शनिवार, 24 नवंबर 2012

केजरीवाल 'आप', अन्ना 'बाप'...खुशदीप


अरविंद केजरीवाल ने अपनी राजनीतिक पार्टी का नाम 'आम आदमी पार्टी ' (AAP) रखा है...अभी तक जिस 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' (IAC) के बैनर तले वो मौजूदा राजनीतिक पार्टियों की नाक में दम करते रहे हैं, उसे वो अन्ना हजारे की इच्छा के मुताबिक उनके गैर-राजनीतिक संगठन के लिए छोड़ने का ऐलान पहले ही कर चुके हैं...लेकिन मेरी समझ से अब अन्ना को भी अपने संगठन के नाम को लेकर रणनीति बदल देनी चाहिए...केजरीवाल के अपनी पार्टी के नाम को सावर्जनिक करने के बाद तो खास तौर पर...अन्ना को अपने संगठन का नाम 'BAAP' (बहुत आम आदमी परेशान) रख देना चाहिए...ठीक शहंशाह के अमिताभ की तरह...रिश्ते में तो हम तुम्हारे 'बाप' लगते हैं, नाम है किसन  बापट बाबूराव हजारे...बापू तो अब इस देश के लिए दोबारा आएंगे नहीं, बाप ही सही...


आम आदमी तो इस देश का बहुत भोला है...बापू ने जिस कांग्रेस को आज़ादी के बाद भंग कर देने की इच्छा जताई, वही कांग्रेस इस आम आदमी को पिछले 65 साल में से 55 साल तक पोपट बनाती रही...बाकी बचे दस साल में जनता पार्टी, जनता दल, संयुक्त मोर्चा और एनडीए ने भी इस देश पर राज किया...इन गैर कांग्रेसी विकल्पों को पांच बार आम आदमी ने बड़ी उम्मीदों के साथ मौका दिया तो इन्होंने भी उसे मायूस करने के अलावा और कुछ नहीं किया...

अब करते हैं आज की बात...आज के आम आदमी की बात...अब ऐसा कहने वालों की कमी नहीं कि केजरीवाल को देश की कमान मिली तो आम आदमी का नसीब बदल जाएगा...आम आदमी एक बार फिर केजरीवाल से बड़ी उम्मीदें पालने लगा है...वही आम आदमी जिसे चुनाव जीतने वाली हर पार्टी वैसे ही बजाती आई है जैसे मंदिर के घंटे को कोई भी बजा सकता है...सत्ता में मौजूद पार्टी के कुशासन को संगठित तौर पर कोई भी चुनौती देता है तो उस शख्स या संगठन में आम आदमी को अपना हीरो नज़र आने लगता है...फिर यही आम आदमी अपनी मुसीबतें जल्दी खत्म होने की सोच कर गाने लगता है...के आप मुझे अच्छे लगने लगे...सपने सच्चे लगने लगे....

अब गाने का ज़िक्र आया है, तो इसे सुन भी लीजिए....कैसे इन मोहतरमा को कोई एक जनाब बहुत अच्छे लगने लगे हैं...कैसे उसके मन में उम्मीदों का सागर हिलोरें मारने लगा है...क्या वैसी ही सूरत आज देश के आम आदमी की भी है....केजरीवाल के 'आप' को लेकर...




आप मुझे अच्छे लगने लगे,
सपने सच्चे लगने लगे,
आहा आप मुझे अच्छे लगने लगे,
सपने सच्चे लगने लगे,
नैन सारी रैन जगने लगे.

के आप मुझे अच्छे लगने लगे,
सपने  सच्चे लगने लगे...
के आप मुझे अच्छे लगने लगे,
सपने  सच्चे लगने लगे...

बातें यही होने लगी गांव में,
बातें यही होने लगी गांव में,
छुपती फिरूं मैं धूप-छांव में,
ज़ंजीरें फौलाद की हैं पांव में,
मगर छन-छन्नन घुंघरू बजने लगे,

आहा, आप मुझे अच्छे लगने लगे,
नैन सारी रैन जगने लगे
के आप मुझे अच्छे लगने लगे,
सपने सच्चे लगने लगे...
अंखियों को भेद खोलना आ गया है,
अंखियों को भेद खोलना आ गया,
मेरे मन को भी डोलना आ गया,
खामोशी को बोलना आ गया,
देखो गीत मेरे मुख पे सजने लगे,

आहा आप मुझे अच्छे लगने लगे,
नैन सारी रैन जगने लगे,
के आप मुझे अच्छे लगने लगे,
सपने सच लगने लगे...


( फिल्म...जीने की राह (1969),  गायिका...लता मंगेशकर,  गीतकार...आनंद बक्षी, संगीतकार...लक्ष्मीकांत प्यारेलाल)

सोमवार, 19 नवंबर 2012

रोता है रातों में पाकिस्तान क्या...खुशदीप





बंटवारे का दर्द जिस पीढ़ी ने सहा,  और जो उस वक्त पूरे होश-ओ-हवास में थे,उनमें से ज़्यादातर लोग दुनिया को अलविदा कह चुके हैं...1947 में भी जो पैदा हुए थे, वो आज 65 साल के हो चुके हैं...देश की आज़ादी के साथ इस बंटवारे ने क्या-क्या छीना, इसकी कसक वही शिद्दत के साथ बयां कर सकते हैं, जिन्होंने इसे जिया, महसूस किया...इस दर्द की एक बानगी देखनी है तो पीयूष मिश्रा का एक गीत सुनिए...गुलाल फेम पीयूष मिश्रा के इस गीत में जावेद नाम के एक शख्स की चिट्ठी के ज़रिए व्यथा को उकेरा गया है...अपनी माशूका हुस्ना से बिछुड़ गया जावेद इन अल्फाज़ों में हर उस बात का ज़िक्र कर रहा है जो सब पीछे छूट चुकी है...




लाहौर के उस पहले जिले के,
दो परगना में पहुंचे,
रेशम गली के दूजे कूचे के,
चौथे मकां में पहुंचे,
कहते हैं जिसको दूजा मुल्क,
उस पाकिस्तान में पहुंचे,
लिखता हूं खत मैं हिंदुस्तां से
पहलु-ए-हुस्ना में पहुंचे,
ओ हुस्ना…

मैं तो हूं बैठा,
ओ हुस्ना मेरी, यादों पुरानी में खोया,
पल पल को गिनता
पल पल को चुनता
बीती कहानी में खोया
पत्ते जब झड़ते हिंदुस्तां में
यादें तुम्हारी ये बोलें
होता उजाला जब हिंदुस्तां में
बातें तुम्हारी ये बोलें
ओ हुस्ना मेरी ये तो बता दो
होता है ऐसा क्या उस गुलिस्तां में
रहती हो नन्ही कबूतर सी गुम तुम जहां

ओ हुस्ना…

पत्ते क्या झड़ते हैं पाकिस्तान में वैसे ही
जैसे झड़ते यहां

ओ हुस्ना…

होता उजाला क्या वैसा ही है
जैसा होता है हिंदुस्तां में…हां

ओ हुस्ना…

वो हीरों के रांझे, के नगमे मुझको
हर पल आ आके सताएं
वो बुल्ले शाह की तकरीरों के
झीने झीने से साये
वो ईद की ईदी, लंबी नमाजें, सेवइयों की झालर
वो दीवाली के दिये, संग में बैसाखी के बादल
होली की वो लकड़ी जिसमें
संग संग आंच लगायी
लोहड़ी का वो धुंआ जिसमें
धड़कन है सुलगायी

ओ हुस्ना मेरी
ये तो बता दो
लोहड़ी का धुआं क्या अब भी निकलता है
जैसे निकलता था, उस दौर में हां… वहां

ओ हुस्ना

हीरों के रांझों के नगमे
क्या अब भी सुने जाते हैं वहां

ओ हुस्ना

रोता है रातों में पाकिस्तान क्या वैसे ही
जैसे हिंदुस्तान

ओ हुस्ना

पत्ते क्या झड़ते हैं क्या वैसे ही
जैसे कि झड़ते यहां
होता उजाला क्या वैसे ही
जैसा होता ही हिंदुस्तां में… हां

ओ हुस्ना…
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गायक  और गीतकार....पीयूष मिश्रा
संगीतकार....हितेश सोनिक
एलबम....कोक स्टूडियो सीज़न फ़ाइव