शुक्रवार, 29 मार्च 2013

हमारे उल्लू-प्रेम के 66 साल...खुशदीप



कल ई-मेल से एक कहानी मिली...शायद आपने भी कहीं पढ़ी हो...लेकिन ये कहानी देश की राजनीति के ऊपर बड़ी सटीक बैठती है...आज़ादी के बाद 66 साल में ये देश जो भी बना, उसके लिए हम खुद ही ज़िम्मेदार हैं...कैसे भला? जानना है तो कहानी पढ़ लीजिए ना...



एक बार एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण से भटकते हुए उजड़े, वीरान और रेगिस्तान के इलाके में आ गये...हंसिनी ने हंस को कहा कि ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं ?...यहाँ न तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं हैं...यहाँ तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा...भटकते-भटकते शाम हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज की रात बिता लो, सुबह हम लोग हरिद्वार लौट चलेंगे... 

रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे, उस पर एक उल्लू बैठा था...वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा... हंसिनी ने हंस से कहा, अरे यहाँ तो रात में सो भी नहीं सकते... ये उल्लू चिल्ला रहा है...हंस ने फिर हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यूँ है ? ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही...पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों कि बात सुन रहा था...

सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा कि हंस भाई मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मुझे माफ़ कर दो...हंस ने कहा, कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद...यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा, पीछे से उल्लू चिल्लाया, अरे हंस मेरी पत्नी को लेकर कहाँ जा रहे हो...हंस चौंका, उसने कहा, आपकी पत्नी? अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है, मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है...उल्लू ने कहा, खामोश रहो, ये मेरी पत्नी है... 

दोनों के बीच विवाद बढ़ गया... पूरे इलाके के लोग इकट्ठा  हो गये...कई गावों की जनता बैठी...पंचायत बुलाई गयी...पंच लोग भी आ गये... बोले, भाई किस बात का विवाद है ?...लोगों ने बताया कि उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है...लम्बी बैठक और पंचायत के बाद पंच लोग किनारे हो गये और कहा कि भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे...हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है...इसलिए फैसला उल्लू के ही हक़ में ही सुनाना है... 

फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि सारे तथ्यों और सबूतों कि जांच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है... 

यह सुनते ही हंस हैरान हो गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला सुनाया...उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली... रोते- चीखते जब वहआगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई...ऐ मित्र हंस, रुको... हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, अब क्या करोगे ? पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब जान भी लोगे ?... 

उल्लू ने कहा, नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी...लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है...मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है...यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं...

शायद 66 साल कि आजादी के बाद भी हमारे देश की दुर्दशा का मूल कारण यही है कि हमने हमेशा अपना फैसला उल्लुओं के ही पक्ष में सुनाया है...इस देश क़ी बदहाली और दुर्दशा के लिए कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैं...

मंगलवार, 26 मार्च 2013

राज भाटिया प्रेज़ेन्ट्स 'ब्लॉगोले'...खुशदीप


कल आधी रात को जर्मनी से राज भाटिया जी का फोन आया...बड़े सीरियस मूड में थे...कहने लगे कि कुछ ज़रूरी बात करनी है...मैं घबरा गया...अचानक ऐसा क्या हो गया...फिर भी हिम्मत करके बोला...बताइए राज जी, ऐसी क्या बात करनी है....राज जी ने सीधे काम की बात पर आते हुए कहा कि एक फिल्म बनाना चाहता हूं, उसी के बारे में डिस्कस करना है...मैंने कहा...मेरा अहोभाग्य, मुझे आपने इस क़ाबिल समझा...बताइए मैं कैसे आपकी मदद कर सकता हूं...

राज जी ने अब विस्तार से अपने प्रोजेक्ट के बारे में बताना शुरू किया...उन्होंने ये पहले ही साफ़ कर दिया वो हॉलीवुड स्टैंडर्ड की फिल्म बनाना चाहते हैं, इसलिए क्वालिटी से कोई समझौता नहीं करेंगे...पैसा चाहे कितना भी लगे, वो फाइनेंस की कोई कमी नहीं आने देंगे...राज जी पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी बात कहते जा रहे थे...उन्होंने आगे साफ़ किया कि उनका इरादा ब्लॉगवुड के लिए शोले जैसी मास्टरपीस का रीमेक  बनाने का  है...क़ानूनी तौर पर रीमेक में कोई अड़चन ना आए, इसके लिए दिनेश राय द्विवेदी जी भाई अजय कुमार झा के साथ मिलकर सारी ज़िम्मेदारी संभाल रहे हैं...राज जी के मुताबिक उन्होंने फिल्म का भी सोच लिया है...'ब्लॉगोले'...राज जी अच्छी बिज़नेस सोच वाले शख्स हैं...दरअसल उनकी योजना हॉलीवुड और बॉलीवुड की तरह ब्लॉगवुड को खड़ा करने की है...




राज जी ने मुझे साथ ही फिल्म की कास्टिंग का ज़िम्मा भी दे दिया...उन्होंने साथ ही ताकीद किया कि मल्टीस्टारर फिल्म बना रहे है, इसलिए उन्हें इसके लिए ब्लॉगवुड से  टॉप स्टार ही चाहिए...राज जी ने ये कहकर और  धर्मसंकट में डाल दिया कि उन्हें फिल्म की स्टारकास्टिंग एक दिन में ही चाहिए...'ब्लॉगोले' की कास्टिंग पर मैंने तत्काल सोचना शुरू किया और अपने करीबियों से एक दो घंटे में ही अपने सुझाव भेजने का आग्रह किया...

पहला सुझाव ही मेरे लिए किसी बम फटने से कम नहीं था...ये सुझाव एक परिचित महिला से मिला...उनका कहना था कि भूल जाइए, शोले का रीमेक बनता हो तो इस फिल्म में कोई महिला कलाकार काम करेगी...मैंने पूछा कि ऐसा क्यों भई...जवाब मिला कि शोले की कास्टिंग में पचास फीसदी के अनुपात से महिला कलाकारों को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया था, इसलिए शोले का रीमेक बनता है तो कोई महिला उसमें काम नहीं करेगी...बात में दम था...शोले में महिला पात्र ही कितने थे...बसंती, राधा और मौसी...बस...

वाकई इस एंगल से तो कभी सोचा ही नहीं गया था...मैंने राज जी को फौरन ये जानकारी दी...राज जी ने कहा...कोई बात नहीं...'ब्लॉगोले' तो बन कर ही रहेगी...चाहे फिल्म सारी मेल कास्ट को ही लेकर क्यों ना बनानी पड़े...राज जी ने आगे हिम्मत बढ़ाते हुए कहा कि आज से ठीक सौ साल पहले दादा साहेब फाल्के ने 'राजा हरिश्चन्द्र' बनाई थी तो उनके सामने भी यही दिक्कत आई थी...तब फिल्म मे तारामति का महिला पात्र उन्हें सालुंके नाम के एक पुरूष कलाकार से कराना पड़ा था...मैंने राज जी को समझाया कि ये सौ साल पहले का ज़माना नहीं है...आज के युग में ऐसा नहीं हो सकता...झट से दर्शक पहचान जाएंगे...राज जी ने कहा तो ठीक है हमारी ब्लॉगोले बिना महिला किरदारों के ही बनेगी...

चलिए एक बड़ी दिक्कत दूर हुई...अब आते हैं  ब्लॉगोले की स्टार-कास्ट पर...सबसे बड़ा चुनौती का काम था...ब्लॉगोले के लिए गब्बर सिंह को ढूंढना...इस पर मशक्कत कर ही रहा था कि मेरी पिछली पोस्ट पर आई डॉ अरविंद मिश्र की इस टिप्पणी ने मेरा ध्यान खींचा...

अब गब्बर दो ही हो सकते हैं -ऐसा करते हैं अनूप शुक्ल जी ये पदवी मझे अता कर दें और मैं इसे उन्हें समर्पित!

अब मैंने इन दोनों नामों पर विचार किया तो कद-काठी के हिसाब से अरविंद जी में ही मुझे परफेक्ट गब्बर नज़र आया...लीजिए अरविंद जी ने खुद ही अपना नाम प्रपोज़ कर मेरा आधा काम आसान कर दिया...

इसके बाद जय और वीरू की जोड़ी के लिए ब्लॉगवुड से स्टार ढूंढने शुरू किए तो दो नाम बिजली की तरह जेहन में कौंधे...गुरुदेव समीर लाल और महागुरुदेव अनूप शुक्ल ....जय यानी धीर-गंभीर लेकिन वक्त आने पर गज़ब की कॉमेडी में भी सक्षम...इस पात्र के लिए समीर जी मुझे बिल्कुल फिट लगे...वीरू के मस्तमौला किरदार के लिए फुरसतिया मौज के महारथी अनूप शुक्ल से बेहतर और कौन हो सकता था...अब इस कॉस्ट पर राज जी ने सहमति की मुहर लगा दी तो मुझे सबसे ज़्यादा इंतज़ार उस क्लाईमेक्स सीन का रहेगा जहां गब्बर और वीरू की भिड़ंत होती है...डॉ अरविंद मिश्र और अनूप शुक्ल आमने-सामने लाइव... 

तीन मुख्य पात्रों की मेरी चिंता तो ख़त्म हुई...लेकिन अभी एक और अहम  किरदार बचा था...ठाकुर बलदेव सिंह का...अब ये यक्ष प्रश्न सामने था कि ब्लॉगवुड में ऐसा कौन है जो संजीव कुमार जैसी संजीदगी के साथ ही इस पात्र से न्याय कर सके...बहुत सोचा कुछ समझ नहीं आया...लेकिन फिर मेन्टॉस की तरह दिमाग़ की बत्ती जली...अरे बगल में छोरा और शहर में ढिंढोरा...ब्लॉगोले के ठाकुर साहब मेरे घर से बामुश्किल दो किलोमीटर की दूरी पर रहते हैं...यानी मेरे और सबके अज़ीज़...बड़े भाई सतीश सक्सेना....

अब शोले फिल्म ही ऐसी थी कि इस में निभाया गया हर छोटा-बड़ा किरदार फिल्म के रिलीज़ होने के 38 साल बाद ही हर एक के दिलो-दिमाग़ में ताजा है...जैसे कि अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर....अबे जब हम नहीं सुधरे तो तुम क्या सुधरोगे...इसके लिए मैंने बहुत सोचा...इस रोल के लिए 'हंसते रहो' के राजीव तनेजा भाई से माकूल मुझे और कोई नज़र नहीं आया...

इसके बाद नंबर आया...सूरमा भोपाली का...वहीं सूरमा भोपाली...दो रुपये में पूरा जंगल खरीदोगे जनाब वाले...अब इस बेहतरीन करेक्टर से कौन न्याय कर सकता था...इसके लिए मेरी नज़र टिकी अपने ब्लॉगवुड के अन्ना भाई यानी अविनाश वाचस्पति पर...

चलिए अहम किरदार तो सारे हो लिए...लेकिन अभी सांभा, कालिया, रहीम चाचा, अहमद के पात्रों के लिए कास्टिंग बाकी है...इतना सन्नाटा क्यों है भाई वाले रहीम चाचा के लिए जी के अवधिया जी मुझे फिट नज़र आ रहे हैं...इन सब पात्रों के  लिए या ऊपर मेरे सुझाये गये अहम किरदारों के लिए ब्लॉगवुड से और ज़्यादा दमदार आपके जेहन में हो तो फौरन अपना प्रस्ताव भेजिए...मुझे होली से पहले ही ब्लॉगोले की स्टारकास्ट फाइनल कर राज जी को जर्मनी भेजनी है...जिससे वो हॉलीवुड में अपने सलाहकारों से और टेक्निकल पाइंट्स  डिस्कस कर सकें...

राज भाटिया प्रेजेंन्ट्स 'ब्लॉगोले'

स्टारकास्ट....

ठाकुर बलदेव सिंह....सतीश सक्सेना
वीरू....अनूप शुक्ल
जय....समीर लाल
गब्बर सिंह...डॉ अरविंद मिश्र
जेलर...राजीव तनेजा
सूरमा भोपाली....अविनाश वाचस्पति
रहीम चाचा...जी के अवधिया
रामू काका...चंद्र प्रकाश
सांभा...संतोष त्रिवेदी (अर्चना जी को नीचे टिप्पणी में ये नाम सुझाने के लिेए साधुवाद)
कालिया...संजय झा (खुद उन्होंने सुझाव दिया)
अहमद...अंतर सोहेल (अदा जी का सुझाव ) या केवल राम (राज भाटिया जी का सुझाव ) या दीपक मशाल (मेरा सुझाव )
हथियारों का कबीलाई डीलर...ललित शर्मा
काशीराम...भारतीय नागरिक
वीरू की अंग्रेज़ी पर सवाल करने वाला ग्रामीण...गिरीश बिल्लौरे
...................
राधा...हरकीरत हीर (खुद  उनका अपना सुझाव)
मौसी...निर्मला कपिला जी ( राज भाटिया जी का सुझाव)
बसंती...कोई तैयार नहीं हुआ (अब लगता है अदा जी के सुझाव के अनुसार मुझे ही ये रोल करना पड़ेगा, जैसे दादा साहेब फाल्के ने भारत की पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र में तारामति के  पात्र के लिेए पुरुष कलाकार सालुंके से अभिनय कराया था)

(होली पर निर्मल हास्य)

रविवार, 24 मार्च 2013

ब्लॉगवुड में गब्बर की होली...खुशदीप


गब्बर की होली पर हिंदी लोक डॉट कॉम पर पीयूष पांडे का एक व्यंग्य पढ़ा...बड़ा आनंद आया...इसी व्यंग्य से ख्याल आया कि अगर रामगढ़ की जगह गब्बर ब्लॉगवुड में होली खेलने आ जाता तो क्या होता...एक तो गब्बर दिमाग़ का वैसे ही पूरा-सूरा... फिर ऊपर से उसे हर साल ये जानने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है कि होली कब होगी....बेचारे का गला सूख जाता है, पूछते-पूछते...होली कब है? कब है होली, कब? लेकिन कोई उसे नहीं बताता...



अब यहां पीयूष पांडे के व्यंग्य को रिपीट कर रहा हूं...बस आपको इतना करना है कि इसे पढ़ते वक्त आपको रामगढ़ की जगह ब्लॉगवुड को ध्यान में रखना है...जैसे कि रामगढ़ के कई अहम किरदार वहां से शिफ्ट हो गये, वैसे ही ब्लॉगवुड के कई महारथियों ने भी कल्टी काट ली...यहां आपको अपने हिसाब से ब्लॉगवुड के किरदार फिट करने  की छूट है...फिर देखिए कि होली की तरंग दुगनी होती है या नहीं...

“अरे ओ सांभा, होली कब है?कब है होली?”  जेल से छूटकर लौटे गब्बर ने बौखला कर सांभा से पूछा... 

“सरदार, होली 27 तारीख को है... लेकिन, अचानक होली का ख्याल कैसे आया? बसंती तो गांव छोड़कर जा चुकी है, और ठाकुर भी अब ज़िंदा नहीं है... फिर, होली किसके साथ खेलोगे?

“धत तेरे की...लेकिन, वीरु-जय उनका क्या हुआ?”

“सरदार, तंबाकू चबाते चबाते तुम्हारी याददाश्त भी चली गई है...जय को तुमने ही ठिकाने लगा दिया था, और वीरु बसंती को लेकर मुंबई चला गया था...”

“जे बात... जेल में बहुत साल गुजारने के बाद फ्लैशबैक में जाने में दिक्कत हो रही है...खैर, ये बताओ बाकी सब कहां हैं...”

“ कौन बाकी...तुम और हम बचे हैं...कालिया को जैसे तुमने मारा था, उसके बाद सारे साथी भाग लिए थे...बचे खुचे जय-वीरु ने टपका दिए थे...”

“तो रामगढ़ में हमारी कोई औकात नहीं अब ? कोई डरता नहीं हमसे? एक ज़माना था कि यहां से पचास पचास मील दूर कोई बच्चा रोता था तो मां कहती थी कि.....”

“अरे, कित्ती बार मारोगे ये डायलॉग...इन दिनों बच्चे रोते नहीं, मां-बाप रोते हैं...बच्चे हर दूसरे दिन मैक्डोनाल्ड जाने की जिद करते हैं... मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने की मांग करते हैं....बंगी जंपिग के लिए प्रेशर डालते हैं...एक बार बच्चों को घुमाने गए मां-बाप शाम तक दो-तीन हजार का फटका खाकर लौटते हैं....।“ 

“सांभा,छोड़ो बच्चों को...बसंती की बहुत याद आ रही है... बसंती नहीं है धन्नो के पास ही ले चलो...”

“अरे सरदार...कौन जमाने में जी रहे हो तुम...धन्नो बसंती की याद में टहल गई थी...अब, धन्नो नहीं सेट्रो, स्विफ्ट, नैनो, एसएक्स-4,सफारी वगैरह से सड़कें पटी पड़ी हैं”

“अरे, ये कौन से हथियार  हैं?”

“ये हथियार नहीं...मोटर कार हैं... तुम्हारे जमाने में तो एम्बेसेडर भी बमुश्किल दिखती थी...अब नये नये ब्रांड की कारें आ गई हैं...”

“सांभा. होली आ रही है...रामगढ़ की होली देखे जमाना हो गया... होली कार में बैठकर देखेंगे...आओ कार खरीदकर लाते हैं...“

“अरे तुम्हारी औकात नहीं है कार खरीदने की...”

“जुबान संभाल सांभा...पता नहीं है सरकार कित्ते का इनाम रखे है हम पर... ”

“घंटा इनाम...कोई इनाम नहीं है तुम पर अब...और जो था न पचास हजार का !उसमें गाड़ी का एक पहिया नहीं आए...सबसे छोटी गाड़ी भी तीन-चार लाख की है...तुम तो साइकिल पर होली देख लो-यही गनीमत है...”

“सांभा,बहुत बदल गया रे रामगढ़...अब कौन सी चक्की का आटा खाते हैं ये रामगढ़ वाले?” 

“अरे, काहे की चक्की...चक्की बंद हो लीं सारी सालों पहले...अब तो पिज्जा-बर्गर खाते हैं...गरीब टाइप के रामगढ़ वाले कोक के साथ सैंडविच वगैरह खा लेते हैं...इन दिनों गरीबों के लिए कंपनी ने कोक के साथ सैंडविच फ्री की स्कीम निकाली है...

“सांभा, खाने की बात से भूख लग गई... होली पर गुझिया वगैरह तो अब भी बनाते होंगे ये लोग?”

“गब्बर बुढ़ा गए हो तुम...आज के बच्चों को गुझिया का नाम भी पता नहीं...बीकानेरवाला, हल्दीरामवाला,गुप्तावाला वगैरह वगैरह मिठाईवाले धांसू डिब्बों में मिठाई बेचते हैं...बस, वो ही खरीदी जाती हैं। एक-एक डिब्बा सात सौ-आठ सौ का आता है...तुम्हारी औकात मिठाई खाने की भी नहीं है...

“सांभा, तूने बोहत बरसों तक हमारा नमक खाया है न..? ”

“जी सरदार”

“तो अब गोली खा...गोली खाकर फिर जेल जाऊंगा... वहां अब भी होली पर रंग-गुलाल उड़ता है, दाढ़ी वाले गाल पर ही सही पर बाकी कैदी प्यार से रंग मलते हैं तो दिल खुश हो जाता है...जेल में दुश्मन पुलिसवाले भी गले लगा लेते हैं होली पर...ठंडाई छनती है खूब...और मिठाई मिलती है अलग से... सांभा, रामगढ़ हमारा नहीं रहा...तू जीकर क्या करेगा... ” (क्या वाकई ब्लॉग जगत का भी ऐसा ही हाल नहीं है...)
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एक पिंकू स्लॉग ओवर...

गुल्ली : 'होली' के त्योहार को "शेर का बच्चा " भी कहते हैं!

मक्खन : क्या बकवास कर रहे हो!

गुल्ली : क्यूँ? आपको  याद नहीं जब 'शोले' (Sholay ) पिक्चर में गब्बर सिंह ने कहा था, "होली 'कब'(Cub) है!"

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होली पर पिछले वर्षों की मेरी पोस्ट...

2010
समीर संतरीमंडल शपथ ग्रहण समारोह की तैयारी...खुशदीप
2011
ब्लॉगरों का सबसे बड़ा पोल खोल...खुशदीप

2012
होली पर ब्लॉगिंग की 'नूरा कुश्ती'...खुशदीप

शनिवार, 23 मार्च 2013

ज़िंदगी है क्या...खुशदीप



उम्र के साथ ज़िंदगी के मायने भी बदलते हैं...बचपन में सबसे प्यारे खिलौने में ज़िंदगी हो सकती है...थोड़ा बड़ा होने पर पढ़ाई ज़िंदगी बन जाती है...फिर करियर...प्रेमिका, पत्नी, बच्चे....पैसा, प्रॉपर्टी...इसी भागदौड़ में इंसान को पता भी नहीं चलता कि वो कब उस दौर में पहुंच जाता है कि उसके लिए मन की शांति ही सब कुछ यानि ज़िंदगी हो जाती है...लेकिन तब तक शायद बहुत देर हो गई होती है....
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एक बार एक बुद्धिमान व्यक्ति ने भगवान से पूछा...ज़िंदगी के मायने क्या है?

भगवान ने जवाब दिया...ज़िंदगी के खुद कोई मायने नहीं है...

ज़िंदगी एक मौका है, खुद मायने गढ़ने के लिए...
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ज़िंदगी तीन पन्नों की किताब है...

पहला और तीसरा पन्ना ऊपरवाले ने लिख दिया है...

पहला पन्ना.... जन्म

तीसरा पन्ना....  मौत

दूसरा पन्ना खाली है,

ये हमारे लिए छोड़ा गया है कि इसे हम कैसे भर कर ज़िंदगी को क्या मायने देते हैं?
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'सत्यकाम'...मेरी सर्वाधिक प्रिय फ़िल्म...जब भी इस फिल्म को देखता हूं, अंदर तक हिल जाता हूं...इसी फ़िल्म का गीत था...ज़िंदगी है क्या, बोलो ज़िंदगी है क्या...हर कोई अपने हिसाब से ज़िंदगी के मायने ढ़ूंढता...और गीत के अंत में धर्मेंद्र ज़िंदगी के सही मायने बताते हुए...




अब आप बताइए, आपके लिए ज़िंदगी के क्या मायने हैं?...

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

अच्छा है! सुनील दत्त आज ज़िंदा नहीं हैं..खुशदीप


1993 मुंबई सीरियल ब्लास्ट, 257 लोगों की मौत, 700 घायल...

साज़िश के सूत्रधार दाऊद इब्राहिम और टाइगर मेमन इंटरपोल की मदद लेने के बावजूद आज तक भारत के हाथ नहीं लग सके...

सुप्रीम कोर्ट ने इसी साज़िश में शामिल याक़ूब मेमन को टाडा अदालत की ओर से सुनाई गई फांसी की सज़ा को आज बरकरार रखा...

टाडा कोर्ट ने याकूब के अलावा जिन दस लोगों को और फांसी की सज़ा सुनाई थी, उसे सुप्रीम कोर्ट ने ज़िंदा रहने तक जेल की सलाखों के पीछे रहने की सज़ा में बदल दिया...

टाडा कोर्ट ने इस मामले में जिन 19 दोषियों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी, उनमें 17 के लिए शीर्ष कोर्ट ने इसी सज़ा पर अपनी मुहर लगाई...इसके अलावा अशरफ़ुर्रहमान अज़ीमुल्ला की उम्र कैद को घटाकर दस साल की सज़ा में तब्दील कर दिया गया..,टाडा कोर्ट से उम्र कैद की सज़ा पाए एड़्स के मरीज इम्तियाज़ यूनुस मियां घावटे को जेल में जितना वक्त बिताया है,उसे ही सज़ा मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मुक्त कर दिया...

बीस साल पुराने मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ये सभी अहम फ़ैसले आज ही सुनाये...लेकिन ये सभी नेपथ्य में चले गए...और इन सब पर भारी पड़ा अभिनेता संजय दत्त को लेकर सुनाया गया फ़ैसला...आर्म्स एक्ट के उल्लंघन के दोषी संजय दत्त की छह साल की सज़ा को घटाकर पांच साल कर दिया गया...पहले जेल में काटे गए सोलह महीने के वक्त को निकाल दिया जाए तो अब संजय दत्त को 44 महीने और जेल में काटने पड़ेंगे...



संजय दत्त जानेमाने अभिनेता है...बहुत ही नेक इंसान रहे सुनील दत्त के बेटे हैं...ज़ाहिर है मीडिया का सारा फोकस उनकी सज़ा पर ही रहना था... मान लीजिए संजय दत्त का नाम इस मामले से ना जुड़ा होता...तो सोचिए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को लेकर आज किस तरह की रिपोर्टिंग होती...तब संजय दत्त की जगह क्या दाउद इब्राहिम और टाइगर मेमन को आज तक ना पकड़ पाने की हमारी सुरक्षा एजेंसियों की नाकामी पर शिद्दत से सवाल नहीं उठ रहे होते...क्या याकूब मेमन समेत पूरे मेमन खानदान की सीरियल ब्लास्ट में भूमिका पर ज़िरह नहीं हो रही होती...आईएसआई और दाऊद के गठजोड़ पर क्या आसमान नहीं उठाया होता...सीरियल ब्लास्ट में जो 257 लोग मरे, जो अपंग हुए, क्या उनके परिवारों के दर्द को बताने में कोई कसर छोड़ी जाती?

लेकिन देश की अस्मिता से जुड़े इन सवालों की जगह अहम हो गई संजय दत्त की सज़ा...53 साल के संजय दत्त के बचपन से लेकर उम्र के इस पड़ाव तक की हर छोटी-बड़ी बात एक ही दिन में सुनने को मिल गई...झट से हिसाब लगाया जाने लगा कि संजय दत्त की सज़ा से फिल्म इंडस्ट्री को कितने करोड़ का नुकसान होगा...ये यक्ष प्रश्न हो गया कि संजय दत्त के घर पर उनसे मिलने के लिए आज बॉलीवुड या इससे बाहर की कौन-कौन सी हस्तियां पहुंची...संजय दत्त पर दो छोटे जुड़वा बेटा-बेटी और एक जवान बेटी की ज़िम्मेदारी का ज़िक्र किया जाने लगा...क्या ये सब इसलिए कि संजय दत्त सेलेब्रिटी हैं...ट्रायल के दौरान उनका आचरण बहुत अच्छा रहा है...लेकिन क्या सिर्फ इसीलिए वो सहानुभूति के हक़दार हो जाते हैं...

संजय दत्त को सीरियल ब्लास्ट की साज़िश में किसी तरह की संलिप्तता से टाडा कोर्ट पहले ही बरी कर चुकी थी... लेकिन आर्म्स एक्ट में संजय दत्त के दोषी होने पर अब सुप्रीम कोर्ट भी मुहर लगा चुका है...ये हो सकता है कि संजय दत्त से लड़कपन और शेखी बधारने के चक्कर में अवैध रूप से एक एके-56 राइफल और एक 9 एमएम पिस्टल अपने पास रखने का गुनाह हुआ...ये हथियार उसी खेप के साथ भारत आए थे, जिसे सीरियल ब्लास्ट में इस्तेमाल किये जाना था...ये माना जा सकता है कि संजय दत्त को सीरियल ब्लास्ट की साज़िश का कुछ पता नहीं था...लेकिन बुरे लोगों से जान-पहचान भी किस तरह ज़िंदगी को नर्क बना सकती है, ये संजय दत्त से बेहतर अब और कौन जानता होगा...संजय दत्त ने अपने कबूलनामे में खुद दुबई में एक बार दाऊद इब्राहिम से मुलाकात की बात मानी थी...अब मान लीजिए संजय दत्त की जगह किसी आम आदमी ने ये सब कुछ किया होता...तब क्या उसके लिए भी हमारा नज़रिया ऐसा ही होता...तब भी उसके लिए क्या कोई अफ़सोस जता रहा होता...    

ज़ाहिर है, संजय दत्त को जो सज़ा दी गई, वो सबूतों को परखने के बाद दी गई...बीस साल बाद ही सही संजय को अपने किए का अंजाम भुगतना पड़ा...ऐसे में जॉली एलएलबी फिल्म में जज बने सौरभ शुक्ला का एक डॉयलॉग सटीक बैठता है...क़ानून अंधा होता है, जज नही...जज को सब दिखता है...लेकिन संजय दत्त के प्रति नरमी की वक़ालत करने वाले कुछ लोग ट्विटर पर भी आज अज़ीब कुतर्क देते दिखे...उनका सवाल था कि जब सीरियल ब्लास्ट के मुख्य गुनहगारों- दाऊद इब्राहिम और टाइगर मेमन को आज तक सज़ा नहीं दी जा सकी तो फिर अवैध हथियार रखने के अपराध में संजय दत्त को सज़ा क्यों...ऐसी दलील देने वालों की अक्ल पर बस तरस ही किया जा सकता है...

ये याद रखा जाना चाहिए कि संजय दत्त पिछले 20 साल में डेढ़ साल से भी कम अरसे तक ही जेल में रहे...बाकी साढ़े 18 साल में उन्होंने कई फिल्मों में अभिनय किया...कई फिल्में प्रोड्यूस भी की...इससे करोड़ों रुपये भी कमाए...यहीं नहीं इसी अरसे में उन्होंने दो शादियां भी कीं...दो जुड़वा बच्चों के पिता भी बने...संजय दत्त को निर्णायक सज़ा सुनाने मे हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था को बीस साल लगे...इस दौरान डेढ़ साल को छोड़ दें तो बाक़ी वक्त में उन्हें वो सभी करने की छूट रही जो उन्होंने करना चाहा...ये भी नहीं भूलना चाहिए कि संजय दत्त अब तक ज़मानत पर रिहा रहे...जो ये विलाप कर रहे हैं कि संजय दत्त के अब साढ़े तीन साल तक जेल में जाने से प्रोड्यूसरों का करोड़ों का नुकसान होगा...तो क्या इन प्रोड्यूसरों को नहीं पता था कि वो ऐसे शख्स पर दांव लगा रहे है जो ज़मानत पर रिहा है...जिसे ज़मानत रद्द होने पर कभी भी जेल जाना पड़ सकता है...

क्या ये सब जानने के बाद भी हमें संजय दत्त के साथ किसी तरह की हमदर्दी होनी चाहिए...क्या सिर्फ़ इसलिए कि वो संजू बाबा है...हमें हमदर्दी होनी चाहिए तो उस नेक आत्मा से जिसका नाम सुनील दत्त था...वो सुनील दत्त, जिनकी हर धड़कन इस देश की भलाई के लिए थी...वो सुनील दत्त जिनके लिए पत्नी नर्गिस दत्त के कैंसर से निधन के बाद संजय दत्त कई बार परेशानी के सबब बने...ड्रग्स के चक्कर से छुड़ाया तो सीरियल ब्लास्ट से जुड़े अवैध हथियार मामले में बेटे के शामिल होने की तोहमत...ये सब उन्हीं सुनील दत्त ने देखा, जिन्होंने खालिस्तानी आतंकवाद के चरम पर होने के दौरान अमृतसर तक पदयात्रा का जोख़िम उठाया था...दत्त साहब, अच्छा है कि आप बेटे को एक बार फिर जेल जाता देखने के लिए इस दुनिया में नहीं है

मंगलवार, 19 मार्च 2013

हमीं से मुहब्बत, हमीं से लड़ाई...खुशदीप



हमीं से मुहब्बत, हमीं से लड़ाई,
अरे मार डाला, दुहाई-दुहाई...




करुणानिधि ने यूपीए से नौ साल के हनीमून के बाद नाता तोड़ लिया...करुणानिधि ने वही श्रीलंकाई तमिल कार्ड खेलने की मंशा से दांव चला है जो वो पिछले कई चुनाव से आज़माते आ रहे हैं...जिस मांग पर उन्होंने यूपीए से समर्थन वापस लिया वो ज़ाहिर है विदेश नीति को ताक पर रख देने वाली थी...सरकार बचाने के लिए अब कांग्रेस की सारी उम्मीदें मायावती और मुलायम सिंह यादव पर हैं...



लेकिन सोनिया भी जानती हैं कि माया-मुलायम के वेंटिलेटर के ज़रिए सरकार ज़्यादा दिनों तक सांस नहीं ले सकतीं...उधर पवार भी कभी भी वार करने के लिए तैयार बैठे हैं...इसलिए सोनिया अपनी पार्टी के सांसदों को चुनाव के लिए तैयार रहने का आह्वान पहले ही कर चुकी हैं...दिल्ली का सियासी पारा अब कुछ दिनों तक उफ़ान पर रहेगा...हो सकता है कि नतीज़ा जल्दी लोकसभा चुनाव के तौर पर निकले...ख़ैर जो होगा, सो होगा, फिलहाल तो गठबंधन की राजनीति में रूठने-मनाने पर दिलीप कुमार की फिल्म लीडर (1964) का ये गाना बड़ा सटीक बैठ रहा है....

हमीं से मुहब्बत, हमीं से लड़ाई,
अरे मार डाला, दुहाई-दुहाई...
अभी नासमझ हो उठाओ ना खंजर,
कहीं मुड़ ना जाए तुम्हारी कलाई...
अरे मार डाला, दुहाई-दुहाई...

सितम आज मुझ पर जो तुम ढहा रही हो,
बड़ी खूबसूरत नज़र आ रही हो,
ये जी चाहता है के खुद जान दे दूं, 
मुहब्बत में आए ना तुम पर बुराई,
अरे मार डाला, दुहाई-दुहाई...

हमें हुस्न की हर अदा है गवारा,
हसीनों का गुस्सा भी लगता है प्यारा.
उधर तुम ने तीर-ए-नज़र दिल पे मारा,
इधर हमने भी जान कर चोट खाई,
हमी से मुहब्बत, हमी से लड़ाई,
अरे मार डाला, दुहाई-दुहाई...


करो ख़ून तुम यूं ना मेरे जिगर का,
बस एक वार काफ़ी है तिरछी नज़र का,
यही प्यार को आज़माने का दिन है
किए जाओ हम से यूहीं  बेवफ़ाई...
हमीं से मुहब्बत, हमीं से लड़ाई,
अरे मार डाला, दुहाई-दुहाई...
अभी नासमझ हो उठाओ ना खंजर,
कहीं मुड़ ना जाए तुम्हारी कलाई...
अरे मार डाला, दुहाई-दुहाई...


सोमवार, 18 मार्च 2013

मेरठ का हूं, औकात पर आ गया तो...खुशदीप

मेरठ का हूं, औकात पर आ गया तो कुकड़गांव बना दूंगा...

जॉली एलएलबी फिल्म में ये डॉयलॉग सुना तो अपने शहर मेरठ का मिजाज़ बड़ी शिद्दत के साथ याद आ गया...दिखने में अक्खड़, बेख़ौफ़ लेकिन दिल से ईमानदार..करनी पे आएं तो आगे-पीछे की सोचे बिना किसी से भी भिड़ जाने वाले...फिल्मकार सुभाष कपूर ने जॉली एलएलबी फिल्म में अरशद वारसी के ज़रिए मेरठ के इस करेक्टर को बाख़ूबी उकेरा है...



इस फिल्म की एक और खासियत है...कोर्ट-रूम के अंदर और बाहर के माहौल का सटीक चित्रण जैसा कि असलियत में उत्तर भारत में किसी भी निचली अदालत में देखा जा सकता है...अभी तक फिल्मों में जिस तरह की अदालतें देखते आए हैं, ये उससे अलग है...इस फिल्म को बनाने वाले सुभाष कपूर पत्रकार से फिल्मकार बने हैं...दिल्ली में पत्रकारिता के दिनों में उन्हें अदालतों के कामकाज को नज़दीक से देखने का मौका मिला...उसी अनुभव का उन्होंने जॉली एलएलबी में बड़ा अच्छा इस्तेमाल किया है...

ये फिल्म देखकर आपको दिल्ली का 10 जनवरी 1999 का बीएमडब्ल्यू हिट एंड रन केस याद आ सकता है...वही केस जिसमें पूर्व नौसेनाध्यक्ष एस एम नंदा के पोते संजीव नंदा पर शराब के नशे में फुटपाथ पर कार चढ़ाकर छह लोगों की जान लेने का आरोप लगा था...इसी केस में एक गवाह बाद में ये कहते हुए मुकर गया था कि हादसा कार से नहीं ट्रक से हुआ था...इसी मामले में संजीव नंदा की पैरवी करते हुए जाने-माने वकील आर के आनंद पर एक दूसरे गवाह को खरीदने की कोशिश करने का आरोप लगा था...

अमीरों के लिए देश में अलग क़ानून है और गरीबों के लिए अलग...कुछ बड़े वकील अमीर गुनहगारों को बचाने के लिए किस तरह सबूतों को मैनीपुलेट करते हैं?...किस तरह ये पुलिस के भ्रष्टाचार को अपने फायदे के लिए भुनाते हैं? कैसे ये गवाहों को खरीदकर दिन को रात और रात को दिन साबित कर देते हैं? जॉली एलएलबी में इसी कड़वे सच पर चोट की गई है...

जॉली एलएलबी में 'दो कौड़ी के वकील' जगदीश त्यागी उर्फ़ जॉली (अरशद वारसी) का मुकाबला दिल्ली के 'टॉपनॉच' वकील तेजिंदर राजपाल (बमन ईरानी) से है...जॉली ने मेरठ के लॉ स्कूल से एलएलबी की है... जो अंग्रेंजी में हाथ तंग होने की वजह से अपील को एप्पल और प्रोसिक्यूशन को प्रोसिच्यूशन लिख देता है...दूसरी और राजपाल को ऐसा तेज़तर्रार वकील बताया गया है जो किसी तारीख पर पैरवी के लिए भी जाता है तो चार-पांच युवा सूटेड-बूटेड असिस्टेंट वकील हमेशा उसके पीछे रहते हैं...

जॉली को मुवक्किलों का टोटा है...दूसरी ओर राजपाल लाखों की फीस देने की कुव्वत रखने वाले मुवक्किलों की ही पैरवी करता है...जॉली भी राजपाल जैसा ही बड़ा वकील बनने का सपना देखता रहता है...इसी चक्कर में  मेरठ से दिल्ली आ जाता है...जॉली एक लैंडक्रूज़र हिट एंड रन केस में पीआईएल दाखिल कर चर्चित होने का टोटका आज़माता है...जॉली का मकसद भी राजपाल की तरह ही माल कमाना होता है...इसी चक्कर में उसका अदालत में राजपाल से टकराव होता है...यही टकराव फिल्म की जान है...किसकी जीत होती है, ये जानने के लिए तो आपको फिल्म ही देखनी होगी...

लेकिन फिल्म के कुछ संवादों का यहां ज़रूर ज़िक्र करना चाहूंगा जिससे कि आपको सिस्टम पर चोट करती इस फिल्म का फील महसूस हो सके...जैसे कि...

'ये अदालत है, यहां कुछ भी जल्दी नहीं होता'...

'कानून अंधा होता है, जज नहीं, उसे सब दिखता है'...

'फुटपॉथ लोगों के सोने के लिए नहीं होते....लेकिन फुटपॉथ गाड़ियां चलाने के लिए भी नहीं होते'...

फिल्म के एक दृश्य में थका-हारा जॉली एक पुल के नीचे पेशाब करने के लिए खड़ा होता है तो एक गरीब बुजुर्ग उससे आग्रह करता है कि साहब थोड़ा उधर चले जाएं, यह हमारे परिवार के सोने की जगह है....

फिल्म में सुभाष कपूर ने व्यंग्य को नई ऊंचाई दी है...कुछ कुछ 'जाने भी दो यारों' जैसी...ये व्यंग्य हंसाने के साथ कचोटता भी है...ये कचोट उन्हीं को हो सकती है जिनमें ईमानदारी बची है...लेकिन सिस्टम को जिन्होंने अपनी चेरी बना रखा है, उन्हें ये सच तिलमिला भी सकता है...

अरशद वारसी और बमन ईरानी दोनों मंझे अदाकार हैं...दोनों ने अपनी भूमिकाओं से पूरा न्याय किया है...लेकिन फिल्म में सबसे बाज़ी मारी है जज सुंदर लाल त्रिपाठी की भूमिका में सौरभ शुक्ला ने...फिल्म में सिर्फ एक सीन में आए संजय मिश्रा का गुरुजी का किरदार भी गज़ब का है...गुरुजी एक ऐसा हेडकांस्टेबल जो दिल्ली के थानों की नीलामी के लिए पुलिस अफ़सरों की क्लास लेता है...फिल्म में नायिका की औपचारिकता अमृता  राव ने पूरी की है...उनके हिस्से में दो गानों के अलावा जॉली के विवेक को झकझोरने का भी जिम्मा है...वैसे फिल्म में गाने ना होते तो भी चलता....

'सलाम इंडिया' और 'फंस गये ओबामा' के बाद जॉली एलएलबी सुभाष कपूर की तीसरी फिल्म है...अब वो विधू विनोद चोपड़ा के लिए मुन्ना भाई सीरीज़ की तीसरी फिल्म डायरेक्ट करने जा रहे हैं...उन्होंने राजू हिरानी को रिप्लेस किया है...ये अपने आप में ही उनके कैलिबर को दर्शाता है...उम्मीद है कि वो आगे भी अच्छे सिनेमा की चाह रखने वालों को निराश नहीं करेंगे...

शनिवार, 16 मार्च 2013

वहां कौन है तेरा?...खुशदीप



वहां कौन है तेरा, मुसाफ़िर जाएगा कहां, 
दम ले ले घड़ी भर, ये छईयां पाएगा कहां,
वहां कौन है तेरा....

आपा-धापी की इस ज़िंदगी में सचिन दा का ये गीत सुनने से बड़ा सुकून मिलता है...हर कोई भाग रहा है अंधी दौड़ में...बिना ये सोचे कि इस दौड़ का अंत कहां होना है...फिर भी सब भाग रहे हैं...कोई एक पल भी रुक कर सोचने को तैयार नहीं है कि ज़्यादा से ज़्यादा पाने की होड़ में  वो खोता क्या-क्या जा रहा है...और जब तक ये सच समझ आता है, तब तक शायद बहुत देर हो चुकी होती है...



नीचे जो लिखा है, उसे मेरे समेत सब जानते हुए भी शायद नहीं जानते..

सबसे निरर्थक काम   - चिंता
सबसे बड़ा आनंद - दान
सबसे बड़ा नुकसान - आत्म-सम्मान खोना
सबसे ज़्यादा संतोष देने वाला काम - दूसरों की मदद करना
सबसे बुरा व्यक्तित्व का पक्ष - स्वार्थी होना
सबसे तेज़ी से विलुप्त होती प्रजाति - समर्पित नेता
सबसे कारगर टॉनिक - उत्साहवर्धन
सबसे पहले क़ाबू पाने योग्य समस्या - डर
सबसे अच्छी नींद की गोली -  मन की शांति
सबसे ज़्यादा किससे बचना चाहिए-  चुगलख़ोर  व्यक्ति
सबसे विश्वसनीय कंप्यूटर -  दिमाग़
सबसे घातक हथियार - ज़ुबान
सबसे शक्तिशाली वाक्य - 'मैं कर सकता हूं'
सबसे बड़ी सम्पत्ति - विश्वास
सबसे व्यर्थ भाव - खुद को बेचारा मानना
सबसे बड़ी पूंजी - ईमानदारी
सबसे सुंदर पहनावा - मुस्कान
सबसे शक्तिशाली संवाद का माध्यम -  प्रार्थना





शनिवार, 9 मार्च 2013

पाकिस्तान! कौन सा पाकिस्तान?...खुशदीप



पाकिस्तान पड़ोसी मुल्क़ है...ये भी सोलह आने सच है कि मर्ज़ी से कभी पड़ोसी बदले नहीं जा सकते...फिर पाकिस्तान जैसे मर्ज़ की दवा क्या है...जवाब जानना चाहते हैं तो पोस्ट के आख़िर में स्लॉग ओवर पढ़ना ना भूलिएगा...



पाकिस्तान के प्रधानमंत्री राजा परवेज़ अशरफ़ ज़ियारत के लिए आज अजमेर शरीफ़ आ रहे हैं...पहले भी पाकिस्तान के कई हुक्मरान ख्वाजा ग़रीब नवाज़ की दरगाह पर चादर चढ़ाने के लिए आ चुके हैं...ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का घर हर एक के लिए खुला है...मज़हब या मुल्क की हदों जैसी यहां कोई बंदिशें नहीं हैं...कोई भी यहां आकर दुआ कर सकता है...अब राजा परवेज़ कौन सी दुआ करने के लिए आ रहे हैं ये तो वहीं जाने...पाकिस्तान में उनकी हुकूमत चंद दिनों की और मेहमान है...वहां की नेशनल असेंबली 16 मार्च को भंग होने जा रही है...

पाकिस्तान में कोई भी हुक्मरान घरेलू मुश्किलात में फंसता है तो अजमेर शरीफ़ का रुख करता है...राजा परवेज़ से पहले भी जिया उल हक़, बेनज़ीर भुट्टो, परवेज़ मुशर्रफ़ और आसिफ़ अली ज़रदारी ये ज़ियारत कर चुके हैं...ज़ाहिर है कि ऐसा कभी भी किया जा सकता है, इसके लिए दिल्ली से बाकायदा न्यौते की ज़रूरत नहीं होती...ये बात अलग  है कि हिंदुस्तान की सरकार के लिए ज़रूर अजीबोग़रीब हालात हो जाते हैं...विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद जयपुर में राजा परवेज के लिए शनिवार दोपहर को ख़ास दावत भी देने जा रहे हैं...शायद ऐसे ही मौकों के लिए निदा फ़ाज़ली साहब ने क्या ख़ूब कहा है...

बात कम कीजिए, 
ज़हानत को छुपाते रहिए,
अजनबी शहर है,
दोस्त बनाते रहिए,
दुश्मनी लाख सही, 
ख़त्म ना कीजिए रिश्ता,
दिल मिले ना मिले,
हाथ मिलाते रहिए...

- निदा फ़ाज़ली

अब स्लॉग ओवर के ज़रिए जानिए वो दवा, जिसका ज़िक्र मैंने पोस्ट के शुरू में किया था...

स्लॉग ओवर...

हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की हुकूमतों के प्रमुख परमाणु हथियारों के मसले पर बातचीत करने के लिए इस्लामाबाद में जुटे...दोनों कुर्सियों पर बैठ गये तो हिंदुस्तानी प्रमुख ने देखा कि पाकिस्तानी प्रमुख की कुर्सी के हत्थे पर तीन बटन लगे हैं...दोनों ने बातचीत शुरू की...पांच मिनट बाद पाकिस्तानी ने एक बटन दबा दिया...ऐसा करते ही हिंदुस्तानी की कुर्सी से एक बॉक्सिंग ग्लव्स निकला और हिंदुस्तानी के मुंह पर झन्नाटेदार मुक्का जड़ दिया...हिंदुस्तानी को यकीन नहीं हुआ लेकिन उसने बातचीत फिर भी जारी रखी...कुछ देर बाद पाकिस्तानी ने दूसरा बटन दबाया...इस बार हिंदुस्तानी की कुर्सी से एक बड़ा बूट (जूता) निकला और हिंदुस्तानी को ज़ोरदार किक जड़ दी...हिंदुस्तानी प्रमुख इस तरह के बर्ताव से सन्न था लेकिन उसने फिर भी खुद को संभाला...फिर बातचीत के दौर को शुरू किया...थोड़ी देर बाद फिर वही किस्सा...पाकिस्तानी प्रमुख ने तीसरा बटन दबा दिया...इस बार कुर्सी के बीचों-बीच नीचे से एक मुक्का निकला और हिंदुस्तानी को दिन में ही तारे नज़र आ गए...लेकिन उसने फिर धैर्य का परिचय दिया...साथ ही उसने पाकिस्तानी से हाथ मिलाते हुए कहा- "इस बातचीत को अब हम अगले हफ्ते दिल्ली में जारी रखेंगे"...हिंदुस्तानी की ऐसी दयनीय हालत देखकर पाकिस्तानी का हंसते-हंसते बुरा हाल था...इसी चक्कर में वो हिंदुस्तान आने के न्योते से मना भी नहीं कर सका...

एक हफ्ता बीतने के बाद पाकिस्तानी प्रमुख दिल्ली में हिंदुस्तानी प्रमुख के दफ्तर में था...दोनों बातचीत के लिए आमने-सामने बैठे...पाकिस्तानी ने देखा कि हिंदुस्तानी प्रमुख की कुर्सी के हत्थे पर तीन बटन लगे हैं...पाकिस्तानी ये देखकर अपनी कुर्सी पर संभल कर बैठ गया...पांच मिनट की बातचीत के बाद हिंदुस्तानी ने एक बटन दबाया...पाकिस्तानी सतर्क था, उसने हिंदुस्तानी को ऐसा करते देखते ही अपना सिर तेज़ी से नीचे कर लिया....लेकिन ये क्या...कुछ भी नहीं हुआ...पाकिस्तानी थोड़ा सकपकाया...तब तक हिंदुस्तानी के चेहरे पर गज़ब की मुस्कान आ चुकी थी...पाकिस्तानी के संभलने के बाद दोनों ने फिर बातचीत शुरू की...दस मिनट बाद हिंदुस्तानी ने दूसरा बटन दबाया...ये देखते ही पाकिस्तानी बिजली की तेज़ी से अपनी कुर्सी से उठ गया...लेकिन फिर वही कहानी,  कुछ नहीं हुआ...अब तक पाकिस्तानी के चेहरे पर हैरानी साफ़ दिखने लगी थी...उधर, हिंदुस्तानी ने ये सब देखकर ज़ोर से हंसना शुरू कर दिया था...ख़ैर बातचीत का दौर फिर आगे बढ़ा...कुछ देर बाद हिंदुस्तानी ने तीसरा बटन दबाया...इस बार पाकिस्तानी प्रमुख कुर्सी पर शांत बैठा रहा...कुछ नहीं हुआ...लेकिन तब तक हिंदुस्तानी प्रमुख हंसते-हंसते बेहाल हो गया था और पेट पकड़ कर कुर्सी से नीचे आ गया था.....ये सब देखकर पाकिस्तानी का सब्र जवाब दे गया...उसने बेहद गुस्से से कहा- "बस, बहुत हो गया...मैं वापस पाकिस्तान जा रहा हूं"...

ये सुनकर हिंदुस्तानी प्रमुख ने ज़मीन पर ही लोटते-लोटते कहा..."पाकिस्तान! कौन सा पाकिस्तान?...तुम क्या समझते हो, वो अब भी वहां मौजूद है??"...