बुधवार, 22 जनवरी 2014

‘आप’ की अंधी गली में उलझा आम आदमी...


'आप' की अंधी गली में उलझा आम आदमी...

बड़े बोल बोलना आसान, अमल करके दिखाना बेहद मुश्किल...

-सुधीर एस. रावल

(सुधीर जी के इस लेख ने मुझे बहुत प्रभावित किया, इसलिए अपने ब्लॉग पर उनकी आज्ञा से इसे प्रकाशित कर रहा हूं)

दो दिन तक दिल्ली की सरकार को सड़क पर ला कर रख देने लाने वाले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आखिर कदम वापस खींच लिए. उन्होंने जीत का दावा करते हुए अपना धरना मंगलवार को खत्म कर दिया. दिल्ली के दो एसएचओ को छुट्टी पर भेजे जाने से ही केजरीवाल को संतुष्ट हो जाना था तो बड़ा सवाल ये ही कि दिल्ली को दो दिन तक उन्होंने बंधक क्यों बनाए रखा? दिल्ली के लोगों को ये कहने को मजबूर क्यों कर दिया कि ये आम आदमी पार्टी नहीं आम आदमी प्रॉब्लम है.



राजनीतिक व्यवस्था को बदलने के बड़े-बड़े वादों के साथ केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में 28 सीटें बेशक जीती थीं लेकिन सरकार बनाने के लिए बहुमत से वो फिर भी दूर थी. सरकार बनाने के लिए आप ने उसी कांग्रेस से समर्थन लिया, जिससे किसी तरह का तालमेल ना करने के लिए केजरीवाल अपने बच्चों की कसम तक खाने से पीछे नहीं हटते थे.

जनादेश की इच्छा के विपरीत बेमेल गठबंधन के ज़रिए बनी आप की सरकार ने एक महीने में जिस तरह का आचरण दिखाया है, वो अपने आप में दिल्ली के साथ देश के लोगों को बेचैन करने वाला है. सवाल ये है कि केजरीवाल और उनके सहयोगी आखिर चाहते क्या हैं? क्या चुनावी वर्ष में वो पूरे देश में वैसी ही अराजकता फैलाना चाहते हैं, जिसका परिचय उन्होंने दिल्ली में पिछले दो दिन में दिया, वो भी ऐसे वक्त जब देश गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारी कर रहा था.

ये नहीं भूलना चाहिए कि केजरीवाल अपने दलबदल के साथ जिस रेल मंत्रालय के सामने धरना दे रहे थे, वहां से राजपथ साथ ही सटा हुआ है. इसी राजपथ पर गणतंत्र दिवस परेड के अलावा इसकी पूर्व ड्रेस रिहर्सल भी की जाती है. ऐसे में बड़ी संख्या में लोगों के वहां पहुंचने से हज़ारों करोड़ों रुपये के रक्षा उपकरणों की सुरक्षा को खतरा हो सकता था.

सूत्र बताते हैं कि जब सेनाध्यक्ष जनरल विक्रम सिंह ने इस मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार के कैबिनेट सेक्रेटरी अजित सेठ से गहरी चिंता जताई तभी उपराज्यपाल नजीब जंग के ज़रिए केजरीवाल को कड़ा संदेश दिया गया. केजरीवाल को फेससेविंग के तहत दो एसएचओ को छुट्टी पर भेजना ही पर्याप्त लगा. लेकिन यहां ये सवाल उठ सकता है कि केजरीवाल ने अपने एक मंत्री सोमनाथ भारती की खातिर जिस तरह का आचरण दिखाया, जिस तरह के बयान दिए, क्या ये एक मुख्यमंत्री का राजधर्म है ? क्या दिल्ली पुलिस के जवानों को वर्दी उतार कर धरने पर शामिल होने के लिए कहना, एक चुनी हुई सरकार के मुखिया को शोभा देता है ?

पिछले एक साल में राष्ट्रीय स्तर पर चान   रविंद केजरीवाल और उनकी  मी पार्टीको दिल्ली की जनता ने 4 दिसंबर को हुए चुनाव में अपेक्षा से अधिक समर्थन दिया. साथ ही जताया कि लोगों की आशाएं हमेशा प्रमाणिकता, ईमानदार, सकारात्मक परिवर्तन, शिक्षित एवं साफ सुथरे नेतृत्व के साथ सक्रिय रूप से जुड़ी होती हैं. लेकिन केजरीवाल, उनके निकट सहयोगियों और आम आदमी पार्टीसे जुड़ी पिछले एक महीने की घटनाओं पर गौर करें, तो कई भ्रम टूटते दिखे. आप के नेताओं के बोल और बर्ताव हैरान करने वाले बेशक ना हो लेकिन आम आदमी के लिए परेशान करने वाले ज़रूर हैं.

ज्यादा दिन नहीं बीते, जब देश ने पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल को ज़ोर देकर कहते सुना था-  कांग्रेस और भाजपा, दोनों को माफिया चला रहे हैं, हमारे सभी सदस्य ईमानदार एवं चरित्रवान है और किसी के खिलाफ अदालत में कोई आपराधिक मामला नहीं चल रहा. हमने सीडब्ल्यूजी मामले में शीला दीक्षित के विरुद्ध षडयंत्र, धोखाधड़ी एवं भ्रष्टाचार जैसे गंभीर अपराध के 370 पन्ने के सबूत पुलिस को सौंपे हैं और अगर एक सप्ताह मे एफआईआर दर्ज नहीं करेंगे तो हम अदालत का दरवाज़ा खटखटाएंगे. चुनाव के बाद भाजपा या कांग्रेस का साथ नहीं लेंगे. जनलोकपाल 15 दिन में पेश करेंगे. वित्तीय भ्रष्टाचार का कोई भी मामला सामने आया तो कड़े कदम उठाएंगे...आदि आदि...

अब यही केजरीवाल शीला दीक्षित के लिए कह रहे हैं कि सबूत मिलने पर कार्रवाई करेंगे. उनके चरित्रवान सदस्यों में से देशराज राघव के खिलाफ माफिया होने एवं मिलावट करने जैसी गंभीर शिकायत लोकायुक्त में पेश की गई है. एक सदस्य विशेष रवि के भाई चकित रवि कुछ समय पहले ही अपहरण के केस मे संलिप्त होने की वजह से जेल में है. हरीश अवस्थी जैसे उनके अन्य एक साथी पर भी आपराधिक केसों में संलिप्त होने का आरोप है. बादलपुर विधानसभा सीट के लिए दो करोड़ लेने की बातें हवा में तैर रही हैं. ये आरोप भी नए नही है कि पार्टी के कर्ताधर्ता भारत विरोधी विदेशी तत्वों से भी चंदे के नाम पर मोटा पैसा धड़ल्ले से ले रहे हैं.

ऐसे आरोपों से इतर एक और बड़ा सवाल है...शासन का...एक महीने में जिस तरह का शासन आपने दिल्ली को दिया है, वो अपने आप में साबित करता है कि अनुभवहीन और नीतिविहीन सरकार से क्या-क्या नुकसान हो सकते हैं? जनलोकपाल को 15 दिन में लागू करने के बड़े बोल बेशक बोले गए हों लेकिन सच ये है कि ये क़ानून पास करना उनके अधिकार क्षेत्र में है ही नहीं. भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए जनता को स्टिंग ऑपरेशन करने की बेतुकी सलाह देने वाली इस सरकार में प्रशासन लकवाग्रस्त होने लगा है. जनता की शिकायतों को दूर करने के लिए बिना सोचे समझे.सड़क पर जनता दरबार लगाना, फिर आपाधापी मचने पर ऐसी कवायद से हमेशा के लिए तौबा कर लेना, खुद ही अपना मखौल बनवाना नहीं तो और क्या है?

केजरीवाल का कहना है कि लोकसभा चुनाव के लिए हर क्षेत्र के लोगों से राय लेकर ही किसी का टिकट फाइनल किया जाएगा. इसके लिए हर उम्मीदवार का नाम फाइनल होने से पहले एक निर्धारित प्रक्रिया से गुजरना होगा. ऐसा है तो फिर कुमार विश्वास का अमेठी से नाम कैसे फाइनल कैसे हो गया. आपकी एक सदस्य टीना शर्मा ने आरोप लगाया है कि दिल्ली में लोकसभा सीटों के लिए शाजिया इल्मी, आशुतोष, संजय सिंह, दिलीप पांडे और आशीष तलवार के नाम पहले ही फाइनल किए जा चुके हैं, फिर और लोगों से क्यों उम्मीदवारी के लिए बेकार में फॉर्म भराए जा रहे हैं.

आम आदमी पार्टीके ही एक नेता कुमार विश्वास इस तरह से बयान देते हैं जैसे उन पर किसी का अंकुश है ही नहीं. ये वही पांच सितारा कवि हैं जिन पर इमाम हुसैन, सिख धर्मगुरु और भगवान शंकर के लिए आपत्तिपूर्ण टिप्पणियां करने की वजह से धार्मिक भावनाओं को भड़काने का केस दर्ज हो चुका है. पार्टी के एक और नेता प्रशांत भूषण कश्मीर और माओवादियों पर विवादित बयान देकर सुर्खियों में छाए रहे. हालांकि सुविधा के अनुसार केजरीवाल ने इन बयानों को प्रशांत भूषण की निजी राय बता कर पल्ला झाड़ लिया.

आपकी दिल्ली में सरकार बनते ही इसके लक्ष्मीनगर सीट से विधायक विनोद कुमार बिन्नी ने तेवर जता कर साफ़ कर दिया था कि पार्टी में अंदरखाने बहुत कुछ सुलग रहा है. 15 दिन बाद बिन्नी ने बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर केजरीवाल को झूठों का सरताज करार दिया. बिन्नी का कहना था कि- वचन लेने के बाद भी आम आदमी पार्टी के मंत्री लाल बत्ती वाली गाड़ी में घूम रहे हैं, पार्टी लोकतांत्रिक पद्धति से नहीं सिर्फ चार-पांच व्यक्तियों के लिए फैसलों पर ही चल रही है. महिला सुरक्षा का आश्वासन दिया गया था लेकिन दिल्ली में एक डेनिश महिला का गैंगरेप होने पर सभी ने चुप्पी साध ली. बिजली एवं पानी के बिल में भी सरकार ने जो कुछ किया वो लीपापोती वाला ही है, केजरीवाल बेईमान, झूठे एवं तानाशाह हैं...वगैरा...वगैरा...

अभी तक आपकी ओर से दूसरे राजनीतिक दलों पर प्रहार किए जाते थे, अब आप खुद सवालों के कटघरे में है. यूपी, उत्तराखंड और हरियाणा में पार्टी के नेताओं को सभाओं के दौरान लोगों के आक्रोश का भी सामना करना पड़ रहा है. यही नहीं अभी तक मीडिया खास तौर पर न्यूज़ चैनल जिस व्यक्ति को राष्ट्रीय हीरो के तौर पर पेश कर रहे थे,वही अब केजरीवाल और आप पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं.

सोशल मीडिया और यू ट्यूब पर भी केजरीवाल और आप की कथनी और करनी में फर्क और दोहरे मापदंडों को लेकर कई तरह के प्रमाण सामने आ रहे हैं. केजरीवाल और उनकी टीम के विचारों में अस्थिरता और अपरिपक्वता के साथ ही आचरण में अवसरवादिता के आरोप उनके विरोधी खुल कर लगाने लगे हैं. दिल्ली की जनता ने जिस भरोसे और उम्मीदों के साथ आप को वोट दिया था, अब वो खुद को ठगा सा महसूस करने लगी है. उसका सवाल है कि केजरीवाल दिल्ली को सुशासन देने की जगह ये किस तरह की राजनीति कर रहे हैं, जो दिल्ली के लोगों की परेशानियां सुलझाने की बजाए उन्हें और बढ़ा रही है.

न्यूज़ चैनलों को देखकर राजनीतिक राय बनाने वाला मध्यम वर्ग हैरान एवं बेचैन है. कुछ वक्त पहले तक वो जिन्हें निस्वार्थ भाव से जनता की सेवा का संकल्प लेने वाला नेता समझ कर उनके बोलों को बहुत गंभीरता से ले रहा था, वही अब उनका असल में आचरण देखकर खुद को अंधी गली में खड़ा महसूस कर रहा है. अरविंद केजरीवाल का समर्थन करने वाला बुद्दिजीवी वर्ग भी उलझन में है कि किस तरह इन लोगों का बचाव किया जाए?

इरादा नेक होना, उसको बयां करना अच्छी बात है, लेकिन इससे ज़्यादा अहम होता है उस पर गंभीरता से अमल करके दिखाना. देश में साफसुथरी छवि वाले जनप्रतिनिधि ही चुन कर आएं, ज़्यादा से ज़्यादा अच्छे लोग सार्वजनिक जीवन में सक्रिय बनें, ये आदर्श स्थिति जितनी जल्दी बने उतना ही भारत और इसके नागरिकों के लिए अच्छा होगा. दिल्ली विधानसभा चुनाव नतीजे आने के बाद अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी का राजनीति का सकारात्मक पक्ष भी सामने आया था. नैतिकता और शुचिता का आग्रह उस वक्त इतना बड़ा था कि हॉर्स ट्रेडिंग की बजाय विपक्ष में बैठने की सोच जैसे अभूतपूर्व और सुखद दृश्य भी देखने को मिले थे. लेकिन ये सब कुछ इतनी जल्दी नेपथ्य में चला जाएगा, किसी ने सोचा नहीं था. अब सवाल यही है कि क्या एंटी-पॉलिटिक्स की ये पॉलिटिक्स ज़्यादा से ज़्यादा पॉवर हथियाने का ही क्या एक हथियार है? सवाल गहरा है, लोकसभा चुनाव तक शायद ये धुंधली तस्वीर बिल्कुल साफ़ हो जाए...


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69 टिप्‍पणियां:

  1. उम्मीदें वाकई धुंधला रही हैं !
    अरविन्द केजरीवाल के कुछ सहयोगियों के मूर्खता पूर्ण बयान एवं कार्यकलाप बेहद निराशाजनक हैं , इनसे हमने देश में अच्छी सरकार की उम्मीद लगाई थी !
    देश की जनता को भड़काकर उनसे अपना उद्देश्य पूरा करवाने की कोशिश बेहद खतरनाक है और मानसिक दीवालियेपन को ही दर्शाता है !

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    1. सतीश भाई,
      यही तो इस देश के लोगों की त्रासदी है, जिस पर भरोसा करते हैं, वही उन्हें बाबा जी का ठुल्लू पकड़ा कर अपना उल्लू सीधा करता है...

      जय हिंद...

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  3. इस लेख से पूरी तरह असहमत हूँ। आम आदमी पार्टी अभी भी निर्माण की अवस्था में है और एक पार्टी न हो कर जनानन्दोलन है। यह आलोचना एक छिद्रान्वेषी आलोचना है। पार्टियाँ फैक्ट्री में नहीं बनती हैं। जिस से उन की गुणवत्ता जाँची जाए। जनसंगठन खड़ा करना दुनिया का सब से मुश्किल काम है जिस में हर कोई अपने तरीके से सोचता है। आम आदमी पार्टी के पिछले दो दिन के आंदोलन ने साबित किया है कि उस में अभी बहुत आगे तक जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप काम करने की क्षमता है। यही तो एक राजनैतिक जनान्दोलन है जो जनता के साथ खड़ा है। कोई दूसरा मुझे बता देश भऱ में। उस का छिद्रान्वेषण करना सब से बडी गलती और जनविरोधी हरकत है। हाँ, उस की सकारात्मक आलोचना की जानी चाहिए जो उसे जनता के साथ चलते हुए आगे बढ़ने में मदद करे।
    इस देश में अभी क्रान्ति दूर है। भूमिकाएं बन बिगड़ रही हैं। लेकिन क्रान्ति तो इस बात पर निर्भर करेगी कि श्रमजीवी वर्ग एक राजनैतिक ताकत के रूप में खड़ा हो और क्रान्ति के नेतृत्व के लिए तैयार हो। आआपा में उसी का अभाव है।

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    1. द्विवेदी सर,

      आपके विचारों का मैं सम्मान करता हूं...इस लेख का उद्देश्य ही एक सकारात्मक बहस को जन्म देना है...जनांदोलन वही जन-जन को उद्वेलित करने की क्षमता रखते हैं, जहां खुद की कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं ना हो...शायद आपको याद हो जब अन्ना पहली बार दिल्ली में 2011 में अनशन पर बैठे थे, तो मैने ना उसका ज़ोरदार समर्थन किया था बल्कि ब्लॉग जगत में भी सबसे पहली पोस्ट लिखी थी. लेकिन बाद में बचपन के चार-पांच दोस्तों की महत्वाकांक्षा के चलते ये आंदोलन दिशा भटक गया..उस वक्त मैने अपनी कई पोस्ट से केजरीवाल एंड टीम के राजनीतिक चोला पहनने की कड़ी आलोचना की थी. जनांदोलन करने वाले अपने मुद्दे से कभी भटकते नहीं है...अब 'आप; में जिस तरह के लोग आ रहे हैं, उनकी वास्तविकता पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है...अब इस पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष को ही देखिए, जिस चैनल के ये मुखिया थे, वहां से कुछ महीने पहले सैकड़ों लोगों की छंटनी कर दी गई, तब तो इन्होंने इस्तीफा नहीं दिया...जब इन्हें दिल्ली से लोकसभा का टिकट मिलने का आश्वासन मिल गया तभी इन्होंने राजनीति में कूदने का फैसला किया...ये अगर जनांदोलन ही बना रहता तभी इसका दूरगामी असर हो सकता था...अब ये खुद ही फेडआउट होने की ओर कदम बढ़ा रहे हैं...
      जय हिंद...

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    2. द्विवेदी जी से सर्वथा सहमत । खुशदीप भाई , इन सबसे परे मुझे लगता है कि सिर्फ़ सत्रह महीने पहले बनी एक राजनीतिक पार्टी जिसकी प्रसव पीडा के दौरान ही उसकी मां ,और मौसियां तक छोड बैठीं , घुटनों के बल रेंगना सीख रहा था कि आपने बागडोर की भार ठीक वैसे थमाई जैसे किसान बैलों के कंधे पर हल रखते थे , सिर्फ़ एक महीने भर , सिर्फ़ एक महीने भर पर इतना ज्यादा आंक लिया जाए जितना शायद आज़ साठ सालों में भी हमने पहले से मौज़ूद शेरों-चिडियों तक के निशान वाली पार्टियों का नहीं किया , क्यों आखिर इस जल्दबाज़ी की वजह क्या है .........

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    3. maan aur mausiyon ne use thama hi avsarvadita ke uddeshay se tha. Isiliye chhodne ki jaldi ho gai.

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  4. राजनीति के नये मापदण्ड स्थापित करने के प्रयास।

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    1. पॉलिटिक्स ऑफ एंटी-पॉलिटिक्स...

      जय हिंद...

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  5. हम सभी ने देखा है कि परिवार में ण्‍क बेटा-बहु असुतुष्‍ट रहता है। वह हमेशा दूसरे की गलती निकालता ही रहता है, लेकिन खुद कुछ नहीं करता है। हार-थककर माता-पिता उसका चूल्‍हा अलग कर देते हैं, लेकिन वह फिर भी असंतुष्‍ट ही बना रहता है। यही हाल केजरीवाल एण्‍ड कम्‍पनी का है, वे नकारात्‍मक से भी ज्‍यादा विधवंसात्‍मक राजनीति कर रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे वे विदेशी इशारे पर भारत को तहस-नहस कर देना चाहते हैं। उनके पास कोई भी कार्ययोजना नहीं है, बस है तो जनता को विद्रोह के लिए उकसाना। यह देश के लिए बहुत ही खतरनाक स्थिति है, इसे शीघ्र ही समझा नहीं गया तो परिणाम अनिष्‍टकारी होंगें

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    1. केजरीवाल ने अपने 'परिवर्तन' संगठन के माध्यम से दिल्ली के सुंदर नगर इलाके में दस साल पहले व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर आंदोलन शुरू किया था...बाद में हालत ये हो गई कि परिवर्तन के दफ्तर पर भी ताला नजर आने लगा...उनका सारा वक्त राजनीतिक योजनाएं बनाने में जो खपने लगा...देखना है कि अपने इस राजनीतिक मिशन को वो कौन सी मंज़िल तक ले जाते हैं...

      जय हिंद...

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    2. Jaikumar Jha commented on my FB wall-

      एक गम्भीर मुद्दे का बेबकूफी भरा अंत।

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  6. आपकी इस प्रस्तुति को आज की सीमान्त गांधी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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    1. शुक्रिया, हर्षवर्धन भाई...

      जय हिंद...

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  7. इस मुद्दे पर एक बेहद सकारात्मक बहस की जरूरत है । अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के अभी कम समय मे आलोचना होने लगी है यही तो भ्रस्त राजनीतिज्ञ चाहते है। क्या एक सामनी सोच रखने वाला , और देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा रखने वाला इन राजनीतिज्ञों की भेट हो जाएगा। आप जैसे बुद्धिजीवी इसे देखे और समझे । यदि आप सरकार ना बनाती तो भी आप आलोचना करते की केजरीवाल पीछे हट गए॥ ज़िम्मेदारी लेने से । आज जरूरत है केजरीवाल को ये बताने की के सरकार चलाने के कुछ नियम कानून होते है सरकार स्वयं की सोच से चलती है न की सड़क की सोच से। प्रशाशन करना हिटलर सही भी होता है क्योंकि अगर कोई नियम लागू होगा तो किसी को मंजूर होगा कोई मीन मेख भी निकलेगा । आपकी ये बात बिलकुल दुरुस्त है की सरकार के पाव ठीक नही दिख रहे कहीं आईशा न हो की बंदर के हाथ अस्तुरा वाली कहावत हो जाए राजनीतिज्ञों को हसने का मौका भी

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    1. कुशवंश जी,
      आपकी बात दुरुस्त है...आज़ादी के बाद हमारे देश में लोकतंत्र का लोक कहीं पीछे छूट गया और सिर्फ तंत्र ही तंत्र रह गया...आग्रह सिर्फ इतना है कि खुद राजनीति में आऩे की जगह राजनीतिक आंदोलन के ज़रिेए परंपरागत पार्टियो पर इतना दबाव डाल दिया जाता कि वो खुद ही शुचिता और नैतिकता को मान देने लगती...दिल्ली में हमने देखा नतीजे आने के बाद भी किसी ने हॉर्स ट्रेडिंग की कोशिश नहीं की...लेकिन जहां 'आप' ने कांग्रेस से सरकार बनाने के लिए हाथ मिलाया, वही ै सब किए कराए पर पानी फिर गया...जनांदोलन इस देश में पहले भी बहुत हुए हैं, लेकिन राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने सभी का गुड़-गोबर कर दिया..यही वजह है कि कांग्रेस सत्ता से हटने के बाद भी दोबारा वापस आ जाती है...ज़रूरत आज इस बात की है कि सत्ता में कोई भी पार्टी रहे, जनमानस का उस पर इतना दबाव रहे कि गलत काम करने से पहले उसकी रूह कांपे...

      जय हिंद...

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    2. आजादी के बाद लोकतंत्र में लोक पीछे छूटकर तंत्र सामंतवादी मानसिकता में विलीन हो गया, जिस सामंतवाद को आज के नेता गालियाँ देते नहीं थकते उसी सामंती मानसिकता में खुद डूबे बैठे है!
      जहाँ तक हॉर्स ट्रेडिंग की बात है, ये उससे भी कहीं दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस पार्टी ने जिस पार्टी की सरकार के खिलाफ आन्दोलन किया आज उसकी की गोद में सरकार बनाये बैठे है !
      एक बात और जिस पार्टी ने सरकार बनाने में समर्थन दे रखा है वे ही अपनी ही समर्थित सरकार के खिलाफ विपक्ष की भूमिका में है और जिनके समर्थन से सरकार बनी है वह समर्थन देने वालों के खिलाफ आन्दोलन में रत है |
      ऐसा विरोधाभास आजतक पहले कभी नहीं देखा !!

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    3. रतन जी,

      विडंबना भी तो यही है जिस कांग्रेस को दिल्ली की जएंनता ने बुरी तरह खारिज किया, केजरीवाल एंड कंपनी ने उसी कांग्रेस को फिर प्रासंगिक बना दिया..केजरीवाल के साथ एक दिक्कत ये है कि वो अपने किसी भी फैसले को जनता की राय बता देते हैं...जनादेश की तुलना में एसएमएस राय का हवाला देकर कांग्रेस से हाथ मिलाना, ये किसी भी तरह से हज़म होने वाला नहीं है...ज़ाहिर है केजरीवाल के इस आचरण से बीजेपी को बैठे बिठाए दिल्ली में एज मिल गई है...केजरीवाल को इसका असर लोकसभा चुनाव में दिख जाएगा...

      जय हिंद...

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  8. बहुत सटीक लेख। पूरी तरह सहमत हूँ।

    सादर

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  9. कल 23/01/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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    1. यशवंत भाई, स्नेह बनाए रखने के लिए शुक्रिया....

      जय हिंद...

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  10. गांधी तपस्या के बाद ही बन पाते हैं .. न की बातों से ... फूल खुशबू दे सके इसके लिए बीज, फिर पेड़ का बढ़ना उसका परिपक्व होना जरूरी है फूल के उगने को ताकि वो खुशबू दे सके ...

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  11. दिगंबर भाई,

    यहां तो बीज डालने से पहले ही फल इकट्ठा करने की फिक्र हो गई...

    जय हिंद...

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  12. खुशदीप भाई ,
    नमस्कार
    मैंने पूरा लेख बहुत ध्यान से पढ़ा है . और सही कहूँ तो पिछले दिनों में जो कुछ भी घटित हुआ , उसने मुझे आश्चर्य में डाल दिया है . केजरीवाल शायद ये बात समझ नहीं पा रहे है कि इस तरह की हरकते उन्हें उनके उद्देश्य से अलग कर रही है और साथ ही ,जनता का विश्वास भी डोल रहा है उन पर से . उन्हें बहुत कम समय में बहुत कुछ हासिल करने की चाह है . मुझे तो ये भी लगता है कि उनके सलाहकार उन्हें सही नीति बता रहे है या नहीं .. अगर ये सब कुछ ऐसे ही चले और जो वादे किये गए है , वो पूरे नहीं हुए तो जनता का जो हाल होंगा वो पूछिए नहीं .
    वैसे इस लेख के लिए आपका शुक्रिया . ये जरुरी था .
    आभार
    विजय


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    1. विजय भाई,
      यही तो दिक्कत है...कथनी और करनी में अंतर दिखे तो लोगों का विश्वास उठना स्वाभाविक है...केजरीवाल जी को सोचना चाहिए कि कहां गलतियां हो रही हैं...उनका हर काम, हर बोल लोगों के रडार पर है...जनता किसी को अर्श पर पहुंचाती है तो फर्श पर लाने में भी देर नहीं लगाती...

      जय हिंद...

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  13. पूरा लेख सटीक है !

    इसमें कोई संदेह नहीं कि केजरीवाल ने जनआंदोलन को सफलता पूर्वक वोट की राजनीति में तब्दील किया है यह उनकी क्षमता को दर्शाता है !
    पर दिल्ली के लोगों ने जिस चमत्कार की उम्मीद कर आप पार्टी को समर्थन दिया वह उनके भरोसे पर खरी नहीं उतर रही है|
    आप की सफलता से कांग्रेस को लग रहा था कि "आप" के जरिये वो मोदी का रथ रोक देगी पर जिस तरह केजरीवाल सरकार और उनकी पार्टी में घुसे विभिन्न विचारधाराओं के मौकापरस्त लोग आचरण कर रहे है उससे लोगों का अब इस पार्टी से विश्वास उठता जा रहा है !
    जिस कांग्रेस के खिलाफ इन्होने आन्दोलन किया आज उसी की गोद में बैठ भाजपा के सामने लड़ाई का ऐलान करने वाले लोगों की नियत पर शक ही होता है कि ये कांग्रेस प्रायोजित ड्रामा है ! और इनका काम सिर्फ भाजपा का रायता फैलाना मात्र है|
    इनका आचरण उस बिगडैल बच्चे की तरह का है जो अपनी माँ की गोद में बैठ माँ के मुंह पर सिर्फ थप्पड़ मारने में लगा रहता है|
    कुल मिलाकर जनता पहले "राजा नहीं फ़क़ीर है" नारे से ठगी गई थी अब केजरीवाल के भ्रष्टाचार नारे से ठगी महसूस कर रही है और यदि इनका आचरण ऐसा ही रहा तो जनता किसी पर भी कभी कोई भरोसा नहीं करेगी !!

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    1. रतन जी,
      आम आदमी पार्टी की ओर से बड़ा दंभ भरा जाता था कि सद्चरित्र,निष्ठावान और निस्वार्थ लोगों को ही पार्टी में जगह दी जाएगी...लेकिन लोकसभा चुनाव से जिस तरह हड़बड़ी में सदस्यता अभियान चलाया जा रहा है, वो अपने आप में कई तरह के सवाल खड़े कर रहा है..टोपी को कई तरह के असामाजिक तत्व भी सम्मान का लाइसेंस समझ रहे हैं...

      जय हिंद...

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    2. सद्चरित्र,निष्ठावान और निस्वार्थ का ये पार्टी कितना भी दम भरे और हो सकता है इसके कुछ सदस्य ऐसे हो भी !
      पर इस पार्टी को लेकर विभिन्न विचारधारा वाले लोग इसमें अपनी अपनी संभावनाएं देख रहे है जैसे -
      १- वामपंथी इसमें अपने लिए क्रांति की संभावनाएं टटोल रहे है !
      २- कांग्रेस इसे आगे बढ़ा कर मोदी को रोकने की संभावनाएं तलाश रही है !
      ३- जिन छुटभय्ये नेता टाइप लोगों को कहीं किसी दल में जगह नहीं मिली वे भी इसमें आसानी से विद्यायक, सांसद बनने की संभावनाएं देख रहे है !
      ४- विभिन्न राजनैतिक दलों के असंतुष्ट भी आप में शामिल होकर संसद, विधानसभा में घुसने या अपनी नेतागिरी चमकाने की सुविधाएँ देख रहे है !
      ऐसे में पार्टी में सद्चरित्र,निष्ठावान और निस्वार्थ लोग कहाँ से होंगे ??

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    3. जिस तरह जेपी आन्दोलन में मौकापरस्त व भ्रष्ट लोग घुसे थे उनके उदाहरण आपके सामने है !
      फिर वीपी.सिंह के समय भी ऐसा ही हुआ कि बहुत सारे मौकापरस्त उनके साथ आ मिले ठीक उसी तरह इस जन आन्दोलन का फायदा लेने के लोग "आप" से जुड़ रहे है और मजे की बात जिस व्यक्ति ने आन्दोलन किया या जिसके पीछे इतनी भीड़ इक्कठा हुई उसी व्यक्ति को जो कल तक लोगों की नजरों में गाँधी था आज सत्ता की चमक के आगे उसे भुला दिया और वो बेचारा अपने को ठगा सा महसूस करता हुआ बैठा है !!

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  14. ज़ोर ज़ोर से भाषण देना, खुद के अलावा सबको बेईमान और भ्रष्ट बताना, आंदोलन को एक मज़ाक बना देना और अपनी प्रशासनिक अक्षमता छुपाने के लिए कुछ जायज़ मुद्दों के नाम पर आम लोगों को गुमराह करना.... किसी भी तरह सही नहीं है... इससे आप पूरी की पूरी पुलिस, पत्रकार और अफसर बिरादरी को ही बदनाम कर रहे हैं... क्या आम आदमी पार्टी से जुड़े सभी लोग दूध के धुले हैं? क्रांति ऐसे नहीं होती, व्यवस्था ऐसे नहीं बदलती... अब न तो 1917 की रूसी क्रांति जैसी स्थिति है, न माओ के क्रांति जैसे हालात हैं और न ही आम आदमी इसके लिए तैयार है... व्यवस्था को इसी व्यवस्था में रहकर बदलना एक बड़ी चुनौती है... हड़बड़ी, तानाशाही और अराजकता इसका रास्ता नहीं हो सकता

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    1. अतुल जी,
      दिल्ली में ऑटो वालो और पुलिसकर्मियों ने भी चुनाव में आम आदमी पार्टी को जमकर समर्थन दिया था...ऑटो वालों का तो पहले ही मोहभंग हो गया था लेकिन अब धरने के दौरान जैसे अधिकतर पुलिसकर्मियों को भ्रष्ट बताया गया, वो भी केजरीवाल से बहुत नाराज़ हैं...पुलिस में भ्रष्टाचार से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन जिन हालात में वो नौकरी करते हैं, उन्हें सुधारने की कोई बात नहीं करता...

      जय हिंद...

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  15. 'आप' के ईमानदार और चरित्रवान होने पर भरोसा कर भी लिया जाए ... तो भी उसके क्रियाकलापों में जो कमजोरियां दिख रही है ... वो बर्दाश्‍त करने योग्‍य नहीं ... क्‍योंकि सिर्फ ईमानदार या चरित्रवान होना भी काफी नहीं .. कोई बडी महत्‍वाकांक्षा पाले तो उसके क्रियाकलापों में गंभीरता होनी चाहिए ... आपको जो पद और अधिकार दिए गए हैं ... पहले उसका सही सदुपयोग करना चाहिए ... दूसरे की गल्तियां निकालने का काम अपनी जबाबदेहियों को पूरा करने के बाद ही करना शोभा देता है।

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    1. संगीता जी,
      मनमोहन सिंह जी के ईमानदार, चरित्रवान, योग्य होने से भी कौन इनकार कर सकता है...लेकिन घर के मुखिया को ये भी ध्यान रखना चाहिए कि घर के सभी सदस्य सही दिशा में जा रहे हैं या नहीं...बहुत कम समय में बहुत कुछ कर दिखाने की हड़बड़ी में यही गलती केजरीवाल से हो रही है..

      जय हिंद...

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  16. जो भी घट रहा वो दिल्ली के लिए दुर्दिन ही कहा जा सकता है
    एक राज्य का मुख्यमंत्री ये कहे की मेरी बात नहीं मानी गई तो 26 जनवरी को पूरे राजपथ पर आदमियों से भर दूंगा ...........और फिर भी वो मुख्यमंत्री बना हुआ है !! मुख्यमंत्री बनने के बाद से जिस तरह से वो सरकारी खजाने का दूर उपयोग कर रहे वो आई ओपनर ही है ........ वो कह रहे मुझे सेक्युर्टी नहीं चाहिए पर आप समझ सकते हैं, इसके कारण और जायादा सुरक्षा देने की जरूरत हो गई है ... क्या ऐसा संभव है की उनके कहे अनुसार सुरक्षा न दी जाए, और कुछ खुदा न खस्ता हो जाए तो ??

    पुलिस का एक नौजवान मारा गया तो उन्होने एक करोड़ रुपए अनुदान की घोषणा कर दी ... क्या ये ठीक है ?

    बिजली पानी पर जिस तरह से बेमतलब का फैसला किया गया जिसका कोई टूक नहीं है, सिर्फ जनता को बरगलाने के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता ...........

    और ये 1000 % सच है की अगर लोक सभा चुनाव न होते तो महाशय चुप चाप रहते ...

    सौ बात की एक बात दिल्ली के लिए शीला दीक्षित एक बेहतरीन मुख्यमंत्री थी, और आज जनता को समझ मे ये बात आ रही होगी !!

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    1. मुकेश भाई,
      आम आदमी पार्टी और केजरीवाल जी की दिक्कत ये है कि उन्हें खुद भी उम्मीद नहीं थी कि दिल्ली में उन्हें इतना अपार जनसमर्थन मिल जाएगा...अब ये लोकसभा चुनाव में पूरे देश में इसकी पुनरावृत्ति होने की उम्मीद बांधे बैठे है..लेकिन इनका पूरा नेतृत्व दिल्ली की सरकार मे उलझा हुआ है...ऐसे मे लोकसभा चुनाव की तैयारी के लिेए ये किसी तरह दिल्ली में सरकार की जिम्मेदारी से पिंड छुड़ाना चाहते थे...लेकिन दांव उल्टा प़ड़ गया...

      जय हिंद...

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  17. मेरे हिसाब से ये सब इसलिए हो रहा है कि इनको राजनीति का अनुभव नहीं है और जल्द ही जिम्मेदारियाँ मिल गई । इन्हे आपस में बैठकर एक बार फिर से सोचने की जरुरत है किसी भी अगले कदम के लिए । साथ ही साथ यह भी याद रखने की जरुरत है अब दिल्ली कि सत्ता भी इनके हाथ में है तो एक सरकार के सोच की तरह भी कार्य करना चाहिए । परिवर्तन आता है पर बहुत जल्दी सब कुछ बदल कर रखने वालों को आलोचना का शिकार भी होना पड़ता है ।

    आप के इस पोस्ट से मैं बहुत हद तक सहमत हूँ ।

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    1. विनोद भाई,
      इन्हें ये भी ठंडे दिमाग से सोचने की ज़रूरत है कि इनसे अन्ना हज़ारे, किरण बेदी, जनरल वी के सिंह, पी वी राजगोपाल जैसे लोग दूर क्यों चले गए...

      जय हिंद...

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  18. अरविन्द केजरीवाल खुद को चुना हुआ मुख्यमंत्री इस तरह बताते हैं जैसे बाक़ी सरकारें जनता की चुनी हुयी नहीं हैं। उनको लगता है जनता ने सिर्फ उनको चुना है और केंद्र सर्कार खुद बन गयी। कल तक खुद को आम आदमी कहने वाला आज मुख्यमंत्री कहता है।

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    1. आसिफ़ भाई,
      माई वे और हाई वे...केजरीवाल इसी सिद्दांत का पालन करते हैं...चुनाव के जनादेश से ज़्यादा जिन्हें खुद की रायशुमारी पर भरोसा है, उनसे और क्या उम्मीद की जा सकती है...अपनी हर मनमानी को जनता की राय कह कर थोपना तानाशाही नहीं तो और क्या है...

      जय हिंद...

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  19. केजरी वाल पढा लिखा इंसान हे, इस के भाषण मैने बहुत पहले सुने, ओर एक तरह से यह दिल ओर दिमाग मे बस गया था..... लेकिन जब इस के सारे काम ही आधुरे दिखने लगे तो कुछ शक हुआ, फ़िर इस ने काग्रेस के संग मिल कर सरकार बनाई, जो वादे जनता से किये कि यह शीला, कलमाडी को ( सबूत जॊ इस ने ३७७ पेजो के जनता को दिखाये) उन समेत सजा दिलवाऊंगा... सब से मुकर गया, मेरे ख्याल मे जनता तो उसी दिन हकई बकी हो गई जिस दिन इस ने काग्रेस का दामन पकडा, अगर यह भाजापा के संग मिल के सरकार बनाता तो इस की इज्जत ज्यादा होती... अब जो इज्जत थी शायद वो भी को दी अब लोग इसे साफ़ काग्रेस का ऎजेंट ही कहते ओर समझते हे, बाकी कसर इस के साथी पुरा कर रहे हे, सब से ज्यादा तो कुमार विशवास, जिसे इस आधी जीत से ( जो की एक तरह से जीत नही हे ) ही इतना घंमंड हो गया कि वो सीधा ही मोदी ओर राहुल को ललकारने लगा, कल तक जो मोदी के जुते चाटता था, ऎसी बहुत सी बाते हे , या गलतिया हे जो इन लोगो के कर के लोगो का विश्वास खो दिया हे, यह जितनी जल्दी ऊपर चढी थी, अब वैसे ही नीचे आ जायेगी, गर्म गर्म खाने से हमेशा मुंह जलता हे, यह बुजुर्गो ने युही नही कहा, ओर यही गलती इन्होने की हे, वैसे इन सब बातो से अगर किसी को लाभ हुआ हे तो वो हे मोदी... अब मोदी ही एक हे जो लोगो को सही लगता हे, अब उसे टक्कर देने के लिये काग्रेस के पास कुछ नही बचा.अगर अर्विंद केजरी वाल गलतियो पर गलतिया ना करते तो ( या इस से करवाने वाले ना करवाते ) तो मोदी की राह मुश्किल हो सकती थी..... अब नही हे... यह मेरा मानना हे, बाकी आप लोग भारत मे रहते हे, इस लिये आप लोगो को ज्यादा पता होगा.

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  20. राज जी,

    आप जर्मनी में रहते हैं...इसलिए गणतंत्र दिवस का क्या महत्व है, भारतीयता की कसक क्या होती है, ये हम भारत में रहने वालों से ज़्यादा आप जानते हैं...पिछले दो-तीन दिन में गणतंत्र की गरिमा से जो खिलवाड़ करने की कोशिश की गई, मैं नहीं जानता कि विदेश में बसने वाले लोगों में उसका क्या संदेश गया होगा..विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव...मुझे ऐसा लगता है कि कहीं चौबे जी छब्बे जी बनने चले और दूबे जी भी नहीं रह गए...वाली कहावत केजरीवाल पर चरितार्थ ना हो जाए...

    जय हिंद...

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  21. खुशदीप भाई , ना तो मुझे राजनीति मे दिलचस्पी है , ना समझ मे आती है . लेकिन एक बात से हैरान हूँ कि कैसे लोग केजरीवाल के पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं . कहते हैं -- रोम वाज नोट बिल्ड इन ए डे . केजरीवाल के साथ भी यही हो रहा है कि वे थोड़े समय मे बहुत ज्यादा करना चाहते हैं . ऐसा करना उनकी मज़बूरी भी हो सकती है . लेकिन निश्चित ही राजनीति का अनुभव ना या कम होने से चूक हो जाती है . उनका पाला पड़ा है मज़े हुए नेताओं से जिनसे टक्कर लेना आसान नहीं होगा . ऐसे मे उन्हे बहुत सोच समझ कर और फूंक फूंक कर कदम बढ़ाने चाहिये .
    जहां तक अन्ना एंड कम्पनी की बात है , मुझे लगता है कि बिना राजनीति मे आये सुधार लाना संभव नहीं होता . वन हैज टू लीड बाई एग्जांपल ! केजरीवाल यही कर रहे हैं जो करने के लिये साहस चाहिये . हमे उनकी नीयत पर ज़रा भी शक नहीं है . बल्कि ऐसे मे विरोध होना स्वभाविक है क्योंकि उन्होने मधु मक्खियों के छत्ते मे हाथ डाला है. इसके लिये उनकी सराहना होनी चाहिये ना कि भर्त्सना . आज की राजनीति महाभ्रष्ट और चोरों से भरी पड़ी है . इसका हल केजरीवाल जैसे लोग ही हो सकते हैं . काश कि वो काम कर पाएँ . सरकारी तंत्र मे रहकर हम स्वयं रोज ऐसी परिस्थितयों का सामना कर रहे हैं . जब हम खुद को सही रखेंगे , तभी दूसरों को सुधार पायेंगे .

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    1. बहुत ही बेहतरीन डा साहब ;) मैं भी यही बात कह और महसूस रहा हूं कि मामला उतना भी ऊपर ऊपर नहीं है , आखिर इतनी ज्यादा सजग सचेत पब्लिक इतनी भी नासमझ नहीं है कि एक साथ इतने स्थानों पर विधानसभा के योग्य बना कर भेज दे , कहीं ऐसा तो नहीं कि ऊपर ऊपर से खास दिख रहा आदमी भीतर से आम आदमी ही निकल रहा हो ;) ;) जो भी हो अभी इनकी सी आर लिखने की इत्ती अकुलाहट क्यों ???

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    2. दराल सर, अजय भाई...आप दोनों के विचारों ने इस बहस को स्वस्थ आयाम दिया है...हम सब इस पर जितना मंथन करेंगे उतना ही अमृत बाहर आएगा...मेरा यहां बस एक आग्रह है, क्या ये देश एक्सपेरिमेंट्स को झेलने की स्थिति में है..केजरीवाल ईमानदार हैं, इसमे कोई शक नहीं,,,लेकिन क्या यही काफ़ी है डेढ़ अरब लोगों के इस देश को एकसूत्र में बांधे रखने के लिए, महाशक्ति बनाने के लिए..विदेशी संगठनों की मदद से मजमा जुटाना एक बात है लेकिन सब को साथ लेकर विकास के रास्ते पर चलना बिल्कुल दूसरी बात है...इंडिया अगेन्स्ट करप्शन आंदोलन ऐसे वक्त में सामने आया था जब यूपीए-2 के कार्यकाल में एक के बाद एक बड़े घोटाले सामने आ रहे थे...भ्रष्टाचार ऐसा मुद्दा है जो समाज के हर वर्ग को प्रभावित करता है...इसलिए आइडिया क्लिक हुआ और इसे बचपन के चार-पांच दोस्तों ने मिलकर राजनीतिक तौर से भुनाने का फैसला किया...जो लोग सिर्फ जनांदोलन की बात कर रहे थे, उनसे किनारा कर लिया गया...जनांदोलन इंस्टेंट कॉफी नहीं हो सकते कि झट से सब कुछ बदल जाए...कांशीराम ने बामसेफ के ज़रिए चुपचाप दो दशक तक बहुजन समाज आंदोलन चलाया..इसके बाद ही बीएसपी जैसा कॉडर बेस राजनीतिक रूप से मज़बूत संगठन खड़ा किया जा सका..हमारे देश के मध्यम वर्ग की यही सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि जैसा मीडिया उसे दिखाता है, उसी को वो अकाट्य सच मान लेता है...कभी उसे वी पी सिंह में मसीहा नज़र आता है तो कभी अन्ना में उसे गांधी नज़र आने लगते हैं...आज केजरीवाल हीरो बने हुए हैं...लेकिन यही वर्ग है जो सबसे पहले अपनी राय पलटता है...लेकिन ये देश में राजनीतिक स्थिरता के लिए काफ़ी नहीं है...संघीय ढांचे के इस देश को चलाने के लिए आर्थिक, रक्षा, विदेश आदि नीतियों की भी आवश्यकता है...अगर कोई संगठन राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं रखता है तो उसे विशेषज्ञों के माध्यम से पहले अपनी नीतियों का खाका देश के लोगों के सामने रखना चाहिए..याद रखना चाहिए कि अगर अस्थिरता का देश में माहौल बना तो राष्ट्रविरोधी शक्तियां घात लगाकर बैठी ही हुई हैं...

      जय हिंद...

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  22. कथनी से आये थे और करनी से जायेंगे।

    इस एक पंक्ति मे मेरी सोच का सम्पूर्ण सार है.

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    1. गुरुदेव,

      आपको मैंने पहली बार में यूहीं अपना गुरुदेव नहीं मान लिया था...एक ही पंक्ति...गागर में सागर...वैसे गुरुदेव आप कनाडा और अमेरिका में समान रूप से दखल रखते हैं...वहां देश के इस घटनाक्रम पर प्रवासी भारतीयों की क्या राय है...

      जय हिंद...

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    2. मुश्किलें तो आयेंगी, जिन्दगी की राह मे !
      राह ये कंटों भरी है, फूलों की सेज़ नहीं !!

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  23. कुंडली सही बांची है ..ये सब कुछ इतनी जल्दी नेपथ्य में चला जाएगा, किसी ने सोचा नहीं था…
    जहाँ तक इन्हें समय देने का सवाल है की अभी मात्र एक माह पुरानी सरकार है तो दिल्ली मे साबित करने को समय ही समय है मगर लोस का लोस (लोक सभा का लोभ संवरण ना कर पाना) खुद को न ले डूबे।
    हर चीज मे वक्त लगता है। फेशियल तक करवाने भी जाओ तो पहले मूँह धुले फिर ब्लीच लगे समय देकर उसे सुखाया जाये, फिर पौंछा जाये, तब फेस पैक लगाया जाये वो सूखे तो धो पौंछ कर क्रीम लगाओ तब चेहरा चमकता है। सब इक्कठा लगा कर बैठ जाओ तो पूरे चेहरे पर धब्बों के सिवाय कुछ नजर न आयेगा ..समय दिया है तो कायदे से समय लो.

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    1. हा,,हा,,हा,,,गुरुदेव, आज पता चला आपकी ब्यूटी का राज़...

      फेशियल की मिसाल खूब दी...एक किस्सा मुझे भी याद आ गया...एक मैडम खूब मेकअप करा कर ओपन में एक पार्टी में हिस्सा लेने गईं...वहां बारिश आ गई...मेकअप सारा धुल गया, बस चेहरे पर उनके चकत्ते ही रह गए...अ्ब मैडम का छोटा बेटा ही उनसे पूछ रहा है...चुड़ैल आंटी, चुड़ैल आंटी मेरी मम्मी कहां गईं...

      जय हिंद...

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  24. उत्तर
    1. सीएम और पीएम के बाद तो बस व्हाइट हाउस पर ही दावेदारी बचती है...

      जय हिंद...

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  25. राजनीती में अपनी दिलचस्पी नहीं … कितने आये कितने गए … स्थिति वही रही .... अब एक केजरीवाल क्या बदलाव ला देगा ? अगर “कांग्रेस और भाजपा, दोनों को माफिया चला रहे हैं, तो देखना चाहेंगे केजरीवाल कितना ईमानदार एवं चरित्रवान है … बस इंतजार है कुछ दिन और।

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    1. वाकई हीर जी...
      ये जो पब्लिक है, ये सब जानती है,
      अंदर क्या है, बाहर क्या है, सब जानती है...
      ये जो पब्लिक है...

      जय हिंद...

      हटाएं
  26. द्विवेदी जी से सहमत हूँ | अरविन्द केजरीवाल के उठाये मुद्दे और भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन में कोई कमी नहीं और ना तो उनके पास अभी पूरी ताक़त है और ना ही अधिक तजुर्बा तो ऐसे में इतनी जल्द आंकलन सही नहीं लगता | और कमियाँ निकालने ही कोई बैठ जाए तो भगवान् भी नहीं बाख पाते अरविन्द क्या बचेंगे |

    सारांश यह की आंकलन के लिए और समय की आवश्यकता है |

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    1. मासूम भाई,

      आंकलन करने वालों के पास तो समय हो जाएगा, लेकिन केजरीवाल जी के पास इसकी कमी लगती है...जैसा कि ऊपर उड़न तश्तरी वाले समीर जी ने कहा कि इन्हें पहले दिल्ली में खुद को साबित करना चाहिए, फिर लोकसभा का रुख करना चाहिए...लेकिन ये सब कुछ बहुत जल्दी करन के चक्कर में हैं...यही इन्हें ले डूबेगा...

      जय हिंद...

      हटाएं
  27. Thank you very much khushdeep ji, all readers and especially those who have contributed their views on this article. I have also received many views from all over the country and abroad. I appreciate their love for the country, insistence for value based politics and welfare of people at large. This has also helped me to understand the issue in a better way. I thank all of them, regards..

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  28. सहमत हूँ आपकी पोस्ट से ....इन का बड़बोलापन ही ले डुबेगा

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    1. अंजू बहना,

      सही कहा, पैर उतने ही पसारने चाहिए जितने कि पैर हो...

      जय हिंद...

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  29. उम्मीदें ज्यादा हो गईं थीं वो भी अव्यवहारिक. और राजनीति का ज्ञान था नहीं. परन्तु जो भी शुरुआत की है ऐसी पहले कभी हुई भी नहीं. भारतीय राजनीति को बदलने की कोशिश तो कर ही रहे हैं. फैसला करने में जल्दीबाजी ठीक नहीं. अभी वे आये हैं, सीखेंगे, थोड़ा समय तो चाहिए ही. हाँ जब एक घर में सब एक जैसे नहीं होते तो एक पार्टी में कैसे होंगे. तो कुछ बेवकूफियां भी हुईं. तालमेल बैठाने में समय तो लगेगा.
    उन्हें जरुरत सही आलोचना और सुझावों की है. मुझे अब भी उनसे उम्मीद बाकी है.

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    1. शिखा,

      केजरीवाल जी भी तो बहुत जल्दबाज़ी में नज़र आते हैं...बहुत कम वक्त में वो बहुत कुछ कर लेना चाहते हैं...दिल्ली की सरकार स्ट्रीमलाइन में लाने की जगह अब उनकी नज़र लोकसभा चुनाव पर है...ये हड़बड़ी ही इनके लिए घातक साबित होगी...

      जय हिंद...

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  30. पार्टी प्रमुख सहित आम आदमी पार्टी के सदस्यों की कथनी और करनी में अन्तर को देखकर प्रारम्भ में कुछ फैसले तो परिस्थितियों की दरकार लगे, किन्तु जल्द ही यह समझ में आने लगा कि ये पार्टी भी येन-केन सिर्फ प्रभुत्व बढाने की इकलौती राह पर चलने का बेढब प्रयास कर रही है । हाल ही में केजरीवाल कह रहे थे कि मैं लोकसभा का चुनाव नहीं लडूंगा फिर एक हफ्ते से भी कम समय में उन्होंने पुनः घोषित कर दिया कि बहुमत की राय है इसलिये लोकसभा चुनाव लडूंगा । कटोरा भरने के पहले ही छलकने के राह पर चल रही “आप” का उद्भव सोडे की बाटल जैसा दिखने लगा है यदि यह पार्टी भी अपनी अपनों को बचाने वाली कार्यशैली में बदलाव नहीं कर पाई तो यह कार्यप्रणाली तेजी से पार्टी को नेचरल डेथ की दिशा में भी ले जाती दिखने लगेगी ।

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    1. सुशील जी.
      जनता की शिकायतों को दूर करने के लिए जनता दरबार लगाना, उसमें ज़बरदस्त अव्यवस्था के बाद उसे हमेशा के लिए निरस्त कर देना, फिर ऑनलाइन सिस्टम का ऐलान करना...मीडिया में ढिंढारा पीटने की नीयत से जब काम किए जाते हैं तो मंशा पर उंगली उठेगी ही...केजरीवाल खुद सबकी समस्या दूर करने का श्रेय लेना चाहते हैं तो उनके कानून मंत्री भी सोमनाथ भारती भी पीछे नहीं है...रेड करने भी जाते हैं तो पूरे मीडिया को साथ लेकर...
      जय हिंद...

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  31. Kichad uchalne se pehla apna giriban jhank lena chahiye
    AAP kuch nahin hai to aap(bjp) kyun darta hein
    Ab tak bad politics ka koi optiin nahin tha logo ko ab jag rahen heun isliye bad politician and parties ko Khujli ho rahi hein

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    1. भाई जी, आप बेनामी की जगह नाम से टिप्पणी करते तो ज़्यादा अच्छा लगता...

      जय हिंद...

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  32. केजरीवाल आंदोलन जनित नेता है और वे अभी उस खुमार से बहार नहीं आ पाये हैं.सत्ता में आ कर रूप स्वरुप भूमिका बदल जाती हैं. उनके साथ मज़बूरी है कि वे ऐसे वादे कर कुर्सी पर बैठे हैं जिनको डेल्ही में पूरा करना आसान नहीं जहाँ केंद्र का पूरा दखल है. दुर्भाग्य से पूर्ण बहुमत भी नहीं तो कांग्रेस के कन्धों पर बैठकर कितने दिन कांग्रेसी गन्दगी व भ्रस्टाचार व लालफीताशाही को दूर करेंगे. यह सब पहले अपेक्षित ही था.अच्छा होता वे सत्ता में आने का लालच छोड़ विपक्ष में बैठ बी जे पी के लिए परेशानियां पैदा करते जिससे उनका संगर्ष था है. अंदर ही अंदर कांग्रेस के साथ भी रोटीपानी के सम्बन्ध बने रहते जिनका उस पर आरोप लगता रहा है.

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    1. डॉक्टर साहब,

      केजरीवाल भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का दिल्ली चुनाव में राजनीतिक दोहन करने में सफल रहे हैं...लेकिन उनकी नैतिकता के दावों की उसी दिन सारी हवा निकल गई, जिस दिन उन्होंने दिल्ली में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस के साथ हाथ मिला लिया..

      जय हिंद...

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  33. suchmuch sahi sahi aankalan aur sateek aalekh hai .......aam aadmi party ne mazak mazak me desh - pradesh ke media ka avalamban lekar na keval delhi ki janta ko bevkoof banaya hai balki samooche desh me ek dhamachaukdi failane ki koshish ki hai

    aane wale samay me is ka naam bahut apmaan ke saath liya jaayega kyonki chor-ucchakon ki kabhi izzat nahin hoti

    auron ko bhrasht aur satta ka dalaal bataane wala kejriwal khud satta ke liye kitna gir sakta hai yah poore desh ne dekh liya

    ab in par jhaadu ferne ka kaam 2014 me ho hi jayega

    jai hind !

    उत्तर देंहटाएं
  34. suchmuch sahi sahi aankalan aur sateek aalekh hai .......aam aadmi party ne mazak mazak me desh - pradesh ke media ka avalamban lekar na keval delhi ki janta ko bevkoof banaya hai balki samooche desh me ek dhamachaukdi failane ki koshish ki hai

    aane wale samay me is ka naam bahut apmaan ke saath liya jaayega kyonki chor-ucchakon ki kabhi izzat nahin hoti

    auron ko bhrasht aur satta ka dalaal bataane wala kejriwal khud satta ke liye kitna gir sakta hai yah poore desh ne dekh liya

    ab in par jhaadu ferne ka kaam 2014 me ho hi jayega

    jai hind !

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