शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

बेटियों को पहला वारिस क्यों नहीं माना जाता...खुशदीप





पिछले साल उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की पत्नी सलमाअंसारी के एक बयान को लेकर खूब हो हल्ला हुआ था।सलमा अंसारी ने कहा था कि हमारे देश में मां - बाप कोअपने यहां बेटी पैदा होते ही उसे जहर दे देना चाहिए।जाहिर है , यह सलमा अंसारी का आक्रोश था , जो इन तीखेशब्दों में फूट पड़ा था। उन्होंने देश में लड़कियों से होने वालेभेदभाव और महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों परअपनी प्रतिक्रिया जताई थी। इस देश में कभी आरक्षण तोकभी पारिवारिक संपत्ति में महिलाओं को पुरुषों के समानसंपत्ति के अधिकार की बात कर महिला सशक्तिकरण के बड़े- बड़े दावे जरूर किए जाते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत क्याहै , यह किसी से छुपी नहीं है।

पुरातनपंथी सोच
एक ही माता - पिता की संतान होने के बावजूद वारिस सिर्फ लड़के को ही क्यों माना जाता है ? लड़कियों सेभेदभाव घर पर ही शुरू हो जाता है। पुरातन काल से हमारे यहां ऐसी सोच चली आ रही है कि लड़का हीपरिवार के वंश को आगे बढ़ाएगा। आखिर लड़कियां वंश को आगे क्यों नहीं बढ़ा सकतीं ? इस सवाल पर देश मेंबहस क्यों नहीं छिड़ती कि कानून की दृष्टि से अगर लड़के और लड़की को एक समान अधिकार है तो फिर सिर्फलड़के को वारिस मानने का सवाल कहां से उठता है ? लड़कियों को पहला वारिस मानने में दिक्कत क्यों होती है।कोई इस पर सोचना भी पसंद नहीं करता कि विवाह के बाद लड़कियों को ही लड़के के घर क्यों जाना होता है।इसका उल्टा क्यों नहीं हो सकता ?

मरुमकथायम परंपरा
अपने देश में सिर्फ केरल ही एक ऐसा राज्य दिखता है , जहां मरुमकथायम परंपरा के मुताबिक महिलाओं के नामपर वंशावली चलने की मिसाल मिलती है। नायर राजसी खानदान से जुड़ी इस परंपरा में महिलाओं को वंश कावारिस बनने का अधिकार रहा है। इस परंपरा के तहत सिर्फ बहन या उनके बच्चे ही परिवार की संपत्ति के वारिसबनते हैं। सभी जानते हैं कि केरल में अधिकारों की दृष्टि से महिलाओं की जो स्थिति है , वह देश में और कहीं नहींहै। पुरुष - महिला लिंग अनुपात की बात की जाए तो बाकी देश में भले ही महिलाओं की संख्या पुरुषों केमुकाबले लगातार कम हो रही हो , लेकिन केरल में मामला उलटा है। यहां हर 1000 पुरुषों पर 1084 महिलाएंहैं। व्यावसायिक और सामाजिक दृष्टि से भी यहां महिलाएं अग्रणी हैं। केरल के इन नतीजों को देखते हुए बाकी देशमें भी विरासत की इसी परंपरा का अनुसरण क्यों नहीं किया जाता ?

हिंदू उत्तराधिकार कानून 1956 में अभी सात साल पहले किए गए बहुप्रचारित संशोधन के बाद भी पारिवारिकसंपत्ति में महिलाओं को पुरुषों के साथ समानता का अधिकार हासिल नहीं हो पाया है। इसके कानून के तहतअगर कोई निस्संतान विधवा बिना वसीयत लिखे मर जाती है तो उससे जुड़ी हर चीज पर ससुराल वालों काकब्जा हो जाता है। यहां तक कि उस रकम पर भी , जो उस महिला ने जीवनपर्यंत नौकरी या स्वरोजगार सेजुटाई थी। अपवाद स्वरूप अगर उसे कोई संपत्ति अपने माता - पिता से मिली हो तो उपरोक्त परिस्थिति में वहउसके पिता के वारिसों को मिलेगी। दूसरी तरफ किसी विधुर की बिना वसीयत लिखे मौत होती है तो उसकीसंपत्ति पर उसके माता - पिता और परिवार का हक हो जाता है। इस सूरत में पत्नी के माता - पिता उस संपत्ति मेंसे फूटी कौड़ी के भी हकदार नहीं होते। एक ही परिस्थिति को अलग - अलग चश्मे से देखने की यह कैसी व्यवस्थाहै ?

हिंदू कोड बिल पर बहस के दौरान पुरुष सांसदों के बहुमत ने पुत्रियों को पैतृक संपत्ति ( मायके ) पर अधिकार देनेका विरोध किया था। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के तहत पुत्रियों को पैतृक संपत्ति पर अधिकार नहींथा। लेकिन 2005 में संशोधन के जरिए कानूनी तौर पर उन्हें यह हक मिल गया। कुछ महिलाओं ने इस बदलावके बाद पैतृक संपत्ति पर दावे भी किए हैं। लेकिन ऐसी महिलाओं की संख्या अभी कम है , क्योंकि उन्हें अपनेपरिवार से संबंध बिगड़ने का डर रहता है। ईसाइयों और मुसलमानों के अपने अलग कानून हैं। अलग - अलगराज्यों के आदिवासियों के संपत्ति अधिकार उनके रीति - रिवाजों से तय होते हैं। राज्य भी अपने उत्तराधिकारकानून बना सकते हैं। यानी किसी महिला के संपत्ति अधिकार उसके मजहब , वैवाहिक स्थिति , राज्य औरजनजातीय पहचान के मुताबिक बदलते रहते हैं। जाहिर है , बराबरी के सिद्धांत को चोट पहुंचाने की कई वजहेंदेश में मौजूद हैं।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 4 (2) में जोत की जमीन का विभाजन रोकने के लिए अथवा जमीनकी अधिकतम सीमा तय करने के लिए पुत्री को जमीन की विरासत का अधिकार नहीं दिया गया। वे खेत में कामतो कर सकती हैं पर उसकी मालिक नहीं बन सकतीं। महिलाओं की इस मामले में क्या स्थिति है , यह 2000-01की कृषि जनगणना से साफ हो जाता है। इस जनगणना के मुताबिक लगभग 12 करोड़ लैंड होल्डरों में से महजएक करोड़ 30 लाख यानी 11 फीसदी महिलाएं हैं।

विरासत कानून के झोल

विवाह के बाद पति की व्यक्तिगत संपत्ति में आधा हिस्सा मांगने पर तर्क दिया जाता है कि पिता और पति , दोनोंकी संपत्ति का हक महिला को क्यों दिया जाए। पति की संपत्ति में आधा अधिकार वे उसकी मृत्यु के बाद ही पासकती हैं , अन्यथा उन्हें सिर्फ गुजारे का खर्च पाने का हक है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 23 के अधीनयदि किसी स्त्री को एक मकान विरासत में मिला है और उसमें उसके पैतृक परिवार के सदस्य रह रहे हैं तो उसेउस मकान में बंटवारा करने का कोई अधिकार नहीं है। वह उसमें रह भी तभी सकती है जब वह अविवाहित होया तलाकशुदा। इस प्रकार अनेक अपवाद 2005 के संशोधन द्वारा पुत्री को पैतृक संपत्ति में मिले उत्तराधिकार कोबेमानी बना देते हैं। साफ है कि महिलाओं को पहला वारिस बनाने जैसा क्रांतिकारी बदलाव लाए बिना महिलाओंकी स्थिति सुधरने की बात करना ख्याली पुलाव पकाने के सिवा कुछ नहीं है।
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यह लेख navbharat times  के 16 फ़रवरी के अंक में प्रकाशित हुआ है-





20 टिप्‍पणियां:

  1. वारिस... यह तो युगो से चली आ रही एक रीत हे, लडके ही अपने परिवार का उप नाम ले कर आगे चलते हे, जब कि लडकियां अपने पति का उपनाम ले कर चलती हे, दुसरा खुन लडके ओर लडकी मे एक ही होता हे, लेकिन दोनो के बच्चो मे अलग अलग खान दान का खुन होता हे, यानि यहां लडकी के बच्चो मे दुसरे खान दान का खुन हो जाता हे, तो कुदरती तॊर पर लडकी दुसरे खान दान की हो गई, यह उचित भी हे, वर्ना दो नांव का यात्री कभी पार नही पहुचता, लडकी को अपने ससुराल को ही सर्वोत्तम मानाना चाहिये, लेकिन मां बाप का ख्याल रखना चाहिये, अब वारिस तो पहले जब लडकी की शादी होती थी तो हमारे समाज के नियम अनुसार लडकी को उस का बाप ओर भाई अपनी हिम्मत के अनुसार उसे दहेज दे देते थे,यानि उस का हिस्सा, फ़िर दिन त्योहार पर बहाने से कभी भाई तो कभी पिता उसे उपहार भी दे आते थे, जिस से वो लडकी अपने को बेगानी ना समझयॆ, ओर ससुराल मे भी एक एहसास बना रहे कि लडकी अकेली नही हे, यह सब्प्यार बनाने के लिये होता था, ओर फ़िर लडके अपने पिता के व्यापार को ,दुकान को, काम को अपनी मेहनत से दिन दुनी मेहनत कर के आगे बढाते थे.... उस समय लोग प्यार के भुखे थे, धन के नही, ओर बहिन के ऊपर मुसिबत आने पर मां बाप ओर भाई बहिन पुरी मदद करते थे, लेकिन आज के युग मे सब कुछ बदल गया हे प्यार की जगह लालच छा गया हे, ओर सब को हक चाहिये.... प्यार नही... पुरानी नीतियो को सही ढंग से कोई नही मानता... ओर आज ना कोई भाई हे ना कोई बहिन सब कुछ धन हे किसी पर मुशिबत आये तो दुसरे को कोई फ़र्क नही, वो तो कहता हे कि इस ने अपना हक ले लिया अब हमे क्या....देश का कोई भी कानून धन पर हक तो दिला सकता हे, लेकिन सच्चे प्यार को नही दिला सकता, वारिस कोई भी बने लेकिन एक अकेला रह जायेगा......जिस के सुख ओर दुख मे कोई हिस्से दार नही होगा.

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    1. आपकी टिप्पणी प्रशंसनीय है जिसमे पूरी बात को बढियां ढंग से समझा दिया गया है.....!

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  2. महिलाओं को पहला वारिस बनाने जैसा क्रांतिकारी बदलाव लाए बिना महिलाओंकी स्थिति सुधरने की बात करना बेमानी है ……………आपके कहने से इत्तफ़ाक रखती हूँ और कुछ दिन पहले यहीख्याल मेरे मन मे भी आया था कि पुत्री का बच्चा वारिस क्यों नही हो सकता या उससे वंशबेल क्यो नही बढ सकती?

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  3. आज ही अखबार में 'रहेजा बिल्डर्स' के घर में झगडे की खबर पढ़ी..जहां अस्सी वर्षीय पिता ने अपनी जायदाद में से ४०% बेटे को..३०% खुद को और बाकी के ३०% दोनों बेटियों को दिया है...पर बेटे को यह गवारा नहीं...वो नहीं चाहता लड़कियों को १५-१५% मिलें....यही सब सवाल मन में सर उठा रहे थे...इस बेटे की भी कोई बेटी होगी...क्या बचपन से ही वह भेदभाव करता होगा...कब बदलेगी यह मानसिकता..

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  4. आज के समय में बेटियां ही वृद्धावस्था में माता पिता का ध्यान रखती हैं. बेटों से तो यह आशा करना ही व्यर्थ है..इस लिये कम से कम स्वअर्जित प्रोपर्टी में तो उनको पूरा अधिकार माता पिता स्वयं दे सकते हैं. जरूरत है सिर्फ़ हमारी सोच में बदलाव करने की.

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  5. कोई कानून या नियम तब तक काम नहीं कर सकता जब तक मानसिकता नहीं बदलती.और वो न जाने कब बदलेगी.

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  6. पहले जरुरी हैं की हम लड़कियों को इंसान माने । ये समझे की वो अपनी जरुरत जानती हैं और अपने लिये सही सोच सकती हैं । वारिस का अर्थ केवल धन और सम्पत्ति में अधिकार देने तक और कुल को संतान देने तक ही सिमित हैं ये सोच बहुत रुढ़िवादी हैं ।
    वारिस का अर्थ हैं बेटे और बेटी को समान अधिकार हो यानी अगर बेटा चिता को अग्नि देता हैं और अर्थी को कंधा देने का अधिकारी हैं तो वो अधिकार बेटी का भी हैं क्युकी बेटी भी संतान हैं ।
    वारिस का अर्थ हैं की अगर बेटे की शादी के समय क़ोई दान नहीं होता हैं तो बेटी की शादी के समय भी ना हो । जो भी बहू लाने जाते हैं वो साफ़ इनकार कर दे की लड़की का कन्यादान वो स्वीकार नहीं करेगे तो ये विभत्स्य प्रथा स्वयं बंद होगी ।
    बेटा , बेटी बहू दमाद सब को एक समान माना जाए और हर एक के समान अधिकार तो विभेद खुद मिटेगा ।

    अगर महिलाए समानता की बात करे तो उन्हे अपने अभिभावकों से इन अधिकारों के विषय मे सबसे पहले बात करनी चाहिये
    १ जब आपने हमे इस लायक बना दिया { पैरो पर खड़ा कर दिया } की हम धन कमा सकते हैं तो हमारे उस कमाये हुए धन पर आप अपना अधिकार समझे और हमे अधिकार दे की हम घर खर्च मे अपनी आय को खर्च कर सके । हम विवाहित हो या अविवाहित पर हमारी आय पर आप अधिकार बनता हैं । आप की हर जरुरत को पुरा करने के लिये हम इस धन को आप पर खर्च कर सके और आप अधिकार से हम से अपनी जरुरत पर इस धन को खर्च करे को कह सके।
    २ आपकी अर्थी को कन्धा देने का अधिकार हमे भी हो । जब आप इस दुनिया से दूसरी दुनिया मे जाए तो भाई के साथ हम भी दाह संस्कार की हर रीत को पूरा करे । आप की आत्मा की शान्ति के लिये मुखाग्नि का अधिकार हमे भी हो ।
    ३ आप हमारा कन्या दान ना करे क्युकी दान किसी वस्तु का होता हैं और दान देने से वस्तु पर दान करने वाले का अधिकार ख़तम हो जाता हैं । आप अपना अधिकार हमेशा हम पर रखे ताकि हम हमेशा सुरक्षित रह सके।

    जिस दिन महिलाए अपने अभिभावकों से ये तीन अधिकार ले लेगी उसदिन वो समानता की सही परिभाषा को समझगी । उसदिन समाज मे "पराया धन " के टैग से वो मुक्त हो जाएगी । समानता का अर्थ यानी मुक्ति रुढिवादी सोच से क्योकि जेंडर ईक्वलिटी इस स्टेट ऑफ़ माइंड { GENDER EQUALITY IS STATE OF MIND } http://indianwomanhasarrived.blogspot.in/2008/09/blog-post_361.html



    परम्परा के नाम पर लोग आज भी लड़की की शादी में कन्या दान कर सकते हैं दहेज़ दे सकते पर उसको क़ानूनी अधिकार मिले इस पर भड़क जाते हैं ।

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  7. जहाँ सिर्फ बेटियां ही होती हैं , वहां यह अधिकार भी मिलने लगा है । बदलेगा समां मगर धीर धीरे।

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  8. जब तक हिन्दू कोड बिल, मुस्लिम पर्सनल ला और भी इसी तरह के विभेदकारी क़ानून रहेंगे, किसी न किसी रूप में यह सब होता रहेगा. एक जैसा क़ानून सबके लिये, हिन्दू-मुस्लिम-पुरुष-महिला...

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  9. आपका एक आलेख ओजस्विनी पत्रिका में भी प्रकाशित हुआ है, बधाई।

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  10. खुशदीप भाई,
    अच्छा आलेख है। हमें इतिहास में महिलाओं की स्थिति का अध्ययन भी करना चाहिए। मनुष्य समाज में पुरुषों के वर्चस्व का युग बहुत लंबा नहीं है। केवल कुछ हजार वर्षों का है। पशुपालन सीख लेने के बाद। लेकिन इस से पहले कई हजार वर्षों तक लाख से भी अधिक वर्षों तक मनुष्य समाज में स्त्रियों की ही प्रधानता रही है। कुल गोत्र उन्हीं के नाम से हुआ करते थे। पहले स्त्रियों की प्रधानता का भी कारण था और अब पुरुषों की प्रधानता का भी कारण है। जब तक समाज की अधिकांश महिलाएँ घऱ से बाहर नहीं निकलतीं और परिवार की आय में महत्वपूर्ण योगदान नहीं करतीं। पुरुष प्रधानता को तोडा नहीं जा सकता। उसे तोडने के लिए पहला सामाजिक परिवर्तन यह लाना होगा कि स्त्रियाँ अपने पैरों पर खड़ी हों। शेष परिवर्तन स्वयमेव हो लेगा। जहाँ स्त्रियाँ पैरों पर खड़ी हैं वहाँ यह हो भी रहा है। हाँ कुछ कानूनों में बदलाव की जरूरत है। वे जल्दी से जल्दी बदले जाने चाहिए। उस से भी पहले एक देश में एक सिविलकोड की आवश्यकता है। अभी तो उत्तराधिकार के कानून भी प्रत्येक धर्मावलंबी के लिए अलग अलग हैं।

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  11. अगर हिस्सा ही मांगना है तो उस से अच्छा तो पहले ही दहेज ले कर चुप हो जाओ, http://sikayaat.blogspot.in/2009/03/blog-post_07.html

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  12. यदि बराबरी का मानना है तो बराबरी का हिस्सा बनता है।

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  13. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  14. मान्यताओं को छेड़ने का क्या फायदा ..पूर्वोत्तर के कई राज्यों की जनजातियों के विवाह में लड़का लड़की के घर चला जाता है..समाज को चलने के लिये कालांतर में कुछ मान्यताएं विकसित होती है और विज्ञान की माने तो अनावश्यक है तो खुद ही मिट जाएगी..
    अगर इतने बुद्धिजीवियों के बाद भी ये मान्यता समाज में है तो आधारहीन तो नहीं हो सकती...

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  15. आपकी सुन्दर प्रस्तुति विचारणीय है.
    ब्लोगर जन की टिप्पणियाँ भी अच्छी जानकारियाँ दे रही हैं.

    वैसे परिवार में प्यार और त्याग को ही आधारशिला होना चाहिये.
    क़ानून कई बार दरार भी डालता है संबंधों में.

    Succession और H.U.F. की सम्पत्तियाँ अक्सर विवादित हो जाती हैं.

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  16. कानून बनने से कुछ नहीं होने वाला.... मानसिकता बदलनी होगी।
    बढिया विचार प्रस्‍तुत करता लेख।

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  17. बेटो से वंश चलने की बात कहने वाले समाज में नयी सोच जागृत करने के उद्देश्य से डेरा सच्चा सौदा के पूज्य गुरु संत गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सा ने बेटियों से वंश चलाने की एक नयी मुहीम का आगाज किया है और इस रीत को ''कुल का क्राउन'' का नाम दिया है । dailymajlis.blogspot.in/2013/01/kulkacrown.html

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  18. Koi kisi ko rok ke nai rakhe hai. . .jis ma bp ka mann ho ladke ko de ya ladki ko de. . .koi na layak lage to samaj sevi sansthao ko sampati de de. . .is bt ko badhne se acha hai k ye jane ki hamara desh 6000jatiyo ka desh hai jo ki apne ap me na jane kitne kabile rahe the aur sabki alag alag ritiyan riwaz rahe unhin ke anusar kanoon bne. Aur koi ma ya bp apni icha se sampti adhikar dne ko swatantra hai jinko lagta hai k unki ladki ko dna sai hai wo ladki ko aur bki ladke ko dte hain. . .ye koi behas ka mudda nai kanoon apna kam behtar dhang se kar raha hai.

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  19. Koi kisi ko rok ke nai rakhe hai. . .jis ma bp ka mann ho ladke ko de ya ladki ko de. . .koi na layak lage to samaj sevi sansthao ko sampati de de. . .is bt ko badhne se acha hai k ye jane ki hamara desh 6000jatiyo ka desh hai jo ki apne ap me na jane kitne kabile rahe the aur sabki alag alag ritiyan riwaz rahe unhin ke anusar kanoon bne. Aur koi ma ya bp apni icha se sampti adhikar dne ko swatantra hai jinko lagta hai k unki ladki ko dena sai hai wo ladki ko aur jinko lagta hai ki ladke ko wo ladke ko dete hain. . .ye koi behas ka mudda nai kanoon apna kam behtar dhang se kar raha hai.

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