रविवार, 15 जुलाई 2012

बिन मां के बच्चे और सतीश भाई की किताब...खुशदीप


 बचपन में दो साल की उम्र की धुंधली यादों में मुझे , २० वर्षीया उर्मिला दीदी की गोद आती है जो मुझे अपनी कमर पर बिठाये, रामचंदर दद्दा अथवा प्रिम्मी दद्दा के घर, अपने एक हाथ से मेरा मुंह साफ़ करते हुए , घुमाने ले जा रही हैं ! ढाई साल की उम्र में मेरी माँ की म्रत्यु के बाद, शायद वे मेरी सुरक्षा के लिए सबसे अधिक तडपी थीं  !कुछ समय बाद वे भी ससुराल चली गयीं, उन दिनों भी वे अक्सर पिता से, मुझे अपनी ससुराल हज़रत पुर,बदायूं  बुलवा लेतीं थी !माँ  के असामयिक चले जाने के बाद , पिता शायद बहुत टूट गए थे ! वे मुझे कभी नानी के घर (पिपला ) और कभी उर्मिला दीदी के घर( हज़रत पुर, बदायूं ) में, मुझे छोड़ जाते थे ! माँ के न रहने के कारण खाने की बुरी व्यवस्था और पेट के बीमार पिता को उन दिनों संग्रहणी नामक एक लाइलाज बीमारी  हो गयी थी जिसके कारण उनका स्वास्थ्य बहुत ख़राब होता चला गया ! लोगो के लाख कहने ने बावजूद उन्होंने अपने इलाज़ के लिए बरेली जाने से मना कर दिया था ! उन्हें एक चिंता रहती थी कि वे बच नहीं पायेंगे और उन दिनों इस लाइलाज बीमारी के लिए वे अपनी जमीन बेचना नहीं चाहते थे ! वे अंतिम समय, अपनी चिंता न कर, मेरे  भविष्य के लिए अधिक चिंतित थे ! इस चिंता को वे अपनी दोनों विवाहित पुत्रियों से , व्यक्त किया करते थे !अंततः पिता के न रहने पर, बड़ी दीदी (कुसुम ) मुझे अपने साथ ले आयीं उसके बाद की मेरी परिवरिश बड़ी दीदी ने की, जिन्होंने अपने सात बच्चों के होते हुए भी, मुझे माँ की कमी महसूस नहीं होने दी ! अगर वे न होतीं तो शायद मेरा अस्तित्व ही न होता !अक्सर अकेला होता हूँ तो मन में, अपनी माँ का चित्र बनाने का प्रयत्न अवश्य करता हूँ ! बिलकुल अकेले में याद करता हूँ , जहाँ हम माँ बेटा दो ही हों , बंद कमरे में ....भगवान् से अक्सर कहता हूँ कि मुझ से सब कुछ ले ले... पर माँ का चेहरा केवल एक बार दिखा भर दे...बस एक बार उन्हें प्यार करने का दिल करता है, केवल एक बार ...कैसी होती है माँ ...??​
​​
ये है सतीश सक्सेना भाई जी के गीत-संग्रह मेरे गीत की भूमिका को लेकर लिखी पोस्ट की आरंभिक पंक्तियां...​

अभी मैं हास्पिटल में भर्ती था, तो सतीश भाई मेरा हाल-चाल पूछने आए...साथ ही मेरे गीत की एक प्रति भी साथ लेते आए...कि मेरा खाली वक्त इसे पढ़ कर कट जाएगा...मैंने सतीश भाई से कहा भी कि आपने पुस्तक की सबसे पहली प्रतियों में से एक मुझे पहले ही भेंट कर रखी है...उसे मैं घर से मंगा लूंगा, इसे किसी और को भेज दें...इस पर सतीश भाई ने अपनी पेटेंट स्माईल के साथ कहा, इसे आप ही जिसे चाहें भेंट कर देना...सतीश भाई, वही आपको बताना चाहता हूं कि इस प्रति को एक ऐसे शख्स को भेंट किया, जिसकी कहानी सटीक वैसी ही है, जैसा कि आपने किताब की भूमिका  में अपने बचपन का ज़िक्र किया है...​

ये शख्स और कोई नहीं, हास्पिटल में डबल रूम में मेरे साथ का ही पेशेंट था...पैंतीस-छत्तीस साल का सुदर्शन युवक...किसी रियल्टी सेक्टर की फर्म में मैनेजर​ के पद पर तैनात..नाम-सुरेश...मंने नोट किया कि सुरेश अक्सर अपने बच्चों को मोबाइल पर हिदायतें देता रहता था...होमवर्क कर लिया...आपस में लड़ना नहीं...छोटे भाई-बहन का ख्याल रखना...जो समझ नहीं आ रहा वो प्रोजेक्ट मैं घर आने के बाद करा दूंगा..मैं हैरान था कि सुरेश को मिलने उसके सब घर वाले बच्चे, माता-पिता, भाई-भाभी समेत दूसरे रिश्तेदार आते थे, लेकिन उसकी पत्नी कभी नहीं आई...मैंने पूछना भी मुनासिब नहीं समझा...

मिलनसार होने के बावजूद सुरेश अपनी बीमारी को लेकर काफ़ी चिंतित दिखता था...दरअसल उसका बुखार नहीं ​जा रहा था..फेफड़ों में कुछ इन्फेक्शन था...डाक्टर रोज़ तरह तरह के महंगे टेस्ट करा रहे थे, लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुच पा रहे थे...यहां तक कि बायोप्सी के लिए उसके सेम्पल भेजे गए थे, जिसकी रिपोर्ट दस-पंद्रह दिन में आनी थी...एक डाक्टर ने डरा भी दिया कि कुछ भी हो सकता है...इसने सुरेश की परेशानी को और बढ़ा दिया था...

एक दिन सुरेश रूम से बाहर गैलरी में टहलने के लिए निकला तो उसके बुजुर्ग पिता मुझसे बात करने लगे...उन्हीं से​ पता चला कि सुरेश की पत्नी दो साल पहले दिल की बीमारी की वजह से चल बसी थी..तीन बच्चों को छोड़कर...बड़ा लड़का अब ग्यारह साल का है, बिटिया नौ साल की और छोटा बेटा छह साल का...एक दिन तीनों बच्चे हास्पिटल आए तो मैंने देखा कि बड़ा लड़का इस छोटी सी उम्र में ही काफ़ी गंभीर दिख रहा था...सुरेश के पिता से ही पता चला कि सुरेश की पत्नी भी बहुत ज़हीन, सुशील और घर में सब का ख्याल रखने वाली थी..उसके इलाज के लिए सुरेश अपने प्लाट वगैरहा  बेच कर अमेरिका जाने की तैयारी कर रहा था कि वो पहले ही भगवान के घर चली गई..मैंने सुरेश के पिता से पूछा कि घर पर इन बच्चों की देखरेख कौन कर रहा है...क्योंकि सुरेश के माता-पिता दोनों ही सरकारी नौकरी में हैं...इस पर सुरेश के पिता ने बताया कि बच्चों की अविवाहित बुआ (फिजीकली चैलेंज्ड) ही उनका सारा ख्याल रखती है...​सुरेश के पिता ने ये भी बताया कि इससे दूसरी शादी के लिए कहो तो भड़क जाता है...कहता है कि मैं बच्चों को लेकर कोई रिस्क नहीं ले सकता...
​​
ये सब जानने के बाद ये सोचकर मेरा कलेजा मुंह को आ रहा था कि सुरेश की बीमारी को लेकर ऊपर वाला और कोई नाइंसाफ़ी न कर दे...मुझे रह-रह कर उसके बच्चों का ही चेहरा याद आ रहा था...जिस डाक्टर ने सुरेश को डराया था, वो सुरेश के सवालों का हमेशा उल्टा-सीधा ही जवाब देता था...आराम न आने की वजह से सुरेश ने उस डाक्टर को ही बदल दिया...नये डाक्टर ने सुरेश को मनोवैज्ञानिक तरीके से बड़ी अच्छी तरह हैंडल किया...फिर एक दिन उसी डाक्टर ने अच्छी खबर सुनाई कि उसे कोई लाइलाज बीमारी नहीं बल्कि टीबी से मिलता जुलता ही कोई इन्फेक्शन है जो लगातार दवा खाने से से ठीक हो जाएगा...ये सुनकर सुरेश और उसके घर वालों ने राहत की सांस ली और मैंने भी ऊपर वाले का शुक्रिया कहा...

हास्पिटल से मेरी छुट्टी पहले हुई...चलते वक्त मैंने सुरेश को सतीश भाई की मेरे गीत की प्रति दी और भूमिका ज़रूर पढ़ने के लिए कहा...छोटी उम्र में ही मां के बिछुड़ जाने का क्या दर्द का होता है...ये सतीश भाई से बेहतर    और कौन जान सकता है...​
​​
(एक अच्छी खबर ये कि मेरे हास्पिटल में रहने के दौरान ही मेरे बेटे सृजन का देश के सबसे प्रतिष्ठित कालेज सेंट स्टीफंस, दिल्ली में एडमिशन हो गया...ये आप ​सब की शुभकामनाओं का नतीजा है)