शनिवार, 26 मई 2012

हाय राम, कैसे होगा ब्लॉगिंग का उत्थान...खुशदीप​​




आजकल  ब्लॉगिंग  में दूसरों को उपदेश  देने वालों की बाढ़  सी आ गई  है...कोई  मर्यादा का पाठ  पढ़ा रहा है...कोई टिप्पणी विनिमय का शिष्टाचार  सिखा रहा है...कोई  भाषा पर सवाल  कर रहा है...कोई  इसी फिक्र में ही कांटा होता जा रहा है कि हिंदी ब्लॉगिंग का उत्थान  कैसे होगा...कई  तो ब्लॉगिंग  ही इसीलिए  कर रहे हैं कि किसी पोस्ट पर कुछ  ऐसा मिले कि पलक झपकते ही उसे​ लताड़ते हुए  पोस्ट तान दी जाए...हिंदी ब्लॉगिंग की यही सबसे बड़ी खामी है कि यहां अपने लिखने पर  ध्यान  देने की जगह  इस  बात  में ज्यादातर  घुले जा रहे हैं कि दूसरे क्या लिख  रहे हैं...​
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​ब्लॉगिंग को  सीमाओं से बंधे तालाब  की जगह  ऐसी उफनती नदी की तरह होना चाहिए जो पहाड़ों को भी काटते हुए अपना रास्ता खुद  बनाती चले..इसलिए  हर ब्लॉगर विशिष्ट  है, और उसे अपने हिसाब  से ब्लॉगिंग की छूट  होनी चाहिए...अगर  गलत  करेगा तो किसी की नज़र  से छुपा नहीं रह  सकेगा...आजकल  किसी को एक्सपोज़  होने में ज़्यादा देर नहीं लगती...फिर अगर कांटे नहीं होंगें तो फूलों की पहचान  कैसी होगी...इस ​मामले में मुझे याद  पड़ता है कि महागुरुदेव  अनूप  शुक्ल भी पहले सचेत  कर चुके हैं कि यहां सब  ज्ञानी है, इसलिए  ज्ञान  बखारने की जगह  सिर्फ खुद  को ही सुधारने की कोशिश  करनी चाहिए...​

यहां ऐसा भी है कि खुद  अलोकतांत्रिक  तरीके अपनाए  जा रहे हैं और दूसरों को दुनिया जहां की नसीहतें दी जाती हैं...मैं जब से ब्लॉगिंग कर रहा हूं माडरेशन  को मैने हमेशा दूसरों की अभिव्यक्ति को घोंटने का औज़ार माना है...अब  तो टिप्पणी आप्शन  बंद  करने और ब्लॉग को आमंत्रित  सदस्यों के लिए  रिज़र्व  रखने का भी ट्रेंड  शुरू हो गया है...

खैर, हर  किसी को अपने हिसाब  से ब्लॉगिंग की छूट  है...लेकिन  ये कहां तक  सही है कि आप  ब्लॉग ​को सिर्फ  आमंत्रित सदस्यों के लिए सीमित  कर दें और उसे एग्रीगेटर  पर  भी बनाए  रखें...आप  खुद  ही सोचिए  कि  आप  एग्रीगेटर के ज़रिए किसी पोस्ट को पढ़ने के लिए  पहुंचे और वहां नोटिस  लिखा मिले कि आप  इस  पोस्ट को पढ़ने के हक़दार  नहीं हैं तो आप को कैसा लगेगा...एक   तरफ  आप  कहते हैं कि बीस​ पाठक  भी बहुत  है सार्थक  विमर्श  के लिए और दूसरी तरफ पाठक बढ़ाने के लिए आप एग्रीगेटर पर मौजूदगी बनाए रखें...ये उस पाठक के लिए वैसा ही है जैसे कि वो बिना बुलाए मेहमान की तरह  ही किसी के घर पहुंच गया...और जब लोगों के पास टाइम  की कमी है, ऐसे में उसके दो मिनट भी इस काम  में व्यर्थ  जाते हैं तो ये उसके साथ  अन्याय  ही है...

चलिए अब  गाना सुनिए...ये जो पब्लिक है, ये सब  जानती है...​


गुरुवार, 24 मई 2012

टैकल पेट्रोल हाइक मक्खन स्टाइल...खुशदीप



सरकार बड़ी समझदार है...उसने पेट्रोल के दामों में साढ़े सात रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी सब सोच-समझ कर की है...सरकार को पता है कि तीन-चार दिन देश भर में हो-हल्ला होगा...कुछ ज़्यादा ही हुआ तो सरकार दो-ढाई रुपए का रोल-बैक कर लेगी...फिर जनता भी खुश...चलो कुछ तो सरकार को झुकाया...लेकिन मक्खन सरकार से भी ज़्यादा स्याना है...देखिए उसने पेट्रोल बढ़ोतरी से निपटने के लिए क्या-क्या रास्ते निकाले हैं...

मक्खन पेट्रोल पंप पहुंचा...

पंप अटैंडेंट ने पूछा...कितने का पेट्रोल डालूं...

मक्खन....दस-बीस रुपए का दे दे...

अटैंडेंट....क्यों मज़ाक कर रहे हो साहब...

मक्खन...ओए, मैं टंकी में नहीं कार के ऊपर स्प्रे करने को कह रहा हूं...इसे यहीं आग लगानी है...

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वैसे पेट्रोल दामों में बढ़ोतरी से निपटने का मक्खन का इससे पहले तक दूसरा फंडा था...

एक शख्स ने कहा...ये पेट्रोल की आग़ तो जेब को राख़ करके छोड़ेगी....

मक्खन...साणूं ते कोई फर्क नहीं पैंदा...सरकार जो मर्ज़ी कर लए...असी ते पहले वी सौ रुपइए दा पेट्रोल पवां दे सी...हुणे वी सौ रुपइए दा ही पवां दे वां...

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ट्रैफिक  पुलिस  वाले अब  चैन  की सांस  ले सकते हैं..अब  उन्हें शराब  पीकर गाड़ी चलाने वालों को पकड़ने की नौबत नहीं आएगी...​​​

आखिर ऐसे कितने लोग  होंगे जो एक  दिन  में ही पेट्रोल  और एल्कोहल  दोनों को एफोर्ड  कर  सकें...

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और ये  रहे सबसे बढ़िया इलाज़...बस आपको गाड़ी चलाने की ऐसे प्रैक्टिस करनी होगी....




सोमवार, 21 मई 2012

ब्लॉगिंग उड़ान भरने के लिए तैयार...खुशदीप

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थिंक  पाज़िटिव...बी पाज़िटिव...​  

ब्लॉगिंग  उड़ान  भरने के लिए  तैयार...

जी हां...हिंदी ब्लॉगिंग  शीघ्र  ही विश्व में उस  मकाम  को प्राप्त  कर लेगी जिसके लिए ये पिछले एक दशक (?) से प्रयासरत  है...बस कान्फिडेंस  होना चाहिए...इसके  लिए  'गुरमुख आफ फगवाड़ा' को रोल माडल बनाया जा सकता है...आप कहेंगे भाई ये गुरमुख कौन ?...​

इनका आज  ही मैंने परिचय जाना...खुशवंत  सिंह के साप्ताहिक कालम 'With malice towards one and all' में दिल्ली के परमजीत सिंह कोचर के सौजन्य से...आप भी मुलाहिज़ा फ़रमाइए...​

राष्ट्रपति ओबामा ओवल आफिस  में गहन  चिंतन मुद्रा में बैठे हैं...ये सोचते हुए  कि अब अकारण  किस  देश  पर हमला करना है...तभी उनके फोन  की रिंग बजती है...''हेलो, मिस्टर ओबामा'' ...दूसरी तरफ  से मोटी सी आवाज़  आती है...''दिस  इज़  गुरमुख  फ्राम  फग़वाड़ा, डिस्ट्रिक्ट  कपूरथला, पंजाब ...मैंने फोन ये जानकारी देने के लिए किया है कि हम आधिकारिक तौर पर अमेरिका के ख़िलाफ़  जंग  शुरू करने जा रहे हैं''...​
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''वेल  गुरमुख''...ओबामा ने जवाब  दिया...''ये तो वाकई  अहम  खबर है..तुम्हारी फौज  कितनी बड़ी है''...​


''अभी इस  वक्त''...गुरमुख  ने कुछ  हिसाब  लगाते हुए  कहा...''मैं, मेरा चचेरा परा सुखदेव, मेरा पड़ोसी भगत और हमारी कब्बडी टीम...कुल मिलाकर हम आठ हैं''...​


ओबामा ने कुछ रूक कर कहा...''हूं...गुरमुख,  क्या मैं बता सकता हूं कि मेरे दस लाख  सैनिक  किसी भी वक्त  मेरी कमांड  पर मूवमेंट के लिए तैयार हैं''...​


''ओह, हो...मैं क्या जी''..गुरमुख  कुछ  सोचते हुए...'मैं बाद  में काल करता हूं''...​


अगले दिन ओबामा को फिर गुरमुख की काल...''मिस्टर  ओबामा, इट इज़  गुरमुख...मैं फगवाड़ा  के  एसटीडी बूथ  से काल  कर  रहा हूं...जंग  जारी है...हमने कुछ इन्फैंट्री इक्विपमेंट्स  इकट्ठा कर  लिए हैं''...​
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​ओबामा...''इट  सीम्स  इंटरेस्टिंग...गुरमुख   किस   तरह   के  इक्विपमेंट्स  हैं  ये''...
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​गुरमुख ...''हमारे  पास  दो कंबाइन्स हैं...एक   गधा  और  अमरीक  का  एक ट्रैक्टर''...​

ओबामा ठंडी  सांस  लेते हुए...''गुरमुख,  मैं बताना चाहूंगा कि हमारे  पास  सोलह  हज़ार  टैंक्स,  चौदह   हज़ार  बख्तरबंद  गाड़ियां  है...और   हमारे  पिछली  बार   बात   करने  के  बाद  से   हमारी  सेना  भी  बढ़कर   पंद्रह   लाख   हो  चुकी है''...​


''ओ    तेरी''....गुरमुख  के मुंह  से ये निकला...साथ   ही उस ने  फिर  फोन  करने  की  बात   कही...​
अगले  दिन  गुरमुख   का  फिर  फोन...''मिस्टर  ओबामा....हमारी  तरफ़  से जंग  अब  भी  जारी है...हम  इस  बीच  में खुद  को एयरबार्न  करने  में कामयाब  हुए  है...हमने  अमरीक   के ट्रैक्टर  पर  दो शाटगन्स लगाने के अलावा  कुछ  पर  भी  लगा  दिए  है...साथ  ही पिंड  का जेनेरेटर  भी  फिट  कर  दिया  है...मालपुर  के चार  स्कूल  पास  लड़के  भी  हमसे  आ   जुड़े  हैं''...​


ओबामा  ने  एक   मिनट  चुप  रहने  के बाद  गला साफ़   करते हुए  कहा...''आई  मस्ट  ​टेल   यू,  गुरमुख ,  मेरे  पास   दस  हज़ार  बाम्बर्स  हैं...बीस  हज़ार  फाइटर्स  प्लेन  हैं...हमारा  मिलिट्री  काम्पलेक्स  चारों ओर  से  लेज़र  गाइडेड  सरफेस  टू  एयर  मिसाइल्स  साइट   से घिरा  है...और  अब  तक  हमारे सैनिक  भी  बीस  लाख  हो चुके हैं''...


''तेरा  भला  होए ...ओ''...गुरमुख   ने  कहा...''मैं फिर  फोन  करता  हूं''...​


अगले दिन  गुरमुख का  फोन...''किदां (कैसे हो) मिस्टर  ओबामा....मुझे खेद  के साथ  बताना पड़  रहा है कि हमने जंग  खत्म करने का फैसला किया है''...​


ओबामा...''ये अचानक दिल  बदलने का कारण''...


गुरमुख...''वेल...हम  सबने आपस में लस्सी सेशन  में काफ़ी  देर  तक  बात  की...और  फिर  इस  नतीजे  पर  पहुंचे कि फिलहाल हमारे पास  बीस  लाख  युद्धबंदियों को खिलाने-ठहराने का बंदोबस्त नहीं है''...​


इसे कहते है पंजाबी  कान्फिडेंस....

रविवार, 20 मई 2012

ये सम्मानों की दुनिया...खुशदीप





ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है,
​​ये ब्लागों, ये आयोजनों, ये सम्मानों की दुनिया...


ये भाईचारे की दुश्मन  गुटबाज़ी की दुनिया,​
​ये नाम  के भूखे रिवाज़ों की दुनिया,​
​ये दुनिया अगर  मिल  भी जाए  तो क्या है...​
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​हर  इक  जिस्म घायल, हर इक  रूह  प्यासी​,
​निगाहों में उलझन, दिलों में उदासी,​
​ये दुनिया है  या आलम-ए-बदहवासी,​
​ये दुनिया अगर  मिल  भी जाए  तो क्या है...
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यहां इक वोट  है ब्लागर  की हस्ती,​
​ये बस्ती है जुगाड़  परस्तों की बस्ती,
​यहां दोस्ती तो क्या दुश्मनी भी नहीं सस्ती,
ये दुनिया अगर  मिल  भी जाए  तो क्या है...
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​ये दुनिया जहां आदमी कुछ  नहीं है,​
​वफ़ा कुछ  नहीं है, दोस्ती कुछ  नहीं है,​
​यहां इंसानियत  की कदर ही कुछ  नहीं है,​
​ये दुनिया अगर  मिल  भी जाए  तो क्या है...
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​जला दो, इसे फूंक  डालो ये दुनिया,​
​मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया,​
​तुम्हारी है, तुम्ही संभालो ये दुनिया,​
​ये दुनिया अगर मिल जाए भी तो क्या है...



रविवार, 13 मई 2012

आमिर की आंधी से किसकी चांदी...खुशदीप



कितने पावन  हैं लोग  यहां,​
​मैं नित  नित  सीस  झुकाता हूं,
​भारत  का रहने वाला हूं, 
भारत  की बात  बताता हूं...​
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​वाकई मेरे देश के लोग बहुत भोले हैं...पहले अन्ना की धारा में बह रहे थे...अब आमिर की आंधी से धन्य हो रहे हैं...खुश  हैं कि जनहित से जुड़े ​मुद्दों को टीवी पर गंभीरता से उठाए जाने की सार्थक  पहल  हुई है...पहली कड़ी में कन्या भ्रूण  हत्या, दूसरी कड़ी में बच्चों के यौन शोषण  का मुद्दा...​दोनों ही संजीदा विषय...

ऐसा नहीं कि पहले इन मुद्दों पर कभी कुछ हुआ  ही नहीं...कई अनसंग हीरोज़  समाज  की नासूर इन  बुराइयों के ख़िलाफ़​ न जाने कब से जंग छेड़े हुए हैं..बेशक उनकी आवाज़  नक्कारखाने में तूती ही साबित हुई...लेकिन छोटे ही सही अपने सीमित  क्षेत्रों में वो बदलाव लाने ​में सफल  हुए...लेकिन  आमिर का हाउसहोल्ड चेहरा अब दर्द  की मास-मार्केटिंग कर रहा है...

एक  तरफ़  प्रोग्राम  चलता है, साथ  ही देश के​ सबसे अमीर व्यक्ति मुकेश अंबानी की पत्नी नीता अंबानी भी एड के ज़रिए  रिलायंस का मानवतावादी चेहरा गढ़ने की कोशिश  करती नज़र आती हैं..​रिलायंस  इस  प्रोग्राम  का पार्टनर भी है...ये ऐलान  किया जाता है कि जितना पैसा एसएमएस  के ज़रिए कल्याणकारी संस्थाओं के लिए आएगा,​ उतना ही पैसा रिलायंस  अपनी ओर से देगा...
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आज  रिलायंस  का न  देश  के एक  बड़े इलैक्ट्रोनिक मीडिया समूह पर कब्जा है बल्कि दूसरे मीडिया संस्थानों में भी अपने हिसाब से वो ख़बरे प्रचारित -प्रसारित  करने की हैसियत  रखता है..अभी ऐसी ही एक  मिसाल  देखने को मिली, जिसमें ख़बरों में रिलायंस  को कर्ज  मुक्त कंपनी बता दिया गया... 
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देश  का कारपोरेट बड़ा समझदार है...गरीब-मजदूरों का हक  मारकर ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ा कमाने में पूरी दुनिया में इनका कोई सानी नहीं...सरकार ​को साधे रखकर अपने मन-मुआफिक नीतियां बनवाने में ये सिद्धहस्त हैं...और कुछ  हो न हों इनके पीआर, मीडिया रिलेशंस  डिपार्टमेंट बहुत मजबूत ​हैं...इनकी कमान  रिटायर्ड  नौकरशाहों या इसी फील्ड के पूर्व  दिग्गजों के हाथ में रहती है...अब सामाजिक  सरोकारों में अपनी भागीदारी  दिखाना इनका नया शगल  है...ठीक  वैसे ही जैसे अपना दिल  बहलाने के लिए आईपीएल  तमाशे में अपने लिए एक क्रिकेट टीम खऱीद कर रखते हैं...



पिछले साल  दुनिया के अस्सी देशों के 150 शहरों में कारपोरेट  की साम्राज्यवादी और पूंजीवादी नीतियों के खिलाफ  सशक्त  विरोध की आवाज़ उठी...आक्यूपाई वाल  स्ट्रीट...मैनहट्टन  से उठी इस  आवाज  से जब  विकसित  देशों के कारपोरेट  आक्रांत थे, उस वक्त भारत में जनविरोध अन्ना की लहर पर सवार था..

देश  का कारपोरेट  वर्ग  बहुत  समझदार है...प्रैशर  कुकर के वाल्व की तरह  जनता के आक्रोश को निकालने के लिए  ये कई तरह के प्रयोगों को फंडिंग करता रहता है...जिससे जनता दूसरे मुद्दों में ही उलझी रहे और उसके गुस्से की धार कभी कारपोरेट की तरफ न मुड़ सके...सामाजिक  मुद्दों में जनता को भरमाने या उलझाए रखने के लिए अब बहुत सोच समझ कर सत्यमेव जयते की रूपरेखा तैयार की गई...भ्रष्टाचार ​के खिलाफ  आंदोलन के लिए अन्ना जैसे ईमानदार साख  वाले शख्स को ब्रैंड बनाया गया...तो अब कारपोरेट के जनसरोकारी चेहरे को घर-घर में चमकाने​ के लिए आमिर खान जैसे हाउसहोल्ड चेहरे को चुना गया...

आमिर की व्यावसायिक  सोच बेजोड है..अपनी हर  फिल्म  की रिलीज से पहले वो नई से नई  मार्केटिंग  गिमिक  चल कर बाक्स आफिस पर जबरदस्त ओपनिंग लेते रहे हैं...इस मामले में उनकी तारीफ करनी होगी कि टीवी पर अपने पहले शो के लिए भी उन्होनें जबरदस्त होमवर्क  किया...लेकिन यहां आमिर  सिर्फ  मोहरा मात्र हैं...इस पूरे खेल की डोर उन्हीं हाथों में है जो दिखाने को गरीब के बच्चे को गोद में उठाते हैं...लेकिन  सिर्फ  इसीलिए  कि गरीब का गुस्सा कहीं एंटीलिया जैसे महज़  एक खरब रुपएकी लागत से बने उनके आशियाने की तरफ़  न  मुड़  जाए...
एंटीलिया का एक  बाथरूम

शनिवार, 12 मई 2012

सूखे में आमरस...खुशदीप


बहुत हुई आंख-मिचौली, खेलूंगी मैं रस की होली...​​
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कैटरीना कैफ़ की ये एड  देखकर आपका मन भी आम या आमरस के लिए मचलने लगा है तो ख़बरदार....

​राज  ठाकरे की आप पर नज़र हो सकती है...महाराष्ट्र में आमरस (Mango-pulp) का आनंद लेना बड़ा महंगा हो सकता है...उत्तर भारतीयों पर आंखें तरेरते रहने​ वाले राज  ठाकरे के शब्दबाणों का रुख़ अब जैन समुदाय की तरफ़ हुआ  है...दरअसल, मुंबई में भगवान महावीर की मूर्ति लगने के 200 साल पूरे हो ने के उपलक्ष्य में इस समुदाय के एक धनी व्यक्ति ने शहर के सभी जैनियों के घर आमरस और पूरियां भिजवाने की व्यवस्था की...



राज ठाकरे को जैन समुदाय की यह बात खटक गई और इससे बहुत नाराज हैं...राज ठाकरे का कहना है कि जैन समुदाय के लोग आमरस-पूरी का भोज कैसे दे सकते हैं, जबकि महाराष्ट्र के बड़े हिस्से में लोग सूखे की मार झेल रहे हैं...उन्होंने धमकी दी है कि अगर उन्हें कोई भी शख्स आमरस-पूरी बांटते हुए दिखा तो उसके खिलाफ कड़ा ऐक्शन लिया जाएगा...मजे की बात यह है कि एमएनएस इस बात को समझा पाने में असमर्थ है कि राज ठाकरे का यह फतवा राज्य में सूखा पीड़ित लोगों को राहत कैसे पहुंचा पाएगा...

महाराष्ट्र के कुछ  हिस्सों में पिछले 40 साल  का सबसे भीषण  सूखा पड़ा है...सूखे पर राजनीति सिर्फ  राज  ठाकरे ही नहीं कर रहे...केंद्रीय  राहत  पैकेज के ऐलान  को लेकर कांग्रेस  और एनसीपी ​में  श्रेय लेने की  होड़  मची  हुई है...मज़े की बात  है कि अभी तक  केंद्रीय पैकेज  का  ऐलान  भी नहीं हुआ है...शिवसेना की ओर से आरोप लगाया जाने लगा है कि एनसीपी मुखिया और कृषि मंत्री शरद पवार केंद्रीय मदद का बड़ा हिस्सा अपने इलाकों में ले जाना चाहते हैं...लेकिन  इसी शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष  उद्धव  ठाकरे ठाणे एक  लाइब्रेरी का विमोचन  करने जाते हैं, तो उनके स्वागत  के लिए वहां की महानगरपालिका सड़कों की धुलाई  के लिए  हज़ारों लीटर पानी बर्बाद कर देती है...

ख़ैर हमें क्या...बहुत हुई आंख-मिचौली, हम तो चले रस की होली खेलने यानी स्लाइस  पीने...

(नवभारत  टाइम्स के इनपुट  के साथ )


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पोस्ट वही जो लफ़ड़े करवाये..डॉ अमर

शुक्रवार, 11 मई 2012

कार्टून, संविधान, अंबेडकर, नेहरू, घोंघा...खुशदीप

एनसीईआरटी की 11वीं कक्षा की राजनीति शास्त्र की किताब में संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर का एक कार्टून छपा है...इसे लेकर दलित समुदाय नाराज है... इस कार्टून के जरिए बताया गया है कि संविधान बनाने की प्रक्रिया काफी सुस्‍त थी...कार्टून में अंबेडकर को एक घोंघे (snail) पर बैठा दिखाया गया है और भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू घोंघे पर कोड़े मारकर इसे तेज चलने के लिए कह रहे हैं...

कार्टून  चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट के लिए शंकर द्वारा बनाया गया है...कार्टून का विरोध करने वालों का कहना है कि इसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि एनसीईआरटी संविधान के निर्माण में हुई तीन वर्ष की देरी के लिए भीमराव अंबेडकर को जिम्मेदार ठहरा रही है...



इसी कार्टून  को लेकर शुक्रवार को संसद  के दोनों सदनों में काफ़ी हंगामा हुआ...दलित  सांसदों में इतनी नाराज़गी थी कि कांग्रेस  के ही सांसद  पी एल पूनिया ने मानव  संसाधन  मंत्री कपिल सिब्बल  से माफ़ी मांगने या इस्तीफ़ा देने की मांग कर  डाली...

भीमराव अंबेडकर के कार्टून पर हुए विवाद पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी अध्यक्ष मायावती ने कहा कि यह मामला बहुत गंभीर है और हम इस मामले को बर्दाश्त नहीं करेंगे...केंद्र सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि वो इस मामले में दोषी लोगों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करे...बाबा अंबेडकर कोई मामूली व्यक्ति नहीं थे...वो भारतीय संविधान के निर्माता थे...भारतीय संसद भी संविधान से ही चल रही है...यह अंबेडकर का अपमान नहीं है बल्कि देश की संसद का अपमान है...केंद्र सरकार को इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करके दोषियों के खिलाफ कार्रवाई शुरु करनी चाहिए...मायावती ने यह भी कहा कि वो इस मुद्दे के समाधान तक संसद को नहीं चलने देंगी...

सांसदों की आपत्ति के बाद  सिब्बल  ने सरकार की तरफ  से ऐलान किया कि कार्टून  को किताब  से हटा दिया जाएगा...लेकिन ये अब  अगले साल  ही संभव  होगा... 

सवाल  ये भी है कि अगर ये कार्टून अपने वक्त के शीर्ष कार्टूनिस्ट शंकर का बनाया हुआ है, तो उनका निधन  भी 23 साल  पहले हो चुका है...मुझे ये जानने में दिलचस्पी है कि जब शंकर ने कार्टून बनाया होगा तो राजनीतिक हल्कों समेत पूरे देश  में क्या प्रतिक्रिया हुई होगी...वैसे इस  तरह  के राजनीतिक कार्टून को बच्चों की पाठ्य पुस्तकों में शामिल करने को मैं भी नितांत गलत मानता हूं..आपकी क्या राय  है...

गुरुवार, 10 मई 2012

कॉल सेंटर टू क्राइम...खुशदीप


बड़े शहरों में कॉल सेंटर बेरोज़गारी को दूर करने का अच्छा ज़रिया बने हुए हैं...माता-पिता को भी लगता है कि बच्चे  पढ़ाई  के साथ  कॉल सेंटर में काम करके जेब खर्च  भी खुद निकाल लेते हैं तो क्या बुराई है...बच्चे कमाई खुद ही करने की वजह से खुद मुख्तार भी होना चाहते  हैं...घर की  रोक-टोक से दूर होने के लिए ये अलग कमरा लेकर रहना भी शुरू कर देते हैं...ज्यादातर ये वो बच्चे करते हैं जो छोटे शहरों से अच्छी नौकरी की तलाश में बड़े शहरों का रुख करते हैं...

अच्छी नौकरियां इस  देश  में हैं ही कितनी..बस अच्छे पैकेज की मृगतृष्णा में ये बच्चे कॉल सेंटरों के जाल में ऐसा उलझ जाते हैं कि उससे निकल ही नहीं पाते...हताशा दूर करने को नशे जैसे ऐब और करने लगते हैं...यहां नोएडा में गैरेज  किराए पर लेकर रहने वाले ऐसे कई बच्चों को मैं देखता रहता हूं...जगह कम और  डिमांड ज्यादा होने की वजह से इन गैरेज का भी सात से आठ हज़ार रुपए किराया वसूला जा रहा है...इन्हीं गैरेज में एक टायलेट और किचन  के लिए एक  शेल्फ लगा दिया जाता है...अब ये बच्चे किराया वक्त पर दे कर वहां जो मर्जी करे कोई मकान मालिक उन्हें टोकता नहीं...छोटे शहर में कोई लड़का-लड़की साथ  घूमते देखे जाएं तो आज भी कई आंखें उनकी तरफ उठ जाती हैं...लेकिन यहां बड़े शहरों में ये लड़के-लड़कियां साथ-साथ कमरों में दिन-रात रुकें, कोई कुछ नहीं कहने वाला..
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​अभी कल चंडीगढ़ से एक ऐसी ख़बर आई है जिसने हिला कर रख  दिया...पंजाब से एक युवा दंपति अच्छी नौकरी की तलाश में चंडीगढ़ आए...   एक बच्चे वाले इस दंपति ने फैसला किया जब तक अच्छी नौकरी नहीं मिलती कॉल सेंटर में ही नौकरी कर ली जाए..महंगे शहर में रहने का खर्च और रातों रात अमीर बनने की चाहत के साथ ही कॉल सेंटर की नौकरी के दबाव ने इन्हें कुंठा से भर दिया...हालीवुड की एक फिल्म को देखने के बाद इन्होंने जुर्म का रास्ता अपनाने का फैसला किया...पीजी में रहने वाले इस  दंपति ने कॉल सेंटर में ही काम करने वाली दो लड़कियों को भी साथ  मिला लिया...



ये लड़कियां हरियाणा से चंडीगढ़ आकर पीजी में रह रही थीं...अब इन चारों ने एयरपोर्ट  के पास वीरान इलाके में स्थित एटीएम को लूटने का मंसूबा बनाया...चारों ने एटीएम मशीन को काटने  के  लिए  पेट्रोल  स्प्रे  और  लाइटर को गैस कटर की तरह इस्तेमाल  करने का फैसला किया...दो दिन पहले आधी रात को मौके पर पहुंच कर एटीएम मशीन को काटना शुरू कर दिया...दंपति एटीएम मशीन के अंदर थे और बाहर दोनों लड़कियां पहरा देने लगीं...ये सब चल ही रहा था कि नाइट ड्यूटी से लौट रहे एक शख्स ने इन चारों की हरकतों को देख  लिया और पुलिस को इतल्ला कर दी...पुलिस ने मौके पर पहंच कर चारों को रंगे हाथ  गिरफ्तार कर  लिया...पुलिस का कहना है कि अगर उसे पहुंचने में थोड़ी देर भी और होती तो चारों ने लाखों का कैश एटीएम  मशीन से उड़ा लिया होता...​
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​शहरी ज़िंदगी के एक बदरंग चेहरे को उजागर करने वाली इस  रिपोर्ट  को पढ़ने के बाद सोच रहा हूं कि बेशक क़ानून इस मामले में अपना काम करेगा और ​दोषियों को सज़ा मिलेगी...लेकिन  जिन चमचमाते शहरों में हम आराम की ज़िंदगी जीने की चाहत रखते हैं क्या ये उसकी एक त्रासद तस्वीर नहीं है...

सोमवार, 7 मई 2012

गूगल-फेसबुक सिर्फ 5 साल और ?...खुशदीप​ ​​

क्या आपने गूगल या फेसबुक के बिना इंटरनेट की कल्पना की है? प्रतिष्ठित अमेरिकी पत्रिका फोर्ब्स में प्रकाशित एक लेख के मुताबिक पांच सालों में गूगल और फेसबुक पूरी तरह से गायब हो सकती हैं।  एरिक जैकसन ने अपने लेख में इसके कारण बताए हैं।






1. साल 2010 के बाद बनी सोशल कंपनियां दुनिया के बारे में बिलकुल अलग राय रखती हैं। ये कंपनियां, उदाहरण के तौर पर इंस्टाग्राम, इंटरनेट के बजाय मोबाइल प्लेटफार्म को अपने कंटेट के लिए प्राइमरी प्लेटफार्म मानती हैं। वेब पर लांच करने के बजाय ये नई कंपनियां यकीन रखती हैं कि उनकी मोबाइल एप्लीकेशन को लोग इंटरनेट के स्थान पर इस्तेमाल करना शुरु कर देंगे। इस अवधारणा के अनुसार हमें कभी भी वेब 3.0 नहीं मिलेगा क्योंकि तब तक इंटरनेट समाप्त हो चुका होगा। 


2. वहीं वेब 1.0 (1994 से 2001 के बीच अस्तित्व में आई कंपनियां जिनमें नेटस्केप, याहू, एओएल, गूगल, अमेजन और ईबे शामिल हैं) और वेब 2.0 कंपनियां (2002 से 2009 के बीच अस्तित्व में आई कंपनियां जिनमें फेसबुक, लिंक्डइन, ग्रुपऑन आदि शामिल हैं) अभी भी इस नए बदलाव के साथ खुद को बदलने को लेकर आश्वस्त नहीं है। फेसबुक सोशल मीडिया कंपनियों में सबसे आगे है और बहुत जल्द ही वो अपना आईपीओ लांच कर रही है। हो सकता है कि उसकी मौजूदा बाजार कीमत 140 बिलियन डॉलर के आंकड़े को भी पार कर जाए। लेकिन फिर भी यह मोबाइल प्लेटफॉर्म पर पिछड़ रही है। इसकी आईफोन और आईपैड एप्लीकेशन इसके डेस्कटॉप वर्जन की ही नकल हैं।

3. फेसबुक इंटरनेट के जरिए पैसा कमाने के तरीके निकालने की कोशिश कर रही है। साल 2011 में फेसबुक की कुल आय सिर्फ 3.7 बिलियन डॉलर ही थी। वहीं 2011 की अंतिम तिमाही के मुकाबले 2012 की पहली तिमाही में भी फेसबुक की आय में कमी आई है। और सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि फेसबुक के पास अपनी मोबाइल एप्लीकेशन के जरिए पैसा कमाने का अभी कोई तरीका भी नहीं है। 

4. वेब 1.0 कंपनियां सोशल मीडिया में नाकाम साबित हुई हैं। इससे मोबाइल प्लेटफार्म पर फेसबुक की सफलता को लेकर भी संदेह है। गूगल अपनी गूगल+ सेवा का हश्र देख ही चुकी है।  वहीं परिस्थितियों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञ मानते हैं कि मौजूदा आपरेटिंग वातावरण और कंपनियों के मूल उत्पादों में असंतुलन के कारण कंपनियों पर 'पिछड़ने का दायित्व' भी बढ़ रहा है। इस सिद्धांत से मौजूदा टेक्नोलॉजी दुनिया की दुर्दशा को समझा जा सकता है। 

अब सवाल उठता है कि क्या फिर गूगल, फेसबुक, अमेजन और याहू जैसी कंपनियां बेमानी हो जाएंगी? हालांकि ये कंपनियां अभी भी लगातार बढ़ रही हैं और अभी भी इनमें बहुत प्रतिभाशाली लोग जुड़े हैं। लेकिन नए बदलावों (जैसे पहले सोशल,  अब मोबाइल और आने वाले वक्त में कुछ और) में पुरानी तकनीकें प्रचलन से बाहर हो जाती हैं।

5. हम अभी जिस तकनीकी दुनिया में रह रहे हैं उसका लगातार विकास हो रहा है। याहू का बाजार 2000 के मुकाबले सिकुड़ रहा है। यह चर्चा जोरों पर है कि कैसे गूगल भी मुश्किल दौर से गुजर रही है। जब उसका डेस्कटाप सर्च व्यापार (गूगल की अधिकतर आय इसी से होती है) कम होने लगेगा तब उसके पास क्या विकल्प होंगे क्योंकि इंटरनेट यूजर ने मोबाइल पर अलग-अलग तरीकों से जानकारी खोजना शुरु कर दिया है।

क्या अमेजन भी लगातार कमजोर होगी? इसमें कोई शक नहीं है कि अमेजन अभी भी लगातार बढ़ रही है लेकिन जब मोबाइल प्लेटफार्म पर लोगों के पास सामान खरीदने के अन्य सुविधाजनक विकल्प होंगे तब निश्चित ही अमेजन की चिंता बढ़ जाएगी। फेसबुक के सामने भी यही चुनौती होगी। हमशी मैकेंजी ने हाल ही में कहा है कि मुझे नहीं लगता कि फेसबुक मोबाइल प्लेटफार्म पर आने के लिए खुद में बदलाव करके न्यूजफीड, मैसेजिंग, फोटो, और एड्रस बुक के लिए अलग-अलग एप्लीकेशन लांच कर पाएगी क्योंकि ऐसा करके उसका मूल रूप पूरी तरह से बदल जाएगा।  

सवाल यह है कि फेसबुक किस गति से मोबाइल प्लेटफार्म पर चेंज करेगा? अनुमानों के मुताबिक उसकी गति भी ऐसे ही होगी जैसे गूगल की सोशल होने के दौरान थी। फेसबुक का सबसे बड़ा डर यही है कि कहीं मोबाइल के दौर में वो पिछड़ न जाए। 

एप्पल के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। एप्पल मूलरूप से हार्डवेयर कंपनी है लेकिन फिर भी वो मोबाइल बाजार में कामयाब रही  क्योंकि उसने अपना ऑपरेटिंग सिस्टम लांच कर दिया। शायद यही कारण है कि अन्य कंपनियां भी एप्पल का अनुसरण करने की सोच रही हैं। रिपोर्टों के मुताबिक फेसबुक और बायडू अपना मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम लांच करने पर काम कर रही हैं। 


अगले 5-8 सालों में इंटरनेट जगत में बहुत बदलाव होंगे। ऐसा भी हो सकता है कि गूगल और फेसबुक अपने आज के आकार के मुकाबले सिमट जाएं या पूरी तरह से गायब ही हो जाएं। 
यूं तो इन कंपनियों के पास वेब से मोबाइल पर शिफ्ट होने के लिए तमाम पैसा और साधन होंगे लेकिन इतिहास के उदाहरण बताते हैं कि वो ऐसा कर नहीं पाएंगी। माना जाता है कि गूगल के कार्यकारी अध्यक्ष एरिक श्मिद्त भी भविष्य में सभी एंड्रायड उपभोक्ताओं से दस डॉलर प्रतिमाह वसूलने का विचार रखते हैं  ताकि भविष्य में कंपनी के आर्थिक फायदों को सुनिश्चित किया जा सके। 


 (Source : Dainik Bhaskar.com)

शनिवार, 5 मई 2012

'भारत माता की जय' पर जंग...खुशदीप​ ​​






तक  धिना धिन ​ ता उम  उम,
तक  धिना धिन ता उम  उम​​...
हा थक  धिना धिना​
​मार लपड़​
​फाड़ छप्पड़
छात  करें​
​नस  में बात कोई​
​हाथ है लात करे​...

अपुन  कोई ना​
​अब हेल्थ लगे ला​
​अरे नाच मगन​
​काट मदन
रोज़  है ख़ाना​...
​​​
​भारत माता की,​
​भारत माता की,
तुम  जय  बोलो, जय​
भारत  माता की जय... ​

सोने की चि़ड़िया​
​डेंगू, मलेरिया​
गुड़ भी है, गोबर भी
फुल  भी है वो​
​पर भी भारत माता की जय...


तक  धिना धिना
​ह​म  होव सरकारी​
​​हथियार प्यारे 
​भी करिया बाज़​
​ऐतराज़  गया भाड़ प्यारे​
​अरे फिर ना कहना.​
​अरे पीछे ही रहना...
​​

कसम  ये खाई है​
​शह​र शंघाई
तूने ​​ कही भूल  वही​
​धिन  ताना नाना...
​​
​ भारत माता की,​
​भारत माता की,
तुम  जय  बोलो, जय​
भारत  माता की जय... ​

सोने की चि़ड़िया​
​डेंगू, मलेरिया​ 
गुड़ भी है, गोबर भी
फुल भी है वो​
​पर भी भारत माता की जय... ​​   ​
​​
​भारत माता की,​
​भारत माता की,
तुम  जय  बोलो, जय​
भारत  माता की जय ​...

​अक्सर देश  में नेता विकास  का हवाला देते हुए कभी मुंबई तो कभी किसी और शहर को शंघाई बनाने के दावे करते हैं...लेकिन शंघाई नाम  की आने​ वाली दिबाकर  बनर्जी  की  फिल्म के गीत  'भारत माता की जय...' पर बवाल मच गया है...यूट्यूब पर इसके वीडियो जारी होने के बाद  इस गीत के गायक विशाल ददलानी को धमकियां मिल रही हैं...आप  भी सुनिए  ये पूरा गीत...



'सोने की चिडि़या, डेंगू मलेरिया, गुड़ भी है, गोबर भी... भारत माता की जय' ये बोल हैं इमरान हाशमी और अभय देओल की आने वाली फिल्म 'शंघाई' के  गीत  'भारत माता की जय....' के...इस  गीत  को खुद फिल्म के डायरेक्टर 'लव, सेक्स, धोखा' फेम दिबाकर बनर्जी ने लिखा है और गाया है विशाल ददलानी ने...

अपने 'कंट्रोवर्शल' लिरिक्स की वजह से यह गीत यूट्यूब पर काफी पॉपुलर हो रहा है...करीब एक हफ्ते पहले अपलोड किए गए इस गीत को 65 हजार से ज्यादा लोग देख चुके हैं...हालांकि इसमें देश की कुछ ज्यादा ही दयनीय तस्वीर पेश की गई है, लेकिन वह कड़वा सच जैसा है...

बेशक, 'कंट्रोवर्शल' लिरिक्स ने इस गीत  को पॉपुलैरिटी तो दिला दी, लेकिन अब उसके 'साइड इफेक्ट' भी सामने आ गए हैं...पिछले दिनों टीम अन्ना के मेंबर प्रशांत भूषण को पीट चुके भगत सिंह क्रांति सेना के तेजिंदर सिंह बग्गा ने विशाल को ट्वीट करके खुली वार्निंग दी है कि डायरेक्टर इस गाने से 'कंट्रोवर्शल' वर्ड्स हटा लें, वरना वे उनसे 'प्रशांत भूषण स्टाइल' में निपटेंगे...यहीं नहीं, फिल्म को देशभर में रिलीज नहीं होने दिया जाएगा...

यही नहीं, बग्गा विशाल पर भी पैसों की खातिर भारत माता का अपमान करने का इल्जाम लगा रहा है...यहां तक कि ददलानी की मां को भी उसने घसीट लिया है...उन्होंने ट्वीट किया, 'यह  गीत कुछ इस तरह होना चाहिए, 'विशाल की मम्मी पीलिया और एड्स की मरीज है...बोलो विशाल की मम्मी की जय'...

ऐसे में, विशाल भी पीछे नहीं रहे और उन्होंने भी बग्गा को 'समझा' दिया...विशाल ने ट्वीट किया, 'मिस्टर बग्गा मुझे धमकी देने की बजाय इस गाने को ध्यान से सुनो...देशभक्ति की आड़ में गुंडागर्दी नहीं चलेगी...और रही बात मां की तो वह आपकी भी होगी'...

बहरहाल, विशाल ददलानी और तेजिंदर बग्गा के बीच चल रही 'जंग' का नतीजा तो पता नहीं क्या होगा, लेकिन इस बहाने उनके सपोर्टर जरूर आमने-सामने आ गए हैं! देखते हैं, यह लड़ाई कहां खत्म होती है! ​...​​



(नवभारत  टाइम्स की रिपोर्ट  के इनपुट  के साथ )

गुरुवार, 3 मई 2012

जहां मैं हूं, वहां कल कोई और था...खुशदीप

 आज जहां मैं हूं, वहां कल  कोई और था, ​
​ये भी एक  दौर है, वो भी एक  दौर था...​





साठ  के दशक  के आखिर और सत्तर के दशक  के शुरू में सुपरस्टार के तौर पर जो क्रेज  राजेश  खन्ना का रहा, वैसा क्रेज़  हिंदी सिनेमा में न  पहले ​कभी किसी स्टार ने देखा और न ही बाद में...अमिताभ  और शाहरूख  ने भी नहीं...रोमांटिक  हीरो के तौर पर राजेश  खन्ना के लिए​ ये लड़कियों की दीवानगी ही थी कि अपने ख़ून से उन्हें  चिट्ठियां लिखती थीं...शायद यही वजह थी कि डिंपल  से शादी करते ही राजेश  खन्ना की ​लोकप्रियता का ग्राफ़  धड़ाम  हो गया...रही सही कसर एंग्री यंग मैन के तौर पर  ज़ंज़ीर से उभरे अमिताभ  ने पूरी कर दी...

राजेश खन्ना आजकल जिस  हाल में हैं, उसे देखना बड़ा त्रासद है..डायलाग  डिलीवरी के खास  अंदाज़  के  लिए  जाने जाने वाले काका आज सही तरह से बोल भी नहीं  पा रहे...अभी उन्हें लेकर चीनी कम  और  पा  फेम  निर्देशक  और देश  के दिग्गज  एड  फिल्म शूटर बाल्की ने हैवेल्स इलैक्ट्रिक  एप्लायंसेज़  की एड  शूट की है...ये पूरे करियर  में पहली बार  है कि राजेश  खन्ना किसी ब्रैंड  को एंडोर्स  कर  रहे हैं...प्रार्थना करता हूं कि काका जल्दी स्वस्थ हों...


​​

राजेश  खन्ना पर  वेब दुनिया डाट  काम  से साभार  ली गई  पचास  जानकारियां...

 1) जिस तरह से आज टीवी के जरिये टैलेंट हंट किया जाता है, कुछ इसी तरह काम 1965 यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स और फिल्मफेअर ने किया था। वे नया हीरो खोज रहे थे। फाइनल में दस हजार में से आठ लड़के चुने गए थे, जिनमें एक राजेश खन्ना भी थे। अंत में राजेश खन्ना विजेता घोषित किए गए। 

2) राजेश खन्ना का वास्तविक नाम जतिन खन्ना है। अपने अंकल के कहने पर उन्होंने नाम बदल लिया। 

3) 1969 से 1975 के बीच राजेश ने कई सुपरहिट फिल्में दीं। उस दौर में पैदा हुए ज्यादातर लड़कों के नाम राजेश रखे गए।

4) फिल्म इंडस्ट्री में राजेश को प्यार से काका कहा जाता है। जब वे सुपरस्टार थे तब एक कहावत बड़ी मशहूर थी- ऊपर आका और नीचे काका। 

5) 29 दिसम्बर 1942 को जन्मे राजेश खन्ना स्कूल और कॉलेज जमाने से ही एक्टिंग की ओर आकर्षित हुए। उन्हें उनके एक नजदीकी रिश्तेदार ने गोद लिया था और बहुत ही लाड़-प्यार से उन्हें पाला गया। 

6) राजेश ने फिल्म में काम पाने के लिए निर्माताओं के दफ्तर के चक्कर लगाए। स्ट्रगलर होने के बावजूद वे इतनी महंगी कार में निर्माताओं के यहां जाते थे कि उस दौर के हीरो के पास भी वैसी कार नहीं थी। 

7) प्रतियोगिता जीतते ही राजेश का संघर्ष खत्म हुआ। सबसे पहले उन्हें ‘राज’ फिल्म के लिए जीपी सिप्पी ने साइन किया, जिसमें बबीता जैसी बड़ी स्टार थीं।

8) राजेश की पहली प्रदर्शित फिल्म का नाम ‘आखिरी खत’ है, जो 1967 में रिलीज हुई थी।

9) 1969 में रिलीज हुई आराधना और दो रास्ते की सफलता के बाद राजेश खन्ना सीधे शिखर पर जा बैठे। उन्हें सुपरस्टार घोषित कर दिया गया और लोगों के बीच उन्हें अपार लोकप्रियता हासिल हुई। 

10) सुपरस्टार के सिंहासन पर राजेश खन्ना भले ही कम समय के लिए विराजमान रहे, लेकिन यह माना जाता है कि वैसी लोकप्रियता किसी को हासिल नहीं हुई जो राजेश को ‍हासिल हुई थी।

11) लड़कियों के बीच राजेश खन्ना बेहद लोकप्रिय हुए। लड़कियों ने उन्हें खून से खत लिखे। उनकी फोटो से शादी कर ली। कुछ ने अपने हाथ या जांघ पर राजेश का नाम गुदवा लिया। कई लड़कियां उनका फोटो तकिये के नीचे रखकर सोती थी। 

12) स्टुडियो या किसी निर्माता के दफ्तर के बाहर राजेश खन्ना की सफेद रंग की कार रुकती थी तो लड़कियां उस कार को ही चूम लेती थी। लिपिस्टिक के निशान से सफेद रंग की कार गुलाबी हो जाया करती थी। 

13) निर्माता-निर्देशक राजेश खन्ना के घर के बाहर लाइन लगाए खड़े रहते थे। वे मुंहमांगे दाम चुकाकर उन्हें साइन करना चाहते थे। 

14) पाइल्स के ऑपरेशन के लिए एक बार राजेश खन्ना को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। अस्पताल में उनके इर्दगिर्द के कमरे निर्माताओं ने बुक करा लिए ताकि मौका मिलते ही वे राजेश को अपनी फिल्मों की कहानी सुना सके।

15) राजेश खन्ना को रोमांटिक हीरो के रूप में बेहद पसंद किया गया। उनकी आंख झपकाने और गर्दन टेढ़ी करने की अदा के लोग दीवाने हो गए।

16) राजेश खन्ना द्वारा पहने गए गुरु कुर्त्ते खूब प्रसिद्ध हुए और कई लोगों ने उनके जैसे कुर्त्ते पहने। 

17) आराधना, सच्चा झूठा, कटी पतंग, हाथी मेरे साथी, मेहबूब की मेहंदी, आनंद, आन मिलो सजना, आपकी कसम जैसी फिल्मों ने आय के नए रिकॉर्ड बनाए। 

18) आराधना फिल्म का गाना ‘मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू...’ उनके करियर का सबसे बड़ा हिट गीत रहा। 

19) आनंद फिल्म राजेश खन्ना के करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म मानी जा सकती है, जिसमें उन्होंने कैंसर से ग्रस्त जिंदादिल युवक की भूमिका निभाई। 

20) राजेश खन्ना की सफलता के पीछे संगीतकार आरडी बर्मन और गायक किशोर का अहम योगदान रहा है। इनके बनाए और राजेश पर फिल्माए अधिकांश गीत हिट साबित हुए और आज भी सुने जाते हैं। किशोर ने 91 फिल्मों में राजेश को आवाज दी तो आरडी ने उनकी 40 फिल्मों में संगीत दिया। 

21) अपनी फिल्मों के संगीत को लेकर राजेश हमेशा सजग रहते हैं। वे गाने की रिकॉर्डिंग के वक्त स्टुडियो में रहना पसंद करते थे और अपने सुझावों से संगीत निर्देशकों को अवगत कराते थे। 

22) मुमताज और शर्मिला टैगोर के साथ राजेश खन्ना की जोड़ी को काफी पसंद किया गया। मुमताज के साथ उन्होंने 8 सुपरहिट फिल्में दी।

23) मुमताज ने शादी कर फिल्म को अलविदा कहने का मन बना लिया। उनके इस निर्णय से राजेश को बहुत दु:ख हुआ। 

24) शर्मिला और मुमताज, जो कि राजेश की लोकप्रियता की गवाह रही हैं, का कहना है कि लड़कियों के बीच राजेश जैसी लोकप्रियता बाद में उन्होंने कभी नहीं देखी। 

25) आशा पारेख और वहीदा रहमान जैसी सीनियर एक्ट्रेस के साथ भी उन्होंने काम किया। खामोशी में राजेश को वहीदा के कहने पर ही रखा गया।​ 26) गुरुदत्त, मीना कुमारी और गीता बाली को राजेश खन्ना अपना आदर्श मानते हैं।

27) जंजीर और शोले जैसी एक्शन फिल्मों की सफलता और अमिताभ बच्चन के उदय ने राजेश खन्ना की लहर को थाम लिया। लोग एक्शन फिल्में पसंद करने लगे और 1975 के बाद राजेश की कई रोमांटिक फिल्में असफल रही। 

28) कुछ लोग राजेश खन्ना के अहंकार और चमचों से घिरे रहने की वजह को उनकी असफलता का कारण मानते हैं। बाद राजेश खन्ना ने कई फिल्में की, लेकिन सफलता की वैसी कहानी वे दोहरा नहीं सके। 

29) राजेश ने उस समय कई महत्वपूर्ण फिल्में ठुकरा दी, जो बाद में अमिताभ को मिली। यही फिल्में अमिताभ के सुपरस्टार बनने की सीढ़ियां साबित हुईं। यही राजेश के पतन का कारण बना।

30) राजेश के स्वभाव की वजह से मनमोहन देसाई, शक्ति सामंत, ऋषिकेश मुखर्जी और यश चोपड़ा ने उन्हें छोड़ अमिताभ को लेकर फिल्म बनाना शुरू कर दी। 

31) अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना को प्रतिद्वंद्वी माना जाता है। दोनों ने आनंद और नमक हराम नामक फिल्मों में साथ काम किया है। इन दोनों फिल्मों में राजेश के रोल अमिताभ के मुकाबले सशक्त हैं। 

32) यह प्रतिद्वंद्विता तब और गहरा गई जब एक ही कहानी पर राजेश को लेकर ‘आज का एमएलए रामअवतार’ और अमिताभ को लेकर ‘इंकलाब’ शुरू की गई। बाद में दोनों ही फिल्म बॉक्स ऑफिस पर खास असर नहीं छोड़ पाई। 

33) रोमांटिक हीरो राजेश दिल के मामले में भी रोमांटिक निकले। अंजू महेन्द्रू से उनका जमकर अफेयर चला, लेकिन फिर ब्रेकअप हो गया। ब्रेकअप की वजह दोनों ने आज तक नहीं बताई है। बाद में अंजू ने क्रिकेट खिलाड़ी गैरी सोबर्स से सगाई कर सभी को चौंका दिया। 

34) राजेश खन्ना ने अचानक डिम्पल कपाड़िया से शादी कर करोड़ों लड़कियों के दिल तोड़ दिए। डिम्पल ने बॉबी फिल्म से सनसनी फैला दी थी। 

35) समुंदर किनारे चांदनी रात में डिम्पल और राजेश साथ घूम रहे थे। अचानक उस दौर के सुपरस्टार राजेश ने कमसिन डिम्पल के आगे शादी का प्रस्ताव रख दिया जिसे डिम्पल ठुकरा नहीं पाईं। शादी के वक्त डिम्पल की उम्र राजेश से लगभग आधी थी।

36) राजेश-डिम्पल की शादी की एक छोटी-सी फिल्म उस समय देश भर के थिएटर्स में फिल्म शुरू होने के पहले दिखाई गई थी। 

37) डिम्पल और राजेश की दो बेटी हैं ट्विंकल और रिंकी। डिम्पल और ‍राजेश में नहीं पटी, बाद में दोनों अलग हो गए। 

38) अलग होने के बावजूद मुसीबत में हमेशा डिम्पल ने राजेश का साथ दिया। हाल ही में वे बीमार हुए तो डिम्पल ने उनकी सेवा की। उनका चुनाव प्रचार ‍भी किया। 

39) अपनी साली सिम्पल कपाड़िया के साथ राजेश बतौर हीरो फिल्म ‘अनुरोध’ में नजर आए। 

40) राजीव गांधी के कहने पर राजेश राजनीति में आए। कांग्रेस (ई) की तरफ से कुछ चुनाव भी उन्होंने लड़े। जीते भी और हारे भी। लालकृष्ण आडवाणी को उन्होंने चुनाव में कड़ी टक्कर दी और शत्रुघ्न सिन्हा को हराया भी। अब उनका राजनीति से मोहभंग हो गया है। 

41) राजेश खन्ना की लाइफ में टीना मुनीम भी आईं। एक जमाने में राजेश ने कहा भी था कि वे और टीना एक ही टूथब्रश का इस्तेमाल करते हैं। 

42) जीतेन्द्र और राजेश खन्ना स्कूल में साथ पढ़ चुके हैं।

43) राजेश खन्ना और उनकी बेटी ट्विंकल का एक ही दिन जन्मदिन आता है, 29 दिसंबर।

44) बहुत पहले ‘जय शिव शंकर’ फिल्म में काम मांगने के लिए राजेश खन्ना के ऑफिस में अक्षय कुमार गए थे। घंटों उन्हें बिठाए रखा और बाद में काका उनसे नहीं मिले। उस दिन कोई सोच भी नहीं सकता था कि यही अक्षय एक दिन काका के दामाद बनेंगे। 

45) अक्षय का कहना है कि वे बचपन से राजेश खन्ना के फैन रहे हैं। आराधना, अमर प्रेम और कटी पतंग उनकी पसंदीदा फिल्म है। 

46) कहा जाता है कि राजेश खन्ना ने बहुत सारा पैसा लॉटरी चलाने वाली एक कंपनी में लगा रखा है जिसके जरिये उन्हें बहुत आमदनी होती है।

47) काका का कहना है कि वे अपनी जिंदगी से बेहद खुश हैं। दोबारा मौका मिला तो वे फिर राजेश खन्ना बनना चाहेंगे और वही गलतियां दोहराएंगे।

48) अपने बैनर तले राजेश खन्ना ने ‘जय शिव शंकर’ नामक फिल्म शुरू की थी, जिसमें उन्होंने पत्नी डिम्पल को साइन किया। आधी बनने के बाद फिल्म रूक गई और आज तक रिलीज नहीं हुई। 

49) राजेश खन्ना ने श्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेअर पुरस्कार तीन बार जीता और चौदह बार वे नॉमिनेट हुए।

50) वर्तमान दौर के सुपरस्टार शाहरुख खान का कहना है कि राजेश ने अपने जमाने में जो लोकप्रियता हासिल की थी, उसे कोई नहीं छू सकता है। 

बुधवार, 2 मई 2012

मां का 'तबेला'...खुशदीप


दो दिन  पहले सुबह  अखबार  पढ़  रहा था...हिंदी के अखबार  अमर  उजाला में मदर्स  डे (13 मई) का विज्ञापन  देखा...फिर  साथ  ही  मेल  टूडे में इस  ख़बर  पर  नज़र गई...'Caring' son keeps mom in cowshed ...

मैसूर  की  80 साल  की मलम्मा के लिए 'मदर्स  डे'  दो  हफ्ते  पहले ही  आ  गया...उन्हें सबसे  बड़ा  तोहफ़ा  मिल  गया...तोहफ़ा  आज़ादी  का...पुलिस  ने गाय  के तबेले में बंधक  की तरह रह  रही मलम्मा को  मुक्त  कराया...उन्हें इस  हाल  में​ रखने वाला और कोई  नहीं बल्कि खुद उनका सगा बेटा जयारप्पा था...

 मलम्मा 
पुलिस  के  मुताबिक  मलम्मा  मैसूर  की इट्टीगेगुडु बस्ती  में अपने  मकान  में  बरसों से पति मरियप्पा, बेटे जयारप्पा  और  बहू  नगम्मा  के  साथ  रहती  आ   रही थीं..लेकिन पति मरियप्पा  के  मरते  ही  बेटा  जयारप्पा उन्हें  बोझ  समझने  लगा...आरोप   के  मुताबिक  दो  साल  पहले  जयारप्पा  ने  घर  में  कम  जगह  का  हवाला  देते  हुए  मां  से गाय  और  बछिया  के  लिए बने छप्पर  में  जाने  को कहा...मलम्मा  को दिन  में कभी छप्पर  से बाहर  निकलने नहीं दिया जाता था...खाना भी छप्पर  में  पहुंचा  दिया जाता...मलम्मा  को  गोबर  के ढेर  और  गंदगी के बीच  ही सोना पड़ता...एक  रात  मलम्मा  ने  एक  पड़ोसी  को  बताया कि उसे  किस हाल  में रहना पड़  रहा  है...

पडोसियों  के  पुलिस  को  सूचना  देने  पर  ही मलम्मा  को  मुक्त  कराया  जा  सका...पुलिस  के जयारप्पा  को थाने बुलाने  पर  उसने  दावा  किया  कि मलम्मा खुद  अपनी मर्ज़ी से  छप्पर  में  रह  रही थीं, क्योंकि वो  उनके साथ  रहना  नहीं चाहती थीं....पुलिस  ने  जयारप्पा  के  खिलाफ  एफआईआर  लिखानी  चाही तो  मलम्मा  ने ही पुलिस से बेटे पर  कोई  कार्रवाई  न  करने  की  गुहार  लगाई...

सच... औलाद कितनी भी  बेगैरत क्यों न हो,  मां का दिल हमेशा मां का ही रहता है...

​मां  की  अहमियत  उनसे पूछनी चाहिए जिनके सर से बहुत छोटी उम्र में ही मां का साया उठ  जाता  है....या उनसे जिन्हें मां की ममता से दूर परदेस में  रहना  पड़ता  है...

आज फिर सुनिए मां पर मेरा सबसे पसंदीदा गीत...आवाज़ मलकीत सिंह  की है...

गाने का सार कुछ इस तरह से है...बेटा चार पैसे कमाने की खातिर विदेश में है...वहीं उसे वतन से आई बहन की लिखी चिट्ठी मिलती है....वो चिट्ठी को पहले चूम कर आंखों से लगाने की बात कह रहा है..... बहन चिट्ठी में घर में बूढ़े मां बाप और अपना हाल सुना रही है...भाई बस भरोसा दिला देता है कि मां को समझा, मैं अगले साल घर वापस आऊंगा...



नी चिट्ठिए वतना दिए तैनू चूम अंखियां नाल लावां
पुत परदेसी होण जिना दे, रावां अडीकन मांवां
मावां ठंडियां छावां, मावां ठंडिया छावां...
दस हां चिट्ठिए केड़ा सनेहा वतन मेरे तो आया
किना हथां दी शो ए तैनू, किसने है लिखवाया
हरफ़ पिरो के कलम विच सारे मोतियां वांग सिधाया
लिख के पढ़या, पढ़ के सारा लिखया हाल सुणाया 
किसने तैनू पाया डाके, किस लिखया सरनावां
मावां ठंडियां छावां, मावां ठंडिया छावां...
अपणा हाल सुणाया जुबानी, अंखियां दे विच भर के पानी
हंजुआ दे डूब गेड़ निशानी, अपणे आप सुनाए कहानी
हमड़ी जाई ने लिखया आपे, वीरा अडीकन बूढरे मा-पे
जेड़ी सी तेरे गल लग रोई, बहण व्यावन जोगी होई
तू वीरा परदेस वसेंदा, कि कि होर सुणावां
मावां ठंडियां छावां, मावां ठंडिया छावां...
अमड़ी जाइए नी निकिए बहणे, वीर सदा तेरे नाल नहीं रहणे
तू एं बेगाणा धन नी शुदैने, रबियों ही विछोड़े सहणे
रखिया कर तू मां दा ख्याल, अखियां रो रो होए निहाल
कह देई मां नू तेरा लाल, घर आवेगा अगले साल
पूरन पुत परदेसी जांदे, लकड न ततियावां
मावां ठंडियां छावां, मावां ठंडिया छावां...