खुशदीप सहगल
बंदा 1994 से कलम-कंप्यूटर तोड़ रहा है

बच्चा एक, 'पिता' तीन...खुशदीप

आम आदमी की दुहाई देने वाली कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार देश का क्या हश्र कर रही है, सब देख रहे हैं...आज बीजेपी के मुखिया नितिन गडकरी को भी प्रेस कांफ्रेंस में सुशासन, सुराज, भ्रष्टाचार मुक्त देश, भयमुक्त समाज की बड़ी बड़ी बातें करते सुना...आडवाणी की रथ यात्रा के उद्देश्य के बारे में बताते सुना...इससे कितनी जनचेतना जागेगी ये तो वक्त ही बताएगा...लेकिन गडकरी जी फिलहाल आज की बात कर ली जाए...आपकी पार्टी के शासन वाले मध्य प्रदेश की बात...वहां जबलपुर में ऐसी घटना घटी है कि शिद्दत के साथ शर्म महसूस हो रही है...ये सोच कर कि हमारे देश में कैसे कैसे बेगैरत लोग भी बसते हैं...ये घटना किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक से कम नहीं...


जबलपुर के डिंडोरी के निगवानी गांव में आज से आठ साल पहले पंद्रह साल की एक लड़की अपने गरीब बाप का हाथ बंटाने के लिए मजदूरी का काम करती है...मजदूरी कराने वाला ठेकेदार लड़की पर बुरी नज़र रखता है...और एक दिन मौका देखकर अपने दो साथियों के साथ उसकी अस्मत को तार-तार कर देता है...लड़की डर के मारे घर पर कुछ नहीं बताती...लेकिन कब तक...खुद तो मुंह सिल सकती थी, लेकिन पेट में आई नन्ही जान को कब तक छुपाती...आखिर पिता को बताना ही पड़ा कि किन तीन वहशियों ने उसके साथ दरिंदगी की थी...

ठेकेदार समेत तीनों आरोपियों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गई...लेकिन पैसे और रसूख के आगे बेचारी लड़की और उसके गरीब पिता की लड़ाई कहां तक चल पाती...मुकदमे के दौरान लड़की अपने बयान से पलट गई और तीनों आरोपी बरी हो गए...


यहां तक तो थी लड़की की कहानी...लेकिन लड़की ने जिस मासूम को जन्म दिया उसके साथ क्या हुआ ये जानकार किसी का भी कलेजा मुंह को आएगा...मासूम का नाना निगवानी पंचायत से उसका जन्म प्रमाण पत्र बनवाने गया तो ऐसा भद्दा मज़ाक किया गया जिसका दर्द बलात्कार से भी बड़ा है...बच्चे का जो जन्म प्रमाणपत्र जारी किया गया उसमें पिता के नाम के तौर उन तीनों लोगों का नाम लिख दिया गया, जिन पर बलात्कार का आरोप लगा था...

ये बेहूदगी करते हुए एक बार भी नहीं सोचा गया कि बच्चा बड़ा होगा तो उस पर क्या बीतेगी...जब पंचायत ऐसा कर सकती है तो दूसरे लोग भी उस बच्चे के बारे मे क्या क्या नहीं कहते होंगे...सात साल का मासूम अब दूसरी क्लास में पढ़ रहा है...औसत बच्चों से वो ज़्यादा होशियार है...अभी उन बातों को मतलब नहीं समझता होगा जो उसकी मां के साथ बीती...लेकिन जैसे जैसे ये बच्चा बड़ा होगा, समझने लायक होगा तो भावनात्मक रूप से उस पर क्या असर होगा, ये सोच कर ही दहल उठता हूं...


मुंशी प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर याद आ रही है...जिसे परमेश्वर कहा जाए क्या वो पंचायत किसी बच्चे को लेकर इतनी अंसवेदनशील भी हो सकती है...धिक्कार है ऐसी पंचायत पर, ऐसे समाज पर, जहां एक अबला और मासूम का ये हाल किया जाए...

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पठान का इंटरव्यू...खुशदीप


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शर्मिला के साथ ये क्या-क्या हो रहा है...खुशदीप


14 सितंबर को पोस्ट लिखी थी...क्या शर्मिला को प्रेम का हक नहीं...उस पोस्ट में मणिपुर में पिछले ग्यारह साल से आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट को हटाने की मांग को लेकर अनशन कर रही शर्मिला इरोम चानु की दुविधा का ज़िक्र किया था...दुविधा थी गोवा मूल के ब्रिटिश नागरिक डेसमंड कॉटिन्हो के प्रति शर्मिला के समर्थकों के व्यवहार को लेकर...शर्मिला इच्छा जता चुकी हैं कि अपने आंदोलन में सफलता मिलने के बाद वो डेसमंड से शादी करना चाहेंगी...इसी बाबत कोलकाता के एक अखबार में छपे शर्मिला के इंटरव्यू को लेकर मणिपुर में काफी उबाल भी रहा...खैर ये तो रही पुरानी बात...लेकिन अब जो शर्मिला को लेकर नई ख़बर सामने आई है, वो और भी हिलाने वाली है...



पिछले ग्यारह साल में पहली बार शर्मिला ने अपनी मां से मिलने की इच्छा जताई है...लेकिन शर्मिला की 78 वर्षीय मां शाखी देवी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया है...शाखी देवी का कहना है कि जब तक शर्मिला को एएफएसपीए कानून को हटाने के मिशन में सफलता नहीं मिल जाती, वो उससे नहीं मिलेंगी...उनकी दलील है कि मेरे शर्मिला के मिलने से उस पर भावनात्मक रूप से बुरा असर पड़ेगा और वो अपनी लड़ाई को लेकर कमज़ोर पड़ेंगी...मैं ऐसा होते नहीं देखना चाहती...शर्मिला ने जब 5 नवंबर 2000 को इम्फाल में अनशन शुरू किया था तो प्रण लिया था कि जब तक अनशन जारी रहेगा वो अपनी मां से नहीं मिलेंगी...

कुछ ही मीटर की दूरी पर रहने के बावजूद पिछले ग्यारह साल में सिर्फ एक मौका ऐसा आया है जब शर्मिला ने अपनी मां शाखी देवी को देखा, जब उन्हें 2009 में दमे के अटैक के बाद कोमा में आने पर इम्फाल के जवाहर लाल नेहरू अस्पताल में भर्ती कराया गया था...शर्मिला भी इसी अस्पताल में आत्महत्या की कोशिश के आरोप के चलते नज़रबंद हैं और यहीं उसे नाक से फीड कराया जा रहा है...शर्मिला के भाई इरोम संघजीत ने उस वाकये का ज़िक्र करते हुए बताया कि उसी दौरान शर्मिला को शक हुआ कि उसकी मां की मौत हो चुकी है...आधी रात को वो मां के वार्ड में जाकर उनके चेहरे के पास झुकीं तो मां चेतनावस्था मे थीं...मां ने शर्मिला को फौरन अपने कमरे में जाने का आदेश दिया...शर्मिला ने अपनी मां के आदेश का बिना कोई तर्क दिए पालन किया....मां ने उस वक्त कहा था...जब तुम अपने आंदोलन में सफल हो जाओ, उसी दिन मुझसे मिलने आना...मैं तुम्हारे घर लौट कर मेरे लिए खाना बनाने का इंतज़ार करूंगी...

अभी कुछ दिन पहले शर्मिला ने जस्ट पीस फाउंडेशन के मैनेजिंग ट्रस्टी आनंदी को भेजे संदेश में मां से मिलने की इच्छा जताई है...फाउंडेशन के सदस्यों और शर्मिला के भाई ने अब मणिपुर सरकार से शर्मिला के हाई सिक्योरिटी प्रिस्न वार्ड में जाकर मिलने के लिए इजाज़त मांगी है...शर्मिला के भाई भी पिछले दो-तीन साल से उससे मिलने से बच रहे हैं...शर्मिला के एक सहयोगी बबलू लोएटोन्गबाम का कहना है कि दुनिया से कट कर रह रही शर्मिला की ज़िंदगी में काफी कुछ हो रहा है....ऐसे में हम उससे मिलकर बहुत कुछ विचार करना चाहते हैं...अगर अनुमति मिली तो शर्मिला की मां को भी उससे मिलने के लिए तैयार होने को मनाने की कोशिश की जाएगी...

ये सब जानकर कोई भी अंदाज़ लगा सकता है कि शर्मिला इस वक्त मानसिक और भावनात्मक तौर पर कैसे अंतर्द्वन्द्व से गुज़र रही होंगी....ऐसे में यही प्रार्थना है कि शर्मिला की ज़िंदगी में जल्दी से जल्दी खुशियां और सुकून वापस आए और वो एक सामान्य इनसान की तरह दोबारा ज़िंदगी शुरू करें....
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राजे रजवाड़े न सही राजा, रेड्डी तो हैं...खुशदीप

कौन कहता है राजे-रजवाड़े चले गए...राजा और रेड्डी तो रह गए हैं...राजा दिल्ली की तिहाड़ जेल में है..रेडडी हैदराबाद की चंचलगुडा जेल में...राजा के टू जी ने कांग्रेस के दो जी यानि प्रणब जी और चिदंबरम जी को ऐसा उलझाया है कि पार्टी के साथ सरकार में भी भूकंप आया हुआ है...न सोनिया जी को कुछ सूझ रहा है और न ही मनमोहन जी को...मनमोहन जी को तो वैसे भी वही सूझता है जो 10, जनपथ से जो सुझवाया जाता है...

रेड्डी (बेल्लारी वाले जी जनार्दन रेड्डी) कनार्टक में मंत्री की कुर्सी छिनते ही पैदल क्या हुए कि सीबीआई लपक कर ले गई और आंध्र प्रदेश ले जा कर जेल में बंद कर दिया...इतनी गनीमत की, साथ में रेड्डी के साले श्रीनिवास रेड्डी को भी जेल में कंपनी देने के लिए बंद कर दिया...


जनार्दन रेड्डी भाई जी करुणाकरा रेड्डी और जी सोमाशेखर रेड्डी के साथ कभी सुषमा स्वराज जी को मां तुल्य बताते हुए उनके बड़े विश्वासपात्र हुआ करते थे...


लेकिन सुषमा जी कुछ महीने पहले ही इनसे पल्ला झाड़ चुकी हैं...सुषमा जी ने साथ ही अरुण जेटली जी पर ये आरोप और जड़ दिया था कि जानबूझकर रेड्डी बंधुओं को उनका नज़दीकी बताते हुए दुष्प्रचार किया जाता है...

खैर अब जनार्दन रेड्डी अंदर हैं और बीजेपी से सुध लेने वाला कोई नहीं है...जेल जाने से पहले जनार्दन रेड़्डी के क्या ठाठ थे, आप खुद ही नीचे दी तस्वीरों से अंदाज़ लगाइए...


बेल्लारी समेत ऐसी कई खदानें जिनसे निकले लौह अयस्क को रेड्डी भाईयों ने चीन जैसे देशों को अवैध निर्यात कर दस साल में पचास हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा कूटे...

रेड्डी के लिविंग रूम में चालीस करोड़ रुपये का हीरों का मुकुट

चालीस करोड़ रुपये का ऐसा ही मुकुट रेड्डी भाइयों ने तिरुपति मंदिर को भेंट चढ़ाया था...भगवान वेंकटेश्वर को मिली ये सबसे कीमती भेंट है

सीबीआई को रेड्डी के घर से पांच करोड़ रुपये की सोने की ऐसी ही कटलरी मिली

बेल्लारी में रेड्डी भाइयों के घर की कीमत 120 करोड़ रुपये आंकी गई है

रेड्डी भाइयों के निजी फ्लीट में पांच हेली़कॉप्टर हैं...ये बेल्लारी और बैंगलुरू के बीच लंच के लिए भी आने-जाने को
हेलीकॉप्टर का ही इस्तेमाल करते रहे हैं...

ये तस्वीरें देखने के बाद भी आप कहेंगे, राजे-रजवाड़ों का ज़माना चला गया...तमिलनाडु में राजा के घर की भी आपको कभी सैर कराने की कोशिश करुंगा...
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ये फोटो देखिए, देखते ही रह जाएंगे...खुशदीप





नेशनल जिओग्राफिक फोटोग्राफी कंटेस्ट 2010 के लिए 130 देशों से सोलह हज़ार प्रविष्टियां आईं थीं...जिनमें से एक फोटो को विनर घोषित किया गया...विनिंग फोटोग्राफ फिर कभी आपको दिखाऊंगा...कंटेस्ट में आए कई बेहतरीन फोटोग्राफ्स को नेशनल जिओग्राफिक ने प्रकाशित किया...ये पहला शेर का जो फोटो है...इसे नेशनल जिओग्राफिक ने ऑनरेबल मेंशन का टाइटल देते हुए विशेष रूप से सराहा...








लेकिन मेरा सबसे ज़्यादा ध्यान खींचा इन दो फोटोग्राफ्स ने...


Great Blue Heron with fish



Herring Gull with Guillemot Chick


इन्हें देखकर आपके ज़ेहन में क्या आता है...मुझे तो लगा ये भारत के आम आदमी की हालत है...आप क्या कहते हैं...
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वहम से हारा हकीम लुकमान...खुशदीप




मैं जब मेरठ में प्रिंट मीडिया में था तो मेरे साथ एक सज्जन काम करते थे...अच्छे रिपोर्टर-पत्रकार थे...लेकिन उनके अंदर न जाने कैसे ये वहम बैठ गया कि ऑफिस में हर शख्स उनके खिलाफ साज़िश में लगा हुआ है...उनकी योग्यता से जलता है, इसलिए उन्हें आगे न बढ़ने देने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं...अब उन जनाब को कौन समझाता, काम के दौरान हर एक की जान को इतने टंटे रहते हैं कि वो उन्हें भुगताए या किसी दूसरे की सोचता रहे...लेकिन नहीं साहब...वो कहते हैं न वहम का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं होता...यही हालत उन जनाब की थी...

कोई उन्हें कभी नेक सलाह देने की कोशिश भी करता तो उन्हें उसमें भी चाल नज़र आती...धीरे-धीरे वो जनाब अपनी ही दुनिया में ही सिमटते चले गए...हर कोई उनसे कतराने लगा...ये उनके लिए और भी घातक साबित हुआ...अब वो आफिस से बचने के लिए तरह-तरह के बहाने बना कर छुट्टी लेने लगे...जाहिर है इस सबसे उनके काम पर असर पड़ा...प्रोग्रेस रिपोर्ट खराब गई तो बुज़ुर्ग बास से खफ़ा हो गए कि जानबूझ कर उन्हें निशाना बनाया गया...

एक अच्छे खासे शख्स ने खुद को तमाशा बना लिया...हर जगह मुफ्त का तमाशा देखने वाले कुछ तमाशबीन भी होते हैं...ये तमाशबीन हमेशा उस बेचारे को ताड़ पर चढ़ाते रहते कि उसके जैसी कॉपी तो कोई लिख ही नहीं सकता...उसके जैसी नॉलेज किसी के पास नहीं है...धीरे-धीरे ये सारी परिस्थितियां इतनी हावी हो गई कि उन्होंने इस्तीफ़ा देने की ठान ली...बॉस समझदार थे, उन्होंने एडजस्ट करने की पूरी कोशिश की...यहां तक कहा कि इस्तीफा मत दो, चाहो तो लंबी छुट्टी पर चले जाओ...लेकिन वो कहां मानने वाले...इस्तीफा दे ही दिया...छोटा शहर था, उनके किस्से दूसरे अखबारों तक पहुंच गए थे...इसलिए जहां भी नौकरी के लिए गए, वहां ही हाथ जोड़ दिए गए...

हमारे बॉस ने उन्हें संदेश भी भिजवाया, लेकिन उन्होंने वापस आना हेकड़ी के खिलाफ समझा...इस बीच मैं भी मेरठ छोड़कर नोएडा सैटल हो गया...बाद में पता चला कि वो जनाब अपने मूल शहर लौट गए थे और अपने पुश्तैनी धंधे में ही घरवालों का हाथ बंटाने लगे ....लेकिन उनके इस एपिसोड से सीखने को बहुत मिला...

1. Respect yourself but never fall in love with you...

2. जिसे हम सही समझते है, हमेशा वही सही नहीं होता...

3. ताड़ पर चढ़ाने वाले प्रशंसकों से कहीं बेहतर हैं आइना दिखाने वाले आलोचक...

4. त्वरित प्रतिक्रिया से बचना चाहिए और बिना परखे किसी के बारे में धारणा नहीं बना लेनी चाहिए...

5. बुज़ुर्ग बॉस ने अपने बाल यूहीं धूप में सफेद नहीं किए थे...
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जलने पर रामबाण है अंडे का फंडा...खुशदीप


एक फॉर्म हाउस मालिक शाम के धुंधलके में अपने लॉन में कीटनाशकों का छिड़काव कर रहा था...ये देखने के लिए ड्रम में कितना कीटनाशक बाकी बचा है, उसने लाइटर की रोशनी में ढक्कन खोलकर झांकना चाहा...ड्रम से गैस का भभका निकला और फॉर्महाउस मालिक का चेहरा आग में झुलसने लगा..

.उसकी चीख-पुकार पड़ोस के घर में रहने वाली महिला ने भी सुनी...किचन की खिड़की से महिला ने फॉर्म हाउस मालिक की हालत देखी...उसने बिना वक्त गवाएं किचन से अंडों की ट्रे उठाई और बाहर भागी...फौरन उसने अंडों को तोड़-तोड़ कर पीला योक वाला हिस्सा अलग कर व्हाईट (एल्बुमिन) वाला पार्ट फॉर्महाउस मालिक के चेहरे पर लगाना शुरू कर दिया...

थोड़ी देर में वहां एंबुलेंस पहुंच गई...एंबुलेंस से बर्न स्पेशलिस्ट बाहर निकले तो उन्होंने फॉर्महाउस के मालिक पर एग व्हाईट मला देख कर पूछा कि ये किसने किया...सबने महिला की ओर इशारा किया...पूरी मेडिकल टीम ने महिला की सराहना करते हुए कहा कि उसकी प्रेसेंस ऑफ माइंड से फॉर्महाउस मालिक का चेहरा बिगड़ने से बच जाएगा...



कुछ हफ्ते अस्पताल में रहने के बाद फॉर्म हाउस मालिक ने घर वापस आने पर पहला काम पड़ोसी महिला के घर जाकर फूलों का गुलदस्ता दिया...फॉर्म हाउस मालिक के चेहरे की त्वचा किसी बच्चे की त्वचा की तरह ही मुलायम थी....

फायरमैन को भी फर्स्टएड के लिए पहला पाठ यही पढ़ाया जाता है कि आग से जले शरीर के हिस्से पर पहले खूब ठंडा पानी डाला जाए...जब त्वचा की परतें पर्याप्त ठंडी हो जाए तो जले हिस्से पर अंडे के व्हाइट का लेप कर दिया जाए...अंडे के व्हाईट हिस्से में कोलेजन (विटामिनों से भरा प्लासेंटा) होता है...यही कोलेजन कुछ ही दिन में जले हुए हिस्से की त्वचा को दोबारा विकसित करने में चमत्कारिक काम करता है...

(ई-मेल से मिली सूचना जनहित में प्रसारित)
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मैं इधर जाऊं या ऊधर जाऊं...खुशदीप

दांत मरोड़ू, तिनका तोड़ूं,

इस लड़के/लड़की से कभी न बोलूं...


कुट्टी पक्की वाली...अंगूठे को आगे के दो दांतों के नीचे ले जाकर किट की आवाज़ के साथ होने वाली कुट्टी...

ये सब याद कर चार दशक पहले मेरठ के न्यू मॉडल स्कूल की अपनी प्राइमरी क्लास में पहुंच गया हूं....यही सब होता था तब...अब पता नहीं प्राइमरी क्लासों में होता है या नहीं...अप्पा के लिए अपने अंगूठे को मुंह में डाल कर गोल गोल घुमाना...

तब कुट्टी और अप्पा के यूनिवर्सल सिगनेचर होते थे...किसी से कुट्टा हो जाती थी तो अपनी तरफ़ से
यही कोशिश रहती थी कि उस लड़के या लड़की से बाकी सारी क्लास के बच्चे भी कुट्टा कर दें...ऐसे में उन बच्चों के लिए बड़ी दिक्कत हो जाती थी जो दोनों ही तरफ के दोस्त होते थे...अब हमारे कहने से जो कुट्टा कर देता था वो अपना पक्का दोस्त और जो कुट्टा नहीं करता था वो दुश्मन से भी बड़ा दुश्मन...

जिस तरह राजनीति में स्थायी न कोई दोस्त होता है और न ही दुश्मन...इसी तरह ये कुट्टी और अप्पा का चक्कर भी होता है...कई बार ऐसा भी हुआ कि जिससे हमने पक्की कुट्टी की थी, बाद में उसी से अप्पा कर ली...लेकिन हमारे कहने पर दूसरे कुट्टी करने वाले फिर धर्मसंकट में पड़ जाते थे...उन्हें भी आखिर फिर पुरानी स्थिति में लौटना पड़ता था...

वैसे ये कुट्टी-अप्पा का सिद्धांत भी बीजगणित या एलज़ेब्रा के फॉर्मूलों पर चलता है...यहां माइनस और माइनस मिल कर प्लस हो जाते हैं...यानि दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त हो जाता है..और दुश्मन का दोस्त अपना दुश्मन हो जाता है...

खैर छोड़िए ये सब चक्कर...मेरा पसंदीदा गाना सुनिए...



मैं इधर जाऊं या ऊधर जाऊं,

बड़ी मुश्किल में हूं किधर जाऊं...

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वर्चुअल दुनिया में मोटी चमड़ी का होना ज़रूरी...खुशदीप



कल की पोस्ट से आगे...

Feeling cool today, dumped my girl-friend, Happy Independence day


फेसबुक पर अभिषेक धान का यही संदेश था जिसे मालिनी मुर्मु ने दिल पर लिया और फिर फंदा लगा कर जान दे दी...मालिनी के घरवालों को यकीन ही नहीं हो रहा कि आत्मविश्वास से भरी उनकी लाडली ऐसा कदम भी उठा सकती है...इसके लिए वो अभिषेक धान से उसके ब्रेक-अप और फिर फेसबुक पर शेखी से बखान करने को ज़िम्मेदार मान रहे हैं...बैंगलुरू पुलिस ने आईपीसी की धारा 306 के तहत अभिषेक के खिलाफ खुदकुशी के लिए उकसाने का मामला दर्ज ज़रूर कर लिया है...लेकिन क्या किसी के साथ नाता तोड़ने के बारे में फेसबुक पर लिखना अपराध है...ब्रेक-अप का फेसबुक पर बखान करना घोर निंदनीय तो है लेकिन अपराध नहीं है...यहां ये जानना भी अहम होगा कि फेसबुक पर अभिषेक के इस कमेंट को कितने लोगों ने माचो या प्लेब्वायिश मानते हुए लाइक किया होगा...

ये सच है कि शब्दों की मर्यादा का ध्यान न रखने वालों की भरमार ने सोशल नेटवर्क वेबसाइट्स को विषैला बना दिया है...फ्रैंड्स सर्किल का जिसे नाम दिया गया है वही सार्वजनिक अपमान के कोड़े बरसाने वाली सर्कस बन जाता है...अभिषेक धान ने मज़े लेते हुए तंज कसते हुए अपना स्टेटस अपडेट किया...अपनी गर्ल-फ्रैंड को डंप करने के लिए खुद की पीठ ठोंकने वाले अंदाज़ में...अभिषेक ये भी भूल गया कि मालिनी को बेशक उसने फ्रैंड मानना छोड़ दिया लेकिन फेसबुक पर वो अब भी उसकी फ्रैंड थी...उसके स्टेटस अपडेट को पढ़ सकती थी....वो फेसबुक जिसे मालिनी ने दुनिया को देखने का आइना बना रखा था...यहां वर्चुअल फेसबुक पर इतने फ्रैंड्स की मौजूदगी में जिस तरह अभिषेक ने शेखी बधारी...क्या वो रियल दुनिया में दोस्तों से भरे कमरे में मालिनी की मौजूदगी में ये हिमाकत कर सकता था...हर्गिज़ नहीं...

अपोलो अस्पताल के साइकाइट्रिस्ट डॉ संदीप वोहरा का कहना है कि पहले ब्रेक-अप होता था तो चार पांच लोगों के बीच की बात ही रहता था...लेकिन ऑनलाइन इसका ऐलान करने पर पढ़ने वाले सैकड़ो-हज़ारों में भी हो सकते हैं...इतने लोगों के बीच शर्मिंदगी का एहसास भावनात्मक तौर पर खतरनाक हो सकता है...डॉ वोरा के मुताबिक किशोरों के लिए आजकल रियल लाइफ और वर्चुअल लाइफ का भेद मिट गया है...यही वजह है कि पिछले पांच साल में इंटरनेट से जुड़े अवसाद को लेकर आने वाले मरीजों (ज्यादातर 15-25 आयु वर्ग) की संख्या काफी बढ़ी है...

सर गंगाराम अस्पताल के बाल और युवा मनोरोग स्पेशलिस्ट डॉ दीपक गुप्ता मानते हैं कि ऑनलाइन संवाद फेस टू फेस नहीं होता. इसलिए स्वभाव से दब्बू लोग तक सोचते हैं यहां जैसे चाहे वैसे भड़ास निकाली जा सकती है...ड़ा गुप्ता के मुताबिक पिछले दो तीन साल में ऐसी शिकायतें लेकर बहुत लोग आए कि नेट पर उनके खिलाफ दूसरों ने उलटा सीधा लिखा...किशोर या युवा वर्ग को सोशल नेटवर्क वेबसाइट पर कथित तौर पर बनी अपनी इमेज की बहुत चिंता रहती है...इसके लिए वो खुद को बढ़ा-चढ़ा कर भी पेश करते रहते हैं...यहां कूल फिनॉमिना भी बड़ा प्रचलन में है...कोई कितना कूल है ये उसके फेसबुक पर प्रोफाइल या फोटो से तय किया जाता है...भावनात्मक तौर पर टूटने का खतरा उनमें ज़्यादा हो जाता है जो परिवार से दूर हॉस्टल या कमरे लेकर अकेले रहते हैं और नेट पर दोस्ती और रिश्तों को ही अपना सब कुछ मान लेते हैं...

ज़्यादा अर्सा नहीं बीता जब अमेरिका के न्यू जर्सी में धारून रवि नाम के एक किशोर ने अपने कालेज के रूममेट के गे-रिलेशन का वीडियो नेट पर डाल दिया था...लोग चटकारे ले ले कर देखने लगे...नतीजा ये हुआ रूममेट ने फेसबुक पर संदेश छोड़कर पुल से कूद कर जान दे दी... अमेरिका के ही मिसौरी में रहने वाली तेरह वर्षीय मेगन मायर ने इसलिए खुदकुशी कर ली क्योंकि उसके ओवरवेट होने का माईस्पेस पर मज़ाक उड़ाने वाले संदेशों की भरमार लग गई थी...

मालिनी मुर्मु के मामले में अभिषेक धान और फेसबुक को दोष देना आसान है लेकिन सवाल उससे कहीं बड़ा है...सोशल नेटवर्क को हम किस तरह इस्तेमाल करते हैं और कैसे अपने को इस्तेमाल होने देते हैं...हम ये भूल जाते हैं कि ट्विटर, फेसबुक या ब्लॉग पर ही कुछ लिखना ठीक वैसे ही है जैसे लोगों से भरे किसी कमरे के बीच ज़ोर से कोई बात कहते हैं...अपमैनशिप का कीड़ा हम जैसे आम लोगों में ही नहीं बड़ी हस्तियों में भी होता है...

ट्विटर पर सलमान रश्दी और तसलीन नसरीन की भिड़ंत अक्सर होती रहती है...पेश है उसी की एक बानगी...

तसलीमा नसरीन ने ट्विट किया...

"Be aware of Salman Rushdie! He wants to get girls in his 'whipped cream' range"

उसका जवाब सलमान रश्दी ने इस तरह दिया...

"Somewhere in the distance I hear the envious miaow of # Taslima-Nasrin being catty about me..Tut, tut, Taslima # Shame # Lajja."


निष्कर्ष यही है कि सोशल नेटवर्क वेबसाइट्स या ब्लॉगिंग में लंबी पारी खेलने के लिए भावनात्मक रूप से मज़बूत होना यानि मोटी चमड़ी का होना ज़रूरी है...

(Firstpost पर Sudip Roy और TOI में Arpita Nath और  Sakshi Budhraja के इनपुट्स के साथ)
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फेसबुक पर कमेंट ने ली जान...खुशदीप




मालिनी मुर्मु...झारखंड के जमशेदपुर की होनहार मालिनी को मां-बाप ने बड़े अरमानों से आईआईएम बैंगलुरू में एमबीए की पढ़ाई के लिए भेजा था...आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में दाखिला मिलने से मालिनी ने न सिर्फ घरवालों का बल्कि अपने पूरे आदिवासी समुदाय का मान बढ़ाया था....इससे पहले वो बीटेक पूरी करने के बाद कुछ वक्त के लिए इन्फोसिस जैसी कंपनी में काम भी कर चुकी थी...लेकिन 22 वर्षीय मालिनी के घरवालों को क्या पता था कि जिस बेटी को डोली में विदा करने के सपने उन्होंने संजोए थे, उसी लाडली की अर्थी बुधवार को कंधे पर उठानी पड़ेगी...



मालिनी ने सोमवार को बैंगलुरू में हॉस्टल के कमरे में फंदा लगा कर जान दे दी...किस लिए खुदकुशी की...फेसबुक पर बाय-फ्रैंड के एक कमेंट की वजह से...जी हां, एक कमेंट की वजह से...पुलिस की जांच से पता चला है कि मालिनी की बाय-फ्रैंड अभिषेक धान से कुछ कहा सुनी हुई थी...इसके बाद अभिषेक ने फेसबुक पर कमेंट दिया कि उसने गर्ल-फ्रैंड से नाता तोड़ लिया है और अब वो आज़ादी का दिन मना रहा है...इसे पढ़कर मालिनी इतनी आहत हुई कि उसे सारी दुनिया ही बेमानी नज़र आने लगी...उसने खुदकुशी से पहले फेसबुक पर लिखा भी कि वो बॉय-फ्रेंड के कमेंट से हुई जिल्लत बर्दाश्त नहीं कर सकती और इस वजह से ही जान दे रही है....



मालिनी ने कमरा बंद कर गले में फंदा डालकर जान दे दी...मालिनी के पिता भारत पेट्रोलियम कारपोरेशन में अधिकारी हैं और मामा रमेश हंसदा झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रवक्ता हैं....मालिनी के घरवालों का कहना है कि उनकी बेटी को खुदकुशी के लिए उकसाने वाले अभिषेक को कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए...बैंगलुरू पुलिस अभिषेक के खिलाफ धारा  306 के तहत (खुदकुशी के लिए उकसाने का) मामला दर्ज़ कर तफ्तीश कर रही है....ये तो थी मालिनी की मार्मिक कहानी...

मालिनी को ब्रेक-अप का दुख तो था ही उससे ज़्यादा वो आहत थी ऑनलाइन पर अपनी रुसवाई के डर से...क्या सोचेंगे उसके बारे में फेसबुक पर फ्रैंडसर्किल में जुड़े सभी लोग...आज की पोस्ट में इतना ही...कल बात करूंगा सोशल नेटवर्क वेबसाइट के इन खतरों पर साइकाइट्रिस्ट की क्या राय है...कैसे लोग इन साइट्स या ब्लॉग पर आए विपरीत कमेंट्स को दिल पर लगा लेते हैं...कैसे महानगरों और शहरों मे बच्चे और किशोर इस वर्चुअल दुनिया के गुलाम बनकर मनोरोगों का शिकार होते जा रहे हैं...
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यू कांट इग्नोर नरेंद्र मोदी...खुशदीप



नरेंद्र मोदी...लव हिम ओर हेट हिम, बट यू कांट इग्नोर हिम...ये ही मोदी की राजनीति का मंत्र है...अगर कोई मोदी से हेट करता है तो वो उसे भी गुजरात में अपने लिए प्लसपाइंट बना लेते हैं...किस की पगड़ी पहननी है और किस की टोपी नहीं पहननी, मोदी अच्छी तरह जानते हैं...मोदी की ये चतुराई ही है कि गुजरात के विकास को उन्होंने अपना पर्यायवाची बना दिया है...जैसे गुजरात में मोदी के आने से पहले विकास कभी हुआ ही नहीं...क्या मोदी के आने से पहले गुजराती उद्यमी नहीं थे...क्या मोदी से पहले दुनिया भर के देशों में जाकर गुजरातियों ने अपनी मेहनत से नाम नहीं कमाया...अगर मोदी गुजरात के विकास के लिए बार-बार अपनी ही पीठ ठोकते हैं तो ये गुजरात के छह करोड़ लोगों का मान है या अपमान, सवाल पेचीदा है...लेकिन मोदी में एक खूबी तो है, चर्चा में मीडिया उन्हें बनाए रखता है...वो बयान न भी दें तो दूसरे के बयानों में उनका नाम सुर्खियां बटोर लेता है...मसलन मंगलवार का सियासी घटनाक्रम...उसी पर है ये तुकबंदी...




मेरा भारत महान, मेरा भारत महान
नित देखे सियासत के नए-नए जहान


महबूबा ने किया था मोदी का गुणगान
सुषमा के इस दावे पर हो गया घमासान,
महबूबा साफ़ मुकरीं, सुषमा उखड़ीं,
बाज़ न आए उमर, ले ली चुटकी,
कहना मुश्किल महबूबा-सुषमा में कौन सच्चीं,
ऐसे में एनआईसी रिकार्डिंग देखने की हमने ली ठान,
मेरा भारत महान, मेरा भारत महान,
नित देखे सियासत के नए-नए जहान...


राज ठाकरे बखार रहे हैं मोदी की शान,
ये देख सूख रहे हैं उद्धव ठाकरे के प्राण,
दांव पर लग गई है दोनों भाइयों की आन,
राज ने गुजरात जा उद्धव पर चलाया कोड़ा,
फोटोग्राफ़ी के शौक को मुंबई के गड्ढ़ों से जोड़ा,
उद्धव ने जानवर कह राज का किया अपमान,
मेरा भारत महान, मेरा भारत महान,
नित देखे सियासत के नए-नए जहान...


यात्राओं का मौसम चढ़ रहा देश में परवान,
अब ज़िले ज़िले जाएंगे मोदी चतुर सुजान,
रामदेव बाबा निकाल रहे यात्रा स्वाभिमान,
आडवाणी की तो रथ-यात्रा बन गई पहचान,
सेवा यात्रा निकालेंगे नीतीश बनने को बलवान,
अखिलेश यादव, अजित की यात्राएं रह गईं अनजान,
मीडिया को सेट न रखने का हो रहा नुकसान,
मेरा भारत महान, मेरा भारत महान,
नित देखे सियासत के नए-नए जहान...
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पाबला डे की आप सब को बहुत बहुत बधाई...खुशदीप



हरदिलअजीज बी एस पाबला जी का जन्मदिन मैंने खोजी पत्रकारिता के ज़रिए पता कराया था...इस ब्लॉगयोगी ने 21सितंबर को दुनिया में जन्म लिया...मैंने पिछले साल प्रस्ताव किया था कि 21 सितंबर को हर साल ब्लॉगजगत में पाबला डे के तौर पर मनाया जाए...इसलिए आप सभी को पाबला डे की बहुत बहुत बधाई....

खुशी जन्मदिन की हो या वैवाहिक वर्षगांठ की, सबसे पहले सूचना पाबला जी से ही मिलती है...पिछले साल मेरी वैवाहिक वर्षगांठ या जन्मदिन पर जितनी बधाईयां मिली थीं, उससे पहले किसी साल में नहीं मिली थी...सिर्फ पाबला जी के ब्लॉग की मेहरबानी से...

मुझे पिछले साल ताज्जुब इस बात पर भी हुआ था कि मैंने कभी उन्हें नहीं बताया था कि मेरी वैवाहिक वर्षगांठ कब है लेकिन 17 अक्टूबर की पूर्वसंध्या पर ही उन्होंने मुझे फोन पर बधाई दी तो मैंने उनसे पूछा भी था कि आपको कैसे पता चला...लेकिन उन्होंने नहीं बताया....ठीक वैसे ही जैसे हम पत्रकार कभी अपने सोर्स का खुलासा नहीं करते...पाबलाजी वाकई वो ब्लॉगयोगी हैं जिन्होंने इस विधा को वर्चुएल्टी से निकालकर रिएल्टी में बदला है...

सब की खुशियों को याद रखने वाले पाबला जी बस अपने जन्मदिन या वैवाहिक वर्षगांठ पर पोस्ट नहीं लगाते...पाबला जी को पूरे ब्लॉगजगत की ओर से एक गीत समर्पित है....

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Love or Hate, but you can't ignore Modi...Khushdeep



नरेंद्र मोदी...लव हिम ओर हेट हिम, बट यू कांट इग्नोर हिम...ये ही मोदी की राजनीति का मंत्र है...अगर कोई मोदी से हेट करता है तो वो उसे भी गुजरात में अपने लिए प्लसपाइंट बना लेते हैं...किस की पगड़ी पहननी है और किस की टोपी नहीं पहननी, मोदी अच्छी तरह जानते हैं...मोदी की ये चतुराई ही है कि गुजरात के विकास को उन्होंने अपना पर्यायवाची बना दिया है...जैसे गुजरात में मोदी के आने से पहले विकास कभी हुआ ही नहीं...क्या मोदी के आने से पहले गुजराती उद्यमी नहीं थे...क्या मोदी से पहले दुनिया भर के देशों में जाकर गुजरातियों ने अपनी मेहनत से नाम नहीं कमाया...अगर मोदी गुजरात के विकास के लिए बार-बार अपनी ही पीठ ठोकते हैं तो ये गुजरात के छह करोड़ लोगों का मान है या अपमान, सवाल पेचीदा है...लेकिन मोदी में एक खूबी तो है, चर्चा में मीडिया उन्हें बनाए रखता है...वो बयान न भी दें तो दूसरे के बयानों में उनका नाम सुर्खियां बटोर लेता है...मसलन मंगलवार का सियासी घटनाक्रम...उसी पर है ये तुकबंदी...

मेरा भारत महान, मेरा भारत महान
नित देखे सियासत के नए-नए जहान

महबूबा ने किया था मोदी का गुणगान
सुषमा के इस दावे पर हो गया घमासान,
महबूबा साफ़ मुकरीं, सुषमा उखड़ीं,
बाज़ न आए उमर, ले ली चुटकी,
कहना मुश्किल महबूबा-सुषमा में कौन सच्चीं,
ऐसे में एनआईसी रिकार्डिंग देखने की हमने ली ठान,
मेरा भारत महान, मेरा भारत महान,
नित देखे सियासत के नए-नए जहान...


राज ठाकरे बखार रहे हैं मोदी की शान,
ये देख सूख रहे हैं उद्धव ठाकरे के प्राण,
दांव पर लग गई है दोनों भाइयों की आन,
राज ने गुजरात जा उद्धव पर चलाया कोड़ा,
फोटोग्राफ़ी के शौक को मुंबई के गड्ढ़ों से जोड़ा,
उद्धव ने जानवर कह राज का किया अपमान,
मेरा भारत महान, मेरा भारत महान,
नित देखे सियासत के नए-नए जहान...


यात्राओं का मौसम चढ़ रहा देश में परवान,
अब ज़िले ज़िले जाएंगे मोदी चतुर सुजान,
रामदेव बाबा निकाल रहे यात्रा स्वाभिमान,
आडवाणी की तो रथ-यात्रा बन गई पहचान,
सेवा यात्रा निकालेंगे नीतीश बनने को बलवान,
अखिलेश यादव, अजित की यात्राएं रह गईं अनजान,
मीडिया को सेट न रखने का हो रहा नुकसान,
मेरा भारत महान, मेरा भारत महान,
नित देखे सियासत के नए-नए जहान...
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अविश्वसनीय लेकिन है सच सरासर सच...खुशदीप

चलिए आज आपको इटली के एक बांध डिगा डेल सिंगिनो पर लेकर चलता हूं...


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पहले इस तस्वीर को गौर से देखिए...पानी के नीचे दिखने वाली बांध की दीवार पर कुछ काले-काले धब्बे नज़र आ रहे हैं...




क्या कुछ समझ नहीं आया....चलिए थोड़ा ज़ूम कर देखिए...



अब ये धब्बे साफ़ नज़र आ गए होंगे...लेकिन ये हैं क्या भला...चलिए कुछ और ज़ूम करते हैं...






जी हां ये हिरण (या हिरण जैसे प्राणी) सपाट दीवार पर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं...और कुछ बड़ा कर देखिए...अब तो विश्वास हो रहा होगा....






क्या बात है भाई....ऐसे गौर से क्या देख रहे हो...



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चक्रवर्ती सम्राट नरेंद्र मोदी और परछाइयां...खुशदीप




...और मोदीत्व को प्राप्त हुई बीजेपी...उपवास के मंच पर नरेंद्र मोदी...गुजरात का फलक छोटा हो गया है...चक्रवर्ती सम्राट के कद के लिए अब पूरे भारत का कैनवास चाहिए...मोदी का दमकता चेहरा...सब कुछ कहती बॉडी लैंग्वेज़...तालियां पीटते बीजेपी के दिग्गज नेता...मुंह से मोदी की शान में कसीदे पढ़ते और खुद के बौने होने के अहसास से मन ही मन कुढ़ते...मोदी का ये आयोजन कांग्रेस से ज़्यादा बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दूसरे दावेदारों को अपने सारे मुगालते साफ़ कर देने के लिए है...मोदी इसमें कामयाब भी हुए...

लेकिन मोदी जी, एक सवाल आपके चिंतन के लिए...बीजेपी से सिर्फ अटल बिहारी वाजपेयी ही प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने में कामयाब क्यों रहे...परमानेंट पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी की सबसे बड़ी मुराद इस देश में क्यों नहीं पूरी हो सकती...

आज पूरे दिन उपवास के उपहास को देखा तो हाल में ब्लॉग पर पढ़ी युवा कवि नीरज कुमार की ये कविता खुद-ब-खुद याद आ गई...


परछाइयां


रात काली, ख्वाब काले, भागतीं परछाइयां,
मौत का है जश्न सारा, नाचतीं परछाइयां...

हुस्न खुदा के नूर का जिस्म में दिखता नहीं,
चीर सीना जो दिखाया, झाँकतीं परछाइयां...


जो दुआ में हम खुदा से मांगते इंसानियत,
तो हमारे हाथ आतीं झेपतीं परछाइयां...


चाँद तारे साज सरगम खो गए ऐ जिंदगी,
दिन दहाड़े आसमां को घेरती परछाइयां...


सुनहरे थे हाथ जिनके कब्र में तनहा पड़े,
आदमी का भ्रम सारा तोड़तीं परछाइयां...


क्यों नगाड़े बज रहे हैं आज भी संसार में,
क्यों हमारी भूख को है हांकती परछाइयां...
 
-नीरज कुमार
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मछली जल दी रानी वे...खुशदीप



मक्खनी को मक्खन से बड़ी शिकायत थी कि वो बेटे गुल्ली की पढ़ाई पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता...

कई दिन ताने सुनने के बाद मक्खन परेशान हो गया...

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आखिर एक दिन तंग आकर उसने कहा...चल आज मैं पढ़ाता हूं...

गुल्ली से पूछा...बोल पुतर, क्या पढ़ेगा...

गुल्ली बोला...डैडी जी हिंदी कविता का कल टेस्ट है, वही पढ़ा दो...

मक्खन ने कहा...इसमें कौन सी बड़ी बात है...बता कौन सी कविता याद करनी है...

गुल्ली...डैडी जी मछली वाली...

मक्खन...चल बोल मेरे साथ... मछली जल दी रानी वे...

गुल्ली...मछली जल दी रानी वे...

आगे मक्खन भूल गया...लेकिन पत्नी-बेटे के सामने किसी कीमत पर शर्मिंदा नहीं होना चाहता था...अपने आप ही कविता बनानी शुरू की...

मछली जल दी रानी वे...

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राती शराब नाल तल के खानी वे...





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क्या शर्मिला इरोम को प्रेम का हक़ नहीं...खुशदीप



मणिपुर में शर्मिला इरोम चानु को लेकर नई बहस छिड़ी है...दरअसल कोलकाता के एक अंग्रेज़ी समाचार पत्र में छपे शर्मिला के एक इंटरव्यू को लेकर शर्मिला के समर्थकों में उबाल है...आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट को हटाने की मांग को लेकर दो नवंबर 2000 से भूख हड़ताल कर रही शर्मिला ने कुछ पत्रकारों के सामने कबूल किया था कि उन्हें गोवा मूल के एक ब्रिटिश नागरिक से प्रेम रहा है, लेकिन उनके समर्थकों को ये पसंद नहीं आया और उन्होंने ब्रिटिश नागरिक से कड़वा बर्ताव किया...

कोलकाता के जिस समाचारपत्र ने ये इंटरव्यू छापा उसे मणिपुर के प्रभावशाली अपुनबा लुप ने राज्य में बैन कर दिया है...अपुनबा लुप तेरह प्रमुख सिविल सोसायटी संगठनों का गठबंधन है...इस गठबंधन का कहना है कि इंटरव्यू सरकार की साज़िश के तहत छपवाया गया है जिससे कि शर्मिला के आंदोलन और निरकुंश आर्म्ड फोर्सज स्पेशल पावर एक्ट से लोगों का ध्यान हटाया जा सके...

39 वर्षीय शर्मिला ने इम्फाल के तुलीहाल एयरपोर्ट पर एक नवंबर 2000 की घटना के बाद इस एक्ट को हटाने की मांग को लेकर अनशन शुरू किया था...उस दिन असम राइफल्स ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग की थी जिसमें दस लोग मारे गए और दर्जनों घायल हुए थे...तब से वो एक अस्पताल में नज़रबंदी की स्थिति में हैं और उन्हें नाक से ही फीड दिया जा रहा है...शर्मिला का अनशन अपने आप में विश्व का सबसे लंबा चलने वाला इस तरह का आंदोलन है...

डेसमंड कॉटिन्हो


अखबार के मुताबिक शर्मिला ने इंटरव्यू में 48 वर्षीय डेसमंड कॉटिन्हो के लिए अपने दिल में साफ्ट कार्नर के बारे में बताया...लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता डेसमंड और शर्मिला के बीच पिछले एक साल से खत लिखने का सिलसिला चल रहा था लेकिन दोनों की पहली बार मुलाकात इस साल नौ मार्च को तब हुई जब शर्मिला को एक स्थानीय अदालत में पेश किया गया था...खत लिखने के दौरान ही डेसमंड ने शर्मिला को प्रपोज़ किया था जिसे शर्मिला ने कबूल कर लिया...डेसमंड ने शर्मिला को एक एप्पल मैक्बुक भी तोहफ़े में दिया...

अखबार के मुताबिक शर्मिला ने कहा कि उनके समर्थक नहीं चाहते कि वो शादी करें...हालांकि शर्मिला ने साफ किया है कि वो शादी तब तक नहीं करेंगी जब तक वो आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट को हटाने के अपने मिशन में कामयाब नहीं हो जाती...शर्मिला ने ये भी कहा कि डेसमंड इसी साल फरवरी में इम्फाल में मिलने आए थे लेकिन इसके लिए उन्हें कई दिनों तक लंबा इंतज़ार करना पड़ा...

शर्मिला की इस कहानी को पढ़ने के बाद कई सवाल जेहन में कौंधने लगे...पहला सवाल क्या वाकई सरकार ने शर्मिला के आंदोलन को पलीता लगाने के लिए अखबार के साथ मिलकर ये इंटरव्यू छपवाया, जैसे कि अपुनबा लुप कह रहा है तो वाकई ये बहुत शर्मनाक बात है और अखबार का मणिपुर ही नहीं सब जगह पर सिविल बैन कर दिया जाना चाहिए...सिक्के के दूसरी तरफ देखें कि अगर अखबार की बातों में सच्चाई है और शर्मिला को वाकई डेसमंड से प्रेम है तो शर्मिला के समर्थक जैसा बर्ताव डेसमंड के साथ कर रहे हैं, क्या उसे जायज़ करार दिया जाएगा..क्या शर्मिला को प्रेम या शादी का अधिकार नहीं है...अखबार के मुताबिक शर्मिला ने साफ किया ही है कि वो आंदोलन में कामयाबी के बाद ही शादी करेंगी...आंदोलन अपनी जगह है मानवीय संवेदनाएं अपनी जगह...मकसद कितना भी बड़ा और पवित्र क्यों न हो लेकिन क्या उसके लिए किसी व्यक्ति को बंधक की तरह मोहरा बना लेना सही है...क्या ऐसा नहीं हो सकता कि डेसमंड का भावनात्मक साथ मिलने के बाद शर्मिला को अपने आंदोलन के लिए दुगनी शक्ति और ऊर्जा मिले...अगर शर्मिला को लेकर अखबार के दावे सही हैं तो कम से कम मुझे शर्मिला के समर्थकों का व्यवहार सही नहीं लग रहा...आप क्या कहते हैं...

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Salute to "The Lady"...Khushdeep


मक्खनी ने पूछा मक्खन से...खुशदीप



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दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अंखियां प्यासी रे...खुशदीप

गोपाल दास नेपाली ने ये भजन 1957 में फिल्म नरसी भगत के लिए लिखा था...अक्सर इस भजन को सूरदास से जोड़ दिया जाता है...फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर्स में भी यही गलती की गई थी...दरअसल मैंने ये देखा है कि हमारे देश में दृष्टिहीनता को सूरदास का पर्याय मानकर उदाहरण दिए जाते है...सूरदास स्वयं दृष्टिहीन थे शायद इसी चक्कर में स्लमडॉग में ये गलती की गई और गोपाल दास नेपाली को भजन का क्रेडिट देने में चूक हो गई...

खैर ये तो रही भजन की बात...आज इस पोस्ट को लिखने का मेरा मकसद दूसरा है...पहले कुछ आंकड़ों पर नज़र डालिए...

भारत की आबादी...एक अरब, बीस करोड़

हर दिन भारत में मौत...62389

हर दिन भारत में जन्म...86853

भारत में दृष्टिहीन....682497

अगर भारत में मृत्यु के बाद नेत्रदान का सभी संकल्प लें तो देश में ग्यारह दिन में ही होने वाली मौतों से सभी दृष्टिहीनों को इस खूबसूरत दुनिया को देखने के लिए रौशनी का सवेरा मिल जाएगा...


मैंने 20 फरवरी 2010 को ये बोधकथा पोस्ट की थी...आज की पोस्ट के संदर्भ में उसका खुद ही स्मरण हो गया...

एक दृष्टिहीन लड़का सुबह एक पार्क में अपनी टोपी पैरों के पास लेकर बैठा हुआ था...उसने साथ ही एक साइनबोर्ड पर लिख रखा था...मेरी आंखों में रौशनी नहीं है, कृपया मदद कीजिए...टोपी में कुछ सिक्के पड़े हुए थे...




तभी एक दयालु सज्जन लड़के के पास से गुज़रे..वो दो मिनट तक चुपचाप वहीं खड़े रहे...फिर अपनी जेब से कुछ सिक्के निकाल कर लड़के की टोपी में डाल दिए...इसके बाद उस सज्जन को न जाने क्या सूझी...उन्होंने लड़के का साइनबोर्ड लिया और उसके पीछे कुछ लिखा और उलटा करके लगा दिया...फिर वो सज्जन अपने ऑफिस की ओर चल दिए...इसके बाद जो भी पार्क में लड़के के पास से गुज़रते हुए उस बोर्ड को पढ़ता, टोपी में सिक्के या नोट डाल कर ही आगे बढ़ता...


जिस सज्जन ने साइनबोर्ड को उलट कर कुछ लिखा था, दोपहर बाद वो फिर पार्क के पास से निकले...सज्जन ने सोचा देखूं तो सही लड़के की लोगों ने कितनी मदद की है...लड़के की टोपी तो सिक्के-नोटों से भर ही गई थी...बाहर भी कुछ सिक्के गिरे हुए थे...वो सज्जन फिर दो मिनट लड़के के पास जाकर खड़े हो गए...बिना कुछ बोले...तभी उस लड़के ने कहा...आप वही सज्जन हैं न जो सुबह मेरा साइनबोर्ड उलट कर कुछ लिख गए थे...


ये सुनकर चौंकने की बारी सज्जन की थी कि बिना आंखों के ही इसने कैसे पहचान लिया...लड़के ने फिर पूछा कि आपने आखिर उस पर लिखा क्या था...सज्जन बोले...मैने सच ही लिखा था...बस तुम्हारे शब्दों को मैंने दूसरे अंदाज़ में लिख दिया था कि आज का दिन बहुत खूबसूरत है, लेकिन मैं इसे देख नहीं सकता...


साइनबोर्ड के दोनों साइड पर जो लिखा गया था उससे साफ़ था कि लड़का दृष्टिहीन है...लेकिन लड़के ने जो लिखा था, वो बस यही बताता था कि वो देख नहीं सकता...लेकिन सज्जन ने जो लिखा, उसका भाव था कि आप कितने सौभाग्यशाली हैं कि दुनिया को देख सकते हैं...

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अतुलनीय स्मृति सँचयन...डॉ अमर (साभार डॉ अनुराग आर्य)


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दिल्ली भूकंप के बड़े झटके के लिए कितनी तैयार...खुशदीप

सात सितंबर की रात 11 बजकर 28 मिनट पर भूकंप ने दिल्ली को हिलाया...4.2 तीव्रता वाले इस भूकंप का केंद्र हरियाणा के सोनीपत के पास था...भूकंप के लिहाज़ से खतरनाक माने जाने वाले दिल्ली और आसपास के इलाके में अगर सात या आसपास की तीव्रता वाला भूकंप आया तो क्या होगा...ये सवाल ही खुद में कंपा देने वाला है...दिल्ली में जिस तरह की इमारतें बनी हैं, उसमें साठ फीसदी से ज़्यादा इमारते भूकंप का बड़ा झटका नहीं झेल सकतीं...ऐसे में दिल्ली की एक करोड़ साठ लाख से ज़्यादा आबादी कितनी महफूज़़ है, खुद ही सोचा जा सकता है...


यहां दो मिसाल देना चाहूंगा...

जापान ने इस साल 11 मार्च को भूकंप और सुनामी की जो मार झेली थी, उसके भयावह दृश्य आज भी ज़ेहन में कौंधते हैं तो पूरे शरीर में सिहरन दौड़ जाती है...जापान का ये भूकंप 8.9 तीव्रता का था...लेकिन जापान जापान है...1945 में परमाणु हमले की मार के बाद विश्व आर्थिक शक्ति के तौर पर उभरे जापान ने एक बार फिर दिखाया कि उसके लोग किस मिट्टी के बने हैं...बिना विश्व की खास मदद लिए जापान ने इस आपदा से पार पाने के लिए दिन-रात एक कर दिया...जिन सड़कों को भूकंप और सुनामी निगल चुके थे, उसे जापान ने एक महीने में ही दोबारा तैयार कर दिखा दिया कि उसके हौसलों को कुदरत का कहर भी नहीं तोड़ सकता...




अब आपको दिल्ली की तस्वीर दिखाता हूं...

इसी साल 18 जुलाई को दिल्ली के दिलशाद गार्डन में एक निर्माणाधीन बहुमंज़िली इमारत इस लिए गिर गई क्योंकि उसका लालची मालिक नाम मात्र के सीमेंट से बिना ठोस बुनियाद रेत का ही महल खड़ा किए जा रहा था...इसी तरह दिल्ली के ललिता पार्क इलाके में पिछले साल 15 नवंबर को एक इमारत पांचवी मंज़िल का बोझ नहीं सह पाई और ताश के पत्तों की तरह नीचे आ गिरी...नतीजा 67 लोगों की मौत हो गई...मरने वाले मजदूर तबके के थे, इसलिए खास हायतौबा नहीं मची...अधिकारियों-इंजीनियरों को घूस देकर किसी भी तरह का निर्माण करना कोई ज़्यादा मुश्किल बात नहीं है...






यमुना बेड पर ही अक्षरधाम जैसे मंदिर, कॉमनवेल्थ गेम्स विलेज, बहुमंजिली इमारतों को खड़ी करने की धड़ल्ले से अनुमति दे दी जाती है...बिना ये सोचे कि यमुना के आसपास की ज़मीन को छेड़ना भूकंप के लिहाज़ से कितना खतरनाक है...दिल्ली सिस्मिक ज़ोन चार में आता है...दुनिया में भूकंप के लिहाज़ा से सबसे खतरनाक इलाकों को सिस्मिक ज़ोन पांच में रखा जाता है...यानि दिल्ली सिर्फ एक पायदान ही नीचे है...दिल्ली जिस इलाके में आती है, उसकी ज़मीन हर महीने छह से आठ बार हिलती है...हालांकि इनकी तीव्रता कम ही होती है...इसी साल दिल्ली में भूकंप के कई छोटे-बड़े झटके आ चुके हैं...

दिल्ली को ख़तरा एक तरफ़ से नहीं तीन तरफ़ से है...जानकारों के मुताबिक दिल्ली भूकंप के तीस से चालीस एपीसेंटरों की जद में आता है...तीन-तीन फॉल्ट लाइन पर बसी दिल्ली में अगर किसी भी फॉल्ट लाइन पर हलचल होती है तो उसका कंपन महसूस किया जाता है...दिल्ली पर सबसे बड़ा ख़तरा मुरादाबाद फॉल्ट लाइन से है...ये काफ़ी अर्से से शांत है...लेकिन जानकारों का कहना है कि इस लाइन में छोटा सा भी बदलाव पूरे इलाके में भारी तबाही ला सकता है...

दिल्ली के लिए दूसरा खतरा मथुरा फॉल्ट लाइन है...यहां पहले भी कई कंपन पैदा हो चुके हैं...दिल्ली के लिए तीसरा खतरा सोहना फॉल्टलाइन से है...भूगर्भ शास्त्रियों का मानना है कि जहां टेक्टॉनिक प्लेट्स होती है वहां भूकंप का खतरा ज़्यादा रहता है...टेक्टॉनिक प्लेट्स के एक दूसरे पर खाली जगह में फ्लोट करने की जगह जब ये प्लेट एक दूसरे के ठीक सामने आ जाती हैं तो दोनों तरफ से बल लगने पर तनाव उत्पन्न होता है...यही तनाव भूकंप की शक्ल में धरती को हिला देता है...

अब सवाल ये उठता है कि  दिल्ली भूकंप के बड़े झटके की मार सहने के लिए कितना तैयार है...क्या हमारे पास जापान जैसा कारगर आपदा प्रबंधन है...क्या हमारी सरकार के पास ऐसी कोई आपात योजना है...यहां सरकार किस तरह काम करती है वो हमने दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर हुए धमाके में देख ही लिया है...25 मई को आतंकवादियों ने दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर धमाके की रिहर्सल की और फिर करीब साढ़े तीन महीने बाद तबाही को हकीकत में अंजाम दिया...हमने या हमारी सरकार ने इन साढ़े तीन महीने में क्या किया...सीसीटीवी कैमरे तक नहीं लगवाए जा सके...सवाल यही है कि जिस खतरे का पता होने के बावजूद हम तेरह निर्दोष लोगों की कीमती जानों को नहीं बचा सके...ऐसे में अगर कुदरत ने बिना कोई दस्तक दिए अपनी नज़र तिरछी की तो कैसा मंज़र होगा, ये आप खुद ही अंदाज़ लगा सकते हैं...

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ज़िंदा है डॉक्टर, ज़िंदा है...खुशदीप


मुंबई में दो दिन से अस्पतालों के रेज़ीडेंट डॉक्टर हड़ताल पर हैं...डॉक्टर अस्पतालों में अपने लिए पूरी सिक्योरिटी मांग रहे हैं...दरअसल बुधवार को सायन अस्पताल में एक मरीज की मौत के बाद उसके रिश्तेदारों ने डॉक्टरों के साथ मारपीट की थी...इस घटना पर विरोध जताते हुए मुंबई के सभी सरकारी अस्पतालों के रेज़ीडेंट डॉक्टर गुरुवार सुबह से हड़ताल पर हैं...इस चक्कर में मरीज़ों का बुरा हाल है...खैर ये तो रही मुंबई की बात, अपने देश की बात...




आपकी मुलाकात कराता हूं आज पाकिस्तान के एक 'डॉक्टर' से...वो भी हड़ताल पर है...शिकायत है कि उसे इतनी कम तनख्वाह क्यों मिलती है...पाकिस्तान के मशहूर कॉमेडियन सोहेल अहमद के निभाए 'डॉक्टर' के इस किरदार की बातें सुनकर मेरे तो पेट में बल पड़ गए...आपकी आप जानो...पूरा लुत्फ़ लेना है तो इस वीडियो को पूरा लोड होने के बाद देखें...जिंदा है डॉक्टर, जिंदा है...



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देश से ऐसे मिटेगा भ्रष्टाचार...खुशदीप




नीतीश कुमार सरकार ने बिहार में एक अच्छा कदम उठाया है...बिहार में एक आईएएस अधिकारी के पटना स्थित आलीशान बंगले को ज़ब्त करके राज्य सरकार ने गुरुवार से उसमें कमज़ोर तबक़े के बच्चों का स्कूल खोल दिया है... अब तक रुकन्पुरा मुशहरी का ये प्राथमिक स्कूल झुग्गी झोपडी मे चल रहा था...

आय से अधिक संपत्ति रखने के मामले में बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम के तहत अभियुक्त बनाए गए अधिकारी शिव शंकर वर्मा के इस दो मंज़िला मकान को ज़िला प्रशासन ने गत रविवार सील कर दिया था...

राज्य के निगरानी (विजिलेंस) विभाग द्वारा चार साल पहले की गई छापेमारी में वर्मा के पास से नौ किलो सोना समेत लगभग डेढ़ करोड़ रूपए मूल्य की संपत्ति पाई गई थी...भ्रष्टाचार के ज़रिए अवैध संपत्ति अर्जित करने के आरोप में निलंबित वर्मा उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं और जब उनके विभिन्न ठिकानों पर छापे पड़े थे, उस समय वह बिहार में लघु सिंचाई विभाग के सचिव थे...बिहार विशेष न्यायालय अधिनियम 2009 के तहत राज्य सरकार को ये क़ानूनी अधिकार मिल गया है कि वह अपने किसी भी अधिकारी द्वारा भ्रष्ट तरीक़े से अर्जित की गई संपत्ति को ज़ब्त कर सकती है...

भले ही संबंधित मामला अंतिम निष्पादन के लिए अदालत में विचाराधीन हो. लेकिन ये भी प्रावधान है कि अगर अभियुक्त अंततः मुक़दमा जीत जाता है तो उसकी ज़ब्त की गई संपत्ति उसे सूद सहित लौटानी होगी...नीतीश सरकार का ये फ़ैसला है कि नए अधिनियम के अंतर्गत ज़ब्त मकान प्राथमिकता के आधार पर उसी क्षेत्र के भवनविहीन स्कूलों को सौंप दिये जाएगे...

इसी फ़ैसले पर अमल का पहला उदहारण बना है पटना के रुकुनपूरा मोहल्ले का यह मकान, जिसमें 'मुसहरी प्राथमिक विद्यालय' नाम से खोले गए स्कूल में दलित और अन्य कमज़ोर वर्ग के 94 बच्चों का दाख़िला हुआ है...मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसे भ्रष्टाचार नियंत्रण की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल मानते हुए कहते है, ''भ्रष्ट कमाई करने वाले सरकारी बाबुओं के मन में आज इस कार्रवाई से जहाँ खौफ़ पैदा हुआ होगा, वहीं अच्छे स्कूल भवन को तरसते ग़रीब बच्चों में ख़ुशी के साथ उम्मीद जगी होगी...''



इसी तरह के दर्जन भर मामलों पर यहाँ विशेष अदालतों में सुनवाई या तो पूरी हो चुकी है या अपील के स्तर पर फ़ैसला रुका हुआ है...इनमें वैसे सेवानिवृत या निलंबित आईएएस, आईपीएस अधिकारियों और अभियंताओं के नाम शामिल हैं, जिनके विरुद्ध निगरानी पुलिस के छापे में लाखों या करोड़ों की ' अवैध चल-अचल संपत्ति ' बरामद हुई हैं...

ज़ाहिर है कि ' ज़ब्त मकान में स्कूल खोलने ' का प्रचार नीतीश सरकार बहुत ज़ोर-शोर से इसलिए कर रही है, क्योंकि इस सरकार के छह वर्षों के शासनकाल में भ्रष्टाचार पहले से भी अधिक बढ़ जाने के आरोप लगते रहे हैं...

उधर यहाँ विपक्षी दलों ने इस संबंध में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दावे को ' थोथा चना बाजे घना ' जैसा भ्रामक प्रचार कहा है...राष्ट्रीय जनता दल के सांसद राम कृपाल यादव कहते हैं, '' इस राज्य में बढ़ते भ्रष्टाचार के समुद्र में गोते लगा रही बड़ी-बड़ी मछलियों के बीच से दो-चार को सिर्फ़ दिखाने के लिए उछाला जा रहा है. आज एक ज़ब्त मकान में स्कूल खोलना मीडिया-प्रचार के लिए रचा गया सरकारी ड्रामा है. जबकि यह सरकार राज्य की स्कूली-शिक्षा को बीते छह सालों में गर्त की ओर ले जाने की दोषी है...''

विपक्ष के ऐसे आरोपों से बेपरवाह सत्तापक्ष की दलील है कि विशेष न्यायालय क़ानून के ज़रिये हो रही कार्रवाई अब रुकने वाली नहीं है और भ्रष्ट अफ़सरों में इस कारण भय पैदा हो रहा है...

इक बडा सवाल क्या भ्रष्ट नेताओं के बंगले भी स्कूल बनेगे?

(मणिकांत ठाकुर, बीबीसी संवाददाता)
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सुबह आतंक ने दहलाया, रात को भूकंप ने हिलाया...खुशदीप





कल दिल्ली के लिए वाकई काला बुधवार था...सुबह दहशतगर्दों ने धमाके से दिल्ली को दहलाया...रात को भूकंप के झटके ने राजधानी को हिलाया...दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर हुए आतंकी धमाके ने ग्यारह बेगुनाहों की जान ले ली और 75 से ज़्यादा को ज़ख्मी कर दिया, जिनमें अब भी कई की हालत नाज़ुक बनी हुई है...शुक्र है कि रात को 11 बजकर 28 मिनट पर आए भूकंप के झटके में जानमाल के नुकसान की कोई ख़बर नहीं मिली...4.2 तीव्रता के इस भूकंप का केंद्र हरियाणा के सोनीपत में था...


दहशतगर्दों से लड़ने के लिए हमारा सिक्योरिटी-सिस्टम कितना मज़बूत है, इसका सबूत आतंकवादियों ने दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर धमाका करके दिखाया, जहां वो करीब साढ़े तीन महीने पहले 25 मई को आईईडी के काम न करने की वजह से ऐसा ही धमाका करने में नाकाम रहे थे...आज तक पता नहीं चल सका कि 25 मई को धमाके की कोशिश करने के पीछे कौन लोग थे...13 जुलाई को मुंबई के झावेरी बाज़ार, ऑपेरा हाउस, दादर कबूतरखाना में एक के बाद एक हुए धमाकों में भी सिक्योरिटी एजेसिंया अभी तक खाली हाथ हैं...मुंबई धमाकों के बाद गृह मंत्री चिदंबरम ने कहा था कि कोई खुफिया इनपुट नहीं मिला था...लेकिन साथ ही ये भी जोड़ा था कि इसे इंटेलीजेंस की खामी नहीं माना जाना चाहिए...कल दिल्ली में धमाके के बाद चिदंबरम ने संसद में खड़े होकर कहा कि जुलाई में खुफिया एजेंसियों ने दिल्ली पुलिस को कुछ लीड दिए थे, उसके बावजूद आतंकी अपने नापाक मंसूबे में कामयाब रहे...

ये वाकई शर्म की बात है...खुफिया इनपुट नहीं था तब मुंबई में धमाके हुए...इस बार खुफिया
इनपुट था तो भी दिल्ली में आतंकी हमले को नहीं रोका जा सका...आखिर कर क्या रही है सरकार...मुंबई में 26/11 हमले के बाद बड़े ज़ोरशोर से एनआईए (नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी) का गठन किया गया...उसके बाद तीन बड़ी आतंकी वारदात हुई हैं... पुणे का जर्मन बेकरी ब्लास्ट, तेरह जुलाई को मुंबई के सीरियल ब्लास्ट और अब दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर धमाका...आखिर ऐसा क्यों होता है कि आतंकी अपना काम करके सफ़ाई से निकल जाते हैं और हम बस लकीर पीटते रहते हैं...

खैर ये तो रही आतंक के खतरे की बात...लेकिन दिल्ली को भूकंप से भी खतरा कम नहीं है...चलिए इस खतरे पर अब कल बात करूंगा...
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सर्जना शर्मा का सम्मान, ब्लॉग जगत का बढ़ा मान...खुशदीप

हर साल सितंबर आता है...साथ ही हिंदी के लिए हिंदी दिवस, हिंदी पखवाड़ा जैसे कार्यक्रम करने की याद सबको आ जाती है...सरकारी-गैर सरकारी उपक्रमों में राजभाषा को प्रोत्साहन देने के लिए आयोजन किए जाने लगते हैं...बरसों से ये रस्मी अनुष्ठान चले आ रहे हैं लेकिन क्या इनसे वाकई हिंदी का भला होता है...एक तो सरकारी विभागों में इतनी क्लिष्ट हिंदी का प्रयोग होता है कि आम आदमी के सिर के ऊपर से ही गुज़र जाती है...जब तक इसे आम बोलचाल की भाषा की तरह इस्तेमाल नहीं किया जाएगा, तब तक हिंदी के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य में सफल नहीं हुआ जा सकता...


ऐसे में मुझे लगता है कि हिंदी के प्रचार प्रसार में ब्लॉग ने थोड़े वर्षों में जो योगदान देश-विदेश में दिया है, वो सराहनीय है...हिंदी दिवस या हिंदी पखवाड़े के रूप में सरकार की बरसों से की जा रही रस्म अदायगी कुछ सरकारी बजट को ही किनारे लगा देने की कवायद बन कर ही रह गई है...

लेकिन देश में कुछ संस्थाएं या व्यक्ति हैं जिन्होंने वास्तव में हिंदी के लिए अच्छा काम किया या कर रहे हैं...ऐसे ही एक विद्वान थे...कानपुर के दुर्गा प्रसाद दुबे...1928 से लेकर 1959 तक हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए उन्होंने अनुकरणीय कार्य किया...उन्हीं की स्मृति में पिछले तीस साल से हर साल कानपुर में हिंदी सेवियों को सम्मानित करने के लिए कार्यक्रम का आयोजन होता है...पंडित के ए दुबे पद्मेश दुबे की ओर से 2 सितंबर को इस साल आयोजित किए गए कार्यक्रम में 22 हिंदीसेवियों को सम्मानित किया गया...
ब्लॉगजगत के लिए खुशी की बात है कि सम्मानित होने वाले इन मनीषियों में रसबतिया ब्लॉग की संचालक सर्जना शर्मा का नाम भी शामिल रहा...उनके साथ तमिलनाडु, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश में हिंदी के विकास के लिए महत्ती योगदान देने वाले विद्वान भास्कर गेंटी और कानपुर के हिंदी अध्यापक पंडित रामकिशोर शुक्ल को भी सम्मानित किया गया...

सर्जना शर्मा इलैक्ट्रोनिक मीडिया की वरिष्ठ पत्रकार होने के नाते मीडिया जगत में भी हिंदी भाषा के कार्यक्रमों के प्रसारण, सनातन संस्कृति पर्व, उत्सव और धर्म पर आधारित कार्यक्रमों को सही रूप में दर्शकों तक पहुंचाने के लिए विशेष योगदान दे रही हैं...इस कार्यक्रम में ऐसे 19 छात्र छात्राओं को भी सम्मानित किया गया जिन्होंने बोर्ड इम्तिहान में हिंदी में नब्बे फीसदी से ज़्यादा अंक प्राप्त किए...पुरस्कार के रूप में साढ़े ग्यारह हज़ार रुपये, प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिह्न प्रदान किए गए...इस संस्था की ओर से अब तक 480 हिंदी सेविओं को सम्मानित किया जा चुका है...इनमें जानेमाने कवि नीरज और शैल चतुर्वेदी के नाम भी शामिल रहे हैं...
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माई नेम इज खुशदीप एंड आई एम नॉट ए कांग्रेसमैन...

माई नेम इज खुशदीप एंड आई एम नॉट ए कांग्रेसमैन...



माई नेम इज ख़ान एंड आई एम नॉट ए टेररिस्ट...शाहरुख ख़ान के इस डॉयलॉग ने ही उनकी फिल्म माई नेम इज़ ख़ान को नए मायने दिए थे...देश में ही नहीं विदेश में भी इस फिल्म ने एक सोच विशेष पर गहरी चोट की थी...इसी तरह आज देश में अन्ना हज़ारे (या टीम अन्ना) की थीम...माई वे ऑर हाईवे...से ज़रा अलग हट कर कोई बात कहता है तो उसे झट से कांग्रेसी करार दे दिया जाता है...

अन्ना ने हमेशा यही कहा कि उनका आंदोलन सरकार, कांग्रेस या किसी पार्टी के ख़िलाफ़ नहीं है...व्यवस्था के ख़िलाफ़ है...वो सिस्टम को बदलना चाहते हैं...लेकिन आंदोलन की अंडर-स्ट्रीम देखी जाए तो आज कांग्रेस और सरकार की छवि ही देश में सबसे बड़े खलनायक की हो गई है...खास कर कपिल सिब्बल, चिदंबरम, मनीष तिवारी और दिग्विजय सिंह अपने कुछ क्रियाकलापों से लोगों की आंख की किरकिरी बन गए हैं...आज हालत ये है कि सरकार या कांग्रेस की तरफ़ से अच्छा सुझाव भी सामने आता है तो कोई उसे सुनने को तैयार नहीं है...

लोकपाल का स्वरूप कैसा हो...इस पर अब तक तस्वीर साफ़ नहीं है...स्टैंड़िंग कमेटी जब तय करेगी तब करेगी, फिलहाल तो विच-हंटिंग का खेल शुरू हो गया है...अन्ना के अनशन के दौरान आंदोलन चरम पर था तो राहुल गांधी ने संसद में खड़े होकर एक बयान दिया था...लोकपाल को चुनाव आयोग की तरह संवैधानिक संस्था बना दिया जाए...ऐसी संस्था जिस पर सरकार का कोई दखल न हो...ठीक वैसे ही जैसे चुनाव के वक्त चुनाव आयोग के आदेश ही सर्वोपरि हो जाते हैं...उस वक्त केंद्र या राज्य सरकारों की कुछ नहीं चलती...अगर देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ असरदार लोकपाल लाना है तो राहुल गांधी के सुझाव में कम से कम मुझे तो दम नज़र आता है...टीम अन्ना के जस्टिस संतोष हेगड़े, अरविंद केजरीवाल और मेधा पाटकर ने भी राहुल के सुझाव को अच्छा बताया है...पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन के मुताबिक वो भी ऐसा ही सुझाव टीम अन्ना के साथ मध्यस्थता करने वाले आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर को भेज चुके हैं...हो सकता है कि अभिषेक मनु सिंघवी की सरपरस्ती वाली स्टैंडिंग कमेटी जब लोकपाल के अंतिम स्वरूप पर माथापच्ची करे तो लोकपाल को चुनाव आयोग जैसी संस्था बनाने के सुझाव पर भी गौर करे...

सवाल आज टकराव का नहीं, सबके मिल बैठकर ऐसी व्यवस्था बनाने का है जिसमें कोई भ्रष्ट आचरण अपनाने की ज़ुर्रत न करे...गलत काम करने से पहले सौ बार सोचे कि उसका नतीजा क्या निकलेगा...मेरा यही मानना है कि देश में आज़ादी के बाद टी एन शेषन ने चुनाव आयोग को अकेले दम पर जिस तरह दांत दिए, उसकी टक्कर का और कोई सुधार का काम नहीं हुआ...ठीक वैसे ही आज देश को पैनी धार वाले लोकपाल की आवश्यकता है...शेषन से पहले चुनाव आयोग की देश में कोई बिसात नहीं थी...

खैर ये तो रही लोकपाल की बात...लेकिन आज एक सवाल राहुल गांधी या सोनिया गांधी को भी सोचना चाहिए...क्यों कांग्रेस की आज ऐसी छवि हो गई है कि लोग उसका नाम भी सुनना पसंद नहीं कर रहे...मनमोहन सिंह जैसी बेदाग छवि वाला ईमानदार शख्स प्रधानमंत्री होने के बावजूद भ्रष्टाचार को लेकर सरकार आज सबके निशाने पर है...क्या ये कुछ व्यक्तियों के अहंकार या लालच की वजह से हो रहा है...या सरकार में हर मंत्री के अपनी ढपली, अपना राग अलापने की वजह से हो रहा है...

चिदंबरम 1 सितंबर को कहते हैं कि केंद्र को भोपाल की आरटीआई कार्यकर्ता शेहला मसूद की हत्या की सीबीआई जांच की सिफारिश की चिट्ठी नहीं मिली...इसकी काट में मध्य प्रदेश के गृह मंत्री उमाशंकर निकल कर कहते हैं कि केंद्र को 20 अगस्त को सिफारिश भेजी गई थी...जिसकी 23 अगस्त को कार्मिक मंत्रालय से प्राप्ति रसीद भी मिल गई...तो एक हफ्ते तक माननीय चिदंबरम जी को क्या इसकी जानकारी ही नहीं मिली..

.ऐसे ही सहजधारी सिखों को एसजीपीसी चुनाव में वोटिंग का अधिकार वापस होने को लेकर भी गलत संदेश गया...पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में वकील की तरफ से जानकारी दी गई कि केंद्र सरकार ने आठ साल पहले की उस अधिसूचना को वापस ले लिया है जिसमें सहजधारी सिखों को वोट डालने पर पाबंदी लगाई गई थी...केंद्र के हाईकोर्ट में इस जवाब से पंजाब में बवाल मच गया...एसजीपीसी के 18 सितंबर को चुनाव होने जा रहे हैं...अगर सहजधारी सिखों को वोटिंग का अधिकार मिल जाता तो सारी वोटर लिस्ट को नए सिरे से बनवाना पड़ता...ऐसी सूरत में हर हाल में एसजीपीसी चुनाव को टालना पड़ता...लेकिन एसजीपीसी और पंजाब की अकाली सरकार ने केंद्र के इस फैसले को सिखों के धार्मिक मामले में दखल बताते हुए कहा कि इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा...मामले ने तूल पकड़ा तो चिदंबरम साहब फिर संसद में खड़े हुए और कहा कि केंद्र ने अधिसूचना वापस लेने का कोई फैसला नहीं किया...यानि सहजधारी सिखों के एसजीपीसी चुनाव में वोटिंग पर पाबंदी लगी रहेगी और चुनाव तय वक्त पर ही होंगे...

पंजाब में बात तो संभल गई लेकिन सवाल बड़ा ये है कि वकील ने फिर हाईकोर्ट में क्यों झूठ बोला...वो वकील यही कहता रहा कि उसके पास दिल्ली से कानून मंत्रालय से अधिसूचना वापस लेने का फैक्स आया था और दिल्ली से फोन पर भी यही सूचना दी गई थी...अब कौन झूठ बोल रहा है और कौन सच, ये तो राम जाने...लेकिन क्या सरकार का कामकाज इसी तरह से चल रहा है...बायां हाथ क्या कर रहा है, ये दाएं हाथ को ही नहीं पता...

प्रधानमंत्री कार्यालय से सभी मंत्रियों को 31 अगस्त तक अपनी और अपने परिवार वालों की कुल संपत्ति का ब्यौरा उपलब्ध कराने के लिए कहा गया था...जिससे कि उसे पीएमओ की वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जा सके...तीन तीन रिमाइंडर देने के बावजूद एक कैबिनेट मंत्री और पांच राज्य मंत्रियों ने ब्यौरा नहीं दिया...क्या इन मंत्रियों को प्रधानमंत्री की बात की भी कोई फिक्र नहीं है...जिन मंत्रियों ने ब्यौरा दिया उनमें से एक मंत्री महोदय कमल नाथ के पास सबसे ज़्यादा ढाई सौ करोड़ की संपत्ति है...इसमें उनकी पत्नी के नाम की संपत्ति भी शामिल है...दो साल पहले लोकसभा चुनाव के दौरान कमलनाथ ने चुनाव आयोग को दिए ब्यौरे में अपनी संपत्ति 14 करोड़ दर्शाई थी...कहां से जुट गई इतनी संपत्ति...इस पर गौर करने की जगह सरकार का नोटिस अरविंद केजरीवाल को जा रहा है...नौ लाख रुपये के बकाया की वसूली के लिए...देश में संदेश यही गया कि सरकार बदले की भावना के तहत टीम अन्ना को शिकंजे में लेना चाह रही है...

ये सब राहुल गांधी और सोनिया गांधी को ही सोचना है कि आखिर क्यों कांग्रेस के खिलाफ लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा है...क्यों सरकार के मंत्री या पार्टी के प्रवक्ता जब बयान देने आते हैं तो उनके हाव-भावों में अहंकार झलकता है...पार्टी और सरकार में मोहरे ठीक करने के लिए अब भी प्रयास नहीं किए तो फिर तो जनता तैयार बैठी ही है सबक सिखाने के लिए...और विरोधी दल अन्ना की आंधी पर सवार होकर मौके का फायदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते...सोनिया गांधी इलाज के बाद अब देश लौटने वाली हैं...करनी नहीं तो कथनी में तो सोनिया पब्लिक परसेप्शन पर बड़ा ज़ोर देती रही हैं...अब उनके सामने बड़ा सवाल यही होगा कि आम आदमी की दुहाई देने वाली कांग्रेस से आम आदमी ही क्यों बिदक रहा है....
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दिल्ली में शिखा वार्ष्णेय का ख़ैर-मख़दम...खुशदीप

तारीख...31 अगस्त 2011
स्थान... वीमेंस प्रेस क्लब, कनाट प्लेस, दिल्ली

मौका...शिखा वार्ष्णेय के दिल्ली में होने पर छोटा सा गेट-टूगैदर

खास बात...विलायत की पंक्चुएलिटी का पालन करते हुए शिखा निर्धारित टाइम साढ़े ग्यारह बजे प्रेस क्लब पहुंच गई...उस वक्त वहां उन्हें कोई मेजबान नहीं मिला...जब तक वो अकेली रहीं यही सोचती रहीं कि तारीख तीस अगस्त हैं या एक अप्रैल...कहीं अप्रैल फूल तो नही बना दिया...दस मिनट की देरी के बाद मैं, सर्जना शर्मा, राकेश कुमार जी, शशि दीदी (श्रीमति राकेश कुमार) प्रेस क्लब पहुंचे तो हमें देखकर शिखा ने राहत की सांस ली...

खैर छोड़िए, ये सब, बस आप इस फोटो फीचर के ज़रिए जानिए कि गेट-टूगैदर में क्या क्या हुआ...




ये कौन आया, रौशन हो गई महफ़िल जिसके नाम से, हमारी दिल्ली में निकला सूरज शिखा के नाम से...सर्जना शर्मा के साथ शिखा वार्ष्णेय

लाटरी निकलने का मैसेज वंदना गुप्ता के मोबाइल पर आया, उदास सर्जना शर्मा हो गईं....

ये लिखा पढ़ी किस बात की भाई...मैं तो सही पासपोर्ट पर भारत आई हूं...गीताश्री और सर्जना शर्मा हंसते हंसते नज़र रखे हैं कि कहीं कोई गलत जानकारी तो नहीं दे रहीं शिखा...


नहीं दीदी...सच में गिलास में कोई गड़बड़ नहीं बस पीच टी है...घर जाकर पत्नीश्री से शिकायत मत कर दीजिएगा...यही विनती कर रहा हूं शशि दीदी से...गौर से सुन रहे हैं राकेश कुमार जी...



अच्छा तो ऐसे खींची जाती है फोटो...राजीव तनेजा के फोटोग्राफी के हुनर को देख कर यही कह रहे हैं राकेश कुमार जी....


चेक कर लूं, हेयर स्टाइल ठीक तो है न...शायद यही सोच रही हैं संजू भाभी (श्रीमति राजीव तनेजा)


अब ज़रा वाह ताज वाह चाय का शौक फरमा लिया जाए...


इतने सारे फोटो लेने के बाद थोड़ा आराम करते हुए भाई राजीव तनेजा


जाने दो मुझे जाना है....घर जाने को लेट होने पर पर्स उठा कर शायद यही कहना चाह रही हैं सर्जना शर्मा...साथ में गीताश्री और शिखा

चलो भाई सब कुछ हो गया...अब ग्रुप फोटो की रस्म भी पूरी कर ली जाए...(राजीव तनेजा और वंदना गुप्ता यहां भी फोटो खींचने में लगे होने की वजह से फ्रेम में नहीं हैं)

नोट...ये सारी फोटो राजीव तनेजा और वंदना गुप्ता के कैमरों का कमाल हैं....
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