बुधवार, 31 अगस्त 2011

दुविधा में हूं, अपनी राय दीजिए...खुशदीप




पता नहीं क्या गड़बड़ी हुई कि डॉ अमर कुमार को समर्पित ब्लॉग पर रश्मि रवीजा की भेजी टिप्पणी के आधार पर पोस्ट डाली...लेकिन वो न तो मेरे ब्लॉग के लिंक पर खुल रही है और न ही हमारी वाणी के लिंक पर...रश्मि बहना ने ग्यारह साल से अनशन कर रही मणिपुर की इरॉम चानु शर्मिला पर एक पोस्ट लिखी थी...इस पर डॉक्टर साहब की भेजी अमर टिप्पणी में विस्तार से पता चलता है कि शर्मिला के अनशन पर उनके क्या विचार थे...डॉक्टर साहब ने इसी पोस्ट पर दूसरी टिप्पंणी में मेरी भी खिंचाई की थी...आप इस लिंक पर जाकर डॉक्टर साहब की टिप्पणियों को पढ़ सकते हैं...


इरॉम शर्मिला को सामूहिक हिस्टीरिया पैदा करने का गुर नहीं आता...डॉ अमर कुमार (साभार रश्मि रवीजा)


एक बात और...मैं असमंजस में हूं...रचना जी ने डॉक्टर साहब को समर्पित ब्लॉग पर एक टिप्पणी में कहा है कि उन्हें इस तरह एक ब्लॉग पर डॉक्टर अमर कुमार की टिप्पणियों को इकट्ठा करना सही नहीं लग रहा...रचना जी का कहना है कि डॉक्टर साहब की जिन पोस्टों पर टिप्पणियां हैं, वो वही रहेंगी यानि इंटरनेट पर सहेजी रहेंगी...रचना जी ने ये भी साफ़ किया है कि इस को उनकी व्यक्तिगत पसंद /न पसंद समझे आक्षेप नहीं क्युकी याद करने और याद भुला कर मुक्त करने के सबके अपने तरीके हैं...

मेरा उद्देश्य डॉक्टर साहब को समर्पित इस ब्लॉग पर न सिर्फ डॉ अमर कुमार बल्कि पहले अगर कोई साथी हमेशा के लिए बिछुड़े हैं तो उनकी यादों को भी संजो कर रखना है....मेरी इस बीच दो बार डॉक्टर साहब के बेटे डॉ शांतनु से भी बात हुई हैं...डॉक्टर साहब का पोस्टों के रूप में खुद का लिखा हुआ अनमोल खज़ाना तो उनके ब्लॉग पर मौजूद रहेगा...जहां तक मेरी जानकारी है डॉक्टर साहब के ब्लॉग ब्लॉगस्पॉट पर न होकर डॉट कॉम पर हैं...इसलिए डॉट कॉम को हर साल बस रीन्यू करना होगा...

रचना जी की टिप्पणी के बाद मैं दुविधा में पड़ गया हूं...बताइए मुझे क्या करना चाहिए...डॉक्टर साहब की टिप्पणियों को एक ब्लॉग पर लाना सही है या नहीं...खुले दिल से अपनी बात कहिएगा जिससे मुझे फैसला करने में आसानी रहेगी...ये भी साफ कर दूं कि अब तक मुझे जितनी भी टिप्पणियां मिल चुकी हैं, उन्हें ज़रूर अमर कहानियां पर लाऊंगा...आगे के लिए आप सबकी राय मेरे लिए अहम होगी...

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी हो या न हो...खुशदीप


 


अगर कोई क़ानूनी पेंच और न फंसा तो पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के तीन दोषियों- मुरुगन, संथन और पेरारिवालान को अगली 9 सितंबर को फांसी के तख्ते पर लटका दिया जाएगा...यानि राजीव गांधी की हत्या के बीस साल साढ़े तीन महीने बाद एलटीटीई के ये तीन पूर्व सदस्य अपने किए के अंजाम तक पहुंचेंगे...

राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल तीनों दोषियों की ओर से दाखिल दया याचिका 12 अगस्त को ठुकरा चुकी हैं...लेकिन जैसे जैसे 9 सितंबर नज़दीक आती जा रही है तमिलनाडु में सियासत उबाल खाने लगी है...तमिल मुद्दे पर पूर्व में एलटीटीई से सहानुभूति रखने वाली पार्टियां खास तौर पर मुखर हैं...एमडीएमके सुप्रीमो वाइको ने मुख्यमंत्री जयललिता से इस मामले में फौरन दखल देकर केंद्र से बात करने की मांग की है...डीएमके चीफ़ करुणानिधि का कहना है कि अगर इन तीनों की फांसी माफ़ कर दी जाती है तो तमिल खुश होंगे...करुणानिधि पिछले हफ्ते सोनिया गांधी से भी तीनों दोषियों की जान बख्शने के लिए पहल करने की मांग कर चुके हैं..करुणानिधि के मुताबिक अगर राजीव गांधी खुद जिंदा होते और उनके सामने ऐसा मामला आता तो वो भी सज़ा माफ़ करने के हक में रहते...

हालांकि मुख्यमंत्री जयललिता ने साफ कर दिया है कि राष्ट्रपति की ओर से दया याचिका खारिज़ होने के बाद वो कुछ भी करने की स्थिति में नहीं है...जयललिता के मुताबिक दोषियों की फांसी माफ़ करना उनके अधिकार से बाहर की बात है...जयललिता ने इस मुद्दे पर सियासत न करने की भी नसीहत दी है...

कांग्रेस का कहना है कि उसकी इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं है...क़ानून अपना काम कर रहा है...जनता पार्टी के मुखिया सुब्रह्मण्यम स्वामी और बीजेपी नेता वेंकैया नायडू, राजीव गांधी के हत्यारों की फांसी माफ़ करने के हक में नहीं हैं...वहीं बीजेपी की लाइन से अलग मशहूर वकील राम जेठमलानी तीनों दोषियों के लिए मंगलवार को मद्रास हाईकोर्ट में पैरवी करने जा रहे हैं...

मद्रास हाईकोर्ट में तीनों दोषियों की ओर से एक रिवीज़न पेटीशन दाखिल की गई है...इसमें राष्ट्रपति से दया याचिका पर पुनर्विचार करने की अपनी अर्जी का हवाला दिया गया है...तीनों दोषियों की ओर अपनी फांसी पर रोक लगाने की मांग करते हुए कोर्ट से कहा गया है कि उनकी पिछली दया याचिका पर राष्ट्रपति की ओर से फैसला करने में ग्यारह साल लगे थे...यही तर्क देते हुए कहा गया है कि दूसरी दया याचिका पर भी लंबा वक्त लगने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता...ये भी दलील दी जा रही है कि बीस साल तो वो पहले ही जेल में काट चुके हैं...

अब आप सब से सीधा प्रश्न...आपकी क्या राय है...मुरूगन, संथन (दोनों श्रीलंकाई) और पेरारिवालान (भारतीय) की सज़ा-ए-मौत बरकरार रखनी चाहिए और नौ सितंबर को उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया जाना चाहिए या उनकी फांसी माफ़ कर देनी चाहिए...
......................................................................................................

भगवान को किससे लग रहा है डर...खुशदीप

Dare to instruct Rajnikanth...Khushdeep





रविवार, 28 अगस्त 2011

ब्रैंड अन्ना क्लिक करने के सात फंडे...खुशदीप




एचटी टीम ने ब्रैंड अन्ना के क्लिक करने पर बड़ी अच्छी स्टडी की है...मार्केटिंग से जुड़े किसी भी शख्स के लिए ये बड़ी उपयोगी साबित हो सकती है...
 
प्रोडक्ट...चार दशक से टंगे लोकपाल बिल के रूप में भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम...

ब्रैंड अम्बेसडर...74 साल के गांधीवादी अन्ना हज़ारे जिनकी इस साल के शुरू तक सिर्फ महाराष्ट्र में ही पहचान थी...

बजट...नगण्य...

प्रभाव...पूरा देश, सारे न्यूज़ चैनल्स, अंतत संसद...


ब्रैंड अन्ना के देश पर छा जाने के फिनॉमिना को अब सारे ब्रैंड मैनेजर, मार्केटिंग गुरू और सीईओ स्टडी कर रहे हैं...इस केस में उपभोक्ता को प्रोडक्ट (भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग) से जोड़ने की कड़ी अहम रही...परफेक्ट टाइमिंग ने भी बड़ा काम किया...ब्रैंड प्रबंधन की कामयाबी मकसद की ईमानदारी और प्रोडक्ट की सच्ची आत्मा पर निर्भर करती है...ये पाठ मार्केटिंग से जुड़े हर शख्स के लिए बड़े काम आ सकते हैं...

पाठ नंबर 1

व्हाट एन आइडिया सर जी...


ऐसा विचार जो लोगों को झनझनाता हो, छा जाता हो और जो़ड़ता हो...

पिछले साल देश को पांच बड़े घोटालों ने हिलाया...जवाबदेही न होने की वजह से लोगों का गुस्सा सरकार और नेताओं के ख़िलाफ़ बढ़ा...एक मज़बूत लोकपाल के आइडिया में लोगों को अपने आक्रोश का आउटलेट मिला...लोकपाल जिसके पास इतनी ज़बरदस्त शक्तियां हो कि वो प्रधानमंत्री की भी जांच कर सके...

पाठ नंबर 2

एक आइकन गढ़ना...

हर ब्रैंड की अपनी टैगलाइन होती है, अपने प्रतीक होते हैं...जैसे ठंडा मतलब कोकाकोला...यही बात हर जनआंदोलन पर लागू होती है...जैसे अहिंसा मतलब महात्मा गांधी...और अब भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के आइकन के तौर पर अन्ना उभरे हैं...


पाठ नंबर 3
उपभोक्ताओं में प्रोडक्ट के अहसास को फील करने की इच्छा जगाना...


हर ब्रैंड की विशिष्ट आत्मा होती है, अलग पहचान होती है...यही चीज़ किसी ब्रैंड को आम ब्रैंडों से हटकर खास बना देती है...रामलीला मैदान पर हज़ारों लोगों का पहुंचना इसी बात का प्रमाण है कि लोग खुद इस ब्रैंड की आत्मा को महसूस करना चाहते थे...


पाठ नंबर 4
टेस्ट लॉन्च...

किसी भी प्रोडक्ट को लाने से पहले मार्केट की नब्ज़ भांपी जाती है...सेम्पल मार्केट में टेस्ट लांच किया जाता है...इस प्रोडक्ट में ये टेस्ट अप्रैल में दिल्ली के जंतर-मंतर पर  किया गया...लोगों के स्वतस्फूर्त वहां पहुंचने से ही पता चल गया कि प्रोडक्ट में कितना पोटेंशियल है...


पाठ नंबर 5
परफेक्ट पैकेजिंग...


बढ़िया मार्केटिंग के लिए चार पी का मंत्र दिया जाता है...प्रोडक्ट, प्राइज़िंग, प्रमोशन, पैकेज़िंग...भ्रष्टाचार के ख़िलाफ मुहिम के केस में पैकेजिंग का पी सबसे अहम था...खुद साफ़ और ईमानदार छवि वाले अन्ना, साथ ही उनके बेदाग़ टोपी, धोती और कुर्ता...ये पैकेजिंग टी शर्ट और जींस पहनने वाले और बेफ़िक्र माने जाने वाले युवा को भी अपनी और खींच लाई...

पाठ नंबर 6
मीडिया प्लैन...

ब्रैंड स्ट्रैटजिस्ट ने ध्यान रखा कि सबसे ज़्यादा मीडिया का ध्यान कब अपनी ओर खींचा जा सकता है...अप्रैल के शुरू में वर्ल्ड कप खत्म हुआ...आईपीएल को शुरू होने में वक्त था...बीच का वक्त ब्रैंड को लांच करने के लिए परफेक्ट टी साबित हुआ...

पाठ नंबर 7
कम्पीटिटर्स को चौंकाना...

कामयाब ब्रैंड के लिए प्रतिद्वंद्वियों को हतप्रभ करने वाला फैक्टर भी बड़ा काम करता है...इस केस में अन्ना अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी यानि सरकार को छकाते रहे कि उनका अगला कदम क्या होगा...मसलन पंद्रह अगस्त की शाम को अन्ना अचानक राजघाट पहुंच कर ध्यान लगाने लगे...या सरकार की ओर से जेल से रिहाई के ऑर्डर आ जाने के बाद भी अन्ना ने तिहाड़ से बाहर आने से इनकार कर दिया...

ब्रैंड को रणनीति के ज़रिए इस्टेब्लिश करना मेहनत का काम है...लेकिन उससे भी ज़्यादा बड़ा काम है ब्रैंड को मार्केट लीडर की पोज़ीशन पर सस्टेन करना...आप ज़ोरदार कैम्पेनिंग के ज़रिए किसी प्रोडक्ट के लिए उपभोक्ता को पहली बार आकर्षित कर सकते हैं...लेकिन बार बार वही प्रोडक्ट उपभोक्ता खरीदे तो इसके लिए प्रोडक्ट की गुणवत्ता, ईमानदारी, सच्चाई अहम हो जाती है...ये ऐसे ही जैसे है टीवी पर आकर्षक एड देखकर आप किसी प्रोडक्ट को ले आते हैं...अगर वो आपकी उम्मीदों पर खरा उतरता है तो आप उसे ज़िंदगी का हिस्सा बना लेते हैं...बार बार उसे खरीदते हैं...अगर चमक दमक झूठी साबित होती है और वादे कोरे निकलते हैं तो आप दोबारा कभी उस प्रोडक्ट को हाथ भी नहीं लगाते...अब यही टीम अन्ना का इम्तिहान है...क्या ये बार-बार परफार्म करने का माद्दा रखती है...या इस कामयाबी के ज़रिए सिर्फ़ एक नया पावर सेंटर बनकर ही रह जाती है...दावा राजनीतिक दल भी लोगों के सबसे ब़ड़े हितैषी होने का ही करते हैं...और जब जनता इन्हें अपार जनसमर्थन देकर चुन लेती है तो फिर यही राजनीतिक दल उसे फार ग्रांटेड समझने लगते हैं...अब मैं टीम अन्ना के लिए यही दुआ करता हूं कि ये सही रास्ते पर चलती रहे...आपसी फूट से बचे...जनता की उम्मीदों पर खरी उतरे...जनता जनार्दन अगर किसी को मसीहा बना सकती है तो उम्मीदें टूटने पर उसे पटकने में भी देर नहीं लगाती...

गुड वर्क टीम अन्ना...कीप इट अप...

शनिवार, 27 अगस्त 2011

देश में जो पहले कभी नहीं हुआ, वो अब हुआ...खुशदीप

बहस नहीं अहसास है,


चाहिए थोड़ी सी सांस है,


संसद है बहुत दूर,


आनी चाहिए अब पास है...




आज...

अन्ना...अनशन...सिविल सोसायटी...लोग...आंदोलन...संघर्ष...मीडिया...जनतंत्र...लोकतंत्र...भ्रष्टतंत्र...जनता सुप्रीम...संसद सर्वोच्च...संविधान की भावना...सत्ता-पक्ष...विपक्ष...सर्वसम्मति...प्रस्ताव...इतिहास...जीत...जश्न...



कल...

स्टैंडिंग कमेटी...विचार...तकरार...बिल...क़ानून...लोकपाल...


परसो...

हर कोई ईमानदार...भ्रष्टाचार मुक्त सरकारी दफ्तर...जनसेवक पुलिस...सच्चे सांसद-विधायक...साफ़-सुथरी सरकार...राष्ट्रीय चरित्र...सामाजिक समरसता...सौहार्द...जातिविहीन समाज...खुशहाल गांव...खुशहाल शहर...भारत फिर सोने की चिड़िया...

आमीन....


(भारत का नागरिक होने के नाते मैं भी एक मत रखता हूं...मेरा मत है कि अन्ना के आंदोलन की असली कामयाबी दबाव में सरकार या संसद के झुकने या जनलोकपाल बिल के क़ानून बनने में नहीं होगी...न ही ये कामयाबी सिविल सोसायटी के एक नए पावर सेंटर बनकर उभरने में होगी...असली कामयाबी तब मिलेगी जब सब खुद को दिल से बदलना शुरू कर देंगे...)

---------------------------------



अगर ओबामा भारत में राजनीति करते...खुशदीप








शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

डॉ अमर कुमार को समर्पित एक ब्लॉग...खुशदीप

प्रिय ब्लॉग मित्रों,



डॉ अमर कुमार नहीं रहे...ये हक़ीक़त है...लेकिन दिल इसे मानने को तैयार नहीं...मौत को भी ज़िंदादिली सिखा देने वाले शख्स को आखिर मौत कैसे हरा सकती है...कैसे ले जा सकती है ब्लॉग जगत के सरपरस्त को हम सबसे दूर...दर्द को भी कहकहे लगाना सिखा देने वाले डॉ अमर कुमार का शरीर बेशक दुनिया से विदा हो गया लेकिन जब तक ये ब्लॉगिंग रहेगी उनकी रूह, उनकी खुशबू हमेशा इसमें रची-बसी रहेगी...टिप्पणियों में छोड़ी गई उनकी अमर आशीषों के रूप में...

कहते हैं इंटरनेट पर छोड़ा गया एक एक शब्द अमर हो जाता है...और उनका तो नाम ही अमर था...अमर मरे नहीं, अमर कभी मरते नहीं....डॉक्टर साहब अब ऊपर वाले की दुनिया को ब्लॉगिंग सिखाते हुए हम सबकी पोस्टों को भी देखते रहेंगे...डॉ अमर कुमार को समर्पित ये निर्माणाधीन ब्लॉग शाहनवाज़ के साथ मिलकर मेरी एक छोटी सी कोशिश है, उनके छोड़े गए अनमोल वचनों को एक जगह एकत्र करने की...ये महत्ती कार्य आप सबके सहयोग के बिना संभव नहीं हो सकता...मैं अब जुट गया हूं, अपनी पोस्टों पर आईं उनकी एक एक टिप्पणी को सहेजने में...आपको जब भी थोड़ा वक्त मिले, डॉ अमर कुमार की याद को अमर करने के लिए अपनी पोस्टों पर आईं उनकी टिप्पणियों को सहेजिए...

यकीन मानिए ये सीप के मोती अब भी हमें सीख देते रहने के साथ नए ब्लॉगरों के लिए भी प्रकाश-पुंज का कार्य करेंगी...ये टिप्पणियां आप Sehgalkd@gmail.com या mailto:shnawaz@gmail.com 
पर भेज सकते हैं...बस एक विनती और...हर टिप्पणी के साथ तारीख और उनके पब्लिश होने का टाइम भी होता है...अगर उसे भी भेजेंगे तो ये भी पता चलेगा कि किस वक्त डॉक्टर साहब के ज़ेहन में वो विचार आया था...इस काम को अपनी सुविधा के अनुसार करिए...एक टिप्पणी मिले तो एक टिप्पणी भेज दीजिए...वो सब आपके नाम के साथ पोस्ट के रूप में इस ब्लॉग पर चमक बिखेरेंगी...इसके अलावा डॉक्टर साहब से जुड़े आपके संस्मरण हैं तो वो भी भेजिए...कोशिश यही है कि जब तक ब्लॉगिंग चले, डॉक्टर साहब हमसे कभी जुदा न हों...कितना भी दर्द, दुख डॉक्टर साहब के शरीर ने झेला, लेकिन दूसरों को हंसाना उन्होंने कभी नहीं छोड़ा...डॉ साहब के इसी जज़्बे को अपने जीवन में उतारना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी...मैं खुशनसीब हूं कि एसएमएस पर उनसे जोक्स पढ़ने-पढ़ाने का सिलसिला चलता रहता था...लगता है अब भी यही आवाज़ कानों में आएगी...खुशदीपे या खुशदीप पुत्तर....अंत में इसी प्रार्थना के साथ...डॉ अमर कुमार को परमपिता अपने चरण-कमलों में स्थान दे और श्रद्धेय माताजी, रूबी भाभी जी, बेटे डॉ शांतनु अमर के साथ सभी परिवारजनों को इस असीम दुख को सहने की शक्ति प्रदान करे...


आपकी भेजी जाने वाली डॉ साहब की टिप्पणियों के इंतज़ार में...


आपके

खुशदीप और शाहनवाज़

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

मौन अमर...खुशदीप








http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2011/08/rip.html

http://www.deshnama.com/2011/08/blog-post_4349.html?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+deshnama%2FiZss+%28%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%29

http://www.nukkadh.com/2011/08/blog-post_9745.html





http://rashmiravija.blogspot.com/2011/08/blog-post_24.html


http://samvedanakeswar.blogspot.com/2011/08/blog-post_24.html


http://doordrishti.blogspot.com/2011/08/blog-post_24.html
 

बुधवार, 24 अगस्त 2011

मुझे तुमसे कुछ भी नहीं चाहिए...डॉ अमर कुमार



September 13, 2009 9:26 PM

खुशदीप जी, आपको अपनी आइकन सूची की समीक्षा समय समय पर करते रहना चाहिये, इसमें परिवर्तन होते रहेंगे, और होते रहना भी चाहिये ।


अपने लेखन शैली, अपने आग्रहों को साथ लेकर चलने वाले, और अपनी खुँदक को जीने वाले भी अपनी अपनी जगह पर आइकन ही हैं ।


इस प्रकार की समीक्षा सर्वग्राह्य ही हो, यह आवश्यक भी नहीं.. व्यर्थ ही इससे सहमति या असहमति जताना , अपनी नित बदलती चेतना के साथ खिलवाड़ होगा ।


भाई मेरे, ( बतर्ज़ स्व. मुकेश जी ) मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिये.. मुझे आइकन बनने से रोक लो.. बस तुम रोक लो ।


जहाँ कुछ गलत दिखता है, मैं इंगित अवश्य कर देता हूँ । यह मेरा व्यक्तिदोष है । यही मैं अपने लिये भी चाहता हूँ ।


यह तो हर कोई मानेगा कि, भले ही एक अपरिचित मनुष्य गड्ढे में पैर डालने जा रहा हो.. आप हठात ही उसे रोक लेते हैं, क्यों ?


तो.. यह तय रहा कि, " मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिये.. मुझे आइकन बनने से रोक लो.. बस तुम रोक लो " पर आप अमल करने जा रहे हैं ।


असीम शुभकामनायें !



ये शब्द जिस अज़ीम शख्सीयत के हैं, उसे सामने देखकर आज खुदा भी हैरान होगा कि इसके आराम के लिए जन्नत से भी ऊंचा स्थान कहां से लाऊं...सुबह उठते ही सतीश भाई के कमेंट से जाना कि डॉ अमर कुमार नहीं रहे...पढ़ कर आंखों पर धुंध छा गई और कान सन्न...थोड़ा संभला तो डॉ अमर का फोन नंबर मिलाया, इसी उम्मीद में कि दूसरी तरफ़ से आवाज़ आएगी...बोल खुशदीपे...फोन डॉ साहब के बेटे ने उठाया...अंकल पापा कल साढ़े पांच बजे चले गए...अब पापा को ले जा रहे हैं...

मैं सुन रहा था लेकिन समझ ही नहीं पाया...क्या बोलूं...डॉ अमर का जाना मेरे लिए एक ही साल में दो बार अनाथ होने जैसा है...पिछले साल पांच नवंबर को दीवाली वाले दिन पापा को खोया और अब डॉक्टर साहब को...डॉक्टर साहब का नाम उनके माता पिता ने बहुत सोच-समझ कर रखा होगा...अमर...कैंसर जैसी नामुराद बीमारी से भी लड़ते हुए एक सेकंड के लिए अपनी ज़िंदादिली नहीं खोने वाले इस शख्स का साथ पाकर खुदा भी अब अपनी किस्मत पर इतराएगा....राजेश खन्ना की फिल्म आनंद की आखिरी पंक्ति याद आ रही है...


आनंद मरा नहीं, आनंद कभी मरते नहीं...


इसे अब बदल देना चाहिए...

अमर मरे नहीं, अमर कभी मरते नहीं...

मैंने 12 सिंतबर 2009 को एक पोस्ट लिखी थी...इसमें डॉ अमर कुमार को अपना टॉप आइकन बताया था...उसी पोस्ट पर डॉ साहब ने ऊपर वाला कमेंट भेजा था...फिर मैंने 15 सितंबर 2009 को एक और पोस्ट लिखकर डॉ साहब को बताया था कि उन्हें अपना आइकन मानने से मुझे कोई भी नहीं रोक सकता, यहां तक कि डॉक्टर साहब भी नहीं...इस पर डॉक्टर साहब ने ये कमेंट भेजा था...


September 16, 2009 2:25 AM

आपने आइकन बनाया तो बुरा मान गये


सोच क्या है ये बताया तो बुरा मान गये


गोया..


खुद ही इशारा भी किया औ’ खुद ही सहारा भी दिया


जो कदम एक नया किसी ने बढ़ाया तो बुरा मान गये



लेकिन.. भाई मेरे, आख़िर मैं शर्म से लाल क्यों होता जा रहा हूँ ?




ये इटैलिक में टिप्पणी करने का डॉक्टर साहब का विशिष्ट अंदाज जिस पोस्ट पर भी मेहरबानी कर देता था वो पोस्ट ही खास हो जाती थी...मैं एक कोशिश कर रहा हूं डॉक्टर साहब की जितनी भी मेरी पोस्टों पर टिप्पणियां आई हैं, उन सभी का संग्रह करूं...इसी तरह हो सके तो आप भी ये कोशिश कीजिए और फिर सब को जमा कर अमर संकलन बनाया जाए...इस पुनीत आत्मा को ब्लॉग जगत की ओर से श्रद्धांजलि देने का वो सही तरीका रहेगा...आप सब की इस बारे में क्या राय है...

जनलोकपाल पर बन रही है बात...खुशदीप



मैंने सुबह कहा था कि मंगलवार को जनलोकपाल पर गतिरोध दूर करने के लिए सरकार कोई बड़ा ऐलान कर सकती है...दिन भर की कसरत के बाद रात साढ़े दस बजे प्रणब मुखर्जी के साथ दो घंटे की बैठक के बाद टीम अन्ना ने कई बातों पर प्रगति होने की जानकारी दी...अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण और किरण बेदी ने नार्थ ब्लाक से आने के बाद जो बताया उसमें टीम अन्ना की जो प्रमुख मांगे मानने को सरकार तैयार हो गई वो हैं-

बन गई है बात-

प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाना


भ्रष्टाचार के मामलों की सीबीआई का एंटी करप्शन ब्यूरो अलग से जांच नहीं करेगा...अब भ्रष्टाचार के सारे मामलों की जांच अकेले लोकपाल के तहत ही रहेगी

सांसदों का सदन में आचरण लोकपाल के तहत आएगा लेकिन साथ ही संविधान की धारा 105 का उल्लेख होगा...अभी तक सरकार का तर्क था कि संविधान की धारा 105 के तहत सांसदों का सदन में वोट देने या बोलने या प्रश्न पूछने की छूट है...टीम अन्ना ने तर्क दिया लेकिन धारा 105 में भ्रष्टाचार जैसे पैसे लेकर प्रश्न पूछने या वोट देने की छूट नहीं है


जजों के भ्रष्टाचार पर सरकार जो अलग से बिल लाएगी वो पहले टीम अन्ना को दिखाया जाएगा


----------------------------

पेंच अभी फंसा


रात बारह बजे तक जिन मुददों पर पेंच फंसा हुआ था और सरकार ने सोचने के लिए वक्त मांगा था, वो थे-


ग्रुप ए से नीचे के कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाना

केंद्र में लोकपाल के साथ ही सभी राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति


हर मंत्रालय के लिए सिटीजन चार्टर लाना, जिससे हर काम तय समय पर हो और कोताही बरतने वालों की तनख्वाह काटी जा सके


------------------------------

टीम अन्ना ने ये भी मांग की है कि जो लोकपाल बिल सरकार ने स्टैंडिंग कमेटी को भेजा है उसे निरस्त किया जाए

सरकार जनलोकपाल बिल को ही संसद के मौजूदा सत्र में ही दोनों सदनों से पास कराए...ज़रूरत हो तो संसद के मौजूदा सत्र को बढ़ाया जाए...

सरकार ने इन दोनों मुद्दों पर भी कल सुबह तक के लिए वक्त मांगा है...सरकार ने टीम अन्ना से कहा कि अन्ना का अनशन तुड़वाने के लिए प्रयास करें...इस पर टीम अन्ना का कहना था कि ज़रूरत पड़ने पर सभी मिलकर अन्ना से अपील करेंगे...कैबिनेट की राजनीतिक मामलों की समिति देर रात तक प्रधानमंत्री आवास पर आपातबैठक में माथापच्ची कर रही थी...

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

मेरे (कु)तार्किक सवाल का (सु)तार्किक जवाब दीजिए...खुशदीप




आज बहुत संभव है कि जनलोकपाल को लेकर चल रहा गतिरोध टूट जाए...टीम अन्ना ने पहले ही साफ़ कर दिया था कि अन्ना का अनशन आमरण अनशन नहीं है...जब तक उनका स्वास्थ्य अनुमति देगा, वो अनशन करेंगे...अनशन के छठे दिन अन्ना के खून और यूरिन में कीटोन मिलना संकेत है कि अन्ना के शरीर ने आवश्यक जैविक क्रियाओं की ऊर्जा के लिए चर्बी का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है...ऐसे में सरकार और टीम अन्ना दोनों को ही चाहिए कि अन्ना का अनशन समाप्त कराने के लिए प्रयास करे...हो सकता है संसद में सरकार आज कोई बड़ी घोषणा करे...

टीम अन्ना के सदस्य प्रशांत भूषण पहले ही कह चुके हैं कि अच्छे सुझाव आते हैं तो उन पर विचार किया जा सकता है...सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद मुझे लग रहा है कि सरकार के लोकपाल और टीम अन्ना के जनलोकपाल से कहीं ज़्यादा लॉजिक नेशनल कैंपेन फॉर पीपुल्‍स राइट फॉर इन्‍फॉर्मेशन (एनसीपीआरआई) के मंच तले लाए अरुणा राय के बिल में है...जिसमें एक की जगह पांच लोकपाल का सुझाव दिया गया है...

1.राष्ट्रीय भ्रष्टाचार निवारण लोकपाल- इसके दायरे में प्रधानमंत्री को कुछ शर्तो के साथ लाया जाए...प्रधानमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला चलाने का फैसला लोकपाल की पूर्ण पीठ करे और सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ अनुमोदन करे. सांसद और वरिष्ठ मंत्री लोकपाल के दायरे में रहें...

2.पृथक न्यायपालिका लोकपाल- न्यायपालिका के लिए अलग से...

3.केंद्रीय सतर्कता लोकपाल- दूसरी व तीसरी श्रेणी के अफसरों के भ्रष्टाचार के लिए सतर्कता आयोग को ही और अधिक ताकतवर बनाया जाए...

4.लोकरक्षक कानून लोकपाल- भ्रष्टाचार की शिकायत करने वाले लोगों की सुरक्षा मुहैया कराने के लिए...

5.शिकायत निवारण लोकपाल-जन शिकायतों के जल्द निपटारे के लिए...

मेरी राय में एक जनलोकपाल पर सारा लोड डालने की जगह कम से कम पांच लोकपाल ज़्यादा बेहतर ढंग से काम तो कर सकेंगे...

अरुणा राय की टीम ने जो लोकपाल बिल तैयार किया है इसमें प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने की बात तो है लेकिन उनका मसौदा न्यायपालिका को इस दायरे में रखने के समर्थन नहीं करता है...जबकि अन्ना के जनलोकपाल बिल में प्रधानमंत्री और न्यायपालिका दोनों को दायरे में रखने की बात कही गयी है जबकि सरकारी बिल प्रधानमंत्री और न्यायपालिका दोनों का विरोध कर रहा है...टीम अन्ना चाहती है कि लोकपाल केंद्र सरकार के कर्मचारियों के मामले को देखे जबकि एनसीपीआरआई का मानना कि राज्य सरकार के कर्मचारियों के मामलों को लोकायुक्त देखे. इसी तरह टीम अन्ना का मानना है कि शिकायतों को सुनने के लिए लोकपाल के अधीन एक अधिकारी होना चाहिए जबकि एनसीपीआरआई एक अलग शिकायत निवारण तंत्र चाहता है.

इस वक्त ज़रूरत है अपनी जिद पर अड़े रहने के बजाए एक दूसरे की बातों को शांत मन से सुना जाए...जिसकी जो बात सबसे अच्छी है उसे ही फाइनल लोकपाल बिल में जगह दी जाए...मकसद भ्रष्टाचार को मिटाना होना चाहिए एक दूसरे को नहीं...गांधी का यही फर्क है कि वो अपने आचरण से विरोधियों को भी अपना मुरीद बनाने का हुनर रखते थे...मान लीजिए सरकार या संसद मन से नहीं दबाव में टीम अन्ना के बिल को ही पारित कर देती है...तो ये कसक आगे चलकर कहीं न कहीं निकलेगी ज़रूर...ज़रूरत भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सबके साथ मिलकर चलने की है...

अब आता हूं अपने (कु) तार्किक प्रश्न पर...

अनशन के छठे दिन तो अन्ना कुछ नहीं बोले...लेकिन पहले पांच दिन वो वक्त वक्त पर स्टेज से लोगों को संबोधित करते रहे...बीच-बीच में टीम अन्ना के सदस्य और कवि कुमार विश्वास अपनी कविताओं से लोगों में जोश भरते रहे...विभिन्न कलाकार भी अपनी प्रस्तुतियां देते रहे...इस दौरान अन्ना-अन्ना-अन्ना का गुणगान भी मंच से होता रहा...विशेष तौर अन्ना के ऊपर बने गीत गाए जाते रहे...मेरा सवाल है कि क्या अन्ना के लिए अपना गुणगान सुनते रहना ठीक है...देशभूमि की शान में गाने और बात है लेकिन एक व्यक्ति का अपना ही महिमामंडन सुनना अलग बात है...क्या अन्ना को अपने सहयोगियों को ऐसा करने के लिए मना नहीं करना चाहिए था...या अन्ना को अपने प्रशंसा-गीत अच्छे लगते हैं...क्या गांधी भी ऐसा ही करते...

रविवार, 21 अगस्त 2011

कटोरे पे कटोरा, बेटा बाप से भी गोरा...खुशदीप


बचपन में ये कहावत सुना करता था...जनलोकपाल या लोकपाल को लेकर देश में जो हाय-तौबा मची है, उसे देखते हुए वो कहावत अचानक फिर याद आ गई...अपना मतलब साफ करूं, उससे पहले एक किस्सा...शायद ये किस्सा पढ़ने के बाद मेरी बात ज़्यादा अच्छी तरह समझ आ सके...

मक्खन जी को शेरो-शायरी की एबीसी नहीं पता...लेकिन एक बार जिद पकड़ ली कि शहर में हो रहा मुशायरा हर हाल में सुनेंगे...बड़ा समझाया कि तुम्हारी सोच का दायरा बड़ा है...ये मुशायरे-वुशायरे उसमें फिट नहीं बैठते...लेकिन मक्खन ने सोच लिया तो सोच लिया...नो इफ़, नो बट...ओनली जट..पहुंच गए जी मुशायरा सुनने...मुशायरे में जैसा होता है नामी-गिरामी शायरों के कलाम से पहले लोकलछाप शायर माइक पर गला साफ कर रहे थे...ऐसे ही एक फन्ने मेरठी ने मोर्चा संभाला और बोलना शुरू किया...

कुर्सी पे बैठा एक कुत्ता....

पूरे हॉल में खामोशी लेकिन अपने मक्खन जी ने दाद दी...वाह, वाह...

आस-प़ड़ोस वालों ने ऐसे देखा जैसे कोई एलियन आसमां से उनके बीच टपक पड़ा हो...उधर फन्ने मेरठी ने अगली लाइन पढ़ी...

कुर्सी पे बैठा कुत्ता, उसके ऊपर एक और कुत्ता...

हाल में अब भी खामोशी थी और लोगों के चेहरे पर झल्लाहट साफ़ नज़र आने लगी...लेकिन मक्खन जी अपनी सीट से खड़े हो चुके थे और कहने लगे...

भई वाह, वाह, वाह क्या बात है, बहुत खूब..

अब तक आस-पास वालों ने मक्खन जी को हिराकत की नज़रों से देखना शुरू कर दिया था...फन्ने मेरठी मंच पर अपनी ही रौ में बके जा रहे थे...

कुर्सी पे कुत्ता, उसके ऊपर कुत्ता, उसके ऊपर एक और कुत्ता...

ये सुनते ही मक्खनजी तो अपनी सीट पर ही खड़े हो गए और उछलते हुए तब तक वाह-वाह करते रहे जब तक साथ वालों ने खींचकर नीचे नहीं पटक दिया...

फन्ने मेरठी का कलाम जारी था..

.कुर्सी पे कुत्ता, उस पर कुत्ता, कुत्ते पर कुत्ता, उसके ऊपर एक और कुत्ता...

अब तक तो मक्खन जी ने फर्श पर लोट लगाना शुरू कर दिया था...इतनी मस्ती कि हाथ-पैर इधर उधर मारना शुरू कर दिया..मुंह से वाह के शब्द बाहर आने भी मुश्किल हो रहे थे...

एक जनाब से आखिर रहा नहीं गया...उन्होंने मक्खन से कड़क अंदाज में कहा...

ये किस बात की वाह-वाह लगा रखी है...मियां ज़रा भी शऊर है शायरी सुनने का या नहीं...इतने वाहिआत शेर पर खुद को हलकान कर रखा है...

मक्खन ने उसी मस्ती में उठ कर बड़ी मुश्किल से कहा...

ओ...तू शेर को मार गोली...बस कुत्तों का बैलेंस देख...



किस्सा सुना दिया...अब आता हूं असली बात पर...एक सीधा सा सवाल है कि अगर लोकपाल या उसके सदस्य भी भ्रष्ट निकल गए तो क्या होगा...टीम अन्ना के जनलोकपाल बिल का कहना है कि लोकपाल पर नज़र रखने के लिए एक और स्वतंत्र संस्था होनी चाहिए...अब मेरा तर्क (या कुतर्क) है कि अगर वो स्वतंत्र संस्था भी भ्रष्ट हो गई तो...तो फिर उसके ऊपर क्या एक और संस्था होगी...इसीलिए कह रहा हूं कि नई संस्था से भी ज़्यादा ज़रूरी है कि मौजूदा क़ानूनों का ही सख्ती, ईमानदार ढंग से पालन किए जाना...सरकार और राजनीतिक दलों पर देश की जनता का इतना प्रैशर रहना चाहिए कि ज़रा सा गलत काम किया नहीं कि गया काम से...पिछली लोकसभा में दस सांसद (राज्यसभा का भी एक सांसद) पैसे लेकर प्रश्न पूछने के मामले में अपनी सदस्यता खो बैठे थे...उनकी सदस्यता किसी लोकपाल ने नहीं संसद की ही एथिक्स कमेटी ने छीनी थी...उसी लोकसभा में बीजेपी का सांसद बाबू भाई कटारा कबूतरबाज़ी में दिल्ली एयरपोर्ट से पकड़ा गया तो पार्टी ने उसे निष्कासित किया...ऐसा ही दबाव हर वक्त हर नेता पर रहना चाहिए...उसे डर रहे कि गलत काम किया तो उसके घर के बाहर ही हज़ारों का हुजूम आकर जमा हो जाएगा...थोड़ा लॉजिकल होइए, जनलोकपाल से इतनी उम्मीदें मत पालिए कि बाद में निराश होना पड़े...

आखिर में ज़िक्र करना चाहूंगा सतीश पंचम जी की एक पोस्ट का...इस पोस्ट में सतीश जी ने दिवंगत शरद जोशी जी के दो दशक पहले लोकायुक्त नाम से लिखे व्यंग्य को उद्धृत किया है...मेरी विनती है इस लेख को सभी को ज़रूर पढ़ना चाहिए...

-------------------------------------------------------------------------

Lokpal : where the buck will stop...Khushdeep


अन्ना को विलायत से आया एक ख़त...खुशदीप




चलिए कई दिन की गंभीर पोस्ट के बाद आज कुछ टेस्ट चेंज किया जाए...अन्ना की मुहिम से देश की जनता को जब फायदा होगा सो होगा, लेकिन विलायत गए कुछ भारतीयों को ज़रूर फायदा हो गया...इसके लिए उन्होंने बाकायदा एक खत में अन्ना का शुक्रिया अदा किया है...


प्रिय अन्ना जी,


आपका हार्दिक आभार,


ईश्वर आपको ताकत दे जिससे कि आप सवा अरब भारतीयों की उम्मीदों पर खरा उतर सकें...आज़ादी के मतवालों ने अंग्रेज़ों से लंबा संघर्ष कर भारत को खुली हवा में सांस लेने का मौका दिया...आज भारत की आज़ादी के 64 साल बाद फिर अंग्रेजों से संघर्ष करते हुए कुछ भारतीय दम तोड़ने के कगार पर पहुंच गए हैं...आज़ादी के शहीदों का हमेशा हर भारतीय के दिलों में सम्मान रहेगा...लेकिन हम जो अब संघर्ष कर रहे हैं, हमारा कोई भारतीय नाम भी लेना नहीं पसंद कर रहा...लेकिन आपने ठीक इसी वक्त अपनी मुहिम चला कर हमें बचा लिया...सारा फोकस आप पर है...इस मोमेन्टम को कुछ दिन और बनाए रखिए...कम से कम हमारे वतन लौटने तक...वरना पूरा देश हमें कच्चा चबा जाएगा...


एक बार फिर आपको बहुत बहुत शुभकामनाएं...


आपके
.......................................................................................
.......................................................................................
.......................................................................................
.......................................................................................

एम एस धोनी, वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण, सुरेश रैना, युवराज सिंह, हरभजन सिंह, अमित मिश्रा, इशांत शर्मा, आरपी सिंह, श्रीशांत, प्रवीण कुमार, मुनफ़ पटेल, अभिनव मुकंद, विराट कोहली, प्रज्ञान ओझा
--------------------------------



शनिवार, 20 अगस्त 2011

अन्ना इज़ इंडिया, इंडिया इज़ अन्ना...खुशदीप


अन्ना भारत हो गए, भारत अन्ना हो गया...इंदिरा गांधी से पहले और बाद में अब तक किसी और शख्स के लिए ये नारा नहीं लगा था...अन्ना के लिए लगा है...सत्तर के दशक में देवकांत बरूआ ने इंदिरा के लिए कहा था इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा...अब टीम अन्ना की अहम सदस्य और देश की पहली महिला आईपीएस अफसर किरण बेदी ने अन्ना के लिए ये नारा लगाया...किसी शख्स को इंडिया बताने का नारा न साठ के दशक में समाजवाद के प्रतीक राम मनोहर लोहिया के लिए लगा और न ही सत्तर के दशक में संपूर्ण क्रांति के नायक जयप्रकाश नारायण के लिए...

इंदिरा सत्ता की प्रतीक थी...अन्ना सत्ता के अहंकार को तोड़ कर जनसंसद की लड़ाई लड़ रहे हैं...इंदिरा गांधी की राजनीतिक समझ का लोहा उनके विरोधी भी मानते थे...जेपी ने इंदिरा की राजनीतिक समझ की काट बदलाव के नारे के साथ अपने पीछे जनसैलाब खड़ा करके ढूंढी थी...ठीक वैसे ही जैसे आज अन्ना के पीछे हुजूम उमड़ रहा है...

अन्ना की सियासी समझ को उनकी टीम के सदस्य अरविंद केजरीवाल देश की राजनीतिक लीडरशिप में शून्यता का जवाब बता रहे हैं...बकौल केजरीवाल- "मैंने अन्ना से बहुत कुछ सीखा है...उनके जैसी राजनीतिक बुद्धिमत्ता किसी के पास नहीं है...वे आध्यात्मिकता और राजनीति के तालमेल की बेजोड़ मिसाल हैं...हमारे देश की जनता को राजनीतिक लीडरशिप में जो खालीपन दिखता है, उसे अन्ना भर रहे हैं"...


केजरीवाल ने साथ ही साफ किया कि राजनीति या 2014 के चुनावों में उतरने का टीम अन्ना का कोई इरादा नहीं है...एक तरफ टीम अन्ना खुद को राजनीति से दूर रखना चाहती है, वहीं साथ ही अन्ना के रास्ते को मौजूदा हालात में भारत की समस्याओं का समाधान बताकर सियासी सिस्टम पर चोट करना चाहती है...जताना चाहती है कि देश की वर्तमान राजनीतिक धारा लोगों का भरोसा खो चुकी है और देश की सारी आस अन्ना पर ही आ टिकी है..इसलिए केजरीवाल ये जताना भी नहीं भूले कि अन्ना जैसा चाहते हैं आंदोलन की दिशा को वैसे ही बढ़ाया जा रहा है और अन्ना को कोई बरगला नहीं सकता...

ये पहला मौका है जब टीम अन्ना ने देश में राजनीतिक शून्यता और अन्ना इज़ इंडिया, इंडिया इज़ अन्ना की बात एकसाथ की है...वही टीम अन्ना जिसने अब तक ये सावधानी बरती है कि कोई भी राजनेता मंच पर अन्ना के आसपास भी न फटके...टीम अन्ना खुद को चुनावी राजनीति से हमेशा दूर रखने की बात कर रही है...लेकिन वो देश को ईमानदार राजनीतिक विकल्प देने की बात क्यों नहीं सोचती...

मैं तो कहता हूं कि टीम अन्ना के सारे सदस्य चुनाव लड़ें...उन्हें पक्का जिताने की ज़िम्मेदारी सारी देश की जनता की है...इस तरह कुछ ईमानदार सांसदों की गारंटी तो देश को मिलेगी...और अगर टीम अन्ना और अच्छे लोगों को भी साथ जोड़कर चुनाव में उतारती है तो उससे देश में बहुत कुछ सुधरेगा...मेरा मानना है कि अगर जनता जिसे जिताने पर आ जाए तो उसे कोई नहीं रोक सकता...न धनबल और न ही बाहुबल...अगर ऐसा ही हो कि अच्छे लोगों को चुनाव लड़ाने की व्यवस्था भी उस क्षेत्र की जनता ही करे...वोट के साथ चुनावी इंतज़ाम के नोट लेकर भी साथ आए...इस तरह चुना गया जनप्रतिनिधि ही जनता का सच्चा नुमाइंदा होगा...सही तरह से जनता के हक की आवाज संसद, विधानसभा या पंचायतों में उठा सकेगा...


टीम अन्ना को राजनीति से इतना परहेज़ क्यों हैं...क्या राजनीति में शतप्रतिशत लोग बुरे हैं...या टीम अन्ना जानती है कि राजनेताओं को लेकर ही लोगों में सबसे ज़्यादा गुस्सा है...और एक रणनीति के तहत राजनीति से दूरी रखी जा रही है...ये सच है कि देश में त्याग की भावना दिखाने वालों को इंस्टेंट हीरो का दर्जा मिल जाता है...लेकिन ये वक्त त्याग का नहीं आगे बढ़ कर कमान संभालने का है...सभी वर्गों को साथ जोड़ने का है...

अभी कहा जा रहा है कि ये मीडिया का अन्ना उत्सव है और शहरों तक ही सीमित है...इंटरनेट जेनेरेशन या खाए-पिए-अघाए लोग ही अन्ना के पीछे हैं...ऐसे आरोपों को टीम अन्ना को खारिज करना है...गांवों में ये मुहिम अन्ना के गांव रालेगण सिद्धि तक ही न सिमटी रहे...देश के सभी गांवों में भी इसका असर दिखे...गांधी की स्वीकार्यता बिना कोई भेद हर तबके में थी...उस वक्त बिना किसी मीडिया के संजाल गांधी ने पूरे देश को अपने पीछे जोड़ा...शहरों में भी गांव मे भी...जेपी के वक्त भी सरकारी दूरदर्शन का ही बोलबाला था...उन्होंने तमाम विपरीत परिस्थितिओं के बावजूद संपूर्ण क्रांति को सफल बना कर दिखाया...ये बात अलग है कि उन्हीं के आंदोलन से निकले कुछ चेले राजनीति में बड़ा नाम बनकर महाभ्रष्ट साबित हुए...

अन्ना के इस आंदोलन का क्या नतीजा सामने आएगा...मैं नहीं जानता...लेकिन इस अन्ना इफैक्ट का ये फायदा ज़रूर होगा कि नेता या अफसर भ्रष्टाचार करते हुए अब सोचेंगे ज़रूर...मेरी शुभकामनाएं हैं कि अन्ना की इस मुहिम से देश से भ्रष्टाचार खत्म हो जाए...जनलोकपाल या लोकपाल जैसी संस्था या व्यक्ति में सारे अधिकार सीमित कर देने को लेकर मेरी कुछ शंकाएं हैं जो हमेशा रहेंगी...भगवान करे मैं गलत साबित हूं और जनलोकपाल भ्रष्टाचार को देश से जड़ से मिटाने में कामयाब हो...

इस पूरे आंदोलन में शुक्रवार रात को रामलीला मैदान एक अद्भुत नज़ारा देखने को मिला...एक युवती बड़े जोश में अन्ना के लिए नारे लगा रही थी...ठीक वैसे ही जैसे वैष्णोदेवी तीर्थ पर भक्त लगाते हैं...ज़ोर से बोलो जय माता की तर्ज पर...आगे वाले भी बोलो...पीछे वाले भी बोलो...सारे बोलो...मिल कर बोलो...जय अन्ना की...

अन्ना को एक ही दिन में इंडिया और भगवान बनते देखना वाकई सुखद था....

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

अन्ना इफैक्ट : अपनी अक्ल भी लड़ाइए...खुशदीप



कम से कम मैं ये नहीं मान सकता कि जनलोकपाल या लोकपाल के आते ही देश में रामराज्य आ जाएगा...न ही अन्ना के इस भरोसे को मान सकता हूं कि देश से पैंसठ फीसदी भ्रष्टाचार मिट जाएगा...भ्रष्ट से त्रस्त लोगों को इस वक्त सुनने में चाहे सब बड़ा अच्छा लग रहा हो लेकिन व्यावहारिकता के पैमाने पर तौला जाए तो ये मुमकिन नहीं है...ऐसे में ये सवाल पूछा जा सकता है कि क्या फिर हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहे...

अपनी बात को और साफ़ करने के लिए आपको एक तस्वीर दिखाता हूं...देश की अदालतों में कितने मुकदमे फैसले के इंतज़ार में पड़े हैं...31 दिसंबर 2010 को सुप्रीम कोर्ट में 54,562 , इक्कीस हाईकोर्टों में 4,217,309 और निचली अदालतों में 27,953,070 यानि देश भर में 32,225,535 मुकदमे फैसले का इंतज़ार कर रहे थे...आज की तारीख से मान लिया जाए कि एक भी मुकदमा और नया नहीं आएगा तो इन सभी मुकदमों का निपटारा होने में डेढ़ सौ साल लग जाएंगे...

अब इस तस्वीर को देखने के बाद फिर आइए जनलोकपाल (मैं मान कर चल रहा हूं कि अन्ना के दबाव से जनलोकपाल बिल ही पास होगा) पर...देश में कहावत मशहूर है सौ में निन्नयानवे बेइमान, फिर भी मेरा भारत महान...सोचिए अगर सभी भ्रष्टों को घेरे में लेना है तो जनलोकपाल के लिए कितना बड़ा तामझाम फैलाना होगा...जाहिर है जनलोकपाल के दस सदस्य सुपरमैन तो होंगे नहीं जो पलक झपकते ही सब शिकायतों में दूध का दूध और पानी का पानी करते चलेंगे....अब जनलोकपाल के पास प्रधानमंत्री तक को औकात दिखा देने की ताकत होगी तो उसका चौबीस कैरेट सोने जैसा खरा होना भी ज़रूरी होगा...साथ ही कानूनन तौर पर भी उसका जीनियस होना बहुत ज़रूरी होगा...चलिए मान लीजिए ऐसा व्यक्ति मिल भी गया, क्या गारंटी उसके मातहत काम करने वाले भी सब वैसे ही होंगे...

अब मेरे एक सवाल का जवाब दीजिए...कौन सा ऐसा अपराध है जिससे निपटने के लिए देश के मौजूदा क़ानूनों में प्रावधान नहीं है...प्रधानमंत्री से लेकर संतरी तक कौन सा ऐसा शख्स है जो मौजूदा क़ानूनों के दायरे में आने से बच सकता है...समस्या क़ानून की नहीं है, समस्या क़ानून के अमल की है...अगर इन्हीं क़ानूनों का सही ढंग से अमल किया जाए तो सब कुछ खुद ही सुधर जाएगा...इसके लिए मज़बूत इच्छाशक्ति वाली ईमानदार सरकार का होना ज़रूरी है...वो तभी बनेगी जब हम अच्छे लोगों को चुनकर संसद में भेजेंगे...मैं किसी पार्टी का समर्थक नहीं हूं....बीजेपी में मैं अटल बिहारी वाजपेयी को पसंद करता हूं...लेफ्ट में सोमनाथ चटर्जी का कायल हूं...तृणमूल की ममता बनर्जी पर मैं भरोसा करता हूं...जिस तरह अन्ना की बेदाग ईमानदारी को कोई खारिज नहीं कर सकता, इसी तरह मनमोहन सिंह की व्यक्तिगत ईमानदारी, योग्यता, भलमनसाहत और अच्छे कामों को भी एक दिन में खारिज नहीं किया जा सकता...मैं यहां इन लोगों का नाम इसलिए ले रहा हूं कि राजनीति में भी सब बुरे नहीं है...अच्छे ही लोगों को चुनिए, चाहे वो किसी भी पार्टी में क्यों न हो, किसी भी फील्ड में क्यों न हों...सब कुछ अपने आप सुधरता चलेगा...

हम भारतीयों की एक आदत है जो अपने पास होता है, उससे संतोष नहीं होता...इसलिए नया कुछ जोड़ने की ओर हमेशा ताकते रहते हैं...ऐसा ही कुछ जनलोकपाल को लेकर है...एक ही शख्स, एक ही संस्था में सारे अधिकार सीमित कर देना क्या इस देश के लिए श्रेयस्कर होगा...क्या इस बात पर भी हमें गंभीरता से नहीं सोचना चाहिए...

मैं भ्रष्टाचार से देश को सौ फीसदी मिटाने का कट्टर समर्थक हूं...मार्च-अप्रैल में मैंने ब्लॉग पर अन्ना के समर्थन के लिए जो मुझसे बन सका था, मैंने किया था...लेकिन इस दौरान ऐसा बहुत कुछ हुआ जिसने मुझे और भी बहुत कुछ सोचने को मजबूर किया...ये वक्त अन्ना पर अंधश्रद्धा का नहीं है...ये वक्त हर भारतीय के अपने अंतर्मन में झांकने का है...ये सोचने का है कि सिवा अपना फायदा सोचने के इस देश के लिए क्या किया..गांधी डर से किसी को नहीं बदलते थे...वो इनसान को अंदर से बदलने की कोशिश करते थे...जनलोकपाल आखिर कितनों पर डंडा चलाएगा...क्या गारंटी की वहां भी जुगाड़ू बचने का रास्ता नहीं निकाल लेंगे...ज़रूरत है आज इस तरह बदलने की...सौ में से एक बेइमान, इसलिए मेरा भारत महान...और ये तभी होगा जब सब खुद अपने को बदलेंगे...अन्ना जैसे ईमानदार हो जाएंगे...तब जो रास्ता निकलेगा वही फिर भारत को सोने की चिड़िया बनाने की ओर ले जाएगा...बाकी सारी बातें मेरी नज़र मे मृगतृष्णा हैं...

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

अन्ना की आंधी लेकिन कहां हैं गांधी...खुशदीप




अनशन गांधी का प्रमुख हथियार था...अन्ना ने भी विरोध का यही रास्ता चुना है....लेकिन इसे इस्तेमाल करने का दोनों का तरीका बिल्कुल जुदा है....गांधी का विरोध करने का मकसद व्यवस्था में सुधार करना और शत्रुओं को भी मित्र बनाना था...लेकिन अन्ना इसे अपने से अलग राय रखने वालों पर निशाना साधने का औजार बना रहे हैं...लोकतंत्र अब भी हमारे देश में बाकी है...ये नहीं भूलना चाहिए कि सरकार कितनी भी निकम्मी क्यों न हो, उसे हमने ही चुनकर भेजा है...ऐसे में सरकार और जनता के बीच इतनी बड़ी खाई आ जाना, कई तरह की समस्याओं को जन्म दे सकता है...सरकार से इतना गुस्सा है, हटा दो इसे...नई सरकार ले आओ...लाओगे कहां से दूध के धुले लोगों की सरकार...उसका तरीका यही है कि चुनाव में अच्छे लोगों को संसद में भेजो...लेकिन इस वक्त जो मध्यम वर्ग या उच्च मध्यम वर्ग अन्ना अन्ना चिल्ला रहा है, वही उस वक्त घरों से निकल कर मतदान करने की जेहमत उठाना भी पसंद नहीं करता...रातों रात कोई सूरत नहीं बदल सकती...मेरा अब भी यही कहना है कि सरकार का मज़बूत विकल्प तैयार करने के लिए दिन-रात लगो...अराजकता का माहौल तैयार कर किसी का भला नहीं होने वाला...


अन्ना जब तक तिहाड़ में अड़े हैं, बाहर लोगों का हुजूम उमड़ा पड़ा है...इस हुजूम में से ज़्यादातर को लोकपाल और जनलोकपाल का अंतर भी नहीं पता...लेकिन देखादेखी सब एक दूसरे के पीछे हैं...इस हुजूम के वहां जुटने से हुआ क्या...अंदर तेरह हज़ार कैदियों के लिए रोजाना का ज़रूरी सामान दूध, सब्ज़ियां, फल जो ट्रकों के ज़रिए अंदर जाता था, उसे ही भेजने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा...अब भले ही सारे कैदियों को वक्त पर खाना न मिले...

लेकिन जिद तो जिद है...जिद भी किस लिए अनशन को बड़ा मैदान मिले...क़ानून की कोई बंदिश न हो...मीडिया का जमावड़ा हो...लाखों लोग जुटे...उनके साथ ही अनशन किया जाए...ये कैसा अनशन है भाई...अनशन तो घर के कमरे या जंगल से भी किया जा सकता है...16 अगस्त 1947 को गांधी कोलकाता के एक कमरे में अंधेरा कर चुपचाप बैठे थे...आप ये रास्ता क्यों नहीं चुन सकते...आप अनशन के लिए जगह पर ज़ोर क्यों दे रहे हैं...चाहे जंगल से भी अनशन शुरू करे, अगर आपका मकसद सच्चा है तो वही रामलीला मैदान बन जाएगा...

महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी का कहना है कि गांधी होते तो वो हालात को इस स्तर तक पहुंचने ही नहीं देते...भ्रष्टाचार की बीमारी शुरू होते ही उसके खात्मे के लिए सक्रिय हो जाते...न कि इंतज़ार करते कि कैंसर पहले पूरे शरीर को जकड़ ले, फिर इलाज शुरू करेंगे...गांधी को आभास था कि आज़ादी के बाद देश में क्या हो सकता है...इसीलिए उन्होंने आज़ादी मिलते ही कांग्रेस को खत्म करने की सलाह दी थी...

हमारे देश के लोगों में से ज़्यादातर का मन अब भी बहुत साफ़ है...निश्चल है...वो अपने दुख-दर्द दूर होने के लिए हर वक्त किसी मसीहा का इंतज़ार करते रहते हैं...अब ये मसीहा अन्ना में दिख रहा है तो सब उनके पीछे हैं...लेकिन कल उनकी उम्मीदें टूटेंगी तो उन्हें अन्ना में ही खोट नज़र आने लगेगा...हमारी राजनीति की त्रासदी है कि यहां लोगों को अब आइकन नज़र नहीं आते...जिस फील्ड में भी कोई नामी हस्ती ईमानदार नज़र आती है तो वो उसे ही भगवान मान लेते हैं...चाहे वो अमिताभ बच्चन हों या सचिन तेंदुलकर...

याद कीजिए अस्सी के दशक के शुरूआती दिनों को...अमिताभ की छवि उस वक्त स्क्रीन पर सिस्टम से लड़कर दुखियों का दर्द दूर करने की थी...हर आदमी अमिताभ को पर्दे पर देखकर तालियां बजाता था...इन्हीं अमिताभ को कुली फिल्म की शूटिंग के दौरान हादसे में पेट में खतरनाक चोट लगी और वो मौत के मुंह तक पहुंच गए तो पूरे देश में उनके चंगे होने के लिए दुआएं होने लगीं...अमिताभ ठीक हुए और लगे हाथ 1984 में इलाहाबाद में चुनाव में उतर कर लोकसभा भी पहुंच गए...वो भी हेमवती नंदन बहुगुणा जैसी शख्सीयत को पटखनी देने के बाद....लेकिन उसके बाद क्या हुआ जल्दी ही तिलिस्म टूटा और इलाहाबाद ने अमिताभ से और अमिताभ ने राजनीति से तौबा कर ली...

इसलिए मेरी विनती यही है कि आंदोलन के लिए जुटिए, लेकिन अपने आंख-कान हर वक्त खुले रखिए...ऐसी व्यवस्था के लिए जुटिए जहां हम सबकी भागीदारी होने के साथ हमारी भी ज़िम्मेदारी हो कि हमने गलत व्यक्ति को चुनकर भेजा, जिसकी सज़ा हमें मिलनी ही चाहिए, जब तक कि उस व्यक्ति के हटने लायक हम फिर परिस्थितियां नहीं बना देते...और वो जनप्रतिनिधियों के लिए राइट टू रीकाल कानून से ही मुमकिन हो सकता है...ऐसे क़ानूनों के लिए ज़्यादा ज़ोर लगाइए...हां सिस्टम से खीझे हुए हैं तो एक-दो दिन रामलीला मैदान में जाकर अन्ना-अन्ना कर आइए...आखिर लौटना तो पड़ेगा ही काम पर...घर-बार चलाने के लिए अन्ना तो नहीं आएंगे, वो तो आपको खुद ही चलाना है....

बुधवार, 17 अगस्त 2011

अन्ना में गांधी को गढ़ना...खुशदीप


अन्ना हज़ारे और लोकतंत्र साथ-साथ नहीं चल सकते...अन्ना बात लोकतंत्र की करते हैं लेकिन स्वभाव से तानाशाह है...ये कहना है पूर्व केंद्रीय मंत्री मोहन धारिया का...मोहन धारिया अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार निर्मूलन न्यास (बीएनएन) में पूर्व सहयोगी रहे हैं...



अभी अन्ना की आंधी चल रही है...हर कोई उसके साथ बहने को बेताब है...लेकिन आंधी के गुज़रने के बाद जब हम ठंडे दिमाग से सोचेंगे तो समझ आएगा कि क्या गलत है और क्या सही...टीम अन्ना ने देश से भ्रष्टाचार को मिटाने का जो मुद्दा चुना है, मैं शत-प्रतिशत उसके साथ हूं...लेकिन इसके लिए लोकतंत्र को बंधक बनाने के जो तरीके अपनाए जा रहे है, उनसे मैं सहमत नहीं हूं...अन्ना को गांधी बताया जा रहा है...लेकिन गांधी ऐसा कभी नहीं करते जैसा अन्ना ने राजघाट पर किया...इतने लोगों और कैमरों की उपस्थिति में ये कैसा ध्यान था...मुझे समझ नहीं आया...

गांधी को अनशन के लिए लाइम-लाइट अपने ऊपर रखने के लिए कभी कोशिश नहीं करनी पड़ी...गांधी खुद प्रकाश-पुंज थे...वो एक कमरे से भी अनशन शुरू कर देते थे तो ब्रिटिश हुकूमत के पसीने आने शुरू हो जाते थे...मेरा सवाल है कि अन्ना को अनशन के लिए इतने ताम-झाम की ज़रूरत क्यों है...और ये ताम-झाम जिस हाई-टेक अभियान के ज़रिए जुटाया जा रहा है वो आंदोलन के गांधीवादी होने पर खुद सवाल उठा देता है...अगर इस अभियान के लिए पैसे का स्रोत अमेरिका की फोर्ड फाउंडेशन और बदनाम लेहमन ब्रदर्स से निकलता है तो माफ़ कीजिएगा फिर ये पूरा आंदोलन ही बेमानी है...

ये सही है कि निकम्मी सरकार को लेकर देश के लोगों में बहुत गुस्सा है...भ्रष्टाचार के चलते मेरे, आपके, हम सबकी जेब में बड़ा छेद होता जा रहा है...लेकिन इस गुस्से को कैश कर देश को अस्थिर करने की कोई बड़ी साज़िश रची जा रही है तो हमें उसके लिए भी सचेत रहना होगा...सिविल सोसायटी क्यों इस रुख पर अड़ी है कि हमने जो कह दिया सो कह दिया, आपको वो मानना ही पड़ेगा...चलिए मान लेते हैं आपकी बात...बना देते हैं आपके जनलोकपाल बिल को ही क़ानून...लेकिन ऐसा कोई भी क़ानून बना और किसी ने भी उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी तो वो पहली बार में ही उड़ जाएगा...फिर आप ऐसा बीच का रास्ता क्यों नहीं निकालते कि सबकी सहमति से ऐसा फुलप्रूफ सिस्टम बने जिस पर बाद में उंगली उठाने की कोई गुंजाइश ही न बचे...

मैंने पहले भी एक पोस्ट में लिखा था कि सिर्फ पांच लोगों को कैसे देश का भविष्य तय करने की अनुमति दी जा सकती है...क्या सिविल सोसायटी को अपना कैनवास बड़ा करते हुए देश के और अच्छे लोगों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए...ढ़ूंढने पर निकलें तो पूर्व राष्ट्रपति कलाम, मैट्रोमैन ई श्रीधरन जैसे कई बेदाग नाम निकल आएंगे जिनकी राय बड़ी अहमियत रखेगी...ये वो नाम हैं जिनकी पूरे देश में स्वीकार्यता है...

ऐसा माहौल नहीं तैयार होना चाहिए कि हम कुएं से निकलें और खाई में गिर जाएं...कांग्रेस से छुटकारा पाएं और फिर सत्ता में उससे भी बुरा विकल्प सामने आ जाए...इस सवाल पर कोई विचार नहीं कर रहा...कांग्रेस के बाद कैसे मज़बूत विकल्प देश को दिया जाए...अगर मौजूदा राजनीतिक दलों में से ही ये विकल्प निकलना है तो फिर 1977, 1990 की पुनरावृत्ति के लिए ही तैयार रहिए...जल्दी ही वो विकल्प धराशाई होगा और फिर आपको कांग्रेस ही राज़ करती दिखाई देगी...

वही कांग्रेस जिसकी प्रबंधन टीम ने आज इसकी छवि आतताई ब्रिटिश हुकूमत जैसी कर दी है...राहुल गांधी ने विदेश से लौटते ही ऐसा आभास दिया कि अन्ना क्राइसिस को सुलझाने के लिए वो कमान अपने हाथ में लेना चाहते हैं...मनीष तिवारी, दिग्विजय सिंह, कपिल सिब्बल और अन्य कांग्रेस नेताओं की तरफ से अन्ना के खिलाफ जो बयानबाजी हो रही थी, उस पर अचानक ब्रेक लगे...अब ऐसा भी जताया जा रहा है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री से बातचीत कर टीम अन्ना से समझौते के लिए कोई रास्ता निकालना चाहते हैं...जो भी होगा वो एक दो दिन में आपके सामने आ जाएगा...लेकिन राहुल जी, अगर यही सब करना था तो इंतजार किस बात का किया जा रहा था...क्या देखना चाह रहे थे कि अन्ना के समर्थन में कितने लोग घरों से निकलते हैं...राहुल आप राजनीति का एक मास्टरस्ट्रोक चलने में चूक गए हैं...15 अगस्त को आप भी उस वक्त राजघाट पर अन्ना के साथ बैठने के लिए चले जाते और आशीर्वाद लेकर वही समझौते की दिशा में बढ़ने का ऐलान कर देते तो आज जो तस्वीर दिख रही है, वो उससे बिल्कुल उलट होती...


खैर इस वक्त तो बापू का भजन ही गाया जा सकता है...रघुपति राघव राजा राम, सबको सम्मति दे भगवान...

------------------------------------







सोमवार, 15 अगस्त 2011

16 अगस्त...मेरे ब्लॉगिंग के दो साल...खुशदीप

आज 16 अगस्त है...देश-विदेश की नज़रें अन्ना हज़ारे पर हैं...

64 साल की आज़ादी...मेरा भारत महान...मदमस्त सरकार...लुंजपुंज विपक्ष...विपक्ष के रोल में सिविल सोसायटी...आंदोलन का प्लेटफॉर्म...अन्ना का मुखौटा...दूसरी आज़ादी का ख्वाब...बापू का ध्यान...राजघाट पर मजमा...15 अगस्त को अंधेरा...16 अगस्त का सवेरा...पुलिस क्या करेगी...सरकार क्या करेगी...अन्ना क्या करेंगे...लोग क्या करेंगे...मीडिया क्या करेगा...अरे छोड़िए न...मनोज कुमार का गाना याद कीजिए... इक तारा बोले...क्या कहे वो तुमसे...तुन तुन...तुन तुन...

चलो ये तो हो गई अन्ना के आंदोलन की बात...

लेकिन मेरे लिए 16 अगस्त के एक दूसरे मायने भी हैं...आज से ठीक दो साल
पहले मेरी ब्लॉगिंग की शुरुआत हुई...16 अगस्त 2009 को देशनामा पर पहली पोस्ट लिखी थी...कलाम से सीखो शाहरुख...हुए सिर्फ दो साल हैं...लेकिन लगता है कि आप सब से न जाने कब का नाता है...इतने दोस्त, बुज़ुर्गों का आशीर्वाद, छोटों का प्यार...क्या नहीं मिला यहां...कौन कहता है ये आभासी दुनिया है...



दो साल की ब्लॉगिंग में मैंने पाया कि ये दुनिया हक़ीक़त की दुनिया से कहीं ज़्यादा ज़िंदादिल है...जैसे परिवार में, दोस्तों में झगड़े होते हैं, वैसी तल्खी यहां भी कभी-कभी देखने को मिलती है...उखाड़-पछाड़ यहां भी हैं...लेकिन जीवन के नौ रसों की तरह इन सबका होना भी ज़रूरी है...तड़के बगैर दाल हो तो स्वाद कहां आता है...हां अगर सिर्फ तड़का ही तड़का रह जाए और दाल गायब हो जाए तो पेट का खराब होना भी निश्चित है...जैसे हिंदुस्तान को अलग अलग फूलों से सजा गुलदस्ता कहा जाता है, ऐसे ही ब्लॉगिंग भी है...दूसरों की खुशबू को भी सराहना सीखिए...कांटा चुभे तो बुरा मत मानिए...

किसी ब्लॉग को पढ़ने के बाद जो आपका अंतर्मन कहता हो, उसी से दूसरे को अवगत कराइए...ये विचारों का अंतर्द्वंद्व ही ब्लॉगिंग की असली ताकत है...इसी से ब्लॉगिंग और व्यक्तिगत स्तर पर विकास हो सकता है...आज नाम किसी का नहीं ले रहा लेकिन जिन्होंने मुझे दो साल में प्रोत्साहित किया, उन्हें शुक्रिया जान कर नहीं कह रहा...मेरी समझ से शुक्रिया परायों का किया जाता है...यहां तो सब अपने हैं...हां, जाने-अनजाने मेरे किसी बोल या कृत्य से किसी का दिल दुखा हो तो ज़रूर नासमझ समझ कर माफ़ कर दीजिएगा...वैसे गाना तो यहां मेरा सबसे मनपसंद ही फिट होता है..एहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तों..लेकिन आज आपको दूसरा गाना सुनाता हूं...

ना मैं भगवान हूं, ना मैं शैतान हूं,दुनिया जो चाहे समझे मैं तो इनसान हूं,
मुझ में भलाई भी मुझ में बुराई भी,
लाखों हैं मैल दिल में, थोड़ी सफाई भी,
थोड़ा सा नेक हूं थोड़ा बेइमान भी,
दुनिया जो चाहे समझे मैं तो इनसान हूं,
दुनिया जो चाहे समझे मैं तो इनसान हूं
ना कोई राज है ना सर पे ताज है,
फिर भी हमारे दम से धरती की लाज है,
तन का गरीब हूं मन का धनवान हूं,
दुनिया जो चाहे समझे मैं तो इनसान हूं,
जीवन का गीत है सुर में ना ताल में,
उलझी है सारी दुनिया रोटी के जाल में,
कैसा अंधेर है, मैं भी हैरान हूं,
दुनिया जो चाहे समझे मैं तो इनसान हूं.,
ना मैं भगवान हूं, ना मैं शैतान हूं,
दुनिया जो चाहे समझे मैं तो इनसान हूं...

(फिल्म- मदर इंडिया (1957), गीतकार- शकील बदायूंनी, संगीत- नौशाद, गायक- मुहम्मद रफ़ी)



रविवार, 14 अगस्त 2011

जय हिंद, जय हिंद की सेना...खुशदीप

हम सब भारत के नागरिक हैं...64 साल के आज़ाद देश भारत के नागरिक...हमारी हज़ार ख्वाहिशें हैं...लेकिन फौजी की एक ही ख्वाहिश होती है...जानते हैं क्या...दुश्मन को छठी का दूध याद दिला कर घर सही सलामत लौटना...हम आज़ाद हवा में सांस ले रहे हैं...हमारी आज़ादी बरकरार है...किसकी बदौलत...सिर्फ देश के इन रणबांकुरों के दम पर...15 अगस्त देश के साथ हम सबके लिए बहुत अहम है...इस तारीख से अपना फायदा ढ़ूंढने की कोशिश किसी को नहीं करनी चाहिेए...न किसी राजनीतिक दल को और न ही किसी मूवमेंट को...इस दिन बत्तियां बुझाने का संदेश देना, मेरे विचार से सही नहीं है...किसी का कद कितना भी बड़ा क्यों न हो, लेकिन देश के फौजियों से ऊंचा नहीं हो सकता...



भ्रष्टाचार पर बेशक हम सरकार से हर दिन लड़ें लेकिन 15 अगस्त जैसे पवित्र राष्ट्रीय पर्व को राजनीति से दूर ही रहने दें...बर्फ से लदी चोटी पर खड़े अपने निगहेबान किसी फौजी को याद कीजिए...याद कीजिए देश के शहीदों को, कवि प्रदीप के इन अमर बोलों के साथ...



ऐ मेरे वतन के लोगो!
तुम खूब लगा लो नारा !
ये शुभदिन है हम सबका!
लहरा लो तिरंगा प्यारा
पर मत भूलो सीमा पर!
वीरों ने है प्राण गँवाए!


कुछ याद उन्हें भी कर लो
जो लौट के घर न आए,
ऐ मेरे वतन के लोगो!
ज़रा आँख में भरलो पानी!
जो शहीद हुए हैं उनकी!
ज़रा याद करो क़ुरबानी...


जब घायल हुआ हिमालय!
खतरे में पड़ी आज़ादी!
जब तक थी साँस लड़े वो!
फिर अपनी लाश बिछा दी
संगीन पे धर कर माथा!
सो गये अमर बलिदानी!
जो शहीद हुए हैं उनकी!
ज़रा याद करो क़ुरबानी...


जब देश में थी दीवाली!
वो खेल रहे थे होली!
जब हम बैठे थे घरों में!
वो झेल रहे थे गोली
थे धन्य जवान वो अपने!
थी धन्य वो उनकी जवानी!
जो शहीद हुए हैं उनकी!
ज़रा याद करो क़ुरबानी...


कोई सिख कोई जाट मराठा
कोई गुरखा कोई मदरासी
सरहद पे मरनेवाला!
हर वीर था भारतवासी
जो ख़ून गिरा पर्वत पर!
वो ख़ून था हिंदुस्तानी!
जो शहीद हुए हैं उनकी!
ज़रा याद करो क़ुरबानी...


थी खून से लथपथ काया!
फिर भी बन्दूक उठाके!
दस-दस को एक ने मारा!
फिर गिर गये होश गँवा के
जब अन्त समय आया तो!
कह गये के अब मरते हैं!
ख़ुश रहना देश के प्यारो
अब हम तो सफ़र करते हैं
क्या लोग थे वो दीवाने!
क्या लोग थे वो अभिमानी!
जो शहीद हुए हैं उनकी!
ज़रा याद करो क़ुरबानी...


तुम भूल न जाओ उनको!
इसलिये कही ये कहानी!
जो शहीद हुए हैं उनकी!
ज़रा याद करो क़ुरबानी...


जय हिन्द। जय हिन्द की सेना,
जय हिन्द, जय हिन्द, जय हिन्द...

सी रामचंद्र के संगीतबद्ध इस गीत को पहली बार लता मंगेशकर ने 26 जनवरी 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान पर गाया था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू समेत सभी की आंखों से गंगा-जमुना की तरह आंसुओं की धारा बह उठी थी...इस गाने से जुड़े किसी भी व्यक्ति ने एक पैसा भी फीस नहीं ली थी...कवि प्रदीप ने गाने की रायल्टी से मिलने वाली सारी रकम वार विडोज़ फंड को देने का ऐलान किया था...

------------------------------

Legendary actor Shammi Kapoor passes away


शम्मी कपूर जी को श्रद्धांजलि...खुशदीप


1931-2011

शम्मी कपूर जी का आज सुबह मुंबई में अस्सी साल की उम्र में निधन हो गया...पूरे ब्लॉगवुड की तरफ से याहू स्टार को श्रद्धांजलि...




शनिवार, 13 अगस्त 2011

मैं कहीं 'कवि' न बन जाऊं...खुशदीप

आजकल फेसबुक पर सुबह गुरुदेव समीर लाल जी अपनी एक फोटो के साथ दो लाइन लिखकर सबको इल्ले से लगा देते हैं...भारत की सुबह का मतलब कनाडा की रात है...गुरुदेव सोने चले जाते हैं और फिर पूरा दिन (कनाडा की पूरी रात) एक से बढ़कर एक कमेंट आते हैं...मैं भी पिछले तीन चार दिन से अपने कमेंट के साथ वहां पर चोंच लड़ा रहा हूं...सच में इंस्टेंट जवाब मिलने में बड़ा मज़ा आता है...प्रेसेंस ऑफ माइंड का सारा खेल है...ऐसे ही फ्रैंडशिप डे वाले दिन फेसबुक पर गुरुदेव की पोस्ट के नीचे ही शरद कोकास भाई जी के शुभकामना संदेश वाली पोस्ट पढ़ने को मिली...इसमें शरद भाई ने लिखा था...सभी कवि मित्रों को मित्रता दिवस की शुभकामनाएं...मैंने सवाल किया...आपके जो मित्र कवि नहीं हैं, वो क्या करें...इस पर शरद भाई का जवाब आया...जो मित्र कवि नहीं हैं, उन्हें भी शुभकामनाएं इस कामना के साथ कि वो भी शीघ्र कवि बन जाएं...इसका जवाब मैंने दिया...मैं कहीं कवि न बन जाऊं, आपकी मित्रता में ए शरद जी...अब कह तो दिया लेकिन कवि बनना इतना आसान तो है नहीं कि खाला जी के घर जाओ और सीख आओ...लेकिन अब मैंने भी ठान ली कि शरद भाई का कवि-मित्र बन कर दिखाऊंगा...इसलिए लैपटॉप पर वर्डपैड खोल कर बैठ गया...कविता के नाम पर जो नतीज़ा निकला, वो आपके सामने है...बस बर्दाश्त कर लीजिएगा....



मैं हूं कौन...

मेरा 'मैं' मिला मुझसे,
वो 'मैं' जो अब मैं नहीं,
मैंने हाथ बढ़ाया,
वो बस मुस्कुराया,
मैं सकपकाया,
हाथ वापस लौट आया,
मैंने कहा, मिलोगे नहीं,
उसने कहा, किससे ?
मुझसे और किससे ?
तुम अब वो हो कहां,
वो जो गैरों को भी
गले मिलता तपाक से,
अब तुम औरों से क्या,
अपने से भी नहीं मिलते,
अपने जो बीता कल हैं,
तुम्हारे सपने ही अब सब कुछ हैं,
सपने जो आने वाला कल है,
इनमें मैं कहां फिट हूंगा,
मैं जो तुम्हारा अतीत हूं,
वो अतीत जो इनसान था,
किसी के भी दर्द में पिघलता था,
अब तुम पत्थर हो,
आलीशान इमारत के पत्थर,
खूबसूरत लेकिन बेजान,
गरूर ऐसा जैसे,
मुर्दे अकड़ते हैं,
मुर्दों से 'मैं' हाथ नहीं मिलाता,
बस हाथ जोड़ता हूं,
फिर मेरा सपना टूट गया,
वो हमेशा के लिए चला गया,
अब मैं सोच रहा हूं,


मैं हूं कौन...

------------------------------------------------




शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

लुट रहा है लंदन, कहां हैं स्कॉटलैंड यार्ड...खुशदीप



कहते हैं कि हर आपदा से कुछ सीखना चाहिए...ब्रिटेन में हो रहे दंगे भी ऐसी ही आपदा है...ब्रिटेन-अमेरिका जैसे पश्चिमी देश भारत की पुलिस का इसलिए मज़ाक उड़ाते रहे हैं कि वो 26/11 जैसे हमले में भी ट्रेंड और अत्याधुनिक हथियारों से लैस आतंकवादियों का लाठी और पुरानी जंग लगी राइफलों से मुकाबला कर रही थी...अब लंदन समेत ब्रिटेन के तमाम शहरों में दंगाइयों ने आतंक मचाया हुआ है तो कहां हैं दुनिया की सबसे बेहतरीन मानी जाने वाली लंदन की स्कॉटलैंड यार्ड पुलिस...ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने गुरुवार को संसद में कबूल किया कि उनकी पुलिस दंगों की शुरुआत में स्थिति की गंभीरता को समझने में नाकाम रही...दंगाइयों से जिस सख्ती से निपटा जाना चाहिए था, वैसे नहीं निपटा गया....पुलिस ने जो भी तरीके अपनाए वो कारगर नहीं रहे...कैमरन के मुताबिक पुलिस यही समझती रही कि ये एक व्यक्ति (मार्क डग्गन) की मौत पर भीड़ का गुस्सा है... एक हफ्ते पहले लंदन के टोटेनहाम इलाके में डग्गन की कथित तौर पर पुलिस की गोली से मौत हुई थी...लेकिन डग्गन की मौत पर वो भीड़ का गुस्सा नहीं था वो आपराधिक प्रवत्ति का दंगा था...एक वक्त में कई जगह कई सारे लोग एक ही काम में लगे हुए थे...वो था संपत्ति को नुकसान पहुंचा कर लूट-खसोट कर अपना फायदा करना...दुकानों से कीमती सामान लूटना...ऐसे लोगों से वैसे ही निपटा जाना चाहिए था जैसे अपराधियों से निपटा जाता है...

पांच दिन तक ब्रिटेन के जलने के बाद ब्रिटेन सरकार ने पुलिस को और अधिकार देने का ऐलान किया...दंगाई युवकों की तलाश में घर-घर छापे मारना शुरू किया गया...लंदन या दूसरे शहरों में नकाब पहनकर अब किसी को घर से निकलने की इजाज़त नहीं होगी...1500 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है...आने वाले दिनों में और भी कई गिरफ्तारियां हो सकती हैं...पड़ोसी मुल्क स्काटलैंड से 250 तेज़तर्रार पुलिस अफसरों को मदद के लिए ब्रिटेन में बुलाया गया है...

माना यही जा रहा है कि दंगे भड़काने में एफ्रो-कैरेबियाई समुदाय के भटके हुए युवकों का हाथ रहा है...इसी समुदाय में बेरोज़गारों और स्कूल ड्राप आउटस का हिस्सा सबसे ज़्यादा है...नस्ली आक्रोश की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा...भारतीयों समेत एशियाई मूल के लोगों को अपनी संपत्ति की हिफाज़त के लिए खुद ही पहरेदारी करनी पड़ रही है...दंगों की विभीषिका के पीछे सोशल मीडिया को भी ज़िम्मेदार माना जा रहा है...कैमरन ने शांति और कानून-व्यवस्था की बहाली के उपायों के तहत सोशल मीडिया पर अंकुश लगाने पर गंभीरता से विचार करने की बात कही है...ब्रितानी प्रधानमंत्री का सवाल है कि जब हम जानते हैं कि वो हिंसा, अव्यवस्था और अपराध को बढ़ावा देने में लगे हैं, ऐसे में उन्हें सोशल मीडिया के ज़रिए एक-दूसरे से संवाद बनाने से रोकना क्या सही कदम नहीं होगा...यानि सोशल मीडिया पर कई तरह की बंदिशें लग जाएं तो कोई बड़ी बात नहीं...

ब्रिटेन में साक्षरता की दर भारत से कहीं ऊंची हैं...मेरा सवाल है कि भारत के भ्रष्टाचार, गरीबी, अशिक्षा, अपराध, गंदगी, दंगों को लेकर नाक-भौं चढ़ाने वाले पश्चिमी देश ब्रिटेन को लेकर चुप क्यों है...भारत में आंतकवाद या और कोई घटना होती है तो अमेरिका-ब्रिटेन जैसे ही देश अपने देश के लोगों को एडवायज़री जारी करने में सबसे आगे रहते हैं...इतना भारत की घटनाओं से असर नहीं होता जितना कि इनकी एडवायज़री से होता है कि भारत जाना खतरे से खाली नहीं है...इससे देश के टूरिज्म और होटल सेक्टर को तो चोट लगती ही है भारत के बारे में भी दुनिया भर में गलत तस्वीर बनती है...

सुनील गावस्कर ने सही कहा है कि अगर ब्रिटेन जैसे दंगे भारत में हो रहे होते और इंग्लैंड टीम भारत के दौरे पर होती तो कब की अपने देश वापसी के लिए भाग खड़ी होती...लेकिन हमारी टीम बर्मिंघम में होटल के पास लूट-पाट होने के बाद भी दौरे की प्रतिबद्धता से पीछे नहीं हटी...लेकिन यहां मेरा मकसद एक दूसरे की कमीज़ को ज़्यादा सफेद बताना नहीं है...हमें दूसरों की खूबियों और खामियों से सबक लेना चाहिए...भीड़तंत्र के मनोविज्ञान से निपटने में ब्रिटेन के इस प्रकरण से नसीहत लेनी चाहिए...कैमरन ने एक बात अच्छी कही है कि दंगे में जिन दुकानों और घरों को नुकसान पहुंचा है वो 12 दिन के भीतर अपने नुकसान की भरपाई के लिए ब्रिटेन सरकार से आवेदन कर सकते हैं...उनके आवेदनों को जल्दी से जल्दी निपटाया जाएगा...क्या हमारे देश में इतनी जल्दी ऐसी राहत मिलती है...

कैमरन के संसद में दिए बयान और दंगों को रोकने के लिए किए गए उपायों को आप विस्तार से इस लिंक में देख सकते हैं... Britain ! You also got wrong...
-------------------------------------------------------------------------





बुधवार, 10 अगस्त 2011

पृथ्वी पर पहला जीवन स्पेस से आया...खुशदीप



पृथ्वी पर सबसे पहले जीवन कैसे आया, ये हम सबके लिए हमेशा से दिलचस्पी का सबब रहा है...इस सवाल का जवाब आज भी वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बना हुआ है...दो सौ साल से डॉर्विन की विकास की थ्योरी सबसे मान्य थ्योरी रही है...इस थ्योरी के मुताबिक 3.9 अरब साल पहले समुद्र में सबसे पहला जीवन आया...अमोनिया, मिथेन, कार्बन डाई आक्साइड और पानी और अन्य यौगिकों के मिलने से ये मुमकिन हुआ...RNA (Ribo-Nucleic Acid) का निर्माण इस दिशा में पहली कड़ी था...

इससे भी थोड़ा पहले की बात की जाए तो 4.6 अरब साल पहले सूर्य के चारों ओर घूम रही Accretion Disc से पृथ्वी बनी...Accretion Disc को ऐसे वलय से समझा जा सकता है जो घटता-बढ़ता रहता है...फिर पृथ्वी और थेइया (Theia) ग्रहों के आपस में टकराने से कई मूनलेट्स निकलीं जिनके जुड़ने से चंद्रमा बना...चंद्रमा के Gravitational Pull (गुरुत्वाकर्षण बल) की वजह से ही पृथ्वी के चक्कर काटने की धुरी (Axis) स्थिर हुई...इसी प्रक्रिया के बाद ऐसे हालात का निर्माण हुआ जिसमें आगे चलकर जीवन का पृथ्वी पर आना संभव हो सका...

करीब 4.1 अरब साल पहले पृथ्वी का Crust ठंडा होकर ठोस हुआ...साथ ही वायुमंडल और समुद्र बने...समुद्र में बहुत गहराई में आयरन सल्फाइड बनना, प्लेटलेट्स की दीवार , RNA जैसे कार्बनिक यौगिक का निर्माण, RNA का खुद को रिपीट करना...यही पहले जीवन का संकेत था...रिपीटिशन या Replication के लिए ऊर्जा, जगह, बिल्डिंग ब्लॉक्स की बड़े पैमाने पर ज़रूरत पड़ी...इससे कंपीटिशन या प्रतिस्पर्धा को मौका मिला...Survival Of Fittest के प्राकृतिक चयन ने उन्हीं मॉलीक्यूल्स को चुन लिया जो खुद को परिस्थितियों के अनुरूप ढालने और Replication में सबसे असरदार थे...फिर DNA (Deoxyribo Nucleic Acid) ने मुख्य रिप्लीकेटर का स्थान लिया...इसी DNA को आज भी जीवन की सबसे छोटी इकाई या Building Blocks of Life माना जाता है...हर जीव का DNA से बना genome अलग होता है...इन्हीं Genomes ने अपने चारों तरफ खोल या Membrane विकसित की और Replication में उन्हें और आसानी हुई... इसके बाद उल्काओं की लगातार बरसात से ये मुमकिन था कि उस वक्त तक जो भी जीवन था सब खत्म हो गया हो...या कुछ Microbes (सूक्ष्म जीव) ऐसे थे जिन्होंने पृथ्वी की सतह पर हाइड्रोथर्मल खोलों में खुद को छुपा लिया हो...और वहीं धीरे-धीरे विकास के रास्ते सभी जीवों को जन्म देने का आधार बने...यहां तक तो थी डार्विन की प्रचलित थ्योरी...

लेकिन यहां से अब एक अलग थ्योरी निकलती है...इसके मुताबिक पृ्थ्वी पर जीवन दूसरे ग्रह से धूमकेतु (Comet) या उल्का (Meteroide) के ज़रिए आया...कार्डिफ यूनिवर्सिटी में एस्ट्रोबायोलॉजी के निदेशक प्रोफेसर एन चंद्रा विक्रमसिंघे के मुताबिक पहली बार इसका सबूत तब मिला जब 1986 में हैली कॉमेट पृथ्वी के बिल्कुल पास से गुज़रा..अंतरिक्ष यान गिओटो के उपकरणों की मदद से वैज्ञानिकों ने देखा कि धूमकेतु जटिल जैविक पदार्थों से ही बने होते हैं...इसी आधार पर प्रोफेसर विक्रमसिंघे ने दावा किया कि जीवन को धरती पर लाने के लिए धूमकेतु ही ज़िम्मेदार थे, न कि समुद्र में जीवन की उत्पत्ति हुई...उनका ये भी कहना है कि जब पांच अरब साल पहले Solar-System (सौर-मंडल) में सिर्फ गैस मौजूद थी तब भी आकाशगंगा में जीवन मौजूद था...धूमकेतुओं ने ही धरती पर बैक्टीरिया के रूप में जीवन का बीज बोया...

धूमकेतुओं या उल्कापिंडो के ज़रिए पृथ्वी पर जीवन आने की थ्योरी को अब नासा के अनुदान पर की गई एक स्टडी से भी बल मिला है...इस में उल्कापिंडो में वही अवयव या components पाए गए हैं जो हमारे जीवन की इकाई DNA में पाए जाते हैं...क्या है ये क्रांतिकारी स्टडी, जो मुमकिन है आगे चलकर डार्विन की समुद्र में जीवन की उत्पत्ति के सिद्धांत को ही गलत ठहरा दे...इस स्टडी को जानने के लिए लिंक है- Is the popular theory of origin of life wrong ...Khushdeep

--------------------------------------