गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

बजट समझ नहीं आता, ये किस्सा पढ़िए...खुशदीप



भारत का बजट समझने का आपको रामबाण नुस्खा बताऊं, उससे पहले बजट की परिभाषा...

बजट होता क्या है...

बजट हर साल का वो अनुष्ठान है, जिसे वित्त मंत्री संपन्न करते हैं...प्रधानमंत्री समेत सत्ता पक्ष मेजें पीटकर उसका अनुमोदन करता है... विपक्ष छाती पीट कर जिसका विरोध करता है...मीडिया गला फाड़ कर जिसकी चीर-फाड़ करता है... लेकिन आम आदमी के पल्ले कुछ नहीं पड़ता...देशवासियों के  पल्ले कुछ पड़े ना पड़े लेकिन बजट में खर्च के प्रावधानों के लिए आखिरकार ज़ेब उसकी ही ढीली होती है... 



अब भारत का बजट समझने के लिए ये किस्सा...

सत्ता पक्ष का एक सदस्य संसद में बड़ी शान के साथ सुना रहा था...

एक पिता ने अपने तीन बेटों को सौ-सौ रुपये देकर कहा कि इस रकम से ऐसी चीज़ खरीद कर लाओ जिससे ये कमरा पूरी तरह भर जाए...

पहला बेटा सौ रुपये का भूसा खरीद कर लाया लेकिन उससे कमरा नहीं भरा...

दूसरा बेटा सौ रुपये की रूई खरीद कर लाया, पर कमरा उससे भी नहीं भरा...

तीसरा बेटा एक रुपये की मोमबत्ती खरीद कर लाया जिसकी रोशनी से कमरा पूरी तरह भर गया...

सत्ता पक्ष के सदस्य ने आगे जोड़ा...ये तीसरा बेटा हमारे वित्त मंत्री  हैं, जिस दिन से उन्होंने कमान संभाली है, देश खुशहाली की रौशनी से जगमगा उठा है....

तभी बैक-बैंच से एक आवाज़ उठी....बहुत बढ़िया, बहुत बढ़िया....लेकिन ये तो बता दो वो बाकी के 99 रुपये कहां गए....





सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

इसे पढ़िए, गले में कुछ फंसा लगेगा...खुशदीप




ये ऑटो वालों की कौम ही ऐसी है...बेईमानी इऩकी रग़-रग़ में बसी है...मीटर से कभी चलते नहीं...न ही थोड़ी दूरी के लिए जाने को राजी होते है...दिल्ली के रास्तों से अनजान लोगों से औने-पौने दाम वसूलते हैं...और कभी कोई विदेशी नज़र आ जाता है तो उसकी ज़ेब पर डाका डालने से भी बाज़ नहीं आते...बेशक दुनिया में देश का नाम कितना भी ख़राब क्यों न हो...

अजी, ये ऑटो वाले ढंग से अपना काम करते तो दिल्ली में दामिनीसे कुछ नरपिशाचों की दरिंदगी जैसी वारदात ही क्यों होती...16 दिसंबर की मनहूस रात को दामिनी और उसका दोस्त कई ऑटोवालों से आग्रह करते रहे लेकिन कोई चलने को तैयार नहीं हुआ...अगर कोई ऑटोवाला राजी हो जाता तो वो दोनों हैवानों की बस में बैठते ही क्यों...

ये ऑटो वाले लातों के भूत हैं, बातों से नहीं मानते...इनका तो सीधा एक ही इलाज है, कोई कहीं जाने को मना करे तो सीधा इऩका नंबर नोट कर पुलिस को रिपोर्ट करो...वो इनसे अपने तरीके से निपटेगी, तभी ये सीधे होंगे...


राजधानी दिल्ली में ऑटो वालों के बर्ताव पर लोग अक्सर इस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करते देखे जाते हैं...कुछ हद तक ऑटो वालों के ख़िलाफ़ ये आक्रोश सही हो सकता है...लेकिन त्रिकोण का एक चौथा कोण भी होता है...गेहूं के साथ घुन कैसे पिसता है, इसे देखा बीती 14 फरवरी यानी वैलेन्टाइन्स डे पर मेल टुडे की रिपोर्टर नीतू चंद्रा ने...

14 फरवरी को दिल्ली के जंतर मंतर पर दामिनीके सम्मान में प्रदर्शनकारियों के जुटने का कार्यक्रम था...इसी कार्यक्रम के बाद करीब दस बजे दो युवकों ने मयूर विहार जाने के लिए एक ऑटो रिक्शा को रोका...ऑटो रिक्शा वाले ने कहा कि उसका बेटा बीमार है और उसे घर जाने की जल्दी है...अगर वो चाहें तो उन्हें इंडिया गेट तक छोड़ सकता है...ये सुनना था कि दोनों युवक ऑटो वाले को गालियां देने लगे...कहने लगे- इन मक्कारों की मनमानी की वजह से ही दामिनी का बलात्कार और मर्डर हुआ...दोनों युवकों ने फौरन पुलिस को बुलाकर ऑटो वाले के ख़िलाफ़ रिपोर्ट दर्ज करा दी...पुलिस ने चालान कर ऑटो ज़ब्त करने में देर नहीं लगाई...फिर अगले चार घंटे तक ऑटो वाला पुलिस स्टेशन पर बैठा रहा...




ये घटनाक्रम पढ़ लिया...अब जानिए कि जनरल परसेप्शन के चलते कभी कैसा अनर्थ हो जाता है...

ऊपर जिस ऑटो वाले का ज़िक्र किया, उसका नाम यशवंत राय है...दाहिनी टांग कटी होने के बावजूद 36 साल का यशवंत किराए के ऑटो के ज़रिए परिवार का गुज़ारा चलाता है...परिवार में पत्नी और दो बेटे हैं...दोनों बेटे मुन्ना (14 साल) और शांतनु (5 साल) हीमोफीलिया बीमारी से पीड़ित हैं...पत्नी भी बीमार रहती है..यशवंत के दोनों बच्चे जिस बीमारी के शिकार है, अगर उसमें वक्त से ट्रांसफ्यूज़न ना हो तो शरीर से खून रिसने लगता है...

14 फरवरी को रात को भी ऐसा ही हुआ...छोटे बेटे शांतनु की कमर से ख़ून रिसने लगा...ये देखकर यशवंत को पत्नी ने जल्दी घर आने के लिए फोन किया जिससे कि बच्चे को अस्पताल ले जाया सके...यही बात यशवंत ने उन दो युवकों से भी कही थी, जो उसे मयूर विहार चलने के लिए कह रहे थे...लेकिन उन्होंने उसे पुलिस स्टेशन पहुंचा दिया...किसी तरह पुलिस की मिन्नत आदि कर यशवंत तड़के घर पहुंचा लेकिन तब तक शांतनु की हालत काफ़ी ख़राब हो चुकी थी...

यशवंत तत्काल उसे लोकनायक अस्पताल लेकर दौड़ा...वहां उसे आईसीयू में भर्ती कराया गया...पांच-छह घंटे की देरी से उसका इलाज शुरू हुआ...डॉक्टरों का कहना था कि ज़रा सी भी और देर हो जाती तो बच्चे की कमर के नीचे के हिस्से को लकवा मार सकता था...शुक्र है कि डॉक्टरों की मेहनत से बच्चा ख़तरे से बाहर है...लेकिन अब भी उसका अस्पताल में इलाज चल रहा है...

यशवंत इस सब को अपनी किस्मत का दोष मानता है...कहता है- एक टांग कटी होने के बावजूद परिवार के पालन के लिए कड़ी मेहनत करता है...लेकिन किसी-किसी दिन ऐसे भी हालात होते हैं कि परिवार के लिए दो जून की रोटी का जुगाड़ भी मुश्किल हो जाता है...

आपने पढ़ लिया ये सब...अब बताइए कि गले में कुछ फंसा हुआ महसूस हो रहा है या नहीं...

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

वो लड़खड़ाए तो देश भी खड़ा नहीं रह पाएगा...खुशदीप


हम मेहनतक़श इस दुनिया से, जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
एक खेत नहीं, एक बाग़ नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे...




मज़दूर फिल्म का ये गाना 20 और 21 फरवरी को बहुत याद आया...इन्हीं दो तारीख़ों को यूपीए सरकार की जनविरोधी और मज़दूर विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ देश भर में महाबंद रहा...हड़ताल का आह्वान 11 ट्रेड यूनियन ने किया था....हड़ताल के पहले दिन नोएडा के फेस 2 में मज़दूर हिंसा पर उतर आए...जमकर तोड़फोड़ के अलावा आधा दर्जन फैक्ट्रियों में आग़ लगा दी गई...दो दर्जन वाहन फूंक डाले गए...अगले दिन के अख़बार जलती हुई कारों की तस्वीरों से पटे थे...मीडिया में जो रिपोर्टिंग थी, वो यही साबित करने वाली थी कि मज़दूर ही देश में सबसे बड़े गुंडे और अराजक तत्व हैं..साथ ही फैक्ट्री मालिकों और मोटी तनख्वाह पाने वाले उनके मैनेजरों से दीन-हीन लोग दुनिया में और कोई नहीं...

देश की आम जनता के ज़ेहन में नोएडा में जलती हुई कारों की तस्वीरें ही रच-बस गई...पूरे देश में मज़दूरों की दुर्दशा पर लोगों का ध्यान खींचने के लिए जिस महाबंद का आह्वान किया गया था, उसका असली उद्देश्य हाशिए पर चला  गया...इस पर बड़ी हाय-तौबा मचाई गई कि पूंजीपतियों का करोड़ों  रुपये का नुकसान हो गया...ये तो सिर्फ एक दिन की कहानी थी...पूंजीपति  हर दिन मज़दूरों के शोषण के ज़रिए  आर्थिक हिंसा से अपना धन का अंबार जो ऊंचा करते जाते है, उस पर क्या कभी कहीं कोई आवाज़ उठती दिखती है...

स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) के लिए किस तरह किसान-आदिवासियों की ज़मीन छीनकर कॉरपोरेट्स के हवाले कर दी जाती है, ये सच किसी से छुपा नहीं है...कोई विरोध करता है तो पुलिस की गोलियां उनका सीना छीलने के लिए तैयार रहती हैं...लेकिन इस पर कहीं चूं भी नहीं होती...बंद के दौरान ये तो खूब बताया गया कि जनता को क्या क्या परेशानी हुई...बच्चों के स्कूल ना पहुंचने से उनकी पढ़ाई का नुकसान हुआ...मरीज़ों को अस्पताल ले जाने में परेशानी हुई...यानी मज़दूरों को समाज का सबसे बड़ा विलेन साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई...जैसे कि वो तो इस समाज का हिस्सा है ही नहीं....हमारा जीना एक दिन अस्तव्यस्त हुआ तो हंगामा हो गया...लेकिन उस मज़दूर का क्या, जिसके लिए रोज़ का जीना ही सबसे बड़ी चुनौती है...

पेट्रोल, डीज़ल, रसोई गैस, फल, सब्ज़ी के दाम बढ़ने पर हम आसमान सिर पर उठा लेते है कि महंगाई डायन मार कर छोड़ेगी...जब हमें इतनी दिक्कत होती है तो ज़रा उस मज़दूर का सोचिए, उसका क्या बुरा हाल होता होगा...क्या महंगाई उसके लिए नहीं बढ़ती...हम अपेक्षा रखते है कि महंगाई बढ़ रही है तो हमारी तनख्वाह में हर साल उसी अनुपात में बढ़ोतरी हो...लेकिन यही मांग फैक्ट्री मज़दूर करता है तो वो गुनाह करता है...फैक्ट्री मज़दूर ही क्यों हमारे मोहल्ले का चौकीदार, प्रेसवाला या घर की मेड 100-200 रुपये बढ़ाने की मांग करती है तो फौरन हमारे मुंह पर आ जाता है...इनके तो मुंह ही चौड़े होते जा रहे हैं...

हर चीज़ बाज़ार के हाथों नियंत्रित होती है...बाज़ार कॉरपोरेट्स का है...इसलिए टारगेट भी वही लोग है जो उत्पादों को खरीदने की हैसियत रखते हैं...मज़दूर इस कैटेगरी में नहीं आते इसलिए उन पर कभी फोकस नहीं रहता...कभी कोई स्लम जा कर जानने की कोशिश नहीं करता कि वहां गरीब मज़दूर किस हाल में रहते हैं...कैसे रोज़ मर मर कर जीते हैं...

नोएडा में जो उपद्रव हुआ, उसकी जड़े कहां है, ये किसी ने जानने की कोशिश नहीं की...नोएडा के करीब साढ़े छह हज़ार उद्योगों में तीन लाख से ज़्यादा श्रमिक काम करते हैं...यहां की फैक्ट्रियों में पिछले काफ़ी अरसे से छंटनी चल रही है...अब ठेके पर मज़दूर रखने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है...ठेकेदार किस तरह मज़दूरों का शोषण करते हैं, ये भी किसी से छुपा नहीं है...यहां फैक्ट्रियों के बाहर पिछले कई महीने से कभी छंटनी के विरोध में तो कभी वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर मज़दूर प्रदर्शन करते आ रहे हैं....हज़ारों मामले श्रम विभाग में लंबित है....कोई शोषण की शिकायत करने पुलिस के पास जाता है तो पुलिस भी पहले फैक्ट्री मालिक का हित देखती है...ऐसा क्यों, क्या ये भी बताने की ज़रूरत है...

मज़दूरों को तय मानकों के अनुसार तनख्वाह नहीं मिलती....नोएडा में मज़दूरों को 5918 रुपये की न्यूनतम तनख्वाह पाने के भी लाले हैं...जबकि दिल्ली में यही न्यूनतम वेतन 8814 रुपये है...ये असंतोष भी नोएडा में आक्रोश का लावा बन कर फूटा...महिला श्रमिकों की हालत तो और भी बदतर है...पैकेजिंग और एक्सपोर्ट कंपनियों में काम करने वाली इन महिला श्रमिकों को दस-दस घंटे जी-तोड़ मेहनत करने के बाद भी पांच हज़ार रुपये ही वेतन मिलता है...नोएडा में बस एक तिहाई कंपनियां ही हैं जो मज़दूरों को ईएसआई जैसी चिकित्सा सुरक्षा जैसी सुविधाएं देती हैं...

नोएडा में मज़दूरों के वेतन का बड़ा हिस्सा सिर छुपाने के लिए छत का बंदोबस्त करने में ही खप जाता है...नोएडा के विकसित सेक्टरों के बीच अब भी निठारी, हरौला, छलेरा, भंगेल, चौड़ा, बरौला, होशियारपुर, नया बांस जैसे पुराने गांव वाले इलाके हैं...नोएडा के ज़्यादातर मज़दूरों की रिहाइश इन्हीं बस्तियों में है...यहां बिना कोई सुविधा एक-एक कमरे के लिए ढाई से तीन हज़ार रुपये चुकाने पड़ते है...अविवाहित मज़दूर तो एक ही कमरे में पांच-छह की संख्या में रहकर कुछ रुपये बचा लेते हैं...लेकिन घर-परिवार वाले मज़दूरों की हालत तो और दयनीय हो जाती है....कमरे का किराया देने के बाद आख़िर खायें क्या...बच्चे हैं तो उन्हें पढ़ाए कैसे...

मनमोहनी अर्थव्यवस्था के दो दशकों का सबसे कड़वा सच है कि देश में ज़्यादातर पूंजी चंद हाथों में ही सिमट गई है...गरीब की हालत और पतली होती जा रही है...आर्थिक असमानता की खाई  चौड़ी होती जा रही है...सरकार भले ही सबको साथ लेकर विकास की बात करती है...लेकिन उसकी नीतियां समाज के सबसे ऊंची पायदान पर खड़े लोगों को ही फ़ायदा पहुंचाने की है...सबसे निचली पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए तो अब यही सबसे बड़ा सवाल है कि वो जीने के लिए रोज़ खड़ा कैसे रहे...और ये खड़ा नहीं रहा तो देश को भी लड़खड़ाने से कोई नहीं रोक सकता...उसका आक्रोश रह-रह कर कभी हरियाणा के मानेसर में तो कभी यूपी के नोएडा में फूटता ही रहेगा...सरकार और समाज को चाहिए कि वो सिर्फ आग़ लगने पर ही फायरफाइटर की भूमिका ना निभाए...हम सबको सोचना चाहिए कि ऐसी परिस्थितियां ही क्यों बनने दी जाएं, जिससे आग़ लगने की नौबत आए...समझदारी इसी में है कि वक्त रहते, हम चेत जाएं....

बात खत्म अपने चिरपरिचित अंदाज़ में फैक्ट्री-मालिक और मज़दूरों के रिश्ते पर बनी फिल्म पैग़ाम के इस गीत से करुंगा...



शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

ब्लास्ट के बाद हमेशा के अनुष्ठान...खुशदीप


हैदराबाद में गुरुवार शाम को जो हुआ, उसी रक्तरंजित घटनाक्रम से पूरी तरह पटे हुए अख़बार अब तक आपके हाथों में आ चुके होंगे...ट्विन ब्लास्ट के बाद से ही कुछ चिरपरिचित शब्दों की गूंज टीवी के ज़रिए आपके कानों में गूंज रही होगी...इंडियन मुजाहिद्दीन, लश्कर-ए-तैयबा, लोकल मॉ़ड्यूल्स, हाफ़िज सईद, टाइमर, बाइक बम, टिफ़िन बम, रेकी, अलर्ट, इंटेलीजेंस इनपुट, इंटेलीजेंस फेल्योर आदि आदि...



हर बार की तरह इस बार भी केंद्र सरकार की ओर से गृह मंत्री ने ब्लास्ट के बाद बयान देने में देर नहीं लगाई कि राज्य सरकारों को पहले से ही अलर्ट कर दिया गया था...मानों केंद्र ने तो अपनी ज़िम्मेदारी निभा दी थी, अब ब्लास्ट नहीं रोके जा सके तो ये सवाल राज्य सरकार  या वहां की पुलिस से पूछा जाना चाहिए...गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने ये बताने में भी वक्त नहीं गंवाया कि केंद्र की ओर से एनएसजी, एनआईए जैसे तमाम स्पेशलाइज्ड दल-बल भी ब्लास्ट की ख़बर मिलते ही हैदराबाद रवाना कर दिए गए...ये बता कर भी उन्होंने अहसान किया कि हवाई जहाज़ मिला तो वो भी गुरुवार आधी रात को हैदराबाद में मौके पर होंगे....और हां ब्लास्ट में जो मारे गए, उनके परिवारों के लिए दो-दो लाख रुपये के मुआवज़े की औपचारिकता पूरी करने में भी सरकार ने तत्परता दिखाई...

यानि केंद्र सरकार ने अपनी तरफ़ से हर वो अनुष्ठान पूरा कर दिया जो हर ब्लास्ट के बाद वो करती आयी है...अभी विपक्ष की बारी बाक़ी है...बीजेपी अब संसद में सरकार से ये सवाल पूछती नज़र आएगी कि आख़िर कब तक बर्दाश्त करता रहेगा देश ये सब? यानी शुरू होगा ब्लेम-गेम...

थोड़े दिन हैदराबाद ब्लास्ट का आफ़्टर-इफैक्ट पूरे देश में महसूस किया जाता रहेगा...प्रमुख शहरों में दो-तीन दिन तक पुलिस भी आपको काफ़ी मुस्तैद दिखाई देगी...ब्लास्ट की जांच को लेकर तरह तरह की थ्योरीज़ मीडिया के ज़रिए आप तक पहुंचेंगी..धीरे-धीरे एक हफ्ते तक सब शांत हो जाएगा...हैदराबाद के ये सीरियल ब्लास्ट भी बस एक काली तारीख बन कर रह जाएंगे...फिर हम हाइबरनेशन स्लीप में चले जाएंगे तब तक, जब तक कि कहीं अगला ब्लास्ट नहीं होता...

दरअसल हमारी (यानी भारत देश की) सबसे बड़ी कमज़ोरी ये है कि जब सिर पर पड़ती है, तभी हम उस समस्या का समाधान सोचते है...पैनिक बटन दबने पर ही हम पेन-किलर ढूंढते हैं...सामान्य अवस्था में जब हम ठंडे दिमाग़ से इस तरह के ख़तरों से निपटने के लिए कारगर नीति बना सकते हैं, तब हम दूसरी ही गपड़चौथ में मशगूल रहते हैं...उस वक्त हम राजनीतिक फायदे के लिए आतंकवाद का रंग ढ़ूंढते रहते हैं...गृह मंत्री शिंदे को आतंकवाद में भगवा नज़र आता है...वहीं संघ वाले सवाल दागते रहते हैं कि बेशक हर मुस्लिम आतंकवादी नहीं होता लेकिन हर आतंकवादी मुस्लिम क्यों होता है...

आतंकवाद को किसी ना किसी रंग से जोड़ कर देखना ही आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर देश का बंटाधार कर रहा है...इस मुद्दे पर हमारा पूरा देश एक होकर वैसा नज़रिया क्यों नहीं दिखा सकता जैसा कि 9/11 के बाद अमेरिका ने दिखाया था...इसी  मुद्दे पर आपकी राय जानने के लिए तीन सवाल रख रहा हूं,

1. सरकार ब्लास्ट होने  के बाद ही फायर-फाइटर की भूमिका में क्यों दिखाई देती है? ऐसी प्रो-एक्टिव अप्रोच क्यों नहीं अपनाती कि आग़ लगने की नौबत ही ना आए?

2. आतंक के इपिसेंटर पाकिस्तान को लेकर हमारी स्ट्रेटेजी इतनी सॉफ्ट क्यों? इस पर क्यों राष्ट्रीय सहमति नहीं बनायी जाती?


3. आतंकवाद से लड़ने का जो हमारा अप्रेटस है, उसमें इसराइल जैसे हॉर्ड-कोर प्रोफेशनल्स को क्यों नहीं शामिल किया जाता?

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

NaMo या RaGa...पर बंदे अच्छे हैं ?...खुशदीप



नमो नम: या रागा रागा...NaMo या RaGa...नरेंद्र मोदी या राहुल गांधी...कोई चाहे ना चाहे लेकिन 2014 लोकसभा चुनाव के लिए सियासत के  इन दो सूरमाओं पर सबसे ज़्यादा दांव लगाया जा रहा है...



नरेंद्र मोदी खुद मुंह से कह चुके हैं कि ब्रैंड गुजरात अब ब्रैंड इंडिया की ज़िम्मेदारी उठाने के लिए तैयार है...यानी मोदी को अपने कद के लिए गांधीनगर की जगह दिल्ली का दरबार ज़्यादा माकूल नज़र आने लगा है...बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी कह दिया है कि 2014 चुनाव में पार्टी के कमांडर मोदी होंगे...

लेकिन राहुल अपने मुंह से कुछ भी कहने के लिए तैयार नहीं है...राहुल के मन में क्या है, ये तो पता नहीं, लेकिन उनकी ज़ुबान पर दूसरा ही राग है...राहुल कांग्रेस उपाध्यक्ष के नाते दो दिन पहले बंद कमरे में करीब 45 कांग्रेसी दिग्गज़ों की क्लास ले रहे थे...वहां अपने नंबर बढ़वाने के मकसद से एक मशविरा देना उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को बहुत भारी पड़ा...

बहुगुणा ने बस इतना ही कहा था कि राहुल जी को प्रधानमंत्री की ज़िम्मेदारी संभाल लेनी चाहिए...ये सुनना ही था कि राहुल बिफर पड़े...आप अपना काम करिए...बिन मांगी सलाह मत दीजिए...प्रधानमंत्री (मनमोहन सिंह) के साथ क्या दिक्कत है? वे अच्छा काम कर रहे हैं...मैं दोबारा इस तरह की बात नहीं सुनना चाहता....

राहुल ने ये भी कहा कि आप बेशक मुझे प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं...लेकिन मेरे लिए मुझे सौंपी गई पार्टी उपाध्यक्ष की ज़िम्मेदारी को मनोयोग से पूरा करना ज़्यादा महत्वपूर्ण है...ये तय करना कांग्रेस आलाकमान का काम है कि कौन प्रधानमंत्री बने और कौन मुख्यमंत्री...फिलहाल प्रधानमंत्री उम्मीदवार को लेकर समस्या  नहीं है, समस्या पार्टी संगठन को लेकर है...जिस पर सबसे पहले ध्यान देने की ज़रूरत है...

ये सुनकर बहुगुणा सन्न रह गए...थोड़ी देर पहले बहुगुणा के सुझाव पर जिन कांग्रेसी दिग्गजों ने मेज थपथपाकर वफ़ादारी का धर्म निभाना चाहा था, उन सबके भी अब काटो तो ख़ून नहीं था...
राहुल यहीं तक चुप नहीं रहे...वो आगे बोले...उत्तर प्रदेश में कम से कम 200 उम्मीदवार हैं, जो मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं...उनमें से कुछ तो संयुक्त राष्ट्र के महासचिव और अमेरिका के राष्ट्रपति पद के भी उम्मीदवार हो सकते है...

राहुल की नेतृत्व क्षमता पर बेशक सवालिया निशान लगे हों, लेकिन उनकी ये अपने ही पार्टीजनों को खरी-खरी कुछ आश्वस्त करती है...राहुल विरोधियों से ज़्यादा इन दिनों अपनों पर ही अटैक कर रहे हैं...विपक्षी पार्टियों की जगह अपने ही संगठन की कमज़ोरियों को ज़्यादा गिना रहे हैं...राहुल जानते हैं कि जब तक कांग्रेस के शरीर को ही रोगमुक्त नहीं किया जाएगा तब तक कैसे एनडीए के डीएनए को पंक्चर किया जाएगा या थर्ड फ्रंट के थ्रेट को फ्रैक्चर किया जाएगा...

जिस तरह राहुल का अपनी ही पार्टी को आइना दिखाना आश्वस्त करता है, उसी तरह मोदी का एसआरसीसी में दिया विकासोन्मुखी भाषण भी देश की भावी राजनीति को लेकर कुछ संभावनाएं जगाता है...प्रधानमंत्री पद के दो अहम उम्मीदवारों के ये बोल, उन्हें कम से कम देश के दूसरे नेताओं से तो अलग कतार में खड़ा करते ही हैं...उन नेताओं से जो सकारात्मकता को छोड़ हर वक्त नकारात्मक रुख अपनाते हुए विरोधियों की खामियों को ही गिनाते रहते हैं...

मोदी गुजरात दंगों के कड़वे अतीत को भुलाकर अब ब्रैंड इंडिया का लोहा दुनिया भर में मनवाना चाहते हैं...राहुल अपने सियासी नौसिखिएपन से छुटकारा पाने के लिए भारत के असली मर्म को जानने की खातिर इसका हर कोना नापना चाहते हैं...मोदी देश के 65 फीसदी युवाओं की आबादी को न्यू एज पॉवर बताते हैं...राहुल पावर के पायज़न होने की दुहाई देते हुए पार्टी के युवाओं को लोगों की भलाई के लिए दिन-रात एक करने का मंत्र देते हैं...

मोदी और राहुल का ये सियासी आचरण कम से कम मायावती, मुलायम सिंह यादव और शरद पवार जैसे नेताओं से तो अच्छा है...जो यही दांव लगाए बैठे हैं कि कब दिल्ली की सत्ता का छींका फूटे और उनका प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब हकीकत बन जाए...

मायावती नागपुर में बीएसपी कार्यकर्ताओं का आह्वान करती हैं कि अगर वो उन्हें लालकिले की प्राचीर से तिरंगा फहराते देखना चाहते हैं तो जी-जान से पार्टी को लोकसभा चुनाव में सफ़ल बनाने के लिए जुट जाएं....मुलायम समाजवादियों को नसीहत देते हैं कि अगर उन्हें प्रधानमंत्री बनाना है तो अनुशासन में रहना सीखें...शरद पवार बोलते तो कुछ नहीं लेकिन मौका मिलते ही चौक्का मारने से कभी पीछे भी नहीं हटते...नीतीश मुंह से अब अल्लाह-अल्लाह करते हैं लेकिन बीते 13-14 साल से राम-राम का सियासी राग जपने वाली पार्टी की मदद से ही सत्ता की मलाई खाते आ रहे है...जहां तक जयललिता और ममता बनर्जी की बात है तो उनके सियासी तीरों के बारे में कुछ ना ही कहना, बेहतर होगा...

यानी लब्बोलुआब यही कि NaMo या RaGa में लाख खामियां सही, सियासी लीडरशिप के लिए.... पर बंदे अच्छे हैं...



बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

हिंदी ब्लॉग का ऑस्कर पाएं, जर्मनी जाएं...खुशदीप


हिंदी में ब्लॉगिंग का भविष्य? हिंदी को प्रोत्साहन कैसे दिया जाए? भारत सरकार या देश के राज्यों की सरकारों ने हिंदी ब्लॉगिंग को बढ़ावा देने के लिए क्या-क्या किया? ये सवाल देश में अक्सर पूछे जाते हैं...लेकिन सवाल इनसे और भी बड़ा है...ऑनलाइन सक्रियता को सही परिप्रेश्र्य में बढ़ावा देने के लिए देश में क्या हो रहा है...क्या नेता और क्या अभिनेता, आज देश में हर कोई सोशल मीडिया के महत्व को समझ रहा है...देश की अग्रणी राजनीतिक पार्टियां तो 2014 के आम चुनाव में सोशल मीडिया की भूमिका को लेकर एक तरह से आतंकित सी हैं...लेकिन ठोस तौर पर और व्यक्तिगत स्तर पर इसे बढ़ावा देने के लिए कोई कुछ नहीं कर रहा...

खैर आता हूं, अहम मुद्दे पर....हिंदी ऑनलाइन सक्रियता की अलग-अलग विधाओं को बढ़ावा देने के लिए सरकारी तौर पर देश में चाहे कुछ ना सोचा गया हो...लेकिन जर्मनी के अंतरराष्ट्रीय ब्रॉ़डकॉस्टर डॉयचे वेले ने इस दिशा में इस साल से प्रशंसनीय पहल की है...डॉयचे वेले बॉब्स अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार के तहत बेस्ट ऑफ ब्लॉग्स के तहत ये पुरस्कार दिए जायेंगे... इसके जूरी मेंबर लोकप्रिय टेलीविजन एंकर रवीश कुमार होंगे... अबतक ये पुरस्कार अंग्रेजी समेत दूसरी भाषाओँ में दिए जाते थे लेकिन इस बार से हिंदी, यूक्रेनी और  तुर्की ब्लॉग्स को भी इसमें शामिल किया गया है...



आप ज़्यादा से ज़्यादा इस आयोजन के लिए सक्रियता दिखाएं, इसके लिए डॉयचे वैले की वेबसाइट से साभार ये जानकारी आपके लिए उपलब्ध करा रहा हूं...

किसका ब्लॉग है, सबसे अच्छा ?

ब्लॉग, इंटरनेट पर जिम्मेदारी के साथ बेबाकी से अपनी बात कहने का एक मंच है. हिन्दी के ब्लॉग भी अब चेतना फैलाने का काम कर रहे हैं. इंटरनेट पर हिन्दी के बढ़ते चलन का ही असर है कि डॉयचे वेले बॉब्स अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार में अब हिन्दी के ब्लॉग्स भी शामिल किये जा रहे हैं.

6 मार्च 2013 तक दुनिया भर के इंटरनेट यूजर्स 14 भाषाओं में अपनी तरफ से उम्मीदवारों को नामांकित कर सकेंगे. इसमें उन वेबसाइटों को नामांकित किया जा सकेगा जो सोशल मीडिया और नेटवर्किंग के जरिए इंटरनेट में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बढ़ावा देती हैं और जनता को भागीदारी के लिए प्रेरित करती हैं.
अंतरराष्ट्रीय ज्यूरी सदस्य बॉब्स के विजेता तय करते हैं और इसके बाद वेबसाइटों की ऑनलाइन वोटिंग होती है. 15 ज्यूरी सदस्य छह सार्वजनिक श्रेणियों में विजेताओं को तय करते हैं. 34 श्रेणियों में इंटरनेट यूजर्स जनता पुरस्कार को तय करते हैं. 2012 में 3,000 से ज्यादा वेबसाइटों को नामांकित किया गया और 60,000 लोगों ने इंटरनेट के जरिए अपने वोट दिए.

नेटवर्क का समाज

हिंदी और यूक्रेनी सहित तुर्की बॉब्स की तीन नई भाषाओं में से है. उम्मीद है कि इनसे ब्लॉग जगत को बढ़ावा मिल सकेगा और सामाजिक नेटवर्कों में बहस की संस्कृति भी बढ़ेगी. इस साल की शुरुआत में स्प्रेब्लिक ब्लॉग ने लिखा कि जर्मनी में ब्लॉग संस्कृति को सामाजिक नेटवर्कों के मुकाबले और बढ़ावा दिया जाना चाहिए क्योंकि सामाजिक नेटवर्क अकसर अपने बिजनेस पर ध्यान देते हैं. इससे अलग ब्लॉग में विश्लेषण और बहस की संभावना ज्यादा होती है. तुर्की से इस साल ज्यूरी सदस्य बनकर आ रहे ओजगुर उत्सकान कहते हैं, “तुर्की में भी और ब्लॉग्स की जरूरत है क्योंकि हमें चीजों को देखने के और नए तरीके ढूंढने हैं और खुली बहस को आगे भी बढ़ाना है. उत्सकान मानते हैं कि बॉब्स जैसी पहल इसमें मददगार साबित हो सकती हैं- गाब्रिएल गोंसालेस जोरिया, मानसी गोपालकृष्णन


बॉब्स हिन्दी

6 फरवरी से बॉब्स तीन नई भाषाओं में शुरू हो रहा है.  बॉब्स यानी बेस्ट ऑफ ब्लॉग्स!!!

क्या आप बॉब्स 2013 के बारे में उत्सुक हैं? इस साल बॉब्स न केवल एक नए रूप में आ रहा है बल्कि इसमें कई सारी नई बातें भी हैं.  नौवें बॉब्स पुरस्कारों में 14 भाषाओं सहित तीन नई भाषाएं हिन्दी, तुर्की और यूक्रेनी शामिल हो रही हैं. इन नई भाषाओं में बेहतरीन ब्लॉग्स के लिए अब आप भी अपने प्रस्ताव रख सकते हैं.

यह कैसे होगा, बॉब्स में क्या श्रेणियां हैं और इसके अलावा आप बॉब्स के बारे में जो कुछ भी जानना चाहते हैं वह आप इन पन्नों पर पढ़ सकते हैं: अरबी, बांगला, चीनी, जर्मन, अंग्रेजी, फ्रांसीसी, हिन्दी, ब्हासा इंडोनेशिया, फारसी, पुर्तगाली, रूसी, स्पैनिश, तुर्की और यूक्रेनी.

साथ ही हम जानना चाहते हैं कि इन भाषाओं में कौन से माइक्रोब्लॉग्स सबसे प्रभावशाली और दिलचस्प हैं. इसलिए हम हर भाषा में माइक्रोब्लॉग ढूंढ रहे हैं.  इस साल से 34 श्रेणियों में पुरस्कार दिए जाएंगे.

2013 की जूरी

कौन सा ब्लॉग सबसे अच्छा है! यह तय करती है बॉब्स की प्रभावशाली जूरी. यह नामांकित ब्लॉग चुनती है और विजेता तय करती है. जूरी सदस्य आने वाले दिनों में बर्लिन में मिलेंगे और साथ बैठकर अपने दावेदार सामने रखेंगे और विजेता तय करेंगे.

तीन नई भाषाओं के लिए हमारे पास आ रहे हैं सक्षम प्रतिनिधि. इस्तांबुल से ओजगुर उकान वहां विश्वविद्यालय में मीडिया पढ़ाते हैं. वह तुर्की के प्रसिद्ध ब्लॉगरों और लेखकों में शामिल हैं. उन्होंने इंटरनेट के बारे में कई किताबें लिखी हैं.

यूक्रेन से हम नैयम मुस्तफा का स्वागत करेंगे.  अफगान मूल के मुस्तफा पत्रकार, ब्लॉगर और टीवी एंकर हैं और यूक्रेनी नेटवर्क की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक आवाजों में से एक हैं. हिन्दी भाषा के जूरी सदस्य रहेंगे रवीश कुमार जो भारत में टीवी एंकर और ब्लॉगर हैं. जूरी के सभी सदस्यों के बारे में जानने के लिए इस लिंक पर जाएं...

http://thebobs.com/hindi/category/2013/jury-2013/

याद रखें, 6 फरवरी

6  फरवरी 12.00 CET (भारतीय समय से शाम 04:30 बजे) पर बॉब्स शुरू हो रहा है. 6 मार्च 2013 तक आप सारी श्रेणियों में ब्लॉग के नाम दे सकते हैं. हम आपके सुझावों का इंतजार करेंगे!

क्या है बॉब्स

डॉयचे वेले के अंतरराष्ट्रीय ब्लॉग पुरस्कार बेस्ट ऑफ ब्लॉग्स में 12 भाषाओं के उन ब्लॉग को पुरस्कृत किया जाता है जो इंटरनेट में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और खुले विचार पेश करते हैं. बॉब्स की शुरुआत 2004 में हुई. उस वक्त इसका मकसद था इंटरनेट में सूचना के नए तरीकों को बढ़ावा देना, नए मिसालों को पहचानना और अलग अलग भाषाओं में सूचना के नए तरीकों को बढ़ावा देना.

इस पुरस्कार के जरिए डॉयचे वेले कोशिश करता है कि खुली बहस हो और मानवाधिकारों को इंटरनेट में बढ़ावा मिल सके.

पिछले साल के 2011 के बॉब्स का लेखा-जोखा-
17 श्रेणी
12 भाषाएं (अरबी, बांग्ला, चीनी, जर्मन, अंग्रेजी, फ्रांसीसी, ब्हासा इंडोनेशिया, फारसी, पुर्तगाली, रूसी, स्पैनिश)
2100 सुझाव
ऑनलाइन वोटिंग में 90,800 वोट


श्रेणी
बॉब्स पुरस्कार 17 श्रेणियों में दिए जाते हैं. अरबी, बांग्ला, चीनी, जर्मन, अंग्रेजी, फ्रांसीसी, ब्हासा इंडोनेशिया, फारसी, पुर्तगाली, रूसी और स्पैनिश.

प्रतियोगिता के 17 श्रेणिय़ों में छह मुख्य श्रेणी हैं जिनमें सारी भाषाओं के ब्लॉगों में से विजेता चुने जाते हैं और हर भाषा में सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग के लिए 11 श्रेणी हैं.

छह बड़ी श्रेणियों में हर श्रेणी के लिए एक जूरी पुरस्कार और एक सार्वजनिक पुरस्कार दिया जाता है. 11 श्रेणी में जीतने वाले ब्लॉगों में ऑनलाइन वोटिंग के जरिए विजेता चुना जाता है.

6 मुख्य श्रेणी (जूरी और सार्वजनिक पुरस्कार)

सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग
इस श्रेणी में उस ब्लॉग को सम्मानित किया जाता है जो मानवाधिकार को बढ़ावा देता है और सार्वजनिक हित वाले मुद्दे उठाता है.

सामाजिक हित के लिए तकनीक का बेहतरीन इस्तेमाल

इस श्रेणी में एक सॉफ्टवेयर या इंटरनेट प्लेटफॉर्म को सम्मानित किया जाता है, जिसने तकनीक से समाज में बदलाव की कोशिश की और लोकतंत्र को बढ़ावा दिया हो.

बेहतरीन मुहिम
इस श्रेणी में ऐसी कोशिश को सम्मानित किया जाता है जो सामाजिक नेटवर्क और डिजिटल संपर्क से आजादी, लोकतंत्र और मानवाधिकार को बढ़ावा देता है. कंपनियों और संगठनों के प्रचार को इसमें शामिल नहीं किया जाता.

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स पुरस्कार
विश्व पत्रकारिता संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की मदद से इस श्रेणी में उन ब्लॉग को सम्मानित किया जाता है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बढ़ावा देते हैं.

शिक्षा और संस्कृति पुरस्कार
यह श्रेणी हर साल बदलती है. बॉब्स में इस साल उन वेबसाइटों को सम्मानित किया जाएगा जो संस्कृति और शिक्षा को अलग तरह से पेश करती हैं.

सर्वश्रेष्ठ वीडियो चैनल
इस कैटेगरी में वीडियो फॉर्मेट को सम्मानित किया जाता है जिसे सीरीज के तौर पर बनाया गया है. अगर सीरीज एक ही विषय पर हों तो अच्छा है लेकिन यह जरूरी नहीं है. वीडियो खास इंटरनेट के लिए बने होने चाहिएं.

11 भाषाओं की श्रेणियां

इसमें 11 भाषाओं में सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग को चुना जाता है. वैसे ब्लॉग, जो खुली बहस को बढ़ावा देते हैं और राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं का विश्लेषण और उनकी टिप्पणी करते हैं, उन्हें इस श्रेणी में मौका दिया जाता है.

अरबी का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग
बांग्ला का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग
चीनी का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग
जर्मन का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग
अंग्रेजी का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग
फ्रांसीसी का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग
ब्हासा इंडोनेशिया का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग
फारसी का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग
पुर्तगाली का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग
रूसी का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग
स्पैनिश का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग
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शर्तें
जूरी की एक बैठक के दौरान जूरी के एक सदस्य किसी दूसरी भाषा के ब्लॉग के बारे में कुछ सुन रहे थे. वह अचानक कुर्सी से उठे और बोलने लगे, “मैं इसके पक्ष में हूं. हमारे देश में भी कुछ ऐसी चीज की जरूरत है.“

 इस घटना से हम ऐसी विशेषता बताना चाहते हैं जो इस प्रतियोगिता को दूसरी प्रतियोगिताओं से अलग करता है. बॉब्स पुरस्कार के जूरी सदस्य अलग अलग देशों से आते हैं और उन्हें अलग अलग भाषाओं में ब्लॉगरों को बढ़ावा देना होता है, उन्हें सम्मानित करना होता है और उनके बारे में चर्चा करनी होती है.


हर श्रेणी में ब्लॉग का सार, उसकी व्यावहारिकता और बनावट पर ध्यान दिया जाता है. हमने इस सिलसिले में तीन शर्तें तय की हैं.

ब्लॉग का मसौदा
आइडिया और शुरुआत, उसका पालन, जानकारी
मुद्दा, समाजिक महत्व
पाठकों के अनुरूप, विश्वास दिलाने की क्षमता
भाषा का प्रयोग
लंबे वक्त तक मुद्दे पर बहस
पारदर्शिता और विश्वासजनक
सृजनात्मकता
देखने में अलग, कलात्मक पेशकश, इंटरनेट में सारी संभावनाओं का अच्छा प्रयोग
नया तरीका
नया रूप या ब्लॉग की खासियत

जूरी सदस्यों की बातचीत में इन सभी शर्तों के आधार पर बातचीत होती है. सारी भाषाओं को एक साथ देखने वाली श्रेणी में तय किया जाता है कि क्या कोई ब्लॉग अपनी भाषा की सीमाओं के बाहर भी लोगों को पसंद आ सकता है और क्या लोग उसका सहयोग भी कर सकते हैं.

जनता पुरस्कार

लोगों की वोटिंग के मुताबिक हर नामांकित ब्लॉगर को यह पुरस्कार दिया जाता है. जिस ब्लॉग या प्रोजेक्ट को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, उसे इनाम दिया जाता है.
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नियम
पहला चरण- यूजर्स के प्रस्ताव

प्रतियोगिता की शुरुआत के साथ इंटरनेट पर यूजर्स से पूछा जाता है कि वह 11 भाषाओं में प्रतियोगियों को नामांकित करें.

पाठक केवल इन 11 भाषाओं में वेबसाइट नामांकित कर सकते हैं- अरबी, बांग्ला, चीनी, जर्मन, अंग्रेजी, फ्रांसीसी, ब्हासा इंडोनेशिया, फारसी, पुर्तगाली, रूसी और स्पैनिश. इस साल से हिंदी, यूक्रेनी और तुर्की भी जुड़े हैं.
आप खुद को नामांकित नहीं कर सकते
वेबसाइट इस तरह हो कि सब उसे देख सकें
डॉयचे वेले में काम कर रहे लोगों या जूरी सदस्यों की वेबसाइटों को नामांकित नहीं किया जा सकता.
हम ऐसे प्रस्ताव स्वीकार नहीं करते जो किसी की भावनाओं को आहत करें, जिनमें सांप्रदायिक भावनाओं या महिलाओं को अपमानित किया जाता हो या जिनमें अश्लील वेबसाइटों के लिंक हों.
एक प्रतियोगी को एक बार नामांकित करना काफी है. उसे कई बार नामांकित करने से उसके जीतने की संभावना पर कोई असर नहीं पड़ता.

दूसरा चरण- जूरी से तय फाइनलिस्ट
जूरी सदस्यों को अपनी अपनी भाषाओं में नामांकित ब्लॉगरों की सूची भेजी जाती है. हर भाषा के लिए एक जूरी सदस्य होता है. यह सदस्य नामांकित ब्लॉगों का विश्लेषण करते हैं और अपनी भाषा में फाइनलिस्ट तय करते हैं. अपनी भाषा में (बेस्ट ब्लॉग अंग्रेजी, जर्मन, स्पैनिश) एक एक कर वे कुल 11 ब्लॉगर चुनते हैं. संयुक्त श्रेणी में केवल एक को चुना जाता है. जूरी सदस्य अपनी तरफ से भी ब्लॉगरों का नामांकन कर सकते हैं. अगर कोई जूरी सदस्य अपनी भाषा से किसी को नामांकित नहीं करना चाहता, तो दूसरे भाषा से ब्लॉगर को लाया जाता है. 11 ब्लॉग हर भाषा से लाए जाते हैं. जूरी सदस्यों की अपनी वेबसाइट या जिन वेबसाइटों पर वे सक्रिय हैं, उन्हें प्रतियोगिता में शामिल नहीं किया जाता.

बॉब्स टीम में डॉयचे वेले के विभागों से एक प्रत्रकार को शामिल किया जाता है. यह पत्रकार जूरी सदस्यों की मदद करता है और उनके सवालों के जवाब देता है. लेकिन जूरी सदस्य अपनी भाषा में खुद फाइनलिस्ट तय करते हैं.

तीसरा चरण- ऑनलाइन वोटिंग और जूरी की बैठक

ऑनलाइन वोटिंग में यूजर्स अपने वोटों के जरिए हर श्रेणी में विजेता चुनते हैं.

जब अंतरराष्ट्रीय जूरी सारी श्रेणियों में फाइनलिस्ट तय कर देती है, तब वोटिंग शूरू होती है.
एक श्रेणी, भाषा और नेटवर्क पर 24 घंटे के अंदर सिर्फ एक बार वोट किया जा सकता है.
आप खुद को भी वोट दे सकते हैं.
17 श्रेणियों में वोटिंग से जनता के पसंदीदा विजेता को चुना जाता है. जूरी पहली छह संयुक्त श्रेणियों में मिलकर विजेता चुनती है.
विजेताओं को तय करने के लिए जूरी सदस्य डॉयचे वेले के निमंत्रण पर बर्लिन आते हैं और वहां एक दिन के बैठक में हिस्सा लेते हैं. अगर जूरी सदस्य किसी वजह से नहीं आ पाते तो बॉब्स के पत्रकार कुछ समय के लिए उनकी जगह ले लेते हैं और जूरी सदस्य का काम करते हैं. जूरी केवल संयुक्त श्रेणी में विजेताओं को चुनती है. डॉयचे वेले का एक सदस्य बैठक की अध्यक्षता करता है लेकिन उसे वोटिंग का अधिकार नहीं है.

वोटिंग केवल अंतरराष्ट्रीय जूरी सदस्य कर सकते हैं. वे कई चरणों के मतदान के बाद बहुमत के आधार पर विजेता तय करते हैं. हर श्रेणी में हर जूरी सदस्य अपने नामांकित प्रतियोगियों को पेश करता है. सारे प्रतियोगियों के परिचय के बाद पहला मतदान होता है. सबसे ज्यादा वोट हासिल करने वाले तीन प्रतियोगियों पर बहस होती है और फिर वोटिंग की जाती है. सबसे ज्यादा वोट पाने वाले दो ब्लॉगरों पर फिर बात होती है और फिर तीसरे मतदान के बाद विजेता तय हो जाता है. विजेता का नाम इस वेबसाइट पर बताया जाता है.
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कार्यक्रम
नौवें बॉब्स पुरस्कार- डॉयचे वेले ब्लॉग पुरस्कार

13 फरवरी से 13 मार्च 2013 तक बॉब्स के लिए प्रस्ताव भेजे जा सकते हैं. प्रस्तावित ब्लॉग इन 11 में से एक भाषा में होना चाहिए. (अरबी, बांग्ला, चीनी, जर्मन, अंग्रेजी, फ्रांसीसी, ब्हासा इंडोनेशिया, फारसी, पुर्तगाली, रूसी या स्पैनिश) और 17 कैटेगरी में से एक में खरा उतरना चाहिए.

बॉब्स में प्रस्तावों की संख्या से जीतने पर कोई असर नहीं होता क्योंकि अंत में जूरी ही विजेताओं को तय करती है.

जूरी प्रस्तावों को देखती है और फाइनलिस्ट तय करती है

13 मार्च से 2 अप्रैल 2013 तक अंतरराष्ट्रीय जूरी काम पर लगी रहती है. जूरी फाइनलिस्ट को तय करती है- यानी हर श्रेणी में 11 नामांकित ब्लॉग. इनमें से विजेताओं को चुना जाता है.

बॉब्स में हर साल जूरी विजेता और यूजर विजेता होते हैं. एक दिन की बैठक में जूरी छह संयुक्त श्रेणियों में विजेताओं को तय करती है. यूजर वोटिंग के जरिए एक विजेता को चुना जाता है. 17 भाषाओं में 11 फाइनलिस्ट ऑनलाइन वोटिंग में हिस्सा ले सकते हैं.

ऑनलाइन वोटिंग

17 श्रेणियों में से 11 फाइनलिस्ट की ऑनलाइन वोटिंग 2 अप्रैल से 2 मई तक होती है. हर श्रेणी के लिए 24 घंटे में एक बार वोट दिया जा सकता है. सबसे ज्यादा वोट पाने वाले प्रतियोगी को इनाम दिया जाता है.

बर्लिन में जूरी की बैठक

अंतरराष्ट्रीय जूरी 1 मई 2013 को बर्लिन में डॉयचे वेले के दफ्तर में मिलेगी. छह संयुक्त श्रेणियों में विजेताओं को खास मतदान से तय किया जाएगा.

विजेता का एलान

सारे विजेता- यूजर और जूरी विजोताओं के नाम 2 मई 2013 को बॉब्स की वेबसाइट पर बताया जाएगा. जूरी विजेताओं को पुरस्कार समारोह के लिए बॉन बुलाया जाएगा.

पुरस्कार समारोह

26 जून 2013 को बॉब्स 2013 पुरस्कार समारोह का आयोजन डॉयचे वेले ग्लोबल मीडिया फोरम में किया जाएगा.
(सामग्री- साभार डॉयचे वैले वेबसाइट)

सब पढ़ लिया, अब सोच क्या रहे हैं, ब्लॉग के नामांकन के लिए नीचे दिए लिंक पर जाएँ...लेकिन याद रखिए कि आप अपने ब्लॉग का सुझाव खुद नहीं दे सकते...अगर ऐसा करेंगे तो सुझाव पर विचार नहीं किया जाएगा....

http://thebobs.com/hindi/

रविवार, 10 फ़रवरी 2013

मोदी पर विष्णु बैरागी जी को ज़रूर पढ़िए...खुशदीप

मैं आज मिले एक ई-मेल से धन्य हो गया...ये मेल प्रसिद्ध साहित्यकार, विचारक और एकोऽहम् ब्लॉग के मॉडरेटर विष्णु बैरागी जी से मिला...कल मैंने नरेंद्र मोदी पर पोस्ट लिखी थी... इसी पोस्ट को पढ़ने के बाद विष्णु जी ने अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया से मुझे कृतार्थ किया...लेकिन इस प्रतिक्रिया का महत्व मेरी पोस्ट से भी कहीं ज़्यादा है, इसलिए आप सब को ये पढ़वाना चाहता हूं...लेकिन इससे पहले एक और बात...विष्णु जी के ब्लॉग पर इऩदिनों नरेंद्र मोदी पर ज्वलंत लेखमाला जारी हैं...मोदी के तिलिस्म को सही तरह से जानना है तो मेरा निवेदन हैं कि इस लेखमाला को अवश्य  पढ़िए....


यह राधा नहीं नाचेगी - 1



अब मेरी पोस्ट पर मिली विष्णु जी की ये प्रतिक्रिया...

अभी-अभी आपका आलेख पढा। पढ कर तन सन्‍न रह गया मन-मस्तिष्‍क  सुन्‍न हो गए। 

मुझे ऑंकडों की भाषा बिलकुल ही नहीं आती। मैं लोगों को उनके सार्वजनिक व्‍यवहार और वचनों पर तौलता हूँ। सबकी सदाशयता पर भरोसा करता हूँ, सबको भला मानता हूँ किन्‍तु यदि 'दृष्‍य-सुविधा' मिले तो उनके हाव-भाव, भाव-भंगिमा तथा वाक्-शैली को भी समझने-तौलने  की कोशिश करता हूँ  और तदनुसार आए निष्‍कर्षों में कमी रह जाने की भी भरपूर सम्‍भावनाऍं  रखता हूँ। इन सारे पैमानों पर मैं मोदी को बहुत ही निकृष्‍ट, प्रतिशोधी, दम्‍भी, असहिष्‍णु मनुष्‍य मानता हूँ।

किन्‍तु, गुजरात की प्रगति के सन्‍दर्भों में,  मुख्‍यमन्‍त्री और प्रशासक के रूप में उनकी जो जन-छवि बनी है, उसे मैंने अब तक प्राय: सच ही  माना है। गुजरात के विकास के, मोदी के दावों को झूठा कह कर उन्‍हें खारिज करनेवाले तमाम लोगों की तमाम बातों को मैंने 'विरोध के लिए विरोध' की राजनीति का अंग ही माना और यही तसल्‍ली करता रहा कि निकृष्‍ट मनुष्‍य यदि उत्‍कृष्‍ट मुखिया बन कर अपने लोगों के जीवन को बेहतर बनाता है तो उसकी 'मानवीय निकृष्‍टता' को अनदेखी कर देने की सीमा तक सहन किया जाना चाहिए।

लेकिन आपका यह आलेख पढकर  इस क्षण  मुझे लग रहा है मानो मेरे घर में कोई जवान मौत हो  गई है। मेरा एक जवान सपना असमय काल कवलित हो गया। मैं बहुत ही असहज हो गया हूँ। वास्‍तविकता को छुपाना एक बात है और अपनी कमियों को छुपाना एकदम दूसरी बात।  अपनी  कमियों को छुपाने का मेरे लिए एक ही अर्थ होता - खुद में सुधार की, बेहतरी की सारी सम्‍भावनाओं को समूल नष्‍ट कर देना। एक मुख्‍यमन्‍त्री को बेहतर बनने के लिए चौबीसों घण्‍टे सन्‍नध्‍द और सचेष्‍ट रहना चाहिए। लेकिन आपने जो कुछ  बताया उसका तो एक ही सन्‍देश मिल रहा है कि अपनी असफलताओं को अपना आभूषण बनाने के लिए न  केवल  किसी भी सीमा तक झूठ बाल लिया जाए  अपितु अपने विरोधियों को अपराधी भी साबित कर दिया जाए और यह सब अनजाने में, अनायास नहीं, सब कुछ जानते-बूझते, सुनियोजित रणनीति के अधीन किया जाए। मानता हूँ कि राजनीति में भजन करने के लिए नहीं आया जाता किन्‍तु इसका अर्थ यह तो बिलकुल ही नहीं होता  खुद को सुधारने की सारी सम्‍भावनाऍं ताक पर रख कर अपने सामनेवाले तमाम लोगों को पापी साबित कर दिया जाए।

मैं बहुंत ही निराश और उदास  हुआ हूँ आपका यह आलेख पढकर। मुझे वह राजनीति तनिक भी नहीं सुहाती जिसमें मनुष्‍यता न हो, ईश्‍वर का भय न हो।

मेरी इन भावनाओं का उपयोग आप अपनी इच्‍छानुसार करने के  लिए स्‍वतन्‍त्र और अधिकृत हैं।





शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

NaMo : कितना दम, कितनी हवा?...खुशदीप

"कुछ कॉरपोरेट्स नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए उछालने में लगे हैं...जो भी ऐसा कर रहे हैं, वो आग से खेल रहे हैं...प्रधानमंत्री की खोज़ ऐसे की जा रही है जैसे कि न्यूक्लियर बम के लिए रिसर्च की जा रही है..."

ये बयान किसी कांग्रेसी नेता का नहीं बल्कि बीजेपी की एनडीए में सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी जेडीयू के अध्यक्ष शरद यादव का है...क्या शरद यादव की बात में दम है? प्रधानमंत्री के लिए नरेंद्र मोदी की दावेदारी का शोर? अशोक सिंघल और प्रवीण तोगड़िया की पुराने तेवरों में वापसी? या फिर महाकुंभ के संगम में सियासी डुबकियां...और इन सब घटनाओं का मीडिया  में हाइप...क्या ये सब अनायास है?



मोदी को किस मौके पर किस की पगड़ी पहननी है और किस मौके पर किसकी टोपी नहीं पहननी है, बाखूबी आता है...मोदी हर जगह यही दिखाना चाहते है कि गुजरात में जो भी विकास हुआ है, वो उनके दम पर ही हुआ है...मोदी से पूछा जाना चाहिए कि क्या मोदी के आने से पहले गुजराती उद्यमी नहीं थे...क्या मोदी से पहले दुनिया भर के देशों में जाकर गुजरातियों ने अपनी मेहनत से नाम नहीं कमाया...

दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कामर्स में दो दिन पहले मोदी के दिए गए भाषण की  बड़ी चर्चा है...हर कोई अपने हिसाब से मोदी के बोले शब्दों का आकलन कर रहा है...मोदी ने इस मौके पर  एक बात कही कि कोई गिलास आधा भरा बताता है...कोई आधा खाली बताता है...लेकिन मैं तीसरी सोच का आदमी हूं...मैं गिलास को पूरा भरा बताता हूं...आधा पानी से, आधा हवा से....

वाकई मोदी ने ये सच कहा...गुजरात के जिस विकास मॉडल का मोदी हर दम जाप जपते हैं, उसकी असलियत भी यही है...'वाइब्रेंट गुजरात' के ज़रिए हर दो साल में मोदी गुजरात में निवेश के नाम पर देश-विदेश के उद्यमियों का अखाड़ा जोड़ते हैं...इस साल भी 11-12 जनवरी को ये आयोजन हुआ...हर बार 'वाइब्रेंट गुजरात' में राज्य में खरबों रुपये का नया निवेश होता दिखाया जाता है...

आइए अब देखते हैं कि 2009 और 2011 में हुए वाइब्रेंट गुजरात का सच...ये सच और कोई नहीं देश का प्रीमियर और इंडिपेंडेंट इकोनॉमिक रिसर्च थिंक टैंक  CMIE (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमिक्स) सामने लाया है...इस सेंटर ने 2009 और 2011 में हुए 'वाइब्रेंट गुजरात' के निवेश के आंकड़ों की पड़ताल की है..

जनवरी 2009 के वाइब्रेंट गुजरात में राज्य सरकार की ओर से दावा किया गया कि 120 खरब रुपये के निवेश के 3574 सहमति-पत्रों (MoU) पर दस्तखत किए गए...लेकिन CMIE के हाथ इनमें से 3947 अरब रुपये के 220 समझौतों की ही जानकारी लग सकी...इन 220 में से 1649 अरब रुपये के 36 प्रोजेक्ट्स पर कोई प्रगति नहीं हुई...465 अरब रुपये के  33 प्रोजेक्ट खटाई में चले गए...1076 अरब रुपये के 31 प्रोजेक्टस की प्रगति के बारे में कोई सूचना उपलब्ध नहीं हुई...217 अरब रुपये के 63 प्रोजेक्ट ही पूरे हुए...इसके अलावा 540 अरब रुपये के 54 प्रोजेक्ट Under-Implementation हैं....

इसी तरह वाइब्रेंट गुजरात 2011 में राज्य सरकार की ओर से 200 खरब रुपये के 8380 सहमति-पत्रों पर दस्तखत का दावा किया गया...लेकिन CMIE अपनी पड़ताल में 1883 अरब रुपये के 175 प्रोजेक्ट्स की ही पहचान कर सका...इनमें से 1514 अरब रुपये के 87 प्रोजेक्ट्स प्रस्ताव से आगे नहीं बढ़ पाए...52 अरब रुपय के 19 प्रोजेक्ट खटाई में चले गए...डेढ़ अरब रुपये के दो प्रोजेक्ट शुरू होकर बंद हो गए...119 अरब रुपये के 11 प्रोजेक्ट्स की प्रगति के बारे में कोई सूचना उपलब्ध नहीं है..वाइब्रेंट गुजरात 2011 के 15 अरब रुपये के सिर्फ 13 प्रोजेक्ट ही पूरे हो सके...इनके अलावा 181 अरब रुपये के 43 प्रोजेक्ट अमल की दिशा में है...CMIE की पड़ताल का निष्कर्ष है कि वाइब्रेंट गुजरात 2009 का कन्वर्जन रेट 3.2 फीसदी और 2011 का सिर्फ 0.5 फीसदी ही रहा...

यानी नरेंद्र मोदी ने SRCC में सही ही कहा....वो गिलास में पानी कितना भी थोड़ा क्यों ना हो, उसे भरा हुआ देखना-दिखाना चाहते हैं...अब चाहे उसमें आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ा कर पीआर मशीनरी से हवा कितनी भी क्यों ना भरनी पड़े...तो क्या यही है विकास के मोदी मॉडल का सच...थोड़ा सब्सटेंस, ज़्यादा से ज़्यादा हाइप...

मोदी विकास में गुजरात के देश में सबसे आगे होने की दुहाई देते नहीं थकते...अब इसका भी सच जान लीजिए...2006-07 से 2010-11 के दौरान देश के राज्यों के आर्थिक विकास दर की बात की जाए तो गुजरात 9.3 फीसदी की दर से पहले पर नहीं छठे स्थान पर है...इस मामले में 10.9 फीसदी की दर से नीतीश कुमार का बिहार देश में अव्वल है...दूसरे स्थान पर छत्तीसगढ़ (10), तीसरे पर हरियाणा (9.7), चौथे पर महाराष्ट्र (9.6) और पांचवें पर उड़ीसा (9.4) है...

अब आते हैं गुजरात के दूध पर...मोदी ने SRCC में उपस्थित  छात्रों से कहा कि यहां ऐसा कोई नहीं जो चाय में गुजरात का दूध ना पीता हो...उनका कहने का अंदाज़ ऐसा ही था कि ये करिश्मा भी जैसे दुग्ध क्रांति के पुरोधा वर्गीज़ कुरियन का नहीं बल्कि उनका खुद का हो....चलिए दूध के मामले में भी राज्यों का लेखा-जोखा खंगाल लिया जाए...

जहां तक हर व्यक्ति को हर दिन दूध की उपलब्धता की बात है तो ज़रा 2010-11 वर्ष के राज्यवार आंकड़ों की इस फेहरिस्त पर गौर कीजिए...

1. पंजाब - 937  (gms/day)
2. हरियाणा - 679  (gms/day)
3. राजस्थान- 538  (gms/day)
4. हिमाचल प्रदेश-    446  (gms/day)
5. गुजरात -     435  (gms/day)

अब दूध उत्पादन के मामले में 2010-11 वर्ष में राज्यों का प्रदर्शन देखा जाए...

1. उत्तर प्रदेश - 21031000 टन
2. राजस्थान -12330000 टन
3. आन्ध्र प्रदेश- 10429000 टन
4. पंजाब-   9389000 टन
5. गुजरात -8844000 टन

यानी विकास हो या दूध, मोदी के गुजरात से कई दूसरे राज्य कहीं ज़्यादा अच्छा प्रदर्शन करके दिखा रहे हैं...लेकिन इन राज्यों के मुख्यमंत्री मोदी की पीआर मशीनरी की तरह हवा भरने का कौशल नहीं दिखा पा रहे हैं...

मोदी 11 साल 4 महीने से गुजरात की सत्ता पर काबिज़ हैं...अब दिल्ली की गद्दी का लड्डू उनके दिल में फूटने लगा है...ब्रैंड गुजरात का नाम लेकर वो अब 2014 चुनाव के लिए ब्रैंड इंडिया का सपना बेचना चाहते हैं...खुद को विज़नरी बता कर वो दिखाना चाहते है कि उनके दिल्ली की गद्दी संभालते ही देश की सारी समस्याएं खुद-ब-खुद खत्म हो जाएंगी...इंडिया बस शाइनिंग शाइनिंग हो जाएगा...

तो मोदी साहब आप एक दशक से ज़्यादा से भी गुजरात पर राज कर रहे हैं...क्या वहां सब कुछ सुधर गया है...क्या भ्रष्टाचार वहां खत्म हो गया है...क्या अहमदाबाद में ट्रैफ़िक पुलिसवाले ट्रक वालों से रिश्वत लेते नहीं देखे जाते...

आपने SRCC में न्यू एज पावर पर बहुत ज़ोर दिया....देश की 65 फीसदी युवा आबादी (35 साल से कम) को देश की ताकत बताते हुए कहा कि भारत अब स्नेक-चार्मर्स का नहीं माउस-चार्मर्स का देश बन गया है...कहा- देश के युवा माउस के ज़रिए दुनिया को उंगलियों पर डुलाते हैं...यानी कम्प्यूटर, सॉफ्टवेयर के मामले में देश दुनिया में ताकत बन गया है...तो मोदी साहब अस्सी के दशक में देश में कंप्यूटर-क्रांति का पहली बार सपना देखने वाला और इसे मिशन बनाने वाला शख्स कौन था, ज़रा उसका भी नाम सुनने वालों को बता देते...