बुधवार, 30 जनवरी 2013

दिलीप, शाहरुख़ और हम सारे वेल्ले...खुशदीप


इतिहास खुद को दोहराता है...पहले दिलीप कुमार और अब शाहरूख़ ख़ान...आता हूं इस बात पर लेकिन पहले एक और आइना देख लिया जाए...



वाकई हमने साबित कर दिया है कि हमसे ज़्यादा दुनिया में कोई और वेल्ला नहीं है... सरहद पार के रहमान मलिक जैसे जोकर और हाफ़िज सईद जैसे खुराफ़ाती दो जुमले क्या बोल देते हैं, कि हम सब धूल में लठ्ठ चलाने लगते हैं...अपने ही घर के, जी हां अपने ही घर के शाहरुख़ ख़ान पर इतना दबाव बना देते हैं कि उसे अपनी सफ़ाई में प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी पड़ती है...वही शाहरुख़ ख़ान जिसने अपने दम पर बॉलीवुड में मकाम बनाया है...पहली बात तो शाहरुख़ के जिस कथित बयान को लेकर इतनी हायतौबा हुई, उसे किसी ने ठीक से समझने की कोशिश नहीं की...बस आतंकी सरगना हाफ़िज सईद के शाहरुख़ को भारत छोड़कर पाकिस्तान आऩे के न्यौते को पकड़ लिया...पाकिस्तान के आंतरिक मामलों के मंत्री रहमान मलिक ने भारत सरकार को शाहरुख़ की सुरक्षा मज़बूत करने की 'बिन मांगी सलाह' देकर और पेट्रोल छिड़क दिया...बस फिर क्या था, देश के सभी ज़रूरी मुद्दों को भूल कर हम लग गये इस गैर ज़रूरी मूर्खता पर ज्ञान झाड़ने...

शाहरुख़ ने भी अपने बयान को लेकर विवाद को ‘बकवास’ बताया है...साथ ही कहा है कि उनके लिखे आर्टिकल ‘बिइंग ए ख़ान’ को गलत ढंग से पेश किया गया है...शाहरुख़ ने कहा क्या, पहले उसे पढ़ लिया जाए...

“मैं उन सभी को बताना चाहता हूं, जो मुझे बिना मांगे सलाह दे रहे हैं, कि हम भारत में पूरी तरह सुरक्षित हैं और खुश हैं...हमारी ज़िंदगी का लोकतांत्रिक, मुक्त और धर्मनिरपेक्ष तरीका अद्भुत है...मैं सभी से कहना चाहूंगा कि पहले उस आर्टिकल को पढ़ें...मैं तो इस विवाद का आधार ही नहीं समझ सकता..विडंबना है कि, जो आर्टिकल मैंने लिखा है, जी हां मैंने लिखा है, उसमें मैं इसी बात को दोहराना चाहता था कि हठी और संकीर्ण मानसिकता के लोग कुछ मौकों पर मेरे भारतीय मुस्लिम फिल्म स्टार होने का दुरुपयोग करते हैं, जो कि धार्मिक विचारधाराओं को अपने बहुत छोटे-छोटे हितों के लिए गलत ढंग से भुनाने की कोशिश करते हैं...

आउटलुक टर्निंग पाइन्ट में शाहरुख़ ने अपने आर्टिकल में लिखा है..."मैं कभी-कभी ऐसे राजनीतिक नेताओं का बेख़बर लक्ष्य बन जाता हूं...जो मुझे उस सभी का प्रतीक चुन लेते हैं जैसा कि वो भारत में मुस्लिमों के बारे में गलत और (अ)देशप्रेमी  होने की धारणा रखते हैं..कुछ ऐसे मौके भी आए, जब मुझे अपने देश की जगह पड़ोसी देश से ज़्यादा निष्ठा रखने का आरोपी ठहराया गया...ये इसके बावजूद किया गया कि मैं भारतीय हूं, जिसके पिता ने देश की आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी थी...ऐसी रैली की गईं जिसमें मुझे नेताओं ने देश छोड़ने और उस जगह लौटने के लिए कहा जिसे वो मेरी मूल मातृभूमि बताते हैं”...

 शाहरुख़ ने आर्टिकल में जो भी लिखा, वो उन्होंने शायद शिवसेना-एमएनएस से पूर्व में हुए कटु अनुभव के आधार पर लिखा...याद कीजिए शाहरुख़ का 2010 में आईपीएल में पाकिस्तानी क्रिकेटरों को लेकर दिया बयान...उस वक्त आईपीएल के दौरान बोली से पाकिस्तानी क्रिकेटरों को अलग कर दिया गया था...शाहरूख ने उस वक्त कहा था कि आईपीएल में पाकिस्तान के क्रिकेटरों को खिलाया जाना चाहिए था...लेकिन शाहरुख़ के इस बयान के बाद शिवसेना का पारा चढ़ गया था...यहां तक कि पार्टी नेताओं ने शाहरूख़ से पाकिस्तान जाकर बस जाने की ही बात कह डाली थी...उनके घर के बाहर प्रदर्शन हुए....शिवसैनिकों ने इसी बयान को लेकर महाराष्ट्र में शाहरुख़ की फिल्म माई नेम इज़ ख़ान का विरोध भी किया था...लेकिन उस वक्त भी शाहरुख़ ने कहा था कि उन्होंने गलत कुछ नहीं कहा था और वो इसके लिए किसी से माफ़ी नहीं मांगेंगे... 

अब याद कीजिए आईपीएल मैच के दौरान वो घटना जिसमें बच्चों को वानखेडे स्टेडियम में जाने से रोकने पर शाहरुख़ आपा खो बैठे थे और एक गार्ड से दुर्व्यवहार कर बैठे थे...उस मामले में राज ठाकरे की एमएनएस ने मराठी अस्मिता का छौंक लगाते हुए कहा था कि जो गार्ड शाहरुख को रोक रहा था वह मराठी में अपनी बात कह रहा था और शाहरुख मराठी नहीं जानने की वजह से उसकी बात समझ नहीं पाये...एमएनएस ने उन्‍हें मराठी सीखने की सलाह भी दे डाली थी...ज़ाहिर है ये सभी बातें शाहरुख़ के ज़ेहन में थी, जिन्हें आउटलुक टर्निंग पाइंट के आर्टिकल में अभिव्यक्ति मिल गई...

ख़ैर शाहरुख़ तो शाहरुख़, अभिनय सम्राट दिलीप कुमार को भी 17 साल पहले ऐसे ही दौर से गुज़रना पड़ा था... पाकिस्तान ने उन्हें 1996 में अपने सर्वोच्च नागरिक अलंकरण निशान-ए-इम्तियाज़ से नवाज़ा था...लेकिन उसकी गूंज तीन साल बाद भारत में सुनी गई..1999 में कारगिल में पाकिस्तान के दुस्साहस के बाद दोनों देशों में तनाव चरम पर था...तब शिवसेना ने दिलीप कुमार पर ये सम्मान पाकिस्तान को लौटाने के लिए जबरदस्त दबाव बनाते हुए विरोध प्रदर्शन किए थे...1999 में दिलीप कुमार ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मुलाकात के बाद निशान-ए-इम्तियाज़ को पाकिस्तान को ना लौटाने का फ़ैसला किया था...उस वक्त वाजपेयी ने भी कहा था कि दिलीप कुमार की देशभक्ति और धर्मनिरपेक्षता पर कोई सवाल नहीं उठा सकता...और सम्मान को रखना या ना रखना ये उनका व्यक्तिगत मामला है और ये उन पर ही छोड़ देना चाहिए. 

तो क्या इतिहास ने फिर खुद को दोहराया है...शाहरुख़ ख़ान को भी दिलीप कुमार की तरह लोकप्रियता की कीमत चुकानी पड़ रही है...यहां ये भी सोचना चाहिए कि क्यों कला, संगीत, खेल जैसे क्षेत्रों और इससे जुड़ी हस्तियों को भी हम खास विचारधाराओं का बंधक बना कर रखना चाहते हैं...क्यों हाफ़िज सईद जैसे सिरफिरे के दो लफ्ज़ ही हमारे लिए इतने अहम हो जाते हैं कि हम अपने ही घर के शाहरुख़ को सवालों के कटघरे में खड़ा कर देते हैं... 

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

ये हमसे नहीं होगा...खुशदीप

ये हमसे नहीं होगा...बिल्कुल नहीं होगा...हमने किया और ग़लत हो गया तो क्या होगा...लोग क्या कहेंगे...ये सवाल हम कभी न कभी अपने आप से करते ही रहते हैंकिसी बड़ी चुनौती को मानने से पहले ही हम हाथ पीछे खींच लेते हैं...सिर्फ इस आशंका में कहीं उलटा-सीधा हो गया तो...

तो फिर हम क्या करते हैं...यही सोचते हैं कि ऐसे किसी फट्टे में हाथ डाला ही ना जाए...यानि कुछ नया करने के लिए खुद को आज़माने से पहले ही हार मान ली जाए...ये सोच ही हमें साधारण से ऊपर उठने नहीं देती...हाथ-पैर सब सलामत होते हुए भी साहस ना दिखाना, असफल होने के डर से ग्रस्त रहना...यानि हम वो मैटीरियल ही नहीं है जो हमें असाधारण बना सके...

ये पढ़ लिया....अब नीचे वाले लिंक पर ये वीडियो देखिए...शायद नज़रिया बदल जाए...


अब बताइए अपाहिज़ कौन है....ये बंदा या अपने ही दायरे में सीमित रहने वाले हट्टे-कट्टे हम....


मंगलवार, 22 जनवरी 2013

तुझको चलना होगा, तुझको चलना होगा...खुशदीप

दूध के कलेक्शन सेंटर में एक मोटा और एक छोटा चूहा धमा-चौकड़ी मचा रहे थे...इसी उछल-कूद के दौरान दोनों ताजा दूध के एक टब में जा गिरे...दोनों बाहर निकलने की कोशिश में घंटो तैरते रहे...लेकिन टब की सीधी और फिसलने वाली दीवारें उनकी दुश्मन बनी हुई थीं...मौत निश्चित दिखने लगी...



तैरते-तैरते मोटे चूहे की हिम्मत जवाब दे गई...बचने की कोई उम्मीद ना देखकर वो  बुदबुदाया..."जो निश्चित है, उसके ख़िलाफ़ लड़ना बेकार है...मैं तैरना छोड़ रहा हूं"...ये सुनकर छोटा चूहा ज़ोर से बोला..."तैरते रहो...तैरते रहो"...छोटा चूहा अब भी टब के गोल चक्कर काटता जा रहा था...ये देखकर मोटा चूहा थोड़ी देर और तैरा और फिर रुक कर बोला..."छोटे भाई, कोई फ़ायदा नहीं...बहुत हो चुका...हमें अब मौत को गले लगा लेना चाहिए"...

अब बस छोटा चूहा ही तैर रहा था...वो अपने से बोला..."कोशिश छोड़ना तो निश्चित मौत है...मैं तैरता रहूंगा"...दो घंटे और बीत गए...आखिर छोटा चूहा भी थक कर चूर हो चुका था...पैर उठाना भी चाह रहा था तो उठ नहीं रहे थे...ऐसे जैसे कि उन्हें लकवा मार गया हो...लेकिन फिर उसके ज़ेहन में मोटे चूहे का हश्र कौंधा...उसने फिर पूरी ताकत के साथ आगे बढ़ना शुरू किया..कुछ देर और उसके तैरने से दूध में लहरें उठती रहीं...फ़िर एक वक्त ऐसा भी आया कि छोटा चूहा भी निढाल हो गया...उसे लगा कि अब वो डूबने वाला है...लेकिन ये क्या उसे अपने पैरों के नीचे कुछ ठोस महसूस हुआ...ये ठोस और कुछ नहीं बल्कि मक्खन का एक बड़ा टुकड़ा था...वही मक्खन, जो चूहे के तैरते-तैरते दूध के मंथन से बना था...थोड़ी देर बाद छोटा चूहा आज़ादी की छलांग लगा कर दूध के टब से बाहर था....

जागो, उठो और लक्ष्य पूरा होने तक मत रुको....स्वामी विवेकानंद 

प्रचलित अंग्रेज़ी बोधकथा  का अनुवाद पढ़ लिया अब ये मेरा सबसे ज़्यादा पसंदीदा गीत भी सुन लीजिए...



सोमवार, 21 जनवरी 2013

राहुल-सोनिया! आप क्यों रोए-रुलाए...खुशदीप


जो हमने दास्तां अपनी सुनाई, तो आप क्यूं रोए?

गाना पुराना है...लेकिन जयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर में इतवार को जो कुछ हुआ, उस पर सटीक बैठता है...राहुल जयपुर में जज़्बाती होकर बोले...कांग्रेस उपाध्यक्ष बनने के बाद राहुल के भाषण के दौरान और बाद में भावनाओं का उफ़ान आ गया...सोनिया की आंखें तो छलछलाईं सो छलछलाईं, मौजूद कांग्रेसी नेता भी आंसुओं की झड़ी को नहीं रोक सके...
जनार्दन द्विवेदी माइक पर ही फूट-फूट कर रो पड़े....

देश ने राहुल के भावुक होकर मां सोनिया के गले मिलते देखा...राहुल जो भी बोले उनके मुताबिक सीधे दिल से बोले...राहुल ने कहा कि सुबह 4 बजे उठकर उन्होंने तय किया था कि क्या बोलना है...राहुल ने ये भी कहा कि उनकी मां शनिवार रात को उनके पास आईं और रोने लगी...राहुल के अनुसार सोनिया इसलिए रोईं क्योंकि वो जानती हैं सत्ता ज़हर है...राहुल ने पिता के बलिदान को भी याद किया, दादी के बलिदान को भी...

ज़ाहिर है, प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए तैयार होते राहुल में कांग्रेसियों को राजीव गांधी का अक्स दिखा, इसलिए सभी भावनाओं में बहते दिखे...कांग्रेस के चिंतन शिविर में उसी सच पर औपचारिक मुहर लगी, जो पहले से ही सार्वभौमिक सच था...राहुल कांग्रेस में अब घोषित तौर पर नंबर दो के नेता हो गए हैं...राहुल उपाध्यक्ष बनने के बाद पार्टी में ऐसा कौन सा मंत्र फूंकेंगे कि 2014 लोकसभा चुनाव में भी यूपीए की कामयाबी की हैट्रिक का रास्ता साफ़ हो जाए? इस सवाल का सीधा जवाब शायद कांग्रेसियों के पास भी नहीं है...

लेकिन मैं ये पोस्ट इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए नहीं लिख रहा...इस सवाल का जवाब तो 15 महीने बाद सामने आ ही जाएगा...मेरे लिए आश्चर्यजनक था जयपुर में नेहरू-गांधी परिवार की एक परंपरा को टूटते देखना...इसके लिए आपको मैं मार्च 1980 में ले चलता हूं...संजय गांधी की दिल्ली में विमान दुर्घटना में मौत हुई थी...शांतिवन में संजय के अंतिम संस्कार के वक्त राजीव गांधी ने मुखाग्नि दी...उस वक्त गांधी-परिवार से जुड़ी एक वृद्ध महिला ने ज़ोर-ज़ोर से सुबकना शुरू कर दिया...ये देख वहीं पास बैठीं इंदिरा गांधी ने आंखों से काला चश्मा उतारा और उस महिला पर तीखी नज़र डाली...इंदिरा गांधी का संदेश साफ़ था...हम नेहरू-गांधी लोगों के बीच में नहीं रोते...ज़ाहिर है वो महिला फौरन चुप हो गई...

शक्ति-स्थल

इंदिरा के समाधि-स्थल पर मौजूद चट्टान भी प्रतीक है, उनकी मज़बूती का....इंदिरा ने निजी तौर पर भी कोई दुख सामने आया तो सार्वजनिक तौर पर अपनी भावनाओं पर हमेशा क़ाबू रखा...लेकिन जयपुर में 2014 के चुनावी रण के लिए तैयार होती कांग्रेस के सेनापति राहुल के भाषण में आंसुओं का खूब ज़िक्र किया गया...मां सोनिया के आंसुओं का हवाला दिया गया...दादी इंदिरा के बलिदान पर पिता राजीव की आंखों में पहली बार आंसू देखने का ज़िक्र किया गया...मैं नहीं जानता कि इस स्क्रिप्ट का राइटर कौन था....राहुल खुद या पर्दे के पीछे का कोई और किरदार...लेकिन ये स्क्रिप्ट वैसी ही थी जैसे कि कभी हिंदी सिनेमा मेलोड्रामा में दर्शकों को जज्बाती बनाने के लिए लिखी जाती थीं...

इंदिरा गांधी के संदेश ‘’We Gandhi-Nehrus never cry in public’’ से लेकर राहुल गांधी के बयान "My mother came to my room and cried... because she understands that power is poison," तक आते-आते देश में काफ़ी कुछ बदल चुका है...कांग्रेस भी काफ़ी बदल चुकी है...तो क्या भावनाओं के सार्वजनिक प्रदर्शन को लेकर गांधी-नेहरू परिवार का नज़रिया भी बदल चुका है...या पर्दे के पीछे से सलीम-जावेदनुमा किसी स्क्रिप्ट राइटर ने राहुल के मुंह में ये शब्द डाले...तो क्या अगले चुनाव में कांग्रेस का नारा होगा...कांग्रेस का हाथ, जज़्बातों के साथ...

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

क्या हमें बड़े-बड़े बोल बोलने का हक़ है?...खुशदीप


नन्हा मुन्ना राही हूं, देश का सिपाही हूं, बोलो मेरे साथ जय हिंद, जय हिंद....
एक दौर था, जब ‘सन ऑफ इंडिया’ फिल्म का ये गाना हर बच्चे के लबों पर रहता था...ये वो दौर था जब फैंसी ड्रेस कंपीटिशन में कोई बच्चा मिलिट्री ड्रेस पहनता था तो सबसे ज़्यादा तालियां भी उसे ही मिलती थी...ये वो दौर था, जब एनडीए के ज़रिए सेना में अफ़सर के तौर पर करियर युवा पीढ़ी को सबसे आकर्षक नज़र आता था...


अब आइए आज के दौर पर? ये दौर जहां देश के किसी नौनिहाल को ‘नन्हा मुन्ना राही हूं, देश का सिपाही हूं’ गाते नहीं सुना जा सकता...ये दौर यो यो हनी सिंह का है...जहां युवा गाते हैं...मरजाणी पाउंदी भंगड़ा, अंग्रेज़ी बीट ते...ये कसूर किसका है?...इन बच्चों का?...इन बच्चों के मां-बाप का?...या फिर बाइस साल पहले देश में शुरू हुए मनमोहनी आर्थिक सुधारों का?...
आता हूं इस सवाल पर लेकिन पहले इसी संदर्भ में बात कर ली जाए एलओसी पर पाकिस्तान की ताज़ा पाशविक करतूत की...दो भारतीय सैनिकों की निर्मम हत्या और उनमें से एक का सर कलम किए जाने की घटना को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता...लेकिन यहां ये सवाल है कि क्या पाकिस्तान ने ऐसा पहली बार किया...क्या करगिल युद्ध के दौरान कैप्टन सौरभ कालिया के शव के साथ भी पाकिस्तानी सैनिकों ने यही बर्बरता नहीं दिखाई थी? संसद हो या देश की आर्थिक राजधानी, सरहद पार से कहां-कहां नहीं हमले हो चुके?...
एक बार फिर ये सवाल देश की फ़िज़ा में तैर रहा है कि पाकिस्तान को हमेशा-हमेशा के लिए करारा सबक क्यों नहीं सिखाया जाता? देशभक्ति के गीत फिर ज़ोर-शोर से सुनने को मिल रहे हैं? वैसे भी देशभक्ति के ये गीत हमें या तो 15 अगस्त या 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय दिवसों पर सुनने को मिलते हैं या फिर मातृभूमि के लिए शहादत देने वाले किसी रणबांकुरे को अंतिम विदाई देते वक्त?
आज युद्ध जैसा उन्माद है...ख़ून खौला देने वाली बहसें छिड़ी हुई हैं...ज़ाहिर है इस गुस्से का सियासतदानों और सेना पर भी दबाव है...प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कह रहे हैं- इस बर्बर घटना के बाद पाकिस्तान के साथ रिश्ते पहले जैसे नहीं रह सकते...थलसेनाध्यक्ष जनरल बिक्रम सिंह की ललकार है कि समय और स्थान चुन कर जवाब देंगे...विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज गरज रही हैं- वो एक सर लेके गये हैं, हम दस लेके आएंगे...
सोशल मीडिया के इस दौर में आज हर कोई अपने तरीके से बता रहा है कि पाकिस्तान को कैसे सबक सिखाना चाहिए...सवाल दाग़े जा रहे हैं कि आख़िर कब तक चुप बैठे रहेंगे?...हर कोई खुद को सबसे बड़ा राष्ट्रभक्त साबित करना चाहता है...फेसबुक पर कुछ लाइकस और कमेंट आ गये तो मानो देश के लिए सारा कर्तव्य पूरा हो गया...शहीद का कुछ दिन सुर्खियों में नाम और फिर सब लग जाते हैं अपने-अपने काम में...आज हम जो इतनी बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं, ज़रा अब दिल में झांक कर भी देख ले...जहां तक देश के लिए बलिदान की बात है तो हम भगत सिंह तो चाहते हैं, लेकिन पडोसी के घर...
आज कितने मां-बाप है जो बच्चों को सेना में भेजना चाहते हैं...क्या ये सच नहीं कि आज हमारी सेना के तीनों अंगों को अफ़सरों की कमी से जूझना पड़ रहा है? दिल पर हाथ रख कर कहिए, क्या हम अपने बच्चों को ऐसे प्रोफेशनल कोर्सेज़ से ट्रेंड नहीं करना चाहते कि वो करियर की शुरुआत में ही बड़े से बड़ा सेलरी पैकेज बटोर सकें? अगर ऐसा है तो फिर हमें देश के लिए युद्ध जैसे बड़े-बड़े बोल बोलने का कोई अधिकार रह जाता है क्या ?

रविवार, 13 जनवरी 2013

निदा फ़ाज़ली के पलड़े पर अमिताभ-कसाब...खुशदीप

आंध्र प्रदेश विधानसभा में एआईएमआईएम विधायक दल के नेता अक़बरुद्दीन ओवैसी ने 24 दिसंबर 2012 को  निर्मल, आदिलाबाद में जो कुछ भी कहा, उसकी वजह से 14 दिन की न्यायिक हिरासत में है...अक़बर ने क्या-क्या कहा, इस पर मैं  जाना नहीं चाहता...लेकिन जाने-माने शायर और फिल्म गीतकार निदा फ़ाजली ने एक साहित्यिक पत्रिका को चिट्ठी  में जो लिखा है, उसने मुझे ये लेख लिखने पर मजबूर कर दिया...निदा फ़ाज़ली ने मुंबई हमले के गुनाहग़ार मोहम्मद अज़मल आमिर कसाब और बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता अमिताभ बच्चन की बिल्कुल अलग-अलग संदर्भ में तुलना की  है...उन्होंने दोनों को किसी और का बनाया हुआ खिलौना बताया है...



अक़बरुद्दीन ओवैसी ने निर्मल में तहरीर के दौरान कसाब और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का एक सांस में ज़िक्र किया था...दोनों को निर्दोष लोगों के क़त्ले-आम का गुनहग़ार बताया था...पूछा था कि कसाब को फांसी दे दी गई, मोदी को कब सज़ा मिलेगी? अक़बरुद्दीन ओवैसी का ये कहने का क्या मकसद था, वही जानें...लेकिन निदा फ़ाज़ली जैसे अज़ीम शायर को अमिताभ और कसाब को एक पलड़े में रखने की ज़रूरत क्यों पड़ी? ये चौंकाने वाला है...निदा फ़ाज़ली अकबरुद्दीन ओवैसी की तरह सियासत से नहीं जु़ड़े हैं...निदा फ़ाज़ली ने अपनी शायरी से देश-विदेश में लोगों के दिलों में मकाम बनाया है...


निदा फ़ाज़ली वहीं है, जिनकी क़लम से निकला है-

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो, यूँ कर लें,
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए...

इसी शेर पर निदा फ़ाज़ली का पाकिस्तान के दौरे पर एक मुशायरे के बाद कट्टरपंथी मुल्लाओं ने घेराव कर ऐतराज़ जताया था...उन्होंने निदा फ़ाज़ली से पूछा था कि क्या वो किसी बच्चे को अल्लाह से बड़ा समझते हैं? निदा ने जवाब दिया कि मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि मस्जिद इंसान के हाथ बनाते हैं जबकि बच्चे को अल्लाह अपने हाथों से बनाता है...

अब आते हैं, क्या कहा निदा फ़ाज़ली ने अमिताभ और कसाब के बारे में...साहित्यिक पत्रिका को लिखी चिट्ठी में उन्होंने लिखा, 'एंग्री यंगमैन को 70 के दशक तक ही कैसे सीमित किया जा सकता है...मुझे लगता है कि 70 के दशक से अधिक गुस्सा तो आज की जरूरत है और फिर अमिताभ को एंग्री यंगमैन की उपाधि से क्यों नवाज़ा गया? वह तो केवल अजमल आमिर कसाब की तरह बना हुआ खिलौना हैं...एक को हाफिज सईद ने बनाया था, दूसरे को सलीम जावेद की कलम ने गढ़ा था...खिलौने को फांसी दे दी गई, लेकिन उस खिलौने को बनाने वाले को पाकिस्तान खुलेआम उसकी मौत की नमाज पढऩे के लिए आज़ाद छोड़े हुए है...दूसरे खिलौने की भी प्रशंसा की जा रही है लेकिन खिलौना बनाने वाले को भुला दिया गया...

निदा फ़ाज़ली शायद यही कहना चाहते हैं कि अमिताभ को लोगों ने याद रखा और उन्हें गढ़ने वाले सलीम-जावेद को भुला दिया...ये सकारात्मक संदर्भ में है...वहीं नकारात्मक संदर्भ में निदा फ़ाज़ली का तात्पर्य यही हो सकता है कि कसाब को शैतान के तौर पर हमेशा याद रखा जाएगा लेकिन उसे रिमोट से चलाने वाले हाफ़िज़ सईद को इतिहास शायद भुला देगा...

अमिताभ और कसाब को लेकर निदा फ़ाज़ली के इस बयान पर विवाद छिड़ गया है...कुछ इस तुलना को बिल्कुल ग़ैर-ज़रूरी बता रहे हैं...तो कुछ ऐसे सवाल भी दाग़ने लगे हैं कि अमिताभ को लोगों ने अमिताभ बनाया, इसके बदले उन्होंने देश को क्या दिया? मेरी नज़र में ये बहस बेमानी हैं...अमिताभ एक प्रोफेशनल हैं...अपने सारे असाइनमेंट्स के साथ पूरी ईमानदारी के साथ इंसाफ़ करते हैं...ये कहां लिखा है कि कोई अपनी मेहनत से अथाह पैसा कमाता है, तो उसके लिए ज़रूरी है कि वो चैरिटी के लिए मोटी रकम देता रहे...प्रोफेशनल जो टैक्स देता है, वो भी तो समाज से जुड़ी सरकार की कल्याण योजनाओं पर ही खर्च होता है...

अमिताभ बच्चन के काम के प्रशंसक भी हो सकते है, आलोचक भी...ये बात ठीक है कि अमिताभ के करियर को ऊंचाई देने में  सलीम-जावेद के स्क्रीन पर गढ़े किरदार विजय ने सबसे अहम भूमिका निभाई...लेकिन क्या सिर्फ यही वजह है कि अमिताभ आज अमिताभ हैं...मैं अमिताभ का कभी बड़ा प्रशंसक नहीं रहा...मैं हिंदी सिनेमा मे दिलीप कुमार से बड़ा वकार किसी और का नही मानता...लेकिन इसका ये मतलब भी नहीं कि अमिताभ ने अपनी मेहनत के दम पर जो हासिल किया, उसे निदा फ़ाज़ली एक झटके में सलीम-जावेद का बनाया खिलौना बता कर खारिज़ कर दें...निदा साहब, आप से मेरा सवाल है कि सलीम-जावेद ही सब कुछ थे तो वो अमिताभ से पहले या अमिताभ के बाद किसी और अदाकार को अपनी क़लम से अमिताभ क्यों नहीं बना पाए...सलीम का बेटा सलमान ख़ान आज बॉलीवुड पर राज कर रहा है तो ये भी सलीम की लेखनी का कमाल नहीं, बल्कि खुद सलमान की बरसों की मेहनत का नतीजा है...

ये बात सही है कि सत्तर के दशक के मध्य में इंदिरा-संजय गांधी राज के ख़िलाफ़ जनाक्रोश चरम पर था...ख़ास तौर पर युवाओं का आक्रोश...रियल लाइफ़ में इस नब्ज़ को लोकनायक जयप्रकाश नारायण पकड़ कर देश की राजनीति को नई दिशा दे रहे थे...वहीं रील लाइफ़ में एंग्री यंगमैन विजय के ज़रिए सलीम-जावेद एक के बाद एक हिट फिल्में देकर भुना रहे थे...जो युवा जेपी की हुंकार पर कुछ भी करने को तैयार था...वही युवा बड़े परदे पर अमिताभ को सिस्टम से लड़ते देखकर तालियां पीटता था...

निदा फ़ाज़ली का कहना है कि सत्तर के दशक से ज़्यादा गुस्से की आज़ ज़रूरत है, फिर अमिताभ को एंग्री यंगमैन की उपाधि से क्यो नवाजा गया? पिछले साल जनता के इसी गुस्से की लक़ीर पर अन्ना हज़ारे चलते दिखे थे...लेकिन अन्ना जेपी नहीं बन सके...वो अपने ही लोगों की फूट का शिकार हो गए...आज बड़े परदे पर भी कोई विजय नज़र नहीं आता...शायद यही कसक सलीम के दिल मे भी है...उनका बेटा सलमान आज फिल्मों की कामयाबी की गारंटी ज़रूर बन गया है लेकिन सलीम यही कहते  हैं कि उसका सर्वश्रेष्ठ बाहर नहीं आ सका है...वैसा ही सर्वश्रेष्ठ जैसा कि सलीम ने जावेद के साथ मिलकर अमिताभ के लिए ज़ंजीर, दीवार, शोले और त्रिशूल मे अपनी क़लम से निकाला था...

आख़िर में निदा फ़ाज़ली साहब से यहीं कहना चाहूंगा कि अगर अमिताभ जैसे खिलौने में प्रतिभा नहीं होती तो क्या सलीम-जावेद उन्हें सदी का महानायक बना सकते थे...या सलमान आज सलीम जैसे पिता की क़लम के कमाल के बिना ही बॉलीवुड का दबंग कैसे बन गया...निदा साहब इन खिलौनों के पचड़ों को छोडिए...चलिए आप ही के शेर के मुताबिक किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए...

इसी मुद्दे पर क्या सटीक है कार्टूनिस्ट इरफ़ान भाई की ये अभिव्यक्ति...



शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

'बिटिया है तो कल है'...इरफ़ान संदेश...खुशदीप


5 से 7 जनवरी तक दिल्ली के निर्माण विहार मेट्रो स्टेशन के पास पूर्वा सांस्कृतिक केंद्र (पीएसके) में देश के प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट इरफ़ान की 9वीं एकल कार्टून प्रदर्शनी का आयोजन हुआ...प्रदर्शनी का विषय भी पूरी तरह सामयिक था...'बेटी है तो कल है'...इरफ़ान भाई मेरे अज़ीज़ है...उनका हुक्म था 5 जनवरी को टाइम से पहुंचना है...बड़े भाई के आदेश का ही असर था कि मैं कड़ाके की ठंड में भी टाइम से पहले ही पहुंच गया...मेरे साथ शाहनवाज़ भी थे...पोस्ट के साथ लगी हुई फोटो शाहनवाज़ की ही खींची हुई है...

प्रदर्शनी को संबोधित करते दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री डॉ ए के वालिया

प्रदर्शनी में प्रदर्शित एक-एक कार्टून 'बिटियाओं को बचाने' का संदेश सटीक ढंग से दे रहा था...इरफ़ान भाई के ये कार्टून इस विषय पर जगह-जगह हो रही महा-बहस से कहीं भारी थे...वैसे इरफ़ान भाई ने इस प्रदर्शनी की जब तैयारी शुरू की थी तो उनकी सोच 'कोख़ में कन्याओं को बचाने' का संदेश देने की थी...लेकिन प्रदर्शनी का जब समय आया तो पूरा देश दिल्ली में गैंग-रेप के जघन्य अपराध से उद्वेलित था...यानि हमारे देश में कन्याएं भ्रूण में ही नहीं, बड़े होने पर भी सुरक्षित नहीं है...इरफ़ान भाई ने बड़े प्रभावी ढंग से अपने कार्टूनों में इसे अभिव्यक्ति दी...(मैं इरफ़ान भाई से अनुरोध करूंगा कि वो ब्लॉग जगत को भी प्रदर्शनी के सारे कार्टूनों से एक पोस्ट के ज़रिए रू-ब-रू कराएं)....



इरफ़ान भाई की कार्टून प्रदर्शनी का उद्घाटन दिल्ली के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री डॉ ए के वालिया ने किया...मुख्य अतिथि के नाते उपस्थित जनों को संबोधित करते हुए डॉ वालिया ने लड़कियों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई...साथ ही उन्होंने लड़कियों की शिक्षा पर भी बहुत ज़ोर दिया...डॉ वालिया ने कहा कि जब एक लड़की  पढ़ती है तो उसके ज़रिए पूरा परिवार शिक्षित होता है....डॉ वालिया के संबोधन के बाद इरफ़ान भाई के बोलने की बारी थी...उन्होंने बड़े शालीन और प्रभावी ढंग से डॉ वालिया का प्रतिवाद करते हुए कहा कि आज जो माहौल है, उसमें सही तौर पर लड़कों को शिक्षित करने की ज़रूरत है....सिर्फ स्कूली पढ़ाई ही नहीं नैतिक शिक्षा के मोर्चे पर भी उन्हें बहुत कुछ पढ़ाने की आवश्यकता है...

इरफ़ान भाई की बातों ने इसी विषय पर मुझे पौने तीन साल पहले लिखी अपनी एक पोस्ट की याद दिला दी...इस का विषय आज के माहौल में ज़्यादा प्रासंगिक है...

बच्चे आप से कुछ बोल्ड पूछें, तो क्या जवाब दें...खुशदीप

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

वो बिटिया ! आज के दौर की रानी लक्ष्मीबाई...खुशदीप

बुंदेले हर बोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी...

कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान की ये पंक्तियां आज के हालात में फिर याद आ रही हैं...नारी शक्ति की पहचान वीरांगना रानी झांसी लक्ष्मीबाई ने अपनी महिला सेनापति झलकारी बाई के साथ फिरंगी सेना का मुकाबला करते हुए युद्ध के मैदान में शहीद होना पसंद किया था, लेकिन अंग्रेज़ों की दासता नहीं मंजूर की थी...ये सब आज़ादी से 90 साल पहले हुआ था...आज़ादी के 65 साल बाद एक और वीरांगना शहीद हुई है...23 साल की इस बिटिया ने अपनी अस्मिता बचाने के लिए छह नर-पिशाचो से तब तक संघर्ष किया जब तक उसमें होश रहा...इस बिटिया की शहादत से पूरी दुनिया में आज लोग उद्वेलित हैं...ये बिटिया नारी अस्मिता की सबसे बड़ी पहचान बन गई है...जिस बिटिया को हम जीते-जी सुरक्षा नहीं दे सके, उसे मरने के बाद भी क्यों हमेशा के लिए गुमनामी के साये में रखना चाहते हैं? उसे क्यों आज के युग की रानी लक्ष्मीबाई नहीं माना जा सकता? क्यों नहीं उस माता-पिता को सैल्यूट किया जा सकता, जिन्होंने ऐसी बहादुर बेटी को जन्म दिया?



लड़की की पहचान छुपाने का तर्क तब तक तो समझ आता है, जब तक वो लड़की जीवित थी...अब वो लड़की अमर हो चुकी है...जो नुकसान होना था, हो चुका...दुनिया का बड़े से बड़ा सुरक्षा का तामझाम भी उस लड़की को दोबारा जीवित नहीं कर सकता... ये भरपाई अगर हो सकती है तो सिर्फ इसी बात से कि अब और किसी बिटिया को ऐसे हालात से न गुज़रना पड़े...ये ज़िम्मेदारी जितनी सरकार और पुलिस की है, उतनी ही पूरे समाज की है...वो समाज जो मेरे और आप से बना है...

आज मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री शशि थरूर ने सोशल माइक्रो वेबसाइट ट्विटर पर एक सवाल रखा कि इस बिटिया की पहचान छुपाए रखने से कौन से हित की रक्षा होगी? थरूर ने ये भी कहा कि अगर बिटिया के माता-पिता को ऐतराज़ ना हो तो बलात्कार विरोधी क़ानून का नाम भी उसी के ऊपर रखा जाए...थरूर के इस बयान पर हर तरह की प्रतिक्रिया सामने आई...किसी ने थरूर से सवाल किया कि वो क्यों सम्मान, मूर्ति और मंदिर बनाना चाहते हैं, इसकी जगह आपराधिक न्याय व्यवस्था में वास्तविक बदलाव के लिए क्यों ज़ोर नहीं लगाते...वही देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी ने ट्विटर पर ही बलात्कार विरोधी क़ानून का नाम इस बिटिया के नाम पर करने का समर्थन किया है...किरण बेदी के अनुसार अमेरिका में ऐसा पहले हो चुका है...


जहां तक देश के क़ानून की बात है तो वह यही कहता है कि बलात्कार पीड़ित की पहचान नहीं खोली जा सकती...कहीं भी उसके नाम का उल्लेख नहीं किया जा सकता...ऐसा करना आईपीसी की 228-ए के तहत अपराध है...लेकिन क़ानून की दुहाई देकर हमेशा एक ही लक़ीर को पीटते रहना क्या उचित है...इस बिटिया की शहादत के बाद जो हालात हैं, वो रेयरेस्ट ऑफ रेयर हैं...इसलिए अब फ़ैसले भी रेयरेस्ट ऑफ रेयर ही लेने चाहिए...इस बिटिया के चेहरे की इतनी सशक्त पहचान बन जानी चाहिए कि फिर कोई दुराचारी ऐसा कुछ करने की ज़ुर्रत ना कर सके...उस दुराचारी को फौरन याद आ जाना चाहिए कि देश ने एकजुट होकर कैसा गुस्सा व्यक्त किया था और उसका क्या हश्र होगा...वैसे भी हम समाज की सोच को बदलने की बात करते हैं...बलात्कार पीड़ित या उसके परिवार के लिए हम फिर क्यों इस नज़रिये को नहीं बदल सकते...पहचान छुपाने के तर्क के पीछे क्या यही सोच तो नहीं है कि बलात्कार पीड़ित या उसका परिवार हमेशा नज़रें नीचे रखकर जीने को मजबूर रहे? नज़रें तो उस समाज की नीचे होनी चाहिए जो एक बिटिया को हवस के भेड़ियों से बचा नहीं सका... 

बिटिया की पहचान सार्वजनिक होने पर एक सवाल खड़ा हो सकता है कि उसके परिवार वालों की सुरक्षा को ख़तरा हो सकता है...ये सवाल भी बेमानी है... क्या हमारे देश का सुरक्षा तंत्र सिर्फ वीआईपी महानुभावों की सुरक्षा के लिए है...अगर उन्हें सुरक्षा का अभेद्य कवच देने के लिए X, Y, Z  कैटेगरी के घेरे हो सकते हैं तो इस परिवार के लिए क्यों नहीं...इस परिवार की बिटिया को तो हम बचा नहीं सके, फिर क्यों नहीं अब इस परिवार को ऐसा अभूतपूर्व सम्मान दिया जाता कि हमेशा हमेशा के लिए मिसाल बन जाए...मुझे तो यहां एक शंका भी है कि कहीं इस बिटिया और परिवार की पहचान छुपाए रखने में सरकारी तंत्र का कहीं कोई हित तो नहीं है...आखिर क्या वजह है कि देश के हुक्मरान तो रात के आखिरी पहरे में भी बिटिया का शव पहुंचने पर शोक जताने पहुंच गए....दूसरी और आम लोगों की इकट्ठा होकर श्रद्धांजलि व्यक्त करने पर पहरे लगा दिए गए...कहीं पहचान छुपाने की आड़ में ही बिटिया के परिवार पर कोई दबाव तो नहीं डाला जा रहा...

इस मुद्दे पर सब की अलग-अलग राय हो सकती है लेकिन मेरे लिए तो ये बिटिया आज के दौर की रानी लक्ष्मीबाई ही है...आप क्या कहते हैं?