बुधवार, 27 जून 2012

के बीमार का हाल अच्छा है...खुशदीप


अच्छे ईसा हो मरीज़ों का ख़याल अच्छा है, 
हम मरे जाते हैं तुम कहते हो हाल अच्छा है...
उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक,
वो समझते हैं के बीमार का हाल अच्छा है...
रोज़ आता है याँ मेरे दिल को तसल्ली देने,
तुझसे तो दुश्मन-ए-जाँ तेरा ख़याल अच्छा है...​
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​ये जो कुछ भी कहा गया है, ये सब कमबख्त ब्लॉगिंग के लिए है...​दारू तो बेचारी यूहीं बदनाम है, दरअसल चचा ग़ालिब ने एडवांस में  ब्लॉगिंग के लिए ही ये फ़रमाया था कि छूटती नहीं हैं ये काफ़िर मुंह से लगी हुई...​​वाकई एक बार ग़ालिब साहब इस शौक को आज़मा लेते तो लाल परी भी इस सौत के ग़म में हर वक्त लाल-पीली हुई कुढ़ती रहती...​

चलिए अब आता हूं अपनी तबीयत पर...कभी खुद को स्टोन-व्टोन पहनने का शौक रहा नहीं...ऊपर वाले का करम देखिए कि शरीर के बाहर न सही शरीर के भीतर ही दो तीन स्टोनों की नेमत बख्श दी...एक स्टोन महाराज इतने खुराफाती निकले ​कि गाल ब्लैडर की नेक में फंस कर उसका टेंटुआ   ही दबा दिया...यानि खाया-पिया न कुछ अंदर जाने देंगे और न ही बाहर आने देंगे...रही सही कसर लिवर महाराज ने पूरी कर दी...एक्यूट कोलेसिस्टिस ( जान्डिस) का पूरा प्रकोप  दिखा कर...



डाक्टर को इन्फैक्शन दूर करने के लिए ही हफ्ते भर​ अस्पताल में भर्ती करना पड़ा...छुट्टी तो मिल गई है, लेकिन अभी वीकनेस बहुत है...​ये पूरा महीना ही बीमारी के नाम चढ़ गया...​ इस दौरान दिनेशराय द्विवेदी सर, समीर लाल जी, महफूज़, शाहनवाज़ और राकेश कुमार जी (मनसा वाचा  कर्मणा) लगातार फोन पर मेरा हाल लेते रहे...अदा जी, शिखा वार्ष्णेय, शिवम ​मिश्रा,  सर्जना शर्मा जी ने भी फोन पर तबीयत जानी और जल्द स्वस्थ होने के लिए शुभकामनाएँ दीं...

पाबला जी ने भी फोन और एसएमएस  किया, लेकिन मैं बेसुध होने की वजह से उनसे बात नहीं कर पाया...​​​इसके अलावा मेरे ब्लॉग पर भी अनूप  शुक्ल जी, रचना जी,वाणी गीत जी, अरविंद  मिश्र जी,अंशुमाला, प्रवीण  शाह भाई, सोनल   रस्तोगी,अंतर सोहिल,  संजय   (मो सम  कौन),अनुराग  भाई (स्मार्ट  इंडियन), दीपक  बाबा, डा अजित गुप्ता जी और डा टी एस  दराल  सर  ने मेरे शीघ्र स्वस्थ होने के लिए कामना की...​राकेश  कुमार जी अपनी पत्नी (मेरी दीदी शशि जी) के साथ  अस्पताल  मुझे देखने के लिए आए और दो घंटे वहां बैठे रहे...​
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​ठहरिए  पिक्चर अभी बाक़ी है दोस्त...अभी एक  शख्स का ज़िक्र  रह  गया है...मेरे इस बुरे दौर में ये शख्स न जाने कितनी बार मेरे पास  अस्पताल  आया...न  जाने कितनी बार इस  शख्स ने मुझे फोन  किया...यानि बड़े भाई  होने का फर्ज़  निभाया....ये शख्स  और कोई  नहीं सतीश  सक्सेना भाई हैं...विडंबना देखिए  कि  सोलह  जून  को सतीश भाई  के काव्य -संग्रह  मेरे  गीत का विमोचन था और उसी दिन  दोपहर को मुझे अस्पताल  ले जाया गया...सतीश भाई  से मैंने वादा किया था कि  मैं ज़रा भी सही हूंगा तो ज़रूर कार्यक्रम में हिस्सा लूंगा...क्योंकि ये सतीश भाई का नहीं, मेरा अपना कार्यक्रम था...लेकिन  ऐन  वक्त  पर  ऊपरवाला दग़ा दे गया...​
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सतीश  भाई, आपके लिए  एक  बात और...आपने मुझे अस्पताल  में मेरे गीत की जो प्रति दी, उसका इतना सदुपयोग हुआ  है कि आपके व्यक्तित्व और ​कृतित्व पर  बिल्कुल  सटीक  बैठता है...ये पूरी कहानी अगली पोस्ट में बताऊंगा...शरीर में थोड़ी और ताक़त आने के बाद...
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बुधवार, 13 जून 2012

​'सूर्यमाल के सप्तक'...​​खुशदीप


आपने अपने हिंदी ब्लॉग  को एलीट, अभिजात्य, कुलीन, संभ्रात, विद्वत ब्लॉगरों से मान्यता दिलानी है, तो आपको अपने लेखन में आमूल-चूल परिवर्तन  करने होंगे...​सबसे पहले आपको लेखन की इस तरह की शैली को तजना होगा जो पहली बार पढ़ने मॆं ही किसी की समझ में आ जाए...भला इस  तरह का लेखन भी कोई  लेखन हुआ...जब तक कुछ शब्दों का अर्थ समझने के लिए शब्दकोष, दिग्दर्शिकाओं को कंसल्ट करने की ज़रूरत  न पड़े तो बेकार है आपका लेखन....​
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आपके ब्लॉग का नाम  भी 'किंकर्तव्यविमूढ़'  या 'दैदीप्यमान'  जैसे ही क्लिष्ट से क्लिष्ट हिंदी शब्द पर होना चाहिए...पाठकों को नाम समझने में कसरत करने के साथ इसे बोलने में भी उनकी जीह्वा मुड़-तुड़ न जाए  तो व्यर्थ है आपका रचनात्मक कौशल...​

पत्रकारिता में एक बात  पर बहुत ज़ोर दिया जाता है कि आपकी रिपोर्ट धाराप्रवाह होने के साथ आम बोलचाल  की भाषा में होनी चाहिए...खास तौर पर टीवी रिपोर्टिंग ...​टीवी की रिपोर्ट के दर्शकों में विश्वविद्यालय का कोई  प्रोफेसर भी हो सकता है और कम पढ़ा-लिखा कोई रिक्शा-चालक भी...अब ये पत्रकार के शब्दों का कौशल  होगा कि प्रोफेसर और  रिक्शा-चालक  समान रूप से उसकी रिपोर्ट को आत्मसात कर सकें...प्रोफेसर तो आपके क्लिष्ट शब्दों को भी समझ  लेगा लेकिन  बेचारे रिक्शा-चालक  के साथ ये अन्याय  होगा...लेकिन  ब्लॉगिॆग  का परिवेश बिल्कुल  दूसरा है...यहां​ आपके विद्वत  और  गंभीर  लेखन  के ठप्पे के लिए सुगम सुग्राह्य शैली में लिखना घातक  सिद्ध  होगा...​ये कोई  मायने नहीं रखता कि स्टैटकाउंटर  पर आपके ब्लॉग  को पढ़ने वालों का आंकड़ा कितना है...आपकी अलैक्सा रैंकिंग  कितनी है...​ये मानकर  चला जाएगा कि ये सारी पठनीयता ऋणात्मक  है, धनात्मक  नहीं...​

अब आपको 'सूर्यमाल  का सप्तक' बनना है तो आपको कभी कभी इस  तरह  की कलमतोड़  शायरी भी करनी होगी...​
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बड़ी चाहत है कि फ़ुरसत के साथ 
बैठें,

लेकिन कमबख़्त फ़ुरसत  को ही फ़ुरसत  कहां...
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​विद्वतता के सागर में आपको हलचल मनानी है तो कभी किसी पोस्ट में आपको बीथोविन  की सिम्फनी की झंकार छेड़नी होगी...कभी महान ओपेराकार मोज़ार्ट के इडोमोनिया की याद दिलानी होगी...कभी अर्नेस्तो "चे" गेवारा की क्यूबा की क्रांति के ज़िक्र के साथ  समाजवाद का अलख  जगाना होगा...​​ऐसे आंचलिक  और  देशज  शब्दों का भी बहुतायत  में प्रयोग  करना होगा जिससे आपके ठेठ शहरी होने के बावजूद ज़ड़ों की मिट्टी की खुशबू का एहसास दिया जाता रहे...​



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​ब्लॉगिॆग  में ये फंडे अपनाएंगे  तो लुडविग वेन बीथोविन की तरह  दस्सी के अंक से आपको कोई चाह कर भी दूर नहीं रख  सकेगा...बीथोविन के लिए 1805 से 1812 का दौर उनके जीवन में दस्सी का अंक लेकर आया...दस्सी के अंक से मतलब उस पीरियड से है, जब किसी कलाकार का सृजन उत्कर्ष पर रहता है और वह दोनों हाथ से सफलता और कीर्ति बटोरता है...


​​तबीयत  ख़राब  होने के दौर में ये किस तरह  की पोस्ट लिख  गया...और क्लिष्ट  बनाने  के लिए शायद  ज्यामिति की किसी अनसुलझी प्रमेय  का उल्लेख और किया जाना चाहिए था...