गुरुवार, 20 जून 2013

ब्लॉगिंग के लौहपुरुष कोपभवन में...खुशदीप


बहुत बड़ा लोचा हो गया है...मुझे अभी अभी ब्लॉगिंग के लौहपुरुष सतीश सक्सेना भाई जी ने अपने पर्सनल सेक्रेटरी टीपक मरोड़ा के ज़रिए एक चिट्ठी भिजवाई है...




चिट्ठी में सतीश भाई ने जो लिखा है, उसकी वजह से ब्लॉग बिरादरी की आपातकालीन बैठक बुलाना ज़रूरी हो गया है...मैं चाहता हूं कि आप सब पहले सतीश भाई की चिट्ठी पढ़ लें...
समस्त ब्लॉगर बिरादरी,

मैंने पूरी जिंदगी ब्लॉगिंग और ब्लॉगरों की सेवा करने में गर्व और संतुष्टि हासिल की है...कुछ समय से मैं अपने आपको ब्लॉगिंग की इस दुनिया के मौजूदा काम करने के तरीके और दिशा-दशा से जोड़ नहीं पा रहा हूं...मुझे नहीं लगता कि यह वही आदर्शवादी विधा है जिसे जीतू भाई, पंडित अनूप शुक्ल जी, कविमना समीर लाल और टेक्नोक्रेट रवि रतिलामी ने अपने खून-पसीने से सींचा और जिस मंच का एकमात्र मकसद हिंदी और हिंदीभाषियों का उत्थान था...

आज हमारे ज्यादातर ब्लॉगर अब सिर्फ अपने निजी हितों को लेकर चिंतित हैं...इसलिए मैंने पार्टी के तीन अहम पदों अंतर्राष्ट्रीय कार्यकारिणी, परामर्श बोर्ड और अवार्ड चयन समिति से इस्तीफा देने का फैसला किया है... इस पत्र को मेरा इस्तीफा माना जाए...

सतीश सक्सेना

20-06-2013

वाकई सतीश भाई का ये इस्तीफ़ा ब्लॉगिंग के लिए बहुत बड़ा संकट काल है...सतीश भाई के बिना इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती...इसके लिए उन्हें हर हाल में मनाया जाएगा...इसके लिए इंदौर में तंग मुख्यालय में ब्लॉग तंग चालक ताऊ जी महाराज से भी संपर्क साधा गया है...




मैंने खोज़ी पत्रकारिता के माध्यम से पता लगाया है कि सतीश भाई की नाराज़गी के पीछे किसी अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर शिरोमणि अवार्ड समारोह का लफड़ा है...इसके ज़रिए सतीश भाई को संदेश भेजा गया कि अब वो चीफ़ इन वेटिंग से चीफ़ नहीं बन सकते...इसलिए आजीवन अध्यक्ष बनकर सिर्फ मार्गदर्शक की भूमिका निभाएं...बाकी सब मक्खन जैसी युवा पीढ़ी के लिए छोड़ दें...सुना है इस सोच के पीछे इंदौर में तंग मुख्यालय का ही दिमाग काम कर रहा है...

वैसे ये दो पोस्ट हैं, जिनकी वजह से ये सब लोचा हुआ है...

अंतर्राष्ट्रीय ब्लोगर शिरोमणि अवार्ड में भाग लें -सतीश सक्सेना



"अंतर्राष्ट्रीय ब्लोगर शिरोमणि अवार्ड" - 2013 आयोजित




 

रविवार, 16 जून 2013

मक्खन LAUGHTER HATTRICK...खुशदीप


बडे़ दिन से मक्खन छुट्टी पर था...सोचा कहीं ब्लॉगर बिरादरी मक्खन को भूल ही ना जाए...इसलिए आज मक्खन की ही हैट्रिक...

मक्खन रोज़ छत पर कपड़े धोने के लिए बैठता... लेकिन उसी वक्त झमाझम बारिश शुरू हो जाती...मक्खन बेचारा सोचता, कपड़े धोने के बाद सूखेंगे कैसे....बेचारा मन मार कर अपने कमरे के अंदर चला जाता...एक दिन मक्खन कमरे से बाहर निकला तो देखा...

कड़कती धूप निकली हुई थी...मक्खन ने सोचा...आज मौका बढ़िया है, कपड़े धोने का...मक्खन ने कपड़े धोने का सब ताम-झाम बाहर निकाला...

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लेकिन ये क्या सर्फ तो डिब्बे में था ही नहीं...मक्खन फटाफट गली के बाहर जनरल स्टोर की तरफ़ भागा...मक्खन जनरल स्टोर के अंदर ही था कि अचानक बादल ज़ोर ज़ोर से गरजने लगे...दिन में ही अंधेरा छा गया...मक्खन जनरल स्टोर से बाहर निकला...दोनों हाथ झुलाते हुए आगे पीछे करने लगा और फिर बड़ी मासूमियत से आसमान की तरफ़ देखकर बोला...



होर जी, किंदा....मैं ते एवें ही बस...बिस्किट लैन आया सी...तुसी गलत समझ रेयो जी...

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हिसाब-किताब बराबर...

 

एक बार एक बच्चे ने मक्खन की दुकान से 45 रूपए का सामान खरीदा और उसे 5 के नोट में 5 के आगे 0 लगा कर दिया और कहा," ये लो 50 रुपए 5 रूपए वापस दो"...

मक्खन को यह पता चल गया..."अच्छा बच्चू मुझे बनाने आया है...तो मैं भी इसका बाप हूं"...

मक्खन ने जेब से 50 का नोट निकाला और उसका 0 पेंसिल से काट दिया और बोला...


"ले 5 रूपए, अब तो हिसाब बराबर?"
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वकीली संतरा

प्रोफेसर: मक्खन अगर तुम्हे किसी को संतरा देना हो तो क्या बोलोगे?

मक्खन : ये संतरा लो...

प्रोफेसर: नहीं, एक वकील की तरह बोलो...

मक्खन : "मैं एतद द्वारा अपनी पूरी रुचि और बिना किसी के दबाव में यह फल जो संतरा कहलाता है, को उसके छिलके, रस, गुदे और बीज समेत देता हूँ और साथ ही इस बात का सम्पूर्ण अधिकार भी कि इसे लेने वाला इसे काटने, छीलने, फ्रिज में रखने या खाने के लिये पूरी तरह अधिकार रखेगा और साथ ही यह भी अधिकार रखेगा कि इसे वो दूसरे को छिलके, रस, गुदे और बीज के बिना या उसके साथ दे सकता है...और इसके बाद मेरा किसी भी प्रकार से इस संतरे से कोई संबंध नहीं रह जाएगा"...

शनिवार, 15 जून 2013

चेहरा ही सब कहता है...खुशदीप

फेकिंग न्यूज़ एक बहुत मज़ेदार वेबसाइट है...उसी में एक सैटायरिकल पोस्ट में बताया गया है कि हमारे सारे मंत्री वयस्क (बायोलॉजिकली) हैं, इसलिए चेहरों पर अपने भाव छुपा लेते हैं...लेकिन अगर बच्चे होते तो उनके मुख की कैसी भंगिमाएं होतीं, उसी की एक बानगी...(बच्चों के लिए प्रेम करने वालों से अग्रिम क्षमाप्रार्थना के साथ...)


CBI तो क्या FBI भी नहीं पता लगा सकती कि मैंने पैसे कहां छुपा रखे हैं...



मुझे कभी इल्म भी नहीं हुआ कि मेरी सारे फोन टैप किए जा रहे हैं...


अरे बाप रे, उन्होंने मेरे पैसे का पता लगा लिया....


कोई सबूत नहीं है कि मैंने फंड खाया है, फिर मैं क्यों इस्तीफ़ा दूं...
 
 

क़ानून अपना काम करेगा...
 

मैं अपना बयान पहले ही वापस ले चुका हूं, माफ़ी भी मांग  चुका हूं...
 


सूखे और महंगाई पर विचार करने के लिए कैबिनेट बैठक


बड़ी भूमिका के लिए तैयार, देश की समस्याओं का सामना करने के लिेए तैयार...


पॉलिसी पैरालिसिस (काम पर सरकार)...
 
 
 
AND ABOVE ALL
फर्रूखाबाद तो आ जाओगे, पर वापस जाकर भी दिखाओ...


(आभार- मिश्टिक जर्नो, फेकिंग न्यूज़)
 

शुक्रवार, 14 जून 2013

अजनबी बन जाएं हम दोनों...खुशदीप





चलो इक बार फिर से, अजनबी बन जाएं हम दोनों
चलो इक बार फिर से...

न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की,
न तुम मेरी तरफ़ देखो गलत अंदाज़ नज़रों से,
न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाये मेरी बातों से,
न ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्मकश का राज़ नज़रों से,
चलो इक बार फिर से, अजनबी बन जाएं हम दोनों,
चलो इक बार फिर से...


तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशकदमी से,
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जलवे पराए हैं,
मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे माझी की,
तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साये है,
चलो इक बार फिर से, अजनबी बन जाएं हम दोनों,
चलो इक बार फिर से...

तार्रुफ़ रोग हो जाये तो उसको भूलना बेहतर
ताल्लुक बोझ बन जाये तो उसको तोड़ना अच्छा,
वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन,
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा,
चलो इक बार फिर से, अजनबी बन जाएं हम दोनों,
चलो इक बार फिर से...




 

सोमवार, 10 जून 2013

कौन 'हिटलर-मुसोलिनी', कौन 'पोप'...खुशदीप

9 जून को नरेंद्र मोदी की पैन इंडियन भूमिका पर मुहर लगाते हुए बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने उन्हें पार्टी की चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बना दिया...



9 जून को ही बीजेपी संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लॉग पर एक दंतकथा का हवाला दिया...आडवाणी के मुताबिक 5 जून को उनके घर पर आए प्रसिद्ध फिल्मकार कमलहासन को उन्होंने ये दंतकथा सुनाई थी...इसे आडवाणी ने कराची में अपने स्कूल के दिनों में सुना था...

दंतकथा एडोल्फ हिटलर और बेनिटो मुसोलिनी की द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुई एक मुलाकात को लेकर है...इसके मुताबिक जर्मनी का पूर्व तानाशाह हिटलर इटली के अपने समकक्ष मुसोलिनी से कहता है कि उन दोनों ने जो पाप किए हैं, वो उन्हें मृत्यु के बाद बहुत भारी पड़ेंगे...इस पर मुसोलिनी का कहना था कि जब उसे अपना अंत करीब आता दिखेगा तो वेटिकन जाकर पोप से मदद मांगेगा क्योंकि उनके पास स्वर्ग में भेजने का पास रहता है...इस पर हिटलर मुसोलिनी से पोप से अपने नाम की भी स्वर्ग के लिए सिफ़ारिश करने के लिए कहता है...इस दंतकथा के साथ डिमॉन्सट्रेशन के लिए दो कैंचियों और कागज़ की भी ज़रुरत होती है...दंतकथा का अंत यही होता है कि दोनों फासीवादी नेताओं को नर्क ही जाना पड़ता है और स्वर्ग में सिर्फ पोप ही जाते हैं...

9 जून को ही ब्लॉग पर आडवाणी के इस दंतकथा को डालने के कई मायने लगाए जा सकते हैं...पूछने वाले पूछ सकते हैं कि आज के संदर्भ में कौन 'हिटलर-मुसोलिनी' हैं और कौन 'पोप'...
 

 



शनिवार, 8 जून 2013

'म' से महाजन, 'म' से मोदी...खुशदीप

गोवा में बीजेपी का मंथन देखकर एक साथ बहुत कुछ याद आ रहा है...सबसे पहले याद आई डार्विन की थ्योरी...गलाकाट प्रतिस्पर्धा हमेशा एक ही प्रजाति के सदस्यों के भीतर ज़्यादा होती है...बनिस्बत कि दो अलग-अलग प्रजातियों के... डार्विन कह गए हैं कि एक प्रजाति के सदस्यों की ज़रूरतें एक जैसी होती हैं...खाना, सिर पर छत जैसी बुनियादी ज़रूरतें पूरी होने के बाद अपने समाज में नामी शख्सीयत होने की ख्वाहिश जागती है...फिर सबसे ताकतवर होने की...अब देखा जाए तो बीजेपी में भी तो यही हो रहा है...चले थे कांग्रेस का डिब्बा गोल करने...लेकिन वो तो रह गया पीछे और आपस में ही लठ्ठमलठ्ठा शुरू हो गई...

एक पाले में नरेंद्र मोदी के पीछे आ जुटे हैं...राजनाथ सिंह, अरुण जेटली, रामलाल, बलबीर पुंज, स्मृति ईरानी, अनुराग ठाकुर और मनोहर पर्रिकर...

इस रस्साकशी का दूसरा छोर लौहपुरुष लाल कृष्ण आडवाणी के हाथ में है...उनके पीछे पुराने सभी गिले-शिकवे भुलाकर दम लगा रहे हैं....सुषमा स्वराज, यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह, मुरली मनोहर जोशी, शत्रुघ्न सिन्हा, अनंत कुमार, शिवराज सिंह चौहान, वरुण गांधी, मेनका गांधी, उमा भारती आदि आदि...

इस पूरे घटनाक्रम पर गौर करने के साथ आपको 11 साल पीछे जाना चाहिए...तब भी बीजेपी का गोवा में अधिवेशन चल रहा था...उस वक्त भी आज की तरह ही नरेंद्र मोदी सबसे बड़ा मुद्दा थे...2002 में गुजरात दंगों के बाद मोदी की मुख्यमंत्री की कुर्सी खतरे में थी...राजधर्म निभाने में नाकाम रहने की वजह से वाजपेयी मोदी की मुख्यमंत्री पद से हर हाल में छुट्टी चाहते थे...लेकिन उस वक्त लालकृष्ण आडवाणी ने मोदी के लिए ज़ोरदार पैरवी की थी...वाजपेयी ने उनका लिहाज़ किया और मोदी को अभयदान मिल गया...अब उस वक्त आडवाणी को क्या पता था कि 11 साल बाद मोदी का कद डायनासॉर की तरह इतना बड़ा हो जाएगा कि उन्हें ही निगलने के लिए तैयार हो जाएगा...

यहां राजनीति का ये पाठ सटीक बैठता है...

शिखर पर पहुंचते ही उसी सीढ़ी को सबसे पहले लात मारनी चाहिए, जिस पर चढ़ कर वहां पहुंचा गया हो...

इसमें कोई शक नहीं कि गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले मोदी का मेंटर आडवाणी को ही माना जाता था...गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद भी मोदी का दिल्ली में तब तक भाव नहीं बढ़ा, जब तक वाजपेयी खराब स्वास्थ्य की वजह से नेपथ्य में नहीं चले गए...वाजपेयी के रहते बीजेपी की भविष्य की उम्मीद प्रमोद महाजन थे....आज मोदी को लोकसभा चुनाव के साथ पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की कमान देने के लिए दबाव डाला जा रहा है...लेकिन प्रमोद महाजन को 2003-2004 में बिना किसी परेशानी के लोकसभा चुनाव और राज्यों में विधानसभा चुनाव की कमान एकसाथ सौंप दी गई थी...यानि प्रमोद महाजन पार्टी के अंदर गोटियों के मैनेजमेंट में मोदी से कहीं आगे थे...



वाजपेयी का खराब स्वास्थ्य और प्रमोद महाजन की अचानक दुखद परिस्थितियों में मौत...इन दो कारणों की वजह से भी बीजेपी में दूसरी पीढ़ी के नेताओं में मोदी का ग्राफ़ तेज़ी से ऊपर चढ़ा...ये बात दूसरी है कि साम दाम दंड भेद जानने के बावजूद प्रमोद महाजन पार्टी के भीतर विनम्रता से काम निकालना जानते थे, दूसरी ओर मोदी का स्टाइल अहम ब्रह्मास्मि का है...

देखना अब ये है कि बीजेपी एकसुर में मोदी को पार्टी का राष्ट्रीय मुखौटा मानने में कितनी देर लगाती है....



चलिए अब राजनीति पर ही...

स्लॉग ओवर...

एक नेता जी की काफ़ी उम्र हो चली...लेकिन वो सियासत से संन्यास लेने का नाम ही नहीं ले रहे थे...उनके अंगद की तरह जमे रहने से और तो और, घर में उनका बेटा ही त्रस्त हो गया...एक दिन लड़के से रहा नहीं गया...उसने पिता से कहा कि अब आप घर पर आराम कीजिए और सियासत में उसे आगे बढ़ने का मौका दीजिए...बस इतना कीजिए कि सियासत के जो दांव-पेंच जानते हैं, वो मुझे भी सिखा दीजिए...

अब बेटे ने ज़्यादा जिद की तो पिता ने उससे कहा कि चलो छत पर चलते हैं...वहीं राजनीति की बात करेंगे....बेटा पिता के साथ छत पर आ गया...छत पर पहुंचने के बाद पिता ने बेटे से कहा....चलो अब छत से नीचे छलांग लगा दो...बेटा सियासत में आने को मरा जा रहा था...उसने सोचा कि शायद ये ज़रूरी शर्त होगी...बेटे ने बिना आगा-पीछे सोचे छत से नीचे छलांग लगा दी....बेटे की टांग टूट गई...अब बेटा पिता पर आग-बबूला....ये क्या मैंने आपको राजनीति सिखाने को कहा और आप ने मेरी टांग तुड़वा दी...

इस पर बाप का जवाब था...

बेटा यही पहला पाठ है...राजनीति में कभी अपने बाप की बात पर भी भरोसा नहीं करना....