमानदार है, कुशल प्रशासक हैं, त्वरित निर्णय लेते हैं, आदि आदि। सवाल ये है कि मोदी क्या अकेले दम पर अपनी ये छवि गढ़ सकते थे। मोदी के अलावा आख़िर और कौन सी वो परिस्थितियां रहीं जिन्होंने मोदी के व्यक्तित्व को इतना तिलिस्मी बना दिया?

मोदी के मददग़ारों में सबसे बड़ा नाम भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के कॉरपोरेट मॉडल का लिया जा सकता है। कॉरपोरेट जगत के बड़े खिलाड़ियों का एकसुर में मोदी की शान में कसीदे पढ़ना संयोग नहीं है। नव उदारवादी नीतियों को देश पर थोपने के लिए कारोबारियों को मोदी से ज़्यादा मुफ़ीद नेता अब और कोई नही दिख रहा। वेलफेयर स्टेट की धारणा के तहत चलने वाले महंगे सामाजिक कार्यक्रम अब कॉरपोरेट जगत की आंख की किरकिरी बन गए हैं। यही हाल देश के दूसरे छोटे-मोटे कारोबारियों का भी है। मोदी की सुपरमैन सरीखी छवि के लिए मीडिया का भी सहारा लिया जा रहा है। मीडिया बड़े कारोबारियों से प्रभावित रहता है क्योंकि उनके विज्ञापनों से ही उसे अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा मिलता है।

मोदी की मसीहा की छवि गढ़ने वाले देश के मध्यम वर्ग की नाराज़गी को भुनाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। दरअसल मध्यम वर्ग मानने लगा है कि देश की मौजूदा आर्थिक नीतियां धन्ना सेठों को और अमीर बनाने वाली हैं। और सामाजिक कल्याण के नाम पर सारी मदद गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों के लिए है। मध्यम वर्ग नाराज़ है कि अपनी कमाई से पूरा टैक्स देने के बावजूद उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।


ये तो रहे वो कारण जिनकी वजह से आज मोदी सुपरब्रैंड बने नज़र आ रहे हैं। लेकिन इन कारणों पर ही पूरा देश सीमित नहीं हो जाता। कर्नाटक को छोड़ दें तो दक्षिण और पूर्व भारत में अभी तक बीजेपी की नाम की ही मौजूदगी रही है। केंद्र में दमदार नेता होना ज़रूरी है लेकिन देश की सामूहिकता भी बहुत मायने रखती है। देश के अल्पसंख्यक दिल्ली की गद्दी पर ऐसे नेता को देखना चाहते हैं, जिससे उन्हें अपनी सुरक्षा की पूरी गारंटी मिले। बीजेपी लोकसभा चुनाव में बहुमत के आंकड़े से अगर दूर रह जाती है तो उसके पोस्टरबॉय मोदी उसके लिए कमज़ोरी भी बन सकते हैं। और ऐसा हुआ तो बीजेपी को सबसे ज्यादा याद मोदी को कभी राजधर्म की नसीहत देने वाले अटल बिहारी वाजपेयी की आएगी।






Keywords:Fascism, Narendra Modi

3 टिप्‍पणियां:

  1. मेरे आस पास कुछ बनना शुरु हो चुके हैं चुनाव होते होते आधे और रिजल्ट आने के बाद पूरे हो जायेंगे तब एक नहीं पूरे देश में बहुत से हो जायेंगे ।

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  2. कल 26/04/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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