शनिवार, 25 मई 2013

IPL के अंधियारे में सीता और राजू...खुशदीप

पहले दो रियल हीरोज़ की बात...

मध्य प्रदेश के रीवा की सीता साहू....और अहमदाबाद का राजू भरवाड़...

सीता साहू ने एथेंस में 2011 के स्पेशल ओलंपिक्स में दो कांस्य पदक जीते...200 मीटर और 1600 मीटर की दौड़ में...सीता के पिता चाट का ठेला लगाते हैं...पिछले दिनों पिता बीमार हो गए तो घर का खर्च चलाने के लिए सीता को खुद गोलगप्पे बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा...




सीता का स्कूल भी छूट गया...सीता को इस स्थिति में लाने के लिए कुछ हद तक मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार भी ज़िम्मेदार है...दरअसल सरकार के पंचायत और सामाजिक न्याय मंत्री गोपाल भार्गव ने एथेंस स्पेशल ओलंपिक्स से पहले ऐलान किया था कि जो भी खिलाड़ी पदक जीत कर लायेगा, उसे नकद इनाम दिया जाएगा...स्वर्ण पर एक लाख, रजत पर 75 हज़ार और कांस्य पर 50 हज़ार...इस हिसाब से एथेंस ओलंपिक्स के बाद सीता को एक लाख रुपये मिल जाने चाहिए थे जो नहीं मिेले...सीता की गोलगप्पे बेचने वाली तस्वीरें मीडिया के ज़रिए सामने आईं तो मुख्यमंत्री नींद से जागे और सीता के लिए आनन-फ़ानन में एक लाख रुपये दिलाने का प्रबंध किया...मीडिया में बात आ गई तो कांग्रेस भी अपना सामाजिक चेहरा दिखाने में कहां पीछे रहने वाली थी...केंद्रीय ऊर्जा राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सीता के लिए नेशनल थर्मल पॉवर कॉरपोरेशन की ओर से पांच लाख रुपये और एक मकान दिलवाने का ऐलान किया...चलो किसी भी तरह सीता की किस्मत बदली तो सही...बहुत अच्छा हुआ...

अब अहमदाबाद के राजू भरवाड़ की बात...ऑटो रिक्शा चला कर परिवार का गुज़ारा करने वाला राजू दिन में मुश्किल से दो-तीन सौ रुपये कमा पाता है...पिछले दिनों राजू को गुजरात औद्योगिक विकास निगम की ओर से एक करोड़ नब्बे लाख रुपये का चेक मिला...ये चेक उसे साणंद के पास पुश्तैनी ज़मीन के मुआवज़े के तौर पर मिला...मां और अपने नाम चेक देखकर राजू चौंका...राजू जानता था कि जिस ज़मीन का उसे चेक मिला वो उसके दादा ढाई दशक पहले नब्बे हज़ार रुपये में बेच चुके थे...वहां कुछ और परिवार भी रहने लगे...लेकिन सरकारी कागज़ों में ज़मीन राजू के परिवार के नाम ही रही...राजू चाहता तो चेक की रकम से उसके पूरे परिवार की किस्मत बदल सकती थी....लेकिन राजू ने वो चेक अगले दिन ही गुजरात औद्योगिक विकास निगम को ले जाकर लौटा दिया...ये कहकर कि वो चेक रखकर पूरी ज़िंदगी अपनी आंखों में शर्मिंदा नहीं रह सकता था...राजू ने ये भी कहा कि ये उन परिवारों के साथ भी अन्याय होता जो उस ज़मीन पर रह रहे हैं...उन्हें वहां से बेदखल होना पड़ता...



आपने सीता और राजू की कहानियां पढ़ ली...

अब आइए अरबों रुपये के तमाशे इंडियन प्रीमियर लीग पर...कहने को देशवासियों को क्रिकेट और एंटरटेनमेंट का हेवी डोज़...ये भी दलील कि इससे नए प्रतिभावान खिलाड़ियों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने में मदद मिलती है...खेलते तो आईपीएल मैचों में लाखों-करोड़ों की नीलामी में खरीदे गए खिलाड़ी ही हैं...लेकिन इन्हें नचाने वाले होते हैं उद्योगपति, धन्ना सेठ, फिल्म स्टार्स...इस तमाशे की डोर बीसीसीआई के हाथ में ही रहती है...इस बीसीसीआई के पदाधिकारियों में देश के कई नामी राजनेता भी शामिल है...बीसीसीआई के चुनावों में बोर्ड की राज्य स्तर की इकाइयों के पदाधिकारी हिस्सा ले सकते हैं...इसलिए राज्यों के नामी नेता ही इन इकाइयों पर काबिज़ हैं...होना तो चाहिए राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले पूर्व क्रिकेटर्स के हाथों में इस खेल का नियंत्रण रहे...लेकिन अब ये क्रिकेट रहा ही कहा है...ये तो पैसे की महालूट का खेल बन चुका है...

कांग्रेस के राजीव शुक्ला आईपीएल कमिश्नर हैं तो बीजेपी के अरुण जेटली बीसीसीआई की अनुशासन समिति के सर्वेसर्वा...इनके अलावा और भी कई नेता क्रिकेट प्रशासन से जुड़े हैं...यहां दलीय राजनीति को पीछे छोड़कर सब एकजुट होकर क्रिकेट की भलाई के नाम पर खुद मलाई काटने में लगे हैं...कीर्ति आज़ाद या अजय माकन जैसे इक्का-दुक्का लोग बीसीसीआई पर लगाम लगाने की बात करते भी हैं तो पॉवरफुल लॉबी के आगे उनकी बात नक्कारखाने में तूती बन कर रह जाती है...

वरना कौन नहीं जानता कि एन श्रीनिवासन बीसीसीआई के अध्यक्ष भी बने रहते हैं...साथ ही अपनी कंपनी इंडिया सीमेंट्स के ज़रिए चेन्नई सुपरकिंग्स का मालिकाना हक़ भी अपने पास रखते हैं...इस टीम की कप्तानी भी वही महेंद्र सिंह धोनी करते हैं जो भारत की भी कप्तानी करते हैं...इन्हीं श्रीनिवासन साहब के दामाद गुरुनाथ मयप्पन को बुकीज़ से संपर्क और फिक्सिंग में भूमिका के शक में मुबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने शुक्रवार रात को तीन घंटे की पूछताछ के बाद गिरफ्तार कर लिया...बुकीज़ से संपर्क रखने के आरोप में गिरफ्तार अभिनेता विंदू दारा सिंह ने माना है कि मयप्पन खुद सट्टेबाज़ी पर मोटी रकम लगाते रहे हैं...अब इस सारे घटनाक्रम को जानने के बाद क्या ये मुमकिन नहीं कि पूरा आईपीएल ही फिक्स्ड है...बीसीसीआई खुद पूरी दुनिया में सबसे मालदार बोर्ड है लेकिन फिर भी इसके सबसे ऊंचे ओहदेदार का दामाद खुद ही फिक्सिंग की फांस में है...और ये दामाद कोई ऐरा-गैरा नहीं बल्कि देश के सबसे पुराने फिल्म प्रोडक्शन हाउस एवीएम का वारिस है...चार्टर्ड प्लेन पर घूमने की हैसियत रखता है...

खिलाड़ियों को अपने इशारों पर नचाने के लिए आईपीएल मैचों के बाद रात भर होने वाली पार्टीज़ में सुरा और सुंदरी का भी भरपूर इंतज़ाम रहता है...इसी चक्कर में बताया जाता है कि श्रीसंत जैसा प्रतिभाशाली खिलाड़ी भी अपने मुंह पर फिक्सिंग की कालिख पुतवा बैठा...ये वही श्रीसंत है जिसे राजस्थान रॉयल्स ने दो करोड़ रुपये की फीस में 2011 में खरीदा था...लेकिन दिल्ली पुलिस के मुताबिक पैसे की हवस और अय्याशी के चक्कर ने श्रीसंत को कहीं का नहीं छोड़ा...

अब तो विदेशों से आईं चीयरलीडर्स को लेकर भी उंगली उठ रही हैं...कहीं ये भी खिलाड़ियों या अम्पायर्स को फांसने का चक्कर तो नहीं...पाकिस्तान के अंपायर असद रऊफ का नाम अय्याशी में पहले भी सामने आया था, अब फिक्सिंग में भी वो जांच के घेरे में हैं...आईसीसी ने बिना वक्त गंवाए असद रऊफ़ को जून में होने वाली चैंपियंस ट्रॉफी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है...ऐसी ही ठोस कार्रवाई बीसीसीआई करे तो कैसे करे...उसके तो खुद मुखिया श्रीनिवासन के हाथ ही जले हुए हैं...श्रीनिवासन का खुद का बेटा अश्विन एक अंग्रेजी अखबार को दिए इंटरव्यू में अपने जीजा मयप्पन को फिक्सिंग का गुरु बता रहा है...साथ ही अपने पिता पर भी सवाल उठा रहा है कि वो क्यों अपने छोटे विमान के लिए दुबई में चार घंटे रुककर ईंधन भरवाना पसंद करते है...अश्विन पूछ रहा है कि वो कौन से लोग हैं जिनके साथ उनके पिता दुबई हाल्ट के दौरान गोल्फ खेलना पसंद करते हैं...

कोई बड़ी बात नहीं कि कराची और दुबई में बैठे देशविरोधी तत्व फिक्सिंग और सट्टेबाज़ी के सिंडीकेट के ज़रिए देश की आस्तीन में बैठे सांप-सपोलों की मदद से अरबों रुपये कूट रहे हों...और फिर इसी पैसे का इस्तेमाल देश में आए-दिन आतंक की नई इबारतें लिखने में भी होता हो...

एक तरफ़ धनपशु पैसे के लालच में कुछ भी करने को तैयार है...वहीं अहमदाबाद में एक राजू भरवाड़ की  मिसाल है...छह हज़ार रुपये महीना कमाने के बावजूद 1.90 करोड़ रुपये की रकम को ठुकराने में एक मिनट की देर नहीं लगाता...क्योंकि उसे अपनी नज़रों में शर्मिंदा नहीं होना है...एक तरफ़ देश में आईपीएल नुमा तमाशे में सट्टे, फिक्सिंग और सेक्स का नंगा नाच है...सब क्रिकेट के नाम पर...वहीं इस क्रिकेट की चकाचौंध (या अंधियारा) में रीवा में सीता साहू जैसी लड़की भी है जो स्पेशल ओलंपिक्स में दो मेडल जीतने के बाद भी पानीपूरी बेचती है....क्या ये देश में क्रिकेट की बेशर्मी के आगे और सभी खेलों की मौत का सबूत नहीं है...

स्लॉग ओवर

एक तौलिया उतारना रणबीर कपूर को कहां से कहां पहुंचा देता है...

एक तौलिया कमर पर लगाना श्रीसंत को कहां से कहां पहुंचा देता है...

रविवार, 19 मई 2013

पत्रकारिता और पेपाराज़्ज़ी का फ़र्क...खुशदीप

16 मई  को संजय दत्त के घर के बाहर सुरक्षा का कड़ा पहरा था...संजय दत्त को सरेंडर के लिए टाडा कोर्ट जाना था, इसलिए मीडियाकर्मियों की सुबह से ही भीड़ लगने लगी थी...संजय के फैन्स भी वहां पहुंचे थे, लेकिन उनकी संख्या कम ही थी...

सुबह करीब साढ़े ग्यारह बजे संजय पत्नी मान्यता और फिल्मकार महेश भट्ट के साथ घर से निकले और कार से टाडा कोर्ट की ओर रवाना हुए...घर के बाहर से संजय की कार के साथ ही अनगिनत गाड़ियों ने चलना शुरू कर दिया...कैमरामैन और फोटोग्राफ़र संजय दत्त की हर झलक को कैद करने के लिए बेताब थे तो पत्रकार रिपोर्टिंग के लिए...

कार में संजय दत्त के साथ बैठे महेश भट्ट के मुताबिक उस वक्त बड़ा खतरनाक नज़ारा था...कई कार और बाइक्स साथ-साथ दौड़ रही थीं...यही सब संजय के घर से लेकर कोर्ट पहुंचने तक लगातार चलता रहा...उस वक्त संजय दत्त और उनकी पत्नी मान्यता की तस्वीरें लेने कि कोशिश में कोई हादसा भी हो सकता था...संजय साढ़े तीन साल के लिए जेल जा रहे थे, इसलिए उनकी और मान्यता की उस वक्त क्या मनोदशा होगी, इसे कोई भी समझ सकता है...लेकिन कवरेज के नाम पर किसी भी हद तक जाना क्या किसी की निजता का उल्लंघन नहीं है...यही फर्क पत्रकारिता और पेपाराज़्जी को अलग करता है...

कोर्ट रूम के बाहर संजय की कार पहुंची तो वहां भीड़ का ये आलम था कि कार का दरवाज़ा भी बहुत मुश्किल से खुल सकता था...पुलिस से रास्ता दिलाने के लिए कहा गया तो उसने असमर्थता जता दी...पुलिस का कहना था कि वहां भीड़ को हटाने के लिए लाठी चार्ज भी नहीं किया जा सकता...क्योंकि भीड़ में ज़्यादातर मीडियाकर्मी ही थे...महेश भट्ट और संजय दत्त की ओर से रास्ता देने की गुहार किए जाने पर भी कोई असर नहीं हुआ...उधर सरेंडर का टाइम भी नज़दीक आता जा रहा था...आखिर करीब ढाई बजे संजय को भीड़ को चीरते हुए ही कोर्ट तक बढ़ना पड़ा...




संजय दत्त ने चार दिन पहले ही टाडा कोर्ट से गुहार लगाई थी कि उन्हें कोर्ट की जगह सीधे जेल में सरेंडर करने दिया जाए...उन्होंने हवाला भी दिया था कि उनके पिछली बार मुंबई से पुणे की यरवडा जेल जाते समय 120 किलोमीटर की रफ्तार से पुलिस वैन का पीछा किया गया था...हालांकि संजय ने जेल में सीधे सरेंडर की अपनी अर्ज़ी बाद में वापस ले ली थी...संजय ने 16 मई को टाडा कोर्ट में ही सरेंडर किया...

संजय दत्त के घर से कोर्ट रूम तक जो हुआ, उसे टाडा जज ने सुरक्षा व्यवस्था की खामी मानते हुए मुंबई पुलिस को कड़ी फटकार भी लगाई...अब संजय दत्त 16 मई की रात से ही ऑर्थर रोड जेल में बंद है...अभी अधिकारी ये तय नहीं कर सके हैं कि उन्हें पुणे या नासिक में से कहां की जेल में शिफ्ट करना है...ज़ाहिर है उनके लिए संजय दत्त को शिफ्ट कराते वक्त वैन में बिना किसी असुविधा के ले जाना भी बड़ी चुनौती होगा...

महेश भट्ट ने इस घटना का ज़िक्र किया तो साथ ही 31 अगस्त 1997 को पेरिस में कार हादसे में ब्रिटेन की राजकुमारी डायना की मौत का भी हवाला दिया...
जुलाई 2008 में लंदन में क्रोनर जूरी ने फैसला भी दिया था कि डायना और उनके दोस्त डोडी फयाद की मौत इसलिए हुई क्योंकि उनकी कार के पीछे पेपाराज्ज़ी ( कुछ फोटोग्राफर) लगे हुए थे...ऐसे में डायना की कार का ड्राइवर तूफ़ानी रफ्तार से कार दौड़ा रहा था...ड्राइवर नशे में था, इसने और काम बिगाड़ दिया और एक अंडरपास से गुज़रते वक्त ये हादसा हो गया...




ऐसे में महेश भट्ट का सवाल है कि क्या हम भारत में भी ऐसे ही किसी हादसे का इंतज़ार कर रहे हैं...क्या ऐसी नौबत आने से पहले ही कोई उपचारात्मक कदम नहीं उठाए जाने चाहिए...

महेश भट्ट के सवाल में मुझे दम नज़र आता है...इससे पहले कि सरकार या कोर्ट कुछ निर्देश दे, या पुलिस सुरक्षा बंदोबस्त के दौरान सख्ती से पेश आए, क्या मीडिया को खुद ही कोई आत्मसंयमन या नियमन का रास्ता नही निकाल लेना चाहिए...

 

 

रविवार, 12 मई 2013

देश को पीएम की ज़रूरत ही कहां है...खुशदीप


पीएम की दुविधा, सोनिया की सुविधा...

मंत्रीमंडल में किसे शामिल करना है, किसे बाहर करना है, ये प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार होता है...हमारे देश का संविधान यही कहता है...कम से कम बचपन से पढ़ते तो हम यही आए हैं...लेकिन क्या पवन कुमार बंसल और अश्वनी कुमार के इस्तीफों को लेकर भी यही बात कही जा सकती है...कम से कम अश्वनी कुमार का इस्तीफा तो प्रधानमंत्री नहीं लेना चाहते थे...सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल ने शुक्रवार को पीएम आवास पर जाकर जब तक सुनिश्चित नहीं कर लिया कि अश्वनी कुमार इस्तीफ़ा दे रहे हैं, तब तक वहीं डेरा डाले रखा...

ख़बरें ऐसी भी छनकर आ रही हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अश्वनी कुमार के मसले पर सोनिया गांधी से अपनी नाराज़गी भी जता दी है...यहां तक कि प्रधानमंत्री ने अपना ही इस्तीफ़ा देने की पेशकश भी कर डाली थी...मनमोहन की नाराज़गी इस बात को लेकर है कि मीडिया के ज़रिए कांग्रेस के कुछ सिपहसालारों ने ये संदेश देने की कोशिश की कि सोनिया की नाराज़गी के बावजूद प्रधानमंत्री ने दोनों मंत्रियों का इस्तीफ़ा लेने में देर लगाई...लेकिन जब संसद चल रही थी और विपक्ष ने बंसल-अश्वनी के इस्तीफे को लेकर बवाल काट रखा था, तब सोनिया गांधी ने ही संदेश दिया था कि विपक्ष के दबाव के आगे नहीं झुका जाएगा...यानि दोनों मंत्रियों को इस्तीफ़ा देने की ज़रूरत नहीं है...

इसी लाइन को बढ़ाते हुए सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने गुरुवार को बयान भी दिया था कि कोयला घोटाला मामले में सुप्रीम कोर्ट में 10 जुलाई को सरकार को जवाब देना है, इसलिए उससे पहले अश्वनी कुमार पर कोई बात करने का मतलब हीं नहीं है...पवन बंसल पर भी मनीष तिवारी ने कहा था कि सीबीआई जांच जारी है और जब तक जांच का कोई नतीजा नहीं आता तब तक किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता...फिर अचानक शुक्रवार को क्या हुआ कि सोनिया गांधी खुद ही दोनों मंत्रियों का इस्तीफ़ा कराने के लिए पीएम आवास जा पहुंचीं...अगर इस्तीफे लेने ही थे तो पहले ही ले लिए जाते...संसद तो दो दिन चल जाती...साथ ही ज़मीन अधिग्रहण और खाद्य सुरक्षा जैसे अहम बिल भी नहीं लटकते...

अब ये तो तय है कि मनमोहन सिंह अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ओर से पीएम पद के उम्मीदवार नहीं होंगे...राहुल गांधी तैयार हुए तो ठीक नहीं तो चिदम्बरम या एंटनी में से किसी को आगे किया जा सकता है...दलित सुशील कुमार शिंदे पर भी दांव लग सकता था लेकिन गृह मंत्री के तौर पर उनके प्रदर्शन को देखते हुए शायद ही उनका नंबर लगे...फिलहाल कांग्रेस के लिए मजबूरी है कम से कम अगले लोकसभा चुनाव तक मनमोहन ही प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाले रखें...अब ये मनमोहन पर निर्भर करता है कि वो ईमानदारी के मोर्चे पर अपने दामन को बेदाग़ रखने के लिए क्या करते हैं...कड़वा घूंट पीकर 10 जनपथ से वफ़ादारी निभाते रहते हैं या कोई ठोस फैसला लेकर अपने माथे से 'कमज़ोर प्रधानमंत्री' का टैग हटाने की कोशिश करते हैं...अब ये मनमोहन सिंह पर है कि वो इतिहास में खुद को किस रूप में दर्ज़ कराना चाहते हैं....

वैसे पीएम की दुविधा, सोनिया की सुविधा और कांग्रेस का अंर्तद्वंद्व सब का जवाब क्या इस सटीक कॉर्टून में नहीं छुपा है....

(साभार  मेल टुडे )


स्लॉग ओवर

नेहरू ने साबित किया कि एक अमीर आदमी देश का प्रधानमंत्री बन सकता है....

शास्त्री ने साबित किया कि एक गरीब आदमी देश का प्रधानमंत्री बन सकता है...

इंदिरा गांधी ने साबित किया कि एक महिला देश की प्रधानमंत्री बन सकती है...

मोरारजी देसाई ने साबित किया कि स्वमूत्रपान  करने वाला शख्स देश का प्रधानमंत्री बन सकता है...

राजीव गांधी ने साबित किया कि प्रधानमंत्री बनना वंशागत खामी है...

वी पी सिंह ने साबित किया कि एक राजा देश का प्रधानमंत्री बन सकता है...

नरसिम्हा राव ने साबित किया कि एक चूका हुआ नेता भी देश का प्रधानमंत्री बन सकता है...

देवेगौड़ा ने साबित किया कि कोई भी देश का प्रधानमंत्री बन सकता है...

वाजपेयी ने साबित किया कि प्रधानमंत्री  के पास करने के लिए कुछ नहीं होता...

और...

मनमोहन सिंह ने साबित किया कि इस देश को प्रधानमंत्री की ज़रूरत ही नहीं है...

अत: इस देश का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा...इस पर इतनी हाय-तौबा क्यों....


बुधवार, 8 मई 2013

नुज़हत तुम पहले 'पाकिस्तानी' हो...खुशदीप



एक है गुलफ़ाम...एक है नुज़हत जहां...दोनों का आपस में पहले 'फर्स्ट कज़न्स'  का रिश्ता था लेकिन पिछले 30 साल से पति-पत्नी है...दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके में रहने वाले इस जोड़े की तीन संतान हैं, जिनमें से दो की शादी हो चुकी है...गुलफ़ाम और नुज़हत दादा-दादी और नाना-नानी भी बन चुके हैं...

गुलफ़ाम अपनी पोतियों के साथ 

तीन दशक एक साथ रहने के बाद गुलफ़ाम और नुज़हत अलग हो चुके हैं...तलाक जैसी कोई बात नहीं है...उम्र  के इस पड़ाव पर दोनों एक दूसरे से अलग नहीं होना चाहते...लेकिन दोनों को जुदा होना पड़ रहा है...30 साल में ये दूसरा मौका है जब गुलफ़ाम को नुज़हत से अलग होना पड़ रहा है...दिल्ली की एक अदालत ने बीती 2 मई को नुज़हत को तिहाड़ जेल भेज दिया...साथ ही ये आदेश भी दिया कि छह दिन के अंदर नुज़हत को पाकिस्तान भेज दिया जाए...इस हिसाब से आठ मई को नुज़हत का भारत में आखिरी दिन है...

इससे पहले 2 जून 2002 को भी नुज़हत और गुलफ़ाम को एक दिन के लिए अलग होना पड़ा था...तब नुज़हत को वीज़ा और वैध पासपोर्ट के बिना भारत में ज़्यादा दिन तक रहने के अपराध में एक रात के लिए जेल में रहना पड़ा था...

वीर-ज़ारा की फिल्मी कहानी की तरह गुलफ़ाम-नुज़हत की इस रियल स्टोरी में भी जज़्बात की कमी नहीं है...

ये कहानी शुरू होती है...देश के बंटवारे के वक्त से...गुलफ़ाम के पिता जहां भारत में ही रहने का फैसला करते है, वहीं नुज़हत का परिवार पाकिस्तान चला जाता है...1961 में गुलफ़ाम का भारत में जन्म होता है...चार साल साल बाद यानि 1965 में पाकिस्तान में नुज़हत का जन्म...अस्सी के दशक के शुरू में 20-21 साल का जवान गुलफ़ाम अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए पाकिस्तान जाता है...वहां नुज़हत को वो पहली बार देखता है और उस पर फिदा हो जाता है...नुज़हत भी गुलफ़ाम को पसंद करने लगती है...नुज़हत का परिवार भी इस रिश्ते पर मंज़ूरी की मुहर लगा देता है...सगाई के बाद गुलफ़ाम भारत लौट आता है...

2 अगस्त 1983 को गुलफ़ाम अपने परिवार के साथ पाकिस्तान जाता है और नुज़हत को निकाह के बाद भारत ले आता है...तभी से ये जोड़ा तुर्कमान गेट इलाके के अपने पुश्तैनी मकान में रह रहा है...भारत आने के बाद पहले नुज़हत का वीज़ा कुछ-कुछ महीनों के आधार पर बढ़ता रहा...नुज़हत को भारत आने के बाद पहली बार 1985 में लॉन्ग टर्म वीज़ा मिला...इसके बाद भी कई बार नुज़हत का वीज़ा बढ़ाने के लिए आवेदन दिए गए...1988 में नुज़हत के पाकिस्तानी पासपोर्ट की मियाद ख़त्म हो गई...पाकिस्तानी उच्चायोग में नये पासपोर्ट के लिए अप्लाई किया गया..नुज़हत को नया पासपोर्ट पांच साल के लिए और मिल गया...लेकिन इसकी मियाद भी 1993 में ख़त्म हो गई...नुज़हत के लिए फिर नये पासपोर्ट के लिए दरख्वास्त दी गई तो पाकिस्तानी उच्चायोग ने इसे नामंज़ूर कर दिया...पाकिस्तानी उच्चायोग का कहना था कि पांच-पांच साल के दो एक्सटेंशन दिए जा चुके हैं, अब नुज़हत को भारतीय नागरिकता के लिए भारत सरकार से आवेदन करना चाहिए...

1994 में नुज़हत का वीज़ा भी ख़त्म हो गया...1996 में नुज़हत के लिए भारत के गृह मंत्रालय को भारतीय नागरिकता देने के लिए अर्ज़ी दी गई...नुज़हत के पति गुलफ़ाम का दावा है कि नुज़हत की नागरिकता की फ़ाइल गृह मंत्रालय से खो गई...बार बार आग्रह किए जाने पर भी इस संबंध में गृह मंत्रालय से लिखित में कोई जवाब नहीं मिला...ओवर स्टे पर गुलफ़ाम ने नुज़हत के लिए 1800 रुपये का जुर्माना भी भरा था...गुलफ़ाम ने ये सारे रिकार्ड्स भी उपलब्ध कराए...

दूसरी ओर पासपोर्ट अधिकारियों का कहना है कि नुज़हत का वीज़ा 1993 में कालातीत (एक्सपायर) होने  के बाद कई बार रिमाइंडर भेजे गए, लेकिन नुज़हत की ओर से कोई जवाब नहीं मिला...उसके कई बार अवसर मिलने के बाद भी नुज़हत का ना तो वीज़ा बढ़वाया गया और ना ही उसके लिए नये पासपोर्ट का इंतज़ाम किया गया...

गुलफ़ाम और नुज़हत की 22 साल की बेटी गुलज़ात का कहना है कि जब भी दोनों देशों के बीच किसी भी बात पर तनाव बढ़ा, उन्हें मां के केस पर प्रतिकूल असर पड़ने की चिंता सताने लगती थी...गुलफ़ाम का कहना है कि उनकी बहन का निकाह पाकिस्तान में 1995 में हुआ, और वो एक साल बाद भारत हमसे मिलने आई तो वो पाकिस्तानी पासपोर्ट पर आई थी...लेकिन नुज़हत 30 साल भारत रहने के बाद भी भारतीय नागरिक नहीं बन सकी...

गुलफ़ाम के मुताबिक नुज़हत के भाई ज़रूर पाकिस्तान में रहते हैं...लेकिन उसने उन्हें पिछले 21 साल से नहीं देखा है...अब इतने साल बाद नुज़हत के वहां पहुंचने पर उनका क्या बर्ताव रहेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता...ऐसे में नुज़हत का पाकिस्तान में क्या होगा...नुज़हत के बिना गुलफ़ाम और परिवार के बाक़ी सदस्यों का भारत में क्या होगा...सवाल वाकई बडे पेचीदा है...

कहानी आपने पढ़ ली...आपकी क्या राय है...

क्या नुज़हत को पाकिस्तान भेजने के अलावा कोई और विकल्प नहीं...

क़ानूनन तौर पर नुज़हत के साथ जो किया जा रहा है, वो बिल्कुल सही हो सकता है...लेकिन एक 18 साल की लड़की जो निकाह के बाद अपना सब कुछ छोड़-छाड़ कर भारत आती है...यहां गृहस्थी सजाने के लिए पूरी मेहनत करती है...पहले बच्चों को पालने-पोसने में दिन रात एक करती है...फिर बच्चों के भी बच्चों का मुंह देख-देख कर रोज़ जीती है...फिर उसे एक दिन इस सबसे अलग कर उसके हाल पर छोड़कर पाकिस्तान भेज दिया जाता है...मुझे नहीं लगता कि नुज़हत इतनी पढ़ी लिखी होगी कि पासपोर्ट-वीज़ा, भारतीय नागरिकता की पेचीदिगियों को खुद ही समझ पाती...ऐसे में गुलफ़ाम को भी दोषी ठहराया जा सकता है कि वक्त रहते क़ानूनी शर्तों को पूरा करने के लिए क्यों ज़्यादा संजीदगी नहीं दिखाई...

नुज़हत को सरहद पार पहुंचा कर क़ानून का बेशक हम मान रखेंगे...लेकिन अगर वो कसूरवार है तो उसे इस हाल में उसे पहुंचाने वाले क्या कम गुनहगार नहीं...क्या सिस्टम का इसमें कोई दोष नहीं...शायद नहीं...क्योंकि नुज़हत एक पत्नी, एक बहू, एक मां, एक सास,  एक दादी, एक नानी बेशक भारत में 30 साल रहने के दौरान बनी लेकिन वो इन सबसे पहले एक 'पाकिस्तानी' है....

शनिवार, 4 मई 2013

नशे में सीमा लांघना 'राष्ट्रीय बहादुरी' है !...खुशदीप




सरबजीत का उसके गांव भिखिविंड में शुक्रवार को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हो गया...सरबजीत को पाकिस्तान की जेल में 22-23 साल नारकीय परिस्थितियों में गुज़ारने पड़े होंगे, ये वाकई बेहद दुखद था...उसके परिवार के लिए भी ये पूरा दौर बहुत कष्टकारी रहा...सरबजीत की बहन दलबीर कौर पिछले सात-आठ साल से उसकी रिहाई के लिए बहुत मुखर रहीं...ये दलबीर कौर की वाकपटुता ही है कि उन्होंने सरबजीत की व्यथा को देश में घर-घर तक पहुंचा दिया...पाकिस्तान की जेलों में करीब पांच सौ और भारतीय कैदी भी बंद है...लेकिन उनके घर वाले बेचारे दुर्भाग्य से ये काम नहीं कर सके...इसलिए सरबजीत जैसी परिस्थिति में होने के बावजूद और किसी भारतीय कैदी पर ऐसा फ़ोकस नहीं गया...

सरबजीत के लिए तीन दिन का राजकीय शोक मनाने के साथ पंजाब सरकार ने उसके परिवार को राजकीय ख़जाने से एक करोड़ रुपये दिए...दोनों बेटियों को सरकारी नौकरी भी मिल जाएगी...पंजाब सरकार ने सरबजीत को शहीद का दर्जा देने के लिए राज्य विधानसभा में प्रस्ताव लाने का भी इंतज़ाम किया...केंद्र सरकार भी 25 लाख रुपये देने के साथ पेट्रोल पंप या गैस एंजेसी देने के लिए भी प्राथमिकता के आधार पर काम कर रही है...प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सरबजीत को 'देश का बहादुर बेटा' बताया है...काश इसी साल 15 जनवरी को लाहौर की कोट लखपत जेल में ही सरबजीत जैसे हालात में ही मारे गए चमेल सिंह के परिवार को भी ये सब कुछ मिला होता...शायद चमेल सिंह की कोई दलबीर कौर जैसी बहन नहीं रही होगी...

चमेल सिंह

सरबजीत को लेकर जो उन्माद जैसे हालात रहे वो अब हफ्ते दस दिन में शांत हो जाएंगे...हो सकता है दलबीर कौर को कोई सियासी पार्टी अगले लोकसभा चुनाव के लिए टिकट भी थमा दे...इस पूरे प्रकरण पर कुछ सवाल कौंध रहे हैं...हो सकता है आपके पास उनके सवालों का जवाब हो...

सरबजीत के घर वाले उसके बचाव में हमेशा यही तर्क देते रहे हैं कि वो नशे में सरहद लांघ गया था...और पाकिस्तान ने उसे मनजीत सिंह की गलत पहचान देकर बम ब्लास्ट के केस में झूठा फंसा दिया...पाकिस्तान ने ये भी कहा कि सरबजीत भारतीय जासूस था...लेकिन भांरत सरकार ने कभी नही माना कि सरबजीत भारतीय जासूस था...सरबजीत के परिवार और भारत सरकार के दिए तथ्यों पर शक करने के लिए हमारे पास कोई गुंजाइश नहीं हो सकती...ऐसे में सरबजीत के नशे में सरहद पार करने और वहां पाकिस्तान के चंगुल में फंस जाने से ही क्या वो शहीद का दर्जा पाने और राष्ट्रीय हीरो कहलाने  के लिए फिट हो जाता है...सरबजीत मातृभूमि के किसी मिशन पर पाकिस्तान  नहीं गया था...फिर कैसे उसे राजकीय सम्मान दिया जा सकता है या तीन दिन का राजकीय शोक किया जा सकता है...क्या पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल बता सकते हैं कि किसी भारतीय सैनिक को भी राज्य या देश के लिए ड्यूटी पर शहादत के बाद उसके परिवार को उन्होंने राजकीय ख़जाने से एक करोड़ रुपये दिए...

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी साफ़ करना चाहिए कि 'भारत का बहादुर बेटा' कहलाने के लिए सरबजीत ने बहादुरी के कौन-कौन से मापदंडों को पूरा किया...क्या नशे में सरहद पार करना ही बहादुरी होती है...ऐसे में सरबजीत के लिए पंजाब और केंद्र सरकार की ओर से इतना कुछ किए जाने से ये सवाल नहीं उठता कि क्या सरबजीत वाकई  भेजा गया 'स्टेट स्पांसर्ड एक्टर' था...