सोमवार, 25 नवंबर 2013

आरुषि...भोर के आकाश की लालिमा...खुशदीप

आरुषि...सभी को इंतज़ार है अदालत के फैसले का...

11 फरवरी 2011 को आरुषि पर एक पोस्ट लिखी थी...आरुषि, जिसे आप नहीं जानते...

आज उसी को दोहराने का मन कर रहा है...

आरुषि जिसे आप नहीं जानते...खुशदीप

Posted on 
  • Friday, February 11, 2011
  • by 
  • Khushdeep Sehgal
  •  in 
  • Labels: , 
  • आरुषि यानि सूरज के उगने से ठीक पहले आकाश की लालिमा...ऐलान करती अंधेरे के छटने का और उजाले के छाने का...क्या आरुषि के लिए इनसाफ़ की कहानी में भी ऐसा होगा...


    आरुषि तलवार को नज़दीक से कोई जानते थे तो वो नोएडा के डीपीएस स्कूल में उसके क्लासमेट ही थे...आरुषि के चरित्र को लेकर यूपी पुलिस के ज़रिए पहली बार जो कहानी सामने आई थी उसे आरुषि के स्कूल के दोस्तों ने पहले दिन ही नकार दिया था...वो अच्छी तरह जानते थे कि सभी को ज़िंदादिली का संदेश देने वाली उनकी आरुषि कभी ऐसा काम नहीं कर सकती थी जो उसके आत्मसम्मान को कचोटे...यही वजह है कि आरुषि को लेकर जब तरह तरह की बातें फैल रही थीं तो उसके स्कूल के दोस्त एक बगीचे का नाम आरुषि पर रखने की सोच रहे थे...

    आरुषि का सबसे बड़ा शौक था जैज़ डांस...आरुषि कभी भी स्कूल के गलियारों में पैरों के अंगूठों पर 360 डिग्री के एंगल पर स्पिन करती देखी जा सकती थी...दोस्तों को भी बैले का ये स्टेप सिखाना आरुषि को बड़ा अच्छा लगता था...नौंवी क्लास में पढ़ने वाली सबसे पॉपुलर स्टूडेंट्स में से एक आरुषि ब्लेज़र स्कॉलर भी रही यानि तीन साल उसने लगातार पढ़ाई में अस्सी-नब्बे फीसदी से ज़्यादा मार्क्स लिए...वो आरुषि जिसे आम बच्चों की तरह ही टीचर्स और कपड़ों के बारे में गॉसिप करना बड़ा अच्छा लगता था...वो आरुषि जिसे अपने अच्छे-बुरे की पूरी समझ थी...खुशहाल परिवार की आरुषि आम बच्चों की तरह ही कैमरे, आधुनिक मोबाइल और छुट्टियों में बाहर घूमने जाने जैसी फरमाइशें घरवालों से किया करती थी..


    तलवार दंपती ने दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में पांच साल तक चले फर्टिलिटी ट्रीटमेंट के बाद इकलौती संतान के तौर पर आरुषि को पाया था...साउथ दिल्ली में 24 मई 1993 को जन्मी आरुषि की अच्छी तरह परवरिश हो सके, इसीलिए दिल्ली के हौज़खास से नोएडा के जलवायु विहार (सेक्टर 25) में आकर रहने का फैसला किया..इसकी सबसे बड़ी वजह आरुषि की नानी लता वहीं पास में रहती थीं और तलवार दंपती के काम पर रहने के दौरान आरुषि की देखभाल कर सकती थीं...आरुषि को स्कूल के लिए ज़्यादा दूर नहीं जाना पड़े इसलिए डेढ़ किलोमीटर के फासले पर ही दिल्ली पब्लिक स्कूल में उसका एडमिशन कराया गया...

    आरुषि के दुनिया से दूर जाने की असल वजह पर बेशक अभी कुहासा छाया है लेकिन आरुषि के स्कूल के दोस्तों को विश्वास है कि एक न एक दिन ये छटेगा ज़रूर...और उस दिन आरुषि तारा बनकर आसमान में जहां भी होगी अपने दोस्तों को खास स्माइल ज़रूर देगी...पैरों के अंगूठे पर स्पिन करती हुई...
     
     

    2 टिप्‍पणियां:

    1. itane lambey samay baad insaaf to mila lekin arushi ko kya mila?betaji kaise ho soch rahi hoon dobara blog par aaoon dekho kab aati hoon

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    2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि कि चर्चा कल मंगलवार २६/११/१३ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर कि जायेगी आपका वहाँ हार्दिक स्वागत है।मेरे ब्लॉग पर भी आयें ---http://hindikavitayenaapkevichaar.blogspot.in/पीहर से बढ़कर है मेरी ससुराल सखी(गीत

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