गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

'लौंडिया पटाएंगे मिसकॉल से' के मायने...खुशदीप



नैन हम लड़ाएंगे बेबी डॉल से,
हो लौंडिया पटाएंगे मिस कॉल से...

ये  बोल 'दबंग-2' फिल्म के सुपरहिट गाने के हैं.. 'दबंग-2' 21 दिसंबर को रिलीज़ हुई...उससे एक दिन पहले फिल्म के हीरो सलमान ख़ान दिल्ली में इसके प्रमोशन के लिए मौजूद थे...इत्तेफ़ाक से तीन दिन पहले ही दिल्ली में 23 साल की लड़की से जघन्य सामूहिक बलात्कार की वारदात से देश हिला हुआ था...ज़ाहिर है सलमान से भी इस मुद्दे पर सवाल किया गया...इस पर सलमान ने जवाब दिया..."मेरे ख्याल से बलात्कारियों के लिए मौत की ही सजा होनी चाहिए...ऐसी घटनाओं की हमारे समाज में कोई जगह नहीं है....मुझे ऐसी घटनाओं से नफरत है...मेरे लिए ये तृतीय क्षेणी का अपराध है...मेरा मानना है कि बलात्कारी को जेल में मरते दम तक पीटना चाहिए"...

सलमान का जवाब बलात्कार की घटना को लेकर हर आम भारतीय की सोच को ही प्रतिबिम्बित करता है...लेकिन मेरी समझ से यहां सलमान से एक और सवाल करना चाहिए था...ये सवाल होता कि आप फिल्मों में....हो लौंडिया पटाएंगे मिसकॉल से...जैसे जो गाने रखते हैं, उनका समाज पर क्या असर होता है...फिल्म में सलमान पुलिस इंस्पेक्टर के किरदार में हैं और ये गाना गाते दिखते हैं....क्या यही गाने शोहदों को लड़कियों से छेड़छाड़ का ज़रिया नहीं देते...अभी हाल ही में 'मुन्नी बदनाम हुई' और 'शीला की जवानी' गानों का ऐसा असर हुआ था कि उनसे परेशान होकर मुंबई में मुन्नी और शीला नाम की दो सगी बहनों ने अपना नाम ही बदल लिया था...

बॉलीवुड में महेश भट्ट जैसे कई दिग्गज सेंसर बोर्ड को खत्म करने के पक्ष में हैं...अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर ये बड़े पर्दे पर कुछ भी दिखाने की छूट चाहते हैं...महेश भट्ट ने पोर्न स्टार सनी लिओन को जिस्म-2 की नायिका बनाकर पेश किया, तो ज़ाहिर है कि उनकी मंशा सेक्स को व्यावसायिक तौर पर भुनाने की थी...महेश भट्ट की ये चिंता कतई नहीं होगी कि समाज पर इसका असर क्या होगा?...सनी लिओन उनकी फिल्म की नायिका बनने के साथ ही भारत में इंटरनेट पर सबसे ज़्यादा सर्च करने वाली शख्सीयत बन गईं...इंटरनेट के आगमन के बाद अब हर उस चीज़ तक पहुंच सिर्फ एक क्लिक की दूरी पर है, जिसे देखना तो दूर, उस पर बात करना भी भारतीय समाज में वर्जित माना जाता था...इंटरनेट पढ़ाई के लिए आज हर बच्चे की ज़रूरत माना जाता है...लेकिन आप चाह कर भी हर वक्त बच्चे पर पहरा नहीं रख सकते कि वो इंटरनेट पर क्या-क्या देखता है...ऐसे में अगर ये समाचार सामने आते है कि सातवीं कक्षा में  पढ़ने वाले एक लड़के ने, अपने ही विद्यालय की तीसरी कक्षा में पढ रही एक बच्ची से बलात्कार करने की कोशिश की, तो ये ताज्जुब से ज़्यादा सोचने वाली बात है कि ऐसा क्यों हो रहा है...

इंटरनेट की बात छोड़ भी दी जाए तो छोटे शहरों और महानगरों के स्लम्स एरिया के सिंगल स्क्रीन थिएटर्स  में ऐसी सी-ग्रेड फिल्में दिखाई जाती है जिनमें धड़ल्ले से अनसेंसर्ड अश्लील दृश्य दिखाए जाते हैं...इनके वल्गर पोस्टर भी जगह-जगह दीवारों पर चिपके देखे जा सकते हैं...ज़ाहिर है ये प्रशासन और पुलिस की नाक के नीचे ही होता है...अब इन पोस्टर्स से लड़कियों-महिलाओं को कितनी परेशानी होती है, इसकी परवाह कोई करने वाला नहीं है...ऐसी फिल्मों के पोस्टर भी जानबूझकर स्कूलों के पास लगाये जाते हैं...बिना ये सोचे कि इनका हमारे नौनिहालों पर कितना बुरा असर होता होगा....

दिल्ली में जो हुआ वह करने वाले सारे  अभियुक्त समाज के निचले तबके से हैं और आर के पुरम के सेक्टर-3 में बने झुग्गी कलस्टर रविदास कैंप में उनकी रिहाइश थी...ये उसी आर के पुरम के साथ बिल्कुल एक दूसरी ही बनी दुनिया है...जिस आर के पुरम में ज्यादातर सरकारी बाबुओं  ने अपने आशियाने बना रखे हैं...यानि एक तरफ़ सर्वसुविधा संपन्न वर्ग और दूसरी तरफ़ हर तरह की सामाजिक बुराइयों से अभिशप्त ज़िंदगी...गैंग-रेप की वारदात के सभी अभियुक्त कम पढ़े लिखे, नशे और ड्रग्स के आदि हैं...और कोई काम कर नहीं सकते, इसलिए ड्राइविंग का लाइसेंस ले लेते हैं...रिश्वत के दम पर हमारे देश में कोई भी ड्राइविंग लाइसेंस ले सकता है....ऐसे लोगों का रहन-सहन, सामाजिक मर्यादा का मतलब वैसा नहीं है जैसा कि हम कथित सभ्य समाज के लोगों के लिए हैं...शराब के नशे में इनके जैसे कुछ लोगों का जमावड़ा होता है तो ये अपनी कुंठाओं को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं...अमीरों जैसी ज़िंदगी ना जी पाने की हताशा भी इन्हें वहशी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती...छोटा पहनावा दिखने पर भी ये उसे अपने लिए आसान टारगेट मान लेते हैं...



ऐसा नहीं कि सेक्स से जुड़े अपराध या छेड़छाड़ की घटनाएं मध्यम वर्ग या उच्च वर्ग में नहीं होतीं...ये भी किसी से छुपा नहीं कि फॉर्म हाउस की ऊंची ऊंची चाहरदीवारियों के पीछे पार्टियों के नाम पर क्या-क्या नहीं होता...ये पैसों वालों की काली दुनिया होती है...इन पार्टियों में मौज-मस्ती के लिए ऊंचे ओहदेदार भी शामिल रहते हैं...इसलिए पुलिस की आंखों पर भी पट्टी बंधे रहती हैं...नये साल के नाम पर होने वाली पार्टियों में क्या-क्या गुल खिलते हैं, ये भी आसानी से समझा जाता है...यानि आप पैसे वाले हैं तो आप कुछ भी खुराफात कर सकते हैं और उस पर हमेशा के लिए पर्दादारी का भी इंतज़ाम कर सकते हैं...अच्छे और बुरे लोग समाज के हर वर्ग में हैं...समाज की निचली पायदान के बुरे लोग जब अपनी विकृतियों के वश में होकर अपराध पर उतरते हैं तो उसका मेनिफेस्टेशन जघन्य अपराध में सामने आता है....इनके पास कुछ पैसा आता है तो ये अपनी सेक्स कुंठाओं को शांत करने के लिए रेड लाइट एरिया, कॉलगर्ल्स का सहारा लेते हैं...अन्यथा इंसान की शक्ल में ये नर-पिशाच ऐसे हिंसक तरीकों पर भी उतर सकते हैं कि हैवानियत भी शर्मा जाए...जैसा कि दिल्ली की हालिया वारदात में हुआ...लेकिन सवाल ये है कि इऩ अपराधियों के इतने बेखौफ़ होने के लिए ज़िम्मेदार कौन है..क्यों
पुलिस का इनके दिल-ओ-दिमाग़ पर डर नहीं होता...

और इस तरह की मानसिक विकृतियों वाले अपराधियों को क्या हमारी फिल्में, इंटरनेट, सेक्स चैट और मसाज पार्लरों के अखबारों में छपने वाले विज्ञापन बढ़ावा नहीं देते...फिर इन विज्ञापनों के ज़रिए मोटी कमाई करने वाले अख़बारों के ख़िलाफ़ आवाज़ हम क्यों नहीं उठाते...क्यों नहीं अश्लील फिल्में दिखाने वाले या पोस्टर लगाने वाले सिनेमाहॉलों का लाइसेंस हमेशा के लिए रद्द नहीं कर दिया जाता...

इसमें कोई शक-ओ-शुबहा नहीं कि महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध घर में हो या बाहर, दोषियों को सख्त से सख्त सज़ा मिलनी चाहिए...लेकिन बात यही खत्म नहीं हो जाती है...हमें विचार इस बात पर भी करना है कि हमारे समाज का एक हिस्सा गर्त में जा रहा है तो उसके लिए ज़िम्मेदार कौन है...हमें समस्या के सिर्फ एक कोण से नहीं बल्कि समग्र तौर पर निपटने के लिए प्रयास करने चाहिएं...

(इसी संदर्भ में डॉ अजित गुप्ता जी ने बड़ा सारगर्भित लेख लिखा है)

बुधवार, 26 दिसंबर 2012

जनता नहीं अब सरकार डरती है...खुशदीप





दिल्ली में बलात्कार के विरोध में प्रदर्शन के निहितार्थ साफ़ हैं- पहले जनता हुक्मरानों से डरती थी...अब हुक्मरान जनता से डरने लगे हैं...17 दिसंबर की शर्मनाक घटना के बाद दिल्ली के पावरसेंटर माने जाने वाले इलाके में लोगों के स्वतस्फूर्त  प्रदर्शन का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसे सरकार ने पहले दिन से ही समझने में गलती की...और अब भी सरकार भ्रम में ही जी रही है...सरकार इसे सिर्फ़ एक जघन्य सामूहिक बलात्कार से उपजा जनाक्रोश मान रही है...यही सरकार की भूल है... ये देश की उस जनता का गुस्सा है, जो अब समझ गई है कि केंद्र और राज्यों में विभिन्न राजनीतिक दल आज़ादी के बाद 65 साल में उसका सिर्फ पोपट बनाते आए हैं...इन 65 साल में सबसे ज़्यादा राज कांग्रेस ने किया है, इसलिए उसी के ख़िलाफ़ सबसे ज़्यादा आक्रोश फूट रहा है...

कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दलों को अब ये साफ़ समझ लेना चाहिए कि चुनाव जीतने का ये मतलब नहीं होता कि पांच साल तक उन्हें जो चाहे करने का अधिकार मिल गया...जनता अब जाग गई है...अब वो पांच साल का इंतज़ार नहीं करने वाली...वो ऐसे ही सड़कों पर आकर नेताओं के दिलों में अब दहशत पैदा करेगी जैसा कि दिल्ली के मौजूदा प्रकरण में हो रहा है...नेता अगर परफॉर्म नहीं करेंगे तो उन्हें ज़बरन घरों में ही बैठने को मजबूर किया जा सकता है...

अब आते हैं, उस प्रकरण पर जिसने देश की पावर-सीट नॉर्थ ब्लॉक-साउथ ब्लॉक को भी हिला कर रख दिया...सरकार ने इस प्रोटेस्ट मूवमेंट को शनिवार-इतवार की छुट्टी वाले दिन महज़ कुछ लोगों का जमावड़ा समझा...विरोध करने वाले युवा संगठित नेतृत्व के अभाव में दिशाहीन  थे...लेकिन यही दिशाहीनता इस मुहिम की सबसे बड़ी ताकत निकली...बाबा रामदेव, रिटायर्ड जनरल वी के सिंह और केजरीवाल कंपनी ने बिन बुलाए मेहमान की तरह इस मुहिम की कमान संभालनी चाही लेकिन युवा प्रदर्शनकारियों ने उनके सारे मुगालते दूर करने में ज़रा देर नहीं लगाई...


सरकार में बैठे ज़िम्मेदार लोगों को जब तक युवाओं की ताकत का सही तरह से एहसास हुआ, तब तक बहुत देर हो चुकी थी...सोनिया गांधी और राहुल को प्रदर्शनकारियों के बीच आना पड़ा, प्रधानमंत्री को जनता के नाम 'ठीक है' संदेश देना पड़ा, राष्ट्रपति को बयान देना पड़ा...दिल्ली की मुख्यमंत्री पुलिस कमिश्नर पर ठीकरा फोड़ती नज़र आईं, दिल्ली के उपराज्यपाल ना सिर्फ अमेरिका का दौरा छोड़ कर वापस आए बल्कि दिल्ली पुलिस के एसीपी स्तर के दो अधिकारियों के निलंबन का फ़रमान भी लगे हाथ सुना दिया...ये सब कुछ हुआ....लेकिन सरकार या शासन के किसी नुमाइंदे ने ये बात नहीं सोची कि जिस लड़की के साथ छह नर-पिशाचों ने हैवानियत की हद पार कर दी, उसी लड़की के पिता या परिवार के किसी और सदस्य के नाम से प्रदर्शनकारियों से शांति बनाये रखने की अपील ही जारी करवा दी जाती....

बात जब हाथ से बाहर आ गई तो सरकार हड़बड़ी में फ़ैसले करती नज़र आई...सवाल यहां ये है कि सरकार के इस बार जैसे हाथ-पांव फूले, क्या पहले भी कभी ऐसा हुआ था? हाल-फिलहाल में अन्ना का आंदोलन हो या केजरीवाल के छापामार प्रदर्शन, बाबा रामदेव की विरोध लीला हो या विपक्ष की हुंकार, हर बार सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी...उलटे दंभ दिखाते हुए उसने हर बार यही संदेश दिया कि वो जो चाहेगी, वो करेगी....लेकिन इस बार पहली बार सरकार डरी दिखी...ज़ाहिर है जनता, खास तौर पर युवाओं की ताकत को सरकार भी समझती है...इस ताकत का डर सिर्फ केंद्र सरकार को ही नहीं बल्कि राज्यों में बैठी हर सरकार के मन में भी होना चाहिए...यानि ऐसे विरोध प्रदर्शनों की हर राज्य, हर ज़िले में दरकार है...

ख़ैर ये तो रही सरकार की बात...लेकिन अब इस सवाल पर भी सोचने की ज़रूरत है कि सामूहिक बलात्कार के इस प्रकरण में क्या एक ही कोण पर ही मंथन करने से सारी समस्या हल हो जाएगी....क्या अकेली सरकार को जनता को सुरक्षा देने मे नाकाम मान लेने से ही हमारे कर्तव्यों और दायित्वों की इतिश्री हो जाएगी...

(अगले लेख में... ये हम ही हैं जो मिसकॉल से लौंडिया पटाएंगे जैसे गाने वाली फिल्म की कमाई के रिकॉर्ड बॉक्स ऑफिस पर बनवा देते हैं...फिर इसी फिल्म के दबंग हीरो को दिल्ली में गैंग-रेप की घटना पर दुख जताते हुए बलात्कारियों के लिए सख्त से सख्त सज़ा की मांग करते हुए भी ध्यान से सुनते हैं...)

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

बलात्कार, विरोध और नगरवधू...खुशदीप


बलात्कार, विरोध और नगरवधू...



नगरवधू !
मेरे मन में बढ़ गया  तेरा सम्मान...

नहीं उठते तेरे लिए कभी झंडे-बैनर,
नहीं सहता कोई पानी की तेज़ बौछार,
नहीं मोमबत्तियों के साथ निकलता मोर्चा, 
नहीं जोड़ता तुझसे कोई अपना अभिमान,

नगरवधू !
मेरे मन में बढ़ गया तेरा सम्मान...

कितने वहशी रोज़ रौंदते तेरी रूह,
देह  तेरी सहती सब कुछ, 
बिना कोई शिकायत, बिना आवाज़,
नहीं आता कभी आक्रोश का उफ़ान,

नगरवधू !
मेरे मन में बढ़ गया तेरा सम्मान,

सोचता हूं अगर तू ना होती तो क्या होता,
कितने दरिन्दे और घूमते सड़कों पर,
आंखों से टपकाते हवस, ढूंढते शिकार,
नगरों को बनाते वासना के श्मशान,

नगरवधू !
मेरे मन में बढ़ गया तेरा सम्मान...

शिव विष पीकर हुए थे नीलकंठ,
क्योंकि देवताओं को मिले अमृत,
तू जिस्म पर झेलती कितने नील,
क्योकि सभ्य समाज का बना रहे मान,

नगरवधू  !
मेरे मन में बढ़ गया तेरा सम्मान...

- खुशदीप



(वीडियो...रवीश की रिपोर्ट से साभार)

गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

1989 से क्या-क्या बदल गया सचिन!...खुशदीप



सचिन तेंदुलकर ने 1989 में पाकिस्तान के दौरे से इंटरनेशनल क्रिकेट करियर की शुरुआत की...तब से अब तक 23 साल में देश में क्या-क्या बदला...
उस वक्त देश में टीवी चैनल के नाम पर सिर्फ दूरदर्शन था...
उस वक्त देश में घरेलू एयरलाइंस के तौर पर सिर्फ इंडियन एयरलाइंस थी...
सचिन के पदार्पण से कुछ महीने पहले ही पेप्सी ने देश में प्रवेश किया था...कोका-कोला की देश में दोबारा एंट्री 1993 में हुई थी...1989 में कॉरबोनेटेड ड्रिंक्स के बाज़ार पर थम्स अप, कैम्पा कोला, गोल्ड स्पॉट, लिमका और सिट्रा छाए हुए थे...
उस वक्त देश में कारों में सिर्फ मारुति, अंबेसडर, प्रीमियर पद्मिनी और स्टेंडर्ड रोवर ही उपलब्ध थीं...
उस वक्त एक डॉलर की कीमत 17 रुपये 50 पैसे थी...

सचिन के टीम इंडिया में शामिल होने से कुछ दिन बाद ही राजीव गांधी को प्रधानमंत्री के पद से हटना पड़ा था और वीपी सिंह की इस पद पर ताजपोशी हुई थी...उस वक्त कांग्रेस और जनता दल के बाद बीजेपी तीसरे नंबर की पार्टी थी...
तब डीवीडी का अविष्कार नहीं हुआ था और सीडी का देश में मिलना दुर्लभ था...
उस साल की सबसे बड़ी बॉलीवुड हिट फिल्म सलमान ख़ान और भाग्यश्री की अभिनीत मैंने प्यार कियाथी
अयातोल्ला खोमेनी ने उसी साल सलमान रश्दी के नॉवल द सेटेनिक वर्सेज़ को लेकर उनकी हत्या के लिए तीस लाख डॉलर का इनाम रखा था...
उस वक्त कलकत्ता मेट्रो का एक ही फेस चालू था...
उस वक्त कोलकाता (2001) का नाम कलकत्ता, मुंबई (1995) का नाम बॉम्बे और चेन्नई (1996) का नाम मद्रास ही था...
उस वक्त भारत में मैक्डॉनल्ड, केएफसी, पिज्ज़ा हट,  डोमिनोज़, कैफ़े कॉफी डे और शॉपर्स स्टॉप का नामो-निशान तक नहीं था...
अगर सचिन के करियर के दौरान चीज़े कैसे बदली हैं, ठीक से जानना है तो देश में पेट्रो उत्पादों की कीमतों में आए बदलाव को जानिए...1 अप्रैल 1989 को पेट्रोल साढ़े आठ रुपये लीटर, डीज़ल साढ़े तीन रुपये लीटर और मिट्टी का तेल सवा दो रुपये लीटर था...और रसोई गैस का सिलेंडर उस वक्त 57 रुपये 60 पैसे का था...
चीज़ें और वक्त काफ़ी बदल चुका है...और सचिन आप!....




(स्रोत- अनंत रंगास्वामी, फर्स्ट पोस्ट डॉट कॉम)

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

पंडित रविशंकर नहीं रहे...खुशदीप

पंडित रविशंकर
7 अप्रैल 1920-11 दिसंबर 2012

सुप्रसिद्ध सितारवादक और संगीतज्ञ पंडित रवि शंकर का 11 दिसंबर को अमेरिका के शहर सैन डिएगो में निधन हो गया...92 साल के पंडित रविशंकर को सांस में तकलीफ़ के बाद पिछले गुरुवार को ला जोल्ला के स्क्रिप्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था...दुनिया भर में पंडित जी को भारत के संगीत-दूत के तौर पर जाना जाता था...उम्र के इस पड़ाव में भी वो संगीत के लिए पूरी तरह सक्रिय थे...यहां तक कि वो अगले ग्रैमी अवार्ड्स के लिए भी दावेदार थे...7 अप्रैल 1920 को वाराणसी में जन्मे पंडित रविशंकर ने भारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा उस्ताद अल्लाऊद्दीन खाँ से प्राप्त की। उनके युवा वर्ष यूरोप और भारत में अपने भाई उदय शंकर के नृत्य समूह के साथ दौरा करते हुए बीते। उन्हे वर्ष 1999 मे भारत रत्न से सम्मानित किया गया। रवि शंकर को कला के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन 1967 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। ये उत्तर प्रदेश राज्य से हैं।

विनम्र श्रद्धांजलि....

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो यहां हैं...खुशदीप




दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है भारत...

लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर है संसद...

लेकिन देश की शान इसी संसद में एफडीआई जैसे गंभीर मुद्दे पर बहस के दौरान ये हैं हमारे कुछ माननीयों के मुखारबिंदुओं से निकले सद्वचन...

जम्हूरा (बीजेपी के एक सांसद के लिए लालू यादव ने कहा)

मुहब्बत में तुम्हें आंसू बहाना नहीं आता, बनारस आकर  बनारस  का पान खाना नहीं आता...(लोकसभा में नेता विपक्ष सुषमा स्वराज के लिए लालू प्रसाद यादव की तुकबंदी)

आपको गांठें खोलना नहीं आता, मसखरी के अलावा बोलना नहीं आता...(लालू यादव के लिए सुषमा स्वराज की जवाबी तुकबंदी)

आप इतना अच्छा बोलती हैं कि ऐसा लगता है कि सब सही बोल रही हैं...(सुषमा स्वराज के लिए कपिल सिब्बल)

इनकी तो आइडियोलॉजी ही फॉरेन है, फॉरेन डायरेक्ट आइडियोलॉजी (एफडीआई)....(लेफ्ट के लिए कपिल सिब्बल)

आपको फ्राई के लिए 24 इंच के आलू चाहिए तो अंबाला आइए...( कांग्रेस सांसद और हरियाणा के सीएम के साहबज़ादे दीपेंद्र हुड्डा)

किसान के बेटे हो पहले आलू और लौकी का फ़र्क तो समझ लीजिए...(दीपेंद्र हुड्डा को सुषमा स्वराज का जवाब)

लोमड़ी को वोट नहीं मिले तो उसने कहा अंगूर खट्टे हो गए....(सुषमा स्वराज के बयान से नाराज़ मायावती)

बेवकूफ़...(कांग्रेस सांसद प्रभा ठाकुर के लिए बीजेपी के वेंकैया नायडू)

ये सब पढ़ लिया, अब नीचे का वीडियो भी देख लीजिए...



मेरे प्याज बड़े हैं! क्या नहीं है...खुशदीप



रिटेल सेक्टर में एफडीआई (विदेशी प्रत्यक्ष निवेश) पर लोकसभा की मंज़ूरी मिलने से सत्ता पक्ष फूले नहीं समा रहा....वहीं विपक्ष का कहना है कि आंकड़ों में बेशक उनकी हार हो गई लेकिन नैतिक तौर पर उनकी जीत हुई...इस चक्कर में दोनों पक्षों के सांसदों को पूरे देश के सामने टेलीविज़न पर गला साफ़ करने का मौका ज़रूर मिल गया...वालमार्ट देश में आया तो क्या क्या होगा...सरकारी पक्ष का तर्क था कि किसानों से सीधे खरीद होगी तो उन्हें फायदा मिलेगा...उपभोक्ताओं को भी सस्ता सामान मिलेगा...मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी का तर्क था कि इससे छोटे दुकानदारों का धंधा चौपट हो जाएगा...सबने बातें तो बहुत बड़ी-बड़ी की लेकिन इतनी अहम बहस के लिए बिना किसी खास तैयारी के...काश ये लोग बहस से पहले पी. साईनाथ का ये लेख ही पढ़ लेते...ये लेख अमेरिका के एक किसान पर आधारित है...अब भारत में जो ये तर्क दे रहे हैं कि छोटे किसानों को विदेशी स्टोरों के आने से फायदा होगा, उनकी आंखें  इस लेख को पढ़ने के बाद ज़रूर खुल जानी चाहिए...इस लेख के लिए मेरी ओर से साईनाथ साहब को ज़ोरदार सैल्यूट....

क्रिस पावेलस्की 
मेरे प्याज बड़े हैं, क्या नहीं है?" न्यूयॉर्क सिटी से 60 किलोमीटर बाहर क्रिस पावेलस्की ने हम आगंतुकों के समूह से ये सवाल किया... "क्या आप जानते हैं क्यों?" क्योंकि उपभोक्ताओं की ये मांग है, शायद? शायद बड़े प्याज ग्राहकों की नज़र में जल्दी चढ़ते हैं? पावेलस्की का जवाब था "नहीं "...पावेलस्की के पड़दादा 1903 में पोलेंड से आकर यहां बसे थे...एक सदी से ज़्यादा इसी ज़मीन पर ये परिवार फार्मिंग करता आया है...

पावेलस्की का कहना है कि आकार रिटेल चेन स्टोर तय करते हैं... "हर चीज़" उनके फ़रमान के अनुसार होती है... "हर चीज़" में कीमतें भी शामिल हैं...वालमार्ट, शॉप राइट और दूसरे चेन स्टोर पावेलस्की जैसे उत्पादित प्याजों को 1.49 डॉलर से लेकर 1.89 डॉलर प्रति पाउंड (करीब 453 ग्राम) में बेचते हैं...लेकिन पावेलस्की के हिस्से में एक पाउंड प्याज के लिए सिर्फ 17 सेंट (1 डॉलर=100 सेंट) ही आते हैं...ये स्थिति भी पिछले दो साल से ही बेहतर हुई है...1983 से 2010 के बीच पावेलस्की को एक पाउंड प्याज के सिर्फ 12 सेंट ही मिलते थे। 

पावेलस्की का कहना है कि खाद, कीटनाशक समेत खेती की हर तरह की लागत बढ़ी है...अगर कुछ नहीं बढ़ा है तो वो हमें मिलने वाली कीमतें...हमें 50 पाउंड के बोरे के करीब छह डॉलर ही मिलते हैं...हां इसी दौरान प्याज की रिटेल कीमतों में ज़रूर  इज़ाफ़ा हुआ है...फिर पावेलस्की ने सवाल किया कि क्या कोई खाना पकाता है...हिचकते हुए कुछ हाथ ऊपर खड़े हुए...पावेलस्की ने एक प्याज हाथ  में लेकर कहा कि वो इतना बड़ा ही प्याज चाहते हैं, क्योंकि वो जानते हैं कि आप खाना बनाते वक्त इसका आधा हिस्सा ही इस्तेमाल करेंगे...और बचा आधा हिस्सा आप फेंक दोगे...जितना ज़्यादा आप बर्बाद करोगे, उतना ही ज़्यादा आप खरीदोगे...स्टोर ये अच्छी तरह जानते हैं...इसलिए यहां बर्बादी रणनीति है, बाइ-प्रोडक्ट नहीं...

पावेलस्की के मुताबिक  पीले प्याज के लिए सामान्यतया दो इंच या उससे थोड़ा बड़ा ही आकार चलता है...जबकि तीन दशक पहले एक इंच के आसपास ही मानक आकार माना जाता था...पावेलस्की के अनुसार छोटे किसान वालमार्ट के साथ मोल-भाव नहीं कर सकते...इसी वजह से उनके खेतों के पास छोटे प्याज़ों के पहाड़ सड़ते मिल जाते हैं...


पावेलस्की के फार्म को छोटा फार्म माना जाता है...अमेरिकी कृषि विभाग के मुताबिक जिन फार्म की सालाना आय ढाई लाख डॉलर से कम हैं, उन्हें छोटा ही माना जाता है...ये बात अलग है कि अमेरिका के कुल फार्म में 91 फीसदी हिस्सेदारी इन छोटे फार्म की ही है...इनमें से भी 60 फीसदी ऐसे फार्म हैं जिनकी सालाना आय दस हज़ार डॉलर से कम है...पावेलस्की, उनके पिता और उनके भाई संयुक्त रूप से 100 एकड़ में खेती  करते हैं...इस ज़मीन में से 60 फीसदी के ये मालिक हैं और 40 फीसदी ज़मीन किराये की है...

पावेलस्की का कहना है कि सिर्फ चेनस्टोर ही छोटे किसानों के हितों के खिलाफ काम नहीं करते...बाढ़ और आइरीन तूफ़ान जैसी प्राकृतिक आपदाओं की भी मार उन्हें सहनी पड़ती है...पावेलस्की को 2009 में फसल नष्ट होने से एक लाख पंद्रह हज़ार डॉलर का नुकसान हुआ था...लेकिन उन्हें फसल बीमे से सिर्फ छह हज़ार डॉलर की भरपाई हुई...जबकि बीमे के प्रीमियम पर ही उनके दस हज़ार डॉलर जेब से खर्च हुए थे...

पूरा कृषिगत ढ़ांचा और नीतियां पिछले कुछ दशकों में छोटे किसानों के खिलाफ होती गई हैं....पावेलस्की खुद कम्युनिकेशन्स स्टडीज़ में पोस्ट ग्रेजुएट हैं...उनके पड़दादा ने जब अमेरिका में पहली बार कदम रखा था तो उनकी जेब में सिर्फ पांच डॉलर थे...आज उऩका पडपोता तीन लाख बीस हज़ार डॉलर का कर्ज़दार है...अमेरिकी कृषि का पूरा ढ़ाचा छोटे किसानों की जगह कारपोरेट सेक्टर के हित साधने वाला है...

पावेलस्की की पत्नी एक स्कूल में असिस्टेंट लाइब्रेरियन हैं...वो इसलिए ये नौकरी करती हैं कि परिवार को आर्थिक सहारा मिलता रहे...पावेलस्की के मुताबिक पिछले साल उन्होंने पचास एकड़ के फार्म पर कृषि लागत पर एक लाख साठ हज़़ार डॉलर खर्च किए और बदले में उन्हें दो लाख डॉलर मिले....यानी चालीस हज़ार डॉलर की कमाई पर उन्हें टैक्स देना पड़ा...इससे दोबारा निवेश के लिए उनके पास बहुत कम बचा...

एसोसिएटेड प्रेस की  2001 में कराई एक जांच से सामने आया था कि सार्वजनिक पैसा सबसे ज़्यादा कहां जाता है...जबकि तब हालात काफ़ी अलग थे, लेकिन  तब भी कारपोरेट जगत और बहुत अमीर कंपनियों की पकड़ बहुत मज़बूत थी...एसोसिएटेड  प्रेस ने अमेरिकी कृषि विभाग के दो करोड बीस लाख चेकों की जांच की तो उनमें से 63 फीसदी रकम इस क्षेत्र के सिर्फ दस बड़े खिलाड़यों को ही मिली...डेविड रॉकफेलर, टेड टर्नर, स्कॉटी पिपेन जैसे धनकुबेरों को भी उनके फार्म्स के लिए सब्सिडी मिली... पी. साईनाथ

क्या यही होने जा रहा है अब भारत में भी....