बुधवार, 25 दिसंबर 2013

केजरीवाल एक बार 'OMG' ज़रूर देखें...खुशदीप

आम आदमी पार्टी देश की राजनीति में आई नहीं कूदी है...पार्टी के मुताबिक परंपरागत सियासी दलों ने देश की राजनीति में इतने गढ्डे कर दिए हैं कि उसे इसमें कूदना पड़ा...चलिए अब कोयले की कोठरी में कूद ही गए हैं तो कालिख से बैर कैसा...

अरविंद केजरीवाल की कामयाबी एंटी पॉलिटिक्स की देन है...केजरीवाल राजनीति के गुर सीख गए हैं, इसका संकेत चुनाव प्रचार के दौरान उनके रोड शो पर रवीशकुमार की रिपोर्ट से मिला था... इस रोड शो के दौरान पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता एक जीप पर गुलाब की पंखुरियों के टोकरे साथ लेकर चल रहे थे...यही कार्यकर्ता रोड शो के दौरान अरविंद केजरीवाल के काफिले पर पंखुरियों की बरसात कर रहे थे...ये रोड शो उसी लक्ष्मीनगर क्षेत्र में हुआ था, जहां आप के उम्मीदवार विनोद कुमार बिन्नी ने कांग्रेस के कालजयी माने वाले नेता डॉ अशोक कुमार वालिया को धूल चटा दी...अब ये बात अलग है कि इन्हीं बिन्नी महाराज ने मंत्री ना बनाए जाने पर सबसे पहले बग़ावती तेवर दिखाए...देखना है कि बिन्नी महाराज को मना लिया जाता है या बुधवार को अपने वादे के मुताबिक वो कोई बड़ा धमाका करते हैं...

केजरीवाल की सफलता के ग्राफ पर गौर किया जाए तो कुछ बातों में वो खांटी नेता के तेवर लगातार दिखा रहे  हैं...जैसे कि वो कहते रहे हैं कि ये मेरी लड़ाई नहीं जनता की लड़ाई है...ये मेरी जीत नहीं जनता की जीत है...ठीक वैसे ही जैसे कि नरेंद्र मोदी खुद पर हुए हर राजनीतिक प्रहार को गुजरात के छह करोड़ लोगों की अस्मिता से जोड़ते रहे हैं...या कांग्रेस जिस तरह अपने हाथ को हमेशा आम आदमी के साथ बताती रही है....अरविंद केजरीवाल ने 26 नवंबर 2012 को अन्ना हज़ारे (जिन्हें वो पितातुल्य बताते हैं) के विरोध को दरकिनार कर पार्टी बनाने का ऐलान किया...लगे हाथ ये ऐलान भी कर दिया कि जनता ने उन्हें पार्टी बनाने के लिए कहा है...इसी तरह केजरीवाल चुनाव के बाद बीजेपी या कांग्रेस से किसी तरह का गठजोड़ ना करने की कसमें खाते रहे थे...केजरीवाल ने नतीजे आने के बाद सरकार बनाने के लिए पलटी मारी तो ठीकरा फिर रायशुमारी का नाम देकर जनता के सिर फोड़ दिया...

जिस वक्त ये लेख लिख रहा हूं उस वक्त तक कांग्रेस पसोपेश में है कि आम आदमी पार्टी को सरकार बनाने के लिए बाहर से समर्थन देने का फैसला सही है या नहीं...कांग्रेस समर्थन देती है तो आज नहीं तो कल इसे वापस लेगी ही, ये शाश्वत सत्य है...ऐसे में बड़ा सवाल ये कि जनता की इच्छा का नाम लेकर केजरीवाल अपने उसूलों से क्यों समझौता कर रहे हैं...

ये तो रही आज की बात...लेकिन मैं आपको थोड़ा अतीत की ओर ले चलता हूं...उस वक्त ना तो केजरीवाल राजनीति से जुड़े थे और ना ही इंडिया अगेन्स्ट करप्शन अस्तित्व में आया था...उस वक्त केजरीवाल की सार्वजनिक पहचान सिर्फ सूचना के अधिकार (आरटीआई) की लड़ाई लड़ने वाले संगठन के अगुआ की थी...उस वक्त भी केजरीवाल ने एक ऐसा कदम उठाया था जिस पर प्रख्यात पत्रकार दिवंगत प्रभाष जोशी ने नाराज़गी दिखाते हुए उन्हें सार्वजनिक तौर पर टोका था...इस प्रकरण का ज़िक्र मैंने 11अप्रैल 2011 को अपनी पोस्ट पर इन शब्दों के साथ किया था...

ये सवाल अरविंद केजरीवाल को लेकर है...मैं आरटीआई कानून के वजूद में आने के लिए सबसे ज़्यादा योगदान अरविंद केजरीवाल का ही मानता हूं...उनका बहुत सम्मान करता हूं...लेकिन अतीत में उनका एक कदम मुझे आज भी कचोटता है...2009 में अरविंद केजरीवाल ने आरटीआई में विशिष्ट योगदान देने वालों को सम्मान देने के लिए कार्यक्रम का आयोजन किया था...लेकिन सम्मान जिन्हें दिया जाना था, उन नामों को छांटने के लिए जो नौ सदस्यीय कमेटी या जूरी बनाई गई थी, उसमें एक नाम ऐसे अखबार के संपादक का था जिस अखबार पर चुनाव में पेड न्यूज के नाम पर दोनों हाथों से धन बटोरने का आरोप लगा था...पेड न्यूज यानि भ्रष्ट से भ्रष्ट नेता, बड़े बड़े से बड़ा अपराधी भी चाहे तो पैसा देकर अपनी तारीफ में अखबार में खबर छपवा ले...दिवंगत प्रभाष जोशी जी ने उस वक्त अरविंद केजरीवाल को आगाह भी किया था कि ऐसे लोगों को कमेटी में न रखें...लोगों में क्या संदेश जाएगा कि भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले ही तय करेंगे कि आरटीआई अवार्ड किसे दिया जाए...उस वक्त केजरीवाल जी ने सफाई दी थी कि दबाव की वजह से ये करना पड़ा...ऐसे में क्या गारंटी कि भविष्य में फिर दबाव में ऐसा ही कोई फैसला न लेना पड़ जाए...


उस वक्त की मेरी लिखी बात आज एक बार फिर क्या आपको प्रासंगिक नहीं लग रही...आज मैं अरविंद केजरीवाल को बिन मांगे एक और सलाह देना चाहता हूं...वो एक बार परेश रावल के नाटक पर आधारित फिल्म ओ माई गॉड को ज़रूर देखें...




वैसे तो वो फिल्म धर्म के स्वयंभू ठेकेदारों के खिलाफ थी...जिनके खिलाफ परेश रावल लड़ाई लड़ते हैं....लेकिन आखिर में ऐसी परिस्थिति आती हैं कि परेश रावल को ही भगवान बता कर उनके बुत बनाए जाने लगते हैं...ये कह कर कि मार्केट में बड़े दिनो बाद कोई नया भगवान आया है...लेकिन परेश रावल को ये पता चलता है तो वो खुद ही जनता के बीच आकर अपने बुत तोड़ देते हैं...ये कहते हुए कि धर्म के नाम पर लोगों को झांसा देने वाले जिन स्वयंभू ठेकेदारों के खिलाफ मैं लड़ता रहा, आज मुझे भी उसी बुराई को बढ़ावा देने का ज़रिया बनाया जा रहा है...अरविंद जी, मेरे कहने पर कृपया इस फिल्म को एक बार ज़रूर देखिए... 

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

Symbiosis of केजरीवाल-कांग्रेस?...खुशदीप

पंडित रविशंकर की जुगलबंदी...

द लाइफ ऑफ पाई...

धर्मेंद्र का डॉन्स सीखना...

तीनों अलग-अलग बातें...लेकिन आज तीनों इकट्ठी याद आ गई...वजह बना इकोनॉमिक टाइम्स में आशीष शर्मा का एक आर्टिकल...ये आर्टिकल अरविंद केजरीवाल की दुविधा पर है कि दिल्ली में कांग्रेस का बाहर से समर्थन लेकर सरकार बनाएं या ना बनाएं...

आशीष ने इस संबंध में प्रख्यात सितार वादक पंडित रविशंकर का ज़िक्र किया है...दिवंगत पं. रविशंकर को जीवनपर्यंत ये आलोचना सुनने को मिली कि वो क्यों पश्चिमी संगीतकारों के साथ जुगलबंदी करते रहे...ये भी कहा गया कि ऐसा करके उन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ समझौता किया...पं. रविशंकर इस आलोचना का ये जवाब देते-देते थक गए कि उन्होंने जब कभी पश्चिमी संगीतज्ञों के साथ संगत की, अपने संगीत को कभी नहीं छोड़ा...उलटे पश्चिमी संगीतकारों के लिए उन्होंने खुद ही संगीत तैयार किया...

जो दुविधा पं. रविशंकर को रही, वही क्या आज दिल्ली की सियासी उलझन में अरविंद केजरीवाल को है....सरकार बनाने के बाद वो बेशक अपना भ्रष्टाचार विरोधी संगीत बजाना नहीं छोड़ें लेकिन उन्हें ताना हमेशा सुनने को मिलेगा...ताना कि उन्होंने उस कांग्रेस की बैसाखियों पर सरकार बनाई जिसे वो आम आदमी की परेशानी के लिए दिन-रात कोसते रहे थे...बेशक आप की सरकार बनने पर कांग्रेस उन्हें परेशान ना करे, लेकिन बद से बदनाम बुरा...

चलिए अब बात करते हैं...येन मार्टेल के उपन्यास पर बनी निर्देशक ऑन्ग ली की फिल्म द लाइफ़ ऑफ पाई की...इसमें इरफ़ान, आदिल हुसैन, तब्बू और नवोदित सूरज (सेंट स्टीफंस, दिल्ली का छात्र) ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं...पाई (सूरज) अपने भाई, मां (तब्बू) और पिता (आदिल हुसैन) के साथ पॉन्डिचेरी में रहता है...ज़ू चलाने वाला ये परिवार बेहतर ज़िंदगी की तलाश में कनाडा पलायन करने का फैसला करता है...परिवार पानी के एक जहाज़ पर ज़ू के सारे जानवरों के साथ रवाना होता है...लेकिन जहाज़ तूफ़ान से पलट जाता है...तूफ़ान गुज़र जाने के बाद एक नाव पर पाई के साथ बंगाल टाइगर (बाघ) ही जीवित बचता है...पाई खुले बाघ से पहले बहुत डरता है...बाघ भी उसे नाव पर बर्दाश्त नहीं कर पा रहा होता...लेकिन धीरे-धीरे दोनों जीने की लालसा में साथ रहना सीख जाते हैं...क्या दिल्ली में भी ऐसा हो सकता है...सवाल मुश्किल है...



आखिर में किस्सा धर्मेंद्र का...ये उन्होंने खुद एक बार सुनाया था...वो नए नए ही फिल्मों में आए थे...पंजाब के इस जट्ट को डॉन्स की एबीसी भी नहीं आती थी...धर्मेंद्र ने अपनी इस कमी को पूरा करने के लिए घर पर डॉन्स की ट्यूशन लेने का फैसला किया...घर पर डॉन्स मास्टर ने आना शुरू कर दिया...तीन-चार महीने गुज़रने के बाद धर्मेंद्र पाजी ने तो क्या डॉन्स सीखना था लेकिन उस डॉन्स मास्टर को ज़रूर दारू की लत लग गई थी...

तीनों किस्से आपने सुन लिए...क्या आपकी दिल्ली से कुछ तार जुड़ रहे हैं...



सोमवार, 16 दिसंबर 2013

A,B,C से चुभते सवाल...खुशदीप

पॉलिटिक्स की A,B,C...A यानि AAP, B यानि BJP और C यानि CONGRESS…दिल्ली से निकले जनादेश ने इसी प्राथमिकता में इन तीनों पार्टियों को भाव दिया है...बीजेपी बेशक सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है लेकिन सारी लाइमलाइट केजरीवाल एंड कंपनी पर ही है...जहां तक कांग्रेस की बात है तो 128 साल पुरानी इस पार्टी को दिल्ली के वोटर्स ने मोक्ष देना ही उचित समझा...

केजरीवाल एंड कंपनी पहले अन्ना के पीछे रह कर कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दलों को कोसते थे...अब ये आपस में ही सुलट रहे हैं...खैर छोड़िए इन सब बातों को...दिल्ली के नतीजों से एक बात तो ज़रूर अच्छी निकली...छह दशक से ज़्यादा की इस देश की राजनीति में लोकतंत्र का जो लोक कहीं पीछे छूट गया था वो अब फिर चर्चा में आ गया है...जिससे सबसे ज़्यादा परेशानी तंत्र को ही है...



अब बात देश की सबसे पुरानी पार्टी की...इस पार्टी के युवराज राहुल गांधी अपने घर को नसीहत दे रहे हैं...जुम्मा-जुम्मा जन्मी AAP से लोगों से जुड़ने के तौर-तरीके सीखने की बात कह रहे हैं...कांग्रेस ये बात मान रही है कि मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को कमान सौंपने में देरी हुई...अगर पहले ये काम कर लिया होता तो मध्य प्रदेश में इतनी बुरी गत नहीं बनती...ये कहने के बावजूद लगता है कांग्रेस ने सबक नहीं सीखा...तभी तो पार्टी अध्यक्ष अब भी कह रही हैं कि लोकसभा चुनाव के लिए पीएम पद का उम्मीदवार उपर्युक्त समय पर घोषित किया जाएगा...चुनाव सिर पर हैं और कब उपर्युक्त समय आएगा भाई...

आखिर में ज़िक्र बीजेपी का...चार राज्यों के नतीजों के बाद बीजेपी अब मोदी की रैलियों में उन्हें गेमचेंजर के तौर पर पेश करेगी...अब ये सवाल अलग है कि दिल्ली में मोदी कितना गेम चेंज कर पाए....पांच रैलियों को संबोधित किया, लेकिन इन रैलियों वाली 5 सीटों में से बीजेपी सिर्फ एक सीट ही जीत पाई...एक सवाल बीजेपी से ये भी था कि दिल्ली की तरह मान लीजिए पार्टी लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर भी आई...लेकिन जैसे दिल्ली में बीजेपी मेज़ोरिटी के लिए 4 सीटों को अटक गई, वैसे ही क्या उसे आम चुनाव के बाद भी सहयोगियों के लिए तरसना नहीं पड़ेगा...

देश में राजनीति की इस नई करवट पर 15 दिसंबर को जानो दुनिया न्यूज़ चैनल के फ्रंट पेज कार्यक्रम में एक घंटा बहस हुई...इसमें कांग्रेस के गुजरात प्रवक्ता जयराज सिंह परमार, बीजेपी के सुनील सिंघी और आप पार्टी के संतोष सिंह के साथ मैंने भी हिस्सा लिया...देखिए-सुनिए इस लिंक पर...



बुधवार, 11 दिसंबर 2013

क़यामत के दौर में कांग्रेस...खुशदीप


भंवर में कांग्रेस...चार राज्यों के चुनाव में चारों खाने चित होने के बाद कांग्रेस आत्मावलोकन की बात कर रही है...128 साल पुरानी पार्टी के पोस्टर बॉय राहुल गांधी 12 महीने की नवजात आपसे सबक लेने की ज़रूरत जता रहे हैं...कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि आगे क्या...

अभी तक राहुल और उनकी लैपटॉप चौकड़ी के सामने पार्टी के ओल्ड गार्डस चुप थे...लेकिन अब सवाल उठने लगे हैं...कहा जाने लगा है कि राहुल की लॉन्ग टर्म पॉलिसी के नतीजे जब आएंगे सो आएंगे लेकिन फिलहाल चुनावी राजनीति में बंटाधार हो रहा है...घाघ राजनीतिज्ञ और यूपीए में कांग्रेस के सबसे बड़े सहयोगी शरद पवार ने भी मौका मिलते ही चौका लगा दिया है...कहा है जनता कमज़ोर लीडर्स को पसंद नहीं करती...पवार के मुताबिक बिना मांगे सलाह देने वाले झोला छाप एडवाइज़र्स को सरकार की नीतियां बनाने में तरजीह देना भारी पड़ रहा है...इशारा उनका निश्चित नेशनल एडवाइज़री काउंसिल पर है जिस पर सोनिया गांधी का सबसे ज़्यादा भरोसा बताया जाता है...पवार ने इंदिरा गांधी जैसे स्ट्रॉन्ग नेतृत्व की दरकार जताई है...लेकिन कहां से लाए कांग्रेस इंदिरा जैसी पर्सनेल्टी...



फिलहाल तो इसी बात के लाले हैं कि अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अपना प्रधानमंत्री का उम्मीदवार किसे बनाए...मोदी के मुकाबले में किसे उतारा जाए...चार राज्यों के नतीजों के बाद राहुल करीब-करीब इस दौड़ से बाहर हैं...मनमोहन सिंह को तीसरी बार उतारने का सवाल नहीं...शीला दीक्षित को दिल्ली में आपने निपटा दिया...ए के एंटनी- सुशील कुमार शिंदे की पूरे देश में स्वीकार्यता मुश्किल है...पी चिदंबरम को नार्थ बनाम साउथ पैट्रन पर मोदी के मुकाबले उतारा जा सकता है...लेकिन वो अपनी सीट जीत जाएंगे, इस पर भी शक है...टेक्नोविज़ नंदन नीलेकणी का शिगूफा भी छोड़ा गया है, लेकिन उनका राजनीतिक अनुभव शून्य है..लोकसभा चुनाव से चार-पांच महीने पहले प्रियंका को बागडोर देने का भी सवाल नहीं...ऐसे में कांग्रेस के पास एक ही मज़बूत नाम बचता है और वो है खुद सोनिया गांधी का...क्या वो खुद फ्रंट पर आकर पार्टी को लीड करेंगी...जैसे कि उन्होंने चार राज्यों के नतीजों के बाद मीडिया से बात करते हुए राहुल को अपने पीछे रख कर किया...

सवाल कई हैं...कांग्रेस की दिशा और दशा पर जानो दुनिया न्यूज़ चैनल पर 10 दिसंबर को आज का मुद्दाकार्यक्रम में बहस हुई...बहस में गुजरात महिला कांग्रेस अध्यक्ष सोनल बेन पटेल, राजनीतिक विश्लेषक भूपत भाई के साथ मैंने भी हिस्सा लिया....देखिए इस लिंक पर...







सोमवार, 9 दिसंबर 2013

जवाब दो ‘आप’...खुशदीप

देश की राजनीति करवट ले रही है...दिल्ली के चुनाव में जनता जनार्दन ने उलझा हुआ नहीं बहुत सुलझा हुआ संदेश दिया है...कांग्रेस की उसके करमों के लिए बुरी गत बनाई है...बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी बनाने के बाद भी जताया है कि आप सरकार बनाने के काबिल नहीं है...यानि दोनों पार्टियों के लिए साफ नसीहत है कि आत्मावलोकन करो...खुद को ज़मीन पर लाकर लोगों की मुसीबतों को सही ढंग से समझो...



खैर ये तो रही दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों की बात...लेकिन दिल्ली के इस जनादेश ने सबसे बड़ा लिटमस टेस्ट जनाक्रोश की कोख से जन्मी पार्टी आप के लिए सुनाया है...उसे सरकार बनाने के करीब पहुंचा कर बताया है कि अब ये ज़िम्मेदारी संभालो और परफॉर्म करके दिखाओ... 

आप कांग्रेस या बीजेपी में से किसी से भी बिना शर्त समर्थन ले सकती है...ये साफ़ करते हुए कि वो अपने हिसाब से चलेगी और कोई दबाव नहीं सहेगी...अगर आप के सरकार में अच्छा काम करने के बावजूद बीजेपी या कांग्रेस समर्थन वापस लेती हैं तो जनता उन्हें लोकसभा चुनाव में मुंहतोड़ सबक सिखाएगी...आज की स्थिति में बिना किसी नतीजे पर पहुंचे नए चुनाव की नौबत आती है तो तीनों पार्टियों को इसके लिए ज़िम्मेदार माना जाएगा...

ऐसे में आप से मेरे कुछ सवाल हैं...

 सरकार बनाने की ज़िम्मेदारी से क्यों बचना चाहती है आप ?

क्या आप को खुद भी भरोसा नहीं था कि दिल्ली राज्य में सरकार बनाने के इतने करीब पहुंच सकती है ?

क्या मौजूदा वक्त में आप को विपक्ष की राजनीति ही अधिक सूट कर रही है ?

क्या आप दिल्ली पर एक चुनाव और थोपने में भागीदार बनना चाहती है ?

आप राजनीति में उतरी तो उसे पता था कि सरकार बनाने का दायित्व भी मिल सकता है, फिर इसके लिए उसने क्या विज़न तैयार कर रखा है ?

महंगाई खास तौर पर खाद्यान्न की कीमतों पर लोगों को तत्काल राहत देने के लिए आप के पास क्या उपाय होगा ?

वर्तमान संस्थागत ढांचे में रहते हुए कैसे भ्रष्टाचार पर नकेल कस सकती है आप ?

आपकी क्या रणनीति यही है कि देश भर में परंपरागत राजनीतिक दलों के लिए सब चोर हैंका शोर मचाते हुए अपना आधार बढ़ाया जाए और सब समस्याओं के लिए उनकी सरकारों को ज़िम्मेदार ठहराते हुए खुद को असली विपक्ष के तौर पर प्रेजेंट किया जाए? कम से कम लोकसभा चुनाव तक तो ऐसा ही किया जाए...

लेकिन देश की जनता बड़ी समझंदार है उसने आप को ऐसा मौका दिया है कि वो बीजेपी या कांग्रेस में से किसी का समर्थन लेकर दिल्ली में सरकार बना कर दिखाए...दिखाए कि वो पांच-छह महीने में ही दिल्ली के लोगों को  कितनी राहत देती है...आम आदमी की कितनी सुनवाई होती है...अगर आप कुछ करिश्मा दिखाती है तो उसका देश भर में हाथों-हाथ लिया जाना तय है...

मुझे पता है कि  आप के लिए खुद को सड़क पर संघर्ष करते हुए आम आदमी का मसीहा दिखाना ही ज़्यादा मुफीद होगा...लेकिन जनता जनार्दन का आदेश है कि आप आगे बढ़ो...दिल्ली में फ्रंट पर रह कर लीड करो...सरकार बना कर आम आदमी को वो सब करके दिखाओ जिसकी आंदोलन के दौरान आप परंपरागत पार्टियों से मांग करते थे...वक्त की यही पुकार है...






शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

क्या है नवाज़ का ‘K’ प्लान ?...खुशदीप

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़, नए सेनाध्यक्ष राहिल शरीफ़, रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ़, वित्त मंत्री इशाक डार...सभी खुद को कश्मीरी मूल का बताते हैं...कश्मीर को फ्लैशपाइंट बताते हुए नवाज़ ख्वाहिश ज़ाहिर करते हैं कि उनके जीते-जी कश्मीर भारत से अलग हो जाए...हज़ार ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पर दम निकले...अगले दिन ही नवाज़ खंडन भी जारी करवा देते हैं कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा...प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए देहाती औरत’  का जुमला इस्तेमाल करने के बाद भी ऐसे ही मुकरे थे...नवाज़ इतने शरीफ़ हैं कि जब सत्ता से बाहर होते हैं तो भारत से दोस्ती का दम भरते नहीं थकते...लेकिन सत्ता में आते ही कश्मीर के तराने गाने लगते हैं...कश्मीर के लिए उन्हें ओबामा का दखल और यूएन का प्रस्ताव याद आने लगता है...बाकायदा कश्मीर सेल बनाकर पिछले छह महीने से खुद ही उसकी मॉनिटरिंग कर रहे हैं...जानो दुनिया न्यूज़ चैनल पर 4 दिसंबर को इस मुद्दे से जुड़े अहम सवालों पर चर्चा हुई... 



गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

370 पर 360 डिग्री ?...खुशदीप

धारा 370 पर क्या बीजेपी ने लिया है 360 डिग्री का टर्न?
क्या फिर गठबंधन धर्म के नाम पर बीजेपी ताक पर रखेगी अपने कोर मुद्दे?
क्यों मोदी ने जम्मू में पाकिस्तान, आतंकवाद, अलगाववाद पर नहीं दिया ज़ोर?
केंद्र में सत्ता के साथ ही क्यों रहती है नेशनल कॉन्फ्रेंस?
कश्मीर से कौन शामिल होगा एनडीए में?
इन सब सवालों पर जानो दुनिया न्यूज़ चैनल पर हुई बहस...
देखिए इस लिंक पर-



370 पर 360 डिग्री?

मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

जुर्म देखो, उम्र नहीं...खुशदीप

निर्भया...दामिनी...बिटिया...कुछ भी कहिए 16 दिसंबर गैंग रेप की वारदात को एक साल होने को आ गया....क्या देश की इस बेटी को पूरा इंसाफ़ मिल पाया...बिटिया के पिता दो दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में ये गुहार लेकर पहुंचे कि वारदात के एक नाबालिग दोषी (जो अब बालिग हो चुका है) को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड से सिर्फ तीन साल सुधार गृह में भेजे जाने की सज़ा इंसाफ़ नहीं है...उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2000 को असंवैधानिक करार देकर रद्द करने की मांग की है...सुप्रीम कोर्ट ने जुवेनेलिटी तय करने के मुद्दे पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है...इस संबंध में महिला और बाल विकास मंत्रालय से चार हफ्ते में जवाब मांगा गया है...ये मंत्रालय पहले से ही गंभीर अपराधों के मामले में जुवेनेलिटी की उम्र 18 से घटाकर 16 साल करने पर काम कर रहा है...क्या है देश-विदेश में क़ानून...कैसे यूएऩ कनवेंशन ऑफ चाइल्ड राइट्स ने बांध रखे हैं भारत के हाथ... इस मुद्दे से जुड़े हर सवाल पर जानो दुनिया न्यूज़ चैनल पर दो दिसंबर को आज का मुद्दा में बहस हुई...देखिए इस लिंक पर...




रविवार, 1 दिसंबर 2013

नोटा का सोटा...खुशदीप



नोटा का सोटा....जी हां...हमारे देश के मतदाता हाल में मिले इस अधिकार के बारे में कितना जानते हैं...राजस्थान में आज यानि 1 दिसंबर को वोट डाले जा रहे हैं...दिल्ली में बुधवार को डाले जाएंगे...छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश में पहले ही मतदान निपट चुका है...सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इन चुनावों में पहली बार ईवीएम पर नोटा का प्रावधान किया गया है...नोटा यानि आपको कोई भी उम्मीदवार पसंद ना हो तो आप नोटा (नन ऑफ द अबव) का वोट दबा सकते हैं...लेकिन आज की स्थिति में ये बटन मतदाताओं के हाथ में कोई ताकत नहीं बस अकेडमिक महत्व का है...मान लीजिए किसी चुनाव क्षेत्र में एक लाख वोटर हैं और 99,999 नोटा पर बटन दबा देते हैं, ऐसे में जिस उम्मीदवार को एक वोट मिला है वही विजेता घोषित कर दिया जाएगा...यानि नोटा का नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ेगा...


इसी सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल हुई थी, जिसमें मांग की गई थी कि अगर किसी सीट पर नोटा पर सर्वाधिक राय आती है तो वहां का चुनाव रद्द कर दोबारा मतदान के लिए चुनाव आयोग को निर्देश दिए जाएं...इस याचिका को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फिलहाल ऐसे आदेश नहीं दिए जा सकते...इसके लिए क़ानून में संशोधन की ज़रूरत होगी और ये काम संसद ही कर सकती है...अब राजनेता इस मुद्दे पर क्यों भला गंभीरता दिखाएं...वो क्यों चाहेंगे कि इस वोटकटवा प्रावधान पर लोग जागरूक हों...आखिर कैसे बन सकता है नोटा एक प्रभावशाली सोटा...क्यों इसके शक्तिशाली होने से राजनेताओं को लगता है डर...आखिर चुनाव पर नेता करोड़ों खर्च करते हैं...अगर नोटा से चुनाव निरस्त होने वाला क़ानून बन गया तो उम्मीदवारों को तो लेने के देने पड़ जाएंगे...इन्हीं सब सवालों पर जानो दुनिया न्यूज़ चैनल पर 27 नवंबर को बहस हुई...मेरे साथ बहस में राजनीतिक विश्लेषकों संजय तिवारी और गिरिजा शंकर जी ने हिस्सा लिया....दॆखिए इस लिंक पर...