खुशदीप सहगल
बंदा 1994 से कलम-कंप्यूटर तोड़ रहा है

नए साल के माथे पर सार्थक तिलक...खुशदीप


अलविदा 2011
स्वागत 2012
नववर्ष है...नवहर्ष है...


कामना यही कि नए साल में आप सब को मिले आपका उत्कर्ष है...



नए साल के माथे पर तिलक के साथ कुछ सार्थक...

बीस रुपये का नोट बहुत ज़्यादा लगता है जब गरीब को देना हो, मगर स्टैंडर्ड के रेस्तरां में वेटर को टिप देना हो तो यही बीस का नोट बहुत कम लगता है...

तीन मिनट के लिए भगवान को याद करना कितना मुश्किल है, और घंटों तक फिल्म, सीरियल या क्रिकेट मैच देखना कितना आसान...

पूरे दिन ज़ुबान चलाने में हमें कोई दिक्कत नहीं होती, लेकिन घर लौटने पर मां-बाप से दो मिनट बात करना भी कितना भारी लगता है...

वेलेनटाइन्स डे  का पूरे साल  इंतज़ार किया जाता है, लेकिन मदर्स डे कब आकर निकल जाता है, पता ही नहीं चलता...

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चेतन भगत के दो बेहतरीन कोट्स...

कड़ी मेहनत करो...लेकिन अपनों के लिए, परिवार के लिए, दोस्तों के लिए वक्त भी निकालो...क्योंकि दुनिया से विदा होने के वक्त आपकी मार्कशीट्स, डिग्रीस, और प्रोफेशनल प्रेज़ेन्टेशन्स को कोई याद नहीं करेगा...

दुनिया से जाने पर आपका जितना भी बैंक-बैंलेस होगा, वो सबूत है आपके ज़रूरत से ज़्यादा काम का, जो कि आपको नहीं करना चाहिए था...

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एक रोटी नहीं दे सका कोई उस मासूम को, लेकिन उसकी तस्वीर लाखों में बिक गई जिसमें रोटी के लिए वो उदास बैठा है...




नए साल पर मस्ती करना कितना आसान है, और ऊपर लिखे  पर मंथन कितना मुश्किल...
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अन्ना के बयान पर 'नारी' चुप क्यों...खुशदीप

मैं दो दिन से इंतज़ार कर रहा था कि हिंदी ब्लॉग जगत में अन्ना हज़ारे के मुंबई के एमएमआरडीए मैदान के मंच से दिए एक बयान पर कोई प्रतिक्रिया होगी...खास तौर पर रचना जी के नारी ब्लॉग पर...लेकिन कोई हलचल नहीं हुई...अन्ना ने कहा था कि बांझ औरत प्रसूता की वेदना को क्या समझेगी...

...मितुल प्रदीप...

अन्ना का इशारा संभवतया कांग्रेस और केंद्र सरकार की संवेदनहीनता की ओर ही था...राष्ट्रकवि प्रदीप की बेटी मितुल प्रदीप ने अन्ना हज़ारे के इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है...अन्ना ने बेशक उपमा देने के लिए इस वाक्य का इस्तेमाल किया लेकिन मितुल के मुताबिक अन्ना का ये बयान महिलाओं का अपमान करने वाला है...उनका कहना है कि भारत में आज भी बच्चा पैदा करने में अक्षम महिलाओं से भेदभाव होता है...उनको मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताडित किया जाता है...जब अन्ना हजारे सार्वजनिक मंच से ऎसे बयान देते हैं तो बच्चा पैदा करने में अक्षम महिलाओं को प्रताड़ित करने वालों का दुस्साहस बढ़ता है....


प्रभात झा
अन्ना निश्चल हो सकते हैं...मुहावरा चुनने में गलती कर सकते हैं...लेकिन जिसे आप गलत समझते हैं उसके लिए बांझ का उदाहरण क्यों....ऐसा ही बयान मध्य प्रदेश के बीजेपी मुखिया प्रभात झा भी इसी महीने की सात तारीख को दे चुके हैं...उन्होंने कांग्रेस को बांझ पार्टी बताते हुए कहा था कि ये ईमानदार नेताओं को जन्म नहीं दे सकती...

इन दोनों महानुभावों से मेरी एक प्रार्थना है कि आप कांग्रेस को बेशक कैसे भी लताड़ें लेकिन किसी नारी के दिल को चोट पहुंचाने वाले शब्दों से ज़रूर बचें...नारी की ममता इस बात की मोहताज़ नहीं होती कि उसकी अपनी कोख से ही बच्चा जन्म लें...मदर टेरेसा पूरी दुनिया के लिए मदर थी...क्या उन्हें दीन-दुखियों के दर्द को समझने के लिए प्रसूति वेदना जानने की ज़रूरत पड़ी...यहां मुझे सुष्मिता सेन के एक बयान की भी याद आ रही है...बिना शादी किए एक बच्ची को गोद लेने वाली सुष्मिता सेन ने एक बार पूछे जाने पर कहा था कि मां होने के लिए अपना ही बच्चा होना जरूरी नहीं है...

ब्लॉग जगत इस मुद्दे पर क्या राय रखता है....
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'काणी मां'...खुशदीप



मेरी मां की सिर्फ एक ही आंख थी...जिससे देखने में वो बड़ी बदसूरत लगती थी..मैं इसके लिए उसे देखना भी पसंद नहीं करता था...वो परिवार का गुज़ारा निकालने के लिए स्कूल के छात्रों और टीचरों का खाना बनाकर भेजती थी...एक दिन मेरी मां स्कूल में मुझे मिलने चली आई...उसे स्कूल में देखकर मुझे बहुत गुस्सा आया...आखिर वो ऐसा कर ही कैसे सकती है...उसने स्कूल के दोस्तों के सामने मुझे शर्मिंदा करने की हिम्मत कैसे की...मैंने मां पर बस हिराकत से नज़र डाली और वहां से भाग गया...अगले दिन स्कूल में मुझे मेरे दोस्त ने मां के काणी (एक आंख वाली) होने का ताना देकर चिढ़ाया...मुझे ये सुनकर ऐसा लगा कि मैं वहीं ज़मीन में गढ़ जाऊं...मैं बस यही चाह रहा था कि फिर मुझे कभी मां का मुंह न देखना पड़े..

मैंने घर आकर मां पर जमकर भड़ास निकाली...अगर तुमने स्कूल आकर मेरा मज़ाक ही उड़वाना है तो तुम मर क्यों नहीं जाती...मेरी मां चुपचाप सुनती रही, एक शब्द भी नहीं बोली...मुझे एक सेंकंड के लिए भी अहसास नहीं हुआ कि मैं क्या बोल रहा हूं...मेरे दिमाग में सिर्फ गुस्सा ही भरा था...

मैंने उस दिन के बाद घर से हमेशा के लिए दूर होने की ठान ली...इसके लिए मेरे पास एक ही रास्ता था, जमकर पढ़ाई करूं...मेरी मेहनत रंग लाई और मुझे विदेश की एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में स्कालरशिप मिल गई...फिर मुझे देश लौटने पर अच्छी कंपनी में नौकरी मिल गई...मैंने खास तौर पर ध्यान रखा कि अपने शहर से दूर कहीं नौकरी करूं...मेरी शादी हो गई...मैंने अपना मकान भी खरीद लिया...मैं बीवी-बच्चों के साथ अपनी दुनिया में मस्त हो गया...

एक दिन अचानक मेरे घर की कॉल बेल बजी...दरवाजे पर मां खड़ी थी...उसने मुझे बरसों से नहीं देखा था...पोते-पोती का मुंह देखने का तो सवाल ही कहां था...मेरे बच्चे अनजान महिला की ऐसी  शक्ल देखकर हंसने लगे...मां की ये हरकत देखकर मैं फिर फट पड़ा...आखिर तुमने मेरे घर आने की हिम्मत कैसे की...बच्चों के आगे भी मेरा मज़ाक बनवाना चाहती हो...फौरन चली जाओ यहां से और फिर कभी ऐसी ज़ुर्रत न करना...


ये सुनकर मेरी मां ने धीरे से जवाब दिया...अनजाने में मैं गलत पते पर आ गई..और मां वहां से चली गई...

एक दिन स्कूल की तरफ से एलुमनी सेलिब्रेशन के लिए मेरे पते पर न्यौता आया...मैं भी स्कूल के दोस्तों से मिलना चाहता था...मैंने पत्नी से झूठ बोला कि इस वीकएंड पर मुझे बिज़नेस ट्रिप पर जाना है...स्कूल का प्रोग्राम खत्म होने के बाद मुझे अपना घर देखने की भी उत्सुकता हुई...मैं घर गया तो पड़ोसियों ने बताया कि मेरी मां की कुछ हफ्ते पहले ही मौत हुई है...ये सुनकर मेरी आंख से एक आंसू भी नहीं निकला...एक पड़ोसी ने एक सीलबंद लिफाफा भी मेरे हवाले किया, जिसमें मेरे लिए मां की लिखी एक चिट्ठी थी...मैंने चिट्ठी पढ़ना शुरू किया...

मेरे दिल के टुकड़े,

मैं इतने साल हमेशा तुम्हारे बारे में ही सोचती रही...मुझे दुख है कि मैंने तुम्हारे घर जाकर तुम्हें और तुम्हारे बच्चों को परेशान किया...मुझे ये जानकर बड़ी खुशी हुई कि तुम इतने साल बाद स्कूल के प्रोग्राम के लिए आ रहे हो...लेकिन तब तक शायद मैं बिस्तर से उठने की हालत में भी न हूं ताकि तुमसे मिल सकूं...मुझे अफसोस है कि मैं तुम्हारे बचपन से जवान होने तक तुम्हारे लिए शर्मिंदगी का सबब बनी रही...तुम बहुत छोटे थे, सीढ़ियों से गिरने पर एक हादसे का शिकार हुए थे...इस हादसे में तुम्हारी एक आंख जाने के बाद मेरे कलेजे पर क्या बीती थी, मैं ही जानती हूं...एक मां के नाते मैं तुम्हें एक आंख के साथ बड़ा होते नहीं देख सकती थी...इसलिए मैंने अपनी एक आंख देने का फैसला करने में एक सेंकंड की भी देर नहीं लगाई...मुझे तुम पर गर्व रहा कि कि मेरा बेटा मेरी आंख से दुनिया को देखेगा...मेरे इस दुनिया से जाने के बाद भी...


खुश रहो और खूब तरक्की करो...


तुम्हारी मां....

(ई-मेल पर आधारित)
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लहू को लहू पुकारा है...खुशदीप





2006 में अलग राहें पकड़ने के बाद पहली बार अंबानी भाई और उनके परिवार सार्वजनिक तौर पर इतने प्यार से मिलते दिखे...गुजरात के जूनागढ़ के चोरवाड़ कस्बे से ही धीरूभाई अंबानी ने सपनों की उड़ान भरी थी...जिस घर में वो कभी किराए पर रहे अब उसी को धीरूभाई के स्मारक का रुप दे दिया गया है...28 दिसंबर को धीरूभाई की 80वीं जयंती के मौके पर स्मारक के दो दिवसीय उद्घाटन समारोह के लिए धीरूभाई की पत्नी कोकिलाबेन तो 26 दिसंबर को ही पहुंच गई थीं...27 को मुकेश-नीता और अनिल-टीना भी अपने-अपने बच्चों के साथ चोरवाड़ में थे..चोरवाड़ी मंदिर में भवानी की पूजा हो या रास गरबा...या फिर परिवार के गुरु रमेश ओझा जी के प्रवचन में पूरे कुनबे की शिरकत, कहीं भी दोनों भाइयों या उनके परिवारों ने ऐसा नहीं लगने दिया कि कभी उनमें बंटवारा भी हुआ है...बिजनेस के लफड़ों या दोस्त-करीबियों से दूर सिर्फ परिवार के लोग ही इन लम्हों को भरपूर जीते हुए...

अंबानी परिवार का आत्मीय मिलन इस वीडियो में देखिए...





अब दोनों भाइयों के लिए रफ़ी साहब की आवाज़ में ये गाना सुनिए...







और अगर आप बड़े सपने देखने के शौकीन हैं तो धीरूभाई पर बनी फिल्म गुरु का ये सीक्वेंस देखिए...


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क्या लोकसभा भंग होगी...खुशदीप



सरकार का लोकपाल बिल साधारण बहुमत से लोकसभा में पास हो गया...लेकिन लोकपाल को राहुल गांधी की इच्छा के अनुरूप संवैधानिक दर्जा देने की कोशिश में सरकार को सदन में मुंह की खानी पड़ी...सदन के नेता प्रणब मुखर्जी ने मज़बूत लोकपाल के लिए संवैधानिक दर्जे का रास्ता साफ़ न होने का ठीकरा बीजेपी पर फोड़ा...प्रणब ने संविधान संशोधन विधेयक गिरने को लोकतंत्र के लिए दुखद दिन बताया...प्रणब के मुताबिक उनके पास संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए ज़रूरी संख्याबल (273) सदन में मौजूद नहीं था...

ये तो रहा लोकसभा में मंगलवार के पूरे दिन की कवायद का निचोड़...बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा ने संवैधानिक दर्जे में हार के बाद नैतिक तौर पर सरकार से इस्तीफ़ा देने की मांग की है...यशवंत सिन्हा के मुताबिक सरकार के पास सामान्य बहुमत (273) भी नहीं है...उधर, कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला का कहना है कि सदन में बहुमत हमारा ही है, हम दो तिहाई बहुमत नहीं दिखा सके...राजीव शुक्ला के मुताबिक बड़ी बात लोकपाल बिल पास होना है...

अब ज़रा बीजेपी नेता एस एस अहलुवालिया की बात मान ली जाए तो ये सरकार गिरने जा रही है...इसके लिए उन्होंने पिछले 42 साल के लोकपाल बिल के इतिहास को आधार बना कर आंकड़े पेश किए...इनका कहना है कि जब भी लोकपाल बिल संसद में लाया गया, सरकार को जाना पड़ा...कभी लोकसभा भंग हो गई, कभी सरकार चुनाव में हार गई...ऐसा 1968 से ही होता आ रहा है..9 मई 1968 को लोकपाल-लोकायु्क्त बिल पहली बार लोकसभा में पेश किया गया...इसे संसद की सेलेक्ट कमेटी के पास भेजा गया...20 अगस्त 1969 को लोकसभा में ये बिल पास भी हो गया...लेकिन ये बिल राज्यसभा से पास होता, इससे पहले ही चौथी लोकसभा भंग हो गई और ये बिल कालातीत हो गया...

इसी तरह 11 अगस्त 1971 को लोकपाल-लोकायुक्त बिल पेश किया गया...लेकिन इसे न तो सेलेक्शन कमेटी के पास भेजा गया और न ही इसे किसी सदन से पास किया...पांचवीं लोकसभा भंग होने से ये बिल भी काल के गर्त में चला गया...

28 जुलाई 1977 को फिर लोकपाल बिल लाया गया...इसे दोनों सदनों की साझा सेलेक्शन कमेटी के पास भेजा गया..इससे पहले की सेलेक्शन कमेटी की सिफारिशों पर विचार किया जाता, छठी लोकसभा भी भंग हो गई...ये बिल भी अपनी मौत मर गया...

28 अगस्त 1985 को फिर लोकपाल बिल पेश किया गया...संसद की साझा सेलेक्शन कमेटी को इसे भेजा गया...लेकिन सरकार ने फिर इसे खुद ही वापस ले लिया..सरकार ने वायदा किया कि जनशिकायतों के निवारण के लिए जल्दी ही मज़बूत बिल लाएगी...लेकिन फिर इस पर कुछ नहीं हुआ...

29 दिसंबर 1989 को लोकसभा में लोकपाल बिल पेश किया गया...लेकिन 13 मार्च 1991 को लोकसभा भंग होने की वजह से ये बिल भी खत्म हो गया...

13 मार्च 1996 को संयुक्त मोर्चा सरकार ने लोकपाल बिल पेश किया, इसे गृह मंत्रालय की स्थाई संसदीय समिति के पास भेजा गया...समिति ने 9 मई 1997 को कई संशोधनों के साथ रिपोर्ट भेजी...सरकार अपना रुख रख पाती इसे पहले ही ग्यारहवीं लोकसभा भंग हो गई...

14 अगस्त 2001 को एनडीए सरकार ने भी लोकसभा में लोकपाल बिल पेश किया...इसे संसद की स्थाई समिति के पास भेजा गया...लेकिन मई 2004 में एनडीए के सत्ता से बाहर होने की वजह से ये बिल भी अपने अंजाम तक नहीं पहुंच पाया...

अब 15वीं लोकसभा की खुदा खैर करे....
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लोकपाल है चंदा मामा दूर के...खुशदीप



एक तारा बोले तुन तुन,
क्या कहे ये तुमसे सुन सुन,
एक तारा बोले,
तुन तुन तुन तुन तुन,
बात है लम्बी मतलब गोल,
खोल न दे ये सबके पोल,
तो फिर उसके बाद,
ऊहूँ ऊहूँ ऊहूँ,
एक तारा बोले,
तुन तुन तुन तुन तुन....

ये गाना याद है क्या आपको...41 साल पहले मनोज कुमार के अभिनय से सजी फिल्म यादगार के लिए वर्मा मलिक ने ये सुपरहिट गीत लिखा था...लोकपाल को लेकर देश में कल से शुरू हो रही सरगर्मियों को देखते हुए ये गीत बहुत याद आ रहा है...

मुंबई के MMRDA मैदान में तबीयत नासाज़ होने के बावजूद अन्ना ने तीन दिन के अनशन के लिए धुनी जमा ली है...

दिल्ली में संसद में राजनीति के धुरंधर लोकपाल के लिए होने वाली महाबहस में अपनी वाकपटुता के जौहर दिखाने लगे हैं...

30 दिसंबर से अन्ना दिल्ली में सोनिया गांधी के घर के बाहर विरोध जताने के लिए खूंटा गाड़ देंगे...साथ ही तीन दिन का जेल भरो आंदोलन शुरू हो जाएगा...

अन्ना और उनके चेले-चपाटे हों या सरकार, या फिर विपक्ष आखिर चाहते क्या हैं...ये समझ पाना मेरी बुद्धि की सीमित क्षमताओं से बाहर निकल चुका है...

हां, इस सब तमाशे का नतीजा क्या निकलेगा, वो कुछ कुछ ज़रूर मुझे दीवार पर लिखी इबारत की तरह नज़र आने लगा है...

लोकपाल चंदा मामा दूर के बना रहेगा...हां इसके नाम पर सियासत के चूल्हे पर कुछ लोगों का...खोए पकाएं बूर के...का सपना ज़रूर पूरा हो जाएगा...

अगर आप भी लोकपाल की किच-किच से पक चुके हैं तो बुधवार को जूनागढ़ पर नज़र रखिएगा, ज़ायका ज़रूर बदल जाएगा...कल लिखूंगा इस पर...

और आप लोकपाल की बहस को एंटरटेनमेंट की तरह देखते हैं तो फिर इस तमाशे को लाइव देखने में कोई हर्ज़ नहीं है...

फिलहाल तो ये गाना सुनिए...



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क्या होता है बॉक्सिंग डे...खुशदीप



26  दिसंबर यानि बॉक्सिंग डे को हम भारत में ज़्यादातर लोग इसलिए जानते हैं कि ऑस्ट्रेलिया में इस दिन हर साल क्रिकेट टेस्ट मैच शुरू होता है...जैसे कि सोमवार से भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच मेलबर्न में पहले टेस्ट मैच के साथ सीरीज़ शुरू हो रही है...आम भाषा में बॉक्सिंग को कोई भी घूंसेबाज़ी समझने की भूल कर सकता है...वो इसलिए कि दो प्रतिद्वन्द्वी टीमें एक दूसरे से भिड़ती हैं...भारत में भी क्रिकेट प्रसारण या रिपोर्टिंग के दौरान बॉक्सिंग डे शब्द का खूब इस्तेमाल किया जाता है....लेकिन बॉक्सिंग डे का क्रिकेट से कोई लेना-देना नहीं है...हां, इसे घुड़दौड़ या शिकार से ज़रूर जोड़ कर देखा जाता है..

ये विशुद्ध रूप से क्रिसमस से जु़ड़ा है...क्रिसमस के बाद जो भी पहला वीकडे यानि काम का दिन होता है उस दिन ब्रिटेन समेत कई देशों में बैंक हॉलीडे यानि छुट्टी रखी जाती है...अगर क्रिसमस शनिवार या रविवार को पड़ता है तो सोमवार को छुट्टी रहती है...यहां बॉक्सिंग का मतलब भी क्रिसमस बॉक्स से होता है...पारंपरिक तौर पर 26 दिसंबर को क्रिसमस बॉक्स को खोला जाता है जिससे कि उसमें आए तोहफ़ों (गिफ्ट्स) को गरीबों में बांटा जा सके...क्रिसमस बॉक्स लकड़ी या क्ले का बना बक्सा होता है...

बॉक्सिंग डे मनाने की शुरुआत कैसे हुई ?

पुराने ज़माने में जब जहाज़ किसी नई जगह की खोज़ में यात्रा के लिए निकलते थे तो गुडलक के लिए पादरी उसमें क्रिसमस बॉक्स रखते थे...यात्रा के लिए निकलने वाले जहाज़ पर सवार सभी लोग उस बॉक्स में कुछ न कुछ पैसे या अन्य चीज़ें डालते थे...जिसे फिर सील कर जहाज़ पर रख दिया जाता था...जब जहाज़ सकुशल यात्रा से लौट आता तो वो बॉक्स पादरी को दे दिया जाता, जिसे वो क्रिसमस के दिन ही खोलते और उसमें रखे पैसे या चीज़ो को गरीबों में बांट दिया जाता था..

क्रिसमस पर हर चर्च के बाहर आल्म्स बॉक्स (तोहफ़े दान में देने का बॉक्स) भी रखे जाते हैं...जिन्हें क्रिसमस से अगले दिन ही खोला जाता है...इसी वजह से 26 दिसंबर को बॉक्सिंग डे कहा जाता है....क्रिसमस पर कई श्रमिकों को काम भी करना पड़ता था, इसलिए उन्हें अगले दिन छुट्टी देने के लिए बॉक्सिंग डे से छुट्टी की परंपरा जुड़ी है...जैसे दीवाली-होली पर हम घर पर नियमित तौर पर आने वाले पोस्टमैन, स्वीपर, चौकीदार आदि को बख्शीश देते हैं ऐसे ही बॉक्सिंग डे पर ब्रिटेन या उसके उपनिवेश रहे देशों में भी रिवाज़ है...काम वाली जगहों पर भी स्टाफ को गिफ्ट देने का प्रचलन है...

आयरलैंड में बॉक्सिंग डे को सेंट स्टीफंस डे कहा जाता है...स्टीफन रोम में रहते थे और माना जाता है कि वो पहले शख्स थे जिन्हें जीसस के उपदेशों में विश्वास रखने के चलते जान देनी पड़ी थी...

बॉक्सिंग डे से एक क्रूर खेल की भी परंपरा जुड़ी है...इस दिन लाल और सफेद कपड़ों में घुड़सवार लोमड़ी के शिकार के लिए निकलते...उनके साथ कुत्ते भी दौड़ते...कोशिश यही रहती कि लोमड़ी को भगा-भगा कर थका दिया जाए जिससे कि कुत्ते उसे मार सकें...इस परंपरा के खिलाफ इस दशक के शुरू में एनिमल वेलफेयर संगठनों ने अभियान चलाया...नवंबर 2004 में सांसदों की वोटिंग के बाद इंग्लैंड और वेल्स में कुत्तों के साथ शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया गया...18 फरवरी 2005 से कुत्तों के साथ शिकार पर निकलने को आपराधिक कृत्य घोषित कर क़ानून बना दिया गया..
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सांपला, ब्लॉगर मीट, अन्ना भाई...खुशदीप

अविनाश वाचस्पति भाई को यूहीं ब्लॉगिंग का अन्ना भाई नहीं कहा जाता...आज अन्ना भाई ने जो कारनामा कर दिखाया है वो बड़े से बड़ा तीसमारखां रिपोर्टर भी नही कर सकता...अविनाश भाई दिल्ली में स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं...हर ब्लॉगर की यही दुआ है कि हमारे अन्ना भाई जल्दी ही पूरी तरह चंगे हो और आगे होने वाली किसी भी ब्लॉगर मीट की सदारत फिर से संभालें...अरे अन्ना भाई के वर्ल्ड रिकार्ड की बात तो रह ही गई...सांपला ब्लॉगर मीट की पहली रिपोर्ट अन्ना भाई ने ही लिखी है...बिना ब्लॉगर मीट में पहुंचे ही और वो भी सटीक...अन्ना भाई...मान गए आपके सूत्रों को...पल पल की रिपोर्ट आप तक विंद्युत की गति से पहुंचती रही... ये गुर मीडिया रिपोर्टरों को भी सिखा दो, बड़ा उपकार मानेंगें...

नाओ ओवर टू सांपला...

तारीख...24 दिसंबर 2011

स्थान...रेलवे रोड धर्मशाला, सांपला, हरियाणा

वक्त...दोपहर 12 से शाम 5 बजे

मेज़बान...राज भाटिया जी, अंतर सोहेल, सांपला सांस्कृतिक मंच के सदस्य


उपस्थिति...

राज भाटिया (पराया देश, छोटी छोटी बातें)
इंदु पुरी (उद्धवजी)
अंजु चौधरी (अपनों का साथ)
वंदना गुप्ता (जख्म…जो फूलों ने दिये, एक प्रयास)
खुशदीप सहगल (देशनामा, स्लॉग ओवर)
महफूज अली (लेखनी…, Glimpse of Soul)
यौगेन्द्र मौदगिल (हरियाणा एक्सप्रैस)
अलबेला खत्री (हास्य व्यंग्य, भजन वन्दन, मुक्तक दोहे)
संजय अनेजा (मो सम कौन कुटिल खल…?)
राजीव तनेजा (हँसते रहो, जरा हट के-लाफ्टर के फटके)
संजू तनेजा
जाट देवता (संदीप पवाँर) (जाट देवता का सफर)
संजय भास्कर (आदत…मुस्कुराने की)
कौशल मिश्रा (जय बाबा बनारस)
दीपक डुडेजा (दीपक बाबा की बक बक, मेरी नजर से…)
आशुतोष तिवारी (आशुतोष की कलम से)
मुकेश कुमार सिन्हा (मेरी कविताओं का संग्रह, जिन्दगी की राहें)
पद्मसिंह (पद्मावली)
सुशील गुप्ता (मेरे विचार मेरे ख्याल)
राकेश कुमार (मनसा वाचा कर्मणा)
सर्जना शर्मा (रसबतिया)
शाहनवाज़ (प्रेम रस)
अजय कुमार झा (झा जी कहिन)
कनिष्क कश्यप (ब्लॉग प्रहरी)
केवल राम (चलते-चलते, धर्म और दर्शन)

अंतर सोहेल (मुझे शिकायत है, सांपला सांस्कृतिक मंच)
(कुछ सज्जनों के नाम मुझसे छूट रहे हैं, मेरी यादाश्त का कसूर है, क्यां करूं भाई उम्र का तकाज़ा है)

विशेष उपस्थिति-

कंचन भाटिया (श्रीमति राज भाटिया)
शशि (श्रीमति राकेश कुमार)

जो कहते थे आएंगे, मगर आ न सके (अंतर सोहेल की पूर्व प्रकाशित लिस्ट के अनुसार)...

डॉ टी एस दराल (अंतर्मंथन)
दिनेश राय द्विवेदी (अनवरत, तीसरा खंभा)
ललित शर्मा (ललित डॉट कॉम)
नीरज जाट (मुसाफिर हूं यारों, घुमक्कड़ी ज़िंदाबाद)
अविनाश वाचस्पति (तेताला, नुक्कड, बगीची, एडी-चोटी)
रतनसिंह शेखावत (ज्ञान दर्पण, आदित्य)
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (नन्हे सुमन, उच्चारण)
गिरीश "मुकुल" (मिसफिट, बावरे फकीरा, हिन्दुस्तान का दर्द)
वीरू भाई (कबीरा खडा बाजार में)
डॉ प्रवीण चोपडा (हैल्थ टिप्स, मीडिया डॉक्टर)

खान-पान की व्यवस्था...चकाचक

सबने अपना इंट्रोडक्शन देते हुए क्या कहा...अगर सारे उपस्थित ब्लॉगरजन खुद ही अपने शब्दों में इसे बयान करते हुए पोस्ट लिखें तो ज़्यादा मज़ेदार रहेगा...

मैंने क्या कहा...

नाम...खुशदीप सहगल, ब्लॉग...देशनामा, स्लॉग ओवर
ढाई साल पहले 16 अगस्त  2009 को ब्लॉगिंग शुरू की थी...और अब तो ऐसा लगता है कि डॉयनासोर जितना पुराना हो गया हूं और विलुप्त होने की ओर बढ़ चला हूं...
ये किस्सा भी सुनाया कि बैल की उम्र जितनी बड़ी होती जाती है वो चारा ज़्यादा मांगने लगता है...और काम करने की बारी आए तो ना में नाड़ (गर्दन) हिलाने लगता है...
खैर ये तो रही मज़ाक की बात, एक निवेदन सभी उपस्थित ब्लॉगरजन से भी किया...
और लोगों को भी ब्लॉगिंग से जोड़ने की कोशिश ज़रूर की जाए...मुझे बड़ी खुशी है कि मेरे कहने पर राकेश कुमार जी (मनसा वाचा कर्मणा) और सर्जना शर्मा (रसबतिया) ने ब्लॉगिंग शुरू की...कम ही वक्त में दोनों ने कैसे अपना मकाम बनाया, ये सबके सामने हैं...







(ये कुछ फोटोग्राफ्स राजीव तनेजा के फेसबुक एकाउंट से साभार, राजीव भाई ने अभी इतने ही फोटो डाले हैं, शाम को वो हास्य कवि सम्मेलन के लिए सांपला ही रुक गए थे...अब रविवार को दिल्ली लौट कर ही वो बाकी सारी फोटो अपने एकाउंट पर डालेंगे... )




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अन्ना की पूरी कहानी, एक तस्वीर की ज़ुबानी...खुशदीप

अन्ना का नया रण....

27 से अनशन का मुंबई संस्करण...


मिल ही गया MMRDA का मैदान...


बस करना पड़ेगा मोटा भुगतान...


30 से जेल भरो का फ़रमान...


सोनिया-राहुल के घर के बाहर भी होगा धरना-प्रदर्शन का घमासान...



अब ये पूरी गाथा बिना कुछ कहे आर प्रसाद के इस कार्टून में....





(साभार...मेल टुडे)


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बुल्ला कि जाणां मैं कौन...खुशदीप

बेशक मंदिर मस्जिद तोड़ो,
बुल्ले शाह ये कहता,
पर प्यार भरा दिल कभी ना तोड़ो,
जिस दिल में दिलबर रहता...

बचपन में जब भी ये गाना सुनता था तो सोचा करता था कि ये बुल्ले शाह कौन हैं...जो मंदिर-मस्जिद को तोड़ने की बात करते हैं....बॉबी फिल्म के लिए ये गाना इंद्रजीत सिंह तुलसी ने प्रेमिका का दिल टूटने की सिचुएशन के लिए लिखा था...लेकिन बुल्ले शाह ने हक़ीक़त में जो  कहा  था, उसका कैनवास बहुत बड़ा है...उनके मुताबिक....

मस्जिद ढा दे, मंदिर ढा दे,
ढा दे जो कुज दिसदा,
पर किसे दा दिल ना ढावीं,
रब दिल्‍लां विच वसदा...

(अर्थात...मस्जिद गिरा दो, मंदिर गिरा दो, जो कुछ भी दिखता है उसे गिरा दो, पर उस दिल को कभी मत चोट पहुंचाना, जिस दिल में रब बसता है)

दिल में बसने वाले इस रब का अर्थ बहुत व्यापक है...चाहो तो इसे अल्लाह मान लो...चाहो तो इसे ईश्वर मान लो...लेकिन मैं इस रब को भरोसा मानता हूं...भरोसा जो एक इनसान का दूसरे इनसान पर होता है...प्यार भी इसी भरोसे का दूसरा नाम है...भरोसा सिर्फ स्त्री-पुरूष के आत्मीय संबंधों तक ही सीमित नहीं किया जा सकता...भरोसा दूसरे रिश्तों में भी होता है...दोस्ती में भी होता है...गुरु-शिष्य में भी होता है...मालिक-नौकर में भी होता है...

आप ये मानकर चलते हैं कि जिसे आप भरोसे लायक मानते हैं, वो हमेशा आपकी उम्मीदों पर खरा उतरेगा...लेकिन वही शख्स जब आपके भरोसे को तोड़ता है तो कलेजे को सबसे ज़्यादा चोट पहुंचती है...जिन पर आप भरोसा नहीं करते, वो कैसा भी सितम ढाएं, आप दिल पर नहीं लगाते...मगर जिसे बरसों से आप अपना समझ रहे हों, वो अंदर से कुछ और निकले, ये हक़ीक़त आपके दिल को नश्तर की तरह चीर देती है...


बुल्ले शाह

बुल्ले शाह इसी भरोसे को रब बताते हुए सबसे ऊपर होने की बात करते हैं...उसे किसी भी कीमत पर न टूटने की दुहाई देते हैं...दूसरे के जज़्बातों की कद्र करने की सीख देते हैं...लेकिन हम कई बार खुद को इतना ऊंचा समझने लगते हैं कि दूसरों को हद में रहने की नसीहत देने लगते हैं...ये हद आखिर है क्या...क्या ऊपर वाले ने हमे जब दुनिया में भेजा था तो किसी हद में बांध कर भेजा था...पैसा, रूतबा, ओहदा सब छलावा है...इस दुनिया का दिया है, इस दुनिया में ही रह जाना है...सिर्फ इसके चलते अपनी हद को दूसरे इनसान से ऊपर मान लेना नादानी है...लेकिन इनसान ये सब जानते हुए भी अहंकार के घोड़े से नीचे नहीं उतरना चाहता...उतरता तभी है जब ऊपर वाला उसे पटक देता है...फिर उसे अपने किए बर्ताव का अहसास भी होता है तो बहुत देर हो चुकी होती है...

बुल्ला कि जाणां मैं कौन...

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डॉन-2 से 200 करोड़ हर्जाने की मांग...खुशदीप





33 साल पहले आई अमिताभ बच्चन की फिल्म डॉन आज भी ज़ेहन में बसी हुई है...साथ ही ये डॉयलाग भी...डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है या डॉन का इंतज़ार तो ग्यारह मुल्कों की पुलिस कर रही है...उस डॉन को नरीमन ईरानी ने प्रोड्यूस किया था और चंद्रा बारोट ने डायरेक्ट किया था..लेकिन उस वक्त डायरेक्टर-प्रोड्यूसर से ज़्यादा क्रेडिट लाइन में स्टोरी राइटर्स सलीम-जावेद की जोड़ी को अहमियत दी जाती थी...फिल्म के पोस्टरों में भी बस यही लिखा जाता था- सलीम-जावेद की डॉन... डॉन का शुमार दीवार और ज़ंजीर  के साथ अमिताभ की तीन सबसे बड़ी हिट फिल्मों में किया जाता है...

ये भी हैरत की बात है कि डॉन के डायरेक्टर चंद्रा बारोट ने इस फिल्म के पहले या बाद में और कोई फिल्म डायरेक्ट ही नहीं की...32 साल बाद 2010 में उन्होंने फिर एक जासूसी और एक कॉमेडी फिल्म को डायरेक्ट करने की बात कही...लेकिन इस ऐलान के बाद और कोई प्रगति नहीं हो सकी...

अब तो खैर मैं फिल्में देखता नहीं, इसलिए पांच साल पहले शाहरुख़ ख़ान को लीड में लेकर डॉन पर बनी रीमेक...डॉन- द चेज़ बिगिन्स...कब आई और कब चली गई, पता नहीं चला...इस रीमेक को फरहान अख्तर ने डायरेक्ट किया था...



अब फरहान ने फिर शाहरुख को लेकर डॉन-2 का निर्देशन किया है, जो शुक्रवार को रिलीज होने जा रही है...इस फिल्म को फरहान ने रीतेश सिद्धवानी और शाहरूख के साथ मिलकर प्रोड्यूस किया है...इसे डॉन- द चेज़ बिगिन्स का सीक्वेल बताया जा रहा है...



डॉन-2 की रिलीज़ से पहले बॉम्बे हाईकोर्ट में कॉपीराइट के उल्लंघन को लेकर अपील की गई है...बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मोहित शाह और जस्टिस रोशन दलवी की बेंच गुरुवार को इस अपील पर सुनवाई करेगी...इससे पहले 19 दिसंबर को हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने अपने आदेश में फिल्म की रिलीज़ पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था लेकिन हर्जाने की मांग पर सुनवाई जारी रखने की बात कही थी...साथ ही डॉन-2 के प्रोडयूसरों को वाद के अंतिम तौर पर निपटारे तक फिल्म से जुड़े सारे खाते संभाल कर रखने को कहा था...सिंगल बेंच के फिल्म की रिलीज पर रोक न लगाने के फैसले को ही बड़ी बेंच में चुनौती दी गई है...

ये वाद अमिताभ की डॉन को प्रोड्यूस करने वाली नरीमन फिल्मस की तरफ से दायर किया गया है...शिकायत में कहा गया है कि डॉन-2 में ओरिजनल डॉन की सिगनेचर ट्यून, गाने, स्क्रिप्ट, करेक्टर्स और संगीत के कॉपीराइट का उल्लंघन किया गया है...साथ ही 200 करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग की गई है...नरीमन फिल्म्स का दावा है कि डॉन के रीमेक के अधिकार 2005 में साझा किए गए थे...लेकिन ये अनुबंध सिर्फ 2009 तक ही मान्य था...नरीमन फिल्म्स के मुताबिक शाहरूख समेत डॉन-2 के प्रोड्यूसरों ने सीक्वेल बनाने के कभी कोई अधिकार नहीं खरीदे...




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टॉयलेट गुमा रे बुराड़ी के बाज़ार में...खुशदीप

दिल्ली के एक टॉयलेट की प्रतीकात्मक फोटो
......
झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में तो आपने सुना होगा लेकिन टॉयलेट गुम हो जाए दिल्ली के बुराड़ी के बाज़ार में...पढ़ने में कुछ अज़ीब लग रहा होगा आपको...लेकिन इस टॉयलेट के चोरी होने की बाकायदा रिपोर्ट दिल्ली के तिमारपुर थाने में दर्ज़ कराई गई है...ये कुछ कुछ वैसा ही माज़रा है जैसे श्याम बेनेगल की फिल्म वेलडन अब्बा में बमन ईरानी कुआं चोरी हो जाने की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज़ कराने के लिए पंहुचते हैं...

अब आपको ज़्यादा घुमाता नहीं, बता ही देता हूं क्या हुआ...दिल्ली के बुराड़ी विधानसभा इलाके के लोगों ने अपना एक टॉयलेट चोरी हो जाने की पुलिस में शिकायत दर्ज करा कर उसकी पावती भी ली है...बुराड़ी के वार्ड नंबर आठ इदौदा में दिल्ली नगर निगम की ओर से एक टॉयलेट बनाना स्वीकृत हुआ...आरटीआई के माध्यम से जुटाई जानकारी से पता चला कि नगर निगम ने 2008 में टॉयलेट बनाने का ठेका महेश चंद्र एंड कंपनी को एक लाख नौ हज़ार रुपए में दिया...नगर निगम के कागज़ों के हिसाब से 14 जनवरी 2008 को ठेकेदार ने वो टॉयलेट बनाकर निगम को सौंप भी दिया...निगम ने जांच के बाद टॉयलेट को ओके कर ठेकेदार को उसका भुगतान भी कर दिया...

कागज़ों में तो ये सब हो गया लेकिन हक़ीक़त में कभी टॉयलेट बना ही नहीं...इलाके में बीस साल से रह रहे लोगों का कहना है कि उन्होंने कभी उस जगह पर टॉयलेट का नामोनिशान तक नहीं देखा...हैरानी की बात है कि इलाके के बीजेपी  पार्षद गौरव खारी को भी इस गोरखधंधे की भनक तक नहीं है...वो भी अब जांच की बात कह रहे हैं...

लेकिन सरकारी कागज़ झूठ थोड़े ही बोलते हैं...टॉयलेट बना तो बना...तो क्या फिर कोई टॉयलेट को कोई पूरा का पूरा चुरा कर ले गया...बुराड़ी के लोगों ने शिकायत दर्ज़ करा दी है...अब टॉयलेट और चोर को ढूंढ कर लाना पुलिस का काम है...क्या मिलेगा ये टॉयलेट कभी वापस...टॉयलेट तो क्या ही मिलेगा लेकिन भ्रष्टाचार के ज़रिए लोगों के हक़ पर डालने वाले बेनकाब होंगे या नहीं, बड़ा सवाल यही है...
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नैतिकता के आइने में स्पर्म डोनेशन...खुशदीप


कभी जो टैबू विषय माने जाते थे, अब उन पर चुन चुन कर बॉलीवुड फिल्में बनाने लगा है...ऐसा ही विषय है स्पर्म डोनेशन (शुक्राणु दान)...इस विषय पर दो फिल्में हैं...एक है वीजे आयुष्मान खुराना की बतौर एक्टर पहली फिल्म...विक्की डोनर...इसमें आयुष्मान को उभरता क्रिकेटर दिखाया गया है जो एक्स्ट्रा मनी के लिए स्पर्म डोनर का काम भी करता है...

इसी कड़ी में दूसरी फिल्म प्रतिभाशाली निर्देशक  ओनिर बना कर पहले ही रिलीज़ कर चुके हैं ..नाम है...आई एम...इस फिल्म का युवा नायक पूरब कोहली स्पर्म डोनर बना है...फिल्म में सिंगल वूमेन का रोल करने वालीं नंदिता दास डॉक्टर  से  पूरब से मिलवाने के लिए एप्रोच करती है...



रचना जी ने हाल में स्पर्म डोनेशन को आधार बनाकर दो पोस्ट लिखीं...

बेटो को भी नैतिक शिक्षा की जरुरत हैं ताकि समाज सुरक्षित रहे । ---- illegal sperm donation

और

क्या कम आयु के लडको का स्पर्म बेचना महज अपनी पॉकेट मनी के लिये सही हैं / नैतिक हैं ???

रचना जी ने एक सवाल भी किया...

अगर लड़कियों को महज पिंक चड्ढी, स्लट वॉक जैसे विरोध करने के तरीको को लेकर लोग उनको छिनाल , वेश्या इत्यादि कहते हैं वो लोग इन लडकों को, जो जान कर और समझ कर ये कृत्य (स्पर्म बेचना) कर रहे हैं क़ोई ब्लॉग पोस्ट दे कर विमर्श क्यूँ नहीं करते हैं....

रचना जी की इन पोस्टों पर बहुत अच्छी बहस हुई...लोगों ने खुल कर अपने विचार रखे...मैं अपनी बात साफ़ करूं, उससे पहले दो बातें...

मैंने 27 मार्च 2010 को एक पोस्ट लिखी थी...बच्चे आप से कुछ बोल्ड पूछें, तो क्या जवाब दें...

उस वक्त भी टिप्पणियों के ज़रिए काफ़ी अच्छा विचार हुआ था...मैंने उस पोस्ट में ये सवाल उठाया था कि जिस तरह बेटियों को हार्मोनल चेंज होने पर माताएं काफी कुछ समझा देती हैं उसी तरह किशोर लड़कों से उनके पिता इस विषय पर बात क्यों नहीं करते...जिससे लड़के बाहर दोस्तों या दूसरों से सेक्स को लेकर अधकचरी बातें सीखने से बच सकें...बेशक उस पोस्ट में स्पर्म डोनेशन का सवाल नहीं था, लेकिन तब भी काफी कुछ था जो अब नई छिड़ी बहस के साथ प्रासंगिक बैठता है...

अब उस रिपोर्ट की बात कर ली जाए, जिसे ज़ेहन में रखकर रचना जी ने अपनी पोस्ट लिखीं...

पांच दिन पहले शारा अशरफ़ ने हिंदुस्तान टाइम्स में एक शॉकिंग स्टोरी में दिल्ली के डॉक्टरों के हवाले से बताया कि राजधानी में स्कूल जाने वाले लड़के भी पॉकेट मनी के लिए स्पर्म डोनेशन कर रहे हैं...आईवीएफ स्पेशलिस्ट रीता बख्शी के मुताबिक उनके सेंटर पर हर महीने पंद्रह से बीस फोन कॉल और बड़ी संख्या में ई-मेल स्कूल के लड़कों के आते हैं जो स्पर्म डोनेट करना चाहते हैं...इनमें से कुछ तो महज़ 14-15 साल के भी होते हैं...डॉ रीता बख्शी के मुताबिक ऐसे सभी लड़कों को मना कर दिया जाता है क्योंकि स्पर्म डोनेशन के लिए 21 साल की उम्र होना ज़रूरी है...रिपोर्टर ने ये जानने के लिए दूसरे फर्टिलिटी क्लीनिक भी क्या ऐसा ही नैतिक रवैया दिखाते हैं, उन्हें स्कूली छात्र बनकर फोन किया तो वो स्पर्म खरीदने के लिए तैयार हो गए...एक क्लीनिक ने कहा कि वो पहले उनके पास आए तो वो सारा प्रोसीज़र समझा देंगे...एक दूसरे क्लीनिक ने एक हज़ार रुपए देने की पेशकश की...इनफर्टिलिटी, होमोसैक्सुएलिटी, सिंगल पेरेंटिंग के केसेज़ बढ़ने से भी स्पर्म डोनेशन की मांग बढ़ रही है...दिल्ली आईवीएफ एंड फर्टिलिटी रिसर्च सेंटर के डॉ अनूप गुप्ता के अनुसारं एक टाइम के स्पर्म डोनेशन के लिए एक हज़ार से पंद्रह हज़ार रुपए का भुगतान होता है...लोग ज़्यादातर लंबे, गोरे और हैंडसम डोनर्स के स्पर्म की ही मांग करते हैं...गुड लुकिंग लड़कों को स्पर्म डोनेशन की भी ज़्यादा कीमत दी जाती है... फर्टिलिटी क्लीनिकों को नियंत्रित करने वाला कोई कानून न होने की वजह से स्पर्म डोनेशन से जुड़ा बिज़नेस चोखा चल रहा है...मैक्स हेल्थकेयर के आईवीएफ स्पेशलिस्ट डॉ कावेरी बनर्जी के मुताबिक जब तक असिस्टेटेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी रेगुलेशन बिल 2010 जब तक पास नहीं होता तब तक ऐसे रैकेट्स पर अंकुश रखना मुमकिन नहीं है...जहां तक इंडियन कांउसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च का सवाल है उसके मुताबिक स्पर्म डोनर की उम्र 21 से 45 साल के बीच होनी चाहिए...एआरटी क्लीनिक स्पर्म सिर्फ स्पर्म बैंकों से ही हासिल करेंगें और डोनर्स की पहचान छुपा कर रखी जाएगी...क्लीनिक और स्पर्म लेने वाले जोड़े को डोनर की हाइट, वजन, त्वचा का रंग, पेशा, पारिवारिक पृष्ठभूमि, जातीय मूल, बीमारी मुक्त रिकॉर्ड, डीएनए फिंगरप्रिट्स जैसी जानकारी हासिल करने का हक होता है लेकिन सीमेन बैंक या क्लीनिक स्पर्म डोनर की पहचान हर्गिज़ नहीं बताएंगे...

अब फिर आता हूं रचना जी के उठाए मुद्दों पर...

उनका कहना है कि जितना नैतिकता के नाम पर लड़कियों को लेकर पोस्ट पर पोस्ट डालकर सो कॉल्ड विमर्श होता हैं उतना विमर्श लड़कों के स्पर्म बेचने पर क्यूँ नहीं हो रहा...क्योंकि यहाँ गलत काम एक नाबालिग लड़का कर रहा हैं...रचना जी ने ये भी कहा है कि बच्चों को मार्ग दर्शन की बहुत आवश्यकता हैं और ये हम तभी दे सकते हैं जब हम खुद नैतिक हो...नैतिकता की बात करना और उस नैतिकता को सबसे पहले अपने पर लागू करना दोनों में अंतर हैं...जब ये अंतर ख़तम होगा तभी नयी पीढ़ी के आगे हम किसी भी सोच को रखने का अधिकार पा सकते हैं...

मेरा मानना ये है कि हर मुद्दे के दो पहलू होते हैं...एक नैतिक दृष्टि से...दूसरा क़ानून के नज़रिए से....नैतिकता का ह्रास हर जगह हुआ है...हमारा समाज भी उससे अछूता नहीं है...इंटरनेट ने विश्व को वाकई ही ग्लोबल विलेज बना दिया है...जो पश्चिमी जगत में बुरा नहीं माना जाता उसे अब हमारे देश के महानगरों में भी अपनाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है ...स्लट वॉक, क्विर परेड, लिव इन रिलेशनशिप अब हमारे देश के लिए भी टैबू सब्जेक्ट नहीं रहे...

नैतिकता पर इतना ही अमल होता तो हमारा देश भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं हो जाता...यौन शोषण समेत सभी अपराध खत्म नहीं हो जाते...पैसा कहीं लालच में तो कहीं मजबूरी में लोगों से वो काम करवाता है जिन्हें नैतिक नहीं कहा जाता...महिलाओं के देह व्यापार के लिए रेड लाइट एरिया हैं...कॉल गर्ल्स के फाइव स्टार रैकेट्स हैं तो अब इसी देश में मेल स्ट्रिपर्स और जिगोलो (पुरुष-वेश्या) भी हैं...ज़ाहिर है ये तभी इस धंधे में हैं जब इन्हें अपने किए का रोकड़ा मिलता है...अर्थशास्त्र का डिमांड एंड सप्लाई का सिद्धांत यहां भी लागू होता है...जिस बात पर क़ानूनन तौर पर मनाही होती है, वो चोरी छुपे होता है, इसलिए उसकी ज़्यादा कीमत वसूली जाती है...

रही बात कानूनी नज़रिए की...तो ऐसी बहुत सी बुराइयां हैं जिन पर क़ानूनन  रोक हैं, वो हमारे देश में बदस्तूर जारी है...

नाबालिग बच्चों का विवाह क़ानूनन अपराध है, क्या उन पर पूरी तरह रोक लगाई जा सकी है...


कन्या भ्रूण हत्याएं रोकने के लिए सेक्स डिटरमिनेशन टेस्ट पर रोक है, क्या पूरी तरह बंद हो गए ऐसे टेस्ट...

क्या हमारे देश में नशेड़ी नशे की लत पूरी करने के लिए अपना खून नहीं बेचते...कुछ लालची ब्लड बैंक मालिक कौड़ियों के दाम ये ख़ून खरीद कर इस नापाक धंधे से मुनाफ़ा नहीं कमाते...

स्कूली लड़कों का स्पर्म बेचना नैतिक दृष्टि से गलत है, इसे तभी रोका जा सकता है जब मां-बाप बच्चों पर हर वक्त नज़र रखें...क्या व्यावहारिकता में ये इतना आसान है जितना कहने में...फिर जो लोग इस धंधे में लगे हैं, क्या सिर्फ आईसीएमआर द्वारा तय किए गए दिशानिर्देशों से उन्हें सज़ा दिलाई जा सकती है...अभी इस विषय पर क़ानून ही नहीं लाया जा सका है तो सज़ा तो बहुत दूर की बात है...इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देने में क्या उन लोगों की सोच भी ज़िम्मेदार नहीं हैं जो संतान के लिए स्पर्म खरीदते वक्त इस बात पर ज़ोर देते हैं कि स्पर्म डोनर लंबा, सुंदर, कुलीन और गोरे रंग का हो...

ये सब गलत है और बंद होना चाहिए...हर कोई इस बात से सहमत होगा...अपराध या अनैतिकता को अपराध या अनतैकिता के नज़रिए से ही देखा जाना चाहिए...इनका कोई जेंडर नहीं हो सकता...किसी के पुरुष या महिला होने से अपराध या क़ानून के मायने नहीं बदल जाते...ठीक उसी तरह जिस तरह सज्जनता का महिला और पुरूष में विभेद नहीं किया जा सकता....
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ये तस्वीर हम सब के मुंह पर तमाचा है...खुशदीप



दिल्ली के ओखला रेलवे स्टेशन के बाहर 19 साल की माधुरी और उसके दो महीने के बच्चे की ये तस्वीर हम सबके मुंह पर तमाचा है...हम जो कि बड़ी बड़ी बाते करते हैं...जो देश दुनिया को बदलने के लिए क्रांति की दुहाई देते हैं...ये तमाचा है उस समाज के मुंह पर जो सर्दी की ठिठुरती रात में एक मां और नवजात की इस हालत को देख कर भी नहीं पसीजता...ये तमाचा है उन जननायकों के मुंह पर जो दिल्ली में सर्दी के डर से अनशन की जगह मुंबई के आज़ाद मैदान में ले जाने की सोचने लगते हैं...ये तमाचा है उस सरकार के मुंह पर जिसके लिए फिक्र कड़ाके की सर्दी में खुले आसमान के नीचे रात बिताते ये मां-बच्चा नहीं बल्कि विकास दर के घोड़े को सरपट दौड़ाने की है...

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्टर मल्लिका जोशी और फोटोग्राफर संजीव वर्मा को सलाम...जिन्होंने ये स्टोरी की...दिल्ली में सर्दी का अब ये आलम है कि यहां रात को न्यूनतम तापमान (4.7) डिग्री) शिमला जैसे हिल स्टेशन को भी पीछे छोड़ रहा है...ऐसे में छत के नीचे सिर छुपाने की माधुरी की आखिरी उम्मीद भी कल टूट गई जब ओखला स्टेशन के बाहर रेलवे की टीम ने निर्माणाधीन अस्थायी रैन-बसेरे को गिरा दिया...

दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड (DUSIB) की ओर से एनजीओ प्रेरणा को ये शेल्टर बनाने की इजाज़त देने के बावजूद रेलवे ने बुलडोज़र चलवा कर सब साफ़ करा दिया..ये सरकार के ही विभागों में संवादहीनता के चलते हुआ...DUSIB ने पिछले हफ्ते ही तय किया था कि सर्दियों में कहां कहां शेल्टर बनाए जा सकते हैं...इसी के बाद शुक्रवार को यहां शेल्टर बनना शुरू हुआ था...लेकिन रेलवे के अधिकारियों को इसकी कोई जानकारी नही दी गई...

बहरहाल हमें क्या, एक मां-बेटा की हड्डियां चिलचिलाती ठंड में कपकपाती रहें, हम तो रजाई तान कर सोएं...

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STUDIOUS STUDENT BECAME NAUGHTY





The newly given topic for Indiblogger contest  immediately refreshed memories of my college days in Eighties..In those days, I was very much concerned about my reputation of studious and serious student...Once my batch-mates planned a fun out-trip to Badkal Lake, Faridabad...They specially took my consent for participation...One Casanova type student. whose only job was how to impress girls, commented on me...Hamare angane mein tumahara kya kaam hai...So the D-day came and we marched on a luxary bus for picnic-spot...After reaching Badkal Lake, everybody was in their joyous best except me...After 4 or 5 hours of outing, we all were set for lunch session, At that time Casanova proposed that whoever be among us tell most wittiest thing, he or she would be declared as Mr Jovial or Ms Jovial...He was over-confident about his witty charm...But I decided to give him surprise of the life..When my turn came, i started narrating this joke slowly and without any expression on my face...

Once two young friends, Suresh and Ramesh were sitting in a park...Suresh was very sad and upset...Ramesh enquired him about his problem...After listening that Suresh started sobing...That made Ramesh more worried and he assumed that something is very serious with Suresh...Ramesh again offered a helping hand by saying...Tell me your problem, so i can suggest some remedy to over-come that...

Suresh...Yaar, now-a-days Baap had made my life like a hell by always complaining that i'm a Nikkhattu and always killing time for useless things...

Ramesh...But Buddy, my Baap is very much happy with me...

Suresh.. How it is possible ?

Ramesh...Daily in the morning i leave house with my Gulel and broke glass-windows of some residents in the town...They all come to my father's  Glass and furniture shop for replacing their broken glasses...In that way my father's business is flourishing which makes him happy..Now tell me about your father's business, so I can suggest accordingly...

After listening that Suresh started weeping loudly...No you cannot help me...

Ramesh...But why, tell me your father's buisness first...

Suresh answered with cold breath...My father is running a Maternity Home, now tell me, What should i do to make him happy...

And that joke made my mark and from that day, i got the tag of most wittiest person of the college...

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दिल्ली में इंडीब्लॉगर्स मीट, कुछ हट कर...खुशदीप



ढाई साल की ब्लॉगिंग में बहुत सारी ब्लॉगर्स मीट्स में हिस्सा लिया है...इन सभी मीट्स में हिंदी ब्लॉगर्स के सानिध्य में बहुत कुछ सीखने को मिला...बहुत सारे नए दोस्त मिले...संयोग से आज भी मैंने एक ब्लॉगर्स मीट में हिस्सा लिया...एचपी इंडीब्लॉगर्स नई दिल्ली मीट...इंडीब्लॉगर्स की ओर से ई-मेल पर इंवीटेशन मिला था...रजिस्ट्रेशन के साथ उन्होंने फोन पर भी मेरी शिरकत के बारे में कंफर्म किया...रविवार की वजह से मेरा ऑफ था, इसलिए कुछ नया सीखने के इरादे से मैंने इस मीट में जाने का फैसला किया...ई-मेल के ज़रिए ये भी पता चल गया कि कौन-कौन से ब्लॉगर्स इसमें हिस्सा लेने आ सकते हैं...पौने दो सौ नामों में से दो-चार को छोड़ सब अंग्रेज़ी के ब्लॉगर...

कनॉट प्लास के द पार्क होटल में दोपहर डेढ़ बजे से शाम छह बजे तक मीटिंग चलनी थी...ये तो भला हो मनसा वाचा कर्मणा वाले राकेश कुमार जी का...जिनका इस मीटिंग के लिए साथ मिल गया...तसल्ली हुई कि किसी से बात तो कर सकूंगा...टाइम से दस-पंद्रह मिनट लेट होटल पहुंच गए...वहां इंडीब्लॉगर्स की टीम ने रिसेप्शन पर गर्मजोशी से स्वागत किया...काउंटर पर रजिस्ट्रेशन कंफर्म किया गया...बड़े से हॉल में आंमत्रित ब्लॉगर्स के हिसाब से सीट्स थी...लेकिन हॉल के खचाखच भर जाने के बाद कुछ और सीट्स की भी व्यवस्था की गई...किसी भी ब्लॉगर के एंट्री करते ही हॉल में बड़ी स्क्रीन पर उसका नाम ब्लॉग के नाम के साथ आ जाता था...

मुझे, राकेश जी और उनकी पत्नीश्री (मेरी दीदी शशि जी) को आगे से दूसरी कतार में सीट मिली...पहले इंडीब्लॉगर्स टीम की तरफ़ से कार्तिक ने सभी का वेलकम किया...इसके बाद एचपी टीम ने एक प्रभावी प्रेज़ेंटेशन के ज़रिए ओरिजनल प्रोडक्ट्स की महत्ता के बारे में बताया...फिर शुरू हुआ सबके इंट्रोडक्शन का दौर...थर्टी सेकंड्स ऑफ फेम नाम वाले इस सेशन में सभी ब्लॉगर्स ने तीस-तीस सेकंड्स में अपना परिचय दिया...इस सेशन में एचपी की ओर से पेन ड्राइव जैसे प्राइज़ भी बांटे जाते रहे...जैसे हॉल में सभी शाल वाली लेडीज़, सभी पगड़ी वाले ब्लॉगर्स, सीनियर मोस्ट ब्लॉगर, यंगेस्ट ब्लॉगर...इंट्रोडक्शन पूरा होने के बाद सबसे विटी बात कहने वाले जालंधर के युवा ब्लॉगर राजन को एचपी प्रिंटर प्राइज़ दिया गया...

इसके बाद जितने भी ब्लॉगर्स आए थे, उनमें छह टीम बनाकर प्रतियोगिता कराई गई...सभी टीम का एक प्रोजेक्ट मैनेजर चुना गया...सभी टीम को अलग अलग नाम रखने के लिए भी कहा गया...मेरी टीम का नाम मेरे ही सुझाव पर जीतो इंडिया रखा गया...इस सेशन में जगह जगह हॉल में स्टीकर्स चिपके हुए थे...स्मार्ट फोन के ज़रिए उन्ही स्टीकर्स में बार कोड में से ओरिजनल चुनने थे...जिन स्टिकर्स पर एचपी प्रिंटर छपा हुआ था, उसे ढूंढने वालों को प्रिंटर गिफ्ट में मिले...जिस टीम ने सबसे ज़्यादा ओरिजनल स्टीकर्स चुने, उसे विजेता घोषित किया गया...हमारी टीम इस मुकाबले में दूसरे नंबर पर रही...

इस सेशन के बाद हाई टी के लिए आधा घंटे का ब्रेक किया गया...हाई टी क्या चाय-कॉफी और अच्छा खासा खाना. दोनों एक साथ थे...इस सेशन के बाद सबको एक-एक शीट देकर एक दूसरे से कमेंट लेने के लिए कहा गया...साथ ही ये भी कहा गया कि ज़्यादा से ज़्यादा कमेंट लेने की कोशिश कीजिए...अच्छा खासा नज़ारा था...सब की पीठ पर वो शीट थीं और सब एक दूसरे के कमेंट लेने के लिए जुटे थे...मैनें अपनी शीट सीट के साथ कोरी ही रखी और सबको ये करते देखने लगा...अदभुत नज़ारा था...लंबी लाइन लगाकर सब एक दूसरे को तल्लीनता से कमेंट देते हुए (ये समझ भी आया कि ब्लॉगिंग में कमेंट्स की इतनी महत्ता क्यों हैं)...अपने राकेश जी हॉल में कई ब्लॉगरों से मिलकर अपनी शीट पर बीस-पच्चीस कमेंट इकट्ठा कर लाए...लेकिन युवा ब्लॉगरों से कहां पार पाते...कई ब्लॉगर तो इतने थोड़े से वक्त में ही चालीस से पचास कमेंट तक का जुगाड़ कर लाए थे...

सबसे मज़ेदार आखिरी सेशन रहा...इंडीब्लॉगर फोरम के तहत इसमें सारे ब्लॉगर्स में से सात-आठ लोगों को चुन कर डिबेट सेशन कराया गया...टॉपिक कंट्रोवर्सियल रखा जाना था तो कपिल सिब्बल का सोशल नेटवर्किंग साइट्स की नकेल कसे जाने की वकालत से बढ़िया और सब्जेक्ट क्या हो सकता था...एक शख्स स्वेच्छा से कपिल सिब्बल बन गए...एक दिग्विजय बन गए...एक बीजेपी की प्रवक्ता, साथ ही गूगल, फेसबुक, याहू कंपनियों के भी एक-एक मालिक बना दिए गए...एक शख्स को सुहेल सेठ बना दिया गया...इस सेशन में सेंस ऑफ ह्यूमर पूरे निखार पर था...जैसे कि बीजेपी की प्रवक्ता बनी यंग लेडी ने सुझाव दिया कि कुछ करने की ज़रूरत नहीं है, फेसबुक, गूगल, याहू, आरकुट सभी नेटवर्किंग साइट्स के नाम गांधी परिवार की अलग-अलग शख्सीयतों पर रख दिए जाएं, जैसे कि दिल्ली में कनाट प्लेस का नाम बदल कर राजीव चौक कर दिया गया है, फिर देखिए सिब्बल जैसे कांग्रेस के नेता ही इन साइट्स पर बैन की जगह इन्हीं का गुणगान करने लगेंगे...यहां चुटीले अंदाज़ में अच्छा वाद-विवाद देखने को मिला...सभी ने न्यू मीडिया पर सरकारी अंकुश का विरोध किया लेकिन साथ ही इस बात पर भी जोर दिया कि खुद ही किसी के बारे में अभद्र शब्द, तस्वीरों आदि से बचना चाहिए...ऐसे कंटेट की भी भर्तस्ना की जानी चाहिए जो साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाता हो...

जो शख्स कपिल सिब्बल बने थे, उन्हें खूब सवालों का सामना करना पड़ा...दिलेरी से सबका सामने करने के लिए उन्हें भी प्रिंटर प्राइज़ में दिया गया...आख़िर में जितने ब्लॉगर्स आए थे, सभी को साइज़ के अनुसार इंडीब्लॉगर्स की ब्लैक टी-शर्ट देकर विदा किया गया...चलते चलते मेरी इंडीब्लॉगर्स टीम के कार्तिक और द प्रैक्टिस, स्ट्रैटेजिक कम्युनिकेशंस की अशिमा अग्रवाल से बात हुई...इस दौरान खास तौर पर हिंदी और अन्य भाषाओं के ब्लॉगर्स के लिए भी इंडीब्लॉगर्स की तरफ से ऐसे ही आयोजन का मुद्दा उठा...कार्तिक ने बताया कि उनकी टीम इस पर पहले से ही विचार कर रही है...उन्होंने ऐसी किसी मीट के लिए प्रपोज़ल पर आगे डिस्कस करने के लिए अपना कार्ड भी दिया...

कुल मिलाकर आज की शाम अच्छे माहौल में कुछ सार्थक करते बीती...सबसे ज़्यादा मुझे इस मीटिंग की ऊर्जा ने प्रभावित किया...सत्तर साल के एक शख्स भी वैसे जोश के साथ हिस्सा ले रहे थे जैसे कि पंद्रह-सोलह का कोई किशोर...सब कुछ खुशमिजाज़...ऊपर से इंडीब्लॉगर टीम और प्रायोजक एचपी ग्रुप का प्रोफेशनल अंदाज़ में टाइम मैनेजमेंट के साथ मीटिंग का संचालन...एक बात मेरी और समझ में आई कि जब बड़ी ब्लॉगर मीट का आयोजन किया जाना हो तो अच्छे प्रायोजक के साथ इंडीब्लॉगर जैसी तजुर्बेकार टीम का साथ लेना सोने पे सुहागा वाला काम कर सकता है...
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'डर्टी पिक्चर' को ब्लॉग पर डालना कितना सही...खुशदीप




आज ब्लॉग पर एक पोस्ट देखी...हाल में रिलीज़ हुई फिल्म डर्टी पिक्चर को एक सज्जन ने पूरा का पूरा अपने ब्लॉग पर अपलोड कर रखा है...यानि कोई भी उस फिल्म को नेट पर देख सकता है...मैं ये देखकर हैरान हूं.. जिन सज्जन ने ये काम किया है, या तो उन्हें पता ही नहीं है कि ऐसा करके कितना बड़ा ज़ोखिम मोल ले रहे हैं...और अगर पता होने के बावजूद किया है तो फिर कुछ नहीं कहा जा सकता...

मैं फिल्म के कंटेंट या एडल्ट सर्टिफिकेट की वजह से यह बात नहीं कह रहा...

कोई भी फिल्म प्रो़ड्यूसर इसलिए फिल्म बनाता है कि लोग हॉल में जाकर उसे देखें...इसीलिए अवैध सीडी बनाने, चलाने और देखने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए प्रोड्यूसरों ने मिलकर एक संगठन भी बनाया हुआ है...पाइरेसी करने वालों के ख़िलाफ़ वक्त वक्त पर पुलिस कार्रवाई भी करती रहती है...लेकिन इसके बावजूद देश में ये रोग बढ़ता जा रहा है...

मुझे लगता है कि डर्टी पिक्चर के  प्रोडक्शन हाउस ने  हर्गिंज़ ब्लॉग या नेट पर इसे अपलोड करने की अनुमति नहीं दी होगी...यहां तक कि यू-ट्यूब पर भी नई फिल्मों के सिर्फ गाने या ट्रेलर ही रिलीज किए जाते हैं... नई फिल्म को अपलोड करना भारतीय दंड संहिता के तहत किस अपराध की श्रेणी में आता है, इस पर दिनेशराय द्विवेदी सर या अख़्तर ख़ान अकेला भाई ही ज़्यादा प्रकाश डाल सकते हैं...

मेरा इस पोस्ट का मकसद यही है कि उत्साह में या अनजाने में ऐसा कोई काम करने से बचा जाए, जो हमारे लिए बाद में क़ानूनी तौर पर परेशानी खड़ी कर दे...


(मैंने पोस्ट में कथित पोस्ट का लिंक जान कर नहीं दिया)




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बहादुरी की हद...खुशदीप
 

What do you want to know about sex-education?
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ज़िंदगी से क्यों हार रहे हैं लोग...खुशदीप




मंगलवार और बुधवार को देश के दो शहरों में ऐसी घटनाएं हुईं, जो बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती हैं कि हमारे बड़े शहरों में लोगों पर तनाव किस कद्र हावी होता जा रहा है...चुनौतियों से जूझने की जगह किस तरह लोग ज़िंदगी से हार मान कर खुद ही मौत को गले लगा रहे हैं...

पहले सूरत की घटना

सूरत के पालनपुर जकात नाका इलाके के शिखालेख कॉम्पलेक्स में चौथी मंज़िल के अपार्टमेंट में रहने वाली 32 साल की वंदना ने पहले अपने तीन मासूमों ( मुस्कान 7, अनु्ष्का 4 और शिवांग ढाई साल) की तकियों से मुंह दबा कर जान ली और फिर खुद भी दुपट्टे से फंदा डालकर फांसी लगा ली...वंदना का पति जय प्रकाश शर्मा एक निजी शिपिंग कंपनी में टग मास्टर के पद पर तैनात है और करीब ७५ हज़ार रुपये महीना कमाता है...मूल रूप से बिहार से नाता रखने वाला जयशंकर रत्नागिरी में तैनात और करीब डेढ महीने से घर नहीं आया था...इस परिवार का आस-पास में बिल्कुल आना-जाना नहीं था...इलाके में खारे पानी की सप्लाई होने की वजह से वॉचमैन रोज़ इस घर में मिनरल वाटर की बड़ी बोतल देने जाता था...उसी ने बुधवार सुबह घर की बेल बजाई...काफी देर तक दरवाज़ा नही खुला...घर के अंदर से बदबू आने की वजह से वॉचमैन का माथ ठनका तो उसने पड़ोसियों को ये जानकारी दी...पुलिस को बुला कर दरवाज़ा खोल कर देखा गया तो अंदर का मंज़र देखकर हर कोई सन्न रह गया...पुलिस को मौके से वंदना का एक सुसाइड नोट भी मिला है, जिसमें ज़िंदगी से तंग आकर जान देने की बात कही गई है...वंदना ने ये भी लिखा है कि इस घटना के लिए कोई और नहीं, वो खुद ही ज़िम्मेदार है....पुलिस ने बड़ी मुश्किल से वंदना के पति का फोन नंबर हासिल कर उसे घटना के बारे में बताया...पति और वंदना के घरवालों के पहुंचने के बाद ही पुलिस को पता चलेगा कि उसने ये क्यों कदम उठाया...

दूसरी पुणे की घटना

पुणे के बानेर इलाके के रामकृष्ण अपार्टमेंट में रहने वालों के लिए मंगलवार की सुबह दिल दहला देने वाली घटना के साथ हुई...यहां एक फ्लैट में रहने वाले चंद्रशेखर और उसके तीन बच्चों के शव अलग अलग कमरों से फंदों से झूलते मिले... चंद्रशेखर की बड़ी बेटी धनश्री का फंदा किसी तरह खुल गया और उसकी जान बच गई..पुलिस के मुताबिक चंद्रशेखर अपनी पत्नी वर्षा और बच्चों के साथ इस फ्लैट में रहता था...वर्षा से शादी से पहले चंद्रशेखर के दो तलाक हो चुके थे...बताया गया है कि चंद्रशेखर की वर्षा के साथ भी नहीं बनती थी और आए-दिन झगड़े होते रहते थे...

ये दोनों घटनाएं आपने पढ़ी...दोनों ही घटनाओं में ये तो साफ़ लगता है कि इनके पीछे आर्थिक परेशानी नहीं थी...फिर क्यों एक मां और एक पिता ने ऐसे कदम उठाए...अपनी निराशा से खुदकुशी की बात तो समझ आती है लेकिन इन छह मासूमों का क्या कसूर था, जिन्हें उन्हें जन्म देने वालों ने ही मौत की सज़ा दे डाली...दोनों ही घटनाएं कई सवाल भी उठाती है...सूरत की घटना खास तौर पर...क्या मां ने इसलिए बच्चों की जान लेकर खुदकुशी की, क्योंकि वो पति के बिना तीन छोटे बच्चों को अकेले संभालने का तनाव झेल नहीं पा रही थी...वजह तो पुलिस की जांच के बाद ही सामने आएगी...लेकिन अगर यही आस-पड़ोस में इस महिला का आना-जाना होता तो शायद वो अपना दर्द किसी और महिला के साथ बांट सकती थी...लेकिन बड़े शहरों की यही त्रासदी होती जा रही है कि अब पड़ोसियों से मिलना-जुलना तो दूर, कोई ये भी नहीं जानता कि साथ के घर में कौन रह रहा है...बच्चे भी बाहर जाकर खेलने की जगह घरों में ही पढ़ाई के अलावा टीवी, इंटरनेट, मोबाइल पर मस्त रहते हैं...ये महानगरों के विकास का नया डरावना चेहरा है...अभी पांच दिन पहले बैंगलुरू में जाने माने डॉक्टर अमानुल्ला ने पत्नी और दो जवान बेटों के साथ ज़हर के इंजेक्शन लेकर जान दे दी थी...वजह नर्सिंग होम और बच्चों को डाक्टर बनाने के लिए लिया गया मोटा कर्ज़ बताया गया...

ये सभी मामले विदर्भ के किसानों की खुदकुशी जैसे नहीं है जो दो जून की रोटी का जुगाड़ तक न होने और कर्ज़ के बोझ की वजह से मौत को गले लगाते हैं...ये शहरों में तनाव की वजह से ज़िंदगी से हारते लोग है...ज़रूरत ज़िंदगी को जीने के मोटीवेशन की है...इसके लिए सरकार के साथ एनजीओ और स्वयंसेवकों को भी आगे आना चाहिए...जो खास तौर पर ऐसे प्रोग्राम चलाएं जिनसे सीखा जा सके कि ज़िंदगी को जिस तरह लोगे, वो वैसी ही हो जाएगी...यहां जितने संसाधन आपके पास हैं, उन्हीं से छोटी छोटी खुशियां चुरा कर भी जीने का अंदाज़ बदला जा सकता है...डिप्रेशन में देखा गया है कि इनसान पर कोई फोबिया ऐसा हावी हो जाता है कि वो उस चीज़ से डर कर उससे भागने लगता है...ज़रूरत भागने की नहीं, उसी चीज़ का हिम्मत के साथ सामना करने की है...इसके लिए दूसरे सही मार्गदर्शन और मोटिवेशन दें तो किसी को भी अवसाद से निकाला जा सकता है...

सुनिए ये मेरा मनपंसद गाना,

कैसे जीते हैं भला, हमसे सीखो ये अदा....
 
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फेल छात्रों को डॉक्टर बनाओ...खुशदीप



शीर्षक पढ़ कर आप चौंके होंगे...मैं भी चौंका इस आशय की ख़बर पढ़कर...लखनऊ की छत्रपति शाहूजी महाराज मेडिकल यूनिवर्सिटी ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) से कुछ ऐसा ही आग्रह किया है...देश की इस पहली रेसीडेंशियल मेडिकल यूनिवर्सिटी ने एमसीआई को भेजी चिट्ठी में कहा है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी-एसटी) के ऐसे मेडिकल छात्रों को ग्रेजुएशन की डिग्री दे दी जाए जो कई बार प्रयास करने के बाद भी फाइनल एग्ज़ाम्स पास नहीं कर पा रहे हैं...कुछ छात्र तो ऐसे भी हैं जो 1996 से इम्तिहान देते आ रहे हैं लेकिन कामयाबी का मुंह नहीं देख पाए हैं...इससे पहले रिजर्व्ड कैटेगरी के करीब पचास मेडिकल छात्रों ने यूनिवर्सिटी के टीचर्स पर आरोप लगाया था कि उन्हें जानबूझकर ख़राब मार्क्स दिए जाते हैं....



छत्रपति शाहूजी महाराज यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रोफेसर डी के गुप्ता ने ये चिट्ठी एमसीआई को ऐसे वक्त पर लिखी है जब कुछ ही महीनों में उत्तर प्रदेश में चुनाव होने जा रहे हैं...उत्तर प्रदेश में कुल वोटरों में  एससी-एसटी की 18 फीसदी हिस्सेदारी हैं...प्रोफेसर गुप्ता ने चिट्ठी में कहा है...क्योंकि छात्र लगातार कई बार कोशिश करने के बावजूद एग्ज़ाम्स में फेल हो रहे हैं इसलिए उन्हें डिग्री दे दी जाए...प्रो. गुप्ता ने सुझाव दिया है कि रिज़र्व्ड कैटेगरी के छात्रों के लिए अलग पासिंग परसन्टेज़ फिक्स की जानी चाहिए...इसके लिए उनका तर्क है- क्योंकि एमबीबीएस के दाखिले के इम्तिहान में भी क्वालीफाइ करने के लिए रिज़र्व्ड कैटेगरी के छात्रों के लिए कम मार्क्स निर्धारित होते हैं, इसलिए उन्हें एमबीबीएस डिग्री के एग्ज़ाम्स में भी ऐसी ही छूट दी जानी चाहिए...

यूपी के मेडिकल एजुकेशन मंत्री लालजी वर्मा ने प्रोफेसर गुप्ता की चिट्ठी देखने के बाद ही कोई प्रतिक्रिया देने की बात कही है...यूपी में कांग्रेस के प्रवक्ता राम कुमार वर्मा का कहना है कि रिज़र्व्ड कैटेगरी के छात्र क्यों बार बार फेल हो रहे हैं, इसकी समुचित जांच कराई जानी चाहिए...समाजवादी पार्टी के नेता अंबिका चौधरी का कहना है कि वंचित वर्ग के छात्रों को दाखिले के दौरान मौका मिल जाता है तो उन्हें डॉक्टर बनने के लिए खुद को कड़ी मेहनत से तैयार करना चाहिए...

क्या रिज़र्वेशन का लाभ एन्ट्रेंस में मिलने के बाद प्रोफेशनल कोर्सेज़ के एग्ज़ाम्स में भी जारी रखना चाहिए...क्या रिज़र्व्ड कैटेगरी के छात्रों को वाकई जानबूझकर बार बार फेल किया जाता है, इस विषय पर आप सब की क्या राय है....

(स्रोत...हिंदुस्तान टाइम्स)
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बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया...खुशदीप

कल की पोस्ट इस लाइन पर छोड़ी थी कि पचास के दशक के आखिर तक देव आनंद का शुमार दिलीप कुमार और राज कपूर के साथ हिंदी सिनेमा की त्रिमूर्ति के तौर पर होने लगा था...उन्हीं दिनों में देव साहब के बड़े भाई चेतन आनंद ने नवकेतन से अलग होकर अपना अलग बैनर हिमालय फिल्म्स बनाने का फैसला किया...नवकेतन में चेतन आनंद की जगह विजय आनंद ने ली...



नवकेतन की अगली फिल्म काला बाज़ार में देव साहब के साथ नंदा और वहीदा रहमान का लव ट्राएंगल था...इसके बाद विजय आनंद की स्क्रिप्ट पर बनने वाली फिल्म हम दोनों के निर्देशन की ज़िम्मेदारी अमरजीत को सौंपी गई...युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी हम दोनों में देव साहब ने नंदा और साधना के साथ डबल रोल किया...इस फिल्म के गाने...अल्लाह तेरो नाम...मैं हर फ़िक्र को धुएं में..देव साहब की तरह ही सदाबहार हैं...हम दोनों से संगीतकार जयदेव के करियर का आगाज़ हुआ...हम दोनों को बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भारत की आधिकारिक एंट्री के तौर पर भेजा गया...ये फिल्म थोड़े से ही अंतर से गोल्डन बीयर जीतने से चूक गई...देव आनंद और नवकेतन बेशक इस फिल्म से अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाने से रह गए लेकिन देव साहब को उसी दौरान नोबेल पुरस्कार विजेता पर्ल बक से मुलाकात का मौका मिला...पर्ल बक भारतीय मूल के लेखक आर के नारायण के उपन्यास द गाइड पर इंडो-अमेरिकन प्रोडक्शन के तहत फिल्म बनाना चाहती थीं...उन्हें इस काम के लिए देव साहब से बढ़िया शख्स और कौन मिल सकता था...

डील तय होने के बाद देश की कुछ बेहतरीन लोकेशन्स पर शूटिंग शुरू हुई...मैन ऑफ कमिटमेंट माने जाने वाले देव साहब ने अपने सारे रिसोर्सेज़, सारा एक्सपरटाइज़ प्रोजेक्ट में हॉलीवुड के भागीदारों को मुहैया करा दिया...देव साहब के प्रोफेशन्लिज़्म के विदेशी भी बेहद कायल हो गए...टैड डेनियलवेस्की ने द गाइड के इंग्लिश वर्ज़न और चेतन आनंद ने हिंदी वर्ज़न का निर्देशन एकसाथ शुरू किया...शूटिंग शुरू होने के कुछ दिनों बाद तय हुआ पहले इंग्लिश वर्ज़न को पूरा कर लिया जाए...उसी वक्त चेतन आनंद को पंजाब सरकार के वित्तीय अनुदान पर युद्ध आधारित फिल्म हक़ीक़त बनाने की पेशकश मिली...चेतन आनंद गाइड से अलग होकर हक़ीक़त बनाने में जुट गए...हक़ीक़त को लोगों ने खास तौर पर इसके गानों को बेहद पसंद किया...उधर द गाइड का इंटरनेशनल वर्ज़न रिलीज़ हुआ...लेकिन ये ज़्यादा कमाल नहीं कर सका...इसकी नाकामी के बावजूद देव साहब ने हिम्मत नहीं हारी...



विजय आनंद ने द गाइड की स्क्रिप्ट को नए सिरे से लिखा...फिल्म का नाम भी गाइड कर दिया गया...निर्देशन की ज़िम्मेदारी भी विजय आनंद ने ही संभाली....देव और वहीदा रहमान के अभिनय के कमाल के साथ सचिन देव बर्मन के संगीत का जादू गाइड के ज़रिए लोगों के सिर चढ़ कर बोला...आज तक गाइड को नवकेतन की सबसे प्रतिष्ठित फिल्म माना जाता है...नवकेतन की अगली फिल्म ज्वैलथीफ़ (1967, निर्देशक विजय आनंद) की शूटिंग सिक्किम की मनोरम लोकेशन्स में हुई...

ज्वैलथीफ़ की शूटिंग के दौरान ही फुर्सत के वक्त देव साहब एक मोटी सी फाइल लेकर सेना के अधिकारियों और जवानों से बातें करते देखे जाते थे...शूटिंग खत्म होने के बाद देव साहब भारत-चीन सीमा पर नाथूला पास भी होकर आए...मुंबई लौटने के बाद देव साहब ने उस बात का ऐलान किया जिसका उन्होंने बरसों से सपना संजो रखा था...यानि खुद की लिखी स्टोरी पर फिल्म निर्देशन...देव साहब के निर्देशन में बनने वाली पहली फिल्म थी- प्रेम पुजारी (1969)...वहीदा रहमान और ज़ाहिदा के लीड फीमेल रोल वाली युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में देव साहब का प्रेम का संदेश देना लोगों के गले नहीं उतरा और फिल्म बॉक्स आफिस पर नाकाम रही...

प्रेम पुजारी की नाकामी को भुला कर देव साहब ने अगली फिल्म के लिए बिल्कुल अछूते विषय को चुना...वो दौर था जब विदेश से आई हिप्पी कल्चर से पहली बार भारत रू-ब-रू हुआ था...इसी सबजेक्ट पर देव साहब ने हरे रामा,हरे कृष्णा (1972) बनाई...कहने को इस फिल्म में देव साहब और मुमताज़ की लीड जोड़ी थी...लेकिन सारी लाइमलाइट फिल्म में देव साहब की बहन बनी ज़ीनत अमान ले गई...अपनी पहली फिल्म में ही दम मारो दम गाने ने ज़ीनत को नेशनल क्रेज़ बना दिया...हरे रामा,हरे कृष्णा में आर डी बर्मन (पंचम) के संगीत को खास तौर पर लोगों ने बहुत पसंद किया...

हरे रामा, हरे कृष्णा के बाद देव साहब ने जो फिल्म बनाई, उसने उन्हें आर्थिक तौर पर बहुत बड़ा झटका दिया...हिमालय की लोकेशन्स पर शूट की गई फिल्म इश्क, इश्क, इश्क (1974) पर देव साहब ने बहुत मोटा खर्च किया...प्रोफेशनल होने के नाते देव साहब जो कंसेप्ट सोच लेते थे, फिर उस पर खर्च से किसी तरह का समझौता नहीं करते थे...लेकिन इश्क, इश्क, इश्क को दर्शकों ने बुरी तरह ठुकरा दिया...देव साहब ने फिल्म की नाकामी के बाद फाइनेंसर्स, डिस्ट्रीब्यूटर्स का भरोसा टूटने नहीं दिया...अपने निजी रिसोर्सेज़ से उनके नुकसान की भरपाई की...देव साहब ने फिर पंजाब के लोगों के विदेश जाने की ललक को विषय बना कर देस परदेस (1978) का निर्माण किया...इस फिल्म में देव साहब ने टीना मुनीम (अब श्रीमति अनिल अंबानी) को ब्रेक दिया था...देस परदेस अच्छी खासी कामयाब रही...और यही नवकेतन बैनर की आखिरी हिट फिल्म रही...बाद में उन्होंने जैकी श्राफ (स्वामी दादा) और तब्बू (हम नौजवान) जैसी प्रतिभाओं को भी हिंदी सिनेमा में इन्ट्रोड्यूज़ कराया ...अपने बेटे सुनील आनंद को भी उन्होंने आनंद और आनंद में ब्रेक दिया लेकिन वो भी बुरी तरह फ्लॉप साबित हुई...

देव साहब ने करियर के आखिरी तीन दशक में लूटमार, मनपसंद, सच्चे का बोल बाला, लश्कर, अव्वल नंबर, सौ करोड़, गैंगस्टर, रिटर्न ऑफ ज्वैलथीफ़, मैं सोलह बरस की, सेंसर, अमन के फरिश्ते, लव एट टाइम्स स्कवॉयर, मिस्टर प्राइममिनिस्टर, चार्जशीट जैसी फिल्में बनाईं लेकिन सब बुरी तरह फ्लाप साबित हुई...लेकिन देव साहब आखिरी दम तक नहीं रुके...न टायर्ड, न रिटायर्ड...बहुत कुछ इसी अंदाज़ में...

बर्बादियों का सोग मनाना फ़ज़ूल था,
बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया...

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'राजू गाइड' के फ़लसफ़े को सलाम...खुशदीप


-देव आनंद-
-26 सितंबर 1923-  4 दिसंबर 2011-

पिछली पोस्ट पर ही गाना लगाया...वहां कौन है तेरा, मुसाफ़िर जाएगा कहां...और आज ख़बर मिली देव साहब का लंदन में....... लिखने की हिम्मत नहीं हो रही कि देव साहब नहीं रहे...वो शख्स जो आखिरी दम तक काम को ही पूजा मानता रहा...कभी अपनी किसी तकलीफ़ को दुनिया के सामने नहीं आने दिया...जब भी दुनिया के सामने आया...एक स्टार की तरह ही...हर वक्त सिर्फ आने वाले कल की सोचता हुआ...बीते कल को धुंए में उड़ाता हुआ...


 एक लीडिंग स्टार ने कुछ साल पहले कहा था...

फिल्म इंडस्ट्री में सही मायने में देव साहब ही अकेले स्टार हैं...उनकी फिल्में अब आती हैं और पहले ही शो में दम तोड़ देती हैं...इसके बाद भी वो फिल्में बनाते जाते हैं...बनाते जाते हैं...हमारी एक फिल्म पिट जाए तो हमारे पैरों से ज़मीन निकल जाती है....ये सोच कर कांपने लगते हैं कि कहीं इंडस्ट्री से आउट ही न हो जाएं...और ये शख्स है कि सत्तर साल से फिल्मों को जुनून की तरह जीता आ रहा है...

ये सिलसिला शुरू हुआ...सन 1945 में बाइस साल का युवक पुणे में प्रभात स्टूडियो के पाटर्नर बाबूराव पई के दफ्तर में पहुंचा...और उसे स्टूडियो की नई फिल्म में लीडिंग रोल के लिए साइन भी कर लिया गया...ये वही प्रभात स्टूडियो है जहां अब फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) स्थित है...यही वजह है कि जब नब्बे के दशक में इंस्टीट्यूट ने अपनी सिल्वर जुबली मनाई तो देव साहब को ही चीफ़ गेस्ट के तौर पर इन्वाइट किया था...वहां जहां फिल्म से जुड़ी हर विधा की ट्रेनिंग दी जाती है, वहां देव साहब ने 1945 में बिना किसी ट्रेनिंग के शुरुआत की थी और जो कुछ भी उन्होंने हिंदी सिनेमा के लिए किया, वो खुद ही इंस्टीट्यूशन बन गया...इस दौरान कई स्टार आए और अपनी चमक दिखाकर वक्त के थपेड़ों में गुम हो गए...लेकिन सदाबहार देव चलते गए...चलते गए....इस फिक्र को छोड़ कि दुनिया उनके बारे में क्या कह रही है...नए ज़माने में उनकी फिल्मों का क्या हश्र हो रहा है...उनके कर्म किए जा की थ्योरी उन्हें हर वक्त कुछ नया करने की ऊर्जा देती रही...अपनी पुरानी हिट फिल्मों के रीमेक बनाने की बाबत उनसे एक बार सवाल पूछा गया, तो उनका जवाब था...मैं बीते कल की कभी नहीं सोचता, मेरे लिए आने वाला कल ही सब कुछ है...

सत्तर के दशक में आई फिल्म देस परदेस के बाद देव साहब की कोई फिल्म हिट नहीं हुई...नुकसान कितना भी हुआ हो देव साहब ने अपने नवकेतन फिल्म्स के बैनर को हमेशा उठाए रखा...अपने स्टाफ के लिए प्रतिबद्धताओं को निभाने में कहीं कोई चूक नहीं की...फिल्म इंडस्ट्री में न जाने कितनी हस्तियां हैं, जिनकी प्रतिभा को पहचान कर देव साहब ने ही ब्रेक दिया...ऐसा ही एक वादा देव साहब ने कभी गुरुदत्त से किया था...देव साहब के इसी वादे की वजह से फिल्म इंडस्ट्री को गुरुदत्त जैसा महान निर्देशक मिला...

देव साहब और गुरुदत्त की दोस्ती 1946 में शुरू हुई थी...प्रभात स्टूडियो के बैनर तले देव साहब ने अपनी पहली फिल्म हम एक है की शूटिंग शुरू की थी...उधर, गुरुदत्त ने प्रभात स्टूडियो की निर्देशक विश्राम बेडेकर की फिल्म लखारानी में असिस्टेंट डायरेक्टर और कोरियोग्राफर के तौर पर करियर का आगाज़ किया था...देव साहब और गुरुदत्त, प्रभात में दोनों ही नए थे, इसलिए दोनों में जमकर छनने लगी...वहीं दोनों ने वादा किया कि जो भी पहले प्रोड्यूसर बनेगा, वो दूसरे को सही मायने में ब्रेक देगा...1947 में देव साहब को प्रभात की फिल्म आगे बढ़ो में उस वक्त की लीडिंग हीरोइन खुर्शीद के साथ साइन किया गया...फिर देव 1948 में मुंबई लौटे और उस वक्त के सबसे प्रतिष्ठित माने जाने वाले बैनर बॉम्बे टाकीज की फिल्म जिद्दी साइन की....जिद्दी की कामयाबी ने देव साहब को रातों-रात स्टार बना दिया...एक नई फिल्म साइन करने के लिए उन्होंने दस हज़ार रुपए पेशगी ली और अपने बड़े भाई चेतन आनंद को वो रकम देकर 1949 में हाउस प्रोडक्शन नव केतन की शुरूआत की...

1950 में नव केतन की पहली फिल्म अफसर के लिए रूसी सैटायर 'इंस्पेक्टर जनरल' को चुना गया...चेतन आनंद ने अपनी पत्नी उमा के साथ फिल्म की स्क्रिप्ट भी लिखी और फिल्म को डायरेक्ट भी किया...फिल्म में देव साहब के साथ नायिका के तौर पर उस वक्त की सुपरस्टार सुरैया को चुना गया...उसी वक्त देव साहब और सुरैया का प्यार भी परवान चढ़ा...अफसर से ही संगीतकार सचिन देव बर्मन ने हिंदी सिनेमा में अपने करियर की शुरुआत की थी...देव साहब और सचिन देव बर्मन का फिर लंबे समय तक साथ रहा...


1951 में देव आनंद (मध्य) और गुरुदत्त (दाएं)

अब तक देव साहब पूरी तरह इस्टैब्लिश्ड हो गए थे तो उन्हें गुरुदत्त से किए अपने वादे की याद आई...1951 तक गुरुदत्त असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर ही काम करते हुए अच्छे ब्रेक का इंतज़ार कर रहे थे...देव साहब ने तब  नवकेतन की अगली फिल्म बाज़ी के निर्देशन के लिए गुरुदत्त को न्योता दिया...इस क्राइम थ्रिलर की स्क्रिप्ट बलराज साहनी ने लिखी थी...इसी फिल्म से गीत लिखने के लिए मशहूर शायर साहिर लुधियानवी संगीतकार सचिन देव बर्मन से जुड़े...इसी फिल्म के दौरान गुरुदत्त की पहली बार मुलाकात पार्श्वगायिका गीता रॉय से हुई जो आगे चलकर उनकी पत्नी बनकर गीता दत्त हो गईं...संयोग से देव साहब की इसी फिल्म के दौरान अपनी भावी पत्नी मोना सिंह (कल्पना कार्तिक) से पहली बार मुलाकात हुई थी जो इस फिल्म की दो नायिकाओं में से एक थीं...कॉमेडियन जॉनी वाकर और असिस्टेंट डायरेक्टर राज खोसला ने भी इसी फिल्म से करियर की शुरुआत की...बाज़ी की जबरदस्त कामयाबी ने नवकेतन को अच्छी तरह इस्टेब्लिश करने के साथ फिल्म से जुड़े सभी नए नामों को भी स्टार बना दिया...इस फिल्म के बाद गुरुदत्त ने अपना प्रोडक्शन हाउस शुरू किया लेकिन देव साहब से उनकी दोस्ती पहले की तरह ही बरकरार रही...

नवकेतन ने अपनी अगली फिल्म आंधियां के संगीत के लिए शास्त्रीय संगीत के बहुत बड़े नाम उस्ताद अकबर अली खां को साइन किया...देव, निम्मी और कल्पना कार्तिक के प्रेम त्रिकोण पर बनी इस फिल्म को कैमरामैन जाल मिस्त्री ने बड़ी खूबसूरती के साथ स्क्रीन पर उकेरा था...लेकिन आंधियां और नवकेतन की अगली फिल्म हमसफ़र बॉक्स आफिस पर कुछ कमाल नहीं कर सकीं...उस वक्त देव आनंद के छोटे भाई गोल्डी (विजय आनंद) सेंट ज़वियर्स कालेज मे पढ़ाई कर रहे थे...सांस्कृतिक गतिविधियों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने वाले विजय आनंद ने नए आइडियों के साथ नवकेतन की अगली फिल्म टैक्सी ड्राइवर की स्क्रिप्ट लिखने में योगदान दिया...देव, कल्पना कार्तिक, शीला रमानी और जॉनी वाकर की अभिनीत ये फिल्म सुपरहिट साबित हुई...इसका एक गाना जाएं तो जाएं कहां,  आज तक लोगों की ज़ुबान पर चढ़ा है...इसी फिल्म की शूटिंग के दौरान देव साहब की कल्पना कार्तिक से शादी हुई...इसके बाद नवकेतन ने हाउस नंबर 44 और फंटूश का निर्माण किया...तब तक विजय आनंद ग्रेजुएट हो गए थे...विजय आनंद ने एक दिन बड़े भाई से कहा कि उनके पास स्क्रिप्ट तैयार है, लेकिन उसके निर्देशन की ज़िम्मेदारी उन्हें ही सौंपी जाए...मुंबई से महाबलेश्वर जाते हुए विजय आनंद ने देव साहब को स्क्रिप्ट सुनाई...महाबलेश्वर में फ्रैड्रिक्स होटल देव साहब का छुट्टियों का प्रिय ठिकाना हुआ करता था...होटल पहुंचते ही देव साहब ने मुंबई नवकेतन के दफ्तर में फोन कर कहा कि अगली फिल्म की शूटिंग के लिए तैयारी की जाए..

फ्रैंक केपरा की रचना इट्स हैप्पन्ड वन नाइट से प्रेरित ये रोमांटिक स्टोरी थी नौ दो ग्यारह...1957 में रिलीज़ इस फिल्म की शूटिंग मुंबई से दिल्ली तक फिल्म की यूनिट ने सड़क के रास्ते ड्राइव करते हुए पूरी की...कल्पना कार्तिक की ये आखिरी फिल्म थी...तब तक गुरुदत्त के असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर शुरुआत करने वाले राज खोसला भी निर्देशक बन गए थे...राज खोसला ने उन्हीं दिनों गुरुदत्त की प्रोड्यूस की फिल्म सीआईडी का निर्देशन किया था...इस फिल्म में देव आनंद की हीरोइन वहीदा रहमान (गुरुदत्त की खोज़) थीं...राज खोसला की प्रतिभा को देखकर ही देव साहब ने नवकेतन की अगली फिल्म काला पानी के निर्देशन की ज़िम्मेदारी उन्हें सौंपी...काला पानी में देव साहब के साथ मधुबाला और नलिनी जयवंत ने अभिनय किया...काला पानी में अभिनय के लिए ही देव आनंद को पहला फिल्मफेयर अवार्ड मिला...इसी दौर में देव आनंद का शुमार दिलीप कुमार और राज कपूर जैसे बड़े नामों के साथ हिंदी सिनेमा की त्रिमूर्ति के तौर पर होने लगा था...

(....जारी है देव आनंद का गोल्डन सफ़रनामा)


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बैंगलुरू देश का 'सुसाइड कैपिटल'...खुशदीप

आईटी सिटी बैंगलुरू...नई नवेली नम्मा मेट्रो का शहर बैंगलुरू...और अब देश की सुसाइड कैपिटल के तौर पर पहचान बनाता बैंगलुरू...बात हैरान करने वाली है लेकिन है सच...शुक्रवार को ही शहर के चामराजपेट इलाके के वाल्मिकिनगर में रहने वाले डॉक्टर अमानुल्ला (60) ने दो जवान बेटों (नवाज़ 28, निज़ाम 26) और पत्नी नवीदा बानो (50) के साथ ड्रग्स के इंजेक्शन लेकर खुदकुशी कर ली...बड़ा बेटा नवाज भी डॉक्टर था और छोटा बेटा निज़ाम कोलार के देवराज अर्स मेडिकल कालेज से एमबीबीएस कर रहा था...करीबियों के मुताबिक ये परिवार मोटे कर्ज़ से परेशान था...


खुदा केयर नर्सिंग होम के ज़रिए मरीज़ों को ज़िंदगी के नए मायने देने वाला ये परिवार खुद ही ज़िंदगी की जंग हार गया...बताया यही जा रहा है कि डॉ अमानुल्ला ने नर्सिंग होम और दोनों बेटों को पढ़ाने के लिए बैंकों और दूसरे वित्तीय संस्थानों से लाखों का कर्ज लिया हुआ था...उसी को न चुका पाने की वजह से अवसाद ने उन्हें जकड़ लिया था...पुलिस कर्ज़ के एंगल के साथ दूसरे पहलुओं पर भी तफ्तीश कर रही है कि परिवार किसी और दबाव से तो परेशान नहीं था...मौके से कोई सुसाइड नोट न मिलने की वजह से पुलिस का काम और मुश्किल हो गया है....

खैर ये तो रही सिर्फ इस परिवार की खुदकुशी की बात...नवंबर के आखिरी हफ्ते में ही बैंगलुरू में 30 लोगों ने अलग-अलग वजहों से खुद ही मौत को गले लगाया...नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ें बताते हैं कि इस साल जनवरी से अक्टूबर तक बैंगलुरू में 1407 लोगों ने खुदकुशी की...इनमें 535 महिलाएं और 872 पुरुष थे...बैंगलुरू में हर साल ये आंकड़ा तकरीबन पांच फीसदी की रफ्तार से बढ़ रहा है...देश के सारे महानगरों में सबसे ज़्यादा खुदकुशी बैंगलुरू में ही होती हैं...

अगर देश की बात की जाए तो हर साल एक लाख से ज़्यादा लोग यहां खुदकुशी करते हैं...इनमें से 43 फीसदी खुदकुशी देश के महानगरों में ही होती हैं...अगर क्षेत्रीय हिसाब से बात की जाए तो दक्षिणी राज्यों में ही आत्महत्याओं के सबसे ज़्यादा मामले सामने आते हैं...खुदकुशी के लिए सबसे बड़ी वजह पारिवारिक झगड़े हैं...

आंकड़े इसलिए भी चौंकाने वाले हैं क्योंकि ये माल कल्चर से चमकते-दमकते महानगरीय जीवन से जुड़े हैं...यहां विदर्भ में खुदकुशी करने वाले किसानों की बात नहीं हो रही...उन किसानों के लिए तो यही सबसे बड़ी कशमकश होती है कि किस तरह ज़िंदगी को बचाने लायक दो जून की रोटी का इंतज़ाम होता रहे...लेकिन महानगरों में मुफलिसी की वजह से मरने वाले तो इक्का-दुक्का ही होते होंगे...फिर क्या वजह है, इस तरह ज़िंदगी से हारने की...क्यों लोग छोटी-छोटी खुशियों को जीने की जगह इतनी बड़ी हसरतें पाल लेते हैं कि ज़िंदगी ही दांव पर लग जाए...ज़रूरी काम के लिए कर्ज़ वहीं तक लेना सही है, जहां तक आप उसे चुकाने की कुव्वत रखते हों...ऐशो-आराम और दूसरों की देखा-देखी अपना ऊंचा स्टेटस दिखाने के लिए कर्ज़ के आसरे विलासिता की चीज़ें इकट्ठा करना पैरों पर कु्ल्हाड़ी मारने जैसा ही है...बच्चे पढ़ाई में फिसड्डी हैं तो भी उन्हें मोटी कैपिटेशन फीस देकर डॉक्टर-इंजीनियर-एमबीए बनाने की सनक एक तरह से खुद को धोखा देना ही है...योग्यता न होने के बावजूद कई साल लगाकर ऐसे बच्चे प्रोफेशनल बन भी गए तो किसका भला होने वाला है...

मल्टीटास्किंग के इस युग में महानगरों में हर कोई दौड़ रहा है...काहे के लिए भइया इतनी मारामारी...ज़िंदगी है तो सब है...जो मिल रहा है, उसी से संतोष क्यों नहीं...क्यों उधार की ज़िंदगी में ही हम खुशियां ढ़ूंढना चाहते हैं...अपने आस पास एक बार नज़र डाल कर तो देखिए...बच्चों की खिलखिलाहट पर....सब कुछ भूलकर उनके साथ बच्चा बनिए...पास के पार्क में जाकर कांटों के बीच भी फूलों से खिलना सीखते हुए घास पर नंगे पैर चलकर देखिए...टेंशन को दिमाग में स्टोर करने की जगह हवा में उड़ाइए...दौड़ने के साथ फुर्सत की दो घड़ी निकाल कर  दम लेना भी सीखिए...सचिन दा के इस गीत की तरह....




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बच सकती थी दो नौनिहालों की जान...खुशदीप



कल दिल्ली से सटे गाज़ियाबाद में एक ऐसी घटना घटी जिसने अंदर तक हिला कर रख दिया...साथ ही बहुत कुछ सोचने को भी मजबूर कर दिया...जब पूरे भारत में विदेशी दुकानों को एंट्री के सवाल पर बवाल मचा हुआ था, उस वक्त इन मुद्दों से पूरी तरह बेखबर देश के दो नौनिहाल कानों पर हेडफोन लगाकर मोबाइल से गाने सुनने में इतने मशगूल थे कि और किसी चीज़ की होश ही नहीं रही..



दोनों स्कूल से बंक मार कर रेलवे ट्रैक के किनारे इसी रूटीन को पिछले तीन दिन से दोहरा रहे थे...लोगों ने चेताया भी लेकिन वो नहीं माने...कानों पर हेडफोन पर फुल वोल्यूम में गाने बज रहे हों तो किसी की आवाज़ सुनाई ही कहां देती है...दोनों को पीछे से तूफ़ानी रफ्तार से आ रही देहरादून जनशताब्दी ट्रेन का भी आभास नहीं हुआ...जब तक लोग कुछ करने के लिए दौड़ते, तब तक बहुत देर हो चुकी थी...ट्रेन के गुज़रने के बाद वहां जो मंज़र था, वो किसी के भी कलेजे को दहलाने के लिए काफ़ी था...स्कूल यूनिफ़ार्म में दो क्षत-विक्षत शव...बस्ते से बिखरी किताबें...जूते...पहचान बताते दो स्कूल आई कार्ड...गाज़ियाबाद के देहरादून पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाले दोनों छात्र...बारहवीं का रोहित और नौवीं का कुलदीप...

दो घरों के चिराग बुझने से जहां उनके परिवार बेहाल हैं, वहीं हैरान भी हैं कि उनके ला़डले रोज़ सुबह घर से तैयार होकर स्कूल के लिए निकलते थे, वो रेलवे ट्रैक के पास कैसे पहुंच गए...यही सवाल स्कूल की प्रिंसिपल से पूछा गया तो उनका कहना था कि दोनों बच्चे पिछले तीन दिन से स्कूल नहीं आ रहे थे...दोनों ने स्कूल में जो फोन नंबर दे रखे थे वो भी गलत थे...हादसे के बाद बड़ी मुश्किल से स्कूल ने दोनों बच्चों के घरों के फोन नंबर पता कराके सूचना दी...इस घटना से कई सवाल उठते हैं जिन पर हर व्यक्ति, माता-पिता और स्कूल प्रबंधनों का सोचना बहुत ज़रूरी है...

क्या स्कूल पढ़ने वाले बच्चों के लिए मोबाइल ज़रूरी है...

सड़क पर हेडफोन के ज़रिए मोबाइल से बातें करना या गाने सुनना कितना महफूज़ है...

क्या बच्चों को स्कूल भेजने के बाद अभिभावकों की ज़िम्मेदारी खत्म हो जाती है...

अगर कोई बच्चा स्कूल नहीं आता तो क्या स्कूल प्रबंधन या क्लास टीचर की ये ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि वो उसके घर इस बात की सूचना दे...इसके लिए एक बड़ा अच्छा रास्ता कुछ बड़े कोचिंग इंस्टीट्यूट अपनाते हैं...वहां अगर कोई बच्चा क्लास मिस करता है तो उसकी सूचना एसएमएस के ज़रिए पेरेन्ट्स को दे दी जाती है...इससे पेरेन्ट्स भी अलर्ट हो जाते हैं...मुझे लगता है ऐसा सिस्टम डवलप करने में स्कूलों को भी कोई परेशानी नहीं आनी चाहिए...

बच्चों पर भरोसा करना अच्छी बात है, लेकिन ये भी अभिभावकों का फर्ज़ है कि पेरेन्ट्स टीचर मीटिंग (पीटीएम) में रेगुलर जाकर बच्चों की प्रोग्रेस या दिक्कतों के बारे में टीचर्स से संवाद कायम करते रहें...

अगर इन सब बातों पर ध्यान दिया होता तो गाज़ियाबाद में दो नौनिहालों की जान शायद इस तरह न जाती...

भगवान दोनों बच्चों की आत्मा को शांति दे और उनके घरवालों को ये असीम दुख सहने की शक्ति दे...
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