मंगलवार, 29 नवंबर 2011

अहिंसा बनाम हिंसा की बहस...खुशदीप





बीता कल यानि इतिहास....

सम्राट अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 8वें वर्ष  में कलिंग पर आक्रमण किया था...तेरहवें शिलालेख के अनुसार कलिंग युद्ध में एक लाख पचास हजार व्यक्‍ति बन्दी बनाकर निर्वासित कर दिए गए, एक लाख लोगों की हत्या कर दी गई...सम्राट अशोक ने भारी नरसंहार को अपनी आँखों से देखा...कलिंग युद्ध ने अशोक के हृदय में महान परिवर्तन कर दिया...उसका हृदय मानवता के प्रति दया और करुणा से उद्वेलित हो गया...उसने युद्ध क्रियाओं को सदा के लिए बन्द कर देने की प्रतिज्ञा की...यहाँ से आध्यात्मिक और धम्म विजय का युग शुरू हुआ...उसने बौद्ध धर्म को अपना धर्म स्वीकार किया...

आज यानि वर्तमान...

चार दिन पहले यमन के तानाशाह राष्ट्रपति अली अब्दु्ल्लाह सालेह 32 साल के शासन के बाद अहिंसक आंदोलनकारियों की मांग के आगे झुकते हुए सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण को तैयार हो गए हैं...

पिछले साल के आखिर में मध्यपूर्वी देश ट्यूनीशिया में तानाशाही सत्ता के खिलाफ शुरू हुए अहिंसक जनविद्रोह (जास्मिन क्रांति) ने जिन अल अबिदीन बेन अली के तेइस साल के शासन को उखाड़ फेंका...

जास्मिन क्रांति की इसी लहर ने मिस्र, जार्डन, अल्जीरिया, यमन जैसे देशों में सत्ता परिवर्तन का रास्ता तैयार किया...ये सारे वो देश है जहां हुक्मरान बरसों से सत्ता पर कुंडली मारे बैठे थे...यह आंदोलन रक्तहीन क्रांति का पर्याय माना जा रहा है...मिस्र में तहरीर चौक पर शांति से बैठे आंदोलनकारियों पर होस्नी मुबारक के अपनाए सारे दमनकारी तरीके बेकार साबित हुए...होस्नी को सत्ता छोड़नी पड़ी...अब मिस्र के सैनिक हुक्मरान लोकतांत्रिक सरकार लाने में आनाकानी करने लगे तो आंदोलनकारी फिर तहरीर चौक पर जुट गए...अब ये सैनिक शासक जल्द ही अंतरिम सरकार लाने और जुलाई तक लोकतांत्रिक सरकार के गठन की बात कर रहे हैं..

अहिंसा बनाम हिंसा की बहस में मेरा ये प्रिय गीत भी सुन लीजिए...


 
जब ज़ीरो दिया मेरे भारत ने, दुनिया को तब गिनती आई,
तारों की भाषा भारत ने, दुनिया को पहले सिखलाई,


देता न दशमलव भारत तो, यूं चांद पे जाना मुश्किल था,
धरती और चांद की दूरी का, अंदाज़ लगाना मुश्किल था,


सभ्यता जहां पहले आई, पहले जनमी है जहां पे कला,
अपना भारत वो भारत है, जिसके पीछे संसार चला,


संसार चला और आगे बढ़ा, ज्यूं आगे बढ़ा, बढ़ता ही गया,
भगवान करे ये और बढ़े, बढ़ता ही रहे और फूले-फले...


है प्रीत जहां की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूं,
भारत का रहने वाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं,


काले-गोरे का भेद नहीं, हर दिल से हमारा नाता है,
कुछ और न आता हो हमको, हमें प्यार निभाना आता है,


जिसे मान चुकी सारी दुनिया, मैं बात वही दोहराता हूं,
भारत का रहने वाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं,


जीते हों किसी ने देश तो क्या, हमने तो दिलों को जीता है,
जहां राम अभी तक है नर में, नारी में अभी तक सीता है,


इतने पावन हैं लोग जहां, मैं नित-नित शीश झुकाता हूं,
भारत का रहने वाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं,


इतनी ममता नदियों को भी, जहां माता कहके बुलाते हैं,
इतना आदर इन्सान तो क्या, पत्थर भी पूजे जातें हैं,


उस धरती पे मैंने जन्म लिया, ये सोच के मैं इतराता हूं,
भारत का रहने वाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं...


रविवार, 27 नवंबर 2011

वाय दिस कोलावरी, कोलावरी, कोलावरी डी....खुशदीप






आप कहेंगे ये कोलावरी क्या बला है...तमिलनाडु से निकला ये गाना दस दिन में ही इंटरनेट पर नेशनल क्रेज़ बन गया है...कुछ बताने से पहले इस का मतलब बता दूं...कोलावरी यानि ख़ूनी गुस्सा...वाय दिस कोलावारी, कोलावरी, कोलावरी डी का पूरा सेंस होता है...आप मुझे क्यों मारे डाल रहे हो...वैसे तो फिल्म में ये सवाल प्रेम में ठुकरा दिए जाने के बाद लड़का लड़की से पूछ रहा है...लेकिन ये सवाल आज देश में हर जगह सटीक बैठ रहा है...देखा जाए तो हर कोई ये सवाल कर रहा है...

जनता सरकार से सवाल कर रही है....वाय दिस कोलावरी, कोलावरी, कोलावरी डी...आप क्यों हमें मारे डाल रहे हो...

थप्पड़ खाने वाले नेता भी सवाल कर रहे हैं...वाय दिस कोलावरी, कोलावरी, कोलावरी डी...

कहीं न कहीं आप भी ये सवाल किसी न किसी से ज़रूर पूछ रहे होंगे...

पोस्ट के आखिर में आपको ये गाना सुनाऊंगा...सिर्फ एक बार गाना सुनने के बाद ही आप भी कोलावरी, कोलावरी न करने लग जाएं तो मुझे कहिएगा...



अब इस गाने के बारे में कुछ बता दूं...इसे एक हफ्ता पहले ही राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेता धनुष (असली नाम वेंकटेश प्रभु कस्तूरी राजा) ने रिकॉर्ड कराया है...28 साल के धनुष की एक और पहचान भी है...इनका विवाह वन एंड ओनली रजनीकांत की बेटी ऐश्वर्या से हुआ है...इस गाने को शीघ्र रिलीज होने वाली फिल्म '3' के लिए फिल्माया गया है...फिल्म मे धनुष के साथ श्रुति हसन (कमलहासन-सारिका की बेटी) की जोड़ी है...धनुष का खुद का कहना है कि इस गाने का कोई मीनिंग नहीं है...ये बस मैंने अपनी टूटी-फूटी इंग्लिश में गाया है...वो इंग्लिश जिसे हिंग्लिश की तरह तमिलनाडु में टैंग्लिश कहते हैं...वहां हर कोई इसका इस्तेमाल करता है...इसलिए इस गाने को सुनते ही सबने इसे हॉट केक की तरह लिया...16 नवंबर को सोनी म्यूज़िक ने गाने को रिकॉर्ड कराते हुए धनुष का वीडियो यू-ट्यूब पर जारी किया...दस दिन में ही दस लाख से ज़्यादा लोग इसे यू-ट्यूब पर देख चुके हैं...वीडियो में धनुष गा रहे हैं..संगीतकार अनिरुद्ध रविचंदर कीबोर्ड पर हैं...रात दो बजे स्टूडियो में गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान धनुष की निर्देशक-पत्नी ऐश्वर्या और नायिका श्रुति हसन भी नज़र आ रहे हैं...चलिए बहुत जानकारी दे दी...

ये रहा गाना और उसका वीडियो...



yo boys i am singing song


soup song


flop song


why this kolaveri kolaveri kolaveri di


why this kolaveri kolaveri kolaveri di


rhythm correct


why this kolaveri kolaveri kolaveri di


maintain this


why this kolaveri..di


distance la moon-moon-


moon-color-white-


white background night-nigth


night-color-black-


why this kolaveri kolaveri kolaveri di


why this kolaveri kolaveri kolaveri di


white skin-girl-girl-


girl-heart-black-


eyes-eyes-meet-meet-


my future dark


why this kolaveri kolaveri kolaveri di


why this kolaveri kolaveri kolaveri di


maama notes eduthuko


apdiye kaila sax eduthuko


pa pa paan pa pa paan pa pa paa pa pa paan


sariya vaasi


super maama ready


ready 1 2 3 4


whaa wat a change over maama


ok maama now tune change-


kaila glass


only english..


hand la glass


glass la scotch


eyes-full-aa tear-


empty life-


girl-come-


life reverse gear-


lovv lovv


oh my lovv


you showed me bouv-


cow- cow- holi cow-


i want u hear now-


god i m dying now-


she is happy how-


this song for soup boys-


we dont have choice-


why this kolaveri kolaveri kolaveri di


why this kolaveri kolaveri kolaveri di


why this kolaveri kolaveri kolaveri di


why this kolaveri kolaveri kolaveri di


flop song


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"Soup Song" - Love failure Song

"Soup Boys" - Boys who failed in love





शनिवार, 26 नवंबर 2011

हिंसा से 'हीरो' बनना कितना आसान...खुशदीप





ज़माना वाकई बदल गया है...जेट एज है...पब्लिक में 'हीरो' बनना भी इंस्टेंट कॉफी की तरह हो गया है...अब बैलगाड़ी का युग थोड़े ही है कि लोगों के दिलों पर छाप छोड़ने के लिए बरसों तक निस्वार्थ भाव से समाजसेवा की जाए...आज के दौर में चर्चित होना है या 'हीरो' बनना है तो रास्ता बहुत आसान है...किसी टारगेट को चुनिए...टारगेट कोई भी ऐसा शख्स हो सकता है जिसके नाम को देश भर में या कम से कम प्रदेश भर में ज़रूर हर कोई जानता हो...अगर वो शख्स नेता है तो काम और भी आसान हो जाता है...हीरो बनने के लिए बस अपने टारगेट के नज़दीक से नज़दीक पहुंचने का जुगाड़ लगाना होता है...

नेता आए दिन समारोह, रैली, उदघाटन आदि में शिरकत करते ही रहते हैं...इसलिए उनके करीब पहुंचने के लिए कोई रॉकेट साइंस नहीं लगानी पड़ती...इस काम के लिए सबसे कारगर तरीका पत्रकार का वेश धारण करना है...श्रोता या पत्रकारों के जमघट का हिस्सा बनकर टारगेट के नज़दीक से नज़दीक पहुंचने का इंतज़ार किया जाता है...जब बिल्कुल आमना सामना हो जाए तो टारगेट की थप्पड़, लात-घूंसों से खातिर कर दी जाती है...थोड़ा फासला अगर टारगेट से बना रहे तो पैरों में पहने जूते-चप्पल किस काम आते हैं...बस उन्हें टारगेट को दे मारने या उसकी तरफ़ बस उछालने की ही ज़रूरत होती है...इस कारनामे को करने वाले शख्स का नाम मिनटों में ही पूरा देश जानने लगता है...अब ज़रा ऐसी ही 'बहादुरी' दिखाने वाले 'सूरमाओं' के नामों पर गौर कीजिए...

7 अप्रैल 2009
दिल्ली
गृह मंत्री चिदंबरम पर पत्रकार जरनैल सिंह ने जूता उछाला...चिदंबरम 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े सवाल पर बोल रहे थे...चिदंबरम का जवाब जरनैल को संतुष्ट नहीं कर सका...नतीजा प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही चिदंबरम पर जूता उछाल दिया...इस घटना के टीवी चैनलों के स्क्रीन पर फ्लैश होते ही जरनैल का नाम पूरा देश जानने लगा...उस वक्त तक जरनैल का नाता नंबर एक का दावा करने वाले अखबार दैनिक जागरण से था...


17 अप्रैल 2009
कटनी, मध्य प्रदेश

चुनावी रैली के दौरान बीजेपी के पूर्व कार्यकर्ता पावस अग्रवाल ने लालकृष्ण आडवाणी के ऊपर चप्पल उछाली...ये जनाब इस बात के लिए नाराज़ थे कि पाकिस्तान में जिन्ना के मज़ार पर जाकर आडवाणी ने उन्हें क्यों सेकुलर बताया...


6 जून 2011
दिल्ली
कांग्रेस मुख्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता जर्नादन द्विवेदी पर सुनील कुमार ने जूता उछाला...खुद को जयपुर की नवसंचार पत्रिका का पत्रकार बनाने वाले सुनील कुमार ने रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई से नाराज होकर ये कदम उठाया...


12 अक्टूबर 2011
दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट में टीम अन्ना के सदस्य और वकील प्रशांत भूषण अपने चैम्बर में बैठे एक न्यूज चैनल को इंटरव्यू दे रहे थे...तभी इंदर वर्मा नाम के एक शख्स ने थप्पड़, गुस्से, लातों से प्रशांत भूषण पर हमला बोल दिया...इस हमले के दौरान खुद को भगत सिंह क्रांति सेना से जुड़े बताने वाले तेजिंदर पाल सिंह बग्गा और विष्णु गुप्ता चैम्बर के बाहर खड़े रहे...हमले की वजह प्रशांत भूषण के वाराणसी में कश्मीर पर जनमत-संग्रह की वकालत करना बताया गया....


20 अक्टूबर 2011
लखनऊ
टीम अन्ना के संयोजक अरविंद केजरीवाल पर कांग्रेस सेवा दल के पूर्व सदस्य जितेंद्र पाठक ने लखनऊ में चप्पल उछाली...जितेंद्र का कहना था कि अरविंद भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश को गुमराह कर रहे हैं...


19 नवंबर 2011
24 नवंबर 2011
दिल्ली

सबसे ताजा मामला हरविंदर सिंह का है...हरविंदर ने पांच दिन के अंतराल में ही पहले पूर्व संचार मंत्री सुखराम की कोर्ट परिसर में ही धुनाई की और फिर कृषि मंत्री शरद पवार को थप्पड़ जड़ा...हरविंदर ने धमकी भी दी कि वो नेताओं पर ऐसे ही हमले करेगा...हरविंदर के मुताबिक भ्रष्टाचार और महंगाई की जड़ ये नेता ही हैं...हरविंदर ने जब पवार को थप्पड़ जड़ा तो वो पत्रकारों के साथ ही खड़ा था...

इन मामलों में एक-दो को छोड़ कर बाकी सब में हमला करने वाले या तो खुद पत्रकार थे या फिर पत्रकारों की आड़ लेकर खड़े थे...ऐसे में अब पत्रकारों के पास जाने से भी नेता कतराने लगे तो कोई बड़ी बात नहीं...या ये भी हो सकता है उन्हें जूते उतरवा कर ही प्रेस कॉन्फ्रेंस में जाने दिया जाए...बड़े अखबार या न्यूज चैनलों की बीट वाले पत्रकारों को तो नेता जानते हैं, परेशानी नए या छोटे मीडिया संस्थानों से जुड़े पत्रकारों को होगी...

इन मामलों में जो हमले का शिकार बने, उन्होंने राजनीति के तकाजे के चलते अपना बड़ा दिल दिखाने के लिए हमलावरों को माफ कर दिया...हमला करने वाले पकड़े भी गए तो चंद दिनों में छोड़ दिए गए...कुछ पर केस भी दर्ज नहीं हुआ, कुछ ज़मानत पर रिहा हो गए...शरद पवार पर हमला करने वाला हरविंदर के साथ भी ऐसा हो तो कोई बड़ी बात नहीं...ये आसान सा कष्ट और पूरे देश में नाम होने की उपलब्धि, यही अब ज़्यादा से ज़्यादा सूरमाओं को ऐसी हरकतें करने के लिए प्रेरित कर रहा है...अगर किसी मामले में सख्त सज़ा मिल जाए और मीडिया ऐसी घटनाओं को हाईलाइट करना बंद कर दे, तो इस तरह क़ानून हाथ में लेना खुद-ब-खुद बंद हो जाएगा...

खैर ये तो रही बात मीडिया की...न्यू मीडिया (फेसबुक, गूगल प्लस, ट्विटर, ब्लॉग) पर भी ऐसी घटनाओं का महिमामंडन करने वालों की कमी नहीं रही...तर्क दिए गए कि जनता महंगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त है. किसान खुदकुशी कर रहे हैं तो नेताओं को सबक सिखाने का यही सबसे कारगर तरीका है...कुछ ज़िम्मेदार समझे जाने वाली हस्तियों के... बस एक ही मारा...महंगाई न थमी तो हिंसक आंदोलन भड़क जाएंगे...जैसे बयानों ने और आग़ में तेल डालने का काम किया...

नेताओं के चलते जिस लोकतंत्र को हम फेल मानने लगे हैं, ये उसी लोकतंत्र का कमाल है कि हम जो चाहे, जिसे चाहे, जो मर्जी कह सकते हैं...जनरल परसेप्शन के चलते किसी को भी चोर ठहराने में हम एक मिनट की भी देर नहीं लगाते...लेकिन सिर्फ मुंह हिलाने से या लंबी चौड़ी बाते लिखने से तो कोई चोर साबित नहीं किया सकता...इसके लिए पुख्ता सबूतों की भी ज़रूरतों होती है...क्या होते हैं हमारे पास ये सबूत...अमेरिका या यूरोप में भ्रष्टों के लिए कड़ी सज़ा है तो ऐसे लोगों के लिए भी सख्त सज़ा के प्रावधान हैं जो दूसरों पर आरोप लगाने के बाद उन्हें सिद्ध नहीं कर पाते...

लोकतंत्र में नाकारा और भ्रष्ट नेताओं को सबक सिखाने के लिए आज भी सबसे अच्छा इलाज चुनाव ही है...जनता सच्चे मन से जिसे हराने या जिताने की ठान ले तो उसे ऐसा करने से कोई नहीं रोक सकता...न धनबल और न ही बाहुबल...इसलिए अगर नेताओं के मन में डर बैठाना है तो सबसे ज़रूरी है चुनाव सुधारों पर ज़ोर दिया जाए...ऐसा दबाव बनाया जाए कि सियासी पार्टियां भ्रष्ट या दाग़ी लोगों को टिकट देने से पहले सौ बार सोचे...इसके अलावा शिवाजी या भगत सिंह का नाम लेकर जो हिंसा को जायज़ ठहराने का तर्क देते हैं वो सुनी-सुनाई बातें छोड़कर इन महान हस्तियों के दर्शन को पहले अच्छी तरह आत्मसात करें...अहिंसा का हथियार ही बड़े बड़े तानाशाहों को घुटने के बल झुकाने में कामयाब रहा है...इस अहिंसा के मिशन को पलीता लगाने के लिए कहीं से भी छूटी हिंसा की छोटी सी चिंगारी काफ़ी होती है...

उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के चुनाव सिर पर हैं...जिन से आप नाराज़ हैं, उन्हें इन चुनावों में जमकर सबक सिखाइए...किसने रोका है आपको...देर-सबेर लोकसभा चुनाव भी होंगे..वहां भी देश के गुनहगारों को उनके किए की सज़ा दीजिए...लेकिन प्रार्थना यही है कि विवेक का साथ मत छोडि़ए...हिंसा किसी भी स्वरूप में हो, उसका समर्थन नहीं किया जाना चाहिए...बल्कि उसकी पूरी शक्ति के साथ प्रताड़ना की जानी चाहिए...वरना अगर क़ानून सबने खुद ही हाथ में लेने का रास्ता अपना लिया तो फिर देश के बनाना स्टेट बनने में देर नहीं लगेगी...

अगर बुराइयों या अपराधों के लिए खुद ही लोगों को सबक सिखाना है तो फिर तो हर गांव, गली, कस्बों में कंगारू कोर्ट बना देनी चाहिए, देश में अदालतों या न्यायिक व्यवस्था की ज़रूरत ही क्या है...क्यों इस पर इतना पैसा खर्च किया जा रहा है...

पॉपुलेरिज्म के लिए बयान देना अलग बात है, लेकिन देश के लिए हमारे महापुरुषों के सुझाए अहिंसा, संयम, तप, विवेक, सहनशीलता, शांति, धीरज के वही सिद्धांत कारगर साबित होंगे, जिनका सदियों से दूसरे देश लोहा मानते रहे हैं...मेरा यही निवेदन है, बाक़ी इस स्वतंत्र देश में हर शख्स अपनी स्वतंत्र सोच रखने के लिए स्वतंत्र है...

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

अरबों के जिन्ना हाउस का मालिक कौन...खुशदीप







पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के मुंबई में आवास रहे जिन्ना हाउस पर मालिकाना हक किसका है, ये तय करने के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट में 12 दिसंबर से सुनवाई शुरू हो सकती है...जिन्ना की इकलौती संतान उनकी बेटी डीना वा़डिया ने 2007 में जिन्ना की वारिस के नाते जिन्ना हाउस पर अपना दावा करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था...ढाई एकड़ में फैला जिन्ना हाउस मुंबई के पॉश इलाके मालाबार हिल्स में माउंट प्लेसेंट रोड (भाऊसाहेब हीरे मार्ग) पर स्थित है...इसी के सामने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का आधिकारिक निवास है...इसी से अंदाज़ लगाया जा सकता है कि मौजूद बाज़ार भाव के मुताबिक ये कितनी कीमती प्रॉपर्टी होगी...




पांच दिन पहले बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस पी बी मजूमदार की अगुवाई वाली बेच ने कहा कि इस केस को अब तार्किक नतीजे पर पहुंचना चाहिए...बेंच ने केस से जुड़ी सभी पार्टियों को दिसंबर के पहले हफ्ते तक अपने लिखित बयान कोर्ट में दाखिल कराने का आदेश दिया है...

डीना वाडिया की दलील है कि उनके पिता ने मरने से पहले कोई वसीयत नहीं छोड़ी थी...डीना वाडिया के मुताबिक भारत सरकार की वह अधिसूचना अवैध है जिसमें जिन्ना हाउस को इवेक्यूइ प्रॉपर्टी घोषित किया गया है...ऐसी प्रॉपर्टी जो विभाजन के वक्त पाकिस्तान गए लोग भारत में ही छोड़ गए थे...भारत सरकार अदालत को बता चुकी है कि वो जिन्ना हाउस को साउथ एशिया कल्चरल सेंटर में तब्दील करना चाहती है और किसी भी शख्स या संस्था को ये प्रॉपर्टी सौंपने के हक में नहीं है...


मोहम्मद अली जिन्ना बेटी डीना के साथ

डीना वाडिया के अलावा मोहम्मद राजाबल्ली इब्राहिम और शाकिर मोहम्मद इब्राहिम ने भी अदालत में अर्ज़ी देकर जिन्ना हाउस में हिस्सेदारी देने की मांग की है...ये दोनों खुद को जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना के वंशज बताते हैं...

जिन्ना ने इस प्रॉपर्टी को 1917 में खरीदा था और इटालियन मार्बल और अखरोट की लकड़ी से 1936 में दो लाख रुपये की लागत से इसका कायापलट किया था...यही 41 साल की उम्र में जिन्ना ने पारसी लड़की रतनबाई से शादी की थी...

देश के विभाजन से एक साल पहले जिन्ना और नेहरू ने इसी हाउस में वो ऐतिहासिक बातचीत की थी जो बंटवारे का आधार बनी...जिन्ना को इस जगह से बेहद लगाव था..उन्होंने नेहरू से इस जगह को किसी विदेशी दूतावास को सौंपने का आग्रह किया था...यहां 1948 से 1982 तक ब्रिटिश डिप्टी हाईकमीश्नर का ऑफिस रहा...उसके बाद से ये जगह इंडियन काउंसिल ऑफ कल्चरल रिलेशन्स के पास है...

मैंने 15 सितंबर 2010 को जिन्ना पर ही एक पोस्ट लिखी थी, जिसमें जिन्ना की हिंदू जड़ों के बारे में बताया था...उसी पोस्ट को यहां रिपीट कर रहा हूं...

क्या आप जानते हैं कि स्वतंत्र भारत के जनक महात्मा गांधी की तरह ही पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्ना की जड़ें भी सौराष्ट्र (कठियावाड़) से हैं..मोहम्मद अली जिन्ना के बारे में कुछ ऐसे तथ्य जिन्हें मैंने पहली बार जाना है...जिन्ना के दादा का नाम प्रेमजी भाई ठक्कर था...वो कठियावाड़ के गोंडाल के पनेली गांव के हिंदू भाटिया राजपूत थे...अपने परिवार के गुजर-बसर के लिए प्रेमजी भाई ने तटीय कस्बे वेरावल में मछलियों का कारोबार शुरू किया...लेकिन जिस लोहाना समुदाय से प्रेमजी भाई आते थे, वहां मछलियों के धंधे को अच्छी नज़रों से नहीं देखा जाता था...लिहाज़ा प्रेमजी भाई को लोहाना समुदाय से बहिष्कृत कर दिया गया...

प्रेमजी भाई ने मछलियों के धंधे में खूब पैसा बनाया...इसके बाद उन्होंने फिर समुदाय में वापस आने की कोशिश की..मछलियों का धंधा भी छोड़ दिया...लेकिन प्रेमजी भाई को लोहाना समुदाय में वापस नहीं लिया गया...इस अपमान से सबसे ज़्यादा गुस्सा प्रेमजी भाई के बेटे पुंजालाल ठक्कर (जिन्ना के पिता) को आया...इस तिरस्कार की प्रतिक्रिया में ही पुंजालाल ठक्कर ने मुस्लिम धर्म अपना लिया...साथ ही अपने बेटों का नाम भी मुस्लिम धर्म के मुताबिक ही रख दिया...हालांकि पुंजालाल खुद के लिए गुजराती का ही अपना निकनेम ज़िनो ही इस्तेमाल करते रहे...ज़िनो का अर्थ होता है दुबला-पतला...पुंजालाल उर्फ ज़िन्नो ने कठियावाड़ से कराची आकर अपना ठिकाना भी बदल लिया...


पुंजालाल की शादी मिट्ठीभाई से हुई थी...दोनों की सात संतानों में से मोहम्मद अली जिन्ना सबसे बड़े थे... मोहम्मद अली जिन्ना का जन्म कराची ज़िले के वज़ीर मेंशन में हुआ...स्कूल रिकार्ड के मुताबिक उनकी जन्मतिथि 20 अक्टूबर 1875 है...हालांकि जिन्ना की पहली बायोग्राफी लिखने वाली सरोजनी नायडू के मुताबिक जिन्ना का जन्म 25 दिसंबर 1876 को हुआ था....मोहम्मद अली ने ही अपने परिवार का सरनेम पिता के निकनेम पर जिन्ना कर दिया...जिन्ना 1892 में पढाई के लिए इंग्लैंड गए...

बुधवार, 23 नवंबर 2011

क्या समीर जी की पोस्ट से नाराज हैं अन्ना...खुशदीप


अन्ना हज़ारे के मल्टीटास्किंग स्किल्स के बारे में गुरुदेव समीर लाल जी ने हाल में एक पोस्ट लिखी थी...यानि अन्ना के पास हर मर्ज़ की दवा है...लगता है अन्ना ने समीर जी की वो पोस्ट पढ़ ली है...और इसका बदला उन सभी लोगों से लेने की ठानी है जो कभी खुशी, कभी गम, कभी थकान उतारने, कभी बोरियत मिटाने और कभी कुछ भी खास न होने की वजह से लाल परी का सहारा लेते हैं...अन्ना ने ऐसे लोगों को चेतावनी के बावजूद न मानने पर पेड़ से बांध कर कूटने का रास्ता सुझाया है...



अन्ना के इस बयान पर सीपीआई के गुरुदास दासगुप्ता ने कहा है-

"अन्ना पागल है...वो तालिबानी फरमान सुनाता है..."

अन्ना हज़ारे ने मंगलवार को कहा था कि शराब पीने वालों को पीटने के बाद सार्वजनिक तौर पर जलील करना चाहिए, इससे उन्हें इस आदत से छुटकारा दिलाया जा सकेगा...हालांकि अन्ना ने एक न्यूज़ चैनल से बात करते हुए ये भी साफ़ किया था कि ये तरीका अपनाने से पहले शराब पीने वाले शख्स को समुचित चेतावनी दी जानी चाहिए...

अन्ना के इस बयान को भी बीजेपी प्रवक्ता निर्मला सीतारमण ने खारिज करते हुए कहा है कि उनकी पार्टी शराब छुड़वाने के लिए इस तरह के कट्टरपंथी तरीकों का समर्थन नहीं करती...यह आज के दौर का तरीका नहीं है...कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी अन्ना को लेकर अब बहुत सावधानी से बोलते हैं...उन्होंने अन्ना के सुझाव की तालिबान के उन फरमानों से तुलना की है जो वो शरीआ कानून का पालन न करने वालों के खिलाफ सुनाते रहे हैं...मनीष का कहना है कि अन्ना के इस सुझाव के हिसाब से तो आधे केरल, तीन-चौथाई आंध्र प्रदेश और अस्सी फ़ीसदी पंजाब को कोड़े लगाने होंगे...

इससे पहले अन्ना हजारे ने अपने बयान में स्वीकार किया कि वो महाराष्ट्र में अपने गांव रालेगण सिद्धि में शराबियों को खंभे से बांधकर पीटा करते थे... यही वजह है कि रालेगण में अब कोई शराब नहीं पीता...अन्ना ने कहा, हम पहले प्यार से समझाते थे...शराब पीने वाले हमारे ही लोग हैं...इसलिए हम उन्हें तीन बार चेतावनी देते थे...चेतावनी के बाद अगर वे नहीं मानते तो जिंदगी में शराब न पीने का वचन लेने के लिए घसीट कर मंदिर ले जाते थे...इसके बाद भी अगर वे शराब पीना नहीं छोड़ते तो उन्हें मंदिर के पास खंभे से बांधकर पीटते थे...अन्ना ने इस तरीके को उचित ठहराते हुए कहा है कि यह शराबियों के फायदे के लिए है... सार्वजनिक तौर पर पिटाई के बाद शर्म के कारण शराबी अपनी आदत से छुटकारा पाने के लिए मजबूर हो जाएगा...

अब आप बताइए कि क्या आप इस मुद्दे पर अन्ना से सहमत हैं...

"सरगट" और "नागपाश में स्त्री"...खुशदीप




वरिष्ठ पत्रकार, कथाकार, स्त्री विमर्श के लिए प्रतिबद्ध लेखिका व आउटलुक, हिन्दी की सहायक संपादिका गीताश्री को उनकी सम्पादित पुस्तक ‘नागपाश में स्त्री’ के लिए वर्ष 2011 का सृजनगाथा सम्मान दिए जाने की सूचना ब्लॉगजगत के ज़रिए आपको पहले ही मिल गई होगी...ये भी आपको पता चल गया होगा कि गीताश्री को ये सम्मान बैंकॉक, थाइलैंड में चौंथे हिंदी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान 17 दिसंबर, 2011 को दिया जाएगा...



गीताश्री को ब्लॉगजगत की ओर से बहुत-बहुत बधाई...लेकिन मेरी इस पोस्ट का आशय बधाई के साथ आपको कुछ खास पढ़ाना भी है...ये गीताश्री का ही एक लेख है जिसे मुझे जानकीपुल के प्रभात रंजन के ब्लॉग पर पढ़ने का अवसर मिला...पूरा लेख पढ़ने के लिए लिंक इस पोस्ट के नीचे दे रहा हूं...रचनात्मकता का अंधड़ क्या होता है, ये बताने के लिए मैं गीताश्री के लेख की कुछ पंक्तियां ही यहां दे रहा हूं...

मैं अपनी छोटी-सी दुनिया में ‘कविता लिखने वाली लडक़ी’ के नाम से जानी जाती थी। कहानियां कहीं पीछे छूट गईं। एक बार उसका सिरा मिला। ‘कटरा’ मुजफ्फरपुर जिले का एक कस्बा है। वहां एक कामवाली आती थी। उसका नाम था ‘सरगट’। गरमी की दोपहरी में वह अपने जीवन की दिलचस्प घटनाएं सुनाया करती थी। मुझे उसकी बातें दिलचस्प लगतीं। उसका नाम जरा अटपटा सा था। कभी सुना नहीं। आज तक नहीं सुना। ‘सरगट’- अजीब सी ध्वनि आती। 40 वर्षीय उसी मरियल सी ‘सरगट’ ने बताया कि उसके इलाके में एक चिडिय़ां पाई जाती है। बेहद मरियल-सी, बेनूर चिडिय़ां। सरगट जब पैदा हुई तो बेहद मरियल और बदशक्ल थी। घरवालों ने ‘प्यार’ से उसका नाम उसी चिडिय़ा के नाम पर रख दिया। मैं बहुत बाद तक उस इलाके में ‘सरगट’ चिडिय़ों को तलाशती रही, नहीं दिखी। पता नहीं ऐसी कोई चिडिय़ा होती भी है या नहीं। ‘सरगट’ की कहानी मैंने होस्टल के दिनों में इसी नाम से लिखी। बदशक्ल होने के कारण सरगट का जीवन कैसे नरक में बदल गया था। इसकी दहला देने वाली दास्तान मुझे भीतर तक हिला गई थी। तभी मुझे लगा कि इस दुनिया में एक स्त्री का सुंदर होना कितना जरूरी होता है। खासकर कस्बाई इलाकों में। अब भले रूपरंग के मायने बदल गए हों। शहरों में स्मार्टनेस और सुंदरता के खांचे अलग-अलग बना दिए गए हैं। गांव-कस्बों में गोरी चमड़ी सुंदरता का पैमाना मानी जाती है पिछड़े इलाकों में आज भी। सरगट की कहानी पता नहीं कहां गई।
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जब मेरी कहानियों की स्त्रियां वाचाल दिखाती है, तब उनकी इस वाचालता की तह में जाना जरूरी है। (चिडिय़ाएं जब ज्यादा चहचहाती है तो यह न समझिए कि वे उत्सव मना रही हैं। वे यातना में होती हैं। शायद उन्होंने किसी भयानक जानवर को देख लिया है। उनकी चहचहाहट में छिपी ‘मौन यातना के अवशेषों’ को रेखांकित करने की कोशिशें भी कहानियां बन जाती है।)
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परंपरावादियों को यह दृष्टि बहुत ‘अश्लील’ लगती है। ठीक वैसे ही जैसे कभी मंटो की कहानियों पर भौंहे तनी थीं। परंपरावादियों ने उन्हें अदालत में घसीटा था। एक वाकया हाल ही में मैंने कहीं पढ़ा। अदालत में एक व्यक्ति ने मंटो से कहा कि आपकी कहानी से ‘बू’ तो बड़ी बदबू फैलाती है। मंटो ने कहा, ‘तो आप ‘फिनाइल’ लिख दें।’ इसे मेरा भी जवाब माना जाना चाहिए। उन तमाम शुचितावादियों और पुरुषदंभियों को हमारे लिखे से बदबू आनी ही चाहिए। हमारा लिखना सार्थक ही तभी माना जाएगा।
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गीताश्री के शब्द-सृजन में पूरी तरह डूबने के लिए प्रभात रंजन जी से साभार लिए इस लिंक पर जाइए...और वहां टिप्पणी के ज़रिए अपनी राय देना न भूलिएगा...
 
रचनात्मकता एक अंधड़ है मेरे लिए...


सोमवार, 21 नवंबर 2011

मेज़बान सतीश सक्सेना, मेहमान राहुल सिंह-"वसुंधरा राजे"...खुशदीप



राहुल सिंह जी

पिछली पोस्ट में दिल्ली के इंटरनेशनल ट्रेड फेयर में एंट्री का ज़िक्र किया था...ट्रे़ड फेयर से घर लौटा तो लैटर-बॉक्स में छत्तीसगढ़ के संस्कृति विभाग का वही निमंत्रण-पत्र दिखाई दिया, जिसने इतने दिनो तक छकाया...खैर बात वहां से शुरू करता हूं, जहां पिछली पोस्ट पर छोड़ी थी...राहुल सिंह जी ने वादा किया था कि वो शनिवार को नोएडा मुझसे मिलते हुए जाएंगे...राहुल जी का पुत्र ग्रेटर नोएडा में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है...दिल्ली से ग्रेटर नोएडा के रास्ते में नोएडा बीच में ही पड़ता है...मैं शनिवार को ऑफ होने की वजह से राहुल जी का इंतज़ार कर ही रहा था कि सतीश सक्सेना भाई जी का फोन आ गया...उनका हुक्म था कि एक बजे मैं उनके घर पहुंच जाऊं...सतीश जी ने बताया कि राहुल जी एक बजे उनके घर पर ही पहुंच रहे हैं...सतीश जी ने राहुल जी के साथ ये प्रोग्राम सेट होने की मुझे सूचना दी...मज़े की बात ये है कि सतीश भाई जी से अब पहचान करीब दो साल पुरानी हो चुकी है...वो नोएडा के सेक्टर 19 में रहते हैं और मैं सेक्टर 28 में...ये दोनों सेक्टर साथ-साथ ही हैं...लेकिन कभी ऐसा संयोग ही नहीं बना कि मैं उनके घर जा पाता...

अब सतीश भाई जी का दावतनामा और ऊपर से राहुल जी से विस्तार से कुछ बातचीत का लालच...मौका चूकने का सवाल ही नहीं था...मैं करीब सवा बजे सतीश जी के घर पहुंच गया...बेल बजाते ही मिलियन डॉलर स्माइल के साथ मेरा स्वागत करने के लिए सतीश जी दरवाज़े पर हाज़िर...मैं सोच रहा था कि राहुल जी अब तक आ चुके होंगे...लेकिन सतीश जी ने बताया कि राहुल जी ने फोन पर सूचना दी है कि उन्हें आने में थोड़ा वक्त लगेगा...सतीश जी ने इस बीच दिव्या भाभीश्री जी से परिचय कराया...मेहमाननवाज़ी और मिलनसारिता में बिल्कुल सतीश जी जैसा ही स्वभाव...सतीश जी ने इस बीच दो बहुत बड़ी खुशखबरी सुनाई...पंजाबी टच वाली इन खुशखबरियों का राज़ मैं यहां नहीं खोलने जा रहा..उम्मीद करता हूं कि सतीश जी खुद ही किसी पोस्ट में ये जानकारी देंगे...

खातिरनवाज़ी के बीच ही सतीश जी ने बताया कि राहुल जी संजय के साथ हैं...अब सतीश जी अंदाज़ लगाने लगे कि ये संजय कौन हैं...कहीं संजय मिश्रा तो नहीं...मैंने ध्यान दिलाया कि मो सम कौन वाले संजय भी हो सकते हैं...मेरा अंदाज़ सही निकला...वही संजय निकले...सतीश जी ने संजय से फोन पर बात की और मेरी भी कराई...संजय और मेरा आपस में जल्दी मिलने का वादा भी हुआ...खैर इंतज़ार खत्म हुआ और राहुल जी ड्राईंग रूम में प्रवेश करते दिखे...

लेकिन ये क्या राहुल जी के साथ ही "वसुंधरा राजे" जी का भी आगमन...मैं चौंका, राहुल जी तो छत्तीसगढ़ से जुड़े हैं, ये राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री रानी साहिबा उनके साथ कैसे...वही राजसी गरिमा, चेहरे पर वही तेज...खैर जल्दी ही झटके से उभरा...वो वसुंधरा राजे नहीं श्रीमति राहुल सिंह यानि हमारी भाभीश्री थीं...आपस में परिचय हुआ...(अब मेरी बात का यकीन नहीं करते तो फोटो देख लीजिये)...


श्रीमति सतीश सक्सेना और श्रीमति राहुल सिंह
एक चीज़ और नोट करने वाली थी कि दूसरी भाभीश्री (श्रीमति सतीश सक्सेना) एक पैर पर खड़ी होकर हमारी आवभगत में लगी रहीं ...पंजाबियों को भी कहीं पीछे छोड़ देने वाली खातिर...यहां तक कि अब टेबल पर एक इंच भी ऐसी जगह नहीं बची थी, जहां खाने की कोई प्लेट न रखी हो...
अब चला बातचीत का दौर...पता चला कि राहुल जी ने छत्तीसगढ़ के मंडप में कोसा साड़ियों के राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता डिजाइनर नीलांबर से सतीश जी को अच्छा डिस्काउंट दिलवा दिया था, दिव्या भाभीश्री वहां से बेहतरीन साड़ियां ला कर बहुत खुश थीं...अब ये बात दूसरी थी कि सतीश भाई जेब को मोटा फटका लगने से कितने खुश हुए होंगे...यही तो पतियों (गुरुदेव समीर जी की भाषा में HUNNY) की खूबी होती है पत्नियों का पर्चेसिंग का शौक पूरा होने के बाद भी चेहरे पर मुस्कुराहट बनाए रखते हैं (कोई भुक्तभोगी ही दूसरे का दर्द समझ सकता है)...

खैर छोड़िए अब बात आई पुरातत्व की...वही पुरातत्व जिस पर राहुल जी का एक्सपर्टाइज़ रहा है...बात ऐतिहासिक महत्व की इमारतों के रखरखाव की हुई...पुरातत्व महत्व के स्थलों की खुदाई की चली...ये देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि सतीश जी की पत्नीश्री को भी पुरातत्व वस्तुओं की अच्छी जानकारी होने के साथ दुर्लभ पत्थरों के संग्रह का भी शौक है...उन्होंने ऐसा कुछ संग्रह राहुल जी को दिखाया भी...दिव्या भाभीश्री ने राहुल जी से एक सवाल भी पूछा कि ये कैसे पता लगाया जाए कि कोई पत्थर वाकई आर्कियोलॉजिकल साइट का है या नहीं...या एंटीक चीज़ों को खरीदने से पहले उनकी प्रमाणिकता की जांच कैसे की जाए...यहां मैंने एक लाइन सतीश जी को देखकर बुदबुदाई...आप जैसे एंटीक के घर में होते हुए भाभीश्री क्यों चिंतित हैं...सतीश जी मेरा आशय फौरन समझ गए...उन्होंने दिव्या जी को बताने की कोशिश भी की...लेकिन वो पत्थरों की बातों में इतनी डूबी हुई थीं कि पहली बार में समझ नहीं पाई...फिर सतीश जी ने जब दोबारा आशय समझाया तो हम सबके ठहाके में दिव्या जी का ठहाका सबसे ऊंचा था...


राहुल जी, मैं और सतीश भाई

पता ही नहीं चल रहा था कि वक्त कहां जा रहा है...लेकिन राहुल जी ने बेटे से मिलने के लिए ग्रेटर नोएडा भी निकलना था...उन्होंने और भाभीश्री ने विदा लेने से पहले सतीश जी और मुझे दोनों को छत्तीसगढ़ से जुड़े साहित्य और बाल-मिठाई (उत्तराखंड स्पेशल) भेंट की...मिठाई वैसी ही मीठी जैसी राहुल जी और भाभीश्री का स्वभाव...उन्हें विदा करने के बाद मैंने भी सतीश भाई से इजाज़त लेकर अपने घर की ओर कूच किया...इतने अच्छे लोगों से मुलाकात का अहसास दिल में हमेशा के लिए संजोए हुए...

(तीनों फोटो सतीश सक्सेना भाई जी के कैमरे का कमाल)

शनिवार, 19 नवंबर 2011

ब्लॉगिंग से ट्रेड फेयर में एंट्री...खुशदीप





दिल्ली में 31 वां अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला आज से आम जनता के लिए खुल गया है...खास लोग पहले पांच दिन में ही आराम से ये मेला देख चुके हैं...अब एक हफ्ते यानि अगले इतवार तक बस रेलमपेला ही रहेगा...शनिवार और इतवार को तो इतना रश होता है कि आपको चलने की भी ज़रूरत नहीं, लोग ही आपको पीछे से आगे ठेलते चलेंगे...मेरा सौभाग्य है कि मैं कल ही बिजनेस डे पर पत्नीश्री और बच्चों के साथ मेला देख आया हूं...नहीं बाबा, न तो मुझे बिजनेसमैन के नाते कोई ट्रेड डील करने जाना था और न ही आसमान से ऐसा कुछ तोड़ा है कि खास होने के नाते दनदनाता हुए मेले में घुस जाऊं...तो फिर मेले में बिजनेस डे पर एंट्री कैसे संभव हुई, इसकी भी दिलचस्प कहानी है...

आठ दस दिन पहले छत्तीसगढ़ से ललित शर्मा भाई का फोन आया था, उन्होंने फोन पर राहुल सिंह जी से बात कराई...ललित जी जैसी शानदार हस्ती से भी ब्लॉगिंग के नाते ही परिचय हुआ और राहुल जी से अभी तक पोस्ट और टिप्पणियों की लिखा-पढ़ी के नाते ही जुड़ा था...लेकिन वो एक पंक्ति की टिप्पणी में ही पोस्ट का पूरा भाव लिए जैसा गहरा असर छोड़ते हैं, उससे मैं बहुत प्रभावित था...ये खासियत हिंदी ब्लागिंग जगत में राहुल जी और प्रवीण पांडे भाई के पास ही है... छत्तीसगढ़ के संस्कृति विभाग में आला अफसर होने के नाते राहुल जी के कंधों पर व्यापार मेले में 18 नवंबर को छत्तीसगढ़ का राज्य दिवस मनाने की ज़िम्मेदारी थी...राहुल जी ने बड़े स्नेह के साथ मुझे इस अवसर के लिए आमंत्रित किया और मेरा पता नोट कर जल्दी ही मुझे डाक से निमंत्रण-पत्र मिलने की जानकारी दी...


राहुल जी जैसी शख्सीयत से मिलने की मेरी इच्छा तो पहले से प्रबल थी...ऊपर से बिजनेस डे पर व्यापार मेले में एंट्री का और आकर्षण जुड़ गया था...अब मैं बेसब्री से निमंत्रण-पत्र का इंतज़ार करने लगा...रोज़ लैटर-बॉक्स खोल कर देखता लेकिन वहां का सूनापन मुझे मुंह चिढ़ाता रहता...देखते देखते सत्रह नवंबर भी आ गई...लेकिन निमंत्रण-पत्र नहीं आया...हां राहुल जी का फोन ज़रूर आया...उन्होंने पूछा कि निमंत्रण-पत्र मिल गया...अब मैं क्या जवाब देता...मैंने कहा कि निमंत्रण पत्र तो नहीं मिला, लेकिन आप से मिलने की ख्वाहिश कैसे पूरी हो सकती है...मेले में आप तो सर्विस से जु़ड़े दायित्वों को पूरा करने में बेहद व्यस्त होंगे, इसलिए वहां तो आपको डिस्टर्ब करना ठीक नहीं...दिल्ली में और कहां आप से मिला जा सकता है...या आपको असुविधा न हो तो नोएडा में ही मेरे गरीबख़ाने पर आ सकें तो उससे बढ़िया कोई बात नहीं...अब राहुल जी भी निमंत्रण पत्र न मिलने की बात सुनकर परेशान हुए...लेकिन क्या कर सकते हैं डाक विभाग तो डाक विभाग है...अब बिना निमंत्रण कैसे जाया जाए...बिजनेस डे वाले दिन तो मेले में एंट्री की टिकट भी 400 रुपये की होती है...अब घर के चार सदस्य हैं तो 1600 रुपये तो एंट्री की ही भेंट चढ़ जाते..



अच्छा जो मेरे साथ बीती, ठीक ऐसा ही सतीश सक्सेना भाई जी के साथ भी बीत रहा था..वो भी डाक से न्यौते का इंतज़ार ही करते रह गए...और मज़े की बात इस विषय पर सतीश जी और मेरी कोई बात भी नहीं हुई...और तो और समस्या का तोड़ भी सतीश जी और मेरे बिना एक दूसरे की जानकारी के एक जैसा ही निकला...वैसे मीडियाकर्मी के नाते मेरे लिए प्रवेश का रास्ता निकल सकता था लेकिन मैं ऐसे रास्ते निकालने से बचने की हर संभव कोशिश करता हूं...रास्ता ये निकला कि राहुल जी को इन्फॉर्म कर दिया जाए वो गेट पर बता देंगे और एंट्री मिल जाएगी...अब मैं परिवार सहित गेट पर पहुंचा और राहुल जी को फोन करने की सोच ही रहा था कि वहां तैनात पुलिस अधिकारियों ने पूछा भी नहीं, बस गेट पर बैग आदि की स्क्रीनिंग हुई और हमें एंट्री मिल गई...अब मैं हैरान-परेशान ये चमत्कार कैसे हुआ...न कुछ कहना पड़ा और हम मेले के अंदर...क्या ब्लॉगिंग इतनी ताकतवर हो गई है या कोई और बात, अब ये मेरे लिए भी पहेली है...
 
मैंने मेले के अंदर पहुंच कर राहुल जी को फोन किया...तब दोपहर का एक बजा था...मैंने राहुल जी से कहा कि अभी थोड़ी देर परिवार को दूसरे राज्यों के पैवेलियन दिखाने के बाद आप तक पहुंचता हूं...मेले में कुछ मीडिया से ही जुड़े दोस्त भी मिले...करीब साढ़े चार बजे सतीश सक्सेना जी का मुझे फोन आया...वो राहुल जी के पास थे...मैंने कहा बस पंद्रह मिनट तक आपके पास पहुंचता हूं...लेकिन मुझे राहुल जी के पास पहुंचने में आधा घंटा लग गया, तब तक सतीश जी वापस जा चुके थे...राहुल जी छत्तीसगढ़ मंडप के गेट पर मुझे लेने के लिए पहुंचे...जैसा सोचा था, उससे भी कहीं बढ़कर पर्सनेल्टी...मैं छह फुट का हूं...और राहुल जी मेरे से भी लंबे...हाथ में फाइलें...दरअसल साढ़े पांच बजे से छत्तीसगढ़ दिवस का समारोह शुरू होने जा रहा था...ऐन टाइम पर राहुल जी को कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के महामहिम के आने की भी सूचना मिली थी...ऐसे में उनकी व्यस्तता समझी जा सकती थी...लेकिन राहुल जी ने ऐसी स्थिति में भी मेरे लिए नेशनल अवार्ड विजेता और कोसा साड़ी के डिजाइनर नीलांबर से मिलवाने के लिए वक्त निकाला...मैंने पांच मिनट राहुल जी के साथ रहने के बाद आग्रहपूर्वक उनसे विदा ली...मुझे पता था कि इस वक्त उनके लिए एक एक मिनट भी कितना कीमती है...ये तय हुआ कि राहुल जी अगले दिन मुझसे नोएडा मिलते हुए लौटेंगे...अगले दिन क्या हुआ...ये कल पढ़िएगा...कल ही की पोस्ट में पढ़िएगा कि सतीश सक्सेना भाई जी और दिव्या भाभीश्री ने कैसे अपने घर पर 'वसुंधरा राजे' जी की अगवानी की...

बुधवार, 16 नवंबर 2011

''दफ़नाने" पर भी "जलाना"...खुशदीप




किसी शायर ने क्या ख़ूब कहा...
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वो आती है रोज़, मेरी क़ब्र पर,
अपने हमसफ़र के साथ...
कौन कमबख्त कहता है कि,
"दफ़नाने" के बाद "जलाया" नहीं जाता...

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विचित्र ख़बरें...

विमान पर सवार पाज़ामे में घड़ियाल...

Topless woman allegedly causes crashes




रविवार, 13 नवंबर 2011

मुद्दा बड़ा लेकिन सीज़र की पत्नी पर संदेह !...खुशदीप

मुद्दा बड़ा होता है, व्यक्ति नहीं...सही बात है...भ्रष्टाचार का मुद्दा बड़ा है...देश के हर नागरिक से सीधे तौर पर जुड़ा है...देश में कौन ऐसा शख्स होगा जो ये नहीं कहेगा कि भ्रष्टाचार से निजात मिलनी चाहिए...चाहे कोई कितना भी भ्रष्ट क्यों न हो लेकिन ऊपर से यही दिखाने का प्रयत्न करेगा कि उससे ज़्यादा पाक-साफ़ कोई नहीं...कहने को वो भी यही कहेगा, भ्रष्टाचार जड़ से खत्म होना चाहिए...

भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई सभी को मिलजुल कर लड़नी है...सबसे पहले दिल से खुद को बदलना होगा...ऐसा करने के बाद ही नैतिक तौर पर हमें दूसरों को बदलने के लिए कहने का अधिकार होगा...संसद का शीतकालीन सत्र  22 नवंबर से शुरू होने वाला है...जनलोकपाल या लोकपाल फिर सब की ज़ुबान पर आने वाला है...अगर ये बिल अब पास नहीं होता तो अन्ना हज़ारे सत्र के आखिरी तीन दिन अनशन पर बैठने की बात कह चुके हैं...अन्ना की ईमानदारी और मंशा पर कोई सवाल नहीं उठा सकता...लेकिन टीम अन्ना का हर सदस्य किसी न किसी विवाद में घिर चुका है या घेर दिया गया है...

रही सही कसर अब अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी के बीच खींचतान से सामने आ गई है...ये दोनों ही भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना की मुहिम के दो सबसे बड़े सिपहसालार हैं...केजरीवाल ने कहा कि किरण बेदी को हवाई यात्राओं में रियायत मिलने के बावजूद आयोजकों से मोटे
बिल नहीं वसूलने चाहिए थे...केजरीवाल ने ये भी कहा कि अगर वो खुद होते तो ऐसा नहीं करते...इस पर किरण ने पलटवार किया कि केजरीवाल ने बिना मुद्दे को ठीक समझे ये बयान दिया है...

पहले टीम अन्ना के सदस्यों पर जो आरोप लगे हैं, मैं उन का यहां दोबारा ज़िक्र नहीं करना चाहता...यहां सवाल उठाया जा सकता है कि हम मुद्दे को पकड़ें, व्यक्तियों को नहीं...यानि व्यक्ति विशेष के ख़िलाफ़ आरोपों को तूल न देकर हमें फोकस सिर्फ जनलोकपाल की लड़ाई पर रखना चाहिए...ये कानून बन गया तो सब के सब इसके घेरे में खुद-ब-खुद आ जाएंगे...लेकिन मेरा सवाल है कि अगर किसी मुद्दे पर जंग लड़ने जाना है और आपके सेनापति खुद दागदार हैं तो कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वो मुद्दे के साथ इनसाफ करेंगे...

मेरे या किसी और साधारण नागरिक के लिए भ्रष्टाचार पर कुछ बोलने और टीम अन्ना के सदस्यों के बोलने में काफ़ी फर्क है...वो स्वयंभू सुधारक बने हैं, समाजसेवी बने हैं, देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने के दावे कर रहे हैं तो उनका खुद का रिकार्ड भी शीशे की तरह साफ़ होना चाहिए...मैं या देश का कोई और आम नागरिक ऐसा कोई दावा नहीं कर रहा, करें भी तो सुनेगा कौन...इसलिए हमारे आचरण से कहीं ज़्यादा उनका आचरण मायने रखता है जिन पर देश की 120 करोड़ जनता ने विश्वास किया...(जैसा कि वो खुद दावा करते हैं)...उसके बाद ही ऊंची ऊंची नैतिक बातें करने का उन्हें हक़ मिलता है...
आखिर में ये किस्सा भी सुन लीजिए...



जूलियस सीजर की दूसरी पत्नी का नाम पॉम्पिया था...67 बीसी में दोनों की शादी हुई थी...63 बीसी में सीजर रोमन स्टेट के पोन्टिफेक्स मैक्सीमस यानि मुख्य पादरी चुने गए...62 बीसी में सीजर की पत्नी पोम्पिया ने बोना डिया (अच्छी देवियों का समारोह) का आयोजन किया...इस आयोजन की खास बात होती थी कि कोई भी पुरुष इसमें शिरकत नहीं कर सकता था...लेकिन क्लॉडियस नाम का एक खूबसूरत युवक महिला का वेश धर कर इस आयोजन में पहुंच गया...उसका मकसद सीजर की पत्नी पॉम्पिया को अपनी ओर आकर्षित करना था...क्लॉडियस पकड़ा गया...उस पर पवित्र रस्म के अनादर का मुकदमा चला...लेकिन जूलियस सीजर ने क्लॉडियस के खिलाफ कोई सबूत पेश नहीं किया...क्लॉडियस बरी हो गया...लेकिन बाद में सीज़र ने पत्नी पॉम्पिया को तलाक दे दिया...ये कहते हुए कि वो मेरी पत्नी है, वो रत्ती भर भी संदेह की गुंजाइश से बाहर होनी चाहिए...   
 "Caesar's wife must be above suspicion."

शनिवार, 12 नवंबर 2011

इंसानियत के दो पाठ...खुशदीप


पहला पाठ...

वैभव होनहार छात्र होने के नाते प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान में दाखिला पा गया...कुछ महीने बिताने के बाद संस्थान के एक प्रोफेसर ने छात्रों की जनरल नॉलेज का टेस्ट लिया...वैभव ने सभी प्रश्नों का खटाखट जवाब दे दिया...बस आखिरी सवाल पर वो अटक गया...सवाल था...इंस्टीट्यूट के स्वीपर का क्या नाम है...वैभव ने उस सवाल को छोड़कर अपना पर्चा जमा करा दिया...तभी एक और छात्र ने प्रोफेसर से पूछा कि आखिरी सवाल के भी क्या अंक दिए जाएंगे...प्रोफेसर ने कहा...निश्चित रूप से दिए जाएंगे...आप ज़िंदगी में कई लोगों से मिलोगे...उन सब की कुछ न अहमियत ज़रूर होगी...वो भी ध्यान के क़ाबिल है...चाहे वो हल्की सी मुस्कान हो या सिर्फ आपका ये पूछना कि कैसे हो...उस दिन के बाद वैभव वो पाठ कभी नहीं भूला...ज़िंदगी भर उसे याद रहा कि उसके संस्थान के स्वीपर का नाम रघु था...

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दूसरा पाठ...


26 जुलाई 2005 की रात

मुंबई में ऐसी घनघोर बारिश कि सब कुछ अपने साथ ले जाने के लिए बेताब...एक बुज़ुर्ग आदमी सड़क के बीचोबीच खड़ा था...घुटनों तक पानी...बुज़ुर्ग की कार स्टार्ट होने का नाम नहीं ले रही थी...लेकिन चेहरे से लग रहा था कि बुज़ुर्ग को कहीं जाने की जल्दी थी...उसने लोगों से मदद के लिए हाथ हिलाना शुरू किया...लेकिन आफ़त की बरसात में कौन बुज़ुर्ग की सुनता...बुज़ुर्ग की उम्मीद टूटने ही वाली थी कि एक नौजवान वहां आकर रुका...उसने पहले बुज़ुर्ग की कार को धकेल कर सुरक्षित जगह तक पहुंचाया...मैकेनिक को फोन किया और फिर बुज़ुर्ग के लिए एक ऑटो रुकवाया...बुज़ुर्ग ने नौजवान का धन्यवाद किया और विदा होने से पहले उसका पता भी एक कागज़ पर नोट कर लिया...

सात दिन बाद उस नौजवान के घर के दरवाज़े की बेल बजी...दरवाज़े पर बड़ा सा पैकेट लिए कूरियरमैन खड़ा था...नौजवान ने आश्चर्य से पैकेट खोला था तो उसमें आई-मैक कंप्यूटर और फिलीप्स म्यूज़िक सिस्टम था...साथ में हाथ से लिखा एक नोट भी था...लिखा था...

उस रात मेरी मदद करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया...बारिश ने मुझे और मेरी हिम्मत को पूरी तरह निचोड़ कर रख दिया था...अगर तुम मेरी मदद न करते तो मैं अपनी दम तोड़ती पत्नी तक वक्त रहते नहीं पहुंच पाता...फिर मैं ज़िंदगी में खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाता...गॉड ब्लेस यू माई सन...


डॉ पी के सिंहानिया

(ई-मेल पर आधारित)
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मक्खन बोला ढक्कन से...झल्ला है क्या...खुशदीप


Why post-men are only men ?


मंगलवार, 8 नवंबर 2011

अन्ना, चौकड़ी से बहुत निराश हैं शंभूदत्त...खुशदीप


कौन है असली, अन्ना हज़ारे या शंभूदत्त शर्मा...ये पोस्ट मैंने चार महीने पहले लिखी थी...अब वही बुजुर्ग गांधीवादी कार्यकर्ता शंभूदत्त शर्मा बोले हैं...शंभू दत्‍त लोकपाल के लिए चल रही मुहिम की स्थिति देख कर घोर निराश हैं... 94 साल के शंभू दत्‍त को लगता है कि उन्‍होंने इस बिल की मुहिम टीम अन्‍ना को सौंप कर गलती की थी...उनका कहना है कि वह इन सदस्‍यों के 'झांसे' में पड़ गए थे...



दत्‍त ने ही लोकपाल के मसले पर पहली बार जंतर-मंतर पर अनशन किया था...गांधीवादी सेवा और सत्‍याग्रह ब्रिगेड के महासचिव दत्‍त अपने पांच साथियों के साथ बीते 30 जनवरी को आमरण अनशन पर बैठे थे...शंभू दत्‍त कहते हैं, ‘अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांत भूषण और स्‍वामी अग्निवेश मेरे पास आए और अनशन खत्‍म करने का अनुरोध किया...उन्‍होंने कहा कि उनका संगठन 'इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शन' भी इसी मसले पर काम कर रहा है और अब वे इस विरोध-प्रदर्शन को आगे बढ़ाएंगे...मैं उनके जाल में फंस गया और अनशन तोड़ने का फैसला किया...लेकिन अब लगता है कि हमें अनशन खत्‍म नहीं करना चाहिए था...हम अपने मकसद को लेकर काफी दृढ़ थे...’

टीम अन्‍ना के सदस्‍यों की आलोचना करते हुए शंभू दत्‍त ने कहा कि कोर कमेटी के सदस्‍यों में ‘दम नहीं’ हैं... उन्‍होंने कहा कि टीम अन्‍ना और खासकर अरविंद केजरीवाल ने उन लोगों की नजर में अपनी विश्‍वसनीयता खो दी है जो भीतर की कहानी जानते हैं... कोर कमेटी में ‘जी हुजूरी’ करने वालों की भरमार है और इनमें कोई दम नहीं है... टीम के सदस्‍यों का अतिवादी और उग्र रवैया अन्‍ना हजारे के अभियान की हवा निकाल देगा...’

शंभू दत्‍त ने अन्‍ना हजारे की इस धमकी को ‘बचकाना’ करार दिया है जिसमें उन्‍होंने कहा है कि जिन राज्‍यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहां वे कांग्रेस के खिलाफ प्रचार करेंगे... इससे पहले उन्‍होंने कहा था कि वो कांग्रेस का विरोध नहीं करेंगे... उन्‍हें इंतजार कर देखना चाहिए कि केंद्र सरकार किस तरह का लोकपाल बिल संसद में पेश करती है...

दत्‍त के संगठन ने लोकपाल के मसले पर संसद की स्‍थायी समिति को ज्ञापन भी सौंपा है और जनलोकपाल बिल के कई प्रस्‍तावों को खारिज कर दिया है...दत्‍त के मुताबिक, ‘हम अन्‍ना हजारे के भ्रष्‍टाचार के खिलाफ आंदोलन का समर्थन करते हैं लेकिन जन लोकपाल बिल के कुछ प्रावधानों पर हमें आपत्ति है...’

इससे पहले शंभू दत्‍त ने एक इंटरव्‍यू में अन्‍ना हजारे को स्‍वभाव से जिद्दी किस्‍म का इंसान बताया था...उन्‍होंने कहा, ‘मैं अन्‍ना हजारे के खिलाफ नहीं हूं...वह एक जानी मानी शख्‍सीयत हैं लेकिन वह जिद्दी इंसान हैं और जो उनकी बातों से सहमत नहीं होता, उसे ब्‍लैकमेल करने से भी नहीं हिचकिचाते हैं...’

(भास्कर की रिपोर्ट के इनपुट के साथ)

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SMILE CORNER...

मक्खन की यमदूत ने सुन ली...खुशदीप


Recall of a promise on wedding night...



रविवार, 6 नवंबर 2011

ये क्या हो रहा है अन्ना जी, ये क्या हो रहा है...खुशदीप


एक दिन पहले मैंने आपको अन्ना हज़ारे के अधिकृत ब्लॉगर राजू पारूलेकर की व्यथा सुनाई थी...राजू ने कहा था कि वो अपने सम्मान को बचाने के लिए दस्तावेजी सबूतों के साथ सामने आएंगे...उन्होंने अन्ना के ब्लॉग पर ऐसा सबूत पेश कर भी दिया है...सबूत है अन्ना के हाथ की लिखावट में ही कागज़...



राजू खास तौर पर इस बात से दुखी है कि अन्ना ने ये कहा कि उन्होंने कभी राजू से कोर कमेटी के पुनर्गठन या इसे देशव्यापक रूप देने की बात कभी नहीं की थी...अन्ना ने हालिया दिल्ली प्रवास के दौरान ये भी कहा कि अगर बलॉग पर ऐसी बात लिखी गई है तो बिना उनकी मर्जी के है...और वो इस बात पर रालेगण सिद्धि लौटने के बाद कार्रवाई करेंगे...राजू के दस्तावेज पेश करने पर अन्ना ने कहा कि अगर कागज पर उनके दस्तखत नहीं है तो उसे माना नहीं जाए...अब अन्ना कह रहे हैं कि वो ब्लॉग ही बंद कर देंगे...

राजू ने ब्लॉग में अन्ना के हस्तलिखित ड्राफ्ट का अंग्रेज़ी और मराठी में अनुवाद तो दिया है हिंदी में नहीं...हिंदी में शब्दवार अनुवाद इस प्रकार है...

अति शीघ्र, मैं कोर कमेटी के पुनर्गठन की दिशा में विचार कर रहा हूं, यहां मैं टीम अन्ना के सभी सदस्यों को सूचित करता हूं...इसके पीछे कारण ये है कि मुझे पूरे देश और राज्यों से आंदोलन के समर्थन में पत्र मिले हैं, जिनमें लिखा है कि वो सभी इस पवित्र काम के लिए अपना जीवन समर्पित करते हैं...इन पत्र लिखने वालों में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज, हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज, सेना के ब्रिगेडियर, कर्नल, प्रोफेसर, प्रिंसिपल और विचारवान पढ़े-लिखे लोग शामिल हैं...जल्दी ही इन लोगों को उनकी इच्छा के काम के अनुरूप श्रेणीबद्ध किया जाएगा...मैंने फैसला किया है कि पूरे देश और राज्यों से ऐसे लोगों की सेवाएं ली जाएं जो स्वेच्छा से समाज के हित में कुछ करना चाहते हैं...



इन सब आवेदकों को अपने लिए कोई इच्छा नहीं है, ये सभी राष्ट्र और समाज की सेवा के उद्देश्य से जुड़ना चाहते हैं...अब हम ऐसे लोगों को आश्वस्त करना चाहते हैं और टीम अन्ना की सदस्य संख्या का विस्तार करेंगे...हमें योग्य लोगों की ज़रूरत भी है और कार्यसमिति बनाएंगे...हर राज्य से सभी सदस्यों को कोर कमेटी बनाते वक्त प्राथमिकता दी जाएगी...कारगर संवाद के लिए उन्हें इंटरनेट (ऑनलाइन) से जोड़ा जाएगा...


ऐसे 100 वालंटियर्स के लिए खाने और रहने के लिए खर्च साफ चरित्र वाले लोगों से मिले चंदे से पूरा किया जाएगा... इससे हमें पूरे देश में कारगर आंदोलन खड़ा करने में मदद मिलेगी...हमें आगे लंबी लड़ाई लड़नी है...भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाने के लिए हमें इन सबका इस्तेमाल करना होगा...मेरा मानना है कि इससे न सिर्फ भारत बल्कि उन देशों को भी मिसाल मिलेगी जो भ्रष्टाचार से मुक्त होना चाहते हैं...हम संगठन नहीं बनाना चाहते बल्कि ज़िले और राज्य स्तर पर वालटिंयर खड़े करना चाहते हैं...


जब राष्ट्र स्तर पर कोई आंदोलन चलता है तो आप देखेंगे कि हर राज्य से लोग उसके लिए खड़े होते हैं...इस संघर्ष में न कोई प्रमुख होगा, न सचिव और न ही खंजाची...लोग सिर्फ वालंटियर की हैसियत से काम करेंगे...स्वाभाविक है हमें आर्थिक मदद की ज़रूरत होगी...लेकिन इसके लिए कोई नकद राशि नहीं स्वीकारी जाएगी..सिर्फ चेक और ड्राफ्ट के रुप में ही चंदे का स्वागत किया जाएगा...लेकिन ये सिर्फ उन्हीं लोगों से स्वीकार किए जाएंगे जो भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे लाखों शहीदों पर विश्वास रखते हैं...


के बी हज़ारे
23.10.2011

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स्माइल कॉर्नर...


गज़ल और लेक्चर का अंतर...खुशदीप

important praise for husband....



शनिवार, 5 नवंबर 2011

ओ गंगा, तुम रुक गई क्यों...खुशदीप

भूपेन हज़ारिका

8  सितंबर 1926- 5 नवंबर 2011

खुद को टूटा मान रहा है अन्ना का ब्लॉगर...खुशदीप

राजू पारूलेकर आज बहुत दुखी इनसान हैं...कौन राजू पारूलेकर....इनकी पत्रकार के रूप में महाराष्ट्र में खासी पहचान है...महाराष्ट्र के बाहर पूरे देश में राजू की एक और पहचान हाल ही के दिनों में बन रही थी...अन्ना हज़ारे के अधिकृत ब्लॉगर...यानि अन्ना के विचारों को ब्लॉग के माध्यम से दुनिया के सामने लाने वाले शख्स...लेकिन अब लगता है कि अन्ना अपने इस अधिकृत ब्लॉगर से किनारा करने की दिशा में बढ़ चुके हैं...



राजू का टीम अन्ना के प्रमुख सदस्यों पर आरोप है कि वो अपने-अपने स्वार्थ के चलते अन्ना को ब्लैकहोल (अंधे कुएं) में धकेल रहे हैं...दरअसल सारा विवाद टीम अन्ना की कोर कमेटी को भंग करने के सवाल पर हुआ है...अभी कुछ दिन पहले टीम अन्ना के सदस्य (अब हैं या नहीं, मुझे पता नहीं)  कवि डॉ कुमार विश्वास ने अन्ना को चिट्ठी लिखकर टीम कोर कमेटी को विस्तारित रूप देने की मांग की थी...समाजसेवी मेधा पाटकर ने भी इस मांग में कुमार विश्वास का साथ दिया था...रालेगण सिद्धि से अन्ना की तरफ से भी पहले यही संकेत मिले थे कि मौजूदा कोर कमेटी को भंग कर सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया जाएगा...लेकिन अब अन्ना के दिल्ली प्रवास के दौरान पत्रकारों ने कोर कमेटी को भंग करने के बारे में सवाल पूछे तो अन्ना ने पारूलकर पर ही सवाल उठा दिया कि वो कोर कमेटी को भंग करने जैसी बात कैसे कर सकते हैं...

अन्ना ने कहा...मैंने उन्हें (राजू पारूलकर) नौकरी नहीं दी है, न ही मैं उन्हें कोई वेतन देता हूं...वो कैसे ये सब कह सकते हैं...मैं उनसे इस बारे में पूछूंगा...मैंने  उनसे  इस बारे में कुछ नहीं कहा था...अगर उन्होंने ऐसा कुछ कहा है तो मैं उनके खिलाफ कार्रवाई करूंगा...

अन्ना के इस बयान के बाद राजू पारूलकर की प्रतिक्रिया आई है कि इस मुद्दे से उनकी निजी साख, ईमानदारी और सम्मान पर ही सवाल उठ गया है..उनका कहना है...मैं अपना बचाव खुद करूंगा...ये साबित करूंगा कि जो मैंने लिखा या कहा वो अन्ना की रज़ामंदी से ही था...टीम अन्ना के अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और किरन बेदी मिलकर अपने स्वार्थों के चलते अन्ना को गर्त की ओर ले जा रहे हैं...

राजू ने पूरे विश्वास से कहा कि वो दस्तावेज़ी सबूतों से साबित करेंगे  कि जो कुछ उन्होंने  कहा या ब्लॉग पर लिखा वो सब अन्ना की सहमति से था...राजू के मुताबिक जिस तरह अन्ना और टीम अन्ना ने उनका अपमान किया है, बेइमान साबित करने की कोशिश की है, उसके चलते वो खुद को बहुत ही ठगा और टूटा हुआ महसूस कर रहे है...



राजू का कहना है- मीडिया का एक वर्ग मुझे केंद्र के एक मंत्री का एजेंट बता रहा है....मुझे तिरस्कार का पात्र बनाने के साथ हंसा जा रहा है...कोई भी मेरे साथ नहीं खड़ा हुआ, जबकि उनमें से बहुत सारे लोग पंद्रह साल से प्रोफेशन और निजी ज़िंदगी में  मेरी ईमानदारी और निष्ठा के बारे में अच्छी तरह जानते हैं...

कौन है सच्चा, कौन है झूठा...अब यह तो राम जाने....

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मक्खन की तलब और माचिस

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

दुनिया में इससे मीठा कुछ हो तो बताइए...खुशदीप


आप कभी न कभी तो दूसरे की किसी बात पर ज़रूर झल्लाते होंगे...मैं भी झल्लाता हूं...चलो झल्लाने की बात बाद में, पहले कुछ मीठा हो जाए..ठंडा ठंडा, कूल कूल...क्या मात्र पच्चीस हज़ार डॉलर का चॉकलेट संडे खाएंगे...क्या कहा...नहीं...तो चलिए हुजूर उसकी शक्ल तो देख ही लीजिए...



ये रहा न्यूयॉर्क में बना वो चॉकलेट संडे जिसे चार साल पहले गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में दुनिया की सबसे महंगी आइसक्रीम के तौर पर दर्ज़ किया गया था...

आप कहेंगे कि ये चार साल पुराना राग मैं क्यों आपको सुना रहा हूं...वजह है...मैं आपको मिठास का एहसास कराना चाहता हूं...मिठास पच्चीस हज़ार डॉलर वाले इस संडे में ज़्यादा है या नीचे जो मैं आइसक्रीम का किस्सा सुनाने जा रहा हूं, उसमें है, आप खुद ही तय कीजिए...और मुझे बताना न भूलिएगा...

एक छोटा लड़का आइसक्रीम पॉर्लर में आइसक्रीम खाने गया...


उसने वेटर से पूछा, संडे के लिए मुझे कितने पैसे देने होंगे...


पार्लर में भीड़ ज़्यादा होने की वजह से ऑर्डर निपटाने की जल्दी में लगे वेटर ने कहा...40 रुपए...

लड़के ने ये सुनकर जेब में पहले पैसे गिने और फिर मायूस होकर बोला...सादी आइसक्रीम कितने की होगी...


ये सब देखकर वेटर झल्लाने की स्थिति में पहुंच चुका था...फिर भी अपने पर काबू रखकर तल्ख आवाज़ में बोला...30 रुपये...


लड़के ने कहा...मेरे लिए सादी आइसक्रीम ही प्लीज़...


वेटर ने ऑर्डर लाकर दिया...साथ ही बिल भी...






लड़के ने आइसक्रीम खाई और काउंटर पर आइसक्रीम का बिल देकर चला गया...


थोड़ी देर बाद वेटर प्लेट उठाने के लिए लड़के वाली टेबल पर गया तो चौंक गया...


टेबल पर दस रुपये के सिक्के पड़े थे...टिप के लिए...


अब वेटर की आंखों से झर-झर आंसू बह रहे थे....

आइन्दा आप भी किसी पर झल्लाएं तो पहले सामने वाले के जज्बे को ठीक तरह से समझने की कोशिश ज़रूर कीजिएगा...

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

लेडी गागा, रफ्तार का रोमांच और समोसा...खुशदीप


कल एक दोस्त का फोन आया...पूछ रहा था कि मैं फॉर्मूला वन रेस देखने गया या नहीं...मेरे मना करने पर वो ताज्जुब करने लगा कि नोएडा में रहते हुए भी इतना बड़ा इवेंट मैंने कैसे मिस कर दिया...अब उसे क्या जवाब देता...अखबार रोज़ देखता हूं तो पिछले दिनों कई पन्ने इंडियन ग्रां प्री की खबरों से ही रंगे मिले...इवेंट खत्म होने के बाद भी इससे जुड़ी नाइट पार्टियों की तस्वीरे अभी तक छप रही है...रफ्तार और रेस का रोमांच देखने के लिए टिकट ढाई हज़ार से पैंतीस हज़ार रुपये तक के थे...तो सोमवार को हुई लेडी गागा के कंसर्ट के लिए टिकट चालीस हज़ार रुपये की थी...



सुनने में आ रहा है कि फॉर्मूला वन रेस के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने में जेपी ग्रुप ने सत्रह अरब रुपये खर्च किए हैं...आयोजकों ने इसे देश में खेल को प्रोत्साहन देने के नाम पर टिकटों और इसे जुड़े इवेंट्स पर कर में छूट देने की मांग की थी जिसे दिल्ली की सरकार ने मंज़ूर नहीं किया...




जिस देश में बत्तीस रुपये की कमाई पर गरीबी रेखा की बहस छिड़ी हो वहां ये आर्थिक ताकत का अश्लील प्रदर्शन कितना जायज़ है, मेरी समझ से बाहर है...किसानों की ज़मीन अधिग्रहण कर वहां कार रेसिंग का इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना कौनसा अर्जेंट जनोपयोगी काम है, ये भी मेरी समझ से बाहर है...ये ट्रैक अब तक अमेरिका और रूस जैसे देश भी नहीं बना पाए और हमने बना दिया...रेसिंग जैसे महंगे शौक को पूरा करने के लिए देश में कितने लोग समर्थ होंगे, ये भी आसानी से समझा जा सकता है...इस खेल के लिए महंगी कारों की मियाद सिर्फ एक डेढ़ साल की होती है...इसके अलावा इस चोंचले में रबड़ और ईंधन की जितनी बर्बादी होती है, क्या हमारे देश के लिए ये जायज़ है, जहां इन दोनों चीज़ों का ही आयात किया जाता है...

कल अखबार में ये भी पढ़ रहा था कि जो लोग मोटा पैसा खर्च कर रफ्तार और रोमांच के इस खेल को नंगी आंखों से देखने के लिए गए थे, उन्हें वहां खाने-पीने के छोटे सामान के लिए भी कितनी बड़ी रकम ढीली करनी पड़ी...आप खुद ही मुलाहिजा फरमाइए...

दो समोसे....100 रुपये

चाय........50 रुपये

एक गुलाब जामुन...50 रुपये

राजमा चावल...250 रुपये

वेजी बर्गर...200 रुपये

चिकन बर्गर...250 रुपये

पेटीज...100 रुपये


पानी की बोतल...100 रुपये

अब मरते क्या न करते...ऐसी जगहो पर आपको साथ कुछ भी ले जाने की इजाज़त नहीं होती...इसलिए भूख प्यास लगने पर आपको मुंहमांगी कीमत पर कुछ खरीदना ही पड़ेगा...जिन्होंने ये सब चीज़ें लेकर खाईं, उन्होंने इनके बेस्वाद होने की भी शिकायत की...इस पर जो सामान बेच रहे थे, उनका कहना था कि हमनें ये चीज़ें बाहर के लोगों के स्वाद के अनुरूप कम मिर्च मसाले की बनाई है, इसलिए लोग ऐसा कह रहे हैं...


अब बताइए कि क्या मुझे ये रेस देखने जाना चाहिए था...

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