गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

'लौंडिया पटाएंगे मिसकॉल से' के मायने...खुशदीप



नैन हम लड़ाएंगे बेबी डॉल से,
हो लौंडिया पटाएंगे मिस कॉल से...

ये  बोल 'दबंग-2' फिल्म के सुपरहिट गाने के हैं.. 'दबंग-2' 21 दिसंबर को रिलीज़ हुई...उससे एक दिन पहले फिल्म के हीरो सलमान ख़ान दिल्ली में इसके प्रमोशन के लिए मौजूद थे...इत्तेफ़ाक से तीन दिन पहले ही दिल्ली में 23 साल की लड़की से जघन्य सामूहिक बलात्कार की वारदात से देश हिला हुआ था...ज़ाहिर है सलमान से भी इस मुद्दे पर सवाल किया गया...इस पर सलमान ने जवाब दिया..."मेरे ख्याल से बलात्कारियों के लिए मौत की ही सजा होनी चाहिए...ऐसी घटनाओं की हमारे समाज में कोई जगह नहीं है....मुझे ऐसी घटनाओं से नफरत है...मेरे लिए ये तृतीय क्षेणी का अपराध है...मेरा मानना है कि बलात्कारी को जेल में मरते दम तक पीटना चाहिए"...

सलमान का जवाब बलात्कार की घटना को लेकर हर आम भारतीय की सोच को ही प्रतिबिम्बित करता है...लेकिन मेरी समझ से यहां सलमान से एक और सवाल करना चाहिए था...ये सवाल होता कि आप फिल्मों में....हो लौंडिया पटाएंगे मिसकॉल से...जैसे जो गाने रखते हैं, उनका समाज पर क्या असर होता है...फिल्म में सलमान पुलिस इंस्पेक्टर के किरदार में हैं और ये गाना गाते दिखते हैं....क्या यही गाने शोहदों को लड़कियों से छेड़छाड़ का ज़रिया नहीं देते...अभी हाल ही में 'मुन्नी बदनाम हुई' और 'शीला की जवानी' गानों का ऐसा असर हुआ था कि उनसे परेशान होकर मुंबई में मुन्नी और शीला नाम की दो सगी बहनों ने अपना नाम ही बदल लिया था...

बॉलीवुड में महेश भट्ट जैसे कई दिग्गज सेंसर बोर्ड को खत्म करने के पक्ष में हैं...अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर ये बड़े पर्दे पर कुछ भी दिखाने की छूट चाहते हैं...महेश भट्ट ने पोर्न स्टार सनी लिओन को जिस्म-2 की नायिका बनाकर पेश किया, तो ज़ाहिर है कि उनकी मंशा सेक्स को व्यावसायिक तौर पर भुनाने की थी...महेश भट्ट की ये चिंता कतई नहीं होगी कि समाज पर इसका असर क्या होगा?...सनी लिओन उनकी फिल्म की नायिका बनने के साथ ही भारत में इंटरनेट पर सबसे ज़्यादा सर्च करने वाली शख्सीयत बन गईं...इंटरनेट के आगमन के बाद अब हर उस चीज़ तक पहुंच सिर्फ एक क्लिक की दूरी पर है, जिसे देखना तो दूर, उस पर बात करना भी भारतीय समाज में वर्जित माना जाता था...इंटरनेट पढ़ाई के लिए आज हर बच्चे की ज़रूरत माना जाता है...लेकिन आप चाह कर भी हर वक्त बच्चे पर पहरा नहीं रख सकते कि वो इंटरनेट पर क्या-क्या देखता है...ऐसे में अगर ये समाचार सामने आते है कि सातवीं कक्षा में  पढ़ने वाले एक लड़के ने, अपने ही विद्यालय की तीसरी कक्षा में पढ रही एक बच्ची से बलात्कार करने की कोशिश की, तो ये ताज्जुब से ज़्यादा सोचने वाली बात है कि ऐसा क्यों हो रहा है...

इंटरनेट की बात छोड़ भी दी जाए तो छोटे शहरों और महानगरों के स्लम्स एरिया के सिंगल स्क्रीन थिएटर्स  में ऐसी सी-ग्रेड फिल्में दिखाई जाती है जिनमें धड़ल्ले से अनसेंसर्ड अश्लील दृश्य दिखाए जाते हैं...इनके वल्गर पोस्टर भी जगह-जगह दीवारों पर चिपके देखे जा सकते हैं...ज़ाहिर है ये प्रशासन और पुलिस की नाक के नीचे ही होता है...अब इन पोस्टर्स से लड़कियों-महिलाओं को कितनी परेशानी होती है, इसकी परवाह कोई करने वाला नहीं है...ऐसी फिल्मों के पोस्टर भी जानबूझकर स्कूलों के पास लगाये जाते हैं...बिना ये सोचे कि इनका हमारे नौनिहालों पर कितना बुरा असर होता होगा....

दिल्ली में जो हुआ वह करने वाले सारे  अभियुक्त समाज के निचले तबके से हैं और आर के पुरम के सेक्टर-3 में बने झुग्गी कलस्टर रविदास कैंप में उनकी रिहाइश थी...ये उसी आर के पुरम के साथ बिल्कुल एक दूसरी ही बनी दुनिया है...जिस आर के पुरम में ज्यादातर सरकारी बाबुओं  ने अपने आशियाने बना रखे हैं...यानि एक तरफ़ सर्वसुविधा संपन्न वर्ग और दूसरी तरफ़ हर तरह की सामाजिक बुराइयों से अभिशप्त ज़िंदगी...गैंग-रेप की वारदात के सभी अभियुक्त कम पढ़े लिखे, नशे और ड्रग्स के आदि हैं...और कोई काम कर नहीं सकते, इसलिए ड्राइविंग का लाइसेंस ले लेते हैं...रिश्वत के दम पर हमारे देश में कोई भी ड्राइविंग लाइसेंस ले सकता है....ऐसे लोगों का रहन-सहन, सामाजिक मर्यादा का मतलब वैसा नहीं है जैसा कि हम कथित सभ्य समाज के लोगों के लिए हैं...शराब के नशे में इनके जैसे कुछ लोगों का जमावड़ा होता है तो ये अपनी कुंठाओं को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं...अमीरों जैसी ज़िंदगी ना जी पाने की हताशा भी इन्हें वहशी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती...छोटा पहनावा दिखने पर भी ये उसे अपने लिए आसान टारगेट मान लेते हैं...



ऐसा नहीं कि सेक्स से जुड़े अपराध या छेड़छाड़ की घटनाएं मध्यम वर्ग या उच्च वर्ग में नहीं होतीं...ये भी किसी से छुपा नहीं कि फॉर्म हाउस की ऊंची ऊंची चाहरदीवारियों के पीछे पार्टियों के नाम पर क्या-क्या नहीं होता...ये पैसों वालों की काली दुनिया होती है...इन पार्टियों में मौज-मस्ती के लिए ऊंचे ओहदेदार भी शामिल रहते हैं...इसलिए पुलिस की आंखों पर भी पट्टी बंधे रहती हैं...नये साल के नाम पर होने वाली पार्टियों में क्या-क्या गुल खिलते हैं, ये भी आसानी से समझा जाता है...यानि आप पैसे वाले हैं तो आप कुछ भी खुराफात कर सकते हैं और उस पर हमेशा के लिए पर्दादारी का भी इंतज़ाम कर सकते हैं...अच्छे और बुरे लोग समाज के हर वर्ग में हैं...समाज की निचली पायदान के बुरे लोग जब अपनी विकृतियों के वश में होकर अपराध पर उतरते हैं तो उसका मेनिफेस्टेशन जघन्य अपराध में सामने आता है....इनके पास कुछ पैसा आता है तो ये अपनी सेक्स कुंठाओं को शांत करने के लिए रेड लाइट एरिया, कॉलगर्ल्स का सहारा लेते हैं...अन्यथा इंसान की शक्ल में ये नर-पिशाच ऐसे हिंसक तरीकों पर भी उतर सकते हैं कि हैवानियत भी शर्मा जाए...जैसा कि दिल्ली की हालिया वारदात में हुआ...लेकिन सवाल ये है कि इऩ अपराधियों के इतने बेखौफ़ होने के लिए ज़िम्मेदार कौन है..क्यों
पुलिस का इनके दिल-ओ-दिमाग़ पर डर नहीं होता...

और इस तरह की मानसिक विकृतियों वाले अपराधियों को क्या हमारी फिल्में, इंटरनेट, सेक्स चैट और मसाज पार्लरों के अखबारों में छपने वाले विज्ञापन बढ़ावा नहीं देते...फिर इन विज्ञापनों के ज़रिए मोटी कमाई करने वाले अख़बारों के ख़िलाफ़ आवाज़ हम क्यों नहीं उठाते...क्यों नहीं अश्लील फिल्में दिखाने वाले या पोस्टर लगाने वाले सिनेमाहॉलों का लाइसेंस हमेशा के लिए रद्द नहीं कर दिया जाता...

इसमें कोई शक-ओ-शुबहा नहीं कि महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध घर में हो या बाहर, दोषियों को सख्त से सख्त सज़ा मिलनी चाहिए...लेकिन बात यही खत्म नहीं हो जाती है...हमें विचार इस बात पर भी करना है कि हमारे समाज का एक हिस्सा गर्त में जा रहा है तो उसके लिए ज़िम्मेदार कौन है...हमें समस्या के सिर्फ एक कोण से नहीं बल्कि समग्र तौर पर निपटने के लिए प्रयास करने चाहिएं...

(इसी संदर्भ में डॉ अजित गुप्ता जी ने बड़ा सारगर्भित लेख लिखा है)

बुधवार, 26 दिसंबर 2012

जनता नहीं अब सरकार डरती है...खुशदीप





दिल्ली में बलात्कार के विरोध में प्रदर्शन के निहितार्थ साफ़ हैं- पहले जनता हुक्मरानों से डरती थी...अब हुक्मरान जनता से डरने लगे हैं...17 दिसंबर की शर्मनाक घटना के बाद दिल्ली के पावरसेंटर माने जाने वाले इलाके में लोगों के स्वतस्फूर्त  प्रदर्शन का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसे सरकार ने पहले दिन से ही समझने में गलती की...और अब भी सरकार भ्रम में ही जी रही है...सरकार इसे सिर्फ़ एक जघन्य सामूहिक बलात्कार से उपजा जनाक्रोश मान रही है...यही सरकार की भूल है... ये देश की उस जनता का गुस्सा है, जो अब समझ गई है कि केंद्र और राज्यों में विभिन्न राजनीतिक दल आज़ादी के बाद 65 साल में उसका सिर्फ पोपट बनाते आए हैं...इन 65 साल में सबसे ज़्यादा राज कांग्रेस ने किया है, इसलिए उसी के ख़िलाफ़ सबसे ज़्यादा आक्रोश फूट रहा है...

कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दलों को अब ये साफ़ समझ लेना चाहिए कि चुनाव जीतने का ये मतलब नहीं होता कि पांच साल तक उन्हें जो चाहे करने का अधिकार मिल गया...जनता अब जाग गई है...अब वो पांच साल का इंतज़ार नहीं करने वाली...वो ऐसे ही सड़कों पर आकर नेताओं के दिलों में अब दहशत पैदा करेगी जैसा कि दिल्ली के मौजूदा प्रकरण में हो रहा है...नेता अगर परफॉर्म नहीं करेंगे तो उन्हें ज़बरन घरों में ही बैठने को मजबूर किया जा सकता है...

अब आते हैं, उस प्रकरण पर जिसने देश की पावर-सीट नॉर्थ ब्लॉक-साउथ ब्लॉक को भी हिला कर रख दिया...सरकार ने इस प्रोटेस्ट मूवमेंट को शनिवार-इतवार की छुट्टी वाले दिन महज़ कुछ लोगों का जमावड़ा समझा...विरोध करने वाले युवा संगठित नेतृत्व के अभाव में दिशाहीन  थे...लेकिन यही दिशाहीनता इस मुहिम की सबसे बड़ी ताकत निकली...बाबा रामदेव, रिटायर्ड जनरल वी के सिंह और केजरीवाल कंपनी ने बिन बुलाए मेहमान की तरह इस मुहिम की कमान संभालनी चाही लेकिन युवा प्रदर्शनकारियों ने उनके सारे मुगालते दूर करने में ज़रा देर नहीं लगाई...


सरकार में बैठे ज़िम्मेदार लोगों को जब तक युवाओं की ताकत का सही तरह से एहसास हुआ, तब तक बहुत देर हो चुकी थी...सोनिया गांधी और राहुल को प्रदर्शनकारियों के बीच आना पड़ा, प्रधानमंत्री को जनता के नाम 'ठीक है' संदेश देना पड़ा, राष्ट्रपति को बयान देना पड़ा...दिल्ली की मुख्यमंत्री पुलिस कमिश्नर पर ठीकरा फोड़ती नज़र आईं, दिल्ली के उपराज्यपाल ना सिर्फ अमेरिका का दौरा छोड़ कर वापस आए बल्कि दिल्ली पुलिस के एसीपी स्तर के दो अधिकारियों के निलंबन का फ़रमान भी लगे हाथ सुना दिया...ये सब कुछ हुआ....लेकिन सरकार या शासन के किसी नुमाइंदे ने ये बात नहीं सोची कि जिस लड़की के साथ छह नर-पिशाचों ने हैवानियत की हद पार कर दी, उसी लड़की के पिता या परिवार के किसी और सदस्य के नाम से प्रदर्शनकारियों से शांति बनाये रखने की अपील ही जारी करवा दी जाती....

बात जब हाथ से बाहर आ गई तो सरकार हड़बड़ी में फ़ैसले करती नज़र आई...सवाल यहां ये है कि सरकार के इस बार जैसे हाथ-पांव फूले, क्या पहले भी कभी ऐसा हुआ था? हाल-फिलहाल में अन्ना का आंदोलन हो या केजरीवाल के छापामार प्रदर्शन, बाबा रामदेव की विरोध लीला हो या विपक्ष की हुंकार, हर बार सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी...उलटे दंभ दिखाते हुए उसने हर बार यही संदेश दिया कि वो जो चाहेगी, वो करेगी....लेकिन इस बार पहली बार सरकार डरी दिखी...ज़ाहिर है जनता, खास तौर पर युवाओं की ताकत को सरकार भी समझती है...इस ताकत का डर सिर्फ केंद्र सरकार को ही नहीं बल्कि राज्यों में बैठी हर सरकार के मन में भी होना चाहिए...यानि ऐसे विरोध प्रदर्शनों की हर राज्य, हर ज़िले में दरकार है...

ख़ैर ये तो रही सरकार की बात...लेकिन अब इस सवाल पर भी सोचने की ज़रूरत है कि सामूहिक बलात्कार के इस प्रकरण में क्या एक ही कोण पर ही मंथन करने से सारी समस्या हल हो जाएगी....क्या अकेली सरकार को जनता को सुरक्षा देने मे नाकाम मान लेने से ही हमारे कर्तव्यों और दायित्वों की इतिश्री हो जाएगी...

(अगले लेख में... ये हम ही हैं जो मिसकॉल से लौंडिया पटाएंगे जैसे गाने वाली फिल्म की कमाई के रिकॉर्ड बॉक्स ऑफिस पर बनवा देते हैं...फिर इसी फिल्म के दबंग हीरो को दिल्ली में गैंग-रेप की घटना पर दुख जताते हुए बलात्कारियों के लिए सख्त से सख्त सज़ा की मांग करते हुए भी ध्यान से सुनते हैं...)

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

बलात्कार, विरोध और नगरवधू...खुशदीप


बलात्कार, विरोध और नगरवधू...



नगरवधू !
मेरे मन में बढ़ गया  तेरा सम्मान...

नहीं उठते तेरे लिए कभी झंडे-बैनर,
नहीं सहता कोई पानी की तेज़ बौछार,
नहीं मोमबत्तियों के साथ निकलता मोर्चा, 
नहीं जोड़ता तुझसे कोई अपना अभिमान,

नगरवधू !
मेरे मन में बढ़ गया तेरा सम्मान...

कितने वहशी रोज़ रौंदते तेरी रूह,
देह  तेरी सहती सब कुछ, 
बिना कोई शिकायत, बिना आवाज़,
नहीं आता कभी आक्रोश का उफ़ान,

नगरवधू !
मेरे मन में बढ़ गया तेरा सम्मान,

सोचता हूं अगर तू ना होती तो क्या होता,
कितने दरिन्दे और घूमते सड़कों पर,
आंखों से टपकाते हवस, ढूंढते शिकार,
नगरों को बनाते वासना के श्मशान,

नगरवधू !
मेरे मन में बढ़ गया तेरा सम्मान...

शिव विष पीकर हुए थे नीलकंठ,
क्योंकि देवताओं को मिले अमृत,
तू जिस्म पर झेलती कितने नील,
क्योकि सभ्य समाज का बना रहे मान,

नगरवधू  !
मेरे मन में बढ़ गया तेरा सम्मान...

- खुशदीप



(वीडियो...रवीश की रिपोर्ट से साभार)

गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

1989 से क्या-क्या बदल गया सचिन!...खुशदीप



सचिन तेंदुलकर ने 1989 में पाकिस्तान के दौरे से इंटरनेशनल क्रिकेट करियर की शुरुआत की...तब से अब तक 23 साल में देश में क्या-क्या बदला...
उस वक्त देश में टीवी चैनल के नाम पर सिर्फ दूरदर्शन था...
उस वक्त देश में घरेलू एयरलाइंस के तौर पर सिर्फ इंडियन एयरलाइंस थी...
सचिन के पदार्पण से कुछ महीने पहले ही पेप्सी ने देश में प्रवेश किया था...कोका-कोला की देश में दोबारा एंट्री 1993 में हुई थी...1989 में कॉरबोनेटेड ड्रिंक्स के बाज़ार पर थम्स अप, कैम्पा कोला, गोल्ड स्पॉट, लिमका और सिट्रा छाए हुए थे...
उस वक्त देश में कारों में सिर्फ मारुति, अंबेसडर, प्रीमियर पद्मिनी और स्टेंडर्ड रोवर ही उपलब्ध थीं...
उस वक्त एक डॉलर की कीमत 17 रुपये 50 पैसे थी...

सचिन के टीम इंडिया में शामिल होने से कुछ दिन बाद ही राजीव गांधी को प्रधानमंत्री के पद से हटना पड़ा था और वीपी सिंह की इस पद पर ताजपोशी हुई थी...उस वक्त कांग्रेस और जनता दल के बाद बीजेपी तीसरे नंबर की पार्टी थी...
तब डीवीडी का अविष्कार नहीं हुआ था और सीडी का देश में मिलना दुर्लभ था...
उस साल की सबसे बड़ी बॉलीवुड हिट फिल्म सलमान ख़ान और भाग्यश्री की अभिनीत मैंने प्यार कियाथी
अयातोल्ला खोमेनी ने उसी साल सलमान रश्दी के नॉवल द सेटेनिक वर्सेज़ को लेकर उनकी हत्या के लिए तीस लाख डॉलर का इनाम रखा था...
उस वक्त कलकत्ता मेट्रो का एक ही फेस चालू था...
उस वक्त कोलकाता (2001) का नाम कलकत्ता, मुंबई (1995) का नाम बॉम्बे और चेन्नई (1996) का नाम मद्रास ही था...
उस वक्त भारत में मैक्डॉनल्ड, केएफसी, पिज्ज़ा हट,  डोमिनोज़, कैफ़े कॉफी डे और शॉपर्स स्टॉप का नामो-निशान तक नहीं था...
अगर सचिन के करियर के दौरान चीज़े कैसे बदली हैं, ठीक से जानना है तो देश में पेट्रो उत्पादों की कीमतों में आए बदलाव को जानिए...1 अप्रैल 1989 को पेट्रोल साढ़े आठ रुपये लीटर, डीज़ल साढ़े तीन रुपये लीटर और मिट्टी का तेल सवा दो रुपये लीटर था...और रसोई गैस का सिलेंडर उस वक्त 57 रुपये 60 पैसे का था...
चीज़ें और वक्त काफ़ी बदल चुका है...और सचिन आप!....




(स्रोत- अनंत रंगास्वामी, फर्स्ट पोस्ट डॉट कॉम)

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

पंडित रविशंकर नहीं रहे...खुशदीप

पंडित रविशंकर
7 अप्रैल 1920-11 दिसंबर 2012

सुप्रसिद्ध सितारवादक और संगीतज्ञ पंडित रवि शंकर का 11 दिसंबर को अमेरिका के शहर सैन डिएगो में निधन हो गया...92 साल के पंडित रविशंकर को सांस में तकलीफ़ के बाद पिछले गुरुवार को ला जोल्ला के स्क्रिप्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था...दुनिया भर में पंडित जी को भारत के संगीत-दूत के तौर पर जाना जाता था...उम्र के इस पड़ाव में भी वो संगीत के लिए पूरी तरह सक्रिय थे...यहां तक कि वो अगले ग्रैमी अवार्ड्स के लिए भी दावेदार थे...7 अप्रैल 1920 को वाराणसी में जन्मे पंडित रविशंकर ने भारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा उस्ताद अल्लाऊद्दीन खाँ से प्राप्त की। उनके युवा वर्ष यूरोप और भारत में अपने भाई उदय शंकर के नृत्य समूह के साथ दौरा करते हुए बीते। उन्हे वर्ष 1999 मे भारत रत्न से सम्मानित किया गया। रवि शंकर को कला के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन 1967 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। ये उत्तर प्रदेश राज्य से हैं।

विनम्र श्रद्धांजलि....

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो यहां हैं...खुशदीप




दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है भारत...

लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर है संसद...

लेकिन देश की शान इसी संसद में एफडीआई जैसे गंभीर मुद्दे पर बहस के दौरान ये हैं हमारे कुछ माननीयों के मुखारबिंदुओं से निकले सद्वचन...

जम्हूरा (बीजेपी के एक सांसद के लिए लालू यादव ने कहा)

मुहब्बत में तुम्हें आंसू बहाना नहीं आता, बनारस आकर  बनारस  का पान खाना नहीं आता...(लोकसभा में नेता विपक्ष सुषमा स्वराज के लिए लालू प्रसाद यादव की तुकबंदी)

आपको गांठें खोलना नहीं आता, मसखरी के अलावा बोलना नहीं आता...(लालू यादव के लिए सुषमा स्वराज की जवाबी तुकबंदी)

आप इतना अच्छा बोलती हैं कि ऐसा लगता है कि सब सही बोल रही हैं...(सुषमा स्वराज के लिए कपिल सिब्बल)

इनकी तो आइडियोलॉजी ही फॉरेन है, फॉरेन डायरेक्ट आइडियोलॉजी (एफडीआई)....(लेफ्ट के लिए कपिल सिब्बल)

आपको फ्राई के लिए 24 इंच के आलू चाहिए तो अंबाला आइए...( कांग्रेस सांसद और हरियाणा के सीएम के साहबज़ादे दीपेंद्र हुड्डा)

किसान के बेटे हो पहले आलू और लौकी का फ़र्क तो समझ लीजिए...(दीपेंद्र हुड्डा को सुषमा स्वराज का जवाब)

लोमड़ी को वोट नहीं मिले तो उसने कहा अंगूर खट्टे हो गए....(सुषमा स्वराज के बयान से नाराज़ मायावती)

बेवकूफ़...(कांग्रेस सांसद प्रभा ठाकुर के लिए बीजेपी के वेंकैया नायडू)

ये सब पढ़ लिया, अब नीचे का वीडियो भी देख लीजिए...



मेरे प्याज बड़े हैं! क्या नहीं है...खुशदीप



रिटेल सेक्टर में एफडीआई (विदेशी प्रत्यक्ष निवेश) पर लोकसभा की मंज़ूरी मिलने से सत्ता पक्ष फूले नहीं समा रहा....वहीं विपक्ष का कहना है कि आंकड़ों में बेशक उनकी हार हो गई लेकिन नैतिक तौर पर उनकी जीत हुई...इस चक्कर में दोनों पक्षों के सांसदों को पूरे देश के सामने टेलीविज़न पर गला साफ़ करने का मौका ज़रूर मिल गया...वालमार्ट देश में आया तो क्या क्या होगा...सरकारी पक्ष का तर्क था कि किसानों से सीधे खरीद होगी तो उन्हें फायदा मिलेगा...उपभोक्ताओं को भी सस्ता सामान मिलेगा...मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी का तर्क था कि इससे छोटे दुकानदारों का धंधा चौपट हो जाएगा...सबने बातें तो बहुत बड़ी-बड़ी की लेकिन इतनी अहम बहस के लिए बिना किसी खास तैयारी के...काश ये लोग बहस से पहले पी. साईनाथ का ये लेख ही पढ़ लेते...ये लेख अमेरिका के एक किसान पर आधारित है...अब भारत में जो ये तर्क दे रहे हैं कि छोटे किसानों को विदेशी स्टोरों के आने से फायदा होगा, उनकी आंखें  इस लेख को पढ़ने के बाद ज़रूर खुल जानी चाहिए...इस लेख के लिए मेरी ओर से साईनाथ साहब को ज़ोरदार सैल्यूट....

क्रिस पावेलस्की 
मेरे प्याज बड़े हैं, क्या नहीं है?" न्यूयॉर्क सिटी से 60 किलोमीटर बाहर क्रिस पावेलस्की ने हम आगंतुकों के समूह से ये सवाल किया... "क्या आप जानते हैं क्यों?" क्योंकि उपभोक्ताओं की ये मांग है, शायद? शायद बड़े प्याज ग्राहकों की नज़र में जल्दी चढ़ते हैं? पावेलस्की का जवाब था "नहीं "...पावेलस्की के पड़दादा 1903 में पोलेंड से आकर यहां बसे थे...एक सदी से ज़्यादा इसी ज़मीन पर ये परिवार फार्मिंग करता आया है...

पावेलस्की का कहना है कि आकार रिटेल चेन स्टोर तय करते हैं... "हर चीज़" उनके फ़रमान के अनुसार होती है... "हर चीज़" में कीमतें भी शामिल हैं...वालमार्ट, शॉप राइट और दूसरे चेन स्टोर पावेलस्की जैसे उत्पादित प्याजों को 1.49 डॉलर से लेकर 1.89 डॉलर प्रति पाउंड (करीब 453 ग्राम) में बेचते हैं...लेकिन पावेलस्की के हिस्से में एक पाउंड प्याज के लिए सिर्फ 17 सेंट (1 डॉलर=100 सेंट) ही आते हैं...ये स्थिति भी पिछले दो साल से ही बेहतर हुई है...1983 से 2010 के बीच पावेलस्की को एक पाउंड प्याज के सिर्फ 12 सेंट ही मिलते थे। 

पावेलस्की का कहना है कि खाद, कीटनाशक समेत खेती की हर तरह की लागत बढ़ी है...अगर कुछ नहीं बढ़ा है तो वो हमें मिलने वाली कीमतें...हमें 50 पाउंड के बोरे के करीब छह डॉलर ही मिलते हैं...हां इसी दौरान प्याज की रिटेल कीमतों में ज़रूर  इज़ाफ़ा हुआ है...फिर पावेलस्की ने सवाल किया कि क्या कोई खाना पकाता है...हिचकते हुए कुछ हाथ ऊपर खड़े हुए...पावेलस्की ने एक प्याज हाथ  में लेकर कहा कि वो इतना बड़ा ही प्याज चाहते हैं, क्योंकि वो जानते हैं कि आप खाना बनाते वक्त इसका आधा हिस्सा ही इस्तेमाल करेंगे...और बचा आधा हिस्सा आप फेंक दोगे...जितना ज़्यादा आप बर्बाद करोगे, उतना ही ज़्यादा आप खरीदोगे...स्टोर ये अच्छी तरह जानते हैं...इसलिए यहां बर्बादी रणनीति है, बाइ-प्रोडक्ट नहीं...

पावेलस्की के मुताबिक  पीले प्याज के लिए सामान्यतया दो इंच या उससे थोड़ा बड़ा ही आकार चलता है...जबकि तीन दशक पहले एक इंच के आसपास ही मानक आकार माना जाता था...पावेलस्की के अनुसार छोटे किसान वालमार्ट के साथ मोल-भाव नहीं कर सकते...इसी वजह से उनके खेतों के पास छोटे प्याज़ों के पहाड़ सड़ते मिल जाते हैं...


पावेलस्की के फार्म को छोटा फार्म माना जाता है...अमेरिकी कृषि विभाग के मुताबिक जिन फार्म की सालाना आय ढाई लाख डॉलर से कम हैं, उन्हें छोटा ही माना जाता है...ये बात अलग है कि अमेरिका के कुल फार्म में 91 फीसदी हिस्सेदारी इन छोटे फार्म की ही है...इनमें से भी 60 फीसदी ऐसे फार्म हैं जिनकी सालाना आय दस हज़ार डॉलर से कम है...पावेलस्की, उनके पिता और उनके भाई संयुक्त रूप से 100 एकड़ में खेती  करते हैं...इस ज़मीन में से 60 फीसदी के ये मालिक हैं और 40 फीसदी ज़मीन किराये की है...

पावेलस्की का कहना है कि सिर्फ चेनस्टोर ही छोटे किसानों के हितों के खिलाफ काम नहीं करते...बाढ़ और आइरीन तूफ़ान जैसी प्राकृतिक आपदाओं की भी मार उन्हें सहनी पड़ती है...पावेलस्की को 2009 में फसल नष्ट होने से एक लाख पंद्रह हज़ार डॉलर का नुकसान हुआ था...लेकिन उन्हें फसल बीमे से सिर्फ छह हज़ार डॉलर की भरपाई हुई...जबकि बीमे के प्रीमियम पर ही उनके दस हज़ार डॉलर जेब से खर्च हुए थे...

पूरा कृषिगत ढ़ांचा और नीतियां पिछले कुछ दशकों में छोटे किसानों के खिलाफ होती गई हैं....पावेलस्की खुद कम्युनिकेशन्स स्टडीज़ में पोस्ट ग्रेजुएट हैं...उनके पड़दादा ने जब अमेरिका में पहली बार कदम रखा था तो उनकी जेब में सिर्फ पांच डॉलर थे...आज उऩका पडपोता तीन लाख बीस हज़ार डॉलर का कर्ज़दार है...अमेरिकी कृषि का पूरा ढ़ाचा छोटे किसानों की जगह कारपोरेट सेक्टर के हित साधने वाला है...

पावेलस्की की पत्नी एक स्कूल में असिस्टेंट लाइब्रेरियन हैं...वो इसलिए ये नौकरी करती हैं कि परिवार को आर्थिक सहारा मिलता रहे...पावेलस्की के मुताबिक पिछले साल उन्होंने पचास एकड़ के फार्म पर कृषि लागत पर एक लाख साठ हज़़ार डॉलर खर्च किए और बदले में उन्हें दो लाख डॉलर मिले....यानी चालीस हज़ार डॉलर की कमाई पर उन्हें टैक्स देना पड़ा...इससे दोबारा निवेश के लिए उनके पास बहुत कम बचा...

एसोसिएटेड प्रेस की  2001 में कराई एक जांच से सामने आया था कि सार्वजनिक पैसा सबसे ज़्यादा कहां जाता है...जबकि तब हालात काफ़ी अलग थे, लेकिन  तब भी कारपोरेट जगत और बहुत अमीर कंपनियों की पकड़ बहुत मज़बूत थी...एसोसिएटेड  प्रेस ने अमेरिकी कृषि विभाग के दो करोड बीस लाख चेकों की जांच की तो उनमें से 63 फीसदी रकम इस क्षेत्र के सिर्फ दस बड़े खिलाड़यों को ही मिली...डेविड रॉकफेलर, टेड टर्नर, स्कॉटी पिपेन जैसे धनकुबेरों को भी उनके फार्म्स के लिए सब्सिडी मिली... पी. साईनाथ

क्या यही होने जा रहा है अब भारत में भी....

शनिवार, 24 नवंबर 2012

केजरीवाल 'आप', अन्ना 'बाप'...खुशदीप


अरविंद केजरीवाल ने अपनी राजनीतिक पार्टी का नाम 'आम आदमी पार्टी ' (AAP) रखा है...अभी तक जिस 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' (IAC) के बैनर तले वो मौजूदा राजनीतिक पार्टियों की नाक में दम करते रहे हैं, उसे वो अन्ना हजारे की इच्छा के मुताबिक उनके गैर-राजनीतिक संगठन के लिए छोड़ने का ऐलान पहले ही कर चुके हैं...लेकिन मेरी समझ से अब अन्ना को भी अपने संगठन के नाम को लेकर रणनीति बदल देनी चाहिए...केजरीवाल के अपनी पार्टी के नाम को सावर्जनिक करने के बाद तो खास तौर पर...अन्ना को अपने संगठन का नाम 'BAAP' (बहुत आम आदमी परेशान) रख देना चाहिए...ठीक शहंशाह के अमिताभ की तरह...रिश्ते में तो हम तुम्हारे 'बाप' लगते हैं, नाम है किसन  बापट बाबूराव हजारे...बापू तो अब इस देश के लिए दोबारा आएंगे नहीं, बाप ही सही...


आम आदमी तो इस देश का बहुत भोला है...बापू ने जिस कांग्रेस को आज़ादी के बाद भंग कर देने की इच्छा जताई, वही कांग्रेस इस आम आदमी को पिछले 65 साल में से 55 साल तक पोपट बनाती रही...बाकी बचे दस साल में जनता पार्टी, जनता दल, संयुक्त मोर्चा और एनडीए ने भी इस देश पर राज किया...इन गैर कांग्रेसी विकल्पों को पांच बार आम आदमी ने बड़ी उम्मीदों के साथ मौका दिया तो इन्होंने भी उसे मायूस करने के अलावा और कुछ नहीं किया...

अब करते हैं आज की बात...आज के आम आदमी की बात...अब ऐसा कहने वालों की कमी नहीं कि केजरीवाल को देश की कमान मिली तो आम आदमी का नसीब बदल जाएगा...आम आदमी एक बार फिर केजरीवाल से बड़ी उम्मीदें पालने लगा है...वही आम आदमी जिसे चुनाव जीतने वाली हर पार्टी वैसे ही बजाती आई है जैसे मंदिर के घंटे को कोई भी बजा सकता है...सत्ता में मौजूद पार्टी के कुशासन को संगठित तौर पर कोई भी चुनौती देता है तो उस शख्स या संगठन में आम आदमी को अपना हीरो नज़र आने लगता है...फिर यही आम आदमी अपनी मुसीबतें जल्दी खत्म होने की सोच कर गाने लगता है...के आप मुझे अच्छे लगने लगे...सपने सच्चे लगने लगे....

अब गाने का ज़िक्र आया है, तो इसे सुन भी लीजिए....कैसे इन मोहतरमा को कोई एक जनाब बहुत अच्छे लगने लगे हैं...कैसे उसके मन में उम्मीदों का सागर हिलोरें मारने लगा है...क्या वैसी ही सूरत आज देश के आम आदमी की भी है....केजरीवाल के 'आप' को लेकर...




आप मुझे अच्छे लगने लगे,
सपने सच्चे लगने लगे,
आहा आप मुझे अच्छे लगने लगे,
सपने सच्चे लगने लगे,
नैन सारी रैन जगने लगे.

के आप मुझे अच्छे लगने लगे,
सपने  सच्चे लगने लगे...
के आप मुझे अच्छे लगने लगे,
सपने  सच्चे लगने लगे...

बातें यही होने लगी गांव में,
बातें यही होने लगी गांव में,
छुपती फिरूं मैं धूप-छांव में,
ज़ंजीरें फौलाद की हैं पांव में,
मगर छन-छन्नन घुंघरू बजने लगे,

आहा, आप मुझे अच्छे लगने लगे,
नैन सारी रैन जगने लगे
के आप मुझे अच्छे लगने लगे,
सपने सच्चे लगने लगे...
अंखियों को भेद खोलना आ गया है,
अंखियों को भेद खोलना आ गया,
मेरे मन को भी डोलना आ गया,
खामोशी को बोलना आ गया,
देखो गीत मेरे मुख पे सजने लगे,

आहा आप मुझे अच्छे लगने लगे,
नैन सारी रैन जगने लगे,
के आप मुझे अच्छे लगने लगे,
सपने सच लगने लगे...


( फिल्म...जीने की राह (1969),  गायिका...लता मंगेशकर,  गीतकार...आनंद बक्षी, संगीतकार...लक्ष्मीकांत प्यारेलाल)

सोमवार, 19 नवंबर 2012

रोता है रातों में पाकिस्तान क्या...खुशदीप





बंटवारे का दर्द जिस पीढ़ी ने सहा,  और जो उस वक्त पूरे होश-ओ-हवास में थे,उनमें से ज़्यादातर लोग दुनिया को अलविदा कह चुके हैं...1947 में भी जो पैदा हुए थे, वो आज 65 साल के हो चुके हैं...देश की आज़ादी के साथ इस बंटवारे ने क्या-क्या छीना, इसकी कसक वही शिद्दत के साथ बयां कर सकते हैं, जिन्होंने इसे जिया, महसूस किया...इस दर्द की एक बानगी देखनी है तो पीयूष मिश्रा का एक गीत सुनिए...गुलाल फेम पीयूष मिश्रा के इस गीत में जावेद नाम के एक शख्स की चिट्ठी के ज़रिए व्यथा को उकेरा गया है...अपनी माशूका हुस्ना से बिछुड़ गया जावेद इन अल्फाज़ों में हर उस बात का ज़िक्र कर रहा है जो सब पीछे छूट चुकी है...




लाहौर के उस पहले जिले के,
दो परगना में पहुंचे,
रेशम गली के दूजे कूचे के,
चौथे मकां में पहुंचे,
कहते हैं जिसको दूजा मुल्क,
उस पाकिस्तान में पहुंचे,
लिखता हूं खत मैं हिंदुस्तां से
पहलु-ए-हुस्ना में पहुंचे,
ओ हुस्ना…

मैं तो हूं बैठा,
ओ हुस्ना मेरी, यादों पुरानी में खोया,
पल पल को गिनता
पल पल को चुनता
बीती कहानी में खोया
पत्ते जब झड़ते हिंदुस्तां में
यादें तुम्हारी ये बोलें
होता उजाला जब हिंदुस्तां में
बातें तुम्हारी ये बोलें
ओ हुस्ना मेरी ये तो बता दो
होता है ऐसा क्या उस गुलिस्तां में
रहती हो नन्ही कबूतर सी गुम तुम जहां

ओ हुस्ना…

पत्ते क्या झड़ते हैं पाकिस्तान में वैसे ही
जैसे झड़ते यहां

ओ हुस्ना…

होता उजाला क्या वैसा ही है
जैसा होता है हिंदुस्तां में…हां

ओ हुस्ना…

वो हीरों के रांझे, के नगमे मुझको
हर पल आ आके सताएं
वो बुल्ले शाह की तकरीरों के
झीने झीने से साये
वो ईद की ईदी, लंबी नमाजें, सेवइयों की झालर
वो दीवाली के दिये, संग में बैसाखी के बादल
होली की वो लकड़ी जिसमें
संग संग आंच लगायी
लोहड़ी का वो धुंआ जिसमें
धड़कन है सुलगायी

ओ हुस्ना मेरी
ये तो बता दो
लोहड़ी का धुआं क्या अब भी निकलता है
जैसे निकलता था, उस दौर में हां… वहां

ओ हुस्ना

हीरों के रांझों के नगमे
क्या अब भी सुने जाते हैं वहां

ओ हुस्ना

रोता है रातों में पाकिस्तान क्या वैसे ही
जैसे हिंदुस्तान

ओ हुस्ना

पत्ते क्या झड़ते हैं क्या वैसे ही
जैसे कि झड़ते यहां
होता उजाला क्या वैसे ही
जैसा होता ही हिंदुस्तां में… हां

ओ हुस्ना…
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गायक  और गीतकार....पीयूष मिश्रा
संगीतकार....हितेश सोनिक
एलबम....कोक स्टूडियो सीज़न फ़ाइव

रविवार, 21 अक्तूबर 2012

अलविदा ! प्यार के देवता...खुशदीप



       अलविदा !  प्यार के देवता 

  यश चोपड़ा                
    जन्म-27 सितंबर 1932, लाहौर​                 
 मृत्यु-21अक्टूबर 2012, मुंबई












                                                                 

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

'ड्रीमम वेकपम' की संदर्भ सहित व्याख्या...खुशदीप


पढ़ाई के तरीके बदल रहे हैं...अब उन तरीकों से बच्चों को पढ़ाने पर ज़ोर दिया जा रहा है जिन्हें वो आसानी से समझ सकें...जैसे बच्चा-बच्चा और किसी को पहचानता हो या न हो लेकिन सचिन तेंदुलकर और शाहरुख़ ख़ान को ज़रूर पहचानता होगा...इसलिए अब कई सेलेब्रिटीज़ को बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा है...कहते हैं कविता हमारे जीवन से खत्म होती जा रही है...लेकिन धन्य है हमारा बॉलीवुड जो दिन प्रति दिन हमें न जाने कब से एक से बढ़ कर सस्वर गाई जाने वाली रचनाएं दिए  जा रहा है...अब कल्पना कीजिए इन्हीं रचनाओं को पद्य के रुप में हिंदी के पाठ्यक्रम में स्थान मिलना शुरू हो जाए तो हमारे नौनिहाल किस तरह संदर्भ सहित व्याख्या करेंगे...उसी की एक बानगी...

सवाल...
संदर्भ प्रसंग सहित निम्नलिखित कालजयी रचना की व्याख्या कीजिए...
ड्रीमम वेकपम, क्रिटिकल कंडीशनम

छात्र का उत्तर...

संदर्भ और प्रसंग...
ये पंक्तियां प्रेम रस में रोम-रोम तक डूबीं परम भक्तिनी रानी मुखर्जी के ऐातिहासिक श्रव्य और दृश्य महाग्रंथ अय्या की अमर रचना...ड्रीमम वेकपम, क्रिटिकल कंडीशनम...से उद्धृत की गई हैं....​



व्याख्या... 
इस कविता में  क्यूपिड के तीर से पीड़ित रानी मुखर्जी जब भी देव तुल्य शरीर सौष्ठव वाले पृथ्वीराज को नृत्य का रस बिखेरते देखती हैं तो इनका चंचल मन व्याकुल हो उठता है... स्वपन से जागने के बाद रानी मोहक शब्दों में अपनी क्रिटिकल कंडीशनम यानी गंभीरावस्था का बखान करती हैं...उनके संयम का बांध टूट जाता है और उनके मुखारबिंदु से स्वत ये अनमोल वचन निकलने लगते हैं...​
​​
ड्रीमम वेक अपम क्रिटिकल कंडीशनम​
अर्थम क्वेकपम हिल ढुल सब शेकपम​
​फेस टू फेस धरती पुत्रम ​
​टाप टू बेसम कामासूत्रम​
​थाईसम थंडरम डाउनम अंडरम​
​साईजम मैट्रम थिंकम वंडरम​
​जंपिंगम...पंपिंगम
थ्राबिंगम...थंपिंगम​
​ वुने रुंडे मुने नाले​

​हार्ट बीटनम ढोल पीटनम​​
​लव लस्ट डबल कष्ट बड़ा देतनम
​बाडी हीटनम हाट सीटनम​​
कालिंग फायर ब्रिगेड भी डिफीटनम​
​सेम टू सेमम दिल में उतरम​
​टाप टू बेसम कामासू्त्रम​​
​ थाईसम थंडरम डाउनम अंडरम​
​साईजम मैट्रम थिंकम वंडरम​
​जंपिंगम...पंपिंगम
थ्राबिंगम...थंपिंगम​
​ वुने रुंडे मुने नाले​


निष्कर्ष...

ये रचना प्रेम की  देवी रानी मुखर्जी की  घोर अधीरता की ओर बड़े प्रभावशाली ढंग से इंगित करती है....​


स्लॉग गीत




(अय्या 12 अक्टूबर को रिलीज़ होने जा रही हैं ...​कथा और निर्देशन सचिन कुंदलकर का है...प्रोड्यूस किया है जानेमाने निर्देशक अनुराग कश्यप ने वायाकाम 18 के साथ मिलकर..​.फिल्म में रानी मुखर्जी के साथ मुख्य भूमिका में है​​ मलयालम सुपर स्टार पृथ्वीराज.. पृथ्वीराज इस फिल्म से बालीवुड में डेब्यू कर रहे हैं...अय्या में रानी मराठी लड़की मीनाक्षी देशपांडे का किरदार निभा रही हैं, जिसे तमिल कलाकार सूर्या (पृथ्वीराज) से प्यार हो जाता है...मराठी-तमिल संस्कृति के टकराव की पृष्ठभूमि में हास्य का रोचक तानाबाना बुना गया है..​फिल्म का संगीत अमित त्रिवेदी ने दिया है और इसके गीतों को शब्द अमिताभ​ भट्टाचार्य से मिले हैं...ड्रीमम वेकपम, क्रिटिकल कंडीशनम को गाया है सौम्या राओह ने...)

बुधवार, 19 सितंबर 2012

हिल ढुल सब शेकअपम...खुशदीप



सर्जरी हो गई है...गाल ब्लैडर रिमूव करने के साथ जिन दो स्टोन्स ने पिछले तीन महीने से परेशान कर रखा था, वो भी निकाल दिए गए हैं...सर्जरी के बाद पिछले पांच दिन से पेट में डला हुआ एक ड्रेन भी निकाला गया...सर्जरी तो ज़ाहिर है एनेस्थीसिया के असर में हुई थी, क्या हुआ था कुछ पता नहीं चला...लेकिन मेरे होशोहवास में सर्जन ने जब पेट से एक झटके में ड्रेन निकाला तो कुछ क्षणों के लिए हुए भीषण दर्द ने सारे पूर्वज याद दिला दिए...​

सर्जन ने हैवी पेन किलर देते हुए एक हफ्ता और आराम के लिए कहा है...अभी कमज़ोरी काफ़ी है...इसलिए वक्त बेड पर लेटे ही गुज़र रहा है...नेट​पर भी कुछ देर में थक जाता हूं, पहली बार लेटे लेटे सर्फिंग करते टीवी देखने पर पता चल रहा है कि केबल वाला कितने चैनल दिखाता है...



रिमोट के बटन बार बार बदलता हूं तो हर तीसरे चौथे चैनल पर रानी मुखर्जी पर फिल्माया अय्या फिल्म का गाना दिख रहा है...
ड्रीमम वेक अपम क्रिटिकल कंडीशनम​,
​अर्थम क्वेकपम हिल ढुल सब शेकअपम​........ ...  

गाने के बोल हालिया हिट हुए वाय दिस कोलावरी, कोलावारी, कोलावरी डी जैसे ही साउथ चार्टबस्टर की याद दिला रहे हैं...इससे पहले दर्द से मेरा भी सब हिल ढुल सब शेक अपम करने लगे, इस पोस्ट को यही विराम देता हूं...पूरी तरह ठीक होने पर इस गाने​ ​पर विस्तार से कुछ मज़ेदार ज़रूर लिखूंगा, ये वादा रहा...

शनिवार, 8 सितंबर 2012

राहत का झुनझुना बाजे घणा...खुशदीप​


जो सत्ता में है वो पिता जी की जागीर समझ कर देश पर राज कर रहे हैं...रोज़ आम आदमी की जेब एक बिलांग छोटी करते जा रहे हैं...यूपीए सरकार​ टू-जी का घंटा बजाने के बाद कोयले की कालिख मुंह पर लगाकर नज़र के टीके की तरह अपनी बलैंया उतरवा रही है...कम एनडीए भी नहीं है...जिन​ राज्यों में एनडीए की सरकारें हैं, वो भी जनता की पुंगी बजाकर अपना उल्लू सीधा करने में पीछे नहीं है...हिमाचल प्रदेश में बीजेपी की सरकार है...इसी​ साल यहां विधानसभा चुनाव होने हैं...राज्य सरकार ने आज करोड़ों रुपये के खर्च पर अखबारों में एक विज्ञापन दिया है...​



राहत के राशन नाम के इस विज्ञापन को अब ज़रा गौर से पढ़िए...​
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​आटा, चावल, तीन दाल, सरसों का तेल, रिफाइंड तेल और नमक सस्ते दामों पर मुहैया करा कर प्रेम सिंह धूमल सरकार ने हिमाचल के साढ़े सोलह​ लाख परिवारों की मददगार होने का दावा किया है...विज्ञापन में खुद ही कहा गया है कि इससे हर परिवार को पांच साल में तीस हज़ार रुपये का फ़ायदा​​ हुआ...यानी एक साल में एक परिवार को छह हज़ार रुपये का फ़ायदा...यानी एक महीने में पांच सौ रुपये का फ़ायदा...एक दिन में सोलह रुपये छियासठ पैसे का फ़ायदा...एक परिवार में अगर पांच सदस्य मान लिए जाएं तो हर सदस्य को तीन रुपये  तेंतीस  पैसे का फ़ायदा...अब इस ऊंट के मुंह में जीरे वाली राहत का ढोल पीटने के लिए राज्य सरकार जो करोड़ों रुपये का बजट लुटा रही है, अगर वो भी जनता पर ही खर्च कर देती तो शायद उसका कुछ और भला हो जाता... ऐसे में धर्मेद्र की फिल्म इज्ज़त का गाना याद आ रहा है...

क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी फ़ितरत छिपी रहे, 
नकली चेहरा सामने आए, असली सूरत छिपी रहे,
दान का चर्चा घर घर पहुंचे, लूट की दौलत छिपी रहे...
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शनिवार, 1 सितंबर 2012

मेरी नज़र में लखनऊ ब्लॉगर सम्मेलन...खुशदीप

तस्लीम और परिकल्पना के सहयोग से लखनऊ में अंतर्राष्ट्रीय  ब्लॉगर सम्मेलन संपन्न हुआ...इस आयोजन के लिए भाई रवींद्र प्रभात और भाई ज़ाकिर ने ​महीनों अथक मेहनत की, जिसके लिए वो साधुवाद के पात्र हैं...इस कार्यक्रम के लिए मुझे भी रवींद्र भाई ने न्योता भेजा था लेकिन स्वास्थ्य कारणों ​से मेरी शिरकत संभव नहीं थी, जिसके बारे में मैंने पहले ही सूचित कर दिया था...अभी मेरी सर्जरी होना शेष है, शायद अगले हफ्ते हो जाए..इस वजह ​से नेट पर भी मेरा बहुत कम आना हो पा रहा है...

पिछले दो-तीन में मौका मिला तो देखा, लखनऊ के कार्यक्रम को लेकर  ब्लॉग  और फेसबुक पर पोस्ट-एंटी पोस्ट, टिप्पणी-प्रतिटिप्पणियों की भरमार थी...​इन्हें पढ़कर ऐसा लगा कि जैसे अपमैनशिप के लिए रस्साकशी हो रही है...पुरस्कार आवंटन को लेकर ​पक्ष-प्रतिपक्ष की ओर से कुछ दंभपूर्ण बातें की गईं, ठीक वैसे ही जैसे नौ दिन से संसद में कोल ब्लाक आवंटन को लेकर कांग्रेस और बीजेपी भिड़े हुए हैं...​
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यहां सवाल टांग-खिंचाई का नहीं, दोनों तरफ़ से एक सार्थक सोच दिखाने का है...जिससे नए ब्लॉगरों में भी अच्छा संदेश जाए...नवोदित प्रतिभाओं ​को प्रोत्साहन के लिए रवींद्र भाई इस तरह के कार्यक्रम करते हैं तो उनका भी हमें मनोबल बढ़ाना चाहिए...हां, जो लोग अब ब्लॉग में खुद को अच्छी ​तरह स्थापित कर चुके हैं, अगर उन्हें ही ये सम्मान साल दर साल दिए जाते रहेंगे, तो मेरी दृष्टि से दीर्घकालीन परिप्रेक्ष्य में इसके प्रतिगामी परिणाम​ आएंगे...

मेरा मानना है कि एक ब्लॉगर को सबसे ज़्यादा खुशी दूसरे ब्लॉगरों से मिलने से होती है...सम्मान समारोह में भी ज़्यादातर ब्लॉगर खुद ​के सम्मान से ज़्यादा दूर-दराज़ से आए ब्लॉगरों के साथ मिलने की चाहत से ही पहुंचते हैं...अब सवाल यही रह जाता है कि एक दिन के अल्पकाल​ में औपचारिकताओं को निभाते हुए क्या  ब्लॉगरों की आपस में मिल-बैठने की कसक पूरी हो पाती है...विशिष्ट अतिथियों की नसीहतों से ज़्यादा ब्लॉगरों को एक-दूसरे को सुनने की ज़्यादा ख्वाहिश होती है...इसी पर विमर्श किया जाना चाहिए कि क्या इस तरह के आयोजन इस ख्वाहिश को पूरा कर पाते हैं...​

यहां इसी संदर्भ में मैं उदाहरण देना चाहूंगा, जर्मनी से राज भाटिया जी के हर साल हरियाणा में आकर आयोजन करने का...इन आयोजनों में न कोई​ पूर्व निर्धारित एजेंडा होता है, न ही सम्मान जैसा कोई झंझट...लेकिन भाटिया जी की स्नेहिल मेज़बानी में ब्लॉगरों की एक-दूसरे के साथ मिल-बैठने ​की चाहत बड़ी अच्छी तरह पूरी होती है...यहां सभी  ब्लॉगर होते हैं...राजनीति या साहित्य जगत से कोई बड़ा नाम नहीं होता, जिस पर पूरा कार्यक्रम ही ​केंद्रित हो जाए और ब्लॉगर खुद को नेपथ्य में जाता महसूस करें... कार्यक्रम के बाद सभी हंसी-खुशी विदा लेते हैं कि फिर मिलेंगे अगले साल...ऐसे में कम से कम मुझे तो भाटिया जी के कार्यक्रम का हर साल बेसब्री से इंतज़ार रहता है...​
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अगर मेरी बात को किसी दुराग्रह की तरह न लिया जाए तो मैं लखनऊ जैसे कार्यक्रम के लिए अपने कुछ सुझाव देना पसंद करूंगा, जिससे कि आने वाले​ वर्षों में इस तरह के कार्यक्रमों की सार्थकता बढ़ सके...​

पहली सौ टके की बात, सम्मान से ज़्यादा इन कार्यक्रमों में  ब्लॉगरों के मेल-मिलाप को बढ़ावा देने पर फोकस रखा जाए...​
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पहले दिल्ली और अब लखनऊ में टाइम मैनेजमेंट के चलते ब्लागरों के लिए महत्वपूर्ण सत्रों को रद करने की गलती हुई, जिससे वहां शिरकत करने​वाले ब्लॉगरों को असुविधा हुई...इस पक्ष पर सुधार के लिए प्रयत्न किया जाना चाहिए..​
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इतने बड़े आयोजन के लिए एक दिन पर्याप्त नहीं है...कम से कम दो दिन का आयोजन होना चाहिए...ऐसे में सवाल कार्यक्रम पर आने वाले खर्च का उठ सकता है...तो मेरा नम्र निवेदन है कि इसका सारा बोझ आयोजकों पर डालने की जगह, ब्लॉगरों से ही अंशदान लिया जाना चाहिए...मैं समझता हूं कि सभी ब्लॉगर इसके लिए हंसी-खुशी तैयार होंगे..​
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ब्लागर इतने दूर-दराज़ से आते हैं तो ब्लॉगरों के ठहरने की समुचित व्यवस्था आयोजकों की ज़िम्मेदारी हो जाती है...बेशक इस काम पर आने वाला खर्च​ खुद ब्लॉगर ही  उठाएं..लेकिन अनजान शहर में कम खर्च पर पहले से ही  ब्लॉगरों को ऐसी सुविधा मिले तो उनके लिए बहुत आसानी हो जाएगी...​

ब्लॉगर जगत के लिए आदर्श हैं, जिनका हर कोई सम्मान करता है...जैसे कि रूपचंद्र शास्त्री जी मयंक...अगर उन जैसे ब्लॉग को कार्यक्रम को लेकर कोई​ शिकायत है तो निश्चित तौर पर ये अच्छा संदेश नहीं है...खटीमा से इतनी दूर तक गए शास्त्री जी को पूरा मान-सम्मान मिलना चाहिए था...उनका आसन​ मंच पर ही होना चाहिए था...मैं जानता हूं कि रवींद्र भाई और ज़ाकिर भाई को भी दिल से इस बात के लिए खेद होगा...​
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मुझे ये जानने की बड़ी इच्छा थी कि कार्यक्रम में पिछले साल हमसे बिछड़े डा अमर कुमार को याद किया गया या नहीं...उनकी पुण्यतिथि 23 अगस्त को​, जन्मदिन 29 अगस्त को था...इन्हीं दो तिथियों के बीच यानी 27 अगस्त को ये कार्यक्रम हुआ...लेकिन मैं इस बारे में कहीं पढ़ नहीं पाया...अगर उन्हें कार्यक्रम में याद किया गया तो इसे जानकर मुझे सबसे ज़्यादा संतोष मिलेगा...​

स्लाग ओवर​
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मैं इस तरह के सम्मान समारोह के लिए एक रामबाण नुस्खा सुझाता हूं, जिससे कि सम्मान को लेकर ये किसी को शिकायत ही नहीं रहेगी कि इसे मिला ​तो उसे क्यों नहीं मिला...इसके लिए नोएडा में जिस तरह फ्लैटों के ड्रा के लिए तरीका अपनाया जाता है, वहीं इस्तेमाल किया जाना चाहिए...इसमें​ शीशे के दो तरह के बक्से होते हैं, जिन्हें घुमाया जा सकता है...एक बक्से में सभी आवेदकों की पर्चियां होती हैं...दूसरे बक्से में आवंटित होने वाले फ्लैटों​के नंबर होते हैं...जाहिर है कि आवेदक हज़ारों (कई बार लाखों) में होते हैं तो फ्लैट सिर्फ पचास-सौ ही होते हैं...ऐसे में पहले फ्लैट वाले बक्से से पर्ची निकाली​जाती है और दूसरे बक्से से आवेदक वाली...जिस आवेदक का नाम आता है उसी को फ्लैट आवंटित हो जाता है...यानी सब लाटरी सरीखा, किसी को​ शिकायत का कहीं मौका नहीं...इसी तरह की प्रक्रिया ब्लॉगरों को सम्मान आवंटित करने के लिए अपनाई जानी चाहिए....सभी ब्लॉगर एक समान...कोई​​ किसी से श्रेष्ठ नहीं, कोई किसी से कमतर नहीं.


रविवार, 19 अगस्त 2012

डॉ अमर कुमार के बिना एक साल...खुशदीप


आजकल कुछ लिखने की इच्छा नहीं होती...नेट खोलता भी हूं तो बस न्यूज़ के लिए और ई-मेल चेक करने के लिए...मुझे खुद ही समझ नहीं आ रहा, ऐसा​ क्यों हो गया है मेरे साथ...मुद्दे आज भी बहुत है लिखने को...स्लाग ओवर आज भी बहुत हैं हंसाने को...लेकिन बस बेसिक इन्सटिन्कट गायब हो गई है...​शायद स्वास्थ्य पूरी तरह ठीक हो जाए तो ये इन्सटिन्कट भी वापस आ जाए...​
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लेकिन आज इस पोस्ट को लिखने का खास मकसद है...तीन दिन बाद 23 अगस्त को डॉ  अमर कुमार की पहली पुण्यतिथि है...मेरे लिए आज भी विश्वास करना मुश्किल है  डॉक्टर साहब हमारे बीच नहीं है...अब भी यही लगता है कि कहीं से डॉक्टर साहब की आवाज़ आएगी...ओए खुशदीपे...क्यों उदास बैठा है...​​



इस एक साल में मेरे लिए एक रूटीन सा बन गया है, जब भी सुबह स्नान के बाद प्रार्थना करता हूं तो जब अपने दिवंगत पापा को याद करता हूं तो ​डॉक्टर साहब भी साथ ही रिफ्लेक्स एक्शन की तरह ज़ेहन में आ जाते हैं...नहीं जानता कि ये कौन सा रिश्ता है...उस शख्स के साथ जिससे  मैं ज़िंदगी में कभी​ रू-ब-रू नहीं हुआ...फोन, टिप्पणियों और एसएमएस के ज़रिए उनके साथ जो नाता बना, वो मेरे लिए हमेशा की अनमोल धरोहर है...​​आज डॉक्टर साहब सुबह से ही बहुत याद आ रहे थे, इसलिए शाम को उनके बेटे डॉ शान्तनु अमर को फोन मिलाया...बात कर बड़ा अच्छा लगा...डॉ  शान्तनु ​दिल्ली में ही है...​

27 अगस्त को लखनऊ में रविंद्र प्रभात भाई अंतरराष्ट्रीय ब्लागर सम्मेलन कराने जा रहे हैं...स्वास्थ्य ठीक नहीं होने की वजह से मैं इसमें हिस्सा नहीं ले पाऊंगा...लेकिन अभी से इस कार्यक्रम की सफलता के लिए रविंद्र भाई, उनकी टीम और देश-विदेश से आने वाले ब्लागर साथियों को बहुत बहुत बधाई...​

​​आशा करता हूं इस कार्यक्रम में भी हर कोई शिद्दत के साथ डॉक्टर अमर कुमार को याद करेगा...​
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अमर मरे नहीं, अमर मरा करते नहीं..
वो दिलों में रहते हैं, हमेशा हमेशा के लिए...

शनिवार, 11 अगस्त 2012

कोई दोस्त है न रक़ीब है...खुशदीप




कोई दोस्त है न रक़ीब है, तेरा शहर कितना अजीब है
[ रक़ीब = दुश्मन ]
वो जो इश्क़ था वो जुनून था,
ये जो हिज्र है ये नसीब है
[ हिज्र = विरह ]
यहाँ किसका चेहरा पढ़ा करूं,
यहाँ कौन इतना करीब है
मै किस से कहूं मेरे साथ चल,
यहाँ सब के सर पे सलीब है
​क्या ये बात ब्लागिंग के शहर पर भी सटीक बैठती है...
राणा सहरी​ 

रविवार, 5 अगस्त 2012

अमिताभ के विजय की लकीर पर अन्ना...खुशदीप


​​


जो 65 साल में नहीं हुआ, वो अब तीन साल में होगा....जंतर मंतर पर राजनीतिक विकल्प देने का ऐलान करते हुए अन्ना हज़ारे... ​

(ये सुनना है तो इस वीडियो के काउंटर पर 1.20 से जाकर 1.50 तक सुनिए)


​   रहीम चाचा,  जो पिछले 25 बरस में नहीं हुआ, वो अब होगा, अगले हफ्ते एक और कुली इन मवालियों को पैसा देने से इनकार करने वाला है....1975 में रिलीज फिल्म दीवार में अमिताभ बच्चन... (ये डायलाग सुनना है तो इस वीडियो के काउंटर 5.40 पर जाकर 6.00 तक सुनिए) ​​​
​ इऩ दोनों डायलाग में 37 साल का फर्क है...सत्तर के दशक में बड़े परदे पर अमिताभ बच्चन ने विजय बनकर सिस्टम से लड़ने के लिए हिंसा को रास्ता बनाया था...​देश में ये वो दौर था जब उदारीकरण का किसी ने नाम भी नहीं सुना था...उस वक्त अमिताभ के करेक्टर ज़्यादातर मज़दूर तबके वाले होते थे....जो ज़मीन से उठकर अपने बूते ही आसमान तक पहुंच जाता था...परदे पर विजय का एंटी-हीरो अत्याचारियों को उलटे हाथ के मुक्के से धूल चटाता था तो हक़ीक़त में देश की व्यवस्था में दबे-कुचले लोगों को अपनी विजय नज़र आती थी...
इस दौर की पृष्ठभूमि को जार्ज फर्नाडिस के 1974 की रेलवे हड़ताल, मुंबई के कपड़ा मिलों की हड़ताल और जयप्रकाश नारायण के छात्र आंदोलन से जोड़कर देखा जाना चाहिये...अब चाहे ये सपना ही होता था लेकिन ये लोगों को बड़ा सैटिस्फेक्शन देता था...कोई तो है जो करप्ट सिस्टम के मुंह पर तमाचा जड़ सकता है... यही वह दौर था जब मज़दूर शक्ति आवाज़ उठाने लगी थी जिसे सिल्वर स्क्रीन के तिलिस्म में अमिताभ ने अपनी अदाकारी से फंतासी के रंग दिए...  दुर्योग  से उन्हीं दिनों संजय गांधी की कोटरी की बंधक बनकर इंदिरा गांधी तानाशाह बन बैठी थी...देश की जनता को गुलाम और खुद को महारानी समझने की भूल ही इंदिरा गांधी और कांग्रेस को ले डूबी...समग्र क्रांति के नारे के साथ लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने जनता के आक्रोश को एकसूत्र में पिरो कर सत्ता परिवर्तन का रास्ता तैयार किया...  रियल लाइफ़ में जेपी और रील लाइफ़ में अमिताभ (संयोग से दोनों का जन्मदिन 11अक्टूबर को ही है) की  भूमिका एक जैसी ही थी...लोगों को सपना दिखाना कि सिस्टम को बदल दिया तो उनके अपने दिन भी बदल जाएंगे...एंग्री यंग मैन अमिताभ वन मैन इंडस्ट्री हो गए तो उन्होंने चोला बदल कर कामेडी करना शुरू कर दिया...ठीक वैसे ​ही जैसी कामेडी 1977  में जेपी आंदोलन के रथ पर सवार होकर सत्ता में आई जनता पार्टी ने देश के साथ की थी...मोरारजी देसाई का दंभ और चरण सिंह ​की प्रधानमंत्री बनने की लालसा ने ढाई साल में ही जनता पार्टी का बिस्तर गोल कर दिया...जनता ठगी रह गई और इंदिरा गांधी मौके का फायदा उठा कर 1980  में फिर सत्ता में आ गईं...​ ​ जो अमिताभ ने दीवार में कहा था, वही अब अन्ना ने जंतर-मंतर से चुनावी मंतर देने के दौरान कहा है... जो 65 साल में नहीं हुआ वो चमत्कार अब तीन ​साल में होगा...लेकिन बड़ा सवाल है कि कैसे होगा ये...अन्ना आंदोलन की सबसे बड़ी कमजोरी है कि इसके पीछे बड़े शहरों का मध्यम वर्ग खड़ा नज़र आता है..वो मध्यम वर्ग जिसे कहीं न कहीं मनमोहनी इकोनामिक्स का पिछले दो दशक में फायदा मिला है...मजदूर, दलित या सर्वहारा वर्ग के लोग जंतर मंतर पर कहीं खडे़ नज़र नहीं आते... देश की आज की माल कल्चर से मजदूर और गरीब वर्ग इतना कुंठित हो चुका है कि वो​ मानेसर में मारूति-सुजुकी प्लांट जैसी हिंसा से भी नहीं चूक रहा...वो भी अपने लिए एक लाख वेतन की मांग करने लगा है...टीम अन्ना के सदस्य और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने ​मानेसर हिंसा की मिसाल देते हुए ही कहा है कि व्यवस्था न सुधरी तो देश इसी तरह की सिविल वार की ओर चल देगा...प्रशांत क्या इशारा देना चाहते थे, ये तो वहीं जाने...हां इतना ज़रूर साफ़ है कि अन्ना तीन साल में चमत्कार की​ जो बात कर रहे हैं, वो गांव-देहात, शहर के स्लम. मजदूर, दलित, सर्वहारा लोगों के सपोर्ट के बिना मुमकिन नहीं हो सकता...अगर सोशल मीडिया के बूते ही देश के सियासी घाघों को मात देने का ऱ्वाब देखा और दिखाया जा रहा है तो इस आंदोलन का पीपली लाइव बनना सोलह आने तय है...

रविवार, 15 जुलाई 2012

बिन मां के बच्चे और सतीश भाई की किताब...खुशदीप


 बचपन में दो साल की उम्र की धुंधली यादों में मुझे , २० वर्षीया उर्मिला दीदी की गोद आती है जो मुझे अपनी कमर पर बिठाये, रामचंदर दद्दा अथवा प्रिम्मी दद्दा के घर, अपने एक हाथ से मेरा मुंह साफ़ करते हुए , घुमाने ले जा रही हैं ! ढाई साल की उम्र में मेरी माँ की म्रत्यु के बाद, शायद वे मेरी सुरक्षा के लिए सबसे अधिक तडपी थीं  !कुछ समय बाद वे भी ससुराल चली गयीं, उन दिनों भी वे अक्सर पिता से, मुझे अपनी ससुराल हज़रत पुर,बदायूं  बुलवा लेतीं थी !माँ  के असामयिक चले जाने के बाद , पिता शायद बहुत टूट गए थे ! वे मुझे कभी नानी के घर (पिपला ) और कभी उर्मिला दीदी के घर( हज़रत पुर, बदायूं ) में, मुझे छोड़ जाते थे ! माँ के न रहने के कारण खाने की बुरी व्यवस्था और पेट के बीमार पिता को उन दिनों संग्रहणी नामक एक लाइलाज बीमारी  हो गयी थी जिसके कारण उनका स्वास्थ्य बहुत ख़राब होता चला गया ! लोगो के लाख कहने ने बावजूद उन्होंने अपने इलाज़ के लिए बरेली जाने से मना कर दिया था ! उन्हें एक चिंता रहती थी कि वे बच नहीं पायेंगे और उन दिनों इस लाइलाज बीमारी के लिए वे अपनी जमीन बेचना नहीं चाहते थे ! वे अंतिम समय, अपनी चिंता न कर, मेरे  भविष्य के लिए अधिक चिंतित थे ! इस चिंता को वे अपनी दोनों विवाहित पुत्रियों से , व्यक्त किया करते थे !अंततः पिता के न रहने पर, बड़ी दीदी (कुसुम ) मुझे अपने साथ ले आयीं उसके बाद की मेरी परिवरिश बड़ी दीदी ने की, जिन्होंने अपने सात बच्चों के होते हुए भी, मुझे माँ की कमी महसूस नहीं होने दी ! अगर वे न होतीं तो शायद मेरा अस्तित्व ही न होता !अक्सर अकेला होता हूँ तो मन में, अपनी माँ का चित्र बनाने का प्रयत्न अवश्य करता हूँ ! बिलकुल अकेले में याद करता हूँ , जहाँ हम माँ बेटा दो ही हों , बंद कमरे में ....भगवान् से अक्सर कहता हूँ कि मुझ से सब कुछ ले ले... पर माँ का चेहरा केवल एक बार दिखा भर दे...बस एक बार उन्हें प्यार करने का दिल करता है, केवल एक बार ...कैसी होती है माँ ...??​
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ये है सतीश सक्सेना भाई जी के गीत-संग्रह मेरे गीत की भूमिका को लेकर लिखी पोस्ट की आरंभिक पंक्तियां...​

अभी मैं हास्पिटल में भर्ती था, तो सतीश भाई मेरा हाल-चाल पूछने आए...साथ ही मेरे गीत की एक प्रति भी साथ लेते आए...कि मेरा खाली वक्त इसे पढ़ कर कट जाएगा...मैंने सतीश भाई से कहा भी कि आपने पुस्तक की सबसे पहली प्रतियों में से एक मुझे पहले ही भेंट कर रखी है...उसे मैं घर से मंगा लूंगा, इसे किसी और को भेज दें...इस पर सतीश भाई ने अपनी पेटेंट स्माईल के साथ कहा, इसे आप ही जिसे चाहें भेंट कर देना...सतीश भाई, वही आपको बताना चाहता हूं कि इस प्रति को एक ऐसे शख्स को भेंट किया, जिसकी कहानी सटीक वैसी ही है, जैसा कि आपने किताब की भूमिका  में अपने बचपन का ज़िक्र किया है...​

ये शख्स और कोई नहीं, हास्पिटल में डबल रूम में मेरे साथ का ही पेशेंट था...पैंतीस-छत्तीस साल का सुदर्शन युवक...किसी रियल्टी सेक्टर की फर्म में मैनेजर​ के पद पर तैनात..नाम-सुरेश...मंने नोट किया कि सुरेश अक्सर अपने बच्चों को मोबाइल पर हिदायतें देता रहता था...होमवर्क कर लिया...आपस में लड़ना नहीं...छोटे भाई-बहन का ख्याल रखना...जो समझ नहीं आ रहा वो प्रोजेक्ट मैं घर आने के बाद करा दूंगा..मैं हैरान था कि सुरेश को मिलने उसके सब घर वाले बच्चे, माता-पिता, भाई-भाभी समेत दूसरे रिश्तेदार आते थे, लेकिन उसकी पत्नी कभी नहीं आई...मैंने पूछना भी मुनासिब नहीं समझा...

मिलनसार होने के बावजूद सुरेश अपनी बीमारी को लेकर काफ़ी चिंतित दिखता था...दरअसल उसका बुखार नहीं ​जा रहा था..फेफड़ों में कुछ इन्फेक्शन था...डाक्टर रोज़ तरह तरह के महंगे टेस्ट करा रहे थे, लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुच पा रहे थे...यहां तक कि बायोप्सी के लिए उसके सेम्पल भेजे गए थे, जिसकी रिपोर्ट दस-पंद्रह दिन में आनी थी...एक डाक्टर ने डरा भी दिया कि कुछ भी हो सकता है...इसने सुरेश की परेशानी को और बढ़ा दिया था...

एक दिन सुरेश रूम से बाहर गैलरी में टहलने के लिए निकला तो उसके बुजुर्ग पिता मुझसे बात करने लगे...उन्हीं से​ पता चला कि सुरेश की पत्नी दो साल पहले दिल की बीमारी की वजह से चल बसी थी..तीन बच्चों को छोड़कर...बड़ा लड़का अब ग्यारह साल का है, बिटिया नौ साल की और छोटा बेटा छह साल का...एक दिन तीनों बच्चे हास्पिटल आए तो मैंने देखा कि बड़ा लड़का इस छोटी सी उम्र में ही काफ़ी गंभीर दिख रहा था...सुरेश के पिता से ही पता चला कि सुरेश की पत्नी भी बहुत ज़हीन, सुशील और घर में सब का ख्याल रखने वाली थी..उसके इलाज के लिए सुरेश अपने प्लाट वगैरहा  बेच कर अमेरिका जाने की तैयारी कर रहा था कि वो पहले ही भगवान के घर चली गई..मैंने सुरेश के पिता से पूछा कि घर पर इन बच्चों की देखरेख कौन कर रहा है...क्योंकि सुरेश के माता-पिता दोनों ही सरकारी नौकरी में हैं...इस पर सुरेश के पिता ने बताया कि बच्चों की अविवाहित बुआ (फिजीकली चैलेंज्ड) ही उनका सारा ख्याल रखती है...​सुरेश के पिता ने ये भी बताया कि इससे दूसरी शादी के लिए कहो तो भड़क जाता है...कहता है कि मैं बच्चों को लेकर कोई रिस्क नहीं ले सकता...
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ये सब जानने के बाद ये सोचकर मेरा कलेजा मुंह को आ रहा था कि सुरेश की बीमारी को लेकर ऊपर वाला और कोई नाइंसाफ़ी न कर दे...मुझे रह-रह कर उसके बच्चों का ही चेहरा याद आ रहा था...जिस डाक्टर ने सुरेश को डराया था, वो सुरेश के सवालों का हमेशा उल्टा-सीधा ही जवाब देता था...आराम न आने की वजह से सुरेश ने उस डाक्टर को ही बदल दिया...नये डाक्टर ने सुरेश को मनोवैज्ञानिक तरीके से बड़ी अच्छी तरह हैंडल किया...फिर एक दिन उसी डाक्टर ने अच्छी खबर सुनाई कि उसे कोई लाइलाज बीमारी नहीं बल्कि टीबी से मिलता जुलता ही कोई इन्फेक्शन है जो लगातार दवा खाने से से ठीक हो जाएगा...ये सुनकर सुरेश और उसके घर वालों ने राहत की सांस ली और मैंने भी ऊपर वाले का शुक्रिया कहा...

हास्पिटल से मेरी छुट्टी पहले हुई...चलते वक्त मैंने सुरेश को सतीश भाई की मेरे गीत की प्रति दी और भूमिका ज़रूर पढ़ने के लिए कहा...छोटी उम्र में ही मां के बिछुड़ जाने का क्या दर्द का होता है...ये सतीश भाई से बेहतर    और कौन जान सकता है...​
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(एक अच्छी खबर ये कि मेरे हास्पिटल में रहने के दौरान ही मेरे बेटे सृजन का देश के सबसे प्रतिष्ठित कालेज सेंट स्टीफंस, दिल्ली में एडमिशन हो गया...ये आप ​सब की शुभकामनाओं का नतीजा है)

बुधवार, 27 जून 2012

के बीमार का हाल अच्छा है...खुशदीप


अच्छे ईसा हो मरीज़ों का ख़याल अच्छा है, 
हम मरे जाते हैं तुम कहते हो हाल अच्छा है...
उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक,
वो समझते हैं के बीमार का हाल अच्छा है...
रोज़ आता है याँ मेरे दिल को तसल्ली देने,
तुझसे तो दुश्मन-ए-जाँ तेरा ख़याल अच्छा है...​
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​ये जो कुछ भी कहा गया है, ये सब कमबख्त ब्लॉगिंग के लिए है...​दारू तो बेचारी यूहीं बदनाम है, दरअसल चचा ग़ालिब ने एडवांस में  ब्लॉगिंग के लिए ही ये फ़रमाया था कि छूटती नहीं हैं ये काफ़िर मुंह से लगी हुई...​​वाकई एक बार ग़ालिब साहब इस शौक को आज़मा लेते तो लाल परी भी इस सौत के ग़म में हर वक्त लाल-पीली हुई कुढ़ती रहती...​

चलिए अब आता हूं अपनी तबीयत पर...कभी खुद को स्टोन-व्टोन पहनने का शौक रहा नहीं...ऊपर वाले का करम देखिए कि शरीर के बाहर न सही शरीर के भीतर ही दो तीन स्टोनों की नेमत बख्श दी...एक स्टोन महाराज इतने खुराफाती निकले ​कि गाल ब्लैडर की नेक में फंस कर उसका टेंटुआ   ही दबा दिया...यानि खाया-पिया न कुछ अंदर जाने देंगे और न ही बाहर आने देंगे...रही सही कसर लिवर महाराज ने पूरी कर दी...एक्यूट कोलेसिस्टिस ( जान्डिस) का पूरा प्रकोप  दिखा कर...



डाक्टर को इन्फैक्शन दूर करने के लिए ही हफ्ते भर​ अस्पताल में भर्ती करना पड़ा...छुट्टी तो मिल गई है, लेकिन अभी वीकनेस बहुत है...​ये पूरा महीना ही बीमारी के नाम चढ़ गया...​ इस दौरान दिनेशराय द्विवेदी सर, समीर लाल जी, महफूज़, शाहनवाज़ और राकेश कुमार जी (मनसा वाचा  कर्मणा) लगातार फोन पर मेरा हाल लेते रहे...अदा जी, शिखा वार्ष्णेय, शिवम ​मिश्रा,  सर्जना शर्मा जी ने भी फोन पर तबीयत जानी और जल्द स्वस्थ होने के लिए शुभकामनाएँ दीं...

पाबला जी ने भी फोन और एसएमएस  किया, लेकिन मैं बेसुध होने की वजह से उनसे बात नहीं कर पाया...​​​इसके अलावा मेरे ब्लॉग पर भी अनूप  शुक्ल जी, रचना जी,वाणी गीत जी, अरविंद  मिश्र जी,अंशुमाला, प्रवीण  शाह भाई, सोनल   रस्तोगी,अंतर सोहिल,  संजय   (मो सम  कौन),अनुराग  भाई (स्मार्ट  इंडियन), दीपक  बाबा, डा अजित गुप्ता जी और डा टी एस  दराल  सर  ने मेरे शीघ्र स्वस्थ होने के लिए कामना की...​राकेश  कुमार जी अपनी पत्नी (मेरी दीदी शशि जी) के साथ  अस्पताल  मुझे देखने के लिए आए और दो घंटे वहां बैठे रहे...​
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​ठहरिए  पिक्चर अभी बाक़ी है दोस्त...अभी एक  शख्स का ज़िक्र  रह  गया है...मेरे इस बुरे दौर में ये शख्स न जाने कितनी बार मेरे पास  अस्पताल  आया...न  जाने कितनी बार इस  शख्स ने मुझे फोन  किया...यानि बड़े भाई  होने का फर्ज़  निभाया....ये शख्स  और कोई  नहीं सतीश  सक्सेना भाई हैं...विडंबना देखिए  कि  सोलह  जून  को सतीश भाई  के काव्य -संग्रह  मेरे  गीत का विमोचन था और उसी दिन  दोपहर को मुझे अस्पताल  ले जाया गया...सतीश भाई  से मैंने वादा किया था कि  मैं ज़रा भी सही हूंगा तो ज़रूर कार्यक्रम में हिस्सा लूंगा...क्योंकि ये सतीश भाई का नहीं, मेरा अपना कार्यक्रम था...लेकिन  ऐन  वक्त  पर  ऊपरवाला दग़ा दे गया...​
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सतीश  भाई, आपके लिए  एक  बात और...आपने मुझे अस्पताल  में मेरे गीत की जो प्रति दी, उसका इतना सदुपयोग हुआ  है कि आपके व्यक्तित्व और ​कृतित्व पर  बिल्कुल  सटीक  बैठता है...ये पूरी कहानी अगली पोस्ट में बताऊंगा...शरीर में थोड़ी और ताक़त आने के बाद...
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बुधवार, 13 जून 2012

​'सूर्यमाल के सप्तक'...​​खुशदीप


आपने अपने हिंदी ब्लॉग  को एलीट, अभिजात्य, कुलीन, संभ्रात, विद्वत ब्लॉगरों से मान्यता दिलानी है, तो आपको अपने लेखन में आमूल-चूल परिवर्तन  करने होंगे...​सबसे पहले आपको लेखन की इस तरह की शैली को तजना होगा जो पहली बार पढ़ने मॆं ही किसी की समझ में आ जाए...भला इस  तरह का लेखन भी कोई  लेखन हुआ...जब तक कुछ शब्दों का अर्थ समझने के लिए शब्दकोष, दिग्दर्शिकाओं को कंसल्ट करने की ज़रूरत  न पड़े तो बेकार है आपका लेखन....​
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आपके ब्लॉग का नाम  भी 'किंकर्तव्यविमूढ़'  या 'दैदीप्यमान'  जैसे ही क्लिष्ट से क्लिष्ट हिंदी शब्द पर होना चाहिए...पाठकों को नाम समझने में कसरत करने के साथ इसे बोलने में भी उनकी जीह्वा मुड़-तुड़ न जाए  तो व्यर्थ है आपका रचनात्मक कौशल...​

पत्रकारिता में एक बात  पर बहुत ज़ोर दिया जाता है कि आपकी रिपोर्ट धाराप्रवाह होने के साथ आम बोलचाल  की भाषा में होनी चाहिए...खास तौर पर टीवी रिपोर्टिंग ...​टीवी की रिपोर्ट के दर्शकों में विश्वविद्यालय का कोई  प्रोफेसर भी हो सकता है और कम पढ़ा-लिखा कोई रिक्शा-चालक भी...अब ये पत्रकार के शब्दों का कौशल  होगा कि प्रोफेसर और  रिक्शा-चालक  समान रूप से उसकी रिपोर्ट को आत्मसात कर सकें...प्रोफेसर तो आपके क्लिष्ट शब्दों को भी समझ  लेगा लेकिन  बेचारे रिक्शा-चालक  के साथ ये अन्याय  होगा...लेकिन  ब्लॉगिॆग  का परिवेश बिल्कुल  दूसरा है...यहां​ आपके विद्वत  और  गंभीर  लेखन  के ठप्पे के लिए सुगम सुग्राह्य शैली में लिखना घातक  सिद्ध  होगा...​ये कोई  मायने नहीं रखता कि स्टैटकाउंटर  पर आपके ब्लॉग  को पढ़ने वालों का आंकड़ा कितना है...आपकी अलैक्सा रैंकिंग  कितनी है...​ये मानकर  चला जाएगा कि ये सारी पठनीयता ऋणात्मक  है, धनात्मक  नहीं...​

अब आपको 'सूर्यमाल  का सप्तक' बनना है तो आपको कभी कभी इस  तरह  की कलमतोड़  शायरी भी करनी होगी...​
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बड़ी चाहत है कि फ़ुरसत के साथ 
बैठें,

लेकिन कमबख़्त फ़ुरसत  को ही फ़ुरसत  कहां...
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​विद्वतता के सागर में आपको हलचल मनानी है तो कभी किसी पोस्ट में आपको बीथोविन  की सिम्फनी की झंकार छेड़नी होगी...कभी महान ओपेराकार मोज़ार्ट के इडोमोनिया की याद दिलानी होगी...कभी अर्नेस्तो "चे" गेवारा की क्यूबा की क्रांति के ज़िक्र के साथ  समाजवाद का अलख  जगाना होगा...​​ऐसे आंचलिक  और  देशज  शब्दों का भी बहुतायत  में प्रयोग  करना होगा जिससे आपके ठेठ शहरी होने के बावजूद ज़ड़ों की मिट्टी की खुशबू का एहसास दिया जाता रहे...​



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​ब्लॉगिॆग  में ये फंडे अपनाएंगे  तो लुडविग वेन बीथोविन की तरह  दस्सी के अंक से आपको कोई चाह कर भी दूर नहीं रख  सकेगा...बीथोविन के लिए 1805 से 1812 का दौर उनके जीवन में दस्सी का अंक लेकर आया...दस्सी के अंक से मतलब उस पीरियड से है, जब किसी कलाकार का सृजन उत्कर्ष पर रहता है और वह दोनों हाथ से सफलता और कीर्ति बटोरता है...


​​तबीयत  ख़राब  होने के दौर में ये किस तरह  की पोस्ट लिख  गया...और क्लिष्ट  बनाने  के लिए शायद  ज्यामिति की किसी अनसुलझी प्रमेय  का उल्लेख और किया जाना चाहिए था...