शनिवार, 31 मार्च 2012

'हेट स्टोरी' के प्रोमोज़ पर चल गई कैंची...खुशदीप



विरोध किया जाए तो कुछ तो असर होता है...विक्रम भट्ट और विवेक अग्निहोत्री को उनकी चालाकी भारी पड़ी है...उन्होंने सोचा था कि 20 अप्रैल को अपनी रिलीज़ होने वाली फिल्म 'हेट स्टोरी' का अंसेंसर्ड प्रोमो बनाकर कंट्रोवर्सी के ज़रिए दर्शकों में क्यूरेसिटी जगा लेंगे...मुझे तब भी ये तुक समझ नहीं आई थी कि जब फिल्म को सेंसर बोर्ड के सर्टिफिकेट के बिना रिलीज़ नहीं किया जा सकता तो प्रोमो में जो चाहे जैसे दृश्य और डायलाग डालकर कैसे रिलीज किया जा सकता है..

30 मार्च को रिलीज हुई 'ब्लड मनी' के साथ भी यही गिमीक किया गया...विक्रम भट्ट के ही बड़े भाई महेश भट्ट की प्रोड्यूस की इस फिल्म में हीरो कुनाल खेमू और ​कनाडा मूल की अभिनेत्री मिया उयेदा के लवमेकिंग सीन्स यू ट्यूब पर पहले से ही आ गए...महेश भट्ट ने यही हल्ला मचाया कि फिल्म के सीन्स किसी ने लीक कर दिए....क्या गारंटी कि फिल्म निर्माता ने खुद ही ये सीन्स नहीं लीक करवाए...अगर उन्होंने ये चालाकी भी की तो वो धरी की धरी रह गई...फिल्म के जो रिव्यू आए हैं, वो फिल्म को बकवास ही बता रहे हैं...

​​ अब लौटता हूं हेट स्टोरी पर....'हेट स्टोरी' के इरोटिक (बोल्ड नहीं) थीम, एक्टर्स की वल्गेरिटी (बोल्डनेस नहीं) और कुछ डायलाग्स के विरोध में नेट पर बहस का संज्ञान आखिरकार सेंसर बोर्ड को लेना पड़ा है...फिल्म का अऩसेंसर्ड प्रोमो सेंसर बोर्ड को नागवार गुज़रा है...अब सारे प्रोमो से पाउली दाम के कुछ डायलाग्स को बीप किया जा रहा है...जैसे कि 'मुझे इस शहर की सबसे बड़ी .....बनना है' या 'I ....those who ....with me'...इसके अलावा प्रोमो के कुछ दृश्यों पर भी कैंची चलेगी...

​​सेंसर बोर्ड के इस कदम से फिल्म के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री और निर्माता विक्रम भट्ट भड़के हुए हैं....उनका कहना है कि सेंसर बोर्ड की इस सख्ती से हेट स्टोरी इरोटिक थ्रिलर की जगह रोमांटिक मूवी रह जाएगी..विवेक का कहना है कि आजकल टीवी सीरियल में लवमेकिंग सीन्स दिखाने पर कोई हल्ला नहीं मचता...और हमें फिल्म के प्रोमो को लेकर सौ तरह के पाठ पढ़ाए जा रहे हैं....विवेक के मुताबिक कांटछांट के बाद प्रोमो फिल्म की बोल्डनेस (मैं नहीं कह रहा, विवेक कह रहे हैं) को रिप्रेजेंट नहीं कर रहा..विवेक ने दो टूक कहा है कि जहां तक फिल्म की बात है तो मैं उसमें से कुछ भी नहीं हटाऊंगा...मैं अंत तक लड़ूंगा...मेरी फिल्म एडल्ट्स के लिए हैं...ये बच्चों या उन वयस्कों के लिए नही है जो बच्चों की तरह सोचते हैं...

विवेक का ये भी कहना है कि यू ट्यूब पर फिल्म के प्रोमो काट-छांट से प्रभावित नहीं होंगे..क्योंकि ये सेंसरशिप के अंतरराष्ट्रीय क़ानून से गवर्न होते हैं....विवेक डिजीटल मीडिया के ज़रिए भी इन प्रोमो को दिखाने के विकल्प तलाश रहे हैं...विवेक ने इस बात से भी इनकार किया कि उनकी फिल्म में पाउली दाम का किरदार हालीवुड की फिल्म बेसिक इ्ंसटिंक्ट में शेरोन स्टोन से प्रभावित है..

अब देखना है कि हेट स्टोरी को सेंसर बोर्ड किस तरह सर्टिफिकेट देता है...प्रोमोज़ की तरह ही फिल्म में भी काटछांट की जाती है या नहीं...या जैसे कि निर्देशक विवेक अग्निहोत्री कह रहे हैं कि वो एक कट को भी स्वीकार नहीं करेंगे...फिल्म को एडल्ट्स सर्टिफिकेट देकर क्या उसमें कुछ भी दिखाने की छूट दी जा सकती है...यहां एक सवाल ये भी है कि जिस तरह टीवी पर दिखाए जानी वाली एड्स पर आपको कोई शिकायत है तो उसे एडवरटाइज़िंग स्टैंडर्ड काउंसिल आफ इंडिया के पास दर्ज कराया जा सकता है...फिर फिल्मों या उनके प्रोमोज़ में ऐसा-वैसा कुछ दिखे तो दर्शकों को उस पर भी शिकायत दर्ज कराने के लिए भी कोई संस्था होनी चाहिए...अगर पहले से ही ऐसी कोई संस्था है, और किसी पाठक को उस पर जानकारी है तो सबसे अवश्य साझा करें...
----------------------------------

मच्छर बनेंगे डॉक्टर-इंजीनियर...खुशदीप

गुरुवार, 29 मार्च 2012

ब्रेक ले लेकर ब्लॉगिंग...खुशदीप​




आजकल लंबे ब्रेक ले लेकर ब्लॉगिंग करना रास आ रहा है...वैसे तो इस साल के शुरू से ही रोज़ ब्लाग लिखने की स्वयंभू परंपरा को तोड़ दिया है...इसलिए​ अब ये तनाव नहीं रहता कि आज क्या लिखना है...ढाई साल की ब्लॉगिंग में आदत सी बन गई थी कि जिस तरह रोज़ अखबार आता है, उसी तरह एक पोस्ट भी रोज़ लिखूं...पोस्ट पर टिप्पणियां घटने लगीं तो लगा कि अब अपना टाइम ओवर हो गया है...पढ़ने वाले शायद अपने लिखे से बोर होने लगे हैं...


अलेक्सा रैंकिंग भी जो तीन-चार लाख के अंदर चल रही थी, घट कर पंद्रह लाख के बाहर चली गई...लेकिन दो दिन पहले रवींद्र प्रभात जी की पोस्ट से पता चला कि अलेक्सा रैंकिंग सबकी ही घटी है...जानकर खुशी हुई कि देशनामा वर्ष 2011 के शीर्ष 100 हिंदी ब्लॉगों में नवें नंबर पर और व्यक्तिगत ब्लॉगों में तीसरे नंबर पर रहा...ये देखकर अच्छा लगा कि टिप्पणियां बेशक घट गईं लेकिन पाठकों की संख्या लगातार बढ़ी है..


टिप्पणियों का एक सच ये भी है कि पहले की तुलना में मैं भी अब दूसरे ब्लागों पर बहुत कम टिप्पणियां कर पाता हूं...मेरा इस पोस्ट को लिखने का तात्पर्य यही है कि टिप्पणियां कम होने से ये नहीं समझना चाहिए कि आपको पढ़ा नहीं जा रहा...ज़ाहिर है टिप्पणियां टू-वे ट्रैफिक से गवर्न होती हैं...वनवे ट्रैफिक यहां ज़्यादा दिन नहीं चलता...मेरी खुशकिस्मती रही कि व्यस्तता के चलते दूसरे ब्लागों पर टिप्पणियां न करने के बावजूद मुझे टिप्पणियां मिलती रहीं...इसके लिए मैं सबका दिल से आभारी हूं...कोशिश करूंगा कि दूसरे ब्लागों पर टिप्पणियां करने के पुराने सिलसिले को फिर शुरू कर सकूं...

स्लॉग ओवर

पति की हालत स्पिल्ट एसी की तरह होती है...​

घर के बाहर कितना भी शोर मचाता हो लेकिन घर के अंदर शांत रहना, ठंडा रहना और रिमोट से कंट्रोल होना उसकी नियति है...​

सोमवार, 26 मार्च 2012

कहां ले जाएगी ये बोल्डनेस...खुशदीप



देश में मल्टीप्लेक्स सिनेमा के जड़ें जमाने के बाद रियलिस्ट फिल्में बनाने की होड़ सी लग गई है...स्टार सिस्टम के साथ-साथ न्यू स्ट्रीम सिनेमा भी पकड़ बनाता जा रहा है...बिना स्टार कास्ट मोटी कमाई के लिए बोल्ड से बोल्ड सब्जेक्ट पर फिल्में बन  रही  है...टीवी सोप ओपेरा क्वीन एकता कपूर ने डर्टी पिक्चर के ज़रिेए दुनिया को दिखा दिया है कि फिल्में ख़ान, कुमार, कपूर सुपरस्टार्स के बिना भी हिट कराई जा सकती हैं...ए ग्रेड हीरोईन विद्या बालन ने अस्सी के दशक की बी-सी ग्रेड एक्स्ट्रा सिल्क स्मिता के किरदार को पर्दे पर निभा कर नेशनल समेत सारे बड़े अवार्ड झटक लिए...विडंबना है कि सिल्क स्मिता खुद को आइटम-गर्ल, सिड्यूस करने वाली वैम्प के टैग से खुद को कभी अलग नहीं कर पाई..प्रसिद्धि भी बस इस लिए ही मिली...मार्केट से आउट होने के बाद गुमनामी के अंधेरे में खोने के डर और निजी ज़िंदगी में रिश्तों की कड़वाहट ने सिल्क स्मिता में इतना अवसाद भर दिया कि खुदकुशी से ही उसका खात्मा हुआ...​खैर ये तो रही डर्टी पिक्चर की बात...

बोल्ड विषयों की आज सिनेमा को इतनी दरकार है कि देश में सेक्स अपराध से जुड़ी कोई घटना सामने आती नहीं कि उस पर फिल्म बनाने का ऐलान भी साथ ही हो जाता है...नीरज ग्रोवर मर्डर केस में राम गोपाल वर्मा को सेक्स-ट्राएंगल का मसाला दिखा तो झट से उन्होंने नाट ए लव स्टोरी बना डाली...एकता कपूर डीपीएस एमएमएस कांड पर रागिनी एमएमएस पहले ही बना चुकी हैं...राजस्थान के भंवरी सेक्स स्कैंडल पर निर्माता-निर्देशक महेंद्र धारीवाल ने फिल्म बनाने का ऐलान किया है...उनका इरादा भंवरी के रोल में विद्या बालन या बिपाशा  बसु को लेने का है...

सेंसर बोर्ड को खत्म कर देने के हिमायती महेश भट्ट ने रियल पोर्न एक्ट्रेस सनी लिओन को जिस्म-2  में कौन से अभिनय के लिए चुना है, वही बेहतर जानते होंगे...लेकिन महेश भट्ट से भी एक कदम आगे निकले हैं उनके छोटे भाई विक्रम भट्ट...निर्देशक विवेक अग्निहोत्री के साथ मिलकर कॉरपोरेट साजिश और सेक्‍स के ​काकटेल पर हेट स्टोरी बनाई है...फिल्म को सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट मिलने से पहले ही उन्होंने जो ट्रेलर रिलीज किया है, उसमें कई डायलाग और दृश्य ऐसे हैं जिन पर फिल्म में शायद सेंसर बोर्ड की कैंची चल जाए...अगर नहीं चलती तो मान लेना चाहिए कि हमारा सेंसर बोर्ड भी बहुत बोल्ड हो गया है...फिल्मों की मार्केंटिंग का आजकल ये नया ट्रेंड निकला है कि कुछ बोल्ड सीन पहले ही इंटरनेट पर डाल दो, ये कहकर कि किसी ने उन्हें लीक कर दिया है...ज़ाहिर है इससे लोगों में क्यूरेसिटी जागने के साथ फिल्म का मुफ्त में प्रमोशन भी हो जाता है...​

20 अप्रैल को रिलीज़ होने जा रही हेट स्टोरी की नायिका पाउली दाम कितनी बोल्ड हैं, ये इसी से पता चलता है कि पूरी यूनिट के सामने भी न्यूड सीन की शूटिंग से कोई परहेज नहीं...31 साल की इस अभिनेत्री ने 2006  में बांग्ला फिल्म अग्निपरीक्षा से करियर की शुरुआत की थी...लेकिन लाइमलाइट में ये गौतम घोष की फिल्म कालबेला से 2009 में आई...पाउली अब तक की सबसे बोल्ड बांग्ला फिल्म मानी जाने वाली चत्रक की भी नायिका रही है...श्रीलंकाई निर्देशक विमुक्ति जयसुंद्रा की ये फिल्म कांस और टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में दिखाई जा चुकी है...

​हेट स्टोरी के ट्रेलर को देखकर यही लगता है कि फिल्म में नायिका यानि पाउली दाम अपने साथ हुए फ्राड का बदला लेने के लिए अपने जिस्म को हथियार की तरह इस्तेमाल करती है...ट्रेलर में उसे ये कहते हुए भी सुना जा सकता है कि मुझे इस शहर की सबसे बड़ी वेश्या (ट्रेलर में रंडी शब्द का इस्तेमाल किया गया है ) बनना है...फिल्म बनाने वालों का इरादा ज़ाहिर तौर पर ज़्यादा से ज़्यादा कमाई करना है...लेकिन सेंसर बोर्ड की कौन सी मजबूरी है जो महिला की देह को इस तरह प्रोजेक्ट करने वाली फिल्मों को पास कर देती है...एक बार ऐसी फिल्मों को सख्ती से डब्बे में बंद कर दिया जाए तो फिर दूसरा कोई इस तरह की फिल्म बनाने की जुर्रत नहीं करेगा...आखिर फिल्म में पैसा लगता है...कौन चाहेगा अपना पैसा डुबोना...चलिए अगर फिल्म को एडल्ट सर्टिफिकेट देकर पास कर भी दिया जाता है, या ऐसे-वेसे सीन्स और डायलाग्स पर कैंची भी चल जाती है, लेकिन बगैर सेंसर को दिखाए ऐसे ट्रेलर को नेट या टीवी चैनल जैसे दूसरे माध्यमों पर रिलीज़ करने की क्या तुक है...​

नीचे फिल्म का ट्रेलर आप अपने रिस्क पर ही देखिए...फिर तय कीजिए कि खुलेपन और उदारता के नाम पर आगे भारत में स्क्रीन पर क्या-क्या दिखाया जाने वाला है...




शनिवार, 24 मार्च 2012

बेटा Chatting ही नहीं Setting भी करता है..खुशदीप



तुलसी की जगह Money Plant ने ले ली,
​चाची जी की जगह Aunt ने ले ली...

पिताजी जीते-जी Dad हो गए,
​आगे और भी है, आप तो अभी से Glad हो गए...
 

जीती-जागती मां बच्चों के लिए Mummy हो गई,
10 रुपए की Maggi जो इतनी Yummy हो गई...

भाई Bro हो गए, बहन Sis हो गई,
​दादा-दादी की हालत तो टाएं-टाएं Fiss  हो गई...



दिन भर बेटा Chatting ही नहीं करता

​रात में मोबाइल पर Setting भी करता है...



बड़ी बुरी दशा Nurse के Mister की हो गई,
​बेचारे की तो बीवी भी Sister हो गई...

मुन्नी-शीला बदनाम हो  सिनेमा में Fit हो गई,
चिकनी चमेली भी पऊआ चढ़ा के Hit हो गई...


(ई-मेल पर आधारित )


शनिवार, 17 मार्च 2012

मिसेज सचिन की आ गई SAU-TON...खुशदीप ​





शुक्रवार को सचिन तेंदुलकर के इंटरनेशनल करियर का महाशतक  लगते ही टविटर पर बधाई संदेशों की बाढ़ लग गई..क्रिकेट देश में कितना रचा-बसा है, इसका अंदाज़ इसी से लग जाता है कि बजट जैसा महत्वपूर्ण वार्षिक अनुष्ठान भी नेपथ्य में चला गया...सचिन को किस-किस ने बधाई दी, ये तो आप तक टीवी-अखबारों के ज़रिए पहुंच ही चुका होगा...मैं आपको यहां बताने जा रहा हूं सचिन की मीरपुर में सौवीं सेंचुरी पर आए कुछ मज़ेदार ट्वीट्स के बारे में...​
​​
​त्यागी G...​​
​आखिर अंजलि तेंदुलकर को  SAU-TON मिल गई..​
​​
​सलोनी शर्मा​
​सचिन की माताजी का नाम रजनी हैं...कोच का नाम रमा...कांत है...सौवां शतक तो शुरुआत से ही पत्थर की लकीर था...​
​​
​शैलेश-​
​अब सचिन को अपना उपनाम TEN-DULKAR  की जगह  HUNDRED-ULKAR कर लेना चाहिए...उनकी अगली पीढ़िया HUNDREDULKARS के तौर पर जानी जाएंगी...


​माधवन नारायण-​​
​अब भारत में कम से कम 100 हेयरस्टाईल वास्तु विशेषज्ञ निकल आएंगे...​
​​
​डब्बा-​
​सचिन का ये क्षण आने से अब दुनिया 2012 में शांति से खत्म हो सकती है...​
​​
​सुदीप सेनगुप्ता-​
​बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने सचिन के सौवैं शतक पर शुक्रिया कहा है...कम से कम अब इतिहास में ये तो हमेशा लिखा रहेगा कि बांग्लादेश के पास क्रिकेट की ​टीम भी थी...​
​​
​रामित मनोहर कौल-​
​मुझे अब पाकिस्तान पर तरस आ रहा है...अगले मैच में पाकिस्तान से भिड़ंत पर सचिन के दिमाग़ पर कोई तनाव जो नहीं होगा...​
​​
​रमेश श्रीवत्स...​
सचिन के पिता आसमान से खुशी जताते हुए...यिहा...यिहा...एक साल से तुमने सिर उठा कर आसमान की तरफ़ नहीं देखा था...​
​​
​सिडिन वाडुकुट​-
​कम से कम एक बंगाल तो हमारे देश की मदद कर रहा है...​
​​
​रोहन जोशी-​
मैंने सेंचुरी के लिए नहीं कहा था, इसे रोल-बैक करो- ममता बनर्जी....​
​​
माधवन नारायण-​
​संता- सचिन कैसा खेला ​?
​बंता- ....बस सौ-सौ​.............
​​
​रजनीगंधा-​
​अब सचिन की सौवीं सेंचुरी तो लग गई...अब मुझे इंतज़ार है विराट के विवाह और धोनी के घर में किलकारियां गूंजने की खुशखबरियों का...​

विंटेज-​
​सोनिया ने कहा-इंदिरा गांधी को शुक्रिया जो उन्होंने एक और माइलस्टोन के लिए बांग्लादेश बनाया था...वोट फॉर  कांग्रेस...​
​​
​माधवन नारायण-​
सचिन ने ये शतक लगाने का फैसला इसलिए किया क्योंकि पूनम पांडेय ने उनसे वादा किया कि वो हमेशा बुरखे में रहेगी...​
​​
​खुशदीप सहगल​-
​41 साल पहले आज़ादी दिलाने का कर्ज़ बांग्लादेश ने सचिन का महाशतक लगवा कर चुका दिया...​
​​
​खुशदीप सहगल-​
अर्जुन तेंदुलकर ने भी अब राहत की सांस ली होगी कि डैड के अधूरे काम को उसे पूरा नहीं करना पड़ेगा...

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

ममता बनर्जी राजनीति की 'डॉली बिंद्रा'?...​खुशदीप




ममता दी को जिस तरह बात-बात पर गुस्सा आता है, उस पर चुटकी ली जा रही है कि कहीं उनकी छवि राजनीति में वही तो नही बनती जा रही जैसी कि डॉली बिंद्रा ने बिग बास में अपने लिए गढ़ी थी...ये वही ममता हैं जिनके आदेश पर कोलकाता के हर व्यस्त ट्रैफिक सिग्नल  पर गुरुदेव रबींद्र नाथ टैगोर के गीत बजाए जाते हैं...इसी का हवाला देते हुए रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी (कितने घंटे या दिन  और रेल मंत्री रहेंगे, उन्हें खुद भी नहीं पता) ने गुरुवार को कहा ​कि अगर आप टैगोर की सीख को खुद ही अपने पर नहीं अपनाते तो फिर गली चौराहों पर उनके गीत बजाने की तुक क्या है... त्रिवेदी  गुरुदेव की एक कविता का हवाला देकर ये भी जताना नही भूले कि चाहे वो रेल मंत्री की कुर्सी से हट जाएं लेकिन अपना सिर हमेशा उठा कर चल सकेंगे...बैरकपोर से टीएमसी सांसद त्रिवेदी ने टैगोर की जिस कविता के शीर्षक का हवाला दिया, वो कविता पूरी इस प्रकार है...​

एक ऐसा स्थान,​
​जहां दिमाग़ में कोई भय नहीं,​
​जहां सिर ऊंचा रहता है,​
​जहां ज्ञान पर पहरा नहीं,​
​जहां दुनिया छोटे टुकड़ों में नहीं बंटी,​
​संकीर्ण घरेलू दीवारों से...​
​जहां शब्द सच की गहराई से आते हैं.​
​जहां अथक प्रयास बांहें फैलाए रहते हैं उत्कृष्टता की ओर,
जहां तर्क की स्वच्छ धारा खो नहीं जाती,​
​मृत स्वभाव की उदास रेगिस्तानी रेत में,​
​जहां दिमाग़ बढ़ता है,​
​खुले विचार, कर्मशीलता से मुक्ति के स्वर्ग की ओर,​
​परमपिता,​
​मेरे देश को ऐसा ही स्थान बनाओ....
-नैवेद्य, गीतांजलि ​
( Where the mind is without fear and head is held high)

त्रिवेदी ने यही कहना चाहा कि रेल मंत्री के नाते जो उन्होंने देश और रेलवे के लिए उचित समझा, वही किया...बिना दिमाग में किसी भय के...सिर को ऊंचा रखे हुए...त्रिवेदी की इस बात से मैं प्रभावित हुआ...मैं नहीं जानता कि त्रिवेदी ने ममता के गुस्से को जानते हुए भी ये आत्मघाती कदम क्यों उठाया...मैं नहीं जानता कि इसके पीछे कोई गेमप्लान है या त्रिवेदी ने स्वत ही ये कदम उठाया...लेकिन जिस तरह रेल बजट पेश करने के बाद त्रिवेदी मीडिया से मुखातिब हुए, उनकी बातों और बाडी लैंग्वेज से मुझे सच्चाई झलकती ज़रूर दिखाई दी...वो किसी घाघ राजनेता की तरह शब्दों की बाज़ीगरी करते नहीं दिखे...ऐसा ही लगा कि जो उनके दिल में हैं वही जुबान पर है...त्रिवेदी का ये आचरण लीक से हट कर दिखा...जहां सत्ता के लिए साम-दाम, दंड-भेद  हर तरह के खेल खेले जाते हैं, वहां त्रिवेदी में पद का मोह नहीं दिखा...

दूसरी तरफ़ कांग्रेस को ही देखिए सत्ता से चिपकी रहने के लिए कभी ममता तो कभी मुलायम, कभी मायावती तो कभी करुणानिधि, सबकी चरणवंदना करने के लिए तैयार है, बस आंकड़ों के खेल में सरकार किसी तरह बची रहे...अरे सत्ता का मोह त्याग कर तो देखिए...जनता अब सियासी तिकड़मों या लाग-लपेट को नहीं साफ़-साफ़ सुनना पसंद करती है...प्रधानमंत्री लुंजपुंज रवैया अपना कर कुर्सी पर बने रहने की जगह साफ़-साफ कहें कि देश को विकास की रफ्तार देने के लिए सख्ती से इन- इन कदमों को उठाए जाने की आवश्यकता है...और अगर गठबंधन का दबाव या प्रांतीय क्षत्रपों के संकीर्ण हित ब्रेकरों के ज़रिए इसकी इजाज़त नहीं दे रहे हैं तो सरकार समझौता करने की जगह अपनी बलि चढ़ाने को तैयार है...इस तरह फिर चुनाव में जाकर जनता का सामना करना ज़्यादा अच्छा रहेगा...बजाए इसके कि घुटनों पर घसीटते-घसीटते, कदम-कदम पर समझौता करते किसी तरह पांच साल का कार्यकाल पूरा कर लिया जाए...यही उम्मीद करते करते कि शायद अगले दो साल में जनता का गुस्सा सरकार के लिए कम हो जाए...

ये सही है कि अगर त्रिवेदी लोकसभा चुनाव जीत कर रेल मंत्री की कुर्सी तक पहुंचे तो ये ममता दीदी की कृपा से ही संभव हो सका...लेकिन अगर यही ममता उन्हें देश के रेल मंत्री की जगह सिर्फ अपना हुक्म बजाने वाला प्यादा ही देखना चाहती थीं, तो त्रिवेदी का उनके सामने सिर उठा कर खड़ा होना, खुद में एक दुर्लभ बात है...चाटुकारिता की राजनीति में आज आका अगर घुटने पर चलने का कोई कोई हुक्म देता है तो मातहत निजी स्वार्थ के चलते लोट लगाना शुरू कर देते हैं...त्रिवेदी ने ये जानते हुए भी कि ममता से नाराज़गी मोल लेकर वो रेल मंत्री बने नहीं रह सकते, अपने विवेक के अनुसार फैसला किया...प्रधानमंत्री ने रेल बजट की तारीफ की लेकिन ममता को पलट कर नहीं कह सके कि त्रिवेदी को क्यों और किस बात की सज़ा दी जाए...ऐसा कदम उठाने की जगह सरकार खुद ही जो भी अंजाम हो उसका सामना करने के लिए तैयार है...​

ममता बनर्जी से बंगाल का एक साल में ही मोहभंग हो रहा है, तो उसके पीछे ज़रूर कुछ ठोस वजहें होंगी...लेफ्ट के तीन दशक से ज्यादा के शासन को उखाड़ कर बंगाल की जनता ने बड़ी उम्मीदों के साथ ममता को राइटर्स बिल्डिंग की कमान सौंपी थी...लेकिन ममता का तिलिस्म टूटता नज़र आ रहा है...अगर ममता कोलकाता में बिजली के दाम पंद्रह फीसदी बढ़ा सकती हैं तो फिर रेल किराए बढ़ने पर आम आदमी पर बोझ की दुहाई किस मुंह से देती हैं...जैसे बंगाल ने एक साल पहले ममता पर विश्वास जताया था, वैसे ही उम्मीदों के पहाड़ को पूरा किए जाने की अपेक्षा उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव से की जा रही है...देखना है अखिलेश कैसे खरा उतरते हैं...राजा भैया को क्लीन चिट देने के लिए अखिलेश ने राजनीतिक आरोपों का गुरुवार को जो तर्क दिया, वो संभावनाओं को जगाने वाला नहीं बल्कि ख़तरे की घंटी बजाने वाला है...

सोमवार, 12 मार्च 2012

एक भक्त की मस्त अर्ज़ी भगवन के नाम...खुशदीप​






हे भगवन,​
........................................................................
........................................................................
.........................................................................

सुना है आप बड़े दयालु हैं...लेकिन  आप एक काम सही नहीं कर रहे..पिछले एक साल में आपने कई ऐसे लोगों को अपने पास बुला लिया, जिन्हें मैं बड़ा पसंद करता था...​​मसलन....

मेरे पसंदीदा गायक...भूपेन हज़ारिका​...

​मेरे पसंदीदा अभिनेता...देव आनंद​, शम्मी कपूर​, जाय मुखर्जी...

​मेरे पसंदीदा गज़ल गायक...जगजीत सिंह​...

​मेरे पसंदीदा क्रिकेटर....मंसूर अली ख़ान पटौदी​...

​मेरे पसंदीदा शास्त्रीय गायक...पंडित भीमसेन जोशी​...

​मेरे पसंदीदा संगीत निर्देशक...रवि​...

​मेरे पसंदीदा पेंटर...एम एफ हुसैन ​...

​भगवन वैसे तो आप हर एक के दिल की बात जानते ही हैं...फिर भी आपको बता देता हूं कि मैं भारत के बहुत सारे नेताओं को भी बहुत-बहुत पसंद करता हूं...​नाम तो आप सब का जानते ही हैं....

​आपका आज्ञाकारी 
​एक भक्त




शुक्रवार, 9 मार्च 2012

द्रविड़ के फैसले के पीछे कौन ?...खुशदीप





राहुल द्रविड़ ने आखिर बल्ला खूंटी पर टांग ही दिया...ये राहुल की खुशकिस्मती है या दुर्भाग्य कि वो सचिन तेंदुलकर के समकालीन रहे हैं...उन्हें हमेशा सचिन की छाया में ही रहना पड़ा...तकनीकी रूप से करेक्ट राहुल जैसा और कोई बैट्समैन भारत में नहीं हुआ, ऐसा मेरा मानना है...हमेशा विवादों से दूर और सौम्यता-शालीनता की प्रतिमूर्ति राहुल भी चाहते तो अनिल कुंबले और सौरव गांगुली की तरह ही मैदान से ही विदाई ले सकते थे...लेकिन द्रविड़ ने दिखाया कि वो क्यों सबसे अलग हैं...उन्होंने कप्तान धोनी की युवाओं को मौका देने की चाहत को समझा और फैसला कर लिया...क्या ऐसा करते वक्त राहुल किसी दबाव में थे...अब इसी पर चिंतन-मनन चलेगा..

​इस लिंक पर देखिए द्रविड़ की मनोस्थिति पर एक रिपोर्ट...ये उनकी प्रेस कांफ्रेंस से एक दिन पहले की है...इस रिपोर्ट में आवाज़ मेरी है...

अब राहुल को समर्पित एक गीत- अलविदा राहुल, अलविदा जेम्मी...





गुरुवार, 8 मार्च 2012

'नीले गगन के तले' वाले रवि नहीं रहे..खुशदीप​

​                                                           अलविदा रवि साहब
जन्म-3 मार्च 1926 (दिल्ली)
​निधन-7 मार्च 2012 (मुंबई)
                        संसार की हर शह का इतना ही फ़साना है​,इक धुंध से आना है, इक धुंध में जाना है..



रवि साहब के संगीतबद्ध 30  बेजोड़ गीत इस लिंक पर एक-एक कर सुने जा सकते हैं...

बुधवार, 7 मार्च 2012

​​ ​समाजवाद तो धीरे-धीरे आई बबुआ...खुशदीप




यूपी में माया गईं...मुलायम आ गए...राहुल गांधी आस्तीनें ही चढ़ाते रह गए...बीजेपी को न सत्ता मिली, न राम...आखिर साइकिल इतनी रफ्तार से क्यों दौड़ी...हाथी चारों खाने चित...हाथ खाली...कमल मुरझाया का मुरझाया...इस चुनाव में मतदाताओं के सामने सीधा सवाल था....मायाराज से छुटकारा पाने के बाद यूपी की अगुआई करने लायक नेता किस पार्टी के पास है...

राहुल ने यूपी में कांग्रेस के प्रचार की अगुआई की तो 2012 के सीएम नहीं 2014 में केंद्र में पीएम के तौर पर...बीजेपी के पास तो सीएम के 55 स्वयंभू दावेदार थे (बकौल वरुण गांधी)...इसलिए वोटरों को मज़बूत विकल्प सिर्फ समाजवादी पार्टी में ही दिखा...अब वो चाहें मुलायम हों या अखिलेश...वोटरों को खुद के भरोसे से इंसाफ़ करने लायक माद्दा इस बाप-बेटे की जोड़ी में ही दिखा...

समाजवादी पार्टी इस चुनाव से बहुत पहले ही अपने चाल, चरित्र और दिशा को बदलने के लिए मेहनत करती भी दिखी...समाजवादी पार्टी के चुनाव प्रचार में इस बार न तो बॉलीवुड के सितारों का ग्लैमर देखने को मिला और न ही कॉरपोरेट स्टाइल तड़क-भड़क... अगर कुछ दिखा तो वो था कुछ साल पहले छोटे लोहिया दिवंगत जनेश्वर मिश्र की दी नसीहत का असर...

जनेश्वर बाबू ने जब समाजवादी पार्टी पर पूरी तरह अमर सिंह कल्चर हावी थी, तब बिना किसी लाग-लपेट कहा था...मुलायम जब तक जहाज़ से उतर कर सड़क पर संघर्ष नहीं करेंगे, ज़मीन के लोगों से दोबारा नहीं जुड़ सकेंगे...मुलायम ने संदेश को समझा और खुद के साथ पार्टी को भी बदलना शुरू किया...सबसे भरोसेमंद साथ मुलायम को अखिलेश के तौर पर घर पर ही मिला...मुलायम ने आज़म ख़ान जैसे रुठे सिपहसालारों को दोबारा पार्टी से जोड़ने का काम किया तो अखिलेश ने मायाजाल को तोड़ने के लिए सड़कों को नापना शुरू किया...

अखिलेश से युवाओं ने खुद को जोड़ा तो अखिलेश बुज़ुर्गों को भी चचा-ताऊ के संबोधन से पूरा मान देते और आशीर्वाद लेते दिखे...यहां अखिलेश के सामने कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी बेहद कमज़ोर साबित हुए...राहुल गांधी तमाम रोड शो, भट्टा परसौल में अल सुबह बाइक की सवारी, दलितों के घर में में खाना, 222 जनसभाएँ करने के बाद भी खुद को वोटरों से नहीं जोड़ सके...सिक्योरिटी में घिरे राहुल लोगों को आसमान से उतरे राजकुमार ही नज़र आए, अपने बीच का शख्स नहीं...​
​​
​लोगों की इसी नब्ज़ को पकड़ते हुए अखिलेश अपनी ऐसी छवि गढ़ते चले गए कि ये नौजवान कुछ करके दिखा सकता है...आज के युवा की ज़रूरतों को समझते हुए अंग्रेज़ी और कंप्यूटर के मामले में पिता मुलायम की पहले की घोषित लाइन से अलग लाइन पकड़ी...अखिलेश ने समाजवादी पार्टी के घोषणापत्र में जुड़वाया कि सत्ता में आने पर बारहवीं पास छात्रों को लैपटाप और दसवीं पास छात्रों को टैबलेट मुफ्त दिया जाएगा...ऐसे ही वादों पर निशाना साधते हुए राहुल ने एक रैली में मंच से कागज़ को फाड़ा तो कांग्रेस की यूपी में इस चुनाव में बचीखुची संभावनाओं को भी फाड़ डाला...इस पर अखिलेश ने चुटकी भी ली थी कि इस बार राहुल ने कागज़ फाड़ा है अगली बार कहीं मंच से ही न कूद जाएं...​​​

समाजवादी पार्टी की साइकिल को सरपट दौड़ाने में इस बार मुस्लिम मतदाताओं की भी खासी भूमिका रही...2009 लोकसभा चुनाव की गलती को इस बार मुलायम दूर कर चुके थे...उस चुनाव से पहले मुलायम ने कल्याण सिंह से हाथ मिलाकर बड़ी राजनीतिक भूल की थी...उसी का गुस्सा था कि लोकसभा चुनाव में यूपी में   मुस्लिम  वोट छिटक कर कांग्रेस के पास गया और कांग्रेस को 21  सीटें हाथ लग गई थीं...लेकिन इस विधानसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं ने मुलायम की उस गलती को मुआफ़ कर दिया और थोक के हिसाब से वोट दिया...​
​​
​समाजवादी पार्टी के 2007 में सत्ता से बाहर होने के लिए सबसे बड़ी वजह बनी थी, गुंडाराज की छवि...ऊपर से अमिताभ का ये विज्ञापन और ज़ख्मों पर नमक छिड़कता था कि यूपी में बहुत दम है क्योंकि यहां जुर्म बहुत कम है...इस बार इस छवि को बदलने के लिए अखिलेश ने खास तौर पर काफ़ी मेहनत की...मुलायम के छोटे भाई शिवपाल यादव ने मायावती के खासमखास नसीमुद्दीन सिद्दीकी के छोटे भाई हसीमुद्दीन की सपा में एंट्री कराई हो या आज़म ख़ान ने बाहुबली डी पी यादव की...दोनों बार अखिलेश ने ये कह कर वीटो लगा दिया कि कुख्यात लोगों के लिए पार्टी में कोई जगह नहीं है...

अखिलेश ने ऐसा कर लोगों में यही संदेश दिया कि समाजवादी पार्टी अपने पुराने सारे दाग़ों को धो डालना चाहती है...लोगों ने भरोसा किया और ऐसा जनादेश दिया कि समाजवादी पार्टी को कांग्रेस, आरएलडी तो क्या निर्दलीयों की बैसाखी का सहारा लेने की ज़रूरत न पड़े...अब इतना कुछ मिला है तो समाजवादी पार्टी  को भी आवाम की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए...वो गलती न दोहराएं जो मायावती ने 2007 में स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद की...

ये साफ़ है कि जो लोगों के लिए काम करेगा, उसे ही जनता दोबारा सत्ता का प्रसाद देगी...नीतीश कुमार इसकी अच्छी मिसाल हैं....लेकिन नतीजे वाले दिन ही यूपी में जिस तरह जीत के जोश में समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उत्पात मचाया, उस पर मुलायम-अखिलेश को सख्ती से अंकुश लगाने की ज़रूरत है...संभल में जीत के जुलूस के दौरान फायरिंग में सात साल के बच्चे की मौत हो या झांसी में पत्रकारों की पिटाई या फिर  आरा और फिरोज़ाबाद में टकराव की घटनाएं...ये सब संदेह जगाती हैं कि कहीं समाजवादी पार्टी के राज में फिर दबंगई और गुंडई शुरू न हो जाएं...इनसे आयरन हैंड से निपटने की आवश्यकता है...ज़ाहिर है बदलने में कुछ वक्त लगता है...लेकिन यहां ये कहावत नहीं चलेगी....समाजवाद तो धीरे-धीरे आई बबुआ... ​

इस लेख को ज़ी न्यूज़ के इस लिंक पर भी पढ़ा जा सकता है...

    रविवार, 4 मार्च 2012

    बुज़ुर्गियत की मुस्कान...खुशदीप​ ​​


    सांध्यकाल से जुड़ी पोस्ट की आखिरी कड़ी ​शुक्रवार को ही लिखनी थी...लेकिन शनिवार को 'नूरा कुश्ती' में उलझ गया...लीजिए बुज़ुर्गियत की वो कुछ गुदगुदाती बातें, जिनसे हमें भी कभी न कभी पेश आना ही पड़ेगा...
    ​​​
    ​​


    एक सीनियर सिटीजन ने अपने अस्सी साल के दोस्त से कहा...​
    ​मैंने सुना तुम शादी करने जा रहे हो..​
    ​हां, ठीक सुना है...​
    ​क्या मैं उसे जानता हूं...​
    ​नहीं...​
    ​क्या वो दिखने में सुंदर है...​
    ​हूं...खास नहीं...​
    ​क्या वो अच्छा खाना बनाती है...
    ​​नहीं, वो कुकिंग में अच्छी नहीं है...​
    ​ बहुत अमीर है...​
    ​नहीं ओल्ड एज पेंशनर है...​
    ​फिर तुम्हें बहुत प्यार करती होगी...​
    ​कह नहीं सकता...​
    ​व्हाट द हैल...फिर तुम क्यों इस उम्र में उससे बंधना चाहते हो...​
    ​....क्योंकि वो अब भी कार बहुत अच्छी चला लेती है...​
    ​​
    ..........................................................

    एक बुज़ुर्ग अपने पड़ोसी को बता रहे थे कि उन्होंने सुनने की नई मशीन ली है...कीमत ज़रूर चार हज़ार डालर है, लेकिन है स्टेट ऑफ़ द आर्ट...​बिल्कुल परफेक्ट...
    ​पड़ोसी...रियली, व्हाट काइंड इट इज़...​
    ​बुज़ुर्ग...अभी...12 बजकर 20 मिनट​.......


    ...........................................................

    82 साल के एक जनाब मेडिकल चेकअप के लिए डाक्टर के पास गए...​
    ​​
    ​थोड़े दिन बाद डॉक्टर  ने उन्हें जवान खूबसूरत महिला के साथ हाथों में हाथ डालते घूमते देखा...​बड़े ही खुश और चहकते नज़र आ रहे थे...​
    ​​
     डॉक्टर ...यू आर लुकिंग ग्रेट...​
    ​​
    ​बुज़ुर्ग... डॉक्टर  आप की सलाह ने तो जादू का काम किया है...बस उसी को मान रहा हूं...गेट ए हॉट  मैम एंड बी चियरफुल...​
    ​​
    डॉक्टर...ओह...मैंने ये नहीं कहा था...मैंने कहा था...यू हैव गौट  ए हार्ट मर्मर, एंड बी केयरफुल...

    शनिवार, 3 मार्च 2012

    होली पर ब्लॉगिंग की 'नूरा कुश्ती'...खुशदीप




    वर्ल्ड रेसलिंग इंटरटेंमेंट (WWE) की कुश्तियां देखने में बड़ी रोमांचकारी होती हैं...एक से एक तगड़ा पहलवान...ऐसे खूंखार कि किसी को भी लमलेट कर देने के लिए सिर पर ख़ून सवार...इनकी मारकाट देखकर कोई भी दहल जाए...लेकिन यही तो इनका खेल है...इसी के पीछे तो इनकी कमाई का शास्त्र छुपा है...झूठ की लड़ाई ऐसी सफ़ाई से लड़ो कि सच भी उलटे पैर सरपट दौड़ता नज़र आए...

    बचपन में एकाध बार मुझे भी मेरठ के स्पोर्ट्स स्टेडियम में फ्री-स्टाईल कुश्तियां देखने का मौका मिला था...किंगकांग जैसा कोई विदेश से आया सूरमा...और उसे चुनौती देते दारा सिंह और उनके छोटे भाई रंधावा जैसे खालिस देसी पहलवान...पहले किंगकांग दहाड़ता...भारत में है कोई माई का लाल जो उससे भिड़ने की हिम्मत दिखा सके...रंधावा की ओर से इस चुनौती को कबूल किया जाता...लेकिन एरिना पर पूरा दमखम दिखाने के बावजूद रंधावा मात खा जाते....फिर भाई की हार का बदला लेने के लिए अगले दिन दारा सिंह मैदान में आते..इस गर्जना के साथ कि किंगकांग का ऐसा भुर्ता बनाएंगे कि दोबारा कभी भारत का रुख करने की ज़ुर्रत नहीं करेगा...फिर शुरू होता महासंग्राम...दारा सिंह किंगकांग को धूल चटा कर ही दम लेते...अब इस नूराकुश्ती से जीतने-हारने वाले पहलवान और आयोजक तो मालामाल हो जाते...और दर्शकों को ठगे जाने के बावजूद कोई मलाल नहीं होता...

    सोच रहा हूं होली पर ब्लॉगरों का ऐसा ही कोई दंगल क्यों न करा दिया जाए...


    BLOGGING OF THE BLOGGERS, BY THE BLOGGERS, FOR THE BLOGGERS...यानि ब्लॉगर ही लेखक, ब्लॉगर ही पाठक और ब्लॉगर ही टिप्पणीदाता...पिछले कुछ अरसे से ब्लॉगिंग के साथ एक और आयाम भी जुड़ता दिख रहा है...ब्लॉगरों का साहित्यकार बनना...ब्लॉगर की लिखी किताबें, ब्लॉगर के लिए लिखी किताबें और ब्लॉगर की ओर से ही प्रकाशित किताबें..अब भईया हिंदी ब्लॉगिंग में तीस चालीस हज़ार ब्लॉगर (प्रमाणित कोई आंकड़ा नहीं) होने की बात तो की ही जाती है...यानि किताबें बेचने के लिए अच्छा खासा मार्केट तो यहीं मौजूद हैं...अब सवाल ये कि अपनी किताबों को प्रमोट कैसे किया जाए...

    हर कोई तो चेतन भगत है नहीं जो अपनी हर नई किताब को मार्केट करने के लिए कोई नायाब फंडा ढूंढ लाए...आजकल हर फिल्म की रिलीज से पहले भी बड़े से बड़े सितारों को प्रमोशन के लिए दुनिया भर की ख़ाक छानते देखा जा सकता है...अभी सैफ़ अली ख़ान पर मुंबई के ताज़ होटल में एनआरआई इकबाल शर्मा की धुनाई करने का आरोप लगा तो ऐसा कहने वालों की भी कमी नहीं रही कि ये सारा ड्रामा सैफ़ की आने वाली फिल्म एजेंट विनोद को प्रमोट करने के लिए किया गया...मैं तो कहता हूं ब्लॉगर बिरादरी को भी खुद को प्रमोट करने के लिए मार्केटिंग के ऐसे ही फंडे अपनाने चाहिए...

    बात खत्म अलबेला खत्री जी के सुनाए एक किस्से से करूंगा...मुझे ठीक तरह से तो याद नहीं...उन्होंने बताया था कि किसी शहर में दो भाई थे...दोनों की दुकानें साथ-साथ थीं...और दोनो दिन होते ही एक दूसरे से लड़ना शुरू कर देते थे....और इस लड़ाई का मज़ा लेने के लिए उनकी दुकानों पर तमाशबीनों की भीड़ लगी रहती थी...ज़ाहिर है ये लोग उनकी दुकानों से सामान भी खरीदते थे...यानि इस लड़ाई से आखिरकार फायदा उन दोनों भाइयों को ही होता था...अलबेला जी से निवेदन करुंगा कि इस किस्से को विस्तार से सुनाएं...

    शुक्रवार, 2 मार्च 2012

    बजेगा इश्क-इश्क, सुनाई देगा किश्न-किश्न...खुशदीप



    अच्छा लगा ये जानकर संध्याकाल के प्रति ब्लॉगजगत सचेत है...कल अपनी पोस्ट देखो ! तुम भूल जाओगे (1) पर डॉ टी एस दराल सर और शिखा वार्ष्णेय की टिप्पणियां खास तौर पर अच्छी लगीं...

    पहले डॉ दराल...

    तू मेरा चाँद मैं तेरी चांदनी !
    बुढ़ापे में पति पत्नी ही एक दूसरे का सहारा होते हैं .
    फिर सुनाई दे या न दे , याद रहे या न रहे

    शिखा-

    अगर साथ रहे तो कुछ गम नहीं ..परेशानी तो तब हो जब एक चला जाये.:(

    वाकई इस स्टेज पर तो अगर कहीं ये गाना भी बज रहा हो कि ये इश्क इश्क है, इश्क इश्क, ये इश्क इश्क है, इश्क ...वो अपनी धुन में सुनाई देगा...ये  किश्न किश्न है, किश्न किश्न, ये  किश्न किश्न है, किश्न ...ज़ाहिर है इस उम्र में भक्ति भाव ज़्यादा जाग जाता है तो फिर तो यही सुनाई देगा न...

    चलिए अब देखो ! तुम भूल जाओगे (2) कड़ी पर आते हैं...


    एक बुज़ुर्ग दंपति दूसरे दंपति के घर डिनर पर गए...

    खाने के बाद दोनों पत्नियां किचन में चली गईं...

    टेबल पर दोनों बुज़ुर्ग पति ही बैठे रह गए...

    पहला बुज़ुर्ग...कल रात को हम एक नए रेस्टोरेंट गए थे...बहुत ही बेहतरीन रेस्टोरेंट था....बड़ा अच्छा अनुभव रहा...मैं तो कहूंगा, आप दोनों भी एक बार ज़रूर वहां होकर आओ..

    दूसरा बुज़ुर्ग...क्या नाम था उस रेस्टोरेंट का...

    पहले बुज़ुर्ग ने रेस्टोरेंट का नाम याद करना शुरू किया...नहीं याद आया...दिमाग़ पर बहुत ज़ोर देने के बाद भी वो रेस्टोरेंट के नाम को याद नहीं कर सके...काफ़ी देर बाद उन्होंने दूसरे ब़ुज़ुर्ग से कहा...उस फ़ूल का क्या नाम होता है जो  प्यार का इज़हार करने के लिए दिया जाता है...अरे वही जिसका रंग लाल होता है, जिस पर कांटे भी होते हैं...

    दूसरा बुज़ुर्ग...क्या तुम्हारा मतलब रोज़ से है....

    पहला बुज़ुर्ग ....हां, हां....वही वही...

    ये कहकर पहले बुज़ुर्ग टेबल पर बैठे बैठे ही मुड़े और किचन की ओर ज़ोर से आवाज़ देकर कहा...

    .................................

    ................................

    ................................

    रोज़ !!! डार्लिंग...उस रेस्टोरेंट का क्या नाम था, जहां हम कल रात गए थे...


    (ई-मेल पर आधारित)

    क्रमश :
    ------------------------
    चलिए अभी तो इश्क-इश्क को  इश्क-इश्क की तरह ही सुन लीजिए...





    गुरुवार, 1 मार्च 2012

    देखो ! तुम भूल जाओगे (1)...खुशदीप



    जीवन के संध्याकाल में सभी को जाना है...ये शाश्वत सत्य है, लेकिन रोज़ की भागदौड़ मे शायद ही हमें ये याद रहता है...सुनने, सोचने, समझने की आज जो हमारे पास शक्ति है, उम्र बढ़ने के साथ उसमें कमी आना लाज़मी है...बुज़ुर्गों के व्यवहार को देखकर कभी हम खीझते भी हैं...लेकिन कल हम भी इसी हालत से गुज़रेंगे, ये हर वक्त याद रखा जाए तो बेहतर है...आज से सीनिअर सिटिज़न्स को समर्पित  छोटे छोटे किस्सों की एक श्रंखला शुरू कर रहा हूँ, अपने आने वाले कल को ज़ेहन में रखते हुए...

    नब्बे के आसपास के एक दंपति...दोनों को चीज़े याद रखने में दिक्कत...डॉक्टर ने दोनों का चेकअप करने के बाद सलाह दी कि स्वास्थ्य को लेकर उन्हें कोई दिक्कत नहीं है...भूलने की बीमारी से निपटने के लिए दोनों को कागज़ पर लिख कर चीज़ें याद रखने की आदत डालनी चाहिए...

    उसी रात को दोनों टीवी देख रहे थे तो बुज़ुर्ग जेंटलमैन ने कुर्सी से उठते हुए कहा...मैं किचन में जा रहा हूं, तुम्हें कुछ चाहिए तो नहीं...

    इस पर सीनियर लेडी ने कहा...क्या तुम मेरे लिए आइसक्रीम का बाउल ला सकते हो....

    जेंटलमैन...अवश्य...

    लेडी....याद रखने के लिए इस बात को क्या तुम्हें कागज़ पर नहीं लिख लेना चाहिए...

    जेंटलमैन...नहीं, नहीं, इसकी कोई ज़रूरत नहीं, मुझे याद रहेगा...

    लेडी...मुझे आइसक्रीम के ऊपर स्ट्राबरीज़ बहुत पसंद है...ये लिख ही लो तो सही रहेगा....भूलोगे नहीं...

    जेंटलमैन...मुझे याद है कि तुम्हें आइसक्रीम का बाउल चाहिए वो भी स्ट्राबरीज़ की टॉपिंग के साथ...सही है न...

    लेडी...मुझे थोड़ी व्हिप्पड क्रीम भी साथ चाहिए...मुझे पक्का यक़ीन है तुम ये सब भूल जाओगे...ये सब लिख लो तो बेहतर रहेगा...

    जेंटलमैन थोड़ा नाराज़गी जताते हुए...मुझे लिख कर रखने की ज़रूरत नहीं, मैं सब याद रख सकता हूं...आइसक्रीम साथ में स्ट्राबरीज़ और व्हिप्पड क्रीम...मुझे सब याद है...अब मुझे ज़्यादा नसीहत मत दो...

    ये कह कर जेंटलमैन किचन में चले गए....बीस मिनट बाद वो लौटे...पत्नी को कॉफ़ी के कप के साथ हॉफ फ्राई एग की प्लेट थमाई....

    ये थामने के बाद लेडी थोड़ी देर तक प्लेट को देखती रही...फिर बोली...भूल गए न...
    ...................................

    ....................................

    ........................................

    ....मेरे टोस्ट कहां हैं....


    (ई-मेल पर आधारित)

    क्रमश: