शनिवार, 11 अगस्त 2012

कोई दोस्त है न रक़ीब है...खुशदीप




कोई दोस्त है न रक़ीब है, तेरा शहर कितना अजीब है
[ रक़ीब = दुश्मन ]
वो जो इश्क़ था वो जुनून था,
ये जो हिज्र है ये नसीब है
[ हिज्र = विरह ]
यहाँ किसका चेहरा पढ़ा करूं,
यहाँ कौन इतना करीब है
मै किस से कहूं मेरे साथ चल,
यहाँ सब के सर पे सलीब है
​क्या ये बात ब्लागिंग के शहर पर भी सटीक बैठती है...
राणा सहरी​ 

22 टिप्‍पणियां:

  1. सच ऐसा ही है यहाँ -बस टिप्पणियों का लेनदेन भर है !

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  3. क्या बात है खुशदीप भाई सब खैरियत???? :-) :-) :-)

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  4. अच्छी ग़ज़ल के साथ सत्योक्ति (कटोक्ति)भी कह दी है आपने .कृपया यहाँ भी तवज्जो दें -
    शनिवार, 11 अगस्त 2012
    कंधों , बाजू और हाथों की तकलीफों के लिए भी है का -इरो -प्रेक्टिक

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  5. क्या हो गया, सब ठीक है ना ! आजकल कुछ ऐसी ही बातें हमारे दिलोदिमाग में भी घुमड़ रही हैं ।

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  6. खुशदीप भाई --
    जब हम हँसते हैं , तब दुनिया साथ हंसती है .
    जब हम रोते हैं , तब कोई साथ नहीं देता !

    यही दुनिया का दस्तूर है .

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  7. बेशक ब्लॉगजगत भी ऐसा ही है .
    आखिर है तो एक आभासी दुनिया ही .

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  8. वैसे भी , जब खून के रिश्तों को निभाना ही आसान नहीं रहा , तब इन आभासी रिश्तों से क्या उम्मीद की जा सकती है .
    उम्मीद रखना भी व्यर्थ है .

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  9. ब्लॉगिंग क्या है -- एक खेल ही तो है . एक बार नशा चढ़ता है लेकिन फिर आँख खुलने पर उतर जाता है . एक ब्लॉगर जो अपनी मेहनत से कम समय में ही बहुत लोकप्रिय हो गए थे ( टिप्पणियों की संख्या अनुसार ) , एक दिनं खुद ही यह कह कर सन्यास ले लिया -- रोज १५ -१६ घंटे ब्लॉगिंग को दिए , आखिर क्या मिला !
    ब्लॉग गुरु दूसरों को इस धंधे पर लगाकर स्वयं गायब हो गए -- इसका अर्थ यही है -- और भी ग़म हैं ज़माने में .

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  10. आज इतना बस इसलिए लिख दिया -- क्योंकि यह विषय अक्सर हमें सोचने पर मजबूर करता रहता है . सोचता हूँ -- जब ब्लॉगिंग नहीं करते थे तब भी तो जिंदगी चल रही थी . क्या खराब थी ? अब आदत सी पड़ गई है . लेकिन अपने ऊपर हावी न होने दें , यही कोशिश रहती है . वर्ना लगेगा , सब कुछ जानते हुए भी आखिर मार खा ही गए . लेकिन एक बात हमेशा महसूस की है -- अति हर चीज़ की ख़राब होती है . इसलिए एक बेलेंस बनाना ज़रूरी होता है . ब्लॉगिंग स्वांत: सुखाय करें , जब दिल न कहे तब छोड़ दें -- यही सही लगता है .

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  11. बीमारी के बाद अक्सर मूड थोडा लो रहता है . ऐसे में मूड लाईट करना चाहिए .
    ग़ज़ल बहुत अच्छी है , एकदम सटीक .
    एक आध टिप्पणी शायद स्पैम में चली गई है .

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  12. टिप्पणियों की डोज तो डाक्टर साहब ने पूरी कर दी. चलिए अब प्रसन्न चित्त हो जाइये और खुश(दीप) टाइप पोस्ट लगाइए .

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  13. रियल लाईफ के लोंग ही यहाँ ब्लॉगिंग करते हैं , समाज का वही चेहरा तो यहाँ भी नजर आता है , कुछ अपने , कुछ बेगाने ....इसमें उदासी कैसी !

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  14. अंतत: मनुष्य को परम सत्य का दर्शन हो ही जाता है, देर सबेर ही सही, पर जीवन इतना भी निराशाजनक नहीं की उससे उबर ही ना सके.

    रामराम.

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  15. वो जो इश्क़ था वो जुनून था,
    ये जो हिज्र है ये नसीब है ।

    हाल अपना भी यही है आजकल,
    वो जो मिलते थे तबीयत से, नज़र चुराते हैं ।

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  16. बेहतर संकलन और प्रस्तुति !!

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  17. वो जो इश्क़ था वो जुनून था,
    ये जो हिज्र है ये नसीब है
    सच में इश्क जूनून जैसा ही होना चाहिए, और हिज्र? उसकी परवाह क्यों

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  18. डॉक्टर साहिब ने बहुत सही फरमाया है.
    हारिये न हिम्मत,बिसारिये न हरि नाम.

    ईद की बधाई और शुभकामनाएँ,खुशदीप भाई.

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