गुरुवार, 22 अगस्त 2013

ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना...खुशदीप

 अमर ब्लॉगर डॉ अमर कुमार की शुक्रवार को दूसरी पुण्यतिथि है...


कुछ कहने का मन नहीं...कुछ कहने के लिए शब्द भी नहीं...
बस एक ये गीत...


ओ जानेवाले हो सके तो लौट के आना,
ये घाट तू ये बाट कहीं भूल न जाना...

बचपन के तेरे मीत तेरे संग के सहारे,
ढूँढेंगे तुझे गली-गली सब ये ग़म के मारे,
पूछेगी हर निगाह कल तेरा ठिकाना,
ओ जानेवाले...

दे दे के ये आवाज़ कोई हर घड़ी बुलाए,
फिर जाए जो उस पार कभी लौट के न आए,
है भेद ये कैसा कोई कुछ तो बताना,
ओ जानेवाले...

डॉक्टर साहब ने 23 अगस्त 2011 को दुनिया को अलविदा कहा...
शरीर में तक़लीफ़ होने के बावजूद डॉक्टर साहब का ब्लॉगिंग के लिए आखिरी सांस तक अगाध स्नेह रहा...मेरे ब्लॉग पर 20 जुलाई 2011 को उन्होंने आखिरी बार ये टिप्पणी की थी...
....और वक्त बेवक्त जहाँ तहाँ सूशू पॉटी करने की आज़ादी थी, कोई डाँटता तक न था !
किस संदर्भ में डॉक्टर साहब ने ये टिप्पणी की थी, उसके लिए ये रहा पोस्ट का लिंक-
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जुलाई 2011 में ही डॉक्टर साहब ने मेरी पांच और पोस्ट पर भी टिप्पणियों का आशीष दिया था-


भावी गृहमँत्री अमर कुमार कहिन..
देशवासियों को सतर्क और एकजुट रखने के लिये ऎसी घटनाओं का होते रहना आवश्यक है ।
कॉमन मैन... दोहाई है हुज़ूर की, आपके सूझबूझ से अमेरिका को सीखना चाहिये जो बेचारा 9/11 के बाद पिछले दस सालों में ऎसी कोई घटना दुबारा नहीं करवा पाया ।


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.और तो और... पाबला जी,
यारों के यार हैं.. मुझे उनके आत्मीय और बेकल्लुफ़ स्वभाव के कारण इश्क हो चला है ।
वह अपने को पोज करते कभी नहीं दिखे.... मेरा उनसे पहला परिचय किसी फोटो को हटाने या लगाने के विवाद के चलते हुआ था... और आज... आज हाल यह है कि उनकी आवाज़ सुनते ही एक एनर्जी भर जाती है... वह अपनी चन्द बातों से ही मेरा दिल बल्ले बल्ले कर देते हैं... ऒए जिन्दे रह साड्डे सरदार ! 

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अव्यवहारिक मसलों पर अन्ना का बच्चों जैसा हठ सचमुच चिन्ता में डालने वाला है ।
कहीं कहीं लगता है कि, वह प्रशासन को ही ललकार रहे हैं कि आओ मुझे कुचलो !
दो कदम तुम भी चलो, दो कदम हम भी चलें..... यह है समझौते की सीमा.. न कि,
दो सौ कदम तुम्हीं दौड़ो, हम अडिग बैठे रहें !
मन में एक मलाल यह है कि, भारतीय मीडिया शर्मा जी को सम्मुख लाने में आखिर कैसे चूक गयी ?
आखिर बी.बी.सी. ने अपनी खबरों को लेकर इतना भरोसा कैसे अर्जित कर लिया ? कहीं ऎसा तो नहीं है कि, शँभुदत्त जी को प्रॉक्सी बना कर सँभावनायें ठोकी जा रहीं हों ? आखिरकार राजनीति और रणनीति सँभावनाओं का अनन्त सागर है । :-(

भाई, सतीश जी की शुभकामनायें जल्द स्वीकारो...
यहाँ नीचे मेरे ऊपर टपकी जा रही है... और प्रवीण जी साक्षी बने देख रहे हैं :-)


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हुँह, जनजागृति वाया लकी कूपन ?
इससे सस्ता विकल्प तो यह रहता कि नसबन्दी शिविर से बाहर आते हुये लोगों का एक विडियो प्रचारित करवा दिया जाता, जो कोरस के रूप में गा रहे होते.... 
आज से पहलेऽऽऽ आज से ज़्यादाऽ, खुशी आज तक नहीं मिली 
इतनी सुहानीऽऽऽ ऎसी मीठीऽ, ओ घड़ी आज तक नहीं मिली


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.वृद्धा i.e. बुढ़िया थोड़ी खिसकेली लगती है,
उसे किस करवट बैठना है... यह ऊँटनी पर नकेल कसने से पहले ही पढ़ाने लग पड़ी !



मंगलवार, 20 अगस्त 2013

उंगली करेगे, उंगली करेंगे...खुशदीप



ओए हम ब्लॉगर्स फन्नेखांओं का झुंड,
सुनसानी हाट, अब ऐसी हाट,
रख दिल पे हाथ,
हम साथ-साथ बोलो क्या करेंगे,
उंगली करेंगे, उंगली करेगे, उंगली करेंगे...

ओए जीव जंतु सब सो रहे होंगे,
भूत प्रेत सब सो रहे होंगे,
ऐसी रात ब्लॉगिंग कर रख दिल पे हाथ,
हम साथ साथ, बोलो क्या करेंगे,
उंगली करेंगे, उंगली करेंगे, उंगली करेंगे...

हुर्र, हुर्र, हुर्रर्र...
जलता, फुंकता, जलता, फुंकता, कुढ़ता,
सारी पोस्ट, सारे स्टेट्स बजाता,
तभी तो ब्लॉगर कहलाता,
परेड थम...

जलता, फुंकता, कुढ़ता आहो,
सारी पोस्ट बजाता आहो,
तभी तो ब्लॉगर कहलाता,
परेड थम...
होए लिख लिख के पोस्ट अपना,
हो लिख लिख के पोस्ट अपना,
लिख लिख के पोस्ट अपना,
नाम करेंगे, नाम करेंगे, उंगली करेंगे...

ओए जीव जंतु सब सो रहे होंगे,
भूत प्रेत सब सो रहे होंगे,
ऐसी रात ब्लॉगिंग कर रख दिल पे हाथ,
हम साथ साथ, बोलो क्या करेंगे,
उंगली करेंगे, उंगली करेंगे, उंगली करेंगे...

ओ जंगली आग़ सी भड़कती होगी,
ओए लकड़ी दिल की भी सुलगती होगी,
ओ जंगली आग़ सी भड़कती होगी,
ओए लकड़ी दिल की भी सुलगती होगी,
ऐसी रात ब्लॉगिंग कर रख दिल पे हाथ,
हम साथ साथ, बोलो क्या करेंगे,
उंगली करेंगे, उंगली करेंगे, उंगली करेंगे...
अब सुनिए ये गाना, डबल मज़ा आएगा-
   





गुरुवार, 15 अगस्त 2013

"आप ज़िंदा क्यों रहे?"...खुशदीप

पिछली पोस्ट में किश्तवाड़ दंगों के संदर्भ में सांप्रदायिकता के ज़हर का हवाला देते हुए मैंने आपको 1947 के अतीत में ले जाने का वादा किया था...गांधी से मिलवाने के लिए कहा था...ये इतिहास का वो कोना है जिस पर गांधी के पोते और पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी ने अपने एक लेख में रौशनी डाली थी...गांधी से मिलवाने से पहले थोड़ी आज की बात...
देश ने आज़ादी की 66वीं सालगिरह का जश्न आज मनाया...प्रधानमंत्री के भाषण के साथ पहली बार इस मौके पर भावी प्रधानमंत्रीका भाषण भी सुना...विकास के  उद्घोष के साथ देश की सारी समस्याओं को दूर करने के संबंध में दावे-प्रतिदावे सुने...ज़ाहिर है चुनावी साल है, हर कोई खुद को जनता-जनार्दन का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने की कोशिश करेगा...नतीजा वही रहेगा जो आज़ादी के बाद अब तक देश मे होता आया है...

अब गोपाल कृष्ण गांधी के लेख के हवाले से बापू की बात...
1946 का अंत आते-आते बंगाल के नोआखली में हिंदुओं का बड़ा नरसंहार हुआ...प्रतिक्रिया बिहार में मुसलमानों के जबर्दस्त कत्ले-आम से हुई...दिल्ली और पंजाब को भी सांप्रदायिकता की इसी आग ने जकड़ लिया...उस वक्त एक इनसान ने जो किया, जो कहा, उसका सबूतों की बाध्यता से कोई लेना-देना नहीं था...वो इनसान था मोहनदास कर्मचंद गांधी...
नाओखली में दंगा प्रभावितों से बात करते गांधी
गांधी उस वक्त बंगाल के प्रभावित ज़िलों का दौरा करने के बाद बिहार आए थे...उन्हें बताया गया कि हिंसा में कुछ कांग्रेसजनों को भी शामिल देखा गया...कुछ कांग्रेसियों ने इसे ग़लत बताया तो कुछ ने सही...

19 मार्च 1947 को बीर, बिहार में कांग्रेसजनों के एक समूह से मुखातिब गांधी जी ने कहा- "क्या ये सच है या नहीं कि बड़ी संख्या में कांग्रेसी गड़बड़ी में शामिल थे ? मैं ये इसलिए पूछ रहा हूं कि लोग ऐसा आरोप लगा रहे हैं...लेकिन यहां एकत्र कांग्रेसी खुद सच बता सकते हैं...आप की कमेटी के 132 सदस्यों में से कितने सदस्य शामिल थे ? ये अच्छी बात होगी जब आप में से सब इस बात पर ज़ोर दें कि आप शामिल नहीं थे...लेकिन इस तरह की सफ़ाई नहीं दी जा सकती...मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि आप ये देखने के लिए कैसे ज़िंदा रहे कि 110 साल की एक वृद्धा को मौत के घाट उतार दिया गया ? आपने ये कैसे बर्दाश्त किया ? मैं आपसे और कुछ बात नहीं करना चाहता...मैंने करो या मरो की कसम खाई है...ना मैं खुद चैन से बैठूंगा और ना दूसरों को बैठने दूंगा...मैं सब जगह चलता हुआ जाऊंगा...पड़े हुए कंकालों से पूछूंगा कि कैसे ये सब हुआ मेरे अंदर अब ऐसी आग़ जल रही है कि मैं इस सब का जब तक समाधान नहीं ढूंढ लूंगा, शांति से नहीं बैठूंगा"...
गांधी ने कांग्रेसियों से कुछ जुमले और भी बोले- मैं आपसे पूछना चाहता हूं...आप ज़िंदा क्यों रहे ? सब बातें छोड़कर मैं यही सवाल उठाना चाहता हूं...आप ज़िंदा क्यों रहे?"
यें तो रही 1947 और गांधी की बात...अब लौटते है 1984 और 2002 पर...ना 1984 में कांग्रेस या बीजेपी का कोई शख्स निर्दोषों को बचाते हुए मरा और ना ही 2002 में...ये हो सकता है कि जिन नेताओं पर दंगे करवाने के लिए या हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहने के लिए उंगली उठी वो सबूतों के अभाव में आखिर में साफ़ बच जाएं...लेकिन कहीं ऐसा भी तो सबूत नहीं है कि उन्होंने हिंसा की आग़ को बुझाने के लिए खुद को झोंक दिया...आख़िर आप ज़िंदा क्यों रहे ?
ऐसा नहीं कि देश में पहले कभी ऐसी बहादुरी की मिसाल नहीं मिलती...1 जुलाई 1946 को अहमदाबाद में रथ यात्रा के दौरान शहर साम्प्रदायिक दंगे की आग़ से जल रहा था...कांग्रेस सेवा दल के वसंतराव हेगिश्ठे और रज़ब अली लखानी पूरा दिन निर्दोषों को बचाने में लगे रहे...उन्मादी दंगाइयों ने दोनों से भाग जाने के लिए कहा...लेकिन दोनों डटे रहे...आख़िर दंगाइयों ने उन्हें भी क़त्ल कर दिया...एक साल बाद कलकत्ता में सचिन मित्रा और स्मृतिश बनर्जी भी बेगुनाहों को दंगाइयों से बचाते हुए ऐसे ही मारे गए...
क़ानून सबूत मांगता है...अदालतें सबूतों के अभाव में आरोपियों को बरी कर सकती है...लेकिन जो सच में गुनहगार है उन्हें उनकी अंतर्रात्मा कैसे बरी करेगी ? 1984 या 2002 को लेकर सब कुछ छोड़कर एक ही सवाल..."आपने मारा नहीं, लेकिन मारने वालों को मारते देखा...आप ज़िंदा क्यों रहे? " सबूतों की बाध्यता ये सवाल नहीं पूछेगी जो गांधी ने 66 साल पहले पूछा था...



बुधवार, 14 अगस्त 2013

दंगों की कमीज़ किसकी ज़्यादा काली...खुशदीप

किश्तवाड़ से भड़की सांप्रदायिक हिंसा की आंच ने पूरे जम्मू संभाग को झुलसा दिया...करीब हफ्ते भर से वहां कर्फ्यू लगा है...अब राजनीति अपना काम कर रही है...अगले साल लोकसभा चुनाव है...जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव भी दूर नहीं है...किश्तवाड़ के दौरे के लिए बिना वक्त गंवाए अरुण जेटली की अगुआई में बीजेपी प्रतिनिधिमंडल पहुंचा तो उमर अब्दुल्ला सरकार ने उसे जम्मू से ही लौटा दिया...बीजेपी ने दंगाग्रस्त इलाके में सेना को तैनात करने में देरी पर उमर अब्दुल्ला सरकार को कठघरे में खड़ा किया...उमर सरकार के गृह राज्य मंत्री और स्थानीय विधायक सज्जाद अहमद किचलू की दंगे के दौरान किश्तवाड़ में मौजूदगी को लेकर खास तौर पर सवाल उठाए गए...किचलू को इस्तीफ़ा ज़रूर देना पड़ा लेकिन उमर अब्दुल्ला और उनके पिता केंद्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला ने बीजेपी पर जमकर पलटवार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी...

उमर और फारूक ने गुजरात में 2002 के दंगों का हवाला देते हुए सवाल दागा कि वहां नरेंद्र मौदी सरकार को सेना को तैनात करने में दो दिन क्यों लग गए थे...यानि यही सिद्ध करने की कोशिश कि हमारी कमीज़ तुम्हारी कमीज़ से कम काली कैसे ?
ये देश में पहली बार नहीं हो रहा...राजनेता अपने गुनाहों और ख़ामियों को छुपाने के लिए अपने विरोधियों के दामन पर लगे दाग़ो को गिनाने लगते हैं...जब कांग्रेस गुजरात दंगों को लेकर नरेंद्र मोदी और बीजेपी को पानी पी-पी कर कोसती है तो बीजेपी भी जवाबी प्रहार में 1984 के सिख विरोधी दंगों का हवाला देने से नहीं चूकती...साथ ही भागलपुर, मेरठ और भिवंडी के साम्प्रदायिक दंगों का हवाला देती है...
क्या दूसरों के दाग़ गिनाकर अपने दाग़ धोए जा सकते हैं...क्या इस तरह कभी दो माइनस मिलकर प्लस हो सकते हैं...दूसरों की खामियों को गिनाने की जगह ये राजनीतिक दल अपने गुनाहों के लिए क्यों शर्मिंदा नहीं होते...क्यों नहीं इनके नेता सामने आकर माफ़ी मांगते,,,ये नेता गलती कबूल कर ये वादा क्यों नहीं करते कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं से लोकतंत्र को शर्मसार नहीं होने दिया जाएगा...अगर ये ऐसा करें तो शायद हमारे गणतंत्र के लिए भला होगा....लेकिन बांटने की राजनीति से अपने लिए वोटों का गुब्बारा फैलाने में लगे ये राजनीतिक दल और इनके नेता ऐसा कभी नहीं करेंगे...
अंत में मेरा एक प्रश्न...गुजरात के दंगों को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधने वाले कांग्रेसी जवाब दें कि जब हिंसा हो रही थी, उस वक्त ये कांग्रेसी कहां सोए हुए थे....क्यों नहीं आगे आकर निर्दोंषों को बचाने के लिए प्रयास किया...इसी तरह बीजेपी के कर्णधार जवाब दे कि जब 1984 में बेगुनाह सिखों का कत्ले-आम हो रहा था तो क्यों नहीं उन्होंने सड़कों पर अपने कार्यकर्ताओं के साथ निकलकर दंगाइयों का विरोध किया...अगर 2002 में गुजरात में एक भी कांग्रेसी नेता या 1984 में सिखों को बचाते हुए एक भी बीजेपी नेता अपनी कुर्बानी दे देता तो इन् पार्टियों को ज़रूर आज लंबे चौड़े बयान देने का अधिकार होता...
इसी संदर्भ में अगले लेख में आपको 1947 के अतीत में ले चलूंगा...गांधी से मिलवाऊंगा...गांधी आख़िर क्यों गांधी थे....

शनिवार, 10 अगस्त 2013

इट्स हैप्पन ओनली इन गुजरात ?...खुशदीप

एक खब़र आज नज़रों से गुज़री...टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप जैसे प्रतिष्ठित समाचार समूह के एक रिपोर्टर की ख़बर है...उम्मीद तो यही की जा सकती है कि तथ्यों को खुद जांचने और मौके पर जाने के बाद ही  रिपोर्टर ने ये ख़बर प्रकाशित की होगी...अब पूरी सच्चाई तो शुक्रवार को ईद के दिन मॉल में गए लोग ही बता सकते हैं...लेकिन अगर ऐसा हुआ है तो ये वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है...अगर मॉल के प्रबंधकों ने अपनी मर्ज़ी से एक ही वर्ग के लोगों से भेदभाव किया तो नरेंद्र मोदी सरकार को उन पर एक्शन लेना चाहिए...आखिर मोदी अब गुजरात के साथ पूरे देश के लिए राजधर्म निभाने की चाहत रखते हैं...और हां, अगर ये ख़बर गलत है तो मॉल को टाइम्स ग्रुप के रिपोर्टर पर मानहानि का मुकदमा दायर करना चाहिए...



अहमदाबाद के मॉल ने ईद पर मुस्लिमों से वसूली एंट्री फीस
टाइम्स न्यूज नेटवर्क | Aug 10, 2013, 11.05AM IST
पार्थ शास्त्री
अहमदाबाद।। ईद के मौके पर गुजरात में मुस्लिमों से भेदभाव का मामला सामने आया है। शुक्रवार को ईद के मौके पर अहमदाबाद के सबसे बड़े हिमालय मॉल में मुस्लिमों खासकर इस समुदाय के खास उम्र के युवाओं को को अजीब स्थिति से गुजरना पड़ा। उनसे मॉल में घुसने के लिए एंट्री फीस वूसली गई। हालांकि, मॉल प्रबंधन का कहना है कि महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों को छोड़कर सभी पर एंट्री फीस लगाई थी।

हिमालय मॉल में पीक आवर्स के दौरान मुस्लिमों से 20 रुपये एंट्री फीस वसूली जा रही थी। इसमें शर्त रखी गई थी कि उन्हें ये 20 रुपये तभी वापस किए जाएंगे, जब वे मॉल से कुछ खरीदकर निकलेंगे। मॉल प्रबंधन के इस भेदभावपूर्ण रवैये से मुस्लिम समुदाय के लोग हैरान रह गए।

परिवार के साथ मॉल गए दिल्ली चकला के सैयद शेख ने अपना कड़वा अनुभव सुनाया। उन्होंने बताया, 'सिक्युरिटी गार्ड्स एक खास समुदाय के लोगों से ही फीस वसूल रहे थे। हमने कुछ लोगों को बिना फीस दिए मॉल में घुसते देखा। हमने जब सिक्युरिटी गार्ड्स से पूछा तो उन्होंने बताया कि उन्हें ऊपर से आदेश मिला हुआ है। हम यह सुनकर हैरान रह गए।'
इसी तरह शाहपुर के रहने वाले इलियास अंसारी का कहना था, 'अगर मॉल में यह फीस सभी से ली जाती, तो हमें कोई परेशानी नहीं थी। सिर्फ एक समुदाय से ही भेदभाव क्यों किया गया?'

उधर, मॉल के अधिकारियों ने इसे भीड़भाड़ के दिनों के लिए रूटीन नियम बताया। हमारे सहयोगी अखबार 'टाइम्स ऑफ इंडिया' ने जब हिमालय मॉल की मैनेजर (ऑपरेशन्स) दीपा भटनागर से इस बारे में पूछा तो उनका जवाब था, 'हम परेशानी बढ़ाने वाली भीड़ को कंट्रोल करने के लिए पहले भी ऐसा कर चुके हैं। दिवाली और आने वाले त्योहारों पर भी इसे लागू करने के बारे में सोच रहे हैं। अगर कोई सामान खरीदकर लौटता है, तो फीस लौटा दी जाएगी।'

उन्होंने एक खास समुदाय से एंट्री फीस लेने की बात को गलत बताया और कहा कि मॉल प्रशासन ने महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों को छोड़कर सभी पर एंट्री फीस लगाई थी। हालांकि इस संवाददाता ने मॉल में एंट्री का अलग ही पैटर्न देखा। मॉल में आने वाले मुस्लिम समुदाय के खास उम्र के युवाओं को पूछताछ और फीस वसूलने के बाद मॉल में एंट्री दी जा रही थी, जबकि महिलाओं और अन्य को बिना फीस वसूले अंदर जाने दिया जा रहा था।


बुधवार, 7 अगस्त 2013

कैसे हुआ रिवर्स स्टिंग ऑपरेशन...खुशदीप

हम पत्रकार लोग खुद को बहुत उस्ताद समझते हैं...लेकिन कभी कभी हमारी सारी उस्तादी धरी की धरी रह जाती है...शिकार करने चलते हैं और खुद ही शिकार हो जाते हैं...यानि इरादा हमारा किसी का स्टिंग ऑपरेशन करने का होता है और हमारा ही रिवर्स स्टिंग हो जाता है,,, भई ऐसे ही एक चक्कर में मैं फंस गया...




अब किसी हाड-मांस के आदमी से सामना हो तो बचा भी जा सकता है...लेकिन यहां तो सामना ब्लॉग जगत के मिस्टर इंडिया (इनविज़ीबल) ताऊ और उसकी टीम के खुराफातियों- राम प्यारी और राम प्यारे से था...ऐसे में मैं भला कैसे बच सकता था...देखिए किस तरह चिकने चुपड़े सवालों के फेर में मुझे उलझा कर मेरे और परम सखा मक्खन के सारे राज़ उगलवा लिए गए...ऊपर से पत्नीश्री ने ये सारा गुल-गुपाड़ा और पढ़ लिया...अब उन्हें जवाब देते बनना भारी पड़ रहा है...लीजिए आप भी इस लिंक पर जाकर पढ़िए मेरा रिवर्स स्टिंग ऑपरेशन...

"दो और दो पांच" में बिना मक्खन के पहुंचे खुशदीप सहगल


(कृपया टिप्पणियां यहां ना देकर उपरोक्त लिंक पर ही दीजिएगा...)

शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

मीना कुमारी का ताल्लुक गुरुदेव के कुनबे से...खुशदीप

अभिनेत्री शर्मिला टैगोर और बीते ज़माने की ट्रेजिडी क्वीन मीना कुमारी आपस में रिश्तेदार हैं...चौंक गए ना आप ये सुनकर...पहले कहीं नहीं पढ़ा ना...चलिए आज इस राज़ को ही जान लीजिए...

अभिनेत्री शर्मिला टैगौर के गुरुदेव रबीन्द्र नाथ टैगोर के वंश से होने का सब को पता है...शर्मिला टैगोर की नानी लतिका गुरुदेव के भाई दिजेंद्रनाथ की पोती थी...

लेकिन बीते ज़माने की ट्रेजिडी क्वीन मीना कुमारी का ताल्लुक भी रबीन्द्र नाथ टैगोर के परिवार से रहा है...ये कम ही लोगों को पता है...



मीना कुमारी की नानी सुंदरी देवी का विवाह रबीन्द्र नाथ टैगोर के एक भाई ( हेमेन्द्रनाथ टैगोर, इस की प्रामाणिक पुष्टि के लिए किसी को ज़्यादा जानकारी हो, तो अवगत कराएं) के साथ हुआ था...लेकिन पति की मौत के बाद टैगोर परिवार में सुंदरी देवी के लिए हालात इतने विकट हुए कि उन्हें वो घर छोड़कर लखनऊ जाना पड़ा...सुंदरी देवी ने लखनऊ में नर्स की नौकरी कर ली...यहां उनकी मुलाकात एक ईसाई पत्रकार प्यारे लाल शाकिर से हुई...उर्दू पत्रकारिता में उस वक्त बड़ा नाम माने जाने वाले प्यारेलाल को प्यारेलाल मेरठी के नाम से भी जाना जाता था...क्रांतिकारी विचारों वाले प्यारेलाल खास तौर से सुंदरी देवी का इंटरव्यू लेने के लिए उनसे मिले थे...प्यारेलाल का मकसद ये जानना था कि प्रगतिशील माने जाने वाले टैगोर परिवार ने घर में एक विधवा यानि सुंदरी देवी से ऐसा बर्ताव क्यों किया...

प्यारेलाल शाकिर ने सुंदरी देवी की स्टोरी छापी तो उस वक्त तहलका मच गया...इसी दौरान दोनों ने आपस में शादी भी कर ली...दोनों की छह संतान हुईं...चार लड़कियां और दो लड़के....इन्हीं में से एक लड़की प्रभावती देवी थीं, जिन्होंने आगे चलकर ट्रेजिडी क्वीन मीना कुमारी को जन्म दिया...

प्रभावती ने कोलकाता में अपना करियर थिएटर आर्टिस्ट के तौर पर शुरू किया...प्रभावती बहुत अच्छी नृत्यांगना थीं...लेकिन देश की सांस्कृतिक राजधानी के तौर पर मुंबई ने कोलकाता का स्थान ले लिया तो प्रभावती मुंबई चली आईं...थिएटर में काम करते-करते प्रभावती का हारमोनियम वादक अली बख्श से प्यार हो गया...अली बख्श का ताल्लुक पंजाबी बोलने वाले पेशावर के पठान परिवार से था...हिंदू मां और ईसाई पिता की बेटी प्रभावती ने मुस्लिम अली बख्श से निकाह कर लिया...निकाह के बाद प्रभावती का नाम इकबाल बानो रखा गया...मुस्लिम होने के बावजूद अली बख्श की परवरिश 12 साल तक एक ब्राह्मण ने की थी...अली बख्श को हिंदू ज्योतिष का अच्छा ज्ञान था...

प्रभावती (इकबाल बानो) और अली बख्श की तीन बेटियां हुईं...खुर्शीद, महजबीन और महलका...महजबीन का नाम ही फिल्मों में आने के बाद मीना कुमारी पड़ा...मीना कुमारी की छोटी बहन महलका शादी के बाद माधुरी किशोर शर्मा के नाम से पहचानी जाने लगीं...

माधुरी किशोर शर्मा के मुताबिक टैगोर परिवार ने प्रगतिशील होने के बावजूद उनकी नानी सुंदरी देवी और उनके वंशज़ों से किसी तरह का नाता रखना पसंद नहीं किया...शायद ये उन्हें बर्दाश्त नहीं रहा होगा कि उनके परिवार की एक विधवा पहले तो पुनर्विवाह करे और वो भी एक ईसाई के साथ...माधुरी किशोर शर्मा का कहना है कि मीना कुमारी के जीते जी टैगोर परिवार ने इस दूर के रिश्ते पर चुप्पी साधे रखी...लेकिन उनकी मौत के बाद इस तरह का कोई रिश्ता होने से साफ़ इनकार करना शुरू कर दिया...

अंत में मीना कुमारी का दर्द, उन्हीं की आवाज़ में...