गुरुवार, 20 सितंबर 2012

'ड्रीमम वेकपम' की संदर्भ सहित व्याख्या...खुशदीप


पढ़ाई के तरीके बदल रहे हैं...अब उन तरीकों से बच्चों को पढ़ाने पर ज़ोर दिया जा रहा है जिन्हें वो आसानी से समझ सकें...जैसे बच्चा-बच्चा और किसी को पहचानता हो या न हो लेकिन सचिन तेंदुलकर और शाहरुख़ ख़ान को ज़रूर पहचानता होगा...इसलिए अब कई सेलेब्रिटीज़ को बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा है...कहते हैं कविता हमारे जीवन से खत्म होती जा रही है...लेकिन धन्य है हमारा बॉलीवुड जो दिन प्रति दिन हमें न जाने कब से एक से बढ़ कर सस्वर गाई जाने वाली रचनाएं दिए  जा रहा है...अब कल्पना कीजिए इन्हीं रचनाओं को पद्य के रुप में हिंदी के पाठ्यक्रम में स्थान मिलना शुरू हो जाए तो हमारे नौनिहाल किस तरह संदर्भ सहित व्याख्या करेंगे...उसी की एक बानगी...

सवाल...
संदर्भ प्रसंग सहित निम्नलिखित कालजयी रचना की व्याख्या कीजिए...
ड्रीमम वेकपम, क्रिटिकल कंडीशनम

छात्र का उत्तर...

संदर्भ और प्रसंग...
ये पंक्तियां प्रेम रस में रोम-रोम तक डूबीं परम भक्तिनी रानी मुखर्जी के ऐातिहासिक श्रव्य और दृश्य महाग्रंथ अय्या की अमर रचना...ड्रीमम वेकपम, क्रिटिकल कंडीशनम...से उद्धृत की गई हैं....​



व्याख्या... 
इस कविता में  क्यूपिड के तीर से पीड़ित रानी मुखर्जी जब भी देव तुल्य शरीर सौष्ठव वाले पृथ्वीराज को नृत्य का रस बिखेरते देखती हैं तो इनका चंचल मन व्याकुल हो उठता है... स्वपन से जागने के बाद रानी मोहक शब्दों में अपनी क्रिटिकल कंडीशनम यानी गंभीरावस्था का बखान करती हैं...उनके संयम का बांध टूट जाता है और उनके मुखारबिंदु से स्वत ये अनमोल वचन निकलने लगते हैं...​
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ड्रीमम वेक अपम क्रिटिकल कंडीशनम​
अर्थम क्वेकपम हिल ढुल सब शेकपम​
​फेस टू फेस धरती पुत्रम ​
​टाप टू बेसम कामासूत्रम​
​थाईसम थंडरम डाउनम अंडरम​
​साईजम मैट्रम थिंकम वंडरम​
​जंपिंगम...पंपिंगम
थ्राबिंगम...थंपिंगम​
​ वुने रुंडे मुने नाले​

​हार्ट बीटनम ढोल पीटनम​​
​लव लस्ट डबल कष्ट बड़ा देतनम
​बाडी हीटनम हाट सीटनम​​
कालिंग फायर ब्रिगेड भी डिफीटनम​
​सेम टू सेमम दिल में उतरम​
​टाप टू बेसम कामासू्त्रम​​
​ थाईसम थंडरम डाउनम अंडरम​
​साईजम मैट्रम थिंकम वंडरम​
​जंपिंगम...पंपिंगम
थ्राबिंगम...थंपिंगम​
​ वुने रुंडे मुने नाले​


निष्कर्ष...

ये रचना प्रेम की  देवी रानी मुखर्जी की  घोर अधीरता की ओर बड़े प्रभावशाली ढंग से इंगित करती है....​


स्लॉग गीत




(अय्या 12 अक्टूबर को रिलीज़ होने जा रही हैं ...​कथा और निर्देशन सचिन कुंदलकर का है...प्रोड्यूस किया है जानेमाने निर्देशक अनुराग कश्यप ने वायाकाम 18 के साथ मिलकर..​.फिल्म में रानी मुखर्जी के साथ मुख्य भूमिका में है​​ मलयालम सुपर स्टार पृथ्वीराज.. पृथ्वीराज इस फिल्म से बालीवुड में डेब्यू कर रहे हैं...अय्या में रानी मराठी लड़की मीनाक्षी देशपांडे का किरदार निभा रही हैं, जिसे तमिल कलाकार सूर्या (पृथ्वीराज) से प्यार हो जाता है...मराठी-तमिल संस्कृति के टकराव की पृष्ठभूमि में हास्य का रोचक तानाबाना बुना गया है..​फिल्म का संगीत अमित त्रिवेदी ने दिया है और इसके गीतों को शब्द अमिताभ​ भट्टाचार्य से मिले हैं...ड्रीमम वेकपम, क्रिटिकल कंडीशनम को गाया है सौम्या राओह ने...)

बुधवार, 19 सितंबर 2012

हिल ढुल सब शेकअपम...खुशदीप



सर्जरी हो गई है...गाल ब्लैडर रिमूव करने के साथ जिन दो स्टोन्स ने पिछले तीन महीने से परेशान कर रखा था, वो भी निकाल दिए गए हैं...सर्जरी के बाद पिछले पांच दिन से पेट में डला हुआ एक ड्रेन भी निकाला गया...सर्जरी तो ज़ाहिर है एनेस्थीसिया के असर में हुई थी, क्या हुआ था कुछ पता नहीं चला...लेकिन मेरे होशोहवास में सर्जन ने जब पेट से एक झटके में ड्रेन निकाला तो कुछ क्षणों के लिए हुए भीषण दर्द ने सारे पूर्वज याद दिला दिए...​

सर्जन ने हैवी पेन किलर देते हुए एक हफ्ता और आराम के लिए कहा है...अभी कमज़ोरी काफ़ी है...इसलिए वक्त बेड पर लेटे ही गुज़र रहा है...नेट​पर भी कुछ देर में थक जाता हूं, पहली बार लेटे लेटे सर्फिंग करते टीवी देखने पर पता चल रहा है कि केबल वाला कितने चैनल दिखाता है...



रिमोट के बटन बार बार बदलता हूं तो हर तीसरे चौथे चैनल पर रानी मुखर्जी पर फिल्माया अय्या फिल्म का गाना दिख रहा है...
ड्रीमम वेक अपम क्रिटिकल कंडीशनम​,
​अर्थम क्वेकपम हिल ढुल सब शेकअपम​........ ...  

गाने के बोल हालिया हिट हुए वाय दिस कोलावरी, कोलावारी, कोलावरी डी जैसे ही साउथ चार्टबस्टर की याद दिला रहे हैं...इससे पहले दर्द से मेरा भी सब हिल ढुल सब शेक अपम करने लगे, इस पोस्ट को यही विराम देता हूं...पूरी तरह ठीक होने पर इस गाने​ ​पर विस्तार से कुछ मज़ेदार ज़रूर लिखूंगा, ये वादा रहा...

शनिवार, 8 सितंबर 2012

राहत का झुनझुना बाजे घणा...खुशदीप​


जो सत्ता में है वो पिता जी की जागीर समझ कर देश पर राज कर रहे हैं...रोज़ आम आदमी की जेब एक बिलांग छोटी करते जा रहे हैं...यूपीए सरकार​ टू-जी का घंटा बजाने के बाद कोयले की कालिख मुंह पर लगाकर नज़र के टीके की तरह अपनी बलैंया उतरवा रही है...कम एनडीए भी नहीं है...जिन​ राज्यों में एनडीए की सरकारें हैं, वो भी जनता की पुंगी बजाकर अपना उल्लू सीधा करने में पीछे नहीं है...हिमाचल प्रदेश में बीजेपी की सरकार है...इसी​ साल यहां विधानसभा चुनाव होने हैं...राज्य सरकार ने आज करोड़ों रुपये के खर्च पर अखबारों में एक विज्ञापन दिया है...​



राहत के राशन नाम के इस विज्ञापन को अब ज़रा गौर से पढ़िए...​
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​आटा, चावल, तीन दाल, सरसों का तेल, रिफाइंड तेल और नमक सस्ते दामों पर मुहैया करा कर प्रेम सिंह धूमल सरकार ने हिमाचल के साढ़े सोलह​ लाख परिवारों की मददगार होने का दावा किया है...विज्ञापन में खुद ही कहा गया है कि इससे हर परिवार को पांच साल में तीस हज़ार रुपये का फ़ायदा​​ हुआ...यानी एक साल में एक परिवार को छह हज़ार रुपये का फ़ायदा...यानी एक महीने में पांच सौ रुपये का फ़ायदा...एक दिन में सोलह रुपये छियासठ पैसे का फ़ायदा...एक परिवार में अगर पांच सदस्य मान लिए जाएं तो हर सदस्य को तीन रुपये  तेंतीस  पैसे का फ़ायदा...अब इस ऊंट के मुंह में जीरे वाली राहत का ढोल पीटने के लिए राज्य सरकार जो करोड़ों रुपये का बजट लुटा रही है, अगर वो भी जनता पर ही खर्च कर देती तो शायद उसका कुछ और भला हो जाता... ऐसे में धर्मेद्र की फिल्म इज्ज़त का गाना याद आ रहा है...

क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी फ़ितरत छिपी रहे, 
नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छिपी रहे,
दान का चर्चा घर घर पहुंचे, लूट की दौलत छिपी रहे...
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शनिवार, 1 सितंबर 2012

मेरी नज़र में लखनऊ ब्लॉगर सम्मेलन...खुशदीप

तस्लीम और परिकल्पना के सहयोग से लखनऊ में अंतर्राष्ट्रीय  ब्लॉगर सम्मेलन संपन्न हुआ...इस आयोजन के लिए भाई रवींद्र प्रभात और भाई ज़ाकिर ने ​महीनों अथक मेहनत की, जिसके लिए वो साधुवाद के पात्र हैं...इस कार्यक्रम के लिए मुझे भी रवींद्र भाई ने न्योता भेजा था लेकिन स्वास्थ्य कारणों ​से मेरी शिरकत संभव नहीं थी, जिसके बारे में मैंने पहले ही सूचित कर दिया था...अभी मेरी सर्जरी होना शेष है, शायद अगले हफ्ते हो जाए..इस वजह ​से नेट पर भी मेरा बहुत कम आना हो पा रहा है...

पिछले दो-तीन में मौका मिला तो देखा, लखनऊ के कार्यक्रम को लेकर  ब्लॉग  और फेसबुक पर पोस्ट-एंटी पोस्ट, टिप्पणी-प्रतिटिप्पणियों की भरमार थी...​इन्हें पढ़कर ऐसा लगा कि जैसे अपमैनशिप के लिए रस्साकशी हो रही है...पुरस्कार आवंटन को लेकर ​पक्ष-प्रतिपक्ष की ओर से कुछ दंभपूर्ण बातें की गईं, ठीक वैसे ही जैसे नौ दिन से संसद में कोल ब्लाक आवंटन को लेकर कांग्रेस और बीजेपी भिड़े हुए हैं...​
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यहां सवाल टांग-खिंचाई का नहीं, दोनों तरफ़ से एक सार्थक सोच दिखाने का है...जिससे नए ब्लॉगरों में भी अच्छा संदेश जाए...नवोदित प्रतिभाओं ​को प्रोत्साहन के लिए रवींद्र भाई इस तरह के कार्यक्रम करते हैं तो उनका भी हमें मनोबल बढ़ाना चाहिए...हां, जो लोग अब ब्लॉग में खुद को अच्छी ​तरह स्थापित कर चुके हैं, अगर उन्हें ही ये सम्मान साल दर साल दिए जाते रहेंगे, तो मेरी दृष्टि से दीर्घकालीन परिप्रेक्ष्य में इसके प्रतिगामी परिणाम​ आएंगे...

मेरा मानना है कि एक ब्लॉगर को सबसे ज़्यादा खुशी दूसरे ब्लॉगरों से मिलने से होती है...सम्मान समारोह में भी ज़्यादातर ब्लॉगर खुद ​के सम्मान से ज़्यादा दूर-दराज़ से आए ब्लॉगरों के साथ मिलने की चाहत से ही पहुंचते हैं...अब सवाल यही रह जाता है कि एक दिन के अल्पकाल​ में औपचारिकताओं को निभाते हुए क्या  ब्लॉगरों की आपस में मिल-बैठने की कसक पूरी हो पाती है...विशिष्ट अतिथियों की नसीहतों से ज़्यादा ब्लॉगरों को एक-दूसरे को सुनने की ज़्यादा ख्वाहिश होती है...इसी पर विमर्श किया जाना चाहिए कि क्या इस तरह के आयोजन इस ख्वाहिश को पूरा कर पाते हैं...​

यहां इसी संदर्भ में मैं उदाहरण देना चाहूंगा, जर्मनी से राज भाटिया जी के हर साल हरियाणा में आकर आयोजन करने का...इन आयोजनों में न कोई​ पूर्व निर्धारित एजेंडा होता है, न ही सम्मान जैसा कोई झंझट...लेकिन भाटिया जी की स्नेहिल मेज़बानी में ब्लॉगरों की एक-दूसरे के साथ मिल-बैठने ​की चाहत बड़ी अच्छी तरह पूरी होती है...यहां सभी  ब्लॉगर होते हैं...राजनीति या साहित्य जगत से कोई बड़ा नाम नहीं होता, जिस पर पूरा कार्यक्रम ही ​केंद्रित हो जाए और ब्लॉगर खुद को नेपथ्य में जाता महसूस करें... कार्यक्रम के बाद सभी हंसी-खुशी विदा लेते हैं कि फिर मिलेंगे अगले साल...ऐसे में कम से कम मुझे तो भाटिया जी के कार्यक्रम का हर साल बेसब्री से इंतज़ार रहता है...​
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अगर मेरी बात को किसी दुराग्रह की तरह न लिया जाए तो मैं लखनऊ जैसे कार्यक्रम के लिए अपने कुछ सुझाव देना पसंद करूंगा, जिससे कि आने वाले​ वर्षों में इस तरह के कार्यक्रमों की सार्थकता बढ़ सके...​

पहली सौ टके की बात, सम्मान से ज़्यादा इन कार्यक्रमों में  ब्लॉगरों के मेल-मिलाप को बढ़ावा देने पर फोकस रखा जाए...​
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पहले दिल्ली और अब लखनऊ में टाइम मैनेजमेंट के चलते ब्लागरों के लिए महत्वपूर्ण सत्रों को रद करने की गलती हुई, जिससे वहां शिरकत करने​वाले ब्लॉगरों को असुविधा हुई...इस पक्ष पर सुधार के लिए प्रयत्न किया जाना चाहिए..​
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इतने बड़े आयोजन के लिए एक दिन पर्याप्त नहीं है...कम से कम दो दिन का आयोजन होना चाहिए...ऐसे में सवाल कार्यक्रम पर आने वाले खर्च का उठ सकता है...तो मेरा नम्र निवेदन है कि इसका सारा बोझ आयोजकों पर डालने की जगह, ब्लॉगरों से ही अंशदान लिया जाना चाहिए...मैं समझता हूं कि सभी ब्लॉगर इसके लिए हंसी-खुशी तैयार होंगे..​
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ब्लागर इतने दूर-दराज़ से आते हैं तो ब्लॉगरों के ठहरने की समुचित व्यवस्था आयोजकों की ज़िम्मेदारी हो जाती है...बेशक इस काम पर आने वाला खर्च​ खुद ब्लॉगर ही  उठाएं..लेकिन अनजान शहर में कम खर्च पर पहले से ही  ब्लॉगरों को ऐसी सुविधा मिले तो उनके लिए बहुत आसानी हो जाएगी...​

ब्लॉगर जगत के लिए आदर्श हैं, जिनका हर कोई सम्मान करता है...जैसे कि रूपचंद्र शास्त्री जी मयंक...अगर उन जैसे ब्लॉग को कार्यक्रम को लेकर कोई​ शिकायत है तो निश्चित तौर पर ये अच्छा संदेश नहीं है...खटीमा से इतनी दूर तक गए शास्त्री जी को पूरा मान-सम्मान मिलना चाहिए था...उनका आसन​ मंच पर ही होना चाहिए था...मैं जानता हूं कि रवींद्र भाई और ज़ाकिर भाई को भी दिल से इस बात के लिए खेद होगा...​
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मुझे ये जानने की बड़ी इच्छा थी कि कार्यक्रम में पिछले साल हमसे बिछड़े डा अमर कुमार को याद किया गया या नहीं...उनकी पुण्यतिथि 23 अगस्त को​, जन्मदिन 29 अगस्त को था...इन्हीं दो तिथियों के बीच यानी 27 अगस्त को ये कार्यक्रम हुआ...लेकिन मैं इस बारे में कहीं पढ़ नहीं पाया...अगर उन्हें कार्यक्रम में याद किया गया तो इसे जानकर मुझे सबसे ज़्यादा संतोष मिलेगा...​

स्लाग ओवर​
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मैं इस तरह के सम्मान समारोह के लिए एक रामबाण नुस्खा सुझाता हूं, जिससे कि सम्मान को लेकर ये किसी को शिकायत ही नहीं रहेगी कि इसे मिला ​तो उसे क्यों नहीं मिला...इसके लिए नोएडा में जिस तरह फ्लैटों के ड्रा के लिए तरीका अपनाया जाता है, वहीं इस्तेमाल किया जाना चाहिए...इसमें​ शीशे के दो तरह के बक्से होते हैं, जिन्हें घुमाया जा सकता है...एक बक्से में सभी आवेदकों की पर्चियां होती हैं...दूसरे बक्से में आवंटित होने वाले फ्लैटों​के नंबर होते हैं...जाहिर है कि आवेदक हज़ारों (कई बार लाखों) में होते हैं तो फ्लैट सिर्फ पचास-सौ ही होते हैं...ऐसे में पहले फ्लैट वाले बक्से से पर्ची निकाली​जाती है और दूसरे बक्से से आवेदक वाली...जिस आवेदक का नाम आता है उसी को फ्लैट आवंटित हो जाता है...यानी सब लाटरी सरीखा, किसी को​ शिकायत का कहीं मौका नहीं...इसी तरह की प्रक्रिया ब्लॉगरों को सम्मान आवंटित करने के लिए अपनाई जानी चाहिए....सभी ब्लॉगर एक समान...कोई​​ किसी से श्रेष्ठ नहीं, कोई किसी से कमतर नहीं.