रविवार, 28 अप्रैल 2013

बताओ भला देश में भागदौड़ कहां कम है...खुशदीप


CWG, 2G, COAL, CHITFUND, HELICOPTER DEAL….

सब जगह घोटाला...देश में उबाल...विपक्ष का बवाल...संसद में भूचाल...सरकार फिर भी कमाल...कह रही है, हम जितने ज़रूरी कदम हैं, सभी उठा रहे हैं...भ्रष्टाचारियों को बख्शा नहीं जाएगा....लेकिन किसी मंत्री-संतरी के इस्तीफ़ा देने का सवाल ही नहीं उठता...

आज जो विपक्ष है वो शायद कल सरकार में होगा...आज जो सत्ता पक्ष है वो शायद कल विपक्ष होगा...बाकी कुछ नहीं बदलेगा...भ्रष्टाचार वैसा ही रहेगा...घोटाले होते रहेंगे...बस रोल बदल जाएंगे...आज जो सरकार में है, कल वही संसद ठप करा रहे होंगे...आज जो विपक्ष में हैं, कल वो कह रहे होंगे, इस्तीफ़ा देने का सवाल ही नहीं होता....

खैर ये तो रही राजनीति...अब एक दूसरी बात...दिल्ली में कोई दिन ऐसा नहीं जा रहा जब किसी दामिनी, निर्भया, गुड़िया, लाडो या मुनिया को वहशी दरिंदे अपना शिकार ना बना रहे हों...लेकिन पुलिस कमिश्नर साहब कहते हैं, सुरक्षा के लिए जो ज़रूरी है वो सब कर तो रहे हैं...साथ ही ये तर्क भी दे डाला ज़्यादातर दुष्कर्म की वारदात घरवाले या जानने वाले ही करते हैं...इसलिए हर घर में तो पुलिस नहीं बिठायी जा सकती....कमिश्नर साहब कहते हैं पुलिस इतनी भागदौड़ कर रही है तो फिर मेरा इस्तीफ़ा देने का सवाल ही कहा होता है...

 ये सारे बयानात देख एक कहानी याद आ गई...आप भी पढ़िए, शायद इसमें आपको देश का सच नज़र आए...

 "एक जंगल था...उसमें हर तरह के जानवर रहते थे...एक दिन जंगल के राजा का चुनाव हुआ...जानवरों ने शेर को छोड़कर एक बन्दर को राजा बना दिया...एक दिन शेर बकरी के बच्चे को उठा के ले गया...बकरी बन्दर राजा के पास गई और अपने बच्चे को छुड़ाने के लिए मदद मांगी...

बन्दर शेर की गुफ़ा के पास गया और गुफ़ा में बच्चे को देखा...पर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई...बन्दर राजा गुफ़ा के आसपास पेड़ों पर उछाल लगाता रहा...कई दिन ऐसे ही उछल कूद में गुजर गए...
 
तब एक दिन बकरी ने जाके पूछा- "राजा जी मेरा बच्चा आख़िर कब लाओगे?".

बन्दर राजा तिलमिलाते हुए बोला " हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ"...





तो अब बताइए भला, देश में भागदौड़ की कहां कमी है...

बात करते हैं...

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

ओ लैला तुम्हे कुटवा देगी, लिख के ले लो...खुशदीप




एकता कपूर-संजय गुप्ता की प्रोड्यूस की गई नई फिल्म 'शूटआउट एट वडाला' के प्रमोशन के लिए इसकी स्टारकास्ट पिछले दिनों दिल्ली-नोएडा में थी...इसी दौरान दिल्ली समेत पूरे देश को पांच साल की बच्ची के साथ हैवानियत की वारदात ने उद्वेलित कर रखा था...

'शूट आउट एट वडाला' में पुलिस ऑफिसर बने अनिल कपूर ने इस वारदात पर कहा-

"मैं समझता हूं, देश में ऐसा कोई नहीं होगा जो इसकी भर्त्सना नहीं करेगा...मैं समझता हूं ये पूरी तरह शर्मनाक और अस्वीकार्य है...पुलिस को इसके लिए जवाबदेह होना चाहिए...सरकार जिस पर लोगों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी है, उसे जवाबदेह होना चाहिए.."

फिल्म में डॉन बने जॉन अब्राहम ने कहा कि बलात्कारियों को फांसी से कम सज़ा नहीं मिलनी चाहिए...जॉन ने ऐसी घटनाओं के लिए परवरिश और शिक्षा की ख़ामियों को भी दोष दिया...

फिल्म के ही एक और पात्र और प्रोड्यूसर एकता कपूर के छोटे भाई तुषार कपूर ने भी घटना को शर्मनाक बताते हुए दोषियों को कड़ी से कड़ी सज़ा देने की मांग की...

ये तो रहा हमारी फिल्म इंडस्ट्री का देश के हालात और समाज के नैतिक पतन पर चिंतित होने का चेहरा...
लेकिन इसी इंडस्ट्री से इस बात का कोई जवाब नहीं देता कि इनकी खुद की कारगुज़ारियों का समाज पर कितना बुरा असर पड़ता है...

अब जिस फिल्म की स्टारकास्ट की बात की गई है,...उसकी असलियत भी सुन लीजिए...गैंगस्टर्स की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में तीन-तीन आइटम सॉन्ग्स रखे गए...इन्हें प्रियंका चोपड़ा, सोफी चौधरी और सनी लिओन पर फिल्माया गया है...पोर्न स्टार रही सनी लिओन पर इस फिल्म में जो आइटम सॉन्ग फिल्माया गया है, ज़रा उसके मुखड़े पर गौर फ़रमा लीजिए...

दिल! तेरा ले लेगी,
जान! तेरी ले लेगी,
ईमान तेरा ले लेगी,
लैला तेरी... लैला तेरी...
लैला तेरी ले लेगी...
तू लिख के ले ले ...

इस गाने का प्रोमो बना कर टीवी चैनल्स पर भी रिलीज़ कर दिया गया....यू ट्यूब पर इस गाने को लाखों लोग देख चुके हैं...लेकिन गाने के इन अश्लील बोलों पर सेंसर बोर्ड का ध्यान दिलाया गया तो उसने गाने के प्रोमो को टीवी पर प्राइम टाइम में दिखाने पर बैन लगा दिया...साथ ही फिल्म बनाने वालों से कहा कि अगर उन्हें फिल्म में गाने को इन्हीं बोलों के साथ रखना है तो फिल्म को 'ओनली फॉर एडल्ट्स' सर्टिफिकेट मिलेगा...लेकिन टीवी पर प्रोमो दिखाना है तो इसके बोलों को बदलना होगा...फिल्म निर्माता ने सिर्फ़ टीवी के लिए गाने के बोलों को बदल कर अब कर दिया है...

ओ लैला तुझे लुट लेगी,
तू लिख के ले ले...

लेकिन सेंसर बोर्ड की भी ये कैसी सख्ती...टीवी पर जितना गाने का प्रमोशन किया जाना था किया जा चुका...यू ट्यूब पर इसे कोई भी अब भी देख सकता है...फिल्म 26 अप्रैल को रिलीज़ होगी तो उसमें भी विवादित बोलों वाला गाना ही होगा...यानि सेंसर बोर्ड ने जो भी कार्रवाई की वो सिर्फ दिखावे की ही की...

अब ज़रा सोचिए...फिल्म रिलीज़ होगी...इसके बेहूदा गाने को शोहदे किस्म के लोग गली-सड़कों पर गाते घूमेंगे...इससे समाज पर कितना अच्छा असर पड़ेगा?...अनिल कपूर साहब आप पुलिस और सरकार की जवाबदेही तय करने की बात कर रहे हैं...ज़रा अपनी बिरादरी की जवाबदेही पर भी कुछ बोल दीजिए... उसी ब़ॉलीवुड की जवाबदेही पर, जो खुद को आईना दिखाने पर एकसुर में अभिव्यक्ति की आज़ादी की दुहाई देने लगता है...ये भी दलील दी जाती है फिल्में समाज का ही आईना होती है...लेकिन कभी ये भी सोच लीजिए कि लौंडिया पटाएंगे मिसकॉल से, बबली बदमाश है, लैला तेरी ले लेगी...जैसे गानों से आप खुद भी समाज का कैसा भला कर रहे हैं....खास तौर पर उन युवा लड़कों का, जिनकी शिक्षा या रहन-सहन का स्तर ऐसा नहीं है जो भले-बुरे की तमीज़ कर सकें...

नागरिकों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी जितनी पुलिस और सरकार की है, उतनी ही समाज के हर वर्ग की है...खास तौर पर फिल्मों से जुड़े उन नुमाइंदों की, जिनमें युवा वर्ग अपना अक्स ढूंढता रहता है...उनके जैसे दिखने-बनने की कोशिश करता है...

दरिंदों की दिल्ली या दाग़दार दिल्ली के बैनर लेकर सरकार और पुलिस के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने वाले भी इस और ज़रा ध्यान दे...वो क्यों नहीं ऐसी बेहूदा फिल्में और गाने बनाने वालों का विरोध करते...क्यों नही उनका बॉयकॉट कर देते...

जो लोग ऐसी फिल्में देखने जाते हैं, उनसे भी गांधीगिरी के ज़रिए ऐसी फिल्मों को बढ़ावा ना देने की अपील क्यों नहीं की जाती...

ऐसे फिल्मकारों से मेरा भी कहना है...

ओ जनता तुम्हे, ओ जनता तुम्हे,
सड़कों पर कूट देगी,
तुम लिख के ले लो...

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

दिल्ली में 99 फ़ीसदी अब भी 'दिलदार' हैं...खुशदीप



कुंठित और मानसिक विकृति के दो पिशाचों की वजह से एक फूल जैसी बच्ची को घोर यातना सहनी पड़ी...इन पिशाचों के लिए बड़ी से बड़ी सज़ा भी कम है...

लेकिन इसके आगे क्या...इन्हें सरेआम गोली से उड़ा भी दिया जाए तो क्या गारंटी के साथ कहा जा सकता है कि इस तरह के अपराध समाज में फिर नहीं होंगे...

क्या दरिंदों की दिल्ली कह देने से ही हमारी ज़िम्मेदारी खत्म हो जाती है...समस्या इससे कहीं बड़ी है...हमें सोचना होगा कि हमारे समाज में इस तरह के विकार क्यों पनप रहे हैं...हमें उसी जड़ पर चोट करनी चाहिए...

दिल्ली यूनिवर्सिटी में हर साल बाहर से हज़ारों छात्र (लड़कियां भी) अपना भविष्य संवारने के लिए एडमिशन लेने आते हैं...क्या वो सभी असुरक्षित हैं...

बार बार पूरी दिल्ली को दरिंदों या हैवानों की बस्ती बताने से बाहर से पढ़ने आई इन छात्राओं के घरवालों के दिलों पर क्या बीतती होगी...

जिस तरह पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती उसी तरह सारे पुलिस वाले भी शैतान नहीं होते...ऐसा नहीं होता तो वारदात के दो दिन में ही अपराधी नहीं पकड़े जाते...

आज चिंता से ज़्यादा सतर्क रहने की ज़रूरत है...सभी नागरिक अपनी ज़िम्मेदारी को निभाए...आसपास असामान्य प्रवृत्ति का कुछ होता दिखे या कोई संदिग्ध व्यक्ति दिखे तो हरकत में आ जाए...

खुद विरोध करने की स्थिति में हो तो ज़रूर करें...अन्यथा पुलिस को रिपोर्ट करें...सामूहिक रूप से पुलिस पर दबाव बनाएं...

ज़रूरत मेलोड्रामे की नहीं, बल्कि चीज़ों को अलग नज़रिये से देखने की है...हम बदलेंगे तो समाज बदलेगा...समाज बदलेगा तो ये देश बदलेगा...

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

ब्लडी मंडे क्यूं आया ख़ून चूसने...खुशदीप


आज मंडे है...मंडे का नाम अगर आप संडे को सुन लें तो आपको क्या हो जाता है...काम पर जाने वाले हों या स्कूल-कॉलेज जाने वाले बस यही मलाल करते रहते हैं, यार ये मंडे इतनी जल्दी क्यों जाता है...इसी मंडे की महिमा पर आजकल टीवी और एफएम रेडियो चैनल्स पर एक गाना बड़ा पॉपुलर हो रहा है...
पढ़िए, देखिए, धुनिए...शायद आपकी भी दुखती रग इसके साथ जुड़ी हो....

ए ले, फिर आ गया तू फेस उठा के,

दम लेगा क्या मेरी जान खा के,

ख़ून चूसने तू आया ख़ून चूसने,

ब्लडी ख़ूनी मंडे क्यूं आया ख़ून चूसने.
तू जा रे जा रे जा, कबूतर जा,

मैं नहीं जाना, मैं नहीं जाना,
मैं नहीं जाना बिस्तर को छोड़ के,

ख़ून चूस ले तू मेरा ख़ून चूस ले,
ब्लडी मंडे तू चाहे ख़ून चूस ले,

डररर...
माना तेरे नाम में है मन एक बार,
तो तू मन की करेगा क्या रे मनडे,

काहे पाये ना क़रार जब तक तू ना यार,

गाढ़े सनडे की कब्र पर झंडे,
अस्सी ख़ून के शिकारी सोमवार,

मैंने नहीं जाना, मैंने नहीं जाना,

सनडे है दिलदार देके मैया का प्यार,
मुझे लोरियां गा के जो सुलाये,

पर तेरा है विचार, के मैं शंख हूं यार,
पूरे पावर से मुझे बजाये,
अस्सी ख़ून के शिकारी सोमवार,

कान खुजाना, कान खुजाना, कान खुजाना,
उंगली घुसेड़ के,

ख़ून चूस ले तू मेरा ख़ून चूस ले...

फिल्म – गो गोआ गोन
गायक – सचिन, प्रिया पांचाल

गीत – इरशाद कामिल
संगीत – सचिन-जिगर

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

हिंदी ब्लॉगिंग में ये 'तीसरा' कौन है...खुशदीप


हिंदी ब्लॉग जगत बहुत दिनों से हाइबरनेशन यानि शीतनिद्रा में था...भला हो जर्मन डायचे वेले का जो इसने शीतनिद्रा को भंग किया...लगता है हर ब्लॉगर तरकश के सारे तीरों के साथ उठ खड़ा हुआ है...कुछ पुरस्कारों के समर्थन में, कुछ विरोध में...कुछ नामितों के समर्थन में, कुछ नामितों के विरोध में...एक नामित, दूसरे नामित के विरोध में....और जो इनमें से कुछ नहीं, वो भी चिंतित है...हिंदी ब्लॉगिंग के इतिहास को लेकर... सुनहरे भविष्य को लेकर...हाय ऐसे ही हो-हल्ला मचता रहा तो बाहर वाले क्या सोचेंगे...कैसे होगा हिंदी का उत्थान...

अरे भाई जी, ये हो-हल्ला ही तो किसी ज़िंदा कौम की पहचान है...

क्या ख़ूब कह गए हैं साहिर लुधियानवी साहब...

मैं ज़िन्दा हूं यह मुश्तहर कीजिए,
मेरे क़ातिलों को ख़बर कीजिए’...

अब हाइबरनेशन का ज़िक्र किया है तो पहले इसका ठीक से मतलब भी जान लिया जाए...इस संदर्भ में इंटरनेट पर खोजने पर सुरक्षित गोस्वामी का लेख बहुत सटीक लगा...सुरक्षित जी लिखते हैं...



 'बयॉलजी में एक शब्द प्रयोग होता है - हाइबरनेशन...हिंदी में इसे शीत निद्रा कहते हैं...आपने सुना होगा कि ध्रुवीय भालू, कछुए, मेंढक और सांप जैसे बहुत से जानवर सर्दियों में जमीन के नीचे ऐसी जगह में छिप जाते हैं, जहां ठंड का असर उन पर न हो...वहां उस सुरक्षित जगह पर वे पूरे मौसम यानी तीन या चार महीने तक लगातार सोए रहते हैं....इसी लंबी नींद की अवस्था को हाइबरनेशन या शीत निद्रा कहते हैं.... 

असल में प्रतिकूल मौसम की वजह से शरीर के लिए आवश्यक ऊर्जा देने वाला भोजन उन्हें पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाता, इसलिए वे अंडरग्रांउड हो जाते हैं और महीनों नींद जैसी अवस्था में पडे़ रहते हैं...उस समय अत्यंत धीमी गति से बस उनकी सांस चलती रहती है, जो उन्हें जीवित रखती है...इस दौरान वे खाना- पीना या शिकार या कोई भी अन्य गतिविधि नहीं करते, जैसे बेहोशी या कोमा की स्थिति में हों...उनके शरीर में पहले से जमा चर्बी और पोषक तत्वों से उनका जीवन बचा रहता है...जब मौसम बदलता है, तब वे उस शीत निद्रा से जागते हैं, धीरे-धीरे जमीन से बाहर निकलते हैं और सामान्य जीवन में फिर से लौट आते हैं...

इसी प्रकार आपने यह भी सुना होगा कि प्राचीन काल में हिमालय में अनेक योगी समाधि की अवस्था में महीनों, सालों बैठे रहते थे...इस अवस्था में वे भी अपने शरीर की सुध- बुध खो बैठते थे....यदि समाधि लंबे समय की है तो उनके जटा- दाढ़ी बढ़ जाती थी और कभी- कभी तो शरीर पर दीमक भी लग जाते थे... 

मनुष्य प्राकृतिक रूप से शीत निदा जैसी कोई अवस्था नहीं प्राप्त करता...संभवत: हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने अन्य जीवों की शीत निदा को देख कर ही अपने तप और साधना द्वारा यह अवस्था प्राप्त करने की विधि विकसित की होगी...साधक बताते हैं कि एक तो इस अवस्था में जाने पर जीवित रहने के लिए शरीर से ऊर्जा का क्षय न्यूनतम होता है...इस तरह से मनुष्य जीवन का भी संचय करता है और अपनी ऊर्जा का भी, जिसे वह बाद में किसी बड़े उद्देश्य के लिए लगा सकता है...इसके अलावा, साधक यह भी कहते हैं कि समाधि में सत, चित और आनंद की अवस्था प्राप्त होती है, जो अन्यथा नहीं मिल सकती...इस प्रकार ऐसे योगी सैकड़ों साल तक शुद्घ, बुद्घ और चैतन्य बने रह सकते हैं.'..

हिंदी ब्लॉगिंग के निष्क्रिय कालखंडों को भी इसी हाइबरनेशन से जोड़ कर देखा जा सकता है...अब डायचे वेले की टंकार पर हिंदी ब्लॉगिंग के भी सभी ऋषि-मुनि अपनी कंदराओं से बाहर निकल आए हैं...कुछ शांत प्रवचन करते हुए तो कुछ दुर्वासा ऋषि का रौद्र रूप लेकर...जहां टिप्पणियां सरस्वती नदी की धार जैसे लुप्त हो गई थी, वहां अब कई पोस्टों पर उनका उफ़ान ख़तरे के निशान को पार कर चुका है...

चलिए अब ये हंगामा जिस पर बरपा है, उसकी भी बात कर ली जाए...सम्मान-पुरस्कार...खास तौर पर इनके साथ मिलने वाले प्रशस्ति-पत्र पर...मेरे एक मित्र ने इनकी निरर्थकता पर बड़ा दिलचस्प ऑब्जर्वेशन दिया है...उसका कहना है कि इस काग़ज के टुकड़े  से तो टिश्यू पेपर अच्छा है...कुछ काम तो आता है...प्रशस्ति पत्र को उलटे ज़िंदगी भर संभालने का टंटा और करना पड़ता है...

अब समझ आ रहा है कि अमर ब्लॉगर डॉ अमर कुमार जी ने ताउम्र कोई सम्मान या पुरस्कार क्यों स्वीकार नहीं किया...शायद चिकित्सकों को दिए जाने वाला प्रतिष्ठित डॉ बी सी रॉय अवॉर्ड भी नहीं...(इस बिंदु पर किसी को ज़्यादा जानकारी हो तो कृपया टिप्पणी के ज़रिए बताएं...डॉक्टर साहब ने खुद ही एक बार मेरी पोस्ट पर एक टिप्पणी के ज़रिए ये ज़िक्र किया था...मैं उस पोस्ट को ढूंढ नहीं पा रहा हूं...लेकिन डॉक्टर साहब के इस विलक्षण आयाम को लेकर और दुरूस्त होना चाहता हूं)...

अंत में कवि धूमिल जी को नमन करते हुए पुरस्कारों की ये व्याख्या...

एक आदमी,
पुरस्कार बेलता है,
एक आदमी पुरस्कार खाता है,
एक तीसरा आदमी भी है,
जो न पुरस्कार बेलता है, न पुरस्कार खाता है,
वह सिर्फ़ पुरस्कार से खेलता है,
मैं पूछता हूँ--
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
हिंदी ब्लॉग  की संसद मौन है...

मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

क्या फिक्स हैं डायचे वेले अवार्ड्स?...खुशदीप

एक सज्जन मेरी एक पोस्ट पर अपनी टिप्पणी के ज़रिये ये सवाल उठा चुके हैं-...


धन्यवाद...आपने मुझे इस क़ाबिल समझा कि मैं अकेले ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी ब्लॉग को जिताने की क्षमता रखता हूं...



इन सज्जन ने मेरा ब्लॉग नामित नहीं होने पर मेरी खीझ के बारे में सही कहा...क्योंकि ये मेरा शगल रहा है कि पहले तो मैं इस फ़िराक में रहता हूं कि सम्मान या अवार्ड कहीं भी बंट रहा हो-  गली-मुहल्ला, कस्बा-शहर, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय, अपना नाम संभावितों की सूची में शामिल करा दूं...और फिर उसे लेने से मना कर दूं...इससे जो नाम होता है, आनंद मिलता है, उसका भला कहना ही क्या...अब डॉयचे वेले ने ये हिमाकत भला कैसे कर दी कि मेरे ब्लॉग का नाम नामांकित ब्लॉगों में शामिल नहीं किया...और मुझे उसे ठुकराने के परमानंद से वंचित कर दिया?

ये बात दूसरी है कि जब ब्लॉग जगत में बहुत कम लोगों को ही पता था कि डॉयचे वेले ने इस साल बाब्स (बेस्ट ऑफ ब्लॉग्स) के लिए हिंदी को भी शामिल किया है और ब्लॉग्स के नाम 6 मार्च तक सुझाने के लिए कहा है तो मैंने इस पर 13 फरवरी को एक पोस्ट लिख मारी...उस पोस्ट में विस्तार से इन अवार्ड्स के बारे में बताया...यानि पूरे ब्लॉग जगत को पता चल गया कि इन अवार्ड्स के लिए किसी भी ब्लॉग का नाम 6 मार्च तक सुझाया जा सकता है...इस अवार्ड्स के बारे में प्रचार-प्रसार करने से मुझे ये नहीं पता था कि अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मार लूंगा...अरे जब बहुत कम लोगों को पता था तो चुपचाप बैठा रहता...अपने शुभचितकों से ज़्यादा से ज्यादा अपने ब्लॉग का ही सुझाव भेज देता...कम लोगों को पता रहता तो औरों के ब्लॉग के सुझाव भी कम जाते...यानि जूरी के सामने भी कम विकल्प ही रहते और झक मार कर मेरे ब्लॉग का चुनाव करना ही पड़ता...

ख़ैर चलिए...फिर 6 मार्च के बाद जूरी ने ब्लॉग्स को नामांकित करने का काम शुरू किया...जूरी के पास इतने सुझाव आ गए, उनमें भला मेरा दोयम दर्जे का देशनामा कहां टिकता...3 अप्रैल तक जूरी की ओर से नामांकित ब्लॉग्स की सूची भी जारी कर दी गई और इन ब्लॉग्स के लिए 7 मई तक वोट मांगे गए....इसकी सूचना भी मैंने सबसे पहले 3 अप्रैल को ही अपनी इस पोस्ट के ज़रिए ब्लॉग जगत को दी...इस बात की पुष्टि भी कुछ नामांकित ब्लॉगर्स की ओर से की गई कि उन्हें सबसे पहले ये खुशख़बरी मेरी पोस्ट से ही मिली...इस सूचना का प्रचार-प्रसार कर के भी मैंने गलती की...जब मुझे पता था कि मेरा ब्लॉग नामांकित ब्लॉग्स की सूची में नहीं है तो मुंह सिल लेता...हां, इन नामांकित ब्लॉग्स में से कोई पसंदीदा ब्लॉग होता तो बस उसके लिए ज़्यादा से ज़्यादा वोटिंग का अभियान चुपचाप कराता रहता...लेकिन नहीं जी, मुझे तो ढिंढोरा पीट कर आफ़त मोल लेने का शौक जो है...

अब आख़िर में आता हूं सबसे महत्वपूर्ण सवाल पर...इन अवार्ड्स के लिए बड़े बड़े धुरंधर रह गए लेकिन एक शख्स इतने महान निकले कि उन्हें एक नहीं तीन-तीन जगह नामांकन मिल गया...बेहतरीन हिंदी ब्लॉग की श्रेणी में इन्हें दो नामांकन मिले...इसके अलावा 14 भाषाओं के ब्लॉग्स को मिलाकर बनाई गई सबसे रचनात्मक ब्लॉग की श्रेणी में भी इन्हें एक नामांकन मिला...वाकई बहुत प्रतिभाशाली होंगे ये शख्स...हा इसे संयोग ही कहा जा सकता है कि इस शख्स का परिचय हिंदी ब्लॉग्स को नामांकित करने वाले जूरी सदस्य से बहुत पहले से है...इसका सबूत है जूरी के इस सदस्य के अपने ब्लॉग के साइड-बार में लगा लिंक रोड....ये लिंक रोड हाल-फिलहाल का नहीं बहुत पुराना है...यानि तीन नामांकन पाने वाले शख्स पहले से ही जूरी सदस्य के पसंदीदा है और उनका नाम लिंक-रोड में दिए चुनींदा ब्लॉग्स में शामिल है...

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक़ ही है कि कोई जूरी सदस्य जिसे पहले से ही जानता है, जिसके ब्लॉग को पसंद करता है, जिसका लिंक अपने ब्लॉग पर देता है, उसी को तीन-तीन नामांकन देने का ज़रिया बन जाए? ऐसे में क्या इसी शख्स के सिर पर बॉब्स का ताज सजना नहीं बनता है बॉस?....

अब ये बात दूसरी है कि किसी मुकदमे के दौरान भी जज को पता चल जाता है कि मुकदमा लड़ने वालों में से कोई उसकी जान-पहचान का है तो वो खुद को उस मुकदमे की सुनवाई से अलग कर लेता है...लेकिन यहां तो जूरी सदस्य के हाथ में हर कदम पर अपनी पहचान के ब्लॉग को जिताने के लिए असीम ताकत है...

ते कि मैं झूठ बोलया....


शनिवार, 13 अप्रैल 2013

खुसदीप भाई हमेशा झूठ ही बोलते हैं...खुशदीप






भला हो ब्लॉग बुलेटिन का जिन्होंने मेरी कल की पोस्ट पर सादर आभार और चर्चा के लिंक के साथ ये टिप्पणी की...

आज की ब्लॉग बुलेटिन जलियाँवाला बाग़ की यादें - ब्लॉग जगत के विवाद - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !
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चर्चा को बांचने गया तो वहां अपनी पोस्ट के लिंक के नीचे एक और लिक देखा...शीर्षक मज़ेदार लगा...


उत्सुकतावश इस लिंक को खोला तो ये डॉ संतोष कुमार यादव अन्वेषक जी के ब्लॉग 'खाली-पीली' का था...मैं आभारी हूं डॉक्टर साहब का कि उन्होंने अपने ब्लॉग की पहली पोस्ट ही मेरे सफ़ेद झूठ पर लिखी...ये मेरा झूठडॉक्टर साहब  की उन दो टिप्पणियों के बारे में था, जो इन्होंने 12 अप्रैल को डॉ संतोष कुमार यादव और अन्वेषक दो अलग-अलग नामों से मेरी पोस्ट पर की थीं...ये दोनों टिप्पणियां ही बिना प्रोफाइल की गईं थीं...इनके ब्लॉग पर आने पर पता चला कि डॉ संतोष कुमार यादव अन्वेषक एक ही व्यक्ति का नाम है...

वैसे कल  से ही डॉक्टर साहब ने मेरे फेसबुक वॉल पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भी भेज रखी है...लेकिन मैं उन्हीं की फ्रैंड रिक्वेस्ट स्वीकार करता हूं, जिनसे मैं परिचित होता हूं...डॉक्टर साहब के फेसबुक वॉल पर जाओ तो वहां इन्होंने अपना नाम डॉ संतोष कुमार ही लिख रखा है...

मैं शुक्रगुज़ार हूं कि मेरे लिए डॉक्टर साहब को कितनी मेहनत करनी पड़ी...बिना प्रोफाइल से दो-दो टिप्पणी करनी पड़ी...फिर  अपने ब्लॉग पर पहली पोस्ट भी लिखनी पड़ी...

ख़ैर आता हूं अब अपने 'सफ़ेद झूठ' पर...डॉक्टर  साहब का कहना है कि मैंने कल इनकी करीब दो  घंटे  के अंतराल पर की गई टिप्पणियों को डिलीट कर दिया...यानि टिप्पणियां स्पैम में नहीं गई थीं...डॉक्टर साहब ने अन्वेषक नाम से की गई दूसरी टिप्पणी का स्क्रीन शॉट भी ले लिया...मुझे पौने चार साल ब्लॉगिंग करते हो गए, लेकिन स्क्रीन शॉट लेना नहीं सीखा...डॉक्टर साहब ने  अपनी पहली पोस्ट में ही पूरी दक्षता के साथ स्क्रीन-शॉट लगाया..यानि दूसरी टिप्पणी के साथ ही ये पूरी तैयारी के साथ बैठे थे कि मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी आते ही उसका स्क्रीन शॉट लेना है...

स्पैम में जाने की वजह से इनकी पहली टिप्पणी 12121444मेरी पोस्ट से करीब छह घंटे और दूसरी टिप्पणी करीब चार घंटे गायब रहीं...इसी को आधार बनाते हुए इन्होंने आज यानि 13 अप्रैल को पोस्ट लिखी...लेकिन मैने 12 अप्रैल को रात को ही इंटरनेट खोलने पर इनकी दोनों टिप्पणियों को स्पैम से निकाल कर अपनी पोस्टपर प्रकाशित कर दिया था...इसके बाद ज़्यादा से ज़्यादा लोग डॉक्टर साहब की टिप्पणियों को पढ़ सकें, इसके लिए बाकायदा एक पूरी नई पोस्ट भी बना दी...अब कुछ घंटे के लिए ही टिप्पणियों को डिलीट करना था तो फिर मैं ये सारा टंटा क्यों करता...

अब आता हूं...एक तकनीकी पेंच पर...स्पैम में जाने वाली कोई भी टिप्पणी कुछ सैंकड्स या मिनट के लिए पोस्ट पर दिखती ज़रूर है...शायद तभी डॉक्टर साहब दूसरी टिप्पणी का स्क्रीन शाट ले सकें...पहली टिप्पणी का नहीं ले सके क्योंकि पूरी तैयारी से नही बैठे थे...और जब तक कोई टिप्पणी फॉरएवर डिलीट ना की जाए, उसका ब्लॉकेज का लिंक कॉमेन्ट-बॉक्स पर दिखता रहता है...और जो टिप्पणी फॉरएवर डिलीट कर दी जाए, उसका कहीं नामों-निशान तक नहीं रहता...

एक संभावना और हो सकती है...उपरोक्त दोनों टिप्पणियों को मैंने 12 अप्रैल को डिलीट कर दिया...लेकिन रात आते-आते मुझे पता चल गया कि 13 अप्रैल को डॉक्टर साहब मेरी इस कारस्तानी पर अपनी पहली-पहली पोस्ट लिखने जा रहे हैं...मेरा माथा ठनका और मैंने 12 अप्रैल की रात को ही  फॉरएवर डिलीट की गई दोनों टिप्पणियों को जादू-मंतर से दोबारा बुलाया और अपनी पोस्ट पर प्रकाशित कर दिया...साथ ही इन्हीं दोनों टिप्पणियों पर एक नई पोस्ट भी बना दी...

अब एक बात और...पौने चार साल की ब्लॉगिंग में मेरा अपनी पोस्ट पर ऐसी टिप्पणियों को डिलीट करने का लंबा चौड़ा इतिहास रहा है, जो मेरी मनमर्ज़ी की नहीं होती या जिनमें मेरी ज़रा सी भी आलोचना होती है...इस बात की गवाही हर ब्लॉगर दे सकता है...

ते कि मैं झूठ बोलया...

(नोट- मैं बॉब्स पुरस्कारों के लिए एक नामांकित ब्लॉग को सिर्फ वोट देने की अपील कर रहा हूं...इसका ये मतलब कैसे हो सकता है कि मैं दूसरे नामांकित ब्लॉग्स का विरोध कर रहा हूं...विडंबना ये है कि कुछ लोग अपने पसंद के ब्लॉग के लिए वोट करने की अपील से ज्यादा एक दूसरे नामांकित ब्लॉग के विरोध पर ज़ोर दे रहे हैं...)



शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

खुसदीप भाई, पोपट और ब्लॉगर्स...खुशदीप


रात को इंटरनेट पर बैठा तो कल की मेरी पोस्ट के लिए स्पैम में ये दो टिप्पणियां दिखीं...टिप्पणियां करने वाले दोनों सज्जनों का प्रोफ़ाइल नहीं मिला...ना डॉ संतोष कुमार यादव जी का और ना ही अन्वेषक जी का...दिमाग़ पर बहुत ज़ोर डालने पर भी मुझे याद नहीं आया कि दोनों से पहले कभी मेरा कोई संवाद हुआ हो...ख़ैर दोनों ने मुझे खुसदीप भाई लिखा है...और दोनों ने ही लिखा है कि मैं बॉब्स पुरस्कारों में 'नारी' के लिए वोटिंग की अपील कर ब्लॉगर्स को पोपट बनाने की कोशिश ना करूं...मुझे नहीं पता कि टिप्पणी करने वाले दोनों सज्जनों ने एक जैसे ही मुझे खुसदीप भाई क्यों लिखा और दोनों ने ही एक जैसे पोपट का उल्लेख क्यों किया...लेकिन दूसरी टिप्पणी की आख़िरी लाइन पढ़ कर समझ आ गया कि दोनों टिप्पणी करने वाले सज्जन एक ही हैं...



मैंने जब से ब्लॉगिंग शुरू की है, कभी मॉडरेशन का प्रयोग नहीं किया...टिप्पणी की भाषा मर्यादा में रहे तो मैंने कभी किसी टिप्पणी को डिलीट भी नहीं किया...लेकिन आज मिलीं उपरोक्त दोनों टिप्पणियां स्पैम में चली गई थीं, इसलिए जब मैं ब्लॉग खोलता तभी निकल पातीं...अब इन टिप्पणियों को मैं सिर्फ़ प्रकाशित ही कर देता तो पोस्ट पुरानी हो जाने से इन्हें ज़्यादा पाठक नहीं मिलते...इसलिए मैंने इन्हें बाकायदा पोस्ट बनाने का भी फ़ैसला किया...इसलिए अपनी तरफ़ से कुछ भी ना कहते हुए बस इतना चाहता हूं कि आप इन टिप्पणियों को बस गौर से पढ़ लीजिए...

Dr. Santosh Kumar Yadav has left a new comment on your post "क्या आप में है एक 'सोल्जर'...खुशदीप": (दोपहर 3.37 पर मिली टिप्पणी)

बस भी करो खुसदीप भाई, सारे ब्लागर्स को पोपट समझा है क्या? नारी के प्रचार मेन आप तो मोदी को भी पीछे छोड़े पड़े पड़े हो। अरे नारीवाद का झण्डा ही बुलंद करना था तो चोखेर बाली को चुना होता। आप ऐसे ब्लॉग की वकालत कर रहे हो, जिसे देख कर ही उबकाई आती है। भाषा, ले आउट, मैटर कुछ तो होना चाहिए। और उस पर लेखिका महोदया का व्यवहार.... इससे पहले कि लोग आपकी नियत पर सवाल उठाने लगें, अपने आप पर नियंत्रण करें। कहीं ऐसा न हो कि ये नारी के प्रचार की अति आपकी वर्षों की मेहनत पर पानी न फेर दे... 

अन्वेषक has left a new comment on your post "क्या आप में है एक 'सोल्जर'...खुशदीप": (शाम 5.46 पर मिली टिप्पणी)

क्या खुसदीप भाई सबको पोपट समझा है क्या। सपाओर्ट ही करना था तो किसी ढंग के ब्लाग का करते। नारी ब्लाग मेन भला है क्या? भाषा, ले आउट, सामाजिकता? या फिर नारी के नियंत्रक की दादागीरी। सामूहिक ब्लाग से सभी सहयोगियों को निकाल बाहर करना या फिर आम प्पठकों को प्रतिबंधित कर देना। किस बात पर आपका दिल आ गया? 

अगर आप वास्तव मेन नारीवाद के समर्थक हैं, तो चोखेरबाली का समर्थन करिए, तो सभी का समर्थन करते हुये अच्छा लगेगा। उस पर आप जिस सुर मेन नारी ब्लाग को समर्थन कर कर रहे हैं, प्रतिदिन उसे लेकर पोस्ट लिख रहे हैं, वह समर्थन कम साइकिक अधिक लाग्ने लगा है। उसे देख कर अब लोग हंस रहे हैं, आप का मज़ाक उड़ा रहे है। 

कुछ लोग तो यहा तक कह रहे है की आप नारी के बहाने अपनी खीझ निकाल रहे हैं, की जब मेरे ब्लाग को नामित नाही किया, तो मैं ऐसे ब्लाग को जिताऔंगा जिसे देखते ही उबकाई आने लगे। अगर ऐसा नहीं है तो एक बार गंभीरता से सोचिए, क्योंकि या प्रसंग आपकी प्रतिष्ठा को प्राभावित कर रहा है। जिस प्रकार कमान से निकला हुआ तीर वापस नाही आता, उसी प्रकार प्रतिष्ठा मेन बट्टा लाग्ने मेन भी देर नाही लगती। 
आशा है आप इस पोस्ट को पहली की तरह मिटाएँगे नाही और मेरे बातों को गंभीरता से लेते हुये, ऐसे ब्लाग का समर्थन करेंगे, जिसे देख कर, पढ़ कर पाठको को वास्तव मेन खुशी हो। क्योंकी ये सिर्फ वोट की बात नाही है, ये भाषा की गरिमा से भी जुड़ा हुआ है, देश की प्रतिष्ठा से भी जुड़ा हुआ है। 

आपने दोनों टिप्पणियां पढ़ लीं, अब खुद ही फ़ैसला कीजिए...

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

क्या आप में है एक 'सोल्जर'...खुशदीप



महिला आरक्षण बिल इस देश में आज तक क्यों अटका है..

क्योंकि पुरुष राजनेताओं को लगता है कि महिलाओं के ज़्यादा चुनकर आने से राजनीति में उनका वर्चस्व घट जाएगा....

महिला सशक्तिकरण के लिए ज़ुबानी जमाखर्च बहुत हो चुका, अब वक्त है ठोस कुछ कर दिखाने का...

ब्लॉगर्स के लिए भी आज एक ऐसा ही मौका है...भारतीय महिलाओं के सशक्तिकरण की मुहिम 'नारी' को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान देने का...

क्या आप अपने इस दायित्व में पीछे रहेंगे?  

नहीं! तो फिर सोच क्या रहे हैं?





जर्मनी का अंतरराष्ट्रीय ब्रॉ़डकॉस्टर डॉयचे वेले बेस्ट ऑफ ब्लॉग्स के तहत बॉब्स अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार देने जा रहा है...इसके लिए तीन अप्रैल से वोटिंग भी शुरू हो चुकी है...ये वोटिंग 7 मई तक चलेगी..तो इस वोटिंग में आप भी 'नारी' को आगे करना चाहते हैं तो फटाफट जाइए इस लिंक पर और 'श्रेणी' वाले कॉलम में 'बेहतरीन हिंदी ब्लॉग' चुनिए और फिर वेबसाइट वाले कॉलम में 'नारी' ब्लॉग को चुनिए और दे दीजिए अपना वोट...आप 24 घंटे में एक बार अपनी आईडी से वोट कर सकते हैं यानि 7 मई तक 25 बार आप चाहें तो 'नारी' को वोट कर सकते हैं...

http://thebobs.com/hindi/category/2013/best-blog-hindi-2013/


सोमवार, 8 अप्रैल 2013

'नारी' को और भी करना है...आगे...खुशदीप




स्त्री को पुरुष के बराबर नहीं होना चाहिए...

बल्कि आगे होना चाहिए...

बड़े बदलाव के लिए हर एक को छोटी शुरुआत करनी पड़ेगी...

और भी करना है....आगे....




जागो रे...जागो रे...सीरीज़ में टाटा चाय का बेहतरीन सामाजिक संदेश...जिसने भी इस एड का क्रिएटिव किया है, उसे मेरा सैल्यूट...शाहरुख़ ने  इस एड के संदेश को अमल में लाना भी शुरू कर दिया है...उनकी रिलीज़ होने वाली अगली फिल्म 'चेन्नई एक्सप्रेस' के टाइटल में हीरोइन दीपिका पाडुकोण का नाम उनके नाम से पहले जाएगा..

दूसरी ओर, राजनेता लाख महिला सशक्तिकरण की बात करें...लेकिन उनकी कथनी और करनी में फ़र्क होता है...ये राजनेता हर चीज़ में अपना फ़ायदा ढूंढते है...चुनावी मौसम में ये महिलाओं को ज़्यादा अधिकार संपन्न बनाने की वक़ालत करते हुए मगरमच्छ के आंसू बहाते भी देखे जा सकते हैं...कन्या भ्रूण हत्या पर कलेजा चाक कर देने वाली बातें करते हैं...लेकिन सच्चाई जाननी है तो उनके क्षेत्र में ही जाकर देख लिया जाए कि महिलाओं की क्या दशा है...ये महिलाओँ का आह्वान करते हैं कि ट्विटर और फेसबुक पर उन्हें अपनी समस्याएं बताएं...ज्वलंत मुद्दों पर सुझाव दें...क्या सर्वहारा वर्ग की महिलाएं इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के इन औज़ारों का इस्तेमाल कर सकती हैं...जवाब आप और मैं सब जानते हैं...

चलिए आपने ये पढ़ लिया...अब बताइए इस मुद्दे पर आप खुद क्या करते हैं...चलिए हिंदी ब्लॉगर्स के लिए अब बढ़िया मौका है...कुछ कर दिखाने का...खास कर पुरुष ब्लॉगर्स के लिए...

हिंदी समेत 14 भाषाओं में ऑनलाइन सक्रियता की अलग-अलग विधाओं को बढ़ावा देने के लिए जर्मनी का अंतरराष्ट्रीय ब्रॉ़डकॉस्टर डॉयचे वेले बेस्ट ऑफ ब्लॉग्स के तहत बॉब्स अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार देने जा रहा है...इसके लिए तीन अप्रैल से वोटिंग भी शुरू हो चुकी है...ये वोटिंग 7 मई तक चलेगी...इन पुरस्कारों के लिए 'हिंदी का बेहतरीन ब्लॉग' कैटेगरी में नामांकित किए गए दो ब्लॉग्स का ज़िक्र करना चाहूंगा...

स्त्री प्रश्नों पर केंद्रित हिंदी का पहला सामुदायिक ब्लॉग 'चोखेर बाली' 

और

'The woman has arrived' का उद्घोष करता ब्लॉग 'नारी'...

स्त्री विमर्श के इन दोनों ब्लॉग्स में 'चोखेर बाली' की तुलना में 'नारी' अधिक सक्रिय है...'चोखेर बाली' की इस साल यानि 2013 में सिर्फ एक पोस्ट आई है...दूसरी ओर 'नारी' की इसी साल 29 पोस्ट आ चुकी हैं...लिंगभेद या जेंडर के आधार पर किए गए अधिकारों के बंटवारे के खिलाफ़ आवाज़ बुलंद करने में 'नारी' कभी पीछे नहीं रहा...वैसे भी देखा जाए तो डॉयचे वेले का इन अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों को देने का उद्देश्य ऑनलाइन एक्टिविज्म को सम्मान देना है...इस मापदंड पर भी 'नारी' खरा उतरता है...

तो अब आप भी 'नारी' को आगे करना चाहते हैं तो सोच क्या रहे हैं....फटाफट जाइए इस लिंक पर और श्रेणी वाले कॉलम में 'बेहतरीन हिंदी ब्लॉग' चुनिए और फिर वेबसाइट वाले कॉलम में 'नारी' ब्लॉग को चुनिए और दे दीजिए अपना वोट...लेकिन वोट देने से पहले आपको फेसबुक, ट्विटर या ओपन आईडी से खुद को लॉग करना होगा...24 घंटे में आप एक आईडी से एक बार ही वोट कर सकते हैं...यानि आप चाहें तो रोज़ एक बार अपनी पसंद के नामांकित ब्लॉग को वोट कर सकते हैं...

http://thebobs.com/hindi/category/2013/best-blog-hindi-2013/


(नारी की मॉडरेटर रचना जी से पूर्व में मेरे कुछ मुद्दों पर मतभेद रहे हैं, तीखी तकरार भी हुई है, लेकिन बॉब्स पुरस्कारों की दौड़ में मैं उन्हें आगे देखना चाहता हूं...सबसे आगे...)


शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

अवैध कॉलोनी, अवैध इमारत, अवैध आंसू...खुशदीप


देश के दो महानगर...मुंबई और दिल्ली...

दोनों महानगरों से दो ख़बर एक साथ पढ़ने को मिली...



मुंबई के पास ठाणे के मुंब्रा में गुरुवार रात को निर्माणाधीन सात मंज़िला इमारत गिरने से 55 लोगों की मौत हो गई...60 घायल हो गए...20 का कोई अता-पता नहीं है...ज़्यादातर हताहत मज़दूर तबके के हैं...इमारत अवैध तौर पर बनाई गई  थी, इसकी पुष्टि खुद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने की है...ये इमारत छह हफ्ते में ही खड़ी हो गई थी...इसी से समझा जा सकता है कि इस काग़ज़ी इमारत के निर्माण में कितनी घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया होगा...इसके ऊपर आठवीं मंज़िल और बनाई जा रही थी...और तो और इस इमारत में दुकानों और दफ्तरों के चालू होने के साथ कमरों में लोगों ने रहना भी शुरू कर दिया था...इमारत के बिल्डर जमील कुरैशी और सलीम शेख़ हादसे के बाद फ़रार हो गए हैं...ठाणे के म्युनिसिपल कमिश्नर आर ए राजीव के मुताबिक मुंब्रा में 90 फ़ीसदी इमारतें अवैध हैं...



ये तो पढ़ ली आपने मुंबई की ख़बर...अब आते  हैं दिल्ली की ख़बर पर...

पूर्वी दिल्ली की आज़ाद नगर (ईस्ट) नाम की अवैध कॉलोनी में रहने वाले 83 परिवारों का रातोंरात नसीब बदल गया...क्यों भला...इस कॉलोनी को दिल्ली की पहली अनाधिकृत नियमित (Unauthorised Regularised-UR) कॉलोनी बनने का रुतबा जो हासिल हो गया...पूर्वी दिल्ली नगर निगम ने गुरुवार को ही इस कॉलोनी के ले-आउट को मंज़ूरी दी...यानि अब इस कॉलोनी के लोगों को भी वो सारी सुविधाएं मिलेंगी जो दिल्ली की नियमित कॉलोनी के बाशिंदों को मिलती हैं...अभी तक यहां एक वर्ग गज़ ज़मीन का भाव एक लाख रुपये था...लेकिन अब पूर्वी दिल्ली नगर निगम की घोषणा के बाद यहां ज़मीन का भाव दो से तीन लाख रुपये पहुंच गया है...आज़ाद नगर (ईस्ट) की तरह ही दिल्ली में 894 और अनाधिकृत कॉलोनी नियमित होने का इंतज़ार कर रही हैं...



इन दोनों ख़बरों में आपको क्या कुछ समानता नज़र आई...

पहला सवाल- अवैध कॉलोनियां या अवैध इमारतें जब बनाई जा रही होती हैं तो  सारे प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस वाले क्या भांग खा कर सो रहे होते हैं...या मोटा चढ़ावा खाकर लंबी डकार ले रहे होते हैं...दूसरा सवाल- कोई अवैध इमारत गिरने पर सरकार और नेता इतने टसुए क्यों बहाते हैं...क्या यही नेता वोटों के लालच में अवैध कॉलोनियों को नियमित करने की पैरवी में सबसे आगे नहीं होते...

अवैध कॉलोनियों में अवैध इमारतों के गिरने पर होने वाली मौतों पर इनके लिए ज़िम्मेदार बिल्डर, ठेकेदारों, इंजीनियर, अफ़सरों और  नेताओं को मौत की सज़ा क्यों नहीं दी जाती...