मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

रेपुटेशन​​ भी कोई चीज़ होती है...खुशदीप


नया रोज़गार ढूंढ लिया है मैंने
वन डे वर्ल्ड चैंपियन टीम इंडिया आस्ट्रेलिया में ट्राई सीरीज़ से करीब करीब बाहर हो चुकी है...श्रीलंका से मैच चल रहा है, अभी तक इसमें भी धोनी एंड कंपनी का रवैया वही ढाक के तीन पात वाला है..यानि दिसंबर में डाउन अंडर जाने के बाद से  जिस पैट्रन से हमारी टीम खेल रही है, उससे एक इंच भी इधर-उधर नहीं...आखिर रेपुटेशन और कंसिस्टेन्सी भी कोई चीज़ होती है...​
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​इस सीरीज़ के बाद बीसीसीआई को फ़ैसला लेना चाहिए कि सिर्फ देश में ही सीरीज़ खेला करेगा...विदेश दौरा करेगा भी तो ज़िम्बाबवे, बांग्लादेश जैसे ​देशों का...ऐसे में रिकार्ड हमेशा चोखा ही रहेगा...​
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​धोनी को कभी ब्रेक नहीं देना है...धोनी खुद ही स्लो रेट के चलते हर सीरीज़ में दो-तीन ब्रेक (सस्पेंशन) तो ले ही लेते हैं...​
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​सचिन तेंदुलकर के महाशतक में देरी से उनके प्रशंसक निराश न हो..सचिन का पुत्र अर्जुन भी जल्दी टीम इंडिया में होगा, दोनों मिलकर तो महाशतक बना ही देंगे...​
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​अब टीम इंडिया को ज़रूरत है तो बस इस कोच की...


रविवार, 26 फ़रवरी 2012

सेक्सी कहने पर हंगामा क्यूं है बरपता ...खुशदीप ​

1994 में करिश्मा कपूर और गोविंदा की फिल्म खुद्दार में एक गाने के बोल थे​- सेक्सी, सेक्सी, सेक्सी मुझे लोग बोलें, हाय सेक्सी हेलो सेक्सी क्यूं बोले...गाने पर बवाल हुआ...सेंसर बोर्ड को दखल देना पड़ा...और गाने में सेक्सी को हटा कर बेबी कर दिया गया...खैर ये तो रही 18 साल पहले की बात...तब से अब तक गंगा-जमुना में बहुत पानी गुज़र गया है...अब सेक्सी कहना बुरी बात नहीं रहा..बल्कि इसे तो लड़कियों और महिलाओं को काम्पलिमेंट की तरह लेना ​चाहिए...ये मैं नहीं कह रहा बल्कि अपने देश के महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा कह रही हैं...​

 ममता शर्मा 

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जयपुर में 25 फरवरी को एक जैन संस्था की महिला शाखा के कार्यक्रम से रू-ब-रू ममता शर्मा ने जो कुछ कहा, उसका लबोलुआब यही था कि अगर सड़क पर कोई रोमियोछाप लड़का किसी लड़की को सेक्सी कहता है तो उसे बुरा नहीं मानना चाहिए...बकौल ममता शर्मा अगर लड़कों का समूह सेक्सी कह कर छेड़ता है तो भड़कना नहीं चाहिए, न ही पुलिस में शिकायत के लिए जाना चाहिए बल्कि इसे सकारात्मकता के साथ लेना चाहिए...​
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​ममता जी ने आगे आज के संदर्भ में सेक्सी की व्याख्या भी की है..सेक्सी का मतलब होता है बला की खूबसूरत और दिलकश...अगर कोई ऐसा कहता है तो उसे स्पोर्टिंगली लिया जाना चाहिए...उनका मतलब वो नहीं होता जो आप समझती हैं...अगर आप इसे दूसरी तरह लेकर नाराज़गी दिखाती हैं तो इससे झगड़े की नौबत आ जाती है...ममता जी ये बोल रही थीं और हाल में बैठी महिलाओं और लड़कियों को कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था...​

राजस्थान  बीजेपी की उपाध्यक्ष सुमन शर्मा ने इस बयान को भारतीय संस्कृति और मूल्यों के ख़िलाफ़ बताया है.. ​कुछ महिला संगठनों ने ममता शर्मा के बयान को नारी की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला मानते हुए उनसे इस्तीफ़े की मांग की है...इन संगठनों का कहना है कि इस तरह के बयानों से सड़कों पर शोहदे किस्म के तत्वों को बढ़ावा मिलेगा और लड़कियों-महिलाओं की परेशानी बढ़ेंगी...साथ ही ये बयान सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के भी ख़िलाफ़ जाता है...विशाखा बनाम राजस्थान सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि कोई भी शाब्दिक या गैर शाब्दिक इशारा, जिस पर   सुनने वाले को ऐतराज़ हो या उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ हो तो उसे यौन-उत्पीड़न ही माना जाएगा...


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​खैर ये तो रही ममता शर्मा के बयान की बात...लेकिन महानगरों की पेज थ्री संस्कृति में वाकई सेक्सी शब्द को काम्पलिमेंट की तरह ही लिया जाता है...कुछ साल पहले आई अमिताभ बच्चन की फिल्म चीनी कम में अमिताभ एक बच्ची को सेक्सी नाम से ही बुलाते थे...लेकिन वो बिल्कुल निर्दोष और निश्चल स्नेह की अभिव्यक्ति थी...अब आप ही बताइए कि सेक्सी कहना काम्पलिमेंट है या असंसदीय अभिव्यक्ति...
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शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

बेटियों को पहला वारिस क्यों नहीं माना जाता...खुशदीप





पिछले साल उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की पत्नी सलमाअंसारी के एक बयान को लेकर खूब हो हल्ला हुआ था।सलमा अंसारी ने कहा था कि हमारे देश में मां - बाप कोअपने यहां बेटी पैदा होते ही उसे जहर दे देना चाहिए।जाहिर है , यह सलमा अंसारी का आक्रोश था , जो इन तीखेशब्दों में फूट पड़ा था। उन्होंने देश में लड़कियों से होने वालेभेदभाव और महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों परअपनी प्रतिक्रिया जताई थी। इस देश में कभी आरक्षण तोकभी पारिवारिक संपत्ति में महिलाओं को पुरुषों के समानसंपत्ति के अधिकार की बात कर महिला सशक्तिकरण के बड़े- बड़े दावे जरूर किए जाते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत क्याहै , यह किसी से छुपी नहीं है।

पुरातनपंथी सोच
एक ही माता - पिता की संतान होने के बावजूद वारिस सिर्फ लड़के को ही क्यों माना जाता है ? लड़कियों सेभेदभाव घर पर ही शुरू हो जाता है। पुरातन काल से हमारे यहां ऐसी सोच चली आ रही है कि लड़का हीपरिवार के वंश को आगे बढ़ाएगा। आखिर लड़कियां वंश को आगे क्यों नहीं बढ़ा सकतीं ? इस सवाल पर देश मेंबहस क्यों नहीं छिड़ती कि कानून की दृष्टि से अगर लड़के और लड़की को एक समान अधिकार है तो फिर सिर्फलड़के को वारिस मानने का सवाल कहां से उठता है ? लड़कियों को पहला वारिस मानने में दिक्कत क्यों होती है।कोई इस पर सोचना भी पसंद नहीं करता कि विवाह के बाद लड़कियों को ही लड़के के घर क्यों जाना होता है।इसका उल्टा क्यों नहीं हो सकता ?

मरुमकथायम परंपरा
अपने देश में सिर्फ केरल ही एक ऐसा राज्य दिखता है , जहां मरुमकथायम परंपरा के मुताबिक महिलाओं के नामपर वंशावली चलने की मिसाल मिलती है। नायर राजसी खानदान से जुड़ी इस परंपरा में महिलाओं को वंश कावारिस बनने का अधिकार रहा है। इस परंपरा के तहत सिर्फ बहन या उनके बच्चे ही परिवार की संपत्ति के वारिसबनते हैं। सभी जानते हैं कि केरल में अधिकारों की दृष्टि से महिलाओं की जो स्थिति है , वह देश में और कहीं नहींहै। पुरुष - महिला लिंग अनुपात की बात की जाए तो बाकी देश में भले ही महिलाओं की संख्या पुरुषों केमुकाबले लगातार कम हो रही हो , लेकिन केरल में मामला उलटा है। यहां हर 1000 पुरुषों पर 1084 महिलाएंहैं। व्यावसायिक और सामाजिक दृष्टि से भी यहां महिलाएं अग्रणी हैं। केरल के इन नतीजों को देखते हुए बाकी देशमें भी विरासत की इसी परंपरा का अनुसरण क्यों नहीं किया जाता ?

हिंदू उत्तराधिकार कानून 1956 में अभी सात साल पहले किए गए बहुप्रचारित संशोधन के बाद भी पारिवारिकसंपत्ति में महिलाओं को पुरुषों के साथ समानता का अधिकार हासिल नहीं हो पाया है। इसके कानून के तहतअगर कोई निस्संतान विधवा बिना वसीयत लिखे मर जाती है तो उससे जुड़ी हर चीज पर ससुराल वालों काकब्जा हो जाता है। यहां तक कि उस रकम पर भी , जो उस महिला ने जीवनपर्यंत नौकरी या स्वरोजगार सेजुटाई थी। अपवाद स्वरूप अगर उसे कोई संपत्ति अपने माता - पिता से मिली हो तो उपरोक्त परिस्थिति में वहउसके पिता के वारिसों को मिलेगी। दूसरी तरफ किसी विधुर की बिना वसीयत लिखे मौत होती है तो उसकीसंपत्ति पर उसके माता - पिता और परिवार का हक हो जाता है। इस सूरत में पत्नी के माता - पिता उस संपत्ति मेंसे फूटी कौड़ी के भी हकदार नहीं होते। एक ही परिस्थिति को अलग - अलग चश्मे से देखने की यह कैसी व्यवस्थाहै ?

हिंदू कोड बिल पर बहस के दौरान पुरुष सांसदों के बहुमत ने पुत्रियों को पैतृक संपत्ति ( मायके ) पर अधिकार देनेका विरोध किया था। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के तहत पुत्रियों को पैतृक संपत्ति पर अधिकार नहींथा। लेकिन 2005 में संशोधन के जरिए कानूनी तौर पर उन्हें यह हक मिल गया। कुछ महिलाओं ने इस बदलावके बाद पैतृक संपत्ति पर दावे भी किए हैं। लेकिन ऐसी महिलाओं की संख्या अभी कम है , क्योंकि उन्हें अपनेपरिवार से संबंध बिगड़ने का डर रहता है। ईसाइयों और मुसलमानों के अपने अलग कानून हैं। अलग - अलगराज्यों के आदिवासियों के संपत्ति अधिकार उनके रीति - रिवाजों से तय होते हैं। राज्य भी अपने उत्तराधिकारकानून बना सकते हैं। यानी किसी महिला के संपत्ति अधिकार उसके मजहब , वैवाहिक स्थिति , राज्य औरजनजातीय पहचान के मुताबिक बदलते रहते हैं। जाहिर है , बराबरी के सिद्धांत को चोट पहुंचाने की कई वजहेंदेश में मौजूद हैं।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 4 (2) में जोत की जमीन का विभाजन रोकने के लिए अथवा जमीनकी अधिकतम सीमा तय करने के लिए पुत्री को जमीन की विरासत का अधिकार नहीं दिया गया। वे खेत में कामतो कर सकती हैं पर उसकी मालिक नहीं बन सकतीं। महिलाओं की इस मामले में क्या स्थिति है , यह 2000-01की कृषि जनगणना से साफ हो जाता है। इस जनगणना के मुताबिक लगभग 12 करोड़ लैंड होल्डरों में से महजएक करोड़ 30 लाख यानी 11 फीसदी महिलाएं हैं।

विरासत कानून के झोल

विवाह के बाद पति की व्यक्तिगत संपत्ति में आधा हिस्सा मांगने पर तर्क दिया जाता है कि पिता और पति , दोनोंकी संपत्ति का हक महिला को क्यों दिया जाए। पति की संपत्ति में आधा अधिकार वे उसकी मृत्यु के बाद ही पासकती हैं , अन्यथा उन्हें सिर्फ गुजारे का खर्च पाने का हक है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 23 के अधीनयदि किसी स्त्री को एक मकान विरासत में मिला है और उसमें उसके पैतृक परिवार के सदस्य रह रहे हैं तो उसेउस मकान में बंटवारा करने का कोई अधिकार नहीं है। वह उसमें रह भी तभी सकती है जब वह अविवाहित होया तलाकशुदा। इस प्रकार अनेक अपवाद 2005 के संशोधन द्वारा पुत्री को पैतृक संपत्ति में मिले उत्तराधिकार कोबेमानी बना देते हैं। साफ है कि महिलाओं को पहला वारिस बनाने जैसा क्रांतिकारी बदलाव लाए बिना महिलाओंकी स्थिति सुधरने की बात करना ख्याली पुलाव पकाने के सिवा कुछ नहीं है।
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यह लेख navbharat times  के 16 फ़रवरी के अंक में प्रकाशित हुआ है-





गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

माय नेम इज़ ख़ान एंड आई एम ए...खुशदीप​




जो पहले कभी छोटे नवाब थे...अब बड़े नवाब हैं...अब नवाब साहब से कोई आवाज़ नीची करने के लिए कहने की गुस्ताख़ी कैसे कर सकता है...वो भी जब नवाब साहब के साथ उनकी होने वाली बेगम भी मौजूद थी...बस ठनक गया नवाब का माथा...जड़ दिया इकबाल पर घूंसा और कर लिया अपना इकबाल बलंद...बदनाम हुए तो क्या, नाम तो हुआ...घर के प्रोडक्शन की फिल्म की रिलीज़ से पहले मुफ्त की पब्लिसिटी का जुगाड़ और हो गया...नवाब सैफ़ अली ख़ान की करतूत की हर इच्ची-बिच्ची तो आप तक पहुंच ही गई है...मैं उन्हें दोहराने नहीं जा रहा...मैं तो सैफ़ के इस कारनामे पर न्यू मीडिया पर ली गई कुछ चुटकियों को आप तक पहुंचा रहा हूं...​
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​ये सैफ़ अली ख़ान की पहली 'सोलो हिट' है...​
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​पटौदी गांव के लोगों की नवाब के लिए पसंद  'सेफ़' नहीं है..​
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​ताज होटल में दक्षिण अफ्रीका के एनआरआई पर हमला बताता है कि ताज होटल काफ़ी अन'सेफ़'  है...​
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​वर्ल्ड रेसलिंग एंटरटेन्मेंट (WWE ) ने शाहरुख़ और सैफ़ को पांच साल के कांट्रेक्ट के लिए साइन कर लिया है...​​​
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​PICK THE  ODD MAN OUT का नया सवाल...चार विकल्प हैं-
1.सलमान ख़ान 2. शाहरुख़ ख़ान 3. सैफ़ अली ख़ान 4. आमिर ख़ान

करन जौहर माय नेम इज़ ख़ान का सीक्वेल बनाने जा रहे हैं...इसके लिए शाहरुख़ के साथ उन्होंने सैफ़ को भी साइन किया है...इस फिल्म का नाम है- अवर नेम्स आर ख़ान'स एंड वी आर डेफिनेटली...  ​​

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

रफ्तार पर डेंट अच्छे हैं...खुशदीप​ ​​


एक मल्टीनेशन कंपनी का सीईओ अपनी नई जगुआर कार पर साइडलेन से गुज़र रहा था...​वो पार्क की गई कारों के बीच से निकलते-दौड़ते इक्का-दुक्का बच्चों को देख रहा था...साइडलेन में होने के बावजूद गाड़ी रफ्तार में थी...तभी उसकी कार के एक दरवाज़े पर पत्थर लगने जैसी आवाज़ सुनाई दी...सीईओ ने झट से ब्रेक लगाए...आगबबूला कार से निकला..आसपास देखा...एक बच्चा दिखाई दिया...सीईओ उसे पकड़ कर ज़ोर से डांट पिलाने लगा...जानते हो तुमने क्या किया है...ये कौन सा खेल है...नई कार का सत्यानाश कर दिया... डेंट ठीक कराने में कितने पैसे लगेंगे, कुछ पता भी है...

बच्चे ने दयायाचना के अंदाज़ मे कहा...आई एम रियली सारी सर, लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूं...मैंने पत्थर इसलिए फेंका क्योंकि कोई रूक नहीं रहा था...ये कहते हुए बच्चे की आंखों के आंसू उसके गालों तक छलक आए थे...​

बच्चे ने फिर उंगली से एक पार्क की हुई कार के साइड में इशारा किया...ये मेरा भाई है...पगडंडी  से व्हील चेयर का पहिया फिसलने की वजह से नीचे गिर गया है..उसे चोट भी आई है...लेकिन उसका वजन ज़्यादा होने की वजह से मैं उसे उठा नहीं पा रहा...क्या आप उसे व्हील चेयर पर बिठाने में मेरी मदद करेंगे...
 
सुबकते बच्चे के सामने सीईओ अब निशब्द खड़ा था...उसे अपने गले में कुछ अटका महसूस हुआ..जल्दी ही वो संभला और उसने बच्चे के भाई को व्हील चेयर पर बिठाया...जेब से रूमाल निकाल कर मिट्टी के दागों को साफ़ किया...बच्चे के भाई को कुछ खरोचें ही आई थी...कोई गंभीर बात नहीं थी...बच्चे ने फिर सीईओ को शुक्रिया कहा..,और भाई की व्हीलचेयर को धकेलते हुए पगडंडी पर अपने घर की तरफ़ चल दिया...सीईओ कुछ देर वहीं खड़ा ये दृश्य देखता रहा...फिर वो धीरे कदमों से अपनी कार की तरफ बढ़ा...


कार के दरवाज़े पर अच्छा खासा डेंट पड़ गया था...लेकिन सीईओ ने उस डेंट को कभी सही नहीं कराया...सिर्फ इसलिए कि ये संदेश उसे हमेशा मिलता रहे...अपनी ज़िंदगी में कभी इतनी रफ्तार से नहीं भागो कि दूसरों को तुम्हारा ध्यान खींचने के लिए पत्थर फेंकना पड़ जाए...ऊपर वाला हमारी आत्मा के साथ बुदबुदाता रहता है...हमारे दिल से बात करता है...जब हमारे पास उसे सुनने के लिए वक्त नहीं रहता तो वो किसी पत्थर का सहारा लेता है..अब ये हमारे पर है कि हम उसे सुने या न सुने...



स्लॉग  चिंतन-


अगर आप किसी की खुशियों की इबारत लिखने वाली पेंसिल नहीं बन सकते तो दूसरों के दर्द मिटाने वाले रबर बनने की ही कोशिश कीजिए...


 

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

पाकिस्तान पर वो सब जो आप जानना चाहते हैं...खुशदीप​​




आजकल एक चुटकुला बड़ा चल रहा है- भारत में सेना प्रमुख की उम्र सरकार तय करती है और पाकिस्तान में सरकार की उम्र वहां के सेना प्रमुख तय करते है...पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में स्थिरता भारत के हित में है...लेकिन वहां राजनीतिक तौर पर हालात बड़े विस्फोटक हो चले हैं...क्या आप पाकिस्तान के हालात के बारे में हर बात जानना चाहते हैं...

पाकिस्तान में ऊंट किस करवट बैठेगा ?​
गिलानी जेल गए तो कौन बनेगा पाकिस्तान का प्रधानमंत्री ?​
​​ज़रदारी क्या कलाकारी दिखाने की तैयारी कर रहे हैं​?
​​गिलानी क्यों खुद को राजनीतिक शहीद करने पर तुले हैं​?
​​जनरल कियानी किस बात का इंतज़ार कर रहे हैं ?​
​​इमरान ख़ान की रैलियों में जुटती भीड़ के पीछे ताकत किसकी है​​?
​नवाज़ शरीफ़ के लिए चीफ़ जस्टिस इफ्तिख़ार चौधरी के दिल में साफ्ट कार्नर क्यों है​ ?
बैरिस्टर ऐतज़ाज़ अहसान क्यों ज़रदारी के लिए अहम हो गए हैं​?

क्या आप इन सवालों के जवाब जानना चाहते हैं-

आप को इस लिंक पर इन सभी सवालों का जवाब मिलेगा...​
पाकिस्तान में कौन साबित होगा सुप्रीम ?
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आप से एक निजी अनुरोध कृपया इस लिंक पर ही अपनी राय ज़रूर जताएं...
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रोटी से सस्ती जान...खुशदीप ​​

एक आदमी रोटी बेलता है,
एक आदमी रोटी खाता है,
एक तीसरा आदमी भी है,
जो न रोटी बेलता है,
न रोटी खाता है,
वो सिर्फ रोटी से खेलता है,
मैं पूछता हूं,
ये तीसरा आदमी कौन है,
मेरे देश की संसद मौन है...
- धूमिल 


अब पटना की ये ख़बर...



ना के कदमकुआं पुलिस स्टेशन के अंतर्गत जेहाजी कोठी में रहने वाला दरोगा महतो मंगलवार रात को ठेला चलाने वाले प्रेम कामटी के साथ बैठा था...रमन और सुरेश नाम के दो शख्स वहां और भी बैठे थे..प्रेम सबके लिए रोटियां बना रहा था...तभी वहां क्राकरी की दुकान पर काम करने वाला रवि आया..नशे में धुत रवि ने रोटी की मांग की...रोटी मिलने में देर होती देख रवि ने झगड़ना शुरू कर दिया...40 साल के महतो समेत चारों लोगों ने रवि को भगा दिया...लेकिन थोड़ी देर बाद रवि दर्जन से ज़्यादा साथियों के साथ लौटा...सभी हाकियों से लैस थे...आते ही उन्होंने महतो समेत चारों की धुनाई शुरू कर दी...महतो, रमन और सुरेश इस हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए...सूचना मिलने पर पुलिस ने मौके पर पहुंच कर स्थिति को संभाला.. रमन और सुरेश को पटना मेडिकल कालेज अस्पताल में भर्ती कराया गया...लेकिन महतो बिना बताए अपने घर के लिए निकल गया...बुधवार सुबह महतो की हालत ज़्यादा बिगड़ी तो उसे भी पटना मेडिकल कालेज अस्पताल ले जाया गया...लेकिन उसने अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ दिया...पुलिस ने सोनू और दिलीप नाम के दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है...बाकी सभी हमलावरों की तलाश जारी है...


ख़बर आपने पढ़ ली...ये सच इस देश का ही है...एक इन्सान की जान यहाँ एक रोटी से भी सस्ती है...और नेता चुनाव के वक़्त वोटरों से आसमान से चाँद-तारे तोड़ कर लाने के वादे करते नहीं थकते...







मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

सच ! ज़माना बदलता है...खुशदीप​


ज़माना बदल गया है...​
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पहले रिश्ते प्यार के लिए होते थे, चीज़ें इस्तेमाल करने के लिए..​​


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अब चीज़ों को प्यार किया जाता है और रिश्तों को इस्तेमाल...​
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ज़िंदगी की इस कड़वी हक़ीक़त को छोड़िए, इस तस्वीर को देखिए...


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अब तो मानेंगे बदल रहा है ज़माना...

स्लॉग  ओवर..

मक्खन ढक्कन से...दस साल पहले जब मेरी मक्खनी से शादी हुई थी तो उसकी फिगर कोकाकोला की पुरानी बाटल जैसी थी..



और अब...
ढक्कन...अब क्या...

मक्खन...है तो अब भी कोकाकोला  जैसी ही, लेकिन...



2.5 लीटर की बाटल जैसी...


शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

'अभिन्न' का मतलब यह होता है, 'हाँ नहीं तो'...खुशदीप

शादी की अंगूठी हमेशा चौथी उंगली (Ring Finger) यानि अनामिका में ही क्यों पहनी जाती है...चीन में इसको बड़े खूबसूरत और तार्किक ढंग से समझाया जाता है...हाथ की हर उंगली का प्रतीक किसी रिश्ते से होता है... जैसे...

अंगूठा या Thumb-  माता-पिता


तर्जनी या Index Finger-  भाई-बहन


मध्यमा या Middle Finger-  खुद की प्रतीक


अनामिका या Ring Finger-  जीवन-साथी (पति या पत्नी)


कनिष्ठा या Little Finger-  बच्चे


चलिए अब उंगलियों के रिश्तों से संबंध को समझ लिया...





अब दिए हुए चित्र के मुताबिक दोनों हाथ की हथेलियों को सामने लाएं और बीच की उंगलियों को मोड़ कर साथ लगाएं, फिर अंगूठों और बाकी तीन-तीन उंगलियों के सिरों को भी आपस में जुड़ने दें...

अब माता-पिता के प्रतीक अंगूठों को अलग करने की कोशिश करें...आसानी से हो जाएंगे क्योंकि माता-पिता पूरी ज़िंदगी आपके साथ नहीं रह सकते...उन्हें कभी न कभी आपको एक दिन छोड़कर जाना ही होगा...

अब दूसरे रिश्ते की बारी...अंगूठों को पहले के तरह ही जोड़ कर इंडेक्स फिंगर या तर्जनियों को अलग कीजिए...ये भी आसानी से अलग हो जाएंगी...यानि भाई-बहन भी साथ नहीं रह सकते...उनके अपने परिवार होंगे, उन्हें अपनी ज़िंदगी जीनी होगी...

अब तर्जनी को फिर जोड़ लीजिए और सबसे छोटी उंगलियों यानि कनिष्ठाओं को अलग करने की कोशिश कीजिए...ये भी खुल जाएंगी...क्योंकि आपके बच्चों को भी एक दिन शादी कर घर बसाने होंगे और वो अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जीना पसंद करेंगे...

अब छोटी उंगलियों को फिर जोड़ लीजिए...अब अपनी अनामिका यानि रिंग फिंगर (चौथी उंगलियों) को अलग करने की कोशिश कीजिए...

बताइए क्या अलग होती हैं...उन्हें थोड़ा सा भी अलग करने के लिए कितना ज़ोर लगता है...

यही है पति-पत्नी का रिश्ता...



रविवार, 5 फ़रवरी 2012

अदा जी, स्पेन में मुसीबत में हैं ?....खुशदीप​



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सबसे पहले ये मेल पढ़ लीजिए जो अभी थोड़ी देर पहले मुझे मिला है...​
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​ Dear Friend,

Hope you get this on time,sorry I didn't inform you about my trip in Spain for a program, I'm presently in Madrid and am having some difficulties here because i misplaced my wallet on my way to the hotel where my money and other valuable things were kept.I want  you to assist me with a loan of 2950 Euros to sort-out my hotel bills and  to get myself back home.I have spoken to the embassy here but they are not responding to the matter effectively,I will appreciate whatever you can afford to assist me with,I'll Refund the money back to you as soon as i return, let me know if you can be of any help. I don't have a phone where i can be reached. Please let me know immediately.
   
    
Thanks And regards,

Swapna Manjusha 'ada'
CANADA, OTTAWA ​ ​

मुझे पूरा यकीन है की आप में से कई को यह मेल मिला होगा, ​ये शतप्रतिशत जालसाज़ी है...ऐसी घटनाएं पहले भी कई बार हो चुकी हैं, इसलिए कोई ऐसे मेल के झांसे में न आए...

सॉफ्टवेर के फूल...खुशदीप

मेरे सबसे पसंदीदा फिल्मकार गुरुदत्त ने जब प्यासा  बनाई थी तो आज जैसा इंटरनेटी युग नहीं था...​साहिर लुधियानवी साहब ने इस फिल्म के लिए कालजयी गीत लिखा था..


ये महलों, ये तख्तों, ये ताजो की दुनिया, 
ये इनसां के दुश्मन रिवाजों की दुनिया, 
ये दौलत के भूखे रिवाज़ों की दुनिया, 
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है...



ये फिल्म आज के आईटी युग में सॉफ्टवेर के फूल नाम से बनती तो शायद साहिर साहब का ये गीत कुछ इस अंदाज़ में लिखा जाता...​

ये डाक्यूमेंट्स, ये मीटिंग्स, ये फीचर्स की दुनिया,
​ये इनसां के दुश्मन कर्सर की दुनिया,
ये डेडलाइन्स के भूखे मैनेजमेंट की दुनिया,
​ये प्रोडक्ट अगर बन भी जाए तो क्या है...

यहां इक खिलौना है प्रोग्रामर की हस्ती,
​ये बस्ती है, मुर्दा बग-फिक्सर्स की बस्ती,
​यहां पर तो रेसेस है इन्फ्लेशन से सस्ती,
​ये रिव्यू अगर हो भी जाए तो क्या है...

हर इक की-बोर्ड घायल है, 
हर इक लॉग-इन प्यासी एक्सेल में उलझन,
​विनवर्ड में उदासी, 
ये आफिस है या आलामे माइक्रोसाफ्ट की,
​ये रिलीज़ अगर हो भी जाए तो क्या है...

​जला दो इसे, फूंक डालो ये मानिटर,
​मेरे सामने से हटा डालो ये मानिटर,
​मेरे सामने से हटा डालो ये माडम, 
तुम्हारा है, तुम्ही संभालो ये कंप्यूटर, 
​ये प्रोडक्ट अगर चल भी जाए तो क्या है...
...(गीतकार नामालूम)  (इ-मेल पर आधारित )


शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

अगले जन्म मोहे भारत में न पैदा कीजो...खुशदीप



अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो। इस जुमले को अब बदल देना चाहिए। अगले जन्म मोहे बिटिया तो कीजो लेकिन भारत में न पैदा कीजो । आखिर क्यों बिटिया का भारत में जन्म लेना अभिशाप है। पिछले साल उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की पत्नी सलमा अंसारी ने दिल्ली में कहा था कि भारत में लड़कियों को पैदा होते ही मार देना चाहिए। उनके इस बयान पर ख़ूब विवाद हुआ था। ज़ाहिर है सलमा अंसारी का आशय भारतीय समाज में लड़कियों से किए जाने वाले भेदभाव और महिलाओं के ख़िलाफ़ बढ़ते अपराधों पर अपना आक्रोश जताना था। ये कहते वक्त सलमा अंसारी के मन में जो कुछ भी रहा हो लेकिन संयुक्त राष्ट्र के ताज़ा आंकड़ों ने उनके बयान पर मुहर लगा दी है। इन आंकड़ों के मुताबिक बच्चियों के अस्तित्व को दुनिया में भारत से ज़्यादा ख़तरा किसी और देश में नहीं है। 


ये दुर्योग ही है कि संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग (UN-DISA) ने बच्चियों की भारत में भयावह स्थिति को लेकर आंकड़े ज़ाहिर किए तो दिल्ली के एम्स में भर्ती दो साल की मासूम फ़लक की दर्दनाक कहानी सबके सामने है । संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के ज़िक्र से पहले फ़लक की बात कर ली जाए । फ़लक को जिस 15 साल की लड़की किशोरी (काल्पनिक नाम) ने एम्स में बुरी हालत में भर्ती कराया, उसकी आपबीती भी कम रौंगटे खड़े करने वाली नहीं है। किशोरी पर आरोप है कि उसने वहशी की तरह नन्ही सी जान फलक को पीटा, सिर पटक कर दे मारा, मुंह पर बुरी तरह से काटा । फ़लक की हालत देखकर किसी का भी कलेजा मुंह को आ सकता है। लेकिन सवाल ये भी है कि 15 साल की किशोरी के सिर पर दरिंदगी क्यों सवार हुई। क्या ये लड़की खुद उसके साथ जो अपने-परायों ने किया, उसका बदला मासूम से लेना चाहती थी । या वो नहीं चाहती थी कि जो उसके साथ हुआ  वो बड़ी होने पर फ़लक को भी झेलना पड़े। 

ऐसे ही कुछ सवालों पर मेरी पूरी रिपोर्ट को पढने के लिए कृपया इस लिंक पर जाईये...

एक दिन पहले रचना जी ने भी इसी मुद्दे पर नारी ब्लॉग पर सारगर्भित पोस्ट लिखी थी-

अभी इंसानों की जरुरत हैं हमारे देश को इंसान बने और हैवानियत का काम बंद करे