बुधवार, 19 नवंबर 2014

देश के रिस्पॉन्सिबल सिटिजन...खुशदीप


मूलत: प्रकाशित-  'नवभारत टाइम्स' 19 नवंबर 2014




‘आपने सुना कंट्री में क्लीनलीनेस के लिए ब्रैंड अंबेसडर बनाए जा रहे हैं। हमको भी इस कॉज के लिए कंट्रीब्यूशन देना चाहिए। पीएम का कॉल है। आफ्टरऑल हम देश के रिस्पॉंसिबल सिटिजंस हैं। हमारा भी कुछ मॉरल ड्यूटी बनता है। कैसे पता चलेगा कि हमारा सोशल ऑब्लिगेशन कितना स्ट्रॉंग है।’ 

शहर के इलीट क्लब में यही हॉट डिस्कशन था। एक तरफ किटी की टेबल पर विदेशी परफ्यूम में तर-बतर मोहतरमाएं और दूसरी तरफ बिलियर्डस की टेबल पर शाट लेते हुए जेंटलमैन। साइड टेबल पर करीने से क्रिस्टल के पैमाने भी सजे हुए हैं। बातों के साथ धीरे-धीरे सिप भी लिए जा रहे हैं। ‘यंग लेडीज एंड यंग मेन, योर काइंड अटैन्शन प्लीज (यहां उम्र जितनी भी हो जाए, लेकिन चेहरे पर पैसे की चमक सबको एवरग्रीन यंग रखती है) क्या प्रपोजल्स हैं क्लीनलीनेस ड्राइव के लिए। सोशल फंड से अभी एडवांस पास करा लेते हैं। डिलीवरी डे पर कोई दिक्कत नहीं आएगी।’

सबसे पहले मिसेज दारूवाला उठती हैं- ‘मेरे ख्याल से इलीट क्लब से सिटी मॉल तक पर क्लीनलीनेस मार्च निकाला जाए। वो एरिया पॉश है पहले से ही बहुत साफ रहता है। वहां कुछ पत्ते वगैरा गिरवा देंगे जिससे हम उन्हें ब्रूम करते दिखा सकें। वहां आसपास कोई पेड़ नहीं है। इसलिए अपने पार्क के गार्डनर को पहले ही कह देते हैं कि वहां पहले जाकर कुछ पत्ते स्प्रैड कर दे। इस अकेजन के लिए न्यू ब्रूम्स को खरीद कर उन्हें पहले प्रॉपरली सेनेटाइज करा लिया जाएगा। हाईजीन का तो ध्यान रखना ही पड़ेगा। हमारे जैसी सेलिब्रटीज इस क्लीनलीनेस ड्राइव में हिस्सा लेंगी तो शहर के आम लोगों को इससे अच्छा इंसपिरेशन मिलेगा।’ मिसेज दारूवाला की बात खत्म होने से पहले ही तालियों से क्लब गूंज उठता है।

मिस्टर हाथी तत्काल मिसेज दारूवाला के प्रपोजल को सेकंड करते हैं- ‘हां तो ठीक रहा, कल हम सब क्लब में मिल रहे हैं। पहले वेलकम मेनू सेट कर लिया जाए। हाई टी और जूस के साथ चीज सैंडविच और गार्लिक ब्रेड ठीक रहेगी। भई हम सारे ही कलरी-कॉंशियस हैं। ऐसा है सब को फिजीकली लेबर करना है तो सब को पाकेट में रखने के लिए ड्राई-फ्रूट्स के पैक दे दिए जाएंगे। एनर्जी का लेवल मेंटेन रहेगा। आपसे एक रिक्वेस्ट है, ड्राई-फ्रूट्स के पैक पाकेट में ही रखिएगा। ओपन करने से आम लोगों में अच्छा मैसेज नहीं जाएगा।’

अभी मिस्टर हाथी ने अपनी बात भी पूरी नहीं की थी कि लड़खड़ाते कदमों से मिस्टर पीके माइक के पास आकर बोले- ‘अरे मिस्टर हाथी मरवाएंगे क्या। इतनी फिजिकल लेबर। वो भी सूखे-सूखे। गला तर करने का भी कोई प्रपोजल होगा या नहीं।’ इस पर मिस्टर हाथी ने जवाब दिया- ‘मिस्टर पीके, यू भी न टू मच। बड़ी जल्दी वरी करने लग जाता है। अरे क्लीनलीनेस ड्राइव के बाद सिटी माल के ओपन टेरेस रेस्तरां में कॉकटेल का भी अरेजमेंट रख लेते हैं। वैसे एक मोबाइल कार-ओ-बार भी क्लीनलीनेस ड्राइव के साथ-साथ चलेगी।’

अभी ये बात चल ही रही थी कि मिस कलरफुल खड़ी हो गईं- ‘मिस्टर सेक्रेट्री, हमको आपसे एक शिकायत होता। पिछली बार वीमेन सेफ्टी इश्यू पर कैंडल लाइट मार्च निकाला था तो आपने प्रेस के जिन लोगों को इन्वाइट किया था, उन्हें जरा भी न्यूज-सेंस नहीं था। मैंने उस ओकजन के लिए चेन्नई से स्पेशल कांजीवरम की साड़ी मंगाया था। लेकिन अगले दिन पेज थ्री पर मेरा एक भी फोटोग्राफ नहीं छपा। मेरा दस हजार रुपया पानी में चला गया। इस बार उन्हें पहले से ही अलर्ट कर दीजिएगा कि क्लीनलीनेस ड्राइव को कवर करते हुए वैसा सिली मिस्टेक न हो। चाहें तो एंगल वगैरहा सेट करने के लिए एक बार रिहर्सल भी कर लेते हैं।’ सभी रिस्पेक्टेड लेडीज ने मिस कलरफुल की बात को जोरदार क्लैपिंग के साथ एप्रिशिएट किया। इसके बाद सभी ने आखिरी नोट पर क्लीनलीनेस ड्राइव की सक्सेस के लिए चीयर्स किया।

गुरुवार, 30 अक्तूबर 2014

सिक्किम में हो रही है नए युग की शुरुआत...खुशदीप

देश में खेती ने एक चक्र पूरा किया है और अब यह अपना रूप बदल रही है। यह सही है कि आधी सदी पहले देश में शुरू हुई हरित क्रांति ने खाद्यान्न के क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाया। अब ठहरकर यह सोचने का वक्त है कि पिछले पांच दशक में हमने क्या पाया, क्या खोया? अधिक से अधिक उपज पाने की हमारी सनक आखिर हमें कहां ले आई है? रसायनों और जहरीले कीटनाशकों के दम पर हुई इस क्रांति ने जमीन की माटी और पानी को कितना नुकसान पहुंचाया?



पश्चिमी देशों में सन 1850 से ही रासायनिक खादों का इस्तेमाल प्रारंभ हुआ। लेकिन भारत में रासायनिक खादों से खेती की शुरुआत सन 1965 में हरित क्रांति के साथ हुई थी। तब रसायनों के बुरे प्रभाव के तर्कों को नजरंदाज किया गया। उपज तो बढ़ी, लेकिन जब कीट व कई रोग फसलों पर आक्रमण करने लगे, तो कीटनाशकों का प्रयोग होने लगा। एक ही मौसम में गोभी के लिए कीटनाशकों के आठ से दस छिड़काव, कपास के लिए 13 से 15 छिड़काव और अंगूर के लिए 30-40 छिड़काव। कीटनाशक अवशेषों के कारण ऊपरी नरम मिट्टी कड़क होने लगी। भू-जल सल्फाइड, नाइट्रेट और अन्य रसायनों से प्रदूषित हुआ। प्राकृतिक संतुलन खो गया और कीटों का प्रकोप बना रहा। इनका छिड़काव करने वाले किसान दमा, एलर्जी, कैंसर और अन्य समस्याओं के कहीं ज्यादा शिकार होने लगे। इसके मुकाबले उपज देखें, तो 1965 से 2010 तक रसायनों का इस्तेमाल कई गुना बढ़ा, लेकिन उपज सिर्फ चार गुना ही बढ़ी। यह बढ़ोतरी भी केवल रासायनों के दम पर नहीं हुई। खेती वाली जमीन में वृद्धि और सिंचाई की बेहतर व्यवस्था ने इसमें महत्वपूर्ण योगदान दिया।
अब इसकी उल्टी धारा चलाने का समय है। सिक्किम जैसा राज्य इसका रास्ता दिखा रहा है। सिक्किम 2015 में शत-प्रतिशत ऑर्गेनिक फार्मिंग का लक्ष्य हासिल करने जा रहा है। ऐसा दुनिया में कहीं नहीं हो सका, पर सिक्किम ने इसे कर दिखाया है। सिक्किम ने दिखाया है कि ठान लिया जाए, तो रसायनों और जहरीले कीटनाशकों से पूरी तरह तौबा कर पौधे, पशु, कम स्टार्च वाले पदार्थ, ग्रीन हाउस जैसे ऑर्गेनिक उपायों का इस्तेमाल कर पर्याप्त कृषि उत्पाद हासिल किए जा सकते हैं। इतना ही नहीं, खेती की कमाई के एक बड़े हिस्से को रासायनिक उद्योग के हवाले हो जाने पर भी रोक लगाई जा सकती है। 

सिक्किम जैसे राज्य के लिए इसका अर्थ हुआ खेती की कमाई को राज्य के बाहर जाने से रोकना। उसने इसके लिए नौजवानों और किसानों को तैयार किया। इसका इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाया और किसानों को तकनीक दी। अब सिक्किम जाने वालों को सिर्फ यहां के कुदरती नजारे नहीं मिलेंगे, बल्कि वे जो खाएंगे या पिएंगे, वे भी कुदरती ही होंगे। देश के बाकी राज्य इस ओर कब बढ़ेंगे? कुछ भी हो, देर-सवेर उन्हें यह रास्ता अपनाना होगा।

मूलत: प्रकाशित हिन्दुस्तान, 30 अक्टूबर 2014

मंगलवार, 28 अक्तूबर 2014

मोदी मैजिक की जेके-झारखंड में असली परीक्षा...खुशदीप

ब्रह्मास्त्र के लिए भी मुश्किल मोर्चे...

जम्मू-कश्मीर और झारखंड में चुनाव का बिगुल बज चुका है। इन दोनों राज्यों में 25 नवंबर से 20 दिसंबर तक पांच चरणों में चुनाव होंगे। वोटों की गिनती 23 दिसंबर को होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव कार्यक्रम की घोषणा से दो दिन पहले दीपावली के दिन श्रीनगर पहुंच कर जता दिया था कि उनका अगला निशाना कहां है। मोदी और उनके ‘भाग्यशाली सिपहसालार’ अमित शाह जम्मू-कश्मीर और झारखंड फतह करने के लिए अपने तरकश का हर तीर आजमाएंगे।

शायद यही वजह है कि बीजेपी जब हरियाणा-महाराष्ट्र की जीत पर जश्न में डूबी थी, मोदी ने जम्मू-कश्मीर जाने का ‘मास्टरस्ट्रोक’ खेला। कहा गया कि वह बाढ़ की आपदा से गुजरे घाटी के लोगों के बीच जाकर उनका दर्द बांटना चाहते हैं। यह अलग बात है किश्रीनगर में वे कुल जमा चार घंटे ही रुके और राजभवन में राजनीतिक दलों के प्रतिनिधिमंडलों से अलग-अलग मुलाकात करने के बाद दिल्ली लौट आए। राहत-शिविरों में रह रहे हजारों लोग इंतजार ही करते रह गए कि पीएम उनके आंसू पोंछने आएंगे।



कसौटी पर छवि
घाटी में सैलाब ने सब कुछ तबाह कर दिया है। गरीबों की बात छोड़िए, श्रीनगर के पॉश इलाकों में भी कुदरत की मार ने लोगों को कहीं का नहीं छोड़ा है। ऐसे में वहां प्राथमिकता राहत और पुनर्वास के काम को युद्धस्तर पर आगे बढ़ाने की है। संवैधानिक बाध्यता के चलते चुनाव को अधिक समय तक टाला नहीं जा सकता था। लेकिन लोकतंत्र के इस पर्व में व्यापक हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए ‘लोक’ को सबसे पहले त्रासदी के अवसाद से निकाला जाना चाहिए था।

बहरहाल, जम्मू-कश्मीर में सत्तारूढ़ नैशनल कॉन्फ्रेंस को छोड़कर मुख्यधारा के सभी राजनीतिक दलों ने चुनाव कार्यक्रम का स्वागत किया है। नैशनल कॉन्फ्रेंस ने कहा है कि लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए वह चुनाव में हिस्सा लेगी, लेकिन यह वक्त इलेक्शन के लिए उपयुक्त नहीं है। जहां तक अलगाववादी संगठनों का सवाल है तो उनके लिए जम्मू-कश्मीर के लोगों के हित से ऊपर हमेशा अपना अजेंडा ही रहता है। इसलिए हर बार की तरह वे इस बार भी बहिष्कार का हथकंडा अपनाएंगे।

जम्मू-कश्मीर और झारखंड में एक साथ चुनाव कराना सुरक्षा एजेंसियों के लिए बेहद चुनौतीपू्र्ण होगा। जम्मू-कश्मीर लंबे समय से अलगाववादी आतंकवाद से ग्रस्त है, जबकि झारखंड के अधिकतर हिस्से नक्सलवाद की चपेट में हैं। इसे देखते हुए पांच चरणों में मतदान के चुनाव आयोग के फैसले को ठीक ही कहा जाएगा। दोनों राज्यों के राजनीतिक समीकरणों की बात की जाए तो बीजेपी की कोशिश रहेगी कि यहां भी महाराष्ट्र-हरियाणा की तर्ज पर नरेंद्र मोदी की छवि को आगे रखकर चुनाव लड़ा जाए।

दोनों जगह किसी नेता को मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करने से बीजेपी परहेज ही करेगी। वह जानती है कि जम्मू-कश्मीर की 87 सीटों वाले विधानसभा चुनाव की चुनौती अधिक मुश्किल है। इसीलिए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने यहां मिशन 44 के तहत पिछले कई महीनों से आक्रामक चुनावी अभियान छेड़ रखा है। राज्य में बीजेपी का सबसे अच्छा प्रदर्शन 2008 विधानसभा में रहा था, जब पार्टी ने 11 सीटें जीती थीं। पांच महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में जम्मू और लद्दाख में 41 विधानसभा क्षेत्रों में से 27 पर बीजेपी ने बढ़त कायम की थी। लेकिन घाटी की 46 सीटों में एक पर भी बीजेपी को बढ़त नहीं मिल सकी थी। घाटी में वोट पारंपरिक तौर पर नैशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस और पीडीपी में बंटते रहे हैं। इस बार अगर वहां नेशनल कॉन्फ्रेंस के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर चलती है, तो इसका सबसे ज्यादा फायदा पीडीपी को मिलने की उम्मीद है।

चंद महीने पहले तक कांग्रेस राज्य की सत्ता में नैशनल कॉन्फ्रेंस के साथ थी। इसलिए राज्य में भ्रष्टाचार, कुशासन और बेरोजगारी को लेकर लोगों की नाराज़गी का खामियाजा कांग्रेस को भी भुगतना पड़ सकता है। बीजेपी जम्मू-लद्दाख में अपनी पूरी ताकत झोंकने के साथ घाटी में भी इस बार अपनी दमदार दस्तक देना चाहती है। मोदी का मैजिक यहां कारगर रहता है या नहीं, यह तो 23 दिसंबर को वोटों की गिनती के बाद ही साफ होगा। जहां तक झारखंड का सवाल है तो वहां स्थिरता एक बड़ा चुनावी मुद्दा है। वर्ष 2000 में राज्य बनने के बाद यहां 12 बार सरकारें बनी और बिगड़ी हैं। मौजूदा झारखंड मुक्ति मोर्चा सरकार भी कांग्रेस की बैसाखियों पर चल रही है।

महागठबंधन की आस
केंद्र में जिस तरह बीजेपी को अकेले अपने बूते बहुमत की सरकार बनाने में सफलता मिली, स्थिरता का वही नुस्खा वह झारखंड के लोगों के सामने भी पेश कर रही है। उसने बिना किसी गठबंधन के राज्य की सभी 81 सीटों पर उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया है। दूसरी पार्टियां भी बीजेपी को कड़ी चुनौती देने के लिए बिहार की तर्ज पर महागठजोड़ के लिए कमर कस रही हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस, आरजेडी और जेडीयू साथ मिलकर अपनी चुनावी नैया पार लगाने की कोशिश में हैं। बीजेपी बनाम सेकुलर राजनीतिक दलों का यह प्रयोग बिहार उपचुनाव की दस सीटों पर कामयाब रहा था, लेकिन समूचे राज्य के लिए इसका इस्तेमाल पहली बार झारखंड में हो रहा है। देखना होगा कि झारखंड में यह अस्त्र कारगर रहता है या नरेंद्र मोदी का जादू चलता है?

मूलत: प्रकाशित- नवभारत टाइम्स, 28 अक्टूबर 2014

शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2014

कूल है गूगल हिंदी इनपुट टूल...खुशदीप



हर तरफ गूगल हिंदी इनपुट और एंड्रॉयड वन फोन की चर्चा है। खास तौर पर हिंदीभाषियों के लिए। अधिकतर हिंदीभाषी अभी तक मोबाइल पर कोई एसएमएस भेजना हो या ईमेल करना हो अथवा सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपडेट करना हो, Whatsapp पर चैट करना हो तो हिंदी को रोमन भाषा में ही लिखते रहे हैं जैसे कि...Namaskar, Aap kaise hain?। इस विधि से काम तो चल जाता है लेकिन संवाद करने में अटपटा ज़रूर लगता है। साथ ही अपनी भाषा की आत्मीयता (फील) भी नहीं आ पाती।

एंड्रॉयड मोबाइल पर गूगल हिंदी इनपुट की सुविधा से इस समस्या का काफ़ी हद तक समाधान हो गया है। ये टूल हिंदी में टाइप करने के लिए ये सबसे लोकप्रिय कीबोर्ड है। ये फोनेटिक टाइपिंग टूल है। यानि ये महत्व नहीं रखता कि आपको हिंदी टाइपिंग आती है या नहीं। आप अंग्रेज़ी कीबोर्ड पर टाइप करना शुरू करें और ये टूल उसे खुद--खुद देवनागरी हिंदी में बदलता जाता है।

जैसा कि आप सभी ने नोट किया होगा कि गूगल पिछले कुछ समय से भारत में अपनी योजनाओं के लिए हिंदी पर बहुत ज़ोर दे रहा है। इसी उद्देश्य से हाल ही में गूगल ने कम दाम पर एंड्रॉयड वन स्मार्टफोन लॉन्च किए हैं। इन फोनों में गूगल हिंदी इनपुट टूल के अलावा और क्या स्पेसिफिकेशन्सहैं, इस पर आगे बात करेंगे। इस सेगमेंट के दूसरे फोन की भी चर्चा करेंगे। 

पहले ये देखा जाए कि एंड्रॉयड मोबाइल पर गूगल हिंदी इनपुट टूल की मदद से कैसे हिंदी टाइपिंग की जा सकती है। लेकिन ऐसा करने से पहले ये ध्यान रखना ज़रूरी है कि ये टूल एंड्रॉयड 4.0 से पहले के वर्जन पर काम नहीं करता। अगर आपका एंड्रॉयड 4.0 से ऊपर के वर्जन का है तो इस टूल को गूगल प्ले से डाउनलोड करना होगा। 

फिर Settings में Language & Input पर जाकर Google Hindi Input से इस टूल को अपने एंड्रॉयड फोन पर एक्टिव करना होगा। टाइपिंग शुरू करने से पहले फोन के टॉप पर नोटिफिकेशन एरिया में Choose Input method को चुनकर टूल बदल लें। अब जो लेआउट दिखेगा, उस पर टाइप करना शुरू करेंगे तो हिंदी इनपुट मिल जाएगा। इसे नीचे वीडियो से अच्छी तरह समझा जा सकता है।



अगर आपको 'सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा' लिखना है तो आपको 'Saare Jahan Se Achcha Hindustan Hamara' टाइप करना होगा। कीबोर्ड के ऊपर एक पट्टी में आपको हिंदी शब्द दिखने लगेंगे।

अब बात गूगल के एंड्रॉयड वन फोनों की। गूगल ने तीन मोबाइल निर्माता कंपनियों की मदद से ये फोन देश में उपलब्ध कराए जा रहे हैं। माइक्रोमैक्स कैनवस ए1, कार्बन स्पॉर्क वी और स्पाइस ड्रीम उनो। 




मोबाइल बाज़ार के जानकारों के मुताबिक इस सेगमेंट में अभी तक मोटो ई की डिमांड सबसे अधिक रही है। इसकी बिक्री भारत में मई 2014 से शूरू हुई थी।


मोटो ई और गूगल एंड्रॉयड वन फोनों का मिलान किया जाए तो मज़बूत बैट्री के मामले में मोटो ई बेहतर है। मोटो ई में बैट्री Li-Ion 1980 mAh है। वहीं तीनों एंड्रॉयड वन फोनों में ये Li-Ion 1700 mAh है। लेकिन मोटो ई की कीमत को देखा जाए तो उससे कम दाम में एंड्रायड वन फोनों में उससे मिलते स्पेसिफ़िकेशन्स मौजूद हैं। यही नहीं एन्ड्रॉयड वन में 2 MP फ्रंट कैमरा है जो मोटो ई में नहीं है। कैमरा एंड्रॉयड फोनों और मोटो ई में एक समान 5 MP है। कोर प्रोसेसर में भी एंड्रायड वन फोन मोटो ई से आगे हैं। एंड्रॉयड वन में 1.3 GHz क्वैड कोर प्रोसेसर है, वहीं मोटो ई में 1.2 GHz डुअल कोर प्रोसेसर है। डिस्पले स्क्रीन भी एंड्रॉयड वन में बड़ा है। मोटो ई में डिस्पले स्क्रीन 4.3 इंच है, वहीं एंड्रॉयड वन में 4.5 इंच है। हालांकि स्क्रीन रेसोल्यूशन में मोटो ई आगे है। मोटो ई की स्क्रीन रेसोल्यूशन 540X960 पिक्सल है। एंड्रॉयड वन में ये रेसोल्यूशन 480X854 पिक्सल है।

 रैम मोटो ई और एंड्रॉयड वन फोनों में एक समान यानि 1 GB है। मेमोरी सब फोनों में 4 GB इसे 32 GB तक बढ़ाया जा सकता है।OS एन्ड्रॉयड फोनों में Android OS v4.4.4 KitKat है। मोटो ई में ये Android OS v4.4.2 KitKat जिसे 4.4.4 तक अपग्रेड किया जा सकता है।



एंड्रॉयड के चीफ़ सुंदर पिचाई भारत में ही जन्मे हैं। गूगल के एंड्रॉयड वन फोनों के लॉन्च के वक्त वो भारत आए थे। पिचाई के मुताबिक उनका लक्ष्य विश्व के पांच अरब लोग हैं जो बिना स्मार्ट फोन के रह रहे हैं। एंड्रॉयड वन में हिंदी के अलावा सात और भारतीय भाषाओं के लिए भी सपोर्ट हासिल है। इस सारी कवायद का मकसद यही दिखता है कि कीमत को लेकर काफ़ी सजग भारतीयों के लिए ही खास तौर परर एंड्रॉयड वन को बनाया गया है। यहां ये बताना भी ज़रूरी है कि एंड्रॉयड वन फोनों को अगले दो साल के लिए एंड्रॉयड से सभी अपग्रेड मिलते रहेंगे।

Android का नवीनतम संस्करण (4.4 किटकैट) चलाता है और नया ऑपरेटिंग सिस्टम रिलीज़ होते ही स्वचालित रूप से मिल जाता है मददगार नई चीजें जैसे ध्वनि आदेश और चतुराईपूर्ण इंजीनियरिंग से फ़ोन को तेजी से चलाने में, अधिक समय चलने, और अधिक आकर्षक फ़ोटो लेने में मदद करती हैं। इसे अपने अनुकूल बनाने के लिए एक ताजा होम स्क्रीन के साथ शुरू करें और उसे ठीक वैसा बनाने के लिए जैसा आप चाहते हैं अपने पसंदीदा Android ऐप्स और वॉलपेपर के साथ अनुकूलित कर लें। इनबिल्ट सिक्योरिटी इसकी एक और खासियत है। अपने फ़ोन को एक पासवर्ड, पैटर्न या यहां तक कि अपने चेहरे की छवि का उपयोग करते हुए अनलॉक करें। यदि आप अपना फ़ोन खो देते हैं, तो आप Android उपकरण प्रबंधक का उपयोग करके उसे खोज सकते हैं, लॉक कर सकते हैं, या दूरस्थ रूप से अपनी सामग्री को हटा सकते हैं

बुधवार, 1 अक्तूबर 2014

कुंडली देखेंं या प्रेम...या फिर मेडिकल साइंस की ज़रूरतें...खुशदीप

प्रेम पर भरोसा करें या कुंडली देखें...एक जोड़ा दिलोजान से एक दूसरे से प्यार करता है...लेकिन कुंडली उनके अरमानों पर कुंडली मार कर बैठ जाती है...अब क्या करें...क्या कुंडली ही सब कुछ है...या उपाय-शुपाय कर कोई रास्ता निकाला जा सकता है..ज्योतिष विज्ञान के अलावा भी क्या कुछ बातें हैं जिनका शादी-ब्याह से पहले ध्यान रखा जाना चाहिए...क्या कहती है इस बारे में मेडिकल साइंस...


(मूलत: प्रकाशित- नवभारत टाइम्स, 1 अक्टूबर 2014)

ज्योतिष से अलग, मेडिकल साइंस में ऐसा बहुत कुछ है जो शादी से पहले जान लेना जरूरी है। हमारे देश में शादी-ब्याह को जीवन का नहीं बल्कि जन्म जन्मांतर का साथ माना जाता है। इसलिए लड़के-लड़कियों के ब्याह के मामले में खास तौर पर हमारे बुजुर्ग कोई जोखिम नहीं लेना चाहते। अब ये अलग बात है कि ज्योतिषियों से सभी गुण मिलने का भरोसा मिलने के बाद भी कई शादियां टूट जाती हैं। हमारे महानगरों में भी पश्चिमी देशों की तर्ज पर अब तलाक के मामले बढ़ने लगे हैं। 

हमारे समाज में जो तबका प्रगतिशील माना जाता है वह भी शादी-ब्याह के मामलों में आगे बढ़ने से पहले ज्योतिषियों से सारी आशंकाओं को दूर कर लेना चाहता है। अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय की शादी के वक्त ऐसा ही कुछ देखने को मिला था। ऐश्वर्या की कुंडली के मंगलदोष को दूर करने के लिए लिए उनकी अभिषेक से पहले एक पेड़ से शादी कराने का समाचार मिला था।

वैसे गृह नक्षत्र, लग्न आदि को मानना या ना मानना किसी का निजी विषय है। लेकिन ज्योतिष से इतर लोग ये जानने में भी दिलचस्पी रख सकते हैं कि क्या विज्ञान भी शादी-ब्याह से पहले कुछ सावधानियां बरतने की मांग करता है? जापान की बात की जाए तो वहां लोग एक दूसरे का ब्लड ग्रुप जानने में बड़ी रुचि रखते हैं। वहां वर या वधू की तलाश के वक्त हर किसी को इस सवाल का सामना करना पड़ता है कि आपका ब्लड ग्रुप क्या है? वहां आम धारणा है कि ब्लड ग्रुप से आपके स्वभाव और व्यक्तित्व का पता लग सकता है।

जहां तक मेडिकल साइंस की बात है, उसके अनुसार शादी से पहले ब्लड ग्रुप मैच करने की जरूरत नहीं होती। लेकिन भावी जीवन साथी के एबीओ और आरएच ब्लड ग्रुप के बारे में जानना अहम रहता है। अगर एक आरएच नेगेटिव महिला का विवाह एक आरएच पॉजिटिव पुरुष से होता है तो उनका शिशु भी आरएच पॉजिटिव हो सकता है। इससे आइसोइम्युनाइजेशन की स्थिति बन सकती है। इसका मतलब ये है कि कोख में शिशु के विकास या प्रसव के वक्त शिशु का रक्त मां के रक्त में प्रवेश करता है तो मां के रक्त में एंटीबॉडीज का निर्माण होने लगता है।

ये इसलिए होता है कि मां का इम्युन सिस्टम आरएच नेगेटिव होने की वजह से आरएच पॉजिटिव रक्त का प्रतिरोध करता है। अब यही एंटीबॉडीज प्लासेंटा के जरिए शिशु के रक्त में प्रवेश करते हैं और उसकी आरएच पॉजिटिव लाल रक्त कोशिकाओं को नष्ट कर देता है। इससे शिशु को एनीमिया या जॉंडिस हो सकता है। अगर शादी से पहले आरएच नेगिटिव या आरएच पॉजिटिव का पता हो तो इस स्थिति से बचा जा सकता है। डॉक्टर प्रसव के वक्त सारी ऐहतियात बरतते हैं कि ऐसी नौबत ना आए।

एक सवाल और भी है। विश्व में 3 करोड़ 40 लाख लोग एचआईवी पॉजिटिव हैं। हालांकि भारत में कुल आबादी में 0.34 फीसदी लोग ही एचआईवी पॉजिटिव हैं। ये संख्या बेशक कम है लेकिन पति-पत्नी के संबंधों में भी ये खतरा हो सकता है। यदि दोनों में से एक भी एचआईवी पॉजिटिव है। एड्स/एचआईवी का संक्रमण 5 फीसदी में बच्चों को माता-पिता से होता है।

अगर किसी युवक या युवती की शादी होने जा रही है और वो एचआईवी पॉजिटिव होने की बात होने वाले जीवन साथी से छुपाता है तो वो आईपीसी की धारा 269 और 270 के तहत दंड का भागीदारी है। ऐसी सूरत में क्या युवक या युवती को शादी से पहले अपना एचआईवी टेस्ट कराना चाहिए? क्या ये हमारे समाज में मान्य होगा? अब बताइए, कुंडली देखें या मेडिकल साइंस की जरूरतें?

रविवार, 28 सितंबर 2014

हिंदीभाषी यूजर्स हैं गूगल एन्ड्रॉयड की प्राथमिकता

शनिवार 27 सितंबर को गूगल ने एक खास डूडल के साथ अपना 16वां जन्मदिन मनाया। गूगल के होम पेज पर ऐसा डूडल बनाया गया, जिसमें गूगल के लोगो में किसी मैच्योर इंसान की तरह लेटर 'G' अपने परिवार के बाकी लेटर्स 'O' और 'L' की हाइट नाप रहा है। इस बात से शायद कंपनी ये इशारा कर रही है कि अब गूगल बड़ा हो गया है। 




12 दिन पहले ही 15 सितंबर को गूगल ने अपना नया लो-बजट एंड्रॉयड वन डिवाइस लॉन्च किया। ये डिवाइस हिंदी भाषी लोगों के लिए खासा मददगार साबित होगा। इस डिवाइस की मदद से जहां हिंदी की-बोर्ड के साथ टाइप किया जा सकेगा वहीं सभी मेजर एप भी हिंदी भाषा में डाउनलोड किए जा सकते हैं। भारत की करीब 40 फीसदी जनसंख्या की पहली भाषा हिंदी है। एक सर्वे के अनुसार 2014 में भारत में स्थानीय भाषा का इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं की संख्या में एक-चौथाई का इज़ाफ़ा हुआ है।




आपने देखा होगा कि जब लोग रोमन में हिंदी लिखते हैं तो उन्हें पढ़ने में काफी दिक्कत होती है। इसी के समाधान के लिए गूगल ने खास एप विकसित किया। गूगल हिंदी इनपुट एक भारतीय इनपुट टूल है जो आपको अपने एन्ड्रॉयड फोन पर हिंदी में संदेश लिखने, सोशल वेबसाइट नेटवर्क पर अपडेट देने या ईमेल लिखने देता है। एन्ड्रॉयड 4.0 से पहले, गूगल ने देवनागरी फॉन्ट समर्थन नहीं प्रदान की थी। यह 4.0 से उपलब्ध है। इसमें नया हिंदी की-बोर्ड डिजाइन है। वर्णमाला के ज़्यादातर अक्षर मुख्य स्क्रीन पर क्रम से हैं। व्यंजन लिखने पर स्वर की जगह मात्रा आ जाती है। शब्दांश के लिए उन्हें देर तक दबाए रखें। मसलन " को लंबे समय तक दबाने पर "" या " " लिख सकते हैं। " को लंबे समय तक दबाने पर क, कं, क्र, र्क लिखा जा सकता है। स्माइली कीबोर्ड में ज़्यादा आइकन्स (सिर्फ एन्ड्रॉयड 4.4 में) हैं।

आप जानते हैं गूगल ने स्मार्टफोन्स तथा टेब्लेट कम्प्यूटर्स में प्रयुक्त होने वाले अपने बेहद लोकप्रिय एन्ड्रायड ऑपरेटिंग सिस्टम के नए वर्जन (एन्ड्रायड 4.4) को क्या नाम दिया है? – किट कैटउल्लेखनीय है कि गूगल ने एन्ड्रायड ऑपरेटिंग सिस्टम के तमाम पूर्व में लांच किए गए वर्जन्स का नाम खाने-पीने की चीजों पर रखने की अपनी परंपरा को फिर निभाते हुए इस ऑपरेटिंग सिस्टम का नाम बेहद लोकप्रिय चाकलेट ब्राण्ड किट-कैट पर रखने की घोषणा की है। पूर्व में एन्ड्रॉयड ऑपरेटिग सिस्टम के कुछ नाम रहे हैं- कपकेक, डोनट, फ्रोयो, जिंजरब्रेड, आइस क्रीम सैण्डविच और जेली बीन गूगल का दावा है कि इस समय पूरी दुनिया में एन्ड्रायड ऑपरेटिंग सिस्टम पर आधारित एक अरब से अधिक स्मार्टफोन्स व टैब्लेट्स का प्रयोग हो रहा है)

गूगल ने 15 सितंबर को भारतीय मोबाइल फ़ोन निर्माता कंपनियों के साथ मिलकर तीन किफ़ायती एंड्रॉएड स्मार्टफ़ोन लॉन्च किए'एंड्रॉएड वन' प्रोजेक्ट के पहले तीन फ़ोन हैं - माइक्रोमैक्स कैन्वास ए-1, स्पाइस ड्रीम उनो और कार्बन स्पार्कलहाई स्पीड प्रोसेसिंग, डुअल सिम कार्ड, एफ़एम रेडियो, एसडी कार्ड मेमोरी और पांच मेगापिक्सल के कैमरे समेत कई एडवांस फ़ीचरों से लैस इन फ़ोन्स की क़ीमतें छह से सात हज़ार के बीच हैं तेज़ी से बढ़ रहे भारतीय स्मार्टफ़ोन बाज़ार को देखते हुए गूगल ने एंड्रॉएड वन प्रोजेक्ट की शुरुआत भारत से की हैसभी एंड्रॉएड वन फ़ोन के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर स्पेसिफिकेशंस गूगल के तय किए हुए हैं और इन्हें भारतीय मोबाइल फ़ोन कंपनियों ने बनाया हैहालांकि एंड्रॉएड वन स्मार्टफ़ोन्स को गूगल की सीधी ब्रांडिंग का फायदा मिल सकता हैइन फोन्स की बिक्री फिलहाल ऑनलाइन हो रही है। अक्टूबर से इन्हें रिटेल बाज़ार से खरीदा जा सकेगा।

गूगल एंड्रॉएड के ये स्मार्टफोन हिंदी भाषा के साथ ही नौ दूसरी भाषाओं को सपोर्ट करेंगे इन स्मार्टफोन में वॉइस कमांड, मैसेज टाइपिंग और दूसरे एप्लिकेशन अपनी लोकल भाषा में यूज कर सकेंगेइन स्मार्टफोन को क्वालिटी के लिए गूगल द्वारा टेस्ट किया जाएगागूगल के ऑपरेटिंग सिस्टम सपोर्टिव होने के कारण आप इस अच्छी गति के साथ यूट्यूब वीडियोज़ देख सकते हैंइसके साथ गूगल मैप, गूगल सर्च, गूगल ट्रांसलेट जैसी सुविधओं का यूज भी अच्छे यूजर इंटरफोस के साथ किया जा सकता है।

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

हरियाणवी दंगल में अपना अपना मीडिया

मूलत: प्रकाशित नवभारत टाइम्स, 10 सितंबर 2014
लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव। इसे सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भारत में जिस चुनाव आयोग की है, उसकी ईमानदारी की साख दुनिया भर में है। लेकिन, जैसे-जैसे देश में सूचना और प्रचार के तौर-तरीके बदल रहे हैं, वैसे-वैसे चुनाव आयोग को पेश आने वाली चुनौतियां भी बढ़ती जा रही हैं। सोशल मीडिया के विस्फोट पर नजर रखना मुश्किल है। पारंपरिक मीडिया में पर्दे के पीछे से चलने वाले ‘पेड न्यूज’ के खेल पर अंकुश लगाना भी टेढ़ी खीर है। एक नई चुनौती यह है कि राजनीतिक दल अपने ही अखबार या न्यूज चैनल चलाने लगे हैं और मीडिया-घरानों के मालिक खुद ही चुनावी समर में ताल ठोकते नजर आ रहे हैं। 

घर के टीवी-अखबार
हरियाणा में अक्टूबर के तीसरे हफ्ते में संभावित विधानसभा चुनाव पर भी ‘पेड न्यूज’ को लेकर चुनाव आयोग की पैनी नजर होगी। इस चुनाव को कांग्रेस, इंडियन नेशनल लोकदल, बीजेपी, हरियाणा जनहित कांग्रेस जैसे स्थापित दलों ने अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना रखा है, तो सियासत के कुछ नए खिलाड़ी भी लाव-लश्कर के साथ मैदान में हैं। 
हरियाणा चुनाव पर कुछ ऐसे लोगों ने भी दांव लगा रखा है, जिनके अपने अखबार या न्यूज चैनल हैं। अब, अगर ये लोग खुद चुनाव लड़ते हैं या अपने प्यादों को चुनाव लड़ाते हैं तो पूरे आसार हैं कि इनके अपने मीडिया हाउस उनकी शान में कसीदे पढ़ने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। घर के मीडिया प्लेटफॉर्म हैं तो जाहिर है, उपलब्धियों का स्तुति-गान भी दिन-रात गाया जाएगा।
हरियाणा चुनाव को लेकर मीडिया-मुगल्स की बात की जाए तो पहला नाम आता है, जी ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा का। इन्होंने हाल में अपने गृह-नगर हिसार से बीजेपी के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है। इस सीट से कांग्रेस नेता और उद्योगपति नवीन जिंदल की मां सावित्री जिंदल 2005 से ही विधायक चुनी जाती रही हैं। नवीन जिंदल ने भी हाल में मीडिया कारोबार के क्षेत्र में पांव रखे हैं। ‘फोकस न्यूज’ का संचालन जिंदल ही कर रहे हैं। 
कोल ब्लॉक आवंटन विवाद में जी ग्रुप और नवीन जिंदल की तनातनी किसी से नहीं छुपी है। नवीन जिंदल ने 2012 में आरोप लगाया था कि ‘जी न्यूज’ की ओर से कोल ब्लॉक आवंटन में जिंदल की कंपनी के खिलाफ खबरें ना दिखाने की एवज में 100 करोड़ रुपए की मांग की गई थी। इस प्रकरण के बाद से ही दोनों पक्षों की ओर से एक-दूसरे के खिलाफ कई मुकदमे दर्ज कराए गए। अब हिसार में सावित्री जिंदल के खिलाफ सुभाष चंद्रा चुनाव मैदान में उतरते हैं तो यह देखना दिलचस्प होगा कि ‘जी ग्रुप’ और ‘फोकस’ के न्यूज चैनल किस तरह की कवरेज करते हैं। 
हाल तक कांग्रेस का दामन थामे रखने वाले हरियाणा के बड़े कारोबारी विनोद शर्मा का भी इस संदर्भ में उल्लेख किया जा सकता है। विनोद शर्मा ने अब ‘जनचेतना’ नाम से अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई है। ये वही विनोद शर्मा हैं जिनका बेटा मनु शर्मा जेसिका लाल मर्डर केस में दोषी ठहराए जाने के बाद आजीवन कारावास की सजा भुगत रहा है। फिलहाल ये अंबाला से विधायक हैं और इनका परिवार ‘इंडिया न्यूज’ चैनल के साथ ‘आज समाज’ नाम के अखबार का भी प्रकाशन करता है। विनोद शर्मा की पार्टी ने हरियाणा विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए हरियाणा जनहित कांग्रेस के नेता कुलदीप विश्नोई से हाथ मिलाया है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के बेटे कुलदीप विश्नोई हाल में बीजेपी से अपना गठबंधन तोड़ने का ऐलान कर चुके हैं। 
एयर होस्टेस गीतिका शर्मा की मौत के मामले में महीनों जेल में रहने के बाद रिहा हुए गोपाल कांडा की हरियाणा लोकहित पार्टी भी इस बार चुनावी मैदान में है। 2009 में सिरसा विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव जीतने वाले कांडा का भी खुद का ‘हरियाणा न्यूज चैनल’ है। एक वक्त कांडा की हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा से गहरी छनती थी। लेकिन बाद में हुड्डा से कांडा के मतभेद हो गए। समस्त भारत पार्टी के नेता सुदेश अग्रवाल का ‘खबरें अभी तक’ नाम से न्यूज चैनल है। एक और मौजूदा विधायक रघुवीर कादियान की ‘आई विटनेस’ न्यूज चैनल में भागीदारी है। बीजेपी से जुड़े दो और नेता हैं, जिनके अपने अखबार हैं। दिल्ली से संचालित ‘पंजाब केसरी’ अखबार के मालिक अश्विनी कुमार करनाल से बीजेपी सांसद हैं, जबकि बीजेपी के ही एक और नेता कैप्टन अभिमन्यु के पास दैनिक अखबार ‘हरिभूमि’ का स्वामित्व है। 
कैसे मिले समान प्रचार
चुनावी घपलों को लेकर सक्रिय एक जिम्मेदार एनजीओ ने चुनाव आयोग को चिट्ठी भेज कर हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान इन सभी मीडियापतियों पर कड़ी नजर रखने की मांग की है। यहां सवाल केवल चुनाव की निष्पक्षता और शुचिता का ही नहीं, सभी उम्मीदवारों को प्रचार के लिए समान अवसर देने का भी है। धनबल और बाहुबल के साथ अब मीडिया बल को भी चुनाव में अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किए जाने का खतरा है। देखना होगा कि ऐसे हालात में चुनाव आयोग कैसे सभी प्रत्याशियों को प्रचार का समान अवसर मुहैया करा पाता है। बेशक, आयोग के लिए हरियाणा विधानसभा चुनाव एक नए तरह की अग्निपरीक्षा साबित होने वाला है।
इसी लेख पर मीडिया न्यूज़ वेबसाइट समाचार 4 मीडिया ने इस लिंक पर अपना विश्लेषण प्रस्तुत किया है-

चुनावी राजनीति में उतर रहे मीडिया हाउसों के मालिक...

बुधवार, 27 अगस्त 2014

क्या आप अब भी 'कुत्ते' को गाली समझेंगे...खुशदीप

अभी हाल में कुत्ते को लीड में रखकर एक फिल्म आई थी- इट्स एंटरटेनमेंट। इस फिल्म में कुत्ते के साथ साइड रोल करने वाले अभिनेता अक्षय कुमार इतने अभिभूत थे कि उन्होंने कहा कि वो अब कुत्ता  कहने  को गाली नही समझेंगे। खैर ये  तो  रही फिल्म की बात। लेकिन चेन्नई में वाकई एक ऐसा  वाक्या हुआ है कि  आप भी अक्षय से इत्तेफ़ाक रखने लगेंगे। बहुत दिन से कहीं कुछ लिख नहीं रहा था, लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया में कुत्ते पर एक स्टोरी  पढने के बाद लिखने को  मजबूर हो  गया। इसे पढ़कर आप भी मानेंगे कि ये कुत्ता ज़रूर है लेकिन इसका कद तथाकथित इनसानों से कहीं ऊंचा है।



चेन्नई में अवादी ब्रिज के पास खुले कब्रिस्तान में एक ताज़ा खुदी कब्र के पास एक कुत्ता 15 दिन तक  भूखा-प्यासा कड़ी धूप-बरसात की  परवाह किए बिना खुले में  बैठा रहा। कुत्ते पर ब्लू क्रॉस संस्था के वॉलंटियर्स की नज़र पड़ी तो उन्होंने उसे खिलाने-पिलाने की कोशिश की। साथ  ही सुरक्षित स्थान पर ले जाना चाहा। लेकिन कुत्ता टस से मस नहीं हुआ। बल्कि जो उसके पास आता,  वो उस पर गुर्राता। साथ ही कब्र की मिट्टी पर पंजे मारता।

Blue Cross of India के जनरल मैनेजर Dawn Williams के मुताबिक जब आस-पास के लोगों से कुत्ते के बारे में पूछा गया तो सारा माज़रा समझ आया। दरअसल टॉमी नाम का ये कुत्ता 18 साल के किशोर भास्कर का था। भास्कर को बीती 2 अगस्त को एक तेज़ रफ्तार वाहन ने टक्कर मार दी  थी, जिससे उसकी मौत हो गई। भास्कर की 50 वर्षीय मां सुंदरी के बारे में भी  पता चला।

एक निर्माणाधीन इमारत में मजदूरी करने वाली भास्कर की मां साइट पर ही एक झुग्गी में बेटे के साथ रहती थी। जब सुंदरी को कब्र के पास लाया गया तो कुत्ता उसके पास आकर पांव चाटने लगा। सुंदरी ने कुत्ते को गले से लगा लिया। सुंदरी के मुताबिक टॉमी पिछले पांच साल से उसके बेटे के साथ खूब हिला हुआ था। जिस दिन  से बेटे भास्कर की मौत हुई, उस दिन से ये कुत्ता भी कहीं नहीं  दिख रहा था।

विधवा सुंदरी के मुताबिक बेटे के मौत की बाद उसे अपनी ज़िंदगी बेमायने लगने लगी थी। लेकिन अब टॉमी ने फिर उसे जीने का मकसद दिया है। सुंदरी फिर टॉमी को अपने साथ ले गई। जब टाइम्स ऑफ इडिया ने निर्माणाधीन  इमारत के पास सुंदरी को  ढूंढने की कोशिश की तो पता चला कि वो टॉमी को लेकर अपने मूल स्थान तिरुवन्नामलाई चली गई है।

बताइए अब आप टॉमी को क्या कहेंगे? कुत्ता या इनसानों से भी बढ़कर 'इनसान'....




शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

डॉ अमर कुमार की तीसरी पुण्यतिथि...खुशदीप

अमर ब्लॉगर डॉ अमर कुमार की 23 अगस्त को तीसरी पुण्यतिथि है...

तीन साल बीत गए डॉ अमर कुमार को हमसे जुदा हुए...लेकिन यकीन मानिए इस अर्से में एक दिन भी ऐसा नहीं बीता होगा जिस दिन मैंने उन्हें याद ना किया हो....सुबह प्रार्थना करता हूं तो अपने दिवंगत पिता को याद करने के साथ डॉ अमर कुमार स्वत: ही मस्तिष्क में आकर आशीर्वाद दे जाते हैं...ठीक वैसे ही जैसे वो कभी मेरी पोस्टों पर अपनी टिप्पणियों का प्रसाद दिया करते थे...

एक ऐसी विभूति जिनसे साक्षात मिलने का कभी मुझे मौका नहीं मिला, लेकिन वो ब्लॉगिंग में संवाद के ज़रिए ही मेरे दिल--दिमाग पर छाते चले गए...



27 फरवरी 2010 को मेरी इस पोस्ट पर डॉक्टर साहब की ये टिप्पणी मिली थी-
डा० अमर कुमार February 27, 2010 at 10:49 AM
वर्ष के पहले हफ़्ते में मैंने गलत तो नहीं कहा था,
कि अक्सर तुम मेरी सोच को स्वर दे ही देते हो,
सो मैं आलसी हो गया हूँ । लिखना ऊखना कुछ नहीं बस बैठे बैठे टिप्पणियाँ फ़ेंकते रहो ।
इस पोस्ट ने एक बार फिर तसल्ली दी है,
मैंनें मसिजीवी की वह पोस्ट पढ़ी तो थी, टिप्पणी देकर उनकी टी.आर.पी. बढ़ाना नहीं चाहा । मुझ सा अहमी कोय, सो मैं स्वयँ ही अहँवादियों से बचता हूँ ।
GHETTO; इसका अपने साथियों के सँदर्भ में प्रयोग किया जाना मुझे भी नागवार गुज़रा । मूलतः स्पैनिश से उपजा यह शब्द नाज़ीयों ने अपना लिया क्योंकि यह परिभाषित करता था कि A slum inhabitated by minority group isolated due to social or economic pressures. ज़ाहिर है कि नाज़ी इसे जिस सँदर्भ में उपयोग किया करते थे वह तिरस्कारात्मक ही था ।
इस शब्द ने अमरीका तक की यात्रा में अपना चरित्र और भी मुखर किया । आज भी यह अपने तिरस्कारात्मक चरित्र को ही जी रहा है ।
हड़काऊ तर्ज़ पर यदि मात्र फ़ैशन के तौर पर इसे उछाला जाता है, तो भी कौन कहता है कि फासीवाद मर चुका है, या कि शब्दों में जान नहीं होती ?
तुस्सी साणूँ दिल खुश कित्ता खुशदीपे !

डॉक्टर साहब को याद करते हुए ये गीत सुन रहा हूं, आप भी सुनिए...

दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहां...


शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

गूगल और हिंदी : नए युग का आरंभ

दोस्तों, 

हिंदी और गूगल के रिश्ते पर आप से कुछ अति आवश्यक बातों के लिए ये पोस्ट लिख रहा हूं।



जैसा कि आप जानते हैं कि पिछले कुछ समय से ये अनुभव किया जा रहा है कि हिंदी ब्लॉगिंग के लिए लोगों का उत्साह कम होता जा रहा है। हिंदी ब्लॉगिंग ने आज से चार-पांच साल पहले जो स्वर्णिम काल देखा था वो कहीं पीछे छूट सा गया लगता है। अगर हम में से अधिकतर ऐसा सोचते हैं तो ये अकारण नहीं हैं। ब्लॉगवाणी या चिट्ठाजगत जैसे एग्रीगेटर की कमी, ब्लॉगर्स  का  फेसबुक, ट्विटर में अधिक रुचि  लेना, नामचीन ब्लॉगर्स का लिखना बंद करना या बहुत कम लिखना, टिप्पणियों का अभाव, आर्थिक रूप से कोई प्रोत्साहन ना मिलना, गुटबंदी, नए ब्लॉगर्स  का उत्साहवर्धन ना  होना आदि ऐसी अनेक वजहें रहीं जिन्होंने ब्लॉग के मंच को विरक्त कर दिया। दूसरों  की क्या कहूं, प्रतिदिन एक पोस्ट लिखने वाला मेरे जैसा व्यक्ति भी अब ब्लॉग पर यदा-कदा ही लिखता है।

लेकिन ये स्थिति अब अधिक दिन नहीं रहने वाली है। इसके लिए पहल की है गूगल ने। वही गूगल जो हमारे जीवन का ऐसा अहम हिस्सा बन गया है, जिसके सर्च इंजन के बिना हम स्वयं  को अधूरा समझने लगते हैं। अब इसी गूगल ने हिंदी उत्साहियों को समुदाय के रूप में अपने साथ जोड़ने  के लिए एक वृहत्ती योजना को हाथ में लिया है। बीती 4 अगस्त को ये देखकर आपको सुखद आश्चर्य हुआ होगा कि गूगल ने हिंदी सिनेमा के महान गायक किशोर कुमार  को उनकी 85वीं जयंती पर श्रद्धांजलि देने के लिए भारत में अपने मुखपृष्ठ पर उनका चित्र लगाया।
अभी कुछ दिन पहले  हिंदी उत्साहियों को अपने साथ जोड़ने के लिए गूगल ने एक फॉर्म उपलब्ध कराया। गूगल के इस नए मंच से जो लोग जुड़ चुके हैं, उन्होंने अनुभव किया होगा कि अब  वो अपनी समस्याओं या सुझावों के लिए गूगल टीम से सीधे संवाद कर सकते हैं। हिंदी ब्लॉगर्स ऐसे मंच के लिए लंबे समय से प्रतीक्षा कर रहे थे।

गूगल इसी दिशा में अब कई और महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रहा है। लेकिन जैसा कि आप जानते हैं कि ऐसे सार्थक प्रयासों को ठोस और मूर्त रूप देने में कुछ समय लगता है, इसलिए हम सभी हिंदी उत्साहियों को थोड़े धैर्य से काम लेना होगा। यहां मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि गूगल स्वयं के किसी आर्थिक लाभ के लिए हिंदी उत्साहियों को अपने साथ नहीं जोड़ना चाह रहा। ऐसे में किसी के मस्तिष्क में भी ये प्रश्न उठ सकता है कि गूगल फिर ये सब क्यों कर रहा है?

जैसा कि आप जानते हैं  कि ऑनलाइन प्लेटफार्म को भारत में एक अंग्रेज़ी समृद्ध प्लेटफार्म के हिसाब से जाना जाता है। हालांकि बाकी देशो में लोग ऑनलाइन अंग्रेज़ी के अलावा अपनी मातृभाषा में भी बातें करते हैं।  लेकिन भाषा और क्षेत्र के हिसाब से भारत इतनी विविधताओं वाला देश है कि यहां ऐसा होना कठिन चुनौती है। लेकिन अब समय आ  गया है इस स्थिति को बदलने का। एक अनुसंधान के परिणाम के अनुसार देश में अंग्रेज़ी के बाद तक़रीबन 80% लोग ऑनलाइन हिंदी का प्रयोग करते हैं। निकट भविष्य में ऑनलाइन आने वाले 30 करोड़ लोग और ऑनलाइन अंग्रेज़ी का प्रयोग नहीं करेंगे। इसलिए पूरा भरोसा है कि शीघ्र ही अधिक से अधिक लोग ऑनलाइन हिंदी का प्रयोग करने लगेंगे।

भविष्य की इसी सुखद आशा के साथ गूगल ऐसा प्लेटफॉर्म बनाना चाहता है कि जिसमें हिंदी के अधिक से अधिक रचनाकार जुड़ सकें। सब के साथ मिलकर अधिक से अधिक गुणवत्तापूर्ण हिंदी ऑनलाइन कंटेट का सृजन किया जा सके। हिंदी को देश-विदेश में प्रचारित करने के उद्देश्य से मैं आपसे अपील करता हूं कि इस भागीरथ कार्य  को सफल बनाने में गूगल  का साथ दें। मुझे भरोसा है कि गूगल अच्छे दोस्त की तरह हर घड़ी आपके साथ रहेगा।

यहां मैं ये जानकारी देना भी अपना दायित्व समझता हूं कि गूगल के साथ काम करने से  हिंदी ब्लॉगर्स को क्या-क्या मिलने  जा रहा  है-

1.  हिंदी ब्लॉगिंग से जुड़ी किसी भी समस्या या शंका  की स्थिति में गूगल टीम से सीधी सहायता।

2. एक ऐसा व्यवस्थित और समर्पित प्लेटफॉर्म जहां सभी हिंदी उत्साही आपस  में और गूगल से बात कर सकते हैं।

3. गूगल + की ओर से आपके ब्लॉग की दृश्यता (पहुंच) को बढ़ाना

4. गूगल जानता है कि हिंदी ब्लॉगर्स की हिंदी में एडसेंस को लेकर बहुत  जिज्ञासाएं  हैं। गूगल आपको आश्वस्त करता है कि हिंदी के लिए एडसेंस जब भी आरंभ होगा, सबसे पहले आपको ये जानकारी मिलेगी, साथ  ही  इसका उपभोग करने की सुविधा

5. Open Source Rich देवनागरी  फॉन्ट के बारे में जानकारी 

पोस्ट के अंत में आप से फिर अनुरोध करता हूं कि आप या आपके परिचितों  में से जो कोई भी गूगल के इस समूह का  हिस्सा बनना चाहता है वो कृपया यह फॉर्म भरे। गूगल शीघ्र उनसे संपर्क करने की कोशिश करेगा।

(नोट- फॉर्म भरते समय ये ध्यान रखें कि वहां आपको समूह में उत्सुकता रखने वाले के नाम की जगह अपना नाम लिखना है और जहां आपका नाम लिखा है वहां मेरा नाम यानि खुशदीप सहगल लिखना है।)

आपका
खुशदीप सहगल