शनिवार, 30 नवंबर 2013

बिन फेरे हम तेरे...खुशदीप


बिन फेरे हम तेरे...यानि लिव इन रिलेशनशिप...रिश्तों के नए मायने...समाज मान्यता दे या ना दे लेकिन ये है बदले ज़माने की बदली हक़ीक़त...सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि लिव इन रिलेशनशिप ना अपराध है और ना ही पाप...सर्वोच्च अदालत ने ये भी कहा है कि शादी करना या नहीं करना, किसी के साथ इंटीमेट संबंध रखना ये किसी का नितांत निजी मामला है और उसे ऐसा करने की छूट है...





ये बात अलग है कि ऐसे रिश्ते को हमारे देश में समाज की मान्यता प्राप्त नहीं है...सुप्रीम कोर्ट ने 18 साल लिव इन रिलेशनशिप में रहने के बाद पुरुष से संबंध तोड़ने वाली एक महिला के मामले पर फैसला देते वक्त ये सब कहा...ये महिला अपने पूर्व पार्टनर से डोमेस्टिक वॉयलेंस एक्ट के तहत गुज़ारा भत्ता चाहती थीं...सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस महिला के मामले में डीवी एक्ट लागू नहीं हो सकता...क्योंकि इस महिला ने ये जानते हुए भी कि उसका पार्टनर पहले से शादीशुदा है, उसके साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहना कबूल किया...हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही माना कि लिव इन रिलेशनशिप के  टूटने पर सबसे ज़्यादा महिलाओं और इस संबंध से जन्मे बच्चों को भुगतना पड़ता है...सुप्रीम कोर्ट ने इनके हितों की रक्षा के लिए संसद से क़ानून में संशोधन की भी अपील की...इन सब सवालों पर 29 नवंबर को जानो दुनिया न्यूज़ चैनल पर आज का मुद्दा कार्यक्रम में बहस हुई...इसमें मेरे साथ समाजशास्त्री कुसुम कौल और वकील प्रिंस लेनिन भी शामिल रहे...देखिए इस लिंक पर... 

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

बॉस से बचाओ !...खुशदीप

लड़कियों को नौकरी उनकी योग्यता, शिक्षा, काम के प्रति लगन को देखकर मिलती है या इसका कोई और पैमाना होता है...समाजवादी पार्टी के सांसद महोदय नरेश अग्रवाल ने जिस तरह का बयान दिया है, वो शूट द मैसेंजर की थ्योरी को ही सही ठहराता है...जनाब का कहना है कि उनकी पार्टी ने सेक्सुअल हरैसमेंट एक्ट (प्रीवेशन, प्रोहेबेशन, रिड्रैसल) बिल को संसद में पेश करते वक्त ही आशंका जता दी है कि इस क़ानून का दुरुपयोग होगा...नरेश यहीं नहीं रुकते...आगे जोड़ते हैं कि उन्हें सूचना मिल रही हैं कि तमाम अधिकारियों ने ऐसे आरोपों के डर से महिलाओं को असिस्टेंट ही रखना बंद कर दिया है...यानि जनाब को लड़कियों के लिए वर्कप्लेसेज़ को महफूज़ बनाने से ज़्यादा चिंता इस बात की है कि कहीं किसी पुरुष पर कोई गलत आरोप ना लगा दे...ऐसे ही सभी जलते सवालों पर जानो दुनिया न्यूज़ चैनल पर 27 नवंबर को आज का मुददा कार्यक्रम में बहस हुई...मैंने भी अपने विचार रखे...इस लिंक पर आप भी देखिए....




गुरुवार, 28 नवंबर 2013

मोहे ऐसा ना जनम दीजो...खुशदीप

एक बच्चा इस दुनिया में किसके साथ सबसे सुरक्षित महसूस करता है, अपने मां-बाप के पास...लेकिन मां-बाप ही अपनी लाडली के कत्ल के दोषी करार दिए जाएं...वो लाडली जिसे पांच साल के फर्टिलिटी ट्रीटमेंट के बाद पाया हो...यहां कत्ल सिर्फ एक बच्ची का नहीं बल्कि उस भरोसे का भी हुआ है, जो हर जन्मदाता पर किया जाता है...मां-बाप अति व्यस्त हैं तो यही अपनी ज़िम्मेदारी ना पूरी समझे कि बच्चों को मोटी पॉकेट मनी या महंगे गिफ्ट देकर ही ज़िम्मेदारी खत्म हो जाती है...बच्चों को खासा वक्त देने की भी ज़रूरत होती है...आप समझ सकें कि बच्चे के मन में क्या चल रहा है...कहीं उसकी दिशा गलत तो नहीं...मेरे लिए आरुषि मर्डर केस देश की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री से ज़्यादा पेरेंटिंग फेल्योर का मामला है...जानो दुनिया न्यूज़ चैनल पर इसी मु्द्दे पर हुई बहस...

         

मोहे ऐसा जनम ना दीजो...




मंगलवार, 26 नवंबर 2013

भारत रत्न से जुड़े सवाल...खुशदीप

कांग्रेस में नेहरू और इंदिरा गांधी ने खुद पीएम रहते हुए अपना नाम भारत रत्न के लिए नामांकित कराया...सचिन को ये सम्मान देने का श्रेय कांग्रेस खुद ले रही है...बीजेपी वाजपेयी को भारत रत्न देने की मांग कर रही है, लेकिन 2008 में आडवाणी के ये मांग उठाने के बाद संघ के मुखपत्र पांचजन्य में संपादकीय छपा था कि अगर देश में भारत रत्न पर पहला हक़ बनता है तो वो है शहीद भगत सिंह का...फिर इंडियन सोल्जर का...उस लेख में कहीं वाजपेयी का ज़िक्र नहीं था...सरदार पटेल को 1991 में भारत रत्न मिला...बीजेपी का कहना है कि पटेल को ये सम्मान देने में इतनी देर क्यों की गई...लेकिन बीजेपी ये क्यों भूल जाती है कि जब 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी थी तो बीजेपी (तत्कालीन जनसंघ) उसका हिस्सा थी...तब क्यों नहीं दिया गया था पटेल को भारत रत्न...हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के बेटे अशोक ध्यानचंद का कहना है कि वो खुद ध्यानचंद पर एक किताब लिखेंगे जिसमें वो अपने परिवार के दर्द को बयां करेंगे...ये सभी कुछ शामिल रहा जानो दुनिया न्यूज़ चैनल के फ्रंट पेज प्रोग्राम की इस कड़ी में...बीजेपी प्रवक्ता जयनारायण व्यास और कांग्रेस प्रवक्ता जयराज सिंह परमार के साथ मैं भी रहा इस बहस का हिस्सा...


भारत रत्न से जुड़े सवालों पर ज्वलंत बहस


सोमवार, 25 नवंबर 2013

आरुषि...भोर के आकाश की लालिमा...खुशदीप

आरुषि...सभी को इंतज़ार है अदालत के फैसले का...

11 फरवरी 2011 को आरुषि पर एक पोस्ट लिखी थी...आरुषि, जिसे आप नहीं जानते...

आज उसी को दोहराने का मन कर रहा है...

आरुषि जिसे आप नहीं जानते...खुशदीप

Posted on 
  • Friday, February 11, 2011
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  • Khushdeep Sehgal
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  • आरुषि यानि सूरज के उगने से ठीक पहले आकाश की लालिमा...ऐलान करती अंधेरे के छटने का और उजाले के छाने का...क्या आरुषि के लिए इनसाफ़ की कहानी में भी ऐसा होगा...


    आरुषि तलवार को नज़दीक से कोई जानते थे तो वो नोएडा के डीपीएस स्कूल में उसके क्लासमेट ही थे...आरुषि के चरित्र को लेकर यूपी पुलिस के ज़रिए पहली बार जो कहानी सामने आई थी उसे आरुषि के स्कूल के दोस्तों ने पहले दिन ही नकार दिया था...वो अच्छी तरह जानते थे कि सभी को ज़िंदादिली का संदेश देने वाली उनकी आरुषि कभी ऐसा काम नहीं कर सकती थी जो उसके आत्मसम्मान को कचोटे...यही वजह है कि आरुषि को लेकर जब तरह तरह की बातें फैल रही थीं तो उसके स्कूल के दोस्त एक बगीचे का नाम आरुषि पर रखने की सोच रहे थे...

    आरुषि का सबसे बड़ा शौक था जैज़ डांस...आरुषि कभी भी स्कूल के गलियारों में पैरों के अंगूठों पर 360 डिग्री के एंगल पर स्पिन करती देखी जा सकती थी...दोस्तों को भी बैले का ये स्टेप सिखाना आरुषि को बड़ा अच्छा लगता था...नौंवी क्लास में पढ़ने वाली सबसे पॉपुलर स्टूडेंट्स में से एक आरुषि ब्लेज़र स्कॉलर भी रही यानि तीन साल उसने लगातार पढ़ाई में अस्सी-नब्बे फीसदी से ज़्यादा मार्क्स लिए...वो आरुषि जिसे आम बच्चों की तरह ही टीचर्स और कपड़ों के बारे में गॉसिप करना बड़ा अच्छा लगता था...वो आरुषि जिसे अपने अच्छे-बुरे की पूरी समझ थी...खुशहाल परिवार की आरुषि आम बच्चों की तरह ही कैमरे, आधुनिक मोबाइल और छुट्टियों में बाहर घूमने जाने जैसी फरमाइशें घरवालों से किया करती थी..


    तलवार दंपती ने दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में पांच साल तक चले फर्टिलिटी ट्रीटमेंट के बाद इकलौती संतान के तौर पर आरुषि को पाया था...साउथ दिल्ली में 24 मई 1993 को जन्मी आरुषि की अच्छी तरह परवरिश हो सके, इसीलिए दिल्ली के हौज़खास से नोएडा के जलवायु विहार (सेक्टर 25) में आकर रहने का फैसला किया..इसकी सबसे बड़ी वजह आरुषि की नानी लता वहीं पास में रहती थीं और तलवार दंपती के काम पर रहने के दौरान आरुषि की देखभाल कर सकती थीं...आरुषि को स्कूल के लिए ज़्यादा दूर नहीं जाना पड़े इसलिए डेढ़ किलोमीटर के फासले पर ही दिल्ली पब्लिक स्कूल में उसका एडमिशन कराया गया...

    आरुषि के दुनिया से दूर जाने की असल वजह पर बेशक अभी कुहासा छाया है लेकिन आरुषि के स्कूल के दोस्तों को विश्वास है कि एक न एक दिन ये छटेगा ज़रूर...और उस दिन आरुषि तारा बनकर आसमान में जहां भी होगी अपने दोस्तों को खास स्माइल ज़रूर देगी...पैरों के अंगूठे पर स्पिन करती हुई...
     
     

    शनिवार, 23 नवंबर 2013

    मुआवज़े का मज़हब?...खुशदीप


    क्या मुआवज़े का भी कोई मज़हब होता है ? समाजवादी पार्टी की सरकार को सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद ही अधिसूचना में सुधार करने की याद क्यों आई कि राहत और पुनर्वास में सभी पीड़ितों को समान रूप से देखा जाना चाहिए? बीजेपी भी कटघरे में है कि मुज़फ्फरनगर हिंसा के आरोपी विधायकों का सार्वजनिक मंच से सम्मान क्यों ? इन सभी सवालों पर जानो दुनिया न्यूज़ चैनल पर आज का मुद्दा में हुई बहस...इसे इस लिंक पर देख सकते हैं....मुआवज़े में भेदभाव पर बहस http://janoduniya.tv/aajkamudda/supreme-court-slams-samajwadi-party-government-orders-to-compensate-all-in-muzaffarnagar-riots/201330362

    सोमवार, 18 नवंबर 2013

    सोचो क्या पाया इन्सां होके...खुशदीप





    गुगल ने एक एड जारी किया  है...किस तरह बंटवारे के वक्त बिछड़े दो दोस्त गूगल सर्च की  मदद से मिल जाते हैं...इसके लिए पहल करती है एक दोस्त की बेटी....पोस्ट के नीचे गूगल के आभार से वो वीडियो डाल रहा हूं...एक बार ज़रूर देखिए...


    पंछी, नदियाँ, पवन के झोंके,
    कोई सरहद ना इन्हें रोके,
    सरहद इंसानों के लिए है,
    सोचो, 

    तुमने और मैंने, 
    क्या पाया इन्सां होके...

    जो हम दोनों पंछी होते, तैरते हम इस नीले गगन में, पंख पसारे,
    सारी धरती अपनी होती, अपने होते, सारे नज़ारे,
    खुली फिजाओं में उड़ते,
    अपने दिलों में हम सारा प्यार समो के,
    पंछी, नदियाँ, पवन...

    जो मैं होती नदिया और तुम पवन के झोंके, तो क्या होता,
    पवन के झोंके नदी के तन को जब छूते हैं,
    लहरें ही लहरें बनती हैं,
    हम दोनों जब मिलते तो कुछ ऐसा होता,
    सब कहते ये लहर-लहर जहाँ भी जाएं, इनको ना, कोई टोके,
    पंछी, नदियाँ, पवन...


    (ये वीडियो देखिए, दावा है कि बार-बार देखने के बाद भी जी नहीं भरेगा) 


    (साभार गूगल )

    शनिवार, 16 नवंबर 2013

    भारत रत्न मेकर हैं राहुल गांधी...खुशदीप

    राहुल गांधी जी शुक्रिया...जैसे कुछ लोग किंग नहीं किंगमेकर होते हैं...वैसे ही आप भारत रत्न नहीं, भारत रत्न मेकर हैं...आप सचिन तेंदुलकर का विदाई टेस्ट देखने मुंबई जाते हैं...दिल्ली लौटते हैं...मम्मा से बात करते हैं...प्रधानमंत्री से बात करते हैं...और एक दिन में सचिन को भारत रत्न देने का ऐलान हो जाता है..


    .और ये सब जानकारी दुनिया को और कोई नहीं, आप के ही एक सिपहसालार राजीव शुक्ला देते हैं...राजीव शुक्ला जी की बात पर विश्वास ना करने का कोई मतलब ही नहीं...राजीव शुक्ला अकेले शख्स हैं जो पॉलिटिक्स, क्रिकेट और बॉलीवुड में एकसाथ टॉप पावर सेंटर्स के साथ नज़दीकी रखते हैं...अब पॉलिटिक्स में सोनिया-राहुल हों या बॉलीवुड में शाहरुख ख़ान या फिर क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर (श्रीनिवासन और शरद पवार को छोड़िए ना)...भई बात हैं बंदे में...ना जाने क्या घुट्टी पिलाते हैं कि हर कोई इनका मुरीद हो जाता है...

    राजीव जी सचिन के राज्यसभा पहुंचने का किस्सा भी एक दो दिन पहले बड़े चाव से मीडिया को सुना रहे थे...कैसे सोनिया गांधी ने सचिन को राज्यसभा में लाने की इच्छा जताई...और कैसे उन्होंने राजीव शुक्ला को सचिन से उनकी इच्छा पूछने के लिए कहा....राजीव शुक्ला ने पूछा और सचिन राज्यसभा में जाने के लिए तैयार हो गए...

    राजीव शुक्ला आज सचिन को भारत रत्न दिए जाने के बाद यूपीए सरकार का शुक्रिया करना भी नहीं भूले...गोया सचिन को देश का ये सबसे बड़ा नागरिक सम्मान क्रिकेट में उनके योगदान के लिए नहीं बल्कि कांग्रेस आलाकमान की कृपा से दिया जा रहा हो...

    चलिए भारत रत्न पर राजनीति की बात हो गई...अब एक मुद्दे की बात...

    सचिन ने 24 साल क्रिकेट, भारत और भारतवासियों को बहुत कुछ दिया...उन्होंने ना जाने कितनी बार अपने खेल से देश के सवा अरब नागरिकों को छाती चौड़ी करने का मौका दिया...दुनिया को अहसास कराया कि भारत के लोग भी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ होने का माद्दा रखते हैं...एक छोटा सा उदाहरण है जब सचिन 15 नवंबर 1989 को पहली बार भारत की टेस्ट कैप पहन कर पाकिस्तान के खिलाफ मैदान में उतरे थे तो उस वक्त अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट प्रबंधन में बीसीसीआई को कोई घास तक नहीं डालता था...और आज 16 नवंबर 2013 को  सचिन ने क्रिकेट को अलविदा कहा है तो बीसीसीआई पैसे से इतना ताकतवर है कि जब चाहे आईसीसी की बांह मरोड़ सकता है...

    सचिन ने हम लाखों भारतीयों के लिए अनगिनत बार खुश होने, नाचने-झूमने के लिए ज़मीन तैयार की...सब का ढाई दशक तक भरपूर मनोरंजन किया...SACH  ENTERTAINMENT...सचिन जैसे बल्ले से रनों का तूफ़ान निकालते थे ठीक आज वैसे ही जाते-जाते उन्होंने सीधे दिल से निकली आवाज़ से जज़्बात का सुनामी ला दिया...पहली बार सचिन के मुंह से लोगों ने सुना कि वो गुरु, पिता, मां, पत्नी, बच्चों, भाई, बहन और अन्य करीबियों के लिए क्या भावनाएँ रखते हैं...सचिन के लिए किसने क्या क्या बलिदान दिए...आखिरी बार पिच को चूमकर मैदान से बाहर जाते हुए सचिन की आंख से छलके दो आंसू पूरे देश को रुलाने के लिए काफ़ी थे...



    सचिन आप भारत रत्न के हर मायने से हक़दार हैं...ये विडंबना है कि आज़ादी के इतने साल भारत सरकार ने भारत रत्न दिए जाने के लिए खेल के क्षेत्र को भी उपयुक्त पाया है...ऐसा ना होता तो हॉकी के जादूगर दद्दा (मेजर ध्यानचंद) को ये सम्मान कब का मिल गया होता...



    बेहतर तो यही होता कि सचिन के साथ ही दद्दा को भी भारत रत्न देने का ऐलान होता...ऐसा नहीं हुआ...सचिन नियति ने आप का भारत रत्न बनने वाला पहला खिलाड़ी होना तय कर रखा था...वैसा ही हुआ...लेकिन सचिन अब आप से अपील है...आप खुद ही दद्दा को भारत रत्न जल्दी से जल्दी दिए जाने के लिए मुहिम छेड़ें...यकीन मानिए इससे आपका कद हर भारतीय की नज़र में और ऊंचा हो जाएगा...


    खैर ये तो रही खेल और भारत रत्न की बात...अब एक सवाल...लाखों लोगों को खुशी देने वाले सचिन के साथ न्याय हुआ...लेकान एक ऐसा शख्स जिसने अपने दम पर लाखों भारतीयों की ज़िंदगी बदल दी, स्वावलंबन के ज़रिए उनके घरों में खुशहाली ला दी...क्या वो शख्स भारत रत्न पाने का हक़दार नहीं है...इस शख्स का नाम है डॉ वर्गिस कुरियन...भारत में श्वेत क्रांति के जनक...अगली कुछ पोस्टों में आपको डॉ वर्गिस कुरियन की पूरी कहानी बताने की कोशिश करूंगा...


    गुरुवार, 14 नवंबर 2013

    झुग्गी वाले करें तो साला करेक्टर ढीला...खुशदीप


    उम्र गुज़र जाती है इक घर बनाने में,
    उन्हें शर्म नहीं आती बस्तियां जलाने में...

    किसी का घर उजाड़ा जाता है, तो हर किसी को दर्द होता है...मुंबई के पॉश इलाके वर्ली की कैम्पा कोला सोसायटी पर बुलडोजर पहुंचा तो वहां रहने वालों बाशिंदों का दर्द पूरी दुनिया ने महसूस किया...न्यूज़ चैनलों ने वहां हर लम्हे को कैद किया...लंबी लंबी बहसों का प्रसारण किया गया...लब्बो-लुआब यही रहा कि बिल्डर्स और भ्रष्ट अफसरों के ग़लत काम की सज़ा सोसायटी के फ्लैट-धारकों को क्यों दी जाए...



    निशाने पर सिर्फ 96 फ्लैट थे...लेकिन सोसायटी ने मीडिया और सोशल मीडिया के साथ अपने हक़ में ज़बरदस्त दबाव बनाया...खैर, आज सुबह कुछ देर टकराव के बाद कैम्पा कोला सोसायटी के बाशिंदों के लिए दिल्ली से अच्छी ख़बर आ गई....सुप्रीम कोर्ट ने सात महीने यानि 31 मई 2014 तक डिमोलिशन की कार्रवाई से बीएमसी (ब्रह्नमुंबई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन) को रोक दिया...इस राहत से सभी खुश दिखाई दिए...वहां रहने वाले बाशिंदे भी...क्रेडिट लूटने की हर वक्त फिराक में रहने वाले राजनेता भी...और मीडिया भी...तेवर यही रहे कि सोसायटी के अवैध तौर पर बने फ्लैट्स को आखिरकार एक दिन रेगुलराइज़ करना ही पड़ेगा...

    लेकिन अब तस्वीर को ज़रा घुमा कर देखिए...कैम्पा कोला सोसायटी को एक मिनट के लिए भूल जाइए....शहर में अवैध तौर पर बनी एक झुग्गी झोपड़ी बस्ती (स्लम) को जेहन में लाइए...अगर बुलडोजर इस बस्ती को उजाड़ने पहुंचता तो क्या होता...क्या वही होता जो आज कैम्पा कोला सोसायटी में हुआ...सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश के बावजूद डिमोलिशन दस्ता ऐसे ही खाली हाथ लौट जाता जैसे आज लौटा...क्या झुग्गियों में रहने वाले दर्द को ऐसे ही नेशनल न्यूज़ चैनलों के माध्यम से घर-घर पहुंचाया जाता...ऐसे ही दबाव बनाया जाता...मुझे शक़ है ऐसा होता...दिल पर हाथ रख कर बताइए क्या इन झुग्गी-झोपड़ियों को हम शहर के सीने पर पैबंद नहीं मानते...प्रशासन को कोसते नहीं कि आखिर क्यों इनके अवैध अतिक्रमण पर हथौड़ा नहीं चलाया जाता...सुविधा के लिए हर झुग्गी झोपड़ी वाले को बांग्लादेशी घुसपैठिया भी करार दे दिया जाता है...

    चलिए फिर लौटते हैं कैम्पा कोला सोसायटी पर...ये कहानी शुरू होती है 17 जून 1972 को...उस वक्त प्योर ड्रिंक्स लिमिटेड को डेढ़ लाख स्क्वायर फीट का प्राइम टाइम प्लॉट एक रुपये की लीज़ पर दिया गया था...1980 में कंपनी को प्लॉट पर स्टॉफ के क्वार्टर बनाने के नाम पर रेज़ीडेशियल यूज़ के लिए बीएमसी से अनुमति मिल गई...प्लॉन अप्रूव कराए बिना ही कंपनी ने बिल्डर के साथ मिलकर प्लॉट पर कई मल्टीस्टोरी टॉवर खड़े कर दिए... नवंबर 84 में स्टाप वर्क का नोटिस भी जारी हुआ...लेकिन पेनल्टी भरने के बाद दोबारा काम शुरू हो गया...

    दरअसल पांच मंजिला निर्माण की अनुमति के बावजूद इससे कहीं ज़्यादा फ्लोर्स खड़े कर दिए गए...दो टॉवर में तो 17 से 20 फ्लोर खड़े कर दिए गए....कुल मिलाकर 35 फ्लोर को अवैध माना गया... निर्माण पूरा होने के बाद फ्लैट के खरीदार उनमें रहने भी लगे लेकिन उन्हें वैधता के लिए ज़रूरी ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट नहीं मिले...रेज़ीडेंट्स का कहना है कि वो 1999 में पानी के कनेक्शन के लिए बीएमसी से मांग करने गए तो उन्हें पहली बार सोसायटी के फ्लैट्स के अवैध होने का पता चला...2005 में रेज़ीडेंट्स पानी के कनेक्शन और रेगुलराइज़ेशन के लिए कोर्ट गए...कोर्ट ने म्युनिसपल कमिश्नर से निश्चित अंतराल में कार्रवाई करने के लिए कहा...म्युनिसपल कमिश्नर ने राहत की जगह पांच मज़िल से ऊपर वाले फ्लोर्स के फ्लैट्स को गिराने का नोटिस जारी कर दिया...

    निचली अदालत में विपरीत फैसला आने के बाद रेज़ीडेट्स 2011 में हाईकोर्ट में भी केस हार गए...फरवरी 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने भी फ्लैट्स को रेगुलराइज़ करने से मना कर दिया...27 अप्रैल 2013 को बीएमसी ने 48 घंटे में अवैध फ्लोर खाली करने का आदेश दिया...उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने रेज़ीडेंट्स को हटने के लिए 5 महीने की मोहलत दी...एक अक्टूबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध निर्माण को खाली कराने और गिराने के लिए 11 नवंबर 2013 तक की तारीख तय की...लेकिन 12 नवंबर को बीएमसी के अधिकारी अवैध निर्माण खाली कराने के लिए पहुंचे तो रेज़ीडेट्स डट गए...महिलाओं ने आगे रह कर मोर्चा संभाला...बात एक दिन के लिए टल गई...बुधवार सुबह डिमोलिशन दस्ते ने सख्ती से काम लेते हुए सोसायटी कंपाउंड के तालाबंद गेट को गिरा दिया...साथ ही रेजीडेंट्स पर बल का भी प्रयोग किया...ये सब चल ही रहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने स्वत ज्ञान लेते हुए सात महीने तक बीएमसी की कार्रवाई पर रोक लगा दी....

    ये तो रहा अब तक का घटनाक्रम...अब आते हैं असली सवालों पर...

    क्या इन 96 फ्लैट्स को खाली कराने और गिराने के लिए ये कार्रवाई अचानक ही शुरू हुई...क्या रेज़ीडेट्स को इसका पहले से गुमान तक नहीं था....तो जनाब इसका जवाब ये है कि नवंबर 1984 में ही निर्माण रोकने के लिए स्टाप वर्क नोटिस जारी हो गया था...यानि 29 साल पहले ही ये जाहिर हो गया था कि निर्माण अवैध ढंग से हो रहा है...एक आर्किटेक्ट का कहना है कि क्या रेज़ीडेंट्स और क्या नेता सभी को पता था कि स्टाप वर्क नोटिस के बावजूद निर्माण हो रहा है....वाटर सप्लाई और ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट ना होने पर भी फ्लैट के खरीदार सोसायटी के सदस्य क्यों नहीं सचेत हुए...

    निचली अदालत ने पाया कि आर्किटेक्ट ने बिल्डर-डवलपर को बार-बार चेताया कि सेंक्शन्ड प्लान से अलग निर्माण अवैध है...हाउसिंग सोसायटी के सदस्य भी इस तथ्य से अवगत रहे...

    हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत से सहमति जताई कि सोसायटी के सदस्यों को ये अच्छी तरह मालूम था कि उनके फ्लैट सैंक्शन्ड प्लान को ताक पर रख कर बनाए गए थे...

    फरवरी 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने भी अवैध निर्माण को खाली कराने और गिराने पर अपनी मुहर लगा दी...सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में खास तौर पर राज्य सरकार को वो करने से मना किया, जिसकी रेज़ीडेंट्स मांग कर रहे हैं...इनकी मांग है कि राज्य सरकार अध्यादेश के ज़रिए उनके फ्लैट्स को रेगुलराइज़ कर दे...

    सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा था...

    दुर्भाग्य से बार-बार इस कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों के बावजूद बिल्डर्स और अन्य प्रभावशाली लोग निर्माण गतिविधियों में लगे हैं, ये वो लोग हैं जिन्होंने रेगुलेटरी मैकेनिज्म के प्रति वर्षों से नगण्य सम्मान दिखाया है...जिन्हें सरकारी ढांचे से शह और समर्थन मिलता रहा है...जैसे और जब भी अदालतों ने आदेश जारी किए हैं, स्थानीय और अन्य संस्थानों के अधिकारियों ने शहरों के सुनियोजित विकास के लिए कानून का अमल कराने के लिए अवैध निर्माण गिराने के आदेश जारी किए हैं तो सत्ता में बैठे लोग गलत काम करने वालों के बचाव में आगे आ जाते हैं...प्रशासनिक आदेश जारी कर दिए जाते हैं या फिर दया या मुश्किलात का हवाला देते हुए अनियमित और अनाधिकृत निर्माण को नियमित करने के नाम पर क़ानून बना दिए जाते हैं...ऐसे काम शहरी क्षेत्रों के योजनागत विकास की अवधारणा को ऐसा नुकसान पहुचाते हैं कि जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती...

    निचोड़ ये है कि वर्षों की क़ानूनी लड़ाई के बाद सर्वोच्च अदालत तक से अवैध निर्माण को खाली कराने और गिराने पर मुहर लग गई...यही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ये भी साफ किया कि रेज़ीडेट्स अब किसी एजेंसी से किसी राहत के लिए अप्रोच ना करे...सुप्रीम कोर्ट ने रेज़ीडेंट्स की तरफ से पेश हुए दिग्गज वकील अभिषेक मनु सिंघवी की इस दलील को नहीं माना कि बिल्डर की ओर से अवैध निर्माण किए जाने का दंड रेज़ीडेंट्स को दिया जा रहा है...

    सुप्रीम कोर्ट इसी नतीजे पर पहुंचा कि रेज़ीडेंट्स जानते थे कि आर्किटेक्ट ने जो रिवाइज्ड प्लान जमा कराया था वो प्लानिंग अथॉरिटी से अप्रूव नहीं था...डवलपर की ओर से रेज़ीडेंट्स को ये भी बता दिया गया था कि रिवाइज्ड प्लान के खारिज होने के क्या परिणाम हो सकते हैं...ऐसे हालात में इस नतीजे से बचा नहीं जा सकता कि रेज़ीडेंट्स ने जानने के बावजूद ऐसे फ्लैट्स लिए जिनका बिल्डर-डवलपर ने अवैध ढंग से निर्माण किया था...

    सवाल यहां सुप्रीम कोर्ट के आदेश के सम्मान का भी है...फरवरी में फैसला आने के बाद भी रेज़ीडेंट्स लगातार अपने अवैध निर्माण को बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं...मुख्यमंत्री से वही मांग की जा रही है जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने मना कर रखा है...इलाके के कांग्रेसी सांसद और केंद्र सरकार में मंत्री मिलिंद देवड़ा के लिए कैंपा कोला सोसायटी के समर्थन में आगे आना मजबूरी है...क़ानूनी जटिलताओं को जानते हुए भी वो ऐसा आभास देने की कोशिश करते दिखे कि वो अपनी ही पार्टी की राज्य सरकार से भी इस मुद्दे पर लोहा लेने को तैयार है...सियासत का ही ये रंग है कि बीजेपी के नेता भी इस मौके को भुनाने की कोशिश मे दिखे...साथ ही बीएमसी में जिस शिवसेना का परचम है, उसके मेयर भी कैंपा कोला सोसायटी के लोगों के साथ एकजुट दिखे...अब भले ही बीएमसी को अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई करनी है...

    सवाल ये भी है कि अवैध निर्माण को लेकर कैंपा कोला सोसायटी जैसा ही स्पेशल ट्रीटमेंट स्लम्स में रहने वालों को क्यों नहीं मिलता...2004 और 2005 में मुंबई में लाखों झुग्गियां हटाई गई थीं...



    दिल्ली जैसे महानगर में अवैध कॉलोनियों को नियमित करने में चुनावी फायदे का खेल किसी से छुपा नहीं है...यही सब होना है तो फिर प्लान्ड सिटी के दिखावे ही क्यों किए जाते हैं...अब अगर अध्यादेश लाकर महाराष्ट्र सरकार कैंपा कोला सोसायटी के अवैध निर्माणों को वैधता देती है...तो क्या ऐसी ही ना जाने कितनी और अवैध निर्माण वाली सोसायटी आगे आकर अपने लिए भी ऐसे ही ट्रीटमेंट की मांग करने नहीं लग जाएंगी...

    सौ बातों की एक बात...क्या सुप्रीम कोर्ट से अंतिम फैसला आने के बाद भी दबाव के ज़रिए उसे पलटने की कोशिशों को जायज़ ठहराया जा सकता है...




    शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

    खुला पत्र मोदी के नाम...खुशदीप


    प्रिय नरेंद्र भाई जी मोदी,

    सादर प्रणाम

    जानता हूं कि आप इस समय राजनीतिक करियर के सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव पर हैं...ऐसे में आपकी व्यस्तता किसी से छुपी नहीं है...गुजरात की बागडोर, पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव, मिशन दिल्ली 2014...ज़ाहिर है आप पूरे तन-मन-धन से इस प्रयास में लगे हैं कि आपकी पार्टी बीजेपी को उसका खोया हुआ जनाधार वापस मिल जाए और दिल्ली में एक बार फिर एनडीए की सरकार बने...ये आपका प्रताप है या संयोग आपको राजनीति ने ऐसे मोड़ पर ला दिया है कि बीजेपी और आपका नाम पर्यायवाची हो गया है...अब पूरे देश में चुनाव में आपकी पार्टी के लिए अच्छे या बुरे जो भी नतीजे आएंगे, उन्हें आप से ही जोड़ कर देखा जाएगा...जानता हूं कि आप ऐसी चुनौतियों को पसंद करते हैं...ऐसे मुश्किल दौर में मेरी पूरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं...

    मैं नहीं जानता कि आपको ये पत्र पढ़ने के लिए दो पल मिलेंगे भी या नहीं...लेकिन फिर भी मैं अपनी तरफ़ से कोशिश कर रहा हूं...मैं चुनावी रैलियों के अलावा दूसरे मंचों पर भी आपके संबोधन लगातार सुन रहा हूं...आप अच्छे वक्ता हैं, ये किसी से छुपा नहीं हैं...आप पूरी तरह अपडेट रहते हैं कि आपके विरोधी कहां-कहां, क्या-क्या बोलते हैं...आप फिर अपनी खास शैली में विरोधियों पर शाब्दिक प्रहार करते हैं...समझ सकता हूं कि चुनाव रैलियों में जनता को बांधे रखने के लिए ये सब करने की आवश्यकता होती है...एक नेता के लिए ये करना ज़रूरी भी है...आपके रणनीतिकार अच्छी तरह जानते होंगे कि कब, कहां, क्या कहने से चुनावी लाभ-हानि हो सकते हैं...लेकिन मेरा सवाल ये है कि क्या ये सब आपको विशुद्ध नेता के खांचे में ही सीमित नहीं रखेगा...फिर आप दूसरे नेताओं से अलग कैसे नज़र आएंगे...

    आपकी कोशिश दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का अगुआ बनने की है...ऐसे में मनसा-वाचा-कर्मणा आप दुनिया को एक खांटी नेता नहीं बल्कि सबको साथ लेकर चलने वाले स्टेट्समैन दिखने चाहिएं...इस दिशा में अटल बिहारी वाजपेयी से अच्छा रोल-मॉडल आपके लिए कौन हो सकता है...मुझे याद नहीं पड़ता कि वाजपेयी कभी अपने विरोधियों पर बिलो द बेल्ट प्रहार करते थे...वो कुछ सुनाना भी होता था तो छायावाद का सहारा लेते थे...ये वाजपेयी जी की ही कविता है...

    हे प्रभु !
    मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना,
    कि मैं गैरों को गले लगा ना सकूं...


                                     
    आज देश आपकी तरफ देख रहा है...अगर भारत को दुनिया में महाशक्ति बनाना है तो अल्पकालिक राजनीतिक लाभों की चिंता छोड़कर दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देनी होगी...ऐसे में सिर्फ विरोध के लिए किसी का विरोध खांटी नेताओं की शैली हो सकता है, लेकिन एक स्टेट्समैन से इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जा सकती...हमने इसी देश में नेहरू को सार्वजनिक तौर पर युवा वाजपेयी की ओजस्वी वाणी की तारीफ़ करते देखा...इसी देश में हमने 1971 के युद्ध के बाद वाजपेयी को इंदिरा गांधी को दुर्गा कहते हुए देखा...स्टेट्समैन इसी मिट्टी के बने होते हैं...

    मोदी जी, आप भी इस ओर ध्यान दीजिए...इस सवाल पर भी सोचिए कि आज देश का कोई नौनिहाल क्यों किसी नेता को अपना रोल-मॉडल नहीं मानता...क्यों उन्हें अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर, ए आर रहमान में ही अपने आदर्श नज़र आते हैं...क्यों आज नेताओं में लोगों को नायक कम खलनायक ज़्यादा नज़र आते हैं...क्यों आज के राजनीतिक परिदृश्य पर ये गाना सटीक बैठता है...

    जिन्हें नाज़ है हिंद पर, वो कहां हैं, कहां हैं, कहां हैं....

    मोदी जी, आप के व्यक्तित्व की छाप तब और ज़्यादा गहरी होगी जब आप विरोधियों की तारीफ़ करते हुए अपनी बात कहें...मसलन राहुल गांधी के लिए आप कह सकते हैं कि वो दीन-दुखियारों के घरों में कभी-कभार जाकर उनका दुख जानते हैं, अच्छी बात है...उन्हें कुछ पल के लिए अहसास होता है कि लोगों को किस हालात में गुज़ारा करना पड़ता है...लेकिन राहुल जी, इस दर्द को कुछ मिनटों या कुछ घंटों में नहीं समझा जा सकता...इस मर्म को वही अच्छी तरह जान सकता है जो खुद इन हालात से भी गुज़रा हो...जो बचपन में खुद ट्रेन में चाय बेच-बेच कर परिवार का सहारा बना हो...

    राष्ट्रधर्म और राजधर्म की राह पर मोदी जी आपको देश के हर नागरिक को ये विश्वास दिलाना भी ज़रूरी है-

    छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी
    नए दौर में लिखेंगे, मिल कर नई कहानी
    हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी....

    आपका शुभेच्छु

    देशनामा