गुरुवार, 30 जून 2011

चवन्नी नहीं तो क्या चवन्नीछाप तो रहेंगे...Nostalgia...खुशदीप




आज चवन्नी के चलन का आखिरी दिन है...रिजर्व बैंक के आदेश के मुताबिक अब चवन्नी चलन में नहीं रहेगी...चवन्नी नहीं चलेगी लेकिन चवन्नीछाप ज़रूर रहेंगे...चवन्नी का नाम लेते ही करीब साढ़े तीन दशक पहले आई फिल्म खून पसीना का ये चवन्नीछाप गाना याद आ जाता है...राजा दिल मांगे चवन्नी उछाल के...चवन्नी का आज से एंटीक महत्व ही रह जाएगा...हो सकता है कि आपके पास भूले-बिसरे कुछ चवन्नियां पड़ी हैं तो आने वाले वक्त में उनकी अच्छी कीमत मिल जाए...चवन्नी के नोस्टेलजिया पर दो दिन पहले नवभारत टाइम्स में ओम अवस्थी जी का बड़ा अच्छा लेख पढ़ा था...बचपन में चवन्नी से जुड़ी आपकी कुछ यादें हैं तो इस लेख को पढ़ने से ज़रूर ताज़ा हो जाएंगी...

और खोटी हो गई चवन्नी...

ओम अवस्थी

गुल्लक से खनक कर गिरती थीं तो जमीं पर इतरा के लोटती थीं खुशियां। कभी चूरन के ठेलों पर तो कभी मेलों के झूलों पर चवन्नी में मिलती थीं खुशियां, पर अब चवन्नी हमसे हमेशा के लिए दूर जा रही है। चलन में तो पहले ही 'चल बसी' थी वह। सरकार ने बस अब उसकी मौत की औपचारिक तारीख तय कर दी है। 30 जून के बाद किस्सों-कहानियों में मीठी याद बनकर रह जाएगी चवन्नी।


वक्त अपने साथ बहुत कुछ बदल देता है। बदलाव की ऐसी ही बयार में चवन्नी ने कब अपनी रंगत खो दी, पता ही नहीं चला। लेकिन एक वक्त था, जब चवन्नी की हैसियत कुछ कम नहीं थी। वह पान-परचून की दुकान से लेकर सेठों की तिजोरियों तक का हिस्सा होती थी और उसे दुत्कार नहीं, दुलार की निगाह से देखा जाता था। लेकिन धीरे-धीरे वह लगातार बढ़ती महंगाई की मार नहीं झेल पाई और गैरजरूरी हो गई।


कैसे खोई रंगत


वैज्ञानिक और शिक्षाविद प्रफेसर यशपाल कहते हैं, 'अब रुपए की कीमत नहीं रही, तो चवन्नी की बात क्या करें! वह दौर दूसरा था, जब जरूरतों की कीमत महज 25 पैसे हुआ करती थी। हमारे जमाने में (40 का दशक) में तो एक आने में भी मौज हो जाती थी। मुझे याद है, जब मैं दसवीं क्लास में था, तो मुझे हफ्ते में आने-दो आने मिल जाया करते थे। उन दिनों स्कूल के बाहर एक आने में दो जलेबी मिला करती थीं। अब तो दसवीं के बच्चों के लिए एक दिन के 100 रुपए भी कम हैं। यूनिवर्सिटी के दिनों में मुझे 25 रुपए महीने भर के खर्च के लिए मिला करते थे। उन दिनों यह एक अच्छी-खासी रकम हुआ करती थी। इतने में खाने-पीने और घूमने जैसे तमाम शौक आसानी से पूरे हो जाया करते थे। जाहिर है, तब चवन्नी की भी हैसियत होती थी। अब जमाना बदल गया है तो सिक्कों की शक्ल भी बदल रही है। पुराने गुम हो रहे हैं और नए मुकाम खोज रहे हैं।'


महंगाई की मार


असल में, महंगाई बढ़ने के साथ ही पैसे की कीमत कम हो रही है। एक रुपए से नीचे के सिक्कों का इस्तेमाल काफी कम हो चुका है। 25 पैसे में मार्केट में कोई भी चीज उपलब्ध नहीं है, इसलिए चवन्नी को मार्केट से हटाया जा रहा है। एचडीएफसी बैंक के चीफ इकॉनमिस्ट अभिक बरुआ बताते हैं कि किसी भी सिक्के को मार्केट में लाने और हटाने से पहले आरबीआई का करंसी डिविजन मार्केट पर नजर रखता है और मार्केट से मिलने वाले फीडबैक के आधार पर ही फैसला किया जाता है। महंगाई बढ़ने के कारण जिन सिक्कों की जरूरत खत्म हो जाती है, उन्हें मार्केट से हटा दिया जाता है। पहले 10 पैसे और 20 पैसे को भी मार्केट से इसी वजह से हटाया गया था। अब 30 तारीख को 25 पैसे के सिक्कों को मार्केट से पूरी तरह हटाया जा रहा है। हो सकता है कि आने वाले दिनों में 50 पैसे के सिक्के भी मार्केट से हटा दिए जाएं। किसी भी सिक्कों को हटाने से पहले आरबीआई की ओर से औपचारिक घोषणा की जाती है। जो भी शख्स चाहे वह इन सिक्कों के बदले रिजर्व बैंक से चालू करंसी ले सकता है।


शायर मुनव्वर राणा चवन्नी पर कहते हैं, "मेरे लिए तो चवन्नी बड़ों का आशीर्वाद हुआ करती थी। घर से निकलते वक्त प्यार से दी जाती थी चवन्नी। सन 70 के दौर में जब मैं आठवीं में पढ़ा करता था, उन दिनों स्कूल के बाहर एक आने में एक प्लेट पकौड़े मिला करते थे। मैंने कई दफा चवन्नी में दोस्तों के साथ वहां दावत की थी। उन दिनों मैं पतंगबाजी का दीवाना था। मांझा लेने जाने पर 15 पैसे में चवन्नी के वजन के बराबर मांझा मिला करता था। 25 पैसे में पतंग और मांझा सब कुछ मिल जाता था। अब तो महंगाई ने पतंगों को भी आसमान से गुम कर दिया है। मुझे इस चवन्नी पर आफताब लखनवी का एक शेर याद आता है, 'मेरे वालिद अपना बचपन याद करके रो दिए, कितनी सस्ती थी कि विद नमकीन चार आने में पी, पूरा बोतल मेरा भाई तन्हा ही पी गया, मैंने मजबूरी में लस्सी भर के पैमाने में पी।"


ठसक से थी खनकती


एक वक्त था, जब दादाजी के कुर्ते की जेब में खनकने वाली चवन्नी की भी क्या खूब ठसक हुआ करती थी। नुक्कड़ की परचून की दुकान पर दे आओ तो टॉफियों से जेब भर जाया करती थी। तीज-त्योहार के मौके पर घर में काम करने वाले 'परजा लोगों' को भी चवन्नी इनाम के रूप में दी जाती थी। आइसक्रीम और बर्फ के गोले एक-एक आने में मिल जाया करते थे। चाचा जी का बनारसी पान एक चवन्नी में पत्ते में लिपट कर महकता था। दीपावली पर पूजा के बाद आशीर्वाद के रूप में घर के हर सदस्य को एक-एक चवन्नी दी जाती थी। उन दिनों जेब खर्च के रूप में बच्चों को एक या दो आने ही दिए जाते थे। ऐसे में चवन्नी बड़ी रकम हुआ करती थी और बच्चे उसे संभाल कर रखते थे।


हिफाजत का ताबीज


चवन्नी सिर्फ एक सिक्का भर नहीं थी। उससे कई विश्वास जुडे़ थे। मां चवन्नी को हिफाजत का ताबीज कहा करती थीं। दूसरों की बुरी नजर और बलाओं से बचाने के लिए घर के बच्चों को चवन्नी ढलवाकर पहनाई जाती थी। बड़े-बूढ़ों का विश्वास था कि चवन्नी में इतनी ताकत होती है कि वह हमारी हिफाजत कर सकती है। जन्म के बाद अकसर बच्चों को चवन्नी इसलिए पहनाई जाती थी ताकि उन्हें डरावने सपने न आएं। चवन्नी को आत्मविश्वास बढ़ाने और मानसिक शांति देने के लिए पहनाया जाता था। हालांकि इस तरह की बातें कितनी सच थीं, यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता, पर विश्वास के आगे सब बेकार! 70 के दशक में चवन्नी ढलवाने का चलन खूब था। वक्त के साथ ही यह मान्यता भी पीछे छूट गई।


25 पैसे की दक्षिणा, सवा रुपये का प्रसाद


मंदिर में 25 पैसे की दक्षिणा से पुजारी जी के चेहरे पर रौनक आ जाया करती थी। लंबे वक्त तक चवन्नी की दक्षिणा चलन में रही, पर महंगाई बढ़ने पर दक्षिणा भी बढ़ गई। भगवान का भोग लगाते वक्त कहा जाता है कि प्रसाद कभी पूरे पैसे का नहीं खरीदना चाहिए। सवा रुपए का प्रसाद लंबे वक्त तक मंदिरों में चढ़ता रहा। पांच चवन्नियों या कहें कि एक रुपये के संग एक चवन्नी की कीमत मंदिरों में हमेशा ही खास रही। आज भी प्रसाद पूरे पैसे का नहीं चढ़ाया जाता। 11, 21 और 51 ने अब सवा रुपए के प्रसाद की जगह ले ली है। महंगाई इतनी बढ़ गई कि मंदिरों में भी कायदे बदल गए, लेकिन कहावत बरकरार है। प्रसाद बेशक कितने का भी चढ़ाया जाए लेकिन गाहे-बगाहे बड़े-बुजुर्गों के मुंह से निकल जाता है कि फलां काम होगा तो सवा रुपए का प्रसाद चढ़ाएंगे।


जेएनयू के प्रफेसर पुष्पेश पंत कहते हैं, 'महंगाई इस कदर बढ़ गई है कि आम आदमी के लिए जीना मुश्किल हो गया है। चवन्नी तो हमेशा से आम आदमी की निशानी रही है। सिनेमा हॉल में आगे की सीटों पर बैठने वाले दर्शक चवन्नी छाप हुआ करते थे। मिडल क्लास में खुशियों के मौकों पर चवन्नी लुटाने का रिवाज था। अब इस महंगाई के दौर में आम आदमी के लिए कुछ नहीं बचा है तो चवन्नी कैसे बच सकती थी? मुझे याद है 70 के दशक में जब मैं पढ़ा करता था, तब डीटीसी बसों का टिकट 10 पैसे हुआ करता था। चवन्नी में दो कप चाय मिल जाया करती थी। गरीब आदमी ढाबों पर चवन्नी में पेट भर खाना खा लिया करता था। अब महंगाई ने चवन्नी की तो जान ले ली, पर आम आदमी अब भी जिंदगी से जूझ रहा है।'


सियासत में भी खूब चला सिक्का


जमाना बदला तो चवन्नी कमजोर हो गई। अब चवन्नी इतिहास होने जा रही है, लेकिन एक दौर था जब यह इतिहास लिखा करती थी। सियासत के गलियारे में चार आने का सिक्का खूब चलता था। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में चार आने ने अहम भूमिका निभाई। महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के वक्त लोगों को कांग्रेस से जोड़ने के लिए चार आने में सदस्यता अभियान चलाया था। उस समय चवन्नी और गांधी को लेकर एक नारा दिया गया था, 'खरी चवन्नी चांदी की, जय बोल महात्मा गांधी की।' गांधी के इस अभियान से काफी लोग जुड़े और कांग्रेस को आर्थिक मजबूती भी मिली। कुछ वक्त बाद यही चवन्नी इंदिरा गांधी के विरोध में मुखर हुई, आपातकाल के दौरान कई नारों में चवन्नी लोगों को तौलती रही। इस तरह से चवन्नी का अपना इतिहास तो है ही, यह ऐतिहासिक घटनाओं की गवाह भी रही है।


फिल्मी गीतों में भी गूंजी चवन्नी

चवन्नी की अहमियत को कई दफा फिल्मी पर्दे पर भी जगह दी गई। 60 के दशक में फिल्मी गानों में चवन्नी शब्द का खूब इस्तेमाल होता था। महबूब अपनी महबूबा के लिए चवन्नी उछालता नजर आता था। 'खून पसीना' फिल्म में आशा भोंसले का गाया 'राजा दिल मांगे चवन्नी उछाल के...' लंबे वक्त तक लोगों की जुबां पर चढ़ा रहा। 'मिस मैरी' में मोहम्मद रफी का गाया 'देते जा चवन्नी-अठन्नी बाबू...' ने भी फिल्म में जान डाली। इसके अलावा 'चंदन' में मुमताज का 'मेरी चांदी की चवन्नी...' तो कई महीनों तक सुर्खियों में रहा। बच्चों को भी इस गाने ने खूब लुभाया। ऐसा नहीं है कि सिर्फ 60 और 70 के दशक में फिल्मी गीतों के बोलों में चवन्नी का इस्तेमाल हुआ, बल्कि 21वीं सदी में आई 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' में भी आने 'चार आने...' गीत काफी सराहा गया। फिल्मों ने चवन्नी की इन तमाम यादों को हमेशा के लिए संभाल कर रख लिया है।


चवन्नी की चांदी


देश में मीट्रिक प्रणाली लागू होने के बाद 1957 के आस-पास चवन्नी चलन में आई। 20 पैसे के सिक्के के चलन में आने के बाद 1968 में इसे बंद कर दिया गया, लेकिन 1972 में यह सिक्का फिर से शुरू हुआ। 1988 में स्टेनलेस स्टील के 25 पैसे के सिक्के बाजार में आए।

 सिनेमा हॉल के सबसे आगे की सीट का टिकट 25 पैसे में मिलता था। इन दर्शकों को 'चवन्नी छाप' की उपाधि भी दी जाती थी। दर्शक गानों पर खुश होकर चवन्नी खूब उछालते थे। इसी तरह नौटंकियों में चवन्नी उछालने का चलन भी खूब रहा।


एक वक्त था, जब चवन्नी में भरपेट खाना मिल जाता था। चवन्नी की अहमियत इतनी थी कि गुजरातियों में कंजूसी को लेकर कहा जाता था कि वे रुपए में पांचवीं चवन्नी को खोजते रहते हैं।

मंगलवार, 28 जून 2011

50 लाख के लालच में कुत्ते को पिता बनाया...खुशदीप




पैसे की हवस में इनसान किस हद तक गिर सकता है...इसके लिए सोमवार को अमर उजाला में छपी एक ख़बर पढ़ लेना ही काफ़ी है...इसी ख़बर को आज टाइम्स ऑफ इंडिया और नवभारत टाइम्स ने भी छापा है...हरियाणा के कुरुक्षेत्र के पास पिहोवा में लोग पिंडदान के लिए जाते हैं...लेकिन यहां दिल्ली के एक कलयुगी पूत ने पिता के जीते-जी ऐसा कारनामा कर डाला कि सारी इनसानियत शर्मसार हो गई...

एनआरआई पिता के बीमे की राशि हड़पने के मकसद से उसके बेटे ने पिता का दाहसंस्कार से लेकर पिंडदान तक कर डाला... दिखावे के लिए पिता की जगह कुत्ते का अंतिम संस्कार किया...उसने पिता का डेथ सर्टिफिकेट बनवाने में भी संकोच नहीं किया, लेकिन क्लेम मिलने से पहले ही जालसाजी से पर्दा उठ गया और युवक को गिरफ्तार कर लिया गया...

मामला थाना पिहोवा क्षेत्र का है...पिता का अमेरिकी इंश्योरेंस कंपनी इंटरमेस में पचास लाख का बीमा हो रखा है...कंपनी के पास क्लेम गया तो उसने अपने जांच अधिकारी फूल सिंह को पुष्टि के लिए भेजा...फूल सिंह ने बताया कि 23 जनवरी को दिल्ली निवासी चेतन ओबराय व 6 अन्य के खिलाफ फर्जी डेथ सर्टिफिकेट बनवाने का मामला दर्ज किया गया था...चेतन का कहना था कि अमेरिका में उसके भाई के पास रहने वाले एनआरआई पिता जनकराज ओबरॉय 22 जून 2010 को सरस्वती घाट पिहोवा आए थे, जहां उनकी हार्ट अटैक से मौत हो गई थी...

इस मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई गई, तो फर्जीवाड़े में पिहोवा श्मशान घाट के पुरोहित रामलाल को भी शामिल पाया गया... उसने रजिस्टर में लिखा है कि जनकराज का अंतिम संस्कार पिहोवा के पुरोहित हेमंत ने करवाया....गवाह के तौर पर पिहोवा के ही सतपाल नामक पंडे के साइन भी हैं... इन लोगों ने पिहोवा नगरपालिका के तत्कालीन चेयरमैन महंत तरुण दास को भी घटना में शामिल कर लिया, जिन्होंने जनकराज के डेथ सर्टिफिकेट वाली फाइल पर साइन किए...हालांकि तरुण दास का कहना है कि वह चेतन को नहीं जानते...उन्होंने बतौर गवाह उनके पास आए पिहोवा के ही एक व्यक्ति के कहने पर ये साइन किए थे...

फूल सिंह के अनुसार, चेतन दिल्ली के विकासपुरी में रहता है और गुड़गांव के एक कॉल सेंटर में काम करता है...उसके बडे़ भाई हर्ष ओबराय भी अमेरिका में एनआरआई हैं...जनकराज आज भी उन्हीं के साथ रहते हैं...चेतन को पता था कि उसके पिता का अमेरिका में 50 लाख रुपये का बीमा है...फर्जीवाडे़ में चेतन के ताऊ राजेंद्र और एक रिश्तेदार मनोज भाटिया भी शामिल हैं...उच्चस्तरीय जांच में यह भी मालूम हुआ है कि पिहोवा के श्मशान घाट में दाहसंस्कार तो हुआ, लेकिन दिखावे के तौर पर एक कुत्ते का किया गया...पिहोवा थाना प्रभारी यशवंत सिंह यादव ने बताया कि चेतन को सोमवार को अदालत में पेश करके एक दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया है...

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18+...An Adult joke...Power of Media...Khushdeep

सोमवार, 27 जून 2011

वैष्णोदेवी से लौटने के बाद...खुशदीप



पिछले दो दशक से आदत बनी हुई है, हर साल कम से कम एक बार वैष्णोदेवी तीर्थ पर जाने की...मेरे लिए इसका महत्व धार्मिक से ज़्यादा मन की शांति है...वहां हो आने के बाद पूरा साल अच्छा महसूस करता हूं...पहले तो कभी भी प्रोग्राम बन जाता था...लेकिन अब बच्चों की स्कूल की छुट्टी का भी ध्यान रखना पड़ता है...शायद यही वजह है कि गर्मियों में स्कूल की छुट्टियों के दौरान ही सबसे ज़्यादा श्रद्धालु वैष्णोदेवी दर्शन के लिए पहुंचते हैं...इसलिए इन दिनों में ट्रेन में जम्मू तक का रिज़र्वेशन चाहते हैं तो कम से कम डेढ़-दो महीने पहले ही ये काम कर लेना चाहिए...

दिल्ली के पास रहने का ये आराम है कि अब यहां से ट्रेन के स्लीपर जैसी सुविधा के साथ ही आरामदायक एसी-नॉन एसी बसें रोज़ाना चलती हैं...लालकिले के पास दिल्ली-कटरा डेली बस सर्विस चलाने वाले ऑपरेटर्स की भरमार है...यहां पांच सौ रूपये में सीट और सात सौ रुपये में स्लीपर मिल जाता है...एसी में स्लीपर के लिए हज़ार-बारह सौ खर्च करने पड़ सकते हैं.....बस सर्विस वाले ये ऑपरेटर भी ज़रूरत के हिसाब से रेट वसूल करते हैं...जैसे आपका आज ही प्रोग्राम बना तो ये आपसे सीट और स्लीपर के लिए ज़्यादा पैसे झटक सकते हैं....इसलिए यहां भी आप तीन-चार दिन पहले ही बुकिंग करा लें तो कम खर्च होगा...

ये बस शाम छह से आठ बजे तक दिल्ली से चलती हैं और अगले दिन सुबह नौ से ग्यारह बजे के बीच कटरा पहुंचा देती हैं...इसलिए अगर आपको ट्रेन से रिज़र्वेशन नहीं भी मिल पाया तो बस का ये अच्छा विकल्प मौजूद है...बस से जाने का एक और फायदा है....ट्रेन आपको सिर्फ जम्मू तक ही पहुंचाती है...वहां से कटरा जाने के लिए आपको या तो बस या टैक्सी की सेवाएं लेनी पड़ती हैं...लेकिन दिल्ली से चलने वाली बस आपको सीधे कटरा ले जाती है...


कटरा शहर

जिन्हें पहली बार वैष्णोदेवी की यात्रा पर जाना है, उनके लिए ध्यान रखने योग्य कुछ बातें हैं...माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड इस तीर्थ की सारी व्यवस्था संभालता है...लेकिन श्रद्धालुओं की हर साल बढ़ती तादाद को देखते हुए उसकी भी कुछ सीमाएं हैं...आपको कटरा पहुंचने के बाद सबसे पहले यात्रा के लिए पर्ची बनवा लेनी चाहिए...ये निशुल्क बनती है...इस पर्ची में लिखा जाता है कि आप के ग्रुप में कुल कितने यात्री हैं...इस पर्ची के आधार पर ही आपको ऊपर वैष्णोदेवी भवन पहुंचने के बाद दर्शन के लिए ग्रुप नंबर मिलेगा...ये पर्ची नहीं होगी तो आप दर्शन नहीं कर सकते...इसलिए कटरा में ये पर्ची लेना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है...

कटरा पहुंचने के बाद आपको बस के सफ़र की थकान उतारने और फ्रेश होने के लिए सबसे पहले कहीं टिकने की ज़रूरत होगी...कटरा में हर बजट के होटल मौजूद है...जैसी आपकी ज़ेब इजाज़त देती है, वैसी आपको सुविधा मिल जाएंगी...लेकिन मैं हमेशा बस अड्डे के पास श्राइन बोर्ड के ही निहारिका गेस्ट हाउस में ठहरना पसंद करता हूं...यहां आपको टू बेड वाला रुम पांच सौ में और एसी रूम सात सौ में मिल जाएगा...चार बेड वाला रुम सात सौ और एसी नौ सौ रुपये में मिल जाएगा...यहां एक अलग भवन में डोरमैटरी सुविधा भी है, जहां साठ रुपये में एक बेड मिल जाता है...इन सारी सुविधाओं में चेक आउट टाइम अगले दिन बारह बजे का होता है...लेकिन कम ही यात्री इतनी देर के लिए यहां रुकते हैं...ज़्यादा से ज़्यादा चार पांच घंटे ही यहां रुकने के बाद आपको पैदल यात्रा के लिए चढ़ाई (करीब तेरह किलोमीटर) शुरू करनी होती है...इसलिए यहां आप पूरे दिन की बुकिंग कराने की जगह शार्ट स्टे वाले ऑप्शन को चुनें....इससे आपको कम पैसे खर्च करने पड़ेंगे...


निहारिका के बाहर लगा साइन बोर्ड

यहां भीड़ वाले दिनों में बुकिंग मिलना बहुत मुश्किल होता है....इससे बचने का सबसे अच्छा उपाय है कि श्राइन बोर्ड की वेबसाइट https://www.maavaishnodevi.org/new1/index.html पर जाकर पहले से ही ऑनलाइन बुकिंग करा लें...एक और बहुत ज़रूरी बात...निहारिका से ही ऊपर भवन पर ठहरने के लिए रुम और डॉरमेटरी की भी बुकिंग होती है...ऊपर श्रद्धालुओं की भीड़ ज़्यादा होने की वजह से ये बुकिंग कराना कभी मत भूलिएगा...खास तौर पर अगर महिलाएं और बच्चे भी आपके साथ हैं...ऊपर भी रुम सुविधाएं मौजूद हैं...मनोकामना भवन में डॉरमेटरी में 80 रुपये में एक बेड मिल जाता है...ठंड के दिनों में यहां मुफ्त कंबल की सुविधा भी होती है...इसके लिए आपको प्रति कंबल के हिसाब से सौ रुपये जमा कराने होते हैं...कंबल वापस करने पर आपको वो सौ रुपये वापस मिल जाते हैं....

ऊपर भवन पहुंचने के बाद आपको नीचे कटरा से ली हुई पर्ची पर ग्रुप नंबर लेना होता है...इसी से आपको पता चलेगा कि कितनी देर बाद दर्शन के लिए आपका नंबर आएगा...चढ़ाई पर जितना कम से कम सामान अपने साथ रखें उतना ही अच्छा रहता है...प्रशाद, भेंट भी ऊपर भवन पर श्राइन बोर्ड के स्टॉल से मिल जाती है...इसलिए वहीं से खरीदना सही रहता है...


पैदल यात्रा इसी दर्शनी दरवाज़े से शुरू होती है


दर्शन पर जाने से पहले अपना सारा कीमती सामान लॉकर में रखकर अपना ताला लगा देना चाहिए...ये लॉकर कटरा में निहारिका गेस्ट हाउस और ऊपर भवन पर भी मौजूद होते हैं...ये मैं इसलिए बता रहा हूं कि तीन चार साल पहले मैं दूसरों पर ज़रूरत से ज़्यादा विश्वास करने का खामियाजा भुगत चुका हूं...दरअसल डॉरमेटरी में हम दर्शन पर जाने से पहले वहां रुके एक नये शादीशुदा जोड़े को अपने सामान का ध्यान रखने का आग्रह कर गए थे...आए तो वो जो़ड़ा चंपत था...साथ ही हमारे कैमरे, मोबाइल और नकदी भी...इसलिए धार्मिक स्थल पर सारे लोग नेक इरादे से ही आते हैं, ये समझने की भूल कभी मत करिएगा...

इस बार वैष्णोदेवी यात्रा के दौरान एक चीज़ ने मुझे और चौंकाया...आप वहां कटरा से सांझी छत तक हेलीकॉप्टर सुविधा का लाभ भी उठा सकते हैं...एक तरफ की यात्रा के लिए प्रति यात्री सिर्फ सात सौ रुपये ही खर्च आएगा...जबकि वहीं वृद्ध और चढ़ाई न चढ़ सकने वाले लोगों के लिए पैदल रास्ते से आप अगर पालकी की सुविधा लेंगे तो उसके लिए आपको चार हज़ार रुपये प्रति यात्री खर्च करने पड़ेंगे...वैसे यहां पैदल रास्ते से जाने के लिए आपको घोड़े भी मिल जाएंगें....

एक और चीज़ मैंने यहां नोट की, श्रद्धालु जोश में आकर ज़ोर ज़ोर से माता के जयकारे लगाने लगते हैं...लेकिन वैष्णोदेवी तीर्थ जिन त्रिकुटा की पहाड़ियों पर हैं, वो बहुत परानी हैं...इसलिए यहां कुछ जगह पत्थर गिरने का ख़तरा रहता है...इसलिए वहा साइन बोर्ड भी लगे रहते हैं कि वहां बैठ कर विश्राम न करें...ऐसे में यहां ज़ोर ज़ोर से जयकारे लगाना भी खतरे से खाली नहीं...फिजिक्स का स्टूडेंट रहा होने की वजह से जानता हूं कि रेसोनेंस की वजह से पत्थर गिरने का खतरा और बढ़ जाता है...फ्रीक्वेंसी को एक स्तर पर टालने की वजह से ही पुल से गुज़रते वक्त फौजी कभी कदमताल नहीं करते...अगर वहां भी कदमताल करें तो रेसोनेंस की वजह से ही पुल के गिरने का खतरा हो जाता है...ऊपर वैष्णोदेवी की गुफ़ा मे तो साइनबोर्ड लगे हैं कि मन में ही जयकारे लगाएं...लेकिन यात्रा के दौरान भी जहां पत्थर गिरने वाले संभावित जगह है, वहां भी लोगों को जागरूक करने के लिए श्राइन बोर्ड को साइन बोर्ड लगाने चाहिए...


रात में जगमगाता वैष्णोदेवी भवन

आपको इस पोस्ट में एक बात अखरेगी कि मैं यात्रा के बारे में लिख रहा हूं लेकिन वहां खिंची हुई कोई फोटो साथ नहीं लगा रहा...जो फोटो लगा रहा हूं वो नेट से ही ली हुई हैं...दरअसल जब यात्रा पर जाता हूं तो सारा ध्यान वहीं लगाता हूं, इसलिए कैमरा वगैरहा साथ ले जाने से बचता हूं...आप वैष्णोदेवी यात्रा के संबंध में और कोई जानकारी चाहते हैं तो टिप्पणी के ज़रिए पूछ सकते हैं...

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शनिवार, 25 जून 2011

कोलम्बस, शुक्र मनाओ तुम शादीशुदा न थे...खुशदीप


 


क्रिस्टोफर कोलम्बस महाराज, अमेरिका डिस्कवर कर तुमने तो अपना नाम अमर करा लिया लेकिन एसएसटी के स्टूडेंट्स की जान को हमेशा के लिए जंजाल छोड़ गए...

कोलम्बस मियां, शुक्र मनाओ कि तुम शादीशुदा न थे...अगर शादीशुदा होते तो ये कारनामा कर दिखाते...फिर मानते तुम्हें असली तुर्रम खां...क्या सोचते हो...अमेरिका डिस्कवर करने के लिए तुम कूच करते, और बेगम कोलम्बस बिना कोई चूं-चां किए तुम्हें घर से बाहर पैर रखने की इजाज़त दे देती...यकीनन ऐसा नहीं होता...तुम्हें भी शर्तिया पहले बेगम के इन सवालों का जवाब देना पड़ता...

सवाल नंबर 1-

कहां जा रहे हो...


सवाल नंबर 2-

क्यों जा रहे हो...

सवाल नंबर 3-

किसके साथ जा रहे हो...

सवाल नंबर 4-


मैं भी चलूंगी...

सवाल नंबर 5-

वापस कब आओगे...

सवाल नंबर 6-

घर रह कर ही डिस्कवर कर लो...


सवाल नंबर 7-

मेरे लिए क्या लाओगे...

सवाल नंबर 8-

वापसी में सब्ज़ी लेते आना...

सवाल नंबर 9-

पहुंच कर इत्तला देना...

सवाल नंबर 10-


हर बार तुम ही क्यों डिस्कवर करते हो...कोई दूसरा नहीं कर सकता क्या...
 



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मंगलवार, 21 जून 2011

CTNT (टिप्पणी निषेध तानाशाही) के ख़िलाफ़ अनशन...खुशदीप

CTNT यानि कम्प्रेहेन्सिव टिप्पणी निषेध तानाशाही नहीं चलेगी...नहीं चलेगी...देखने में आ रहा है कि जनता की भारी मांग के बावजूद सतीश सक्सेना भाई जी अपनी पोस्ट पर टिप्पणियों से निषेध नहीं हटा रहे हैं...एक तो उन्होंने पोस्ट भी अब ईद के चांद की तरह लिखना शुरू कर दिया है...यही सितम कम नहीं था कि उन्होंने पिछली कुछ पोस्ट से टिप्पणियों पर भी CTBT (कम्परेहेन्सिव टेस्ट बैन ट्रीटी) की तरह CTNT शुरू कर दी है...सतीश भाई ब्लॉगिंग में होने की वजह से अब निजी अस्तित्व से ऊपर होकर सार्वजनिक व्यक्तित्व हैं...इसलिए उनकी पोस्ट पर टिप्पणियां करना हमारा फंडामेंटल राइट है...इसलिए वो हमें इस हक़ से ज्यादा देर तक वंचित नहीं रख सकते...

अन्ना हजारे जी की तरह सतीश भाई को पहले ही अल्टीमेटम दे रहा हूं कि उन्होंने चार-पांच दिन में CTNT को नहीं हटाया तो मैं नित्य क्रमिक अनशन शुरू कर दूंगा...अब आप पूछेंगे कि अकेला आदमी कैसे क्रमिक अनशन कर सकता है...समझाता हूं बाबा...देखिए दिन में मैं तीन बार मील लेता हूं...ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर...ब्रेकफास्ट और लंच के बीच छह घंटे का वक्त होता है...इसी तरह लंच से डिनर के बीच छह घंटे का वक्त होता है...डिनर और ब्रेकफास्ट के बीच बारह घंटे का वक्त होता है...इस तरह हो गया न दिन और रात मिलाकर पांच घंटे पचास मिनट, पांच घंटे पचास मिनट और ग्यारह घंटे पचास मिनट का क्रमिक अनशन....



बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मिया सुभान अल्लाह...सतीश भाई की संगत का असर है कि शाहनवाज़ भी प्रेमरस बरसाते-बरसाते CTNT के मुरीद हो गए हैं...जनता की भारी डिमांड है कि दोनों सीटीएनटी को बाय-बाय बोलकर पूर्व व्यवस्था पर लौटें...मैं चार-पांच दिन के लिए वैष्णोदेवी जा रहा हूं...आशा है कि मेरे आने तक सतीश भाई और शाहनवाज दोनों मेरे आग्रह को मान चुके होंगे...वरना मुझे कोई बड़ा मैदान किराए पर लेकर सच में ही अनशन शुरू करना पड़ेगा...और मुझे विश्वास है कि अनवर जमाल भाई भी मेरी इस मुहिम में साथ देंगे...मतभेद अपनी जगह हैं लेकिन मनभेद नहीं होने चाहिए...और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार तो सभी को होना चाहिए...

सतीश भाई और शाहनवाज़ ये गाना सुनिए....इसमें नींद और चैन की जगह बस टिप्पणी देने का हक़ कर लीजिए...




(ये व्यंग्य नहीं गंभीर पोस्ट है)


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Funniest joke- Makkhan, Dakkan and Gabbar

सोमवार, 20 जून 2011

ये तो सच है के भगवान है...खुशदीप


 

कल रात ठीक 12 बजे मुंबई से भतीजे करन का फोन आया...फोन उठाते ही उसने कहा...हैप्पी फादर्स डे, चाचू...सुन कर अच्छा भी लगा अजीब भी...करन इन दिनों ढाई महीने की इंटर्नशिप करने के लिए मुंबई में है...सुबह उठा तो बेटे सृजन और बिटिया पूजन ने भी विश किया...दोनों ने फिर मेरठ अपने डैडू (ताऊजी) को भी फोन पर हैप्पी फादर्स डे कहा...उधर से भतीजी पंखुरी ने मेरे लिए वही क्रम दोहराया...

आप सोचेंगे कि ये नितांत अपने से जुड़ी बात ब्लॉग पर क्यों लिख रहा हूं...इसी के सामाजिक  पहलू पर सब की राय जानने के लिए ये पोस्ट लिख रहा हूं...ये मदर्स डे और फादर्स डे मनाने की परंपराओं को बेशक मार्केट फोर्सज़ ने पश्चिमी दुनिया से आयात किया है...अक्सर इन्हें भारत में ये कहकर खारिज़ करने की कोशिश की जाती है कि हम तो रोज़ ही माता-पिता को याद करते हैं...ये तो विदेश में लोगों के पास वक्त नहीं होता, इसलिए मां और पिता के नाम पर एक एक दिन मनाकर और उन्हें तोहफ़े देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली जाती है...

लेकिन क्या ये वाकई सच है...भारत के महानगरों में रहने वाले हम लोगों को भी अब रोज़ इतना वक्त मिलता है कि बीस-पच्चीस मिनट माता-पिता के साथ हंस-बोल लें...उनकी ज़रूरतों को सुन लें...लाइफ़ ने यहां बुलेट ट्रेन की तरह ऐसी रफ्तार पकड़ी हुई है कि कुछ सोचने की फुर्सत ही नहीं...बस इसी आपाधापी में भागे जा रहे हैं कि अपना और अपने बाद बच्चों का भविष्य सिक्योर कर दें...

ऐसे में गाइड का गाना याद आ रहा है...वहां कौन है तेरा, मुसाफिर जाएगा कहां, दम ले ले घड़ी भर, ये आराम पाएगा कहां...लेकिन कौन रुक कर घड़ी भर दम लेना चाहता है...जिन माता-पिता ने हमें बड़ा कर कुछ करने योग्य बनाया, उनके लिए हमारे पास वक्त नहीं...और जिन बच्चों के लिए हम दावा करते हैं कि उन्हीं के लिए तो सब कर रहे हैं, उनके लिए भी कहां क्वालिटी टाइम निकाल पाते हैं...बच्चे जैसे जैसे बड़े होते जाते हैं, उनके अपने सपने हो जाते हैं...ऐसे में हमारी व्यस्तता और उनकी अलग दुनिया की वजह से गैप और बढ़ता जाता है... ...

फिर एक दिन ऐसा भी आ सकता है दो पीढ़ियों के बीच सिर्फ बेहद ज़रूरत की बात होने लगती है...एक-दूसरे के पास बैठने से ही बचने की कोशिश होने लगती है...अगर आप थोड़ा सा अलर्ट रहें तो ऐसी नौबत को टाला जा सकता है...छोटी छोटी बातों से रिश्तों की अहमियत बच्चों को सिखाई जा सकती है...सिर्फ इतना ही कर लें जब आप काम के लिए घर से निकलें तो घर में बड़ों से आशीर्वाद ले लें...साथ ही बच्चों का माथा चूम कर बाय बोलें...

बच्चे चाहें जितने बड़े हो जाएं ये क्रम दोहराना न भूलें...मैं यही करने की कोशिश करता हूं...किसी दिन जल्दी में भूलने लगता हूं तो बिटिया ही सिर आगे कर याद दिला देती है...चाहता हूं ये रूटीन कभी न टूटे...

फादर्स डे हमारी जेनेरेशन ने तो कभी मनाया नहीं था...लेकिन आज इस दिन पर पापा की बेहद याद आई...पिछले साल ठीक दीवाली वाले दिन पापा का हाथ सिर से उठा था...सात महीने से ज़्यादा गुज़र चुके हैं...उनके रहते हुए जो कभी महसूस नहीं हुआ, वो अब शिद्दत के साथ हो रहा है...काश उन्हें और ज़्यादा वक्त दे पाता...

अंत में दुनिया के सभी माता-पिता को समर्पित ये गीत...








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शनिवार, 18 जून 2011

पुरुष ब्लॉगरों के लिए ख़तरे की घंटी...खुशदीप



लंदन के कूल कूल माहौल से शिखा वार्ष्णेय ने बड़ी कूल पोस्ट लिखी है...वरना जून की गर्मी में क्या ब्लॉग और क्या देश, हर जगह पारा ऐसा चढ़ा हुआ है कि नवरत्न कूल तेल भी कोई काम नहीं कर रहा...दिमाग भन्नौट हुए जा रहे हैं...इंद्रदेव अपनी ठंडी फुहारों से इसे ठंडा करते, उससे पहले ही शिखा जी ने इंद्रलोक की ब्लॉगिंग की रिपोर्टिंग करके सबको चिल कर दिया...शिखा के अंदर का पत्रकार जानता है कि लोगों को हंसाते हंसाते तीर कहां निशाने पर लगाना है...शिखा जी !... सटीक चोट की है...समझने वाले समझ गए जो न समझे, वो अनाड़ी है...नहीं समझे...

हाय कितने मासूम हैं, हम सब पुरुष ब्लॉगर...

पहले शिखा के इस पैराग्राफ़ के एक-एक शब्द को गौर से पढ़िए...

और प्रभु उसपर स्वर्ग की देवियों और अप्सराओं ने भी ब्लॉगिंग शुरू कर दी है, अब तक तो वे देवताओं के कामों में ही उलझी रहती थीं...अब जब से लिखना शुरू किया है कमाल हो गया है.... ऐसा लिखती हैं कि सब खिचे चले जाते हैं...हमने तो यहाँ तक फैलाया कि अप्सराओं के लेखन पर नहीं, वे अप्सराएँ हैं इसलिए लोग जाते हैं...उनकी पोस्ट पर.परन्तु कोई फायदा नहीं प्रभु! उनके लेखन में ताजगी है,मौलिकता है और उनके पास समय भी है...प्रभु !....हमें तो कोई पूछता ही नहीं...अब कितना किसी को भड़काएं...


अब पोस्ट पर आई कुछ टिप्पणियों पर गौर फरमाइए...

वंदना जी ने कहा-

मज़ा आ गया शिखा…………सारी पोल खोल दी……………ऐसे व्यंग्य आते रहने चाहिये ताकि कोई ब्लोगर यदि सिर उठाये तो कुचला जा सके अपने व्यंग्यों से…………हा हा हा...


अजित गुप्ता जी के शब्द-

इस बहाने महिला ब्‍लागरों की तो खूब तारीफ हो गयी, हम तो गद गद हुए...अब चाहे दिव्‍या की हो या रश्मि रविजा की लेकिन हमें तो लगता है कि हम सबकी ही हो गयी...अपने मियां मिठ्ठू बन गए हैं जी...बढिया लिखा है, डोलने दो इन्‍द्र का सिंहासन, बस कहीं उस पर भी इंन्‍द्राणी ना बैठ जाए! हा हा हा हा...

क्या ये सब पढ़कर भी पुरुष ब्लॉगरों को चेत नहीं जाना चाहिए...भईया कुछ सार्थक वगैरहा लिखना शुरू कर दो, नहीं तो बोरिया बिस्तरा बांधने के लिए तैयार हो जाओ...खतरे की घंटी बज चुकी है...क्या कहा...रोज़-रोज़ कहां से लाएं सार्थकता...कहां से लाए मौलिकता....औरों को इधर-उधर भिड़ाने का नारद कार्ड भी अब तो फेल होता जा रहा है...और सिर्फ ब्लॉगिंग या ब्लॉगर पर ही घिसी-पिटी बातों को कब तक घुमा घुमा कर स्वयंभू ब्लॉगगुरु बनते रहें...और ये अप्सराएं हैं कि रोज़ न जाने कहां से एक से बढ़कर एक रचनाकर्म पेश करती रहती हैं...तो क्या करें... चूके हुए कारतूसों को कब तक दाग़ते रहें...

अब सरस्वती जी ने सारी कृपा अप्सराओं पर ही करने की ठान ली हैं तो किया भी क्या जा सकता है...मेरे दिमाग़ में एक उपाय आ रहा है...इसकी प्रेरणा मुझे बाबा रामदेव जी से मिली है...इसे मैंने शिखा की पोस्ट पर टिप्पणी के ज़रिए साफ़ भी किया है...

लगता है टीआरपी बढ़ाने के लिए वही नुस्खा अपनाना पड़ेगा जो बाबा रामदेव ने रामलीला मैदान से निकलने के लिए अपनाया था...शिखा जी, आप तो लंदन में रहती है...ये ज़रा क्रिस्टी या सॉदबी वालों से पता लगवा कर तो दीजिए कि बाबा ने जो दुपट्टा, सलवार, कमीज पहना था, उसका ऑक्शन कब होगा...बोली के लिए मेरा नाम अभी से लिखवा दीजिए...(क्रिस्टी और सॉदबी दुनिया के सबसे बड़े ऑक्शन हाउस हैं)...





इस तरह पोस्ट लिखते हुए मेरा  कैसा वेश होगा, इसका प्रीव्यू शाहनवाज़ अपनी एक पोस्ट में पहले ही दिखा चुका है...




इस विपदा से निपटने के लिए भाई लोगों के पास और कुछ सुझाव हैं तो आपस में शेयर करें...मैं तो कहता हूं, इस मुद्दे पर पुरुष ब्लॉगरों की तत्काल  आपात बैठक बुलाई जाए...वरना फिर ना कहना देर हो गई....

( निर्मल हास्य)


शुक्रवार, 17 जून 2011

डेथ ऑफ ए सेंट एंड फिक्सिंग ऑफ फास्ट-ब्रेकिंग...खुशदीप

डेथ ऑफ ए सेंट...


गंगापुत्र स्‍वामी निगमानंद गुरुवार को शाम करीब साढ़े पांच बजे हरिद्वार में भू-समाधि में लीन हो गये... स्वामी निगमानंद के परिवार के तमाम विरोध के बावजूद प्रशासन ने आश्रम की इच्छा और संन्यासियों की परंपरा के अनुरूप भू-समाधि दिए जाने के हक में ही फैसला सुनाया...इससे पहले डॉक्‍टरों ने शव का एक बार फिर पोस्‍टमॉर्टम किया और विसरा निकाल लिया...लेकिन दिन में स्वामी निगमानंद के पिता प्रकाश झा ने मातृ सदन के संस्थापक स्वामी शिवानंद पर बेटे को बहका कर अनशन कराने और मौत के लिए ज़िम्मेदार ठहराया...उधर स्वामी शिवानंद का कहना था कि इतने साल बीतने पर भी स्वामी निगमानंद के परिवार ने उनकी सुध लेने की ज़रूरत क्यों नहीं समझी थी...आश्रम ने एक चिट्ठी भी पेश की, जिसे स्वामी निगमानंद के हाथ से लिखे होने का दावा किया था...जिसमें लिखा था...मेरे पूर्व जन्म (संन्यासी होने से पहले) के पिता भ्रष्टाचार में लिप्त थे, इसलिए उनके साथ रहना मुमकिन नहीं था...स्वामी निगमानंद के घरवालों ने उनका शव अंतिम संस्कार के लिए परिवार को न सौंपे जाने पर आत्मदाह की धमकी भी दे डाली थी...उसी के बाद प्रशासन को दखल देना पड़ा...

उधर, स्वामी निगमानंद की 13 जून को मौत के बाद से ही मातृ सदन आश्रम का ज़ोर रहा है कि इस पूरे प्रकरण की सीबीआई से जांच कराई जाए...स्वामी निगमानंद को 68 दिन अनशन पर बैठे रहने के बाद 27 अप्रैल को प्रशासन ने पहले हरिद्वार के ज़िला अस्पताल में भर्ती कराया था...मातृ सदन आश्रम की ओर से 11 मई को पुलिस में दर्ज शिकायत में कहा था कि किसी अनजान नर्स ने 30 अप्रैल को स्वामी निगमानंद को इंजेक्शन दिया था...उसी के बाद स्वामी निगमानंद की तबीयत ज़्यादा बिगड़नी शुरू हुई और फिर वो नर्स तभी से कहीं दिखाई नहीं दी..

मातृ सदन आश्रम की शिकायत के अनुसार हिमालय स्टोन क्रशर प्राइवेट लिमिटेड के मालिक जी के अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट अस्पताल हरिद्वार के स्टॉफ के साथ मिलकर स्वामी निगमानंद को ज़हर से मारने की साज़िश रची थी...अग्रवाल की इस कंपनी की ओर से किए जा रहे खनन के खिलाफ ही निगमानंद ने आंदोलन छेड़ रखा था...मातृ सदन आश्रम ने गंगा के आसपास फैलाए जा रहे प्रदूषण को रुकवाने के लिए अग्रवाल और उत्तराखंड सरकार के खिलाफ कानूनी लड़ाई भी शुरू कर रखी थी...मातृ सदन के सदस्यों के मुताबिक अग्रवाल आरएसएस और उत्तराखंड सरकार का बेहद करीबी है...पिछले साल जुलाई में आरएसएस, हरिद्वार शाखा के गुरु दक्शिणा कार्यक्रम में अग्रवाल को मुख्य अतिथि बनाया गया था...अग्रवाल के पिता भी हल्द्वानी में आरएसएस के पदाधिकारी रह चुके हैं...

ये दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि नैनीताल स्थित उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 26 मई को जब स्वामी निगमानंद के हक में फैसला सुनाया था तो उस वक्त उन्हें कोमा में गए पच्चीस दिन से ज़्यादा बीत चुके थे...हाईकोर्ट ने हिमालय स्टोन क्रशर को बंद कराने का आदेश देते हुए कहा था कि इससे न सिर्फ गंगा के पास पर्यावरण को बेहद नुकसान हो रहा था बल्कि ये लाइसेंस की शर्तों का खुला उल्लंघन कर रहा था...काश स्वामी निगमानंद अपने होशो-हवास में इस फैसले को सुन पाते...

फिक्सिंग ऑफ फास्ट-ब्रेकिंग...

ये इत्तेफ़ाक ही है कि स्वामी निगमानंद ने देहरादून के हिमालयन इंस्टीट्यूट अस्पताल में जिस दिन आखिरी सांस ली, उससे एक दिन पहले ही  उसी अस्पताल के स्पेशल वार्ड में बाबा रामदेव ने श्री श्री रविशंकर के हाथों जूस पीकर अपना नौ दिन पुराना अनशन तोड़ा...इस लिंक पर जाकर दो वीडियो में देखिए...उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की फोन पर की जा रही बात...अब आप खुद ही अंदाज़ लगाइए इससे कि अनशन टूटने से पहले बीजेपी और बाबा रामदेव में किस तरह की खिचड़ी पक रही थी...

रामदेव के भाजपा एजेंट होने की चुगली करते ये दो वीडियो


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Walk in naked and walk out dressed for free ! ...Khushdeep


मंगलवार, 14 जून 2011

स्वामी निगमानंद ! काश आप भी बाबा रामदेव होते...खुशदीप



स्वामी निगमानंद काश आपको आमरण अनशन के साथ मार्केटिंग करना भी आता...बाबा रामदेव की तरह आपका ऑरा होता.. अरबों रुपये का एम्पायर होता...अन्ना हज़ारे की तरह आपकी टीम में पूर्व नौकरशाह, पूर्व आईपीएस, दिग्गज वकील, रिटायर्ड जस्टिस होते...फिर देखते...आप की मौत के बाद जो आपके लिए आसमान सिर पर उठा रहे हैं, वही आपके जीते-जी भी आपकी गणेश-परिक्रमा कर रहे होते...

आखिर आपने गंगा के मैली होने का मुद्दा उठाया ही क्यों...गंगा मैया का सीना अगर किनारे लगे स्टोन क्रशर से छलनी हो रहा था, तो आपने दर्द क्यों महसूस किया...सवा अरब की आबादी में गंगापुत्र बनने का बीड़ा आपने ही क्यों उठाया...अन्ना हजारे या उनकी टीम के सदस्य या बाबा रामदेव, छींक भी मारते हैं तो कलम-कंप्यूटर के धनी माइक्रोस्कोप से ये भी देखने को तैयार रहते हैं कि कि नाक-मुंह से नज़ले की कितनी बूंदें बाहर आई...लेकिन इन शूरवीरों को भीष्म पितामह की तरह मृत्युशैया पर पड़े स्वामी निगमानंद ज़िंदा रहते कभी नहीं दिखे...मौत के बाद ज़रूर छाती पीट-पीट कर विलाप होने लगा...

अगर बाबा रामदेव के पल-पल के स्वास्थ्य के लिए दुनिया भर का मीडिया देहरादून के हिमालयन इंस्टीट्यूट अस्पताल में डेरा न डाले होता तो स्वामी निगमानंद की मौत का किसी को पता भी नहीं चलता...बाबा रामदेव और स्वामी निगमानंद में एक बात कॉमन थी...आमरण अनशन...इसी ने पैरलल स्टोरी का आधार तैयार किया...लेकिन ये सब भूल गए कि इस साल 19 फरवरी को जब स्वामी निगमानंद ने हरिद्वार के मातृ सदन पर आमरण अनशन शुरू किया था तो उस वक्त न तो अन्ना हजारे और न ही बाबा रामदेव का अनशन कहीं पिक्चर मे था...स्वामी निगमानंद जिस मातृ सदन आश्रम से जु़ड़े थे उसने न जाने कब से गंगा से हिमालय के पत्थरों के खनन और किनारे पर ही क्रशऱ से उन्हें कूटे जाने के खिलाफ आंदोलन छेड़ रखा था...इसी संघर्ष का परिणाम था कि इक्कीस में से बीस क्रशर बंद हो गए...एक क्रशर जो बचा है उसका मामला अदालत में है...यथास्थिति बनाए रखने की वजह से ये इकलौता क्रशर ही बंद नहीं हुआ है...मातृ सदन के संतों समेत स्वामी निगमानंद ने यही प्रण कर रखा था कि जब तक स्टोन क्रशऱ पूरी तरह बंद नहीं हो जाते, उनका आंदोलन जारी रहेगा....

स्वामी निगमानंद ने भी ठान लिया था कि जब तक प्रण पूरा नहीं होता अनशन पर रहेंगे...19 फरवरी से 27अप्रैल तक 68 दिन तक स्वामी निगमानंद अनशन पर बैठे रहे लेकिन किसी ने सुध नहीं ली...27 अप्रैल को उनकी तबीयत बिगड़नी शुरू हुई तो उन्हें ज़बरन अस्पताल पहुंचा दिया गया...हालत ज़्यादा खराब होने पर उन्हें जॉलीग्रांट देहरादून स्थित हिमालयन इंस्टीट्यूट ले जाया गया...दो मई को स्वामी निगमानंद कोमा में गए और 13 जून की दोपहर को इस युग का ये भागीरथ 36 साल की उम्र में ही परलोक सिधार गया...

स्वामी निगमानंद की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कहा गया है कि उनकी मौत कोमा, सेप्टिसेमिया और डिजेनेरेटिव ब्रेन डिसऑर्डर की वजह से हुई...लेकिन मातृ सदन आश्रम के संस्थापक सदस्य स्वामी शिवानंद ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा है कि प्रशासन उत्तराखंड सरकार के दबाव में काम कर रहा है...स्वामी शिवानंद का आरोप है कि स्वामी निगमानंद की मौत ज़हर देने की वजह से हुई है...उनके मुताबिक अस्पताल में स्वामी निगमानंद को नियमित तौर पर एट्रोपिन दी जा रही थी, जिसका इस्तेमाल ज़हर वाले केसों में ही किया जाता है...

स्वामी निगमानंद चले गए...लेकिन उनकी चिता पर राजनीतिक रोटियां ज़रूर सिकनी शुरू हो गई है...कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने उत्तराखंड की रमेश पोखरियाल निशंक सरकार पर दोहरे मापदंड के इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए कठघरे में खड़ा किया है...दिग्विजय सिंह के मुताबिक बाबा रामदेव के अनशन पर तो निशंक सरकार पूरी तरह बिछ गई थी और स्वामी निगमानंद के अनशन की सुध तक नहीं ली थी...निशंक सरकार के बचाव में बीजेपी प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने तर्क दिया है कि स्वामी निगमानंद का सबसे अच्छे अस्पताल में इलाज कराया जा रहा था...

इसे राजनीति का विद्रूप ही कहा जाएगा कि जिस बीजेपी ने बाबा रामदेव के समर्थन के लिए नौ दिन में ही दिन-रात एक कर दिया था...राजघाट पर ठुमके भी लग गए थे...उसी बीजेपी को स्वामी निगमानंद की व्यथा 115 दिन तक नज़र नहीं आ सकी...उत्तराखंड सरकार के मुखिया रमेश पोखरियाल निशंक बाबा रामदेव के 4 जून की कार्रवाई के बाद पतंजलि योग पीठ पहुंचते ही चरणवंदना करने पहुंच गए थे...लेकिन स्वामी निगमानंद के लिए उनसे पर्याप्त वक्त नहीं निकल सका...आरोप तो ये भी हैं कि गंगा किनारे स्टोन क्रशर के धंधे पर राज्य के ही किसी मंत्री का वरदहस्त था...उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव दूर नहीं है...इसलिए कांग्रेस भी स्वामी निगमानंद के मुद्दे को चुनाव तक जिलाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी...बीजेपी ने स्वामी निगमानंद की सुध नहीं ली तो कांग्रेस ने भी उनके जीते-जी क्या किया...क्यों नहीं उनके समर्थन में बड़ा आंदोलन खड़ा किया...खैर राजनीति तो है ही उस चिड़िया का नाम जिसकी कोई नीति न हो....

स्वामी निगमानंद जी आपके जाने के बाद बाबा रामदेव समेत हर कोई कह रहा है कि गंगा के लिए दिए आपके बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने दिया जाएगा...लेकिन क्या ऐसा हो पाएगा...गंगा से भी अपनी तिजोरियां भरने का रास्ता ढूंढने वाले क्या गंगा को मैली होते रहने से बचा पाएंगे...

स्वामी निगमानंद को समर्पित ये गीत...




रविवार, 12 जून 2011

बाबा जी, शुक्रिया आपने मेरी पोस्ट की लाज रख ली...खुशदीप

आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर आखिरकार अपने प्रयास में सफल रहे...बाबा रामदेव का अनशन तुड़वा कर ही माने...बाबा के जूस पीने के साथ ही एक हफ्ते से चल रहे घटनाक्रम पर पर्दा गिरा...बाबा के बाबू बालकृष्ण जी ने साफ़ किया है कि संत समाज के भरोसा दिलाने के बाद बाबा ने अनशन तोड़ा...(वैसे मेडिकली बाबा का अनशन गुरुवार को ही टूट गया था जब उन्हें अस्पताल ले जाते वक्त ग्लूकोज़ चढ़ाया गया था, उससे पहले बाबा ने सिर्फ नींबू शहद वाला पानी ही लेना कबूल किया था)...संत समाज का कहना है कि अनशन खत्म हुआ है, आंदोलन नहीं..आंदोलन अंतिम सांस तक लड़ा जाएगा...बाबा के अनशन की उपलब्धि यह रही है कि आज बच्चे बच्चे की ज़ुबान पर भ्रष्टाचार और काले धन का मुद्दा है...



मैंने कल श्री श्री रविशंकर के ज़रिए सरकार के हरकत में आने का अपनी पोस्ट में ज़िक्र किया था...फेस सेविंग के लिए दूसरी तरफ़ से भी रास्ता ढूंढा जा रहा था...चलिए अंत भला तो सब भला...सरकार भी खुश, बाबा जी का खेमा भी खुश...वैसे समझौता तो सरकार और बाबा के बीच चार जून को ही हो गया था...जिसका सबूत बालकृष्ण जी की चिट्ठी के तौर पर पूरा देश देख चुका है...

अब ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा इस प्रकरण के प्लस और माइनस प्वाइंट क्या रहे...बाबा रामदेव का कद बढ़ा या उनका कारोबारी चेहरा जनता के सामने बेनकाब हुआ...चलिए जो हुआ सो हुआ, लेकिन इस पूरी खींचतान के दौरान बहुत कुछ बढ़िया और पढ़ने को मिला...मेरी समझ से सबसे बेहतरीन लिखा सृजन और सरोकार के रवि कुमार जी ने अपनी इस पोस्ट में---

अ..अ..अनुलोम कर रहे थे, बस जरा सा व..वि..विलोम हो गया

स्लॉग ओवर

सदी का सबसे बड़ा ज़ोक...

देहरादून के अस्पताल में बाबा रामदेव से पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और इंडियन नेशनल लोकदल के नेता ओमप्रकाश चौटाला (हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री) मिले और बाबा की सेहत के बारे में जाना। उन्होंने बताया कि वो बाबा रामदेव के साथ हैं, काला धन और भ्रष्टाचार देश का सबसे बड़ा मसला है, पूरा देश चाहता है कि ये काला धन देश में आए और गरीब लोगों के लिए उपयोग में लाया जाए...


बादल जी और चौटाला जी !
 भ्रष्टाचार को लेकर आपकी चिंता, ईमानदारी और देशभक्ति को शत-शत नमन...
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Gandhi Living It Up On Mars?...मंगल पर गांधी जी !...Khushdeep

शनिवार, 11 जून 2011

क्या लिखूं, क्यों लिखूं...खुशदीप

ब्लॉगिंग करते इक्कीस महीने हो गए...ख़ूब डूब कर ब्लॉगिंग की...रोज़ कोई न कोई बहाना मिलता ही रहा आप सबको पकाने का...मीडिया में हूं, इसलिए लिखने को दीन-दुनिया के मुद्दे मिलते ही रहते हैं...इस बीच ऐसा रूटीन भी बन गया कि रात को पोस्ट लिखे बिना चैन नहीं आता था...कभी-कभार पोस्ट नहीं लिख पाता था तो अगले दिन अधूरापन सा लगता था...ऐसे जैसे कहीं कुछ छूट सा गया है...ठीक वैसी ही फीलिंग होती थी जैसे आपको अख़बार पढ़ने की आदत हो और होली जैसे अवकाश के बाद अगले दिन अखबार छपा न होने की वजह से आपके हाथ न लगे...लेकिन न जाने क्यों पिछले एक महीने से अब खुद के अंदर ब्लॉगिंग के लिए पहले जैसा उत्साह महसूस नहीं कर रहा...



ब्लॉगिंग के साथ देश में भी जैसा माहौल चल रहा है, उससे विरक्ति सी महसूस होने लगी है...सब कुछ प्रायोजित सा लगने लगा है...अप्रैल में अन्ना हज़ारे की मुहिम शुरू होने से लगा था कि सोए हुए देश के साथ अपनी ही मस्ती में डूबी सरकार को झिंझोड़ कर जगाने की कोई ताकत रखता है...लेकिन दो महीने भी नहीं हुए, भ्रम दूर होने लगे हैं...सपने देखने आसान हैं लेकिन उन्हें हक़ीकत में बदलना बहुत मुश्किल...अन्ना हज़ारे नेक आदमी हैं, उनके अंदर भली आत्मा वास करती है...लेकिन वो कहावत है न अकेला चना आखिर क्या क्या फोड़ सकता है...

अन्ना की टीम अपनी ओर से यथाशक्ति कोशिश कर रही है...लेकिन उसकी दिक्कत ये है कि उन्होंने सिर्फ पांच-छह लोगों को ही पूरी सिविल सोसायटी मान लिया है...सरकार शातिर है, पांच-छह लोगों से निपटने के उसके पास हज़ार रास्ते हैं...आज़ादी से पहले के डिवाइड एंड रूल फॉर्मूले को हमारी ये सरकार भी बखूबी इस्तेमाल करना जानती है...और इसके लिए टारगेट मिल भी जाते हैं...अन्ना की लकीर छोटी करने के लिए सरकार ने बाबा रामदेव की लकीर बड़ी करनी चाही...लेकिन बाबा को भी शायद गलतफहमी हो गई थी कि अब सरकार से कुछ भी मनवाया जा सकता है...भ्रष्टाचार का मुद्दा हो या काले धन का मुद्दा, पूरे देश की समस्या है, किसी का इस पर पेटेंट तो है नहीं...फिर क्यों अकेले टीम अन्ना या अकेले रामदेव इस मुद्दे पर ऐसा दृष्टिकोण अपनाए हुए हैं कि बस वो जो कह रहे हैं, वही सही है....अन्ना की टीम ने पहले सरकार के जाल में फंस कर लोकपाल ड्राफ्टिंग कमेटी में शामिल होना कबूल कर लिया....सरकार ने धीरे धीरे अपना असली रंग दिखाना शुरू किया तो अब टीम अन्ना फाउल फाउल चिल्लाते हुए सार्वजनिक बहसों के ज़रिए लोगों की राय जानने की भी बात कर रही है...

मैंने पहले भी अपनी एक पोस्ट में लिखा था कि देश की तस्वीर बदलने के लिए पहले कुछ ऐसे नाम तलाश करने चाहिए जिनका जीवन खुली किताब रहा है...ईमानदारी का रिकार्ड पूरी तरह बेदाग रहा है...पीपुल्स प्रेज़ीडेंट डॉ अब्दुल कलाम, मेट्रोमैन ई श्रीधरन जैसे दस भी आदमी मिल जाएं तो उनकी सलाह लेकर पूरे देश में जनमत खड़ा करने की कोशिश करनी चाहिए...इससे भ्रष्टाचार या काले धन के खिलाफ लड़ाई कुछ ही लोगों तक सिमटी नहीं रह जाएगी...उससे व्यापक आधार मिलेगा...इन दो मुद्दों के साथ गरीबी, एजुकेशन, स्वास्थ्य, किसानों की बदहाली को भी फ्रंटफुट पर रखा जाना चाहिए...

देश की ये बदकिस्मती ही कहिए कि राजनीति के मोर्चे पर जितनी भी ताकतें हैं उनसे देश का मोहभंग हो चुका है...एक भी ऐसा नेता नहीं जो सबको साथ लेकर चलने की सलाहियत रखता हो...सरकार का विरोध करने की जिन पर ज़िम्मेदारी है, वो और ज़्यादा निराश करने वाले हैं...अटल बिहारी वाजपेयी के अस्वस्थ होकर राजनीति के पटल से हटने के बाद विरोधी खेमे में जो रिक्तता आई है, उसकी भरपाई करने वाला विकल्प दूर-दूर तक नज़र नहीं आता...सदन की गरिमा अब अतीत की बात होकर रह गई है...राष्ट्रीय दल हो या प्रांतीय दल, हर कोई अपना उल्लू सीधा करने में लगा है...राजनीतिक मोर्चे से जनता निराश है तो योग सिखाते सिखाते कोई बाबा रामदेव उठ कर कहने लगते हैं कि चार सौ लाख करोड़ का काला धन देश में ले आओ तो देश का हर बंदा सुखी हो जाएगा...एक ही झटके में देश की सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी...एक रुपये में पचास डॉलर मिलने लगेंगे...ये सब अव्यावहारिक बातें इसलिए हैं कि क्योंकि हम सरकार को कोसना तो जानते हैं लेकिन वो विकल्प नहीं सुझाते जिसके तहत देश की तस्वीर बदली जाएगी...यही एजेंडा साफ़ न होने की वजह से सारी मुहिम टाएं-टाएं फिस्स हो जाती हैं...

अब जैसी ख़बरें आ रही हैं बाबा रामदेव और सरकार के बीच गतिरोध जल्दी ही टूट जाएगा...कोई सहमति बन जाएगी....सरकार काले धन पर कोई पैनल या कमेटी जैसा कदम उठाएगी...बाबा रामदेव के कारोबारी धंधों पर कहीं से कोई आंच नहीं आएगी...यानि हर एक के लिए विन-विन पोज़ीशन...ठगी रह जाएगी तो फिर वही जनता...

अगर देश का राजनीतिक नेतृत्व ईमानदार और काबिल होता तो क्यों लोगों को अन्ना हज़ारे या बाबा रामदेव के पीछे लगने की ज़रूरत पड़ती...मुझे अब देश का माहौल सत्तर के दशक जैसा ही नज़र आने लगा है...तब जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया तो पूरे देश को लगा इंदिरा गांधी की सरकार पलटते ही देश में सब कुछ अच्छा अच्छा हो जाएगा...लेकिन उस वक्त भी ये नहीं सोचा गया था कि जो विकल्प आएगा क्या वो वाकई राष्ट्रहित के एजेंडे पर काम करेगा या भानुमति के कुनबे की तरह सिर्फ अपने ही स्वार्थों के लिए मर मिटेगा...हुआ भी यही चौ.चरण सिंह की प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश और मोराराजी देसाई के हठी स्टाइल ने सब पलीता लगा दिया...तीन साल में ही इंदिरा गांधी की वापसी हो गई...

आज तीन दशक बाद भी स्थिति बदली नहीं है...हर कोई अपने स्वार्थ के पीछे भाग रहा है...ऐसे में राजनीति से इतर कोई व्यक्ति ईमानदारी, नैतिकता, शुचिता की बातें करता है तो लोगों को उस में ही आइकन नज़र आने लगता है...ये ठीक वैसे ही है जैसे सत्तर के दशक में महंगाई, भष्टाचार से हर कोई त्रस्त था, और सिल्वर स्क्रीन पर एंग्री यंगमैन के तौर पर अमिताभ बच्चन को व्यवस्था से लड़ते देखता था तो खूब तालियां बजाता था...हक़ीक़त में जो नहीं हो सकता था, वो उसे पर्दे पर अमिताभ के ज़रिए पूरा होते दिखता था...लेकिन यही अमिताभ राजनीति में आए थे तो क्या हश्र हुआ था, ये इलाहाबाद के लोगों से बेहतर कौन जानता होगा...



क्या लिखूं सोच रहा था और बहुत कुछ लिख गया...हमारे देश का मानव संसाधन आज भी हमारा सबसे बड़ा एसेट है...एक से एक प्रतिभाएं हैं देश में...ज़रूरत है हमें अच्छे नेतृत्व की...टॉप लेवल पर ईमानदार और एक्सपर्ट लोगों का पैनल निगरानी करे और छोटे स्तर पर तस्वीर को बदलने वाली लड़ाइयां हम हर गली मोहल्ले, गांव कस्बे में लड़े, तब ही सूरत में बदलाव सोचा जा सकता है...वरना...वरना क्या...मेरा भारत महान तो है ही....

CURRENT POLITICAL SCENARIO IN A NUT-SHELL..KHUSHDEEP

गुरुवार, 9 जून 2011

यू.एस.ए.बॉर्न इन यू.एन...खुशदीप

गुरुदेव समीर लाल जी की आज पोस्ट द सर्टिफाइड साहित्यकार- (हि.) पढ़ी...बड़े दिनों बाद गुरुदेव ने गु.गु. कर पे.में.ब. डाल देने वाली रचना लिखी है...



वाकई डिग्रियों के शार्टकट की महिमा अपरम्पार है...आज गुरुदेव की रचना पर ललित शर्मा भाई ने ब्ला. ललित शर्मा लिखा तो पढ़कर मन गद्गद् हो गया...चलो डॉ. या इं. न सही अब शान के साथ नाम के आगे ब्ला. तो लिख पाएंगे...ब्ला. खुशदीप सहगल...एक बार नाम लिख कर भी देखा...सीना छह इंच चौड़ा हो गया...ऐसा करते वक्त बचपन की वो शेखियां याद आ गई जब ध्यान पढ़ाई पर कम होता था लेकिन नाम के आगे डॉ और पीछे एम.बी.बी.एस. लगा कर कॉपी पर खुद ही लिख-लिख अपने मनमयूरा को नचाते रहते थे...बड़े होकर डॉक्टर तो बने नहीं हां एम.बी.बी.एस. ज़रूर बन गए...एम.बी.बी.एस. बोले तो मैं बीवी, बच्चों का सेवक...

ललित भाई ने गुरुदेव की पोस्ट पर कमेंट में ताकीद भी किया है कि ब्ला. के अन्वेषणकर्ता का श्रेय सिर्फ उन्हें ही दिया जाए...मैं ललित भाई की इस खोज़ को नोबेल पुरस्कार समिति के पास भेजने के लिए प्रपोजल तैयार करने में जुटा ही था कि कुछ सोच कर मेरे उत्साह की उड़ान वैसे ही धम से ज़मीन पर आ गिरी जैसे इसरो की फ्लाईट कई बार आकाश की ओर जाने की जगह समुद्र के धरातल की ओर जाने का मन बना लेती हैं...ब्लॉगर की शान जताने वाली डिग्री ब्ला. को मैंने दोबारा पढ़ा...अचानक दिमाग में कौंधा कि अगर किसी ने ब्ला. का मतलब कुछ और निकाल लिया तो...

ब्ला. यानि बलात्कारी...ये सोचते ही ब्ला. खुशदीप सहगल जहां लिखा था, उसे तब तक पेन से काटता रहा जब तक पूरी तरह गुचड़-मुचड़ नहीं हो गया...इसलिए ललित भाई इस ब्ला. को बाई लॉ बनाने से पहले बाई बाई कर देना ही बेहतर है...

चलिए अब आता हूं, इस पोस्ट के शीर्षक पर यू.एस.ए बॉर्न इन यू.एन. पर...अब उल्हास नगर में जन्मे उमेश संपत अजवाणी अपने नाम को इस तरह लिखना शुरू कर दें तो यू.एस.ए. या यू.एन. उनका क्या बिगाड़ लेंगें...मित्र देशों के साथ मिलकर उमेश भाई के घर पर ड्रोन हमले थोड़े ही करवाना शुरू कर देंगे...

क्लेमेंटटाउन की यू.के. में लोकेशन


एक और अपने साथ पेश आये वाकये का ज़िक्र करता हूं...इसने वाकई मुझे भी चकरा दिया था...बचपन के एक दोस्त ने अपना पता लिख कर भेजा...क्लेमेंटटाउन (यू.के.)...मैं ये जानकर बड़ा  इतराया कि चलो बचपन में निकर को दोनों हाथों से पकड़ कर घूमने वाला दोस्त विलायत जा बसा है...कभी इंग्लैंड जाने का मौका मिला तो फ्री में दो-चार दिन रहने का जुगाड़ तो हो जाएगा...लेकिन कई दिन बाद दोस्त की हक़ीक़त खुली तो सारी खुशी एक झटके में ही काफ़ूर हो गई...क्लेमेंटटाउन इंग्लैंड में नहीं यही देहरादून का कैंट एरिया है...और यू.के. का मतलब भी यूनाइटेड किंगडम नहीं उत्तराखंड है...वैसे ये दोस्त महाराज बचपन में भी बड़े चालू थे...मेरठ के लाल कुर्ती इलाके में हंडिया मोहल्ले में रहते थे...लेकिन जब पता लिखते थे तो हंडिया मोहल्ले को Mohallae Handian लिखते थे...टोकने पर कहते थे, समझा करो यार...इम्प्रेशन पड़ता है....

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मंगलवार, 7 जून 2011

राजनीति का चंडूखाना और रामदेव विलाप...खुशदीप



कई तस्वीरें एक साथ उभरीं...रामलीला मैदान के मंच पर किसी ओलंपिक स्प्रिंटर की तरह पहले कूद-फांद करते और फिर हरिद्वार में विलाप करते बाबा रामदेव...दिल्ली के राजघाट पर सत्याग्रह के दौरान ठुमके लगातीं सुषमा स्वराज...कांग्रेस की प्रेस कॉन्फ्रेंस में जनार्दन द्विवेदी को जूता दिखाता कथित पत्रकार सुनील कुमार...




लोकपाल पर प्रतिवाद करते टीम अन्ना के अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और सरकार के मंत्री...अब मेरे ज़ेहन में ये सारी तस्वीरें गड्मड् होती एक दूसरे पर छाती चली गईं...ठीक वैसे ही जैसे आज हर कोई एक दूसरे पर छाने की कोशिश कर रहा है...कुछ कुछ सीताराम केसरी अंदाज़ में...खाता न बही, जो केसरी कहे वो सही...(अरे इतनी जल्दी भूल गए अपने केसरी चचा को, वही सीताराम केसरी जो दशकों तक कांग्रेस के खजांची रहे, नेहरू परिवार की तीन-तीन पीढ़ियों के साथ काम किया)...

भ्रष्टाचार जैसे असली मुद्दे की राजनीति के इस चंडूखाने में मौत होना नियति है...भ्रष्टाचार पूरे देश का मुद्दा है, ये सिर्फ अन्ना हजारे या बाबा रामदेव की बपौती कैसे हो सकता है...टीम अन्ना और बाबा रामदेव दोनों जिन मुद्दों को उठा रहे हैं, दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं...लेकिन जिस तरह सिक्के के दोनों पहलू आपस में कभी नहीं मिल सकते...यही हाल टीम अन्ना और बाबा रामदेव का है...दोनों दावा करते हैं कि हम साथ-साथ हैं...लेकिन कहने का जो तरीका होता है और जो बॉ़डी लैंग्वेज होती है, उसी से समझ आ जाता है कि दोनों कितने एक-दूसरे के साथ हैं...पास आते भी नहीं, दूर जाते भी नहीं...क्या कशिश है कसम से....

अब सरकार की भी बात कर ली जाए...प्रधानमंत्री की बात कर ली जाए...सोनिया गांधी की बात कर ली जाए, कांग्रेस के नए कर्णधारों-कपिल सिब्बल, पवन कुमार बंसल, सुबोध कुमार सहाय, जनार्दन द्विवेदी की बात कर ली जाए...प्रधानमंत्री ने प्रणब मुखर्जी जैसे वरिष्ठतम मंत्री की अनिच्छा के बावजूद उन्हें दिल्ली एयरपोर्ट पर तीन मंत्रियों के साथ बाबा रामदेव की अगवानी के लिए भेज दिया...यानि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से भी ज़्यादा भाव बाबा रामदेव को उज्जैन से दिल्ली आने पर दिया गया...फिर बाबा से बातचीत के दौर चलते रहे, मंच से बाबा बयानबाज़ी करते रहे और मंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंसों में...लेकिन परदे के पीछे कुछ और ही खेल चलता रहा...बाबाजी भी क्लेरिजेस होटल में पिछले दरवाजे से पहुंचकर गुपचुप सरकार से मंत्रणा करते रहे...कपिल सिब्बल ने बाबा के खासमखास बालकृष्ण की साइन की हुई चिट्ठी सार्वजनिक की तो सभी को पता चला कि फिक्सिंग सिर्फ क्रिकेट में ही नहीं होती...इस चिट्ठी के खुल जाने के बाद बाबा को पत्रकारों के सवालों का जवाब देना भारी हो रहा था...लेकिन चार जून की रात को रामलीला मैदान खाली कराने के लिए दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई कर दी...वजह बताई गई कि बाबा ने योग शिविर की इजाज़त सिर्फ पांच हज़ार लोगों के लिए ली थी...और वहां ज़्यादा लोगों के जमा होने से अनिष्ट का खतरा हो गया था...बाद में सफ़ाई में ये भी कहा कि इंटेलीजेंस एजेंसियों को लीड मिली थी कि बाबा रामदेव की जान को ख़तरा था...ये सब वजह जो बाद में बताईं गईं, ये उस वक्त कहां तेल लेने गई हुईं थी जब सरकार बाबा रामदेव को बातचीत के नाम पर पहले दो दिन मक्खन लगाती रही...

रामलीला मैदान पर लोगों का जमावड़ा पहले दो दिन तक दिल्ली पुलिस को क्यों नहीं दिखा...ये इसलिए क्योंकि सरकार को भरोसा था कि बाबा रामदेव को मना लिया जाएगा और अन्ना हज़ारे के उठाए लोकपाल के मुद्दे की हवा निकाल दी जाएगी...लेकिन बाबा सरकार के भी गुरु निकले...आरएसएस का खुला समर्थन मिल जाने से बाबा ने अपना रुख और कड़ा कर लिया...सरकार से कहते रहे तीन दिन ही अनशन होगा (लिखित में दिया पत्र), लेकिन मंच पर कुछ और ही तेवर दिखाते रहे...सरकार को भी लगा कि बाबा को जितना आसान टारगेट समझा था, उतने वो हैं नहीं...बस आनन-फ़ानन में रात को ही रामलीला मैदान खाली कराने का फैसला कर लिया गया...

लेकिन पुलिसिया कार्रवाई के दौरान बाबा ने जो बर्ताव दिखाया, वो और भी विचित्र था...मान लीजिए बाबा वहां शांति के साथ मंच पर बैठे रहते तो क्या होता...बाबा को गिरफ्तार कर लिया जाता...यहां ये भी न भूला जाए कि पूरे देश के मीडिया के कैमरे दिन-रात रामलीला मैदान के मंच पर बाबा को कवर कर रहे थे...उनके सामने गिरफ्तारी करने के बाद पुलिस क्या वो कर सकती थी जिसका कि दावा बाद में बाबा ने किया...एनकाउंटर...अब वो ज़माना गया जब सरकार या बाबा रामदेव छुप कर कोई डील कर लें और दुनिया को पता भी न चले...पुलिस का व्यवहार तो हर लिहाज़ से बर्बर कहा ही जाएगा लेकिन बाबा रामदेव और आयोजकों ने खुद भी क्या अपने समर्थकों की जान को खतरे में नहीं डाला...पुलिस को देखते ही इतना उग्र होने की क्या ज़रूरत थी...पुलिस के डंडा चलाने की तस्वीरें सब ने देखीं तो साथ ही पुलिस पर हमला करते, पत्थर बरसाते बाबा के समर्थकों को भी पूरे देश ने देखा...बाबा का दावा है कि महिला के कपड़ों में उन्हें रामलीला मैदान से निकलना पड़ा...वहां कोई भी वजह रही हो बाबा की इस हाल में निकलने की....लेकिन अगले दिन हरिद्वार पहुंचने के बाद भी वो क्यों महिला का सलवार, कमीज़, दुपट्टा ओढ़े रहे...क्या इसलिए कि इस हाल में मीडिया के सामने आकर रोने से पूरे देश में उनके लिए सहानुभूति लहर दौड़ जाएगी...बाबा जी, देशवासी अब इतने अपरिपक्व भी नहीं रहे कि कोई कुछ कहे और वो आंख मूंद कर यकीन कर लें....

अब ज़रा संघ परिवार की भी बात कर ली जाए...संघ गंगा को बचाने के अभियान में पहले बाबा रामदेव के हाथों धोखा खा चुका है...बाबा ने इस पूरे अभियान को हाईजैक कर मनमोहन सिंह सरकार से हाथ मिला लिया था...गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किए जाने पर बाबा ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का संतों से सम्मान कराने की योजना भी बना ली थी...लेकिन बाद में मालेगांव, अज़मेर शरीफ़ जैसी जगहों पर धमाकों में साध्वी समेत कुछ हिंदुओं का नाम आने के बाद संतों की नाराज़गी के चलते रामदेव को अपनी योजना को ठंडे बस्ते में डालना पड़ा...एक बार चोट खाने के बाद भी संघ परिवार फिर क्यों बाबा रामदेव के पीछे शिद्दत के साथ आ खड़ा हुआ है...सिर्फ इसलिए कि संघ परिवार को बीजेपी की काबलियत पर भरोसा नहीं रहा है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर वो सरकार को प्रभावी ढंग से घेर सकती है...संघ परिवार को लग रहा है कि बाबा रामदेव को आगे कर जनमानस को उद्वेलित किया जा सकता है...

लेकिन संघ ये भूल रहा है कि बाबा रामदेव का सम्मान पूरा जहान योग की तपस्या के लिए करता है...राजनीति के आसनों के लिए नहीं...ये सही है कि बाबा को भी देश के आम नागरिक की तरह भ्रष्टाचार, काला धन के मुद्दों पर चिंता दिखाने का हक़ है...लेकिन राजनीति की बाज़ीगरी को बाबा अपना शगल बनाना चाहते हैं तो निश्चित रूप से उनकी योगगुरु की पहचान दरकेगी....

अब बीजेपी और बाकी राजनीतिक दल...मुख्य विरोधी दल के नाते बीजेपी का कितना रुतबा है इसकी झलक हाल में लखनऊ में संपन्न दो दिन की उसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में ही मिल गई...ये तो भला हो रामदेव का, बीजेपी को सड़कों पर तेवर दिखाने का मौका मिल गया...राजघाट पर सत्याग्रह के दौरान विजय गोयल, सुषमा स्वराज के ठुमकों ने ही जता दिया कि रामदेव के समर्थकों पर पुलिस की बर्बर कार्रवाई का रोना रोते वक्त उनके आंसू कितने सच्चे थे...



रामदेव के समर्थकों पर कार्रवाई को लेकर मायावती और मुलायम सिंह यादव ने भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा...लेफ्ट की वृंदा करात ने भी कार्रवाई को निंदनीय बताया...वृंदा करात ने ये सावधानी ज़रूर बरती कि काले धन की मुहिम को लेकर बाबा की मंशा पर ज़रूर सवालिया निशान लगा दिया...ये वही वृंदा करात हैं जिन्होंने कभी बाबा की फॉर्मेसी की दवाईयों में मानव-अस्तियों के इस्तेमाल का आरोप बड़े जोर-शोर से लगाया था...मायावती-मुलायम कई मौकों पर पहले यूपीए सरकार को अभयदान दिला चुके हैं...आज उन्होंने रामलीला मैदान पर सरकार की कार्रवाई की सख्त शब्दों में भर्तस्ना की है है...लेकिन हो सकता है कल ये मौका पड़ने पर आरएसएस का नाम लेकर ही बाबा को उधेड़ें ठीक वैसे ही जैसे लालू यादव ने अब सरकार का साथ देते हुए किया है...लालू जी का ऐसा करना समझ में भी आता है...मंत्रिमंडल का विस्तार जल्दी ही होना है...लालू जी खाली है...शायद 10, जनपथ की कृपा हो जाए तो रेलवे मंत्रालय न सही तो कोई और मलाईदार महकमा ही हाथ लग जाए..

चलो जी, सब की ख़बर हो गई, अब हम सब अपनी ख़बर भी लें,,,हमें क्या करना है...बौद्धिक जुगाली करते रहना है और क्या...अभी नेताओं को कोसना है, लेकिन जब चुनाव आएंगे तो घर से बाहर निकलेंगे ही नहीं...हां अगर कोई जान-पहचान का खड़ा है और उससे भविष्य में कुछ फायदा होते दिखे तो ज़रूर वोट दे आएंगे...नहीं तो कहेंगे...क्या फर्क पड़ता है....सभी तो एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं...क्या मिलेगा इन्हें वोट देकर...तो फिर ढूंढिए न चिराग लेकर अपने आस-पास चंद ऐसे लोग जो सच में कुछ करने का जज़्बा रखते हैं...जिनका जीवन बेदाग है...डॉ अब्दुल कलाम, ई श्रीधरन जैसी निस्वार्थ हस्तियां...नेता न सही उन्हें अपना मार्गदर्शक ही बनाइए...शायद उनके बताए रास्ते ही इस देश को बचाने का कोई रास्ता निकल आए...

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शनिवार, 4 जून 2011

राजनीति का अन्ना युग नहीं, बाबा काल...खुशदीप





बाबा रामदेव की बम बम है...रामलीला मैदान चकाचक है...सरकार दंडवत है...संघ परिवार संग-संग है...भई मानना पड़ेगा बाबा जी के प्रताप को...हर एक को साधने की कला जानते हैं...अपने ब्रैंड को प्रमोट करना और फिर उसकी अधिक से अधिक कीमत वसूल करना...ये हावर्ड-ऑक्सफोर्ड वाले क्या खाकर दुनिया को मार्केटिंग सिखाएंगे...मैं तो कहता हूं सभी मार्केटिंग गुरुओं को बाबा के सामने शीर्षासन करना चाहिए...

ढाई लाख वर्ग फुट के पंडाल में बाबा अनशन के लिए पूरी तैयारी के साथ है...काले धन का मुद्दा भी सटीक है...देश में ऐसा कौन होगा जो कहेगा कि विदेशों मे काला धन जमा करने वाले भ्रष्टाचारियों का मुंह काला न हो...ये बात तो वो भी नहीं कहेंगे जो कि पैर से लेकर कंठ तक भ्रष्टाचार के दलदल में डूबे हैं...लेकिन अब ये मुद्दा ज़ोरदार ढंग से बाबा उठा रहे हैं...वही बाबा जो पंद्रह साल पहले तक साइकिल से कनखल-हरिद्वार में आर्यसमाज से जुड़ी संस्थाओं में हवन कराने जाते थे...पंद्रह साल में बाबा ने अरबों रुपये का एम्पायर खड़ा कर लिया...आज बाबा देश-विदेश में योग-शिविरों में योग सिखाने की फीस वसूलने के साथ आयुर्वेदिक दवाओं का धंधा भी करते हैं...क्रीम, पाउडर, तेल, कास्मेटिक, दलिया, हल्दी, बेसन, बिस्किट, साबुन, दंत मंजन ऐसी कौन सी चीज़ है जो बाबा की दिव्य योग फार्मेसी के ज़रिए नहीं बेचा जाता...ये अच्छी बात है कि बाबा ने अपने मार्केटिंग के कौशल के बल पर मल्टी नेशन कंपनियों के सामने स्वदेशी के नाम पर अपने उत्पादों को खड़ा कर लिया है...कहने वाले बाबा के इन सब कामों को भी देश की सेवा बताते हैं...कहते हैं कि बाबा किसी से कुछ ले तो नहीं रहे, दे ही रहे हैं...बाबा के मुताबिक चार सौ लाख करोड़ का काला धन देश में वापस आ जाए तो एक ही झटके में भारत और भारतवासियों के सारे कष्ट दूर हो जाएंगे...सुनने में ये बात बड़ी अच्छी लगती है....लेकिन करने में....

यहां मेरा एक सवाल भी है सबसे पहले देश के सारे बाबा और मठ ही क्यों नहीं अपनी सारी संपत्ति का ब्यौरा, उनके स्रोतों को देश के सामने सार्वजनिक कर देते...बाबा रामदेव कह सकते हैं कि रामलीला मैदान पर जो खर्चा हो रहा है, वो सब खुशी-खुशी उनके भक्त उठा रहे हैं...बाबा हिसाब के पक्के हैं, इसलिए इस खर्च को कागज पर बड़े सलीके के साथ ज़रूरत पड़ने पर पेश भी कर दिया जाएगा...लेकिन यहां क्या ये मुद्दा नहीं होना चाहिए कि देश के धार्मिक और चैरिटी संस्थानों को दिए जाने वाले दान का टैक्स-फ्री होना भी मनी लॉन्ड्रिंग का एक बड़ा ज़रिया है....

बाबा रामदेव योगी हैं, कर्मयोगी हैं, समाज सुधारक हैं, सफल कारोबारी हैं...और अब राजनीति को साधने की कला में भी सिद्धहस्त हैं...अपने ट्रस्ट के वालंटियर्स के साथ अब भक्तों की अच्छी खासी फौज भी उनके पीछे खड़ी है...बाबा का यही सच सत्ताधारी कांग्रेस को भी डरा रहा है और विरोधी दल बीजेपी को भी...संघ मान रहा है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरने के लिए बीजेपी अपने बूते पर लड़ाई लड़ने में नाकाम है...अटल बिहारी वाजपेयी के बाद बीजेपी के पास एक भी नेता ऐसा नहीं है जिस पर पूरा देश भरोसा कर सके...संघ को बाबा रामदेव में वो करिश्मा नज़र आ रहा है जो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार को पटकनी देने के लिए देश-भर में जनमानस तैयार कर सकता है...संघ को बाबा की ज़रूरत है...बाबा को देश भर में अपनी मुहिम को फैलाने के लिए संघ के अनुशासित स्वयंसेवकों की दरकार है...

लेकिन बाबा रामदेव साथ ही सरकार के साथ गोटियां फिट करने की कला को भी बखूबी जानते हैं...पारदर्शिता की बात करते हैं लेकिन जब कांग्रेस के मंत्रियों से बात करनी होती है तो होटल क्लेरिज़ेस में पिछले दरवाजे से पहुंचते हैं...बाबा खुली किताब हैं तो सरकार को रामलीला मैदान में ही भक्तों के सामने ही आकर बात करने के लिए कहते...आखिर जिनके हक़ की लड़ाई लड़ने का बाबा दम भरते हैं, उन्हीं से ही कैसी राज़दारी...

अन्ना हज़ारे अनशन पर बैठे थे...बाबा रामदेव वहां समर्थन देने के लिए पहुंचे थे...लेकिन अन्ना के लिए स्वतस्फूर्त समर्थन के सामने बाबा को अपनी दाल गलती नहीं लगी...झट से वहां आने के बाद टीम अन्ना के शांति-भूषण, प्रशांत भूषण पर वंशवाद का आरोप ठोक डाला...दो दिन पहले ही बाबा ने लोकपाल के मुद्दे पर गुगली फेंकते हुए प्रवचन कर डाला कि प्रधानमंत्री और भारत के मुख्य न्यायाधीश जैसे गरिमा वाले पदों को लोकपाल के दायरे में लाया जाए या नहीं, इस पर बहस की आवश्यकता है...यही बात तो सरकार भी कह रही है...यही प्रश्न सभी मुख्यमंत्रियों और राजनीति दलों को चिट्ठी लिखकर पूछ रही है...

टीम अन्ना और सरकारी नुमाइंदों के बीच छह जून को बैठक निर्धारित है...सरकार का जिस तरह का रुख है उससे लगता नहीं कि वो प्रधानमंत्री के मुद्दे पर टीम अन्ना की मांग माने, सरकार तो सांसदों के सदन में आचरण को भी लोकपाल के दायरे में नहीं लाना चाहती...ऐसे में बहुत संभव है कि टीम अन्ना लोकपाल बिल ड्राफ्टिंग कमेटी का बहिष्कार कर दे...लेकिन जहां तक आसार नज़र आ रहे हैं, उस दिन भी बाबा रामदेव का अनशन चल रहा होगा...बाबा के सबसे विश्वासपात्र सहयोगी बालकृष्णा कह भी चुके हैं कि सरकार बाबा की सारी मांगें मान भी ले तो भी अनशन तीन दिन तक चलेगा...

अन्ना फक्कड़ हैं, धुन के पक्के हैं...हर कोई जानता है...पूरे देश को उन पर भरोसा है...लेकिन अन्ना के पास बाबा रामदेव के संगठन जैसी ताकत नहीं है...पैसा नहीं है...वहीं बाबा रामदेव के पास वो सब कुछ है जो देश के बड़े से बड़े कॉरपोरेटों के पास होता है...लेकिन बाबा को पसंद करने वाले करोड़ों हैं तो उन को शक की नज़रों से देखने वालों की भी कमी नहीं...ऐसे में क्या ये अच्छा नहीं होता बाबा खुद को योग और तपस्या तक ही सीमित रखते और अपनी पूरी ताकत अन्ना की मुहिम को कामयाब बनाने में लगा देते...लेकिन इसके लिए बाबा को खुद परदे के पीछे रहना पड़ता...जो बाबा को हर्गिंज गवारा नहीं...अगर देश में प्रभावी लोकपाल आ जाता है तो भ्रष्टाचार पर नकेल कसते हुए काले धन का नासूर भी उसकी स्क्रूटनी में आएगा ही...लेकिन अन्ना की मुहिम के समानांतर ही अपना आंदोलन चलाना क्या अन्ना का कद छोटा करने की कोशिश नहीं है...जो खबरें छन कर आ रही हैं उसमें बाबा रामदेव के साथ सरकार की जो सहमति बन रही है, उनके मुताबिक बाबा लोकपाल के मुद्दे को छुएंगे भी नहीं...

ओह अन्ना, आप क्यों रालेगन सिद्दि गांव के एक मंदिर में रहते हैं...काश आपने भी आंदोलन शुरू करने से पहले बाबा की तरह अपना एम्पायर खड़ा किया होता...फिर हम राजनीति का अन्ना युग देखते, बाबा काल नहीं....

MEHFOOZ ALI...MISSING OR WANTED...KHUSHDEEP

गुरुवार, 2 जून 2011

वो दुनिया की 'टॉप 100 सेक्सी महिलाओं' में, लेकिन है मर्द...खुशदीप



आज मिलिए आंद्रेज पेजिक से...दुनिया की 'टॉप 100 सेक्सी महिलाओं' में 98वीं पायदान पर आंद्रेज़ का नाम है...आप सोच रहे होंगे कि इसमें विचित्र क्या है...98वीं पायदान पर आकर कौन सा तीर मार लिया...ऊपर 97 नाम और भी तो हैं...लेकिन जनाब आंद्रेज़ क्यों इनमें सबसे अलग है...वो इसलिए कि आंद्रेज महिला नहीं मर्द है...जी हां, बिल्कुल सही लिख रहा हूं...आंद्रेज महिला नहीं मर्द है...वर्ष 2011 के लिए 'टॉप 100 सेक्सी महिलाओं' में आंद्रेज के नाम का शुमार करने का ये कारनामा कर दिखाया है, पश्चिमी देशों के हाई-फाई मर्दों में मशहूर मैगजीन FHM ने...ये मैगजीन दुनिया की एक से बढ़ कर एक खूबसूरत महिला मॉडलों के फोटोग्राफ्स छापने के लिए प्रसिद्ध है...अब इस मैगजीन ने अपने पाठकों से बाकायदा वोटिंग करा के 'टॉप 100 सेक्सी महिलाओं' को चुना है...और इसी वोटिंग में आंद्रेज को 98वां स्थान मिला...

21 साल के आंद्रेज की खूबी ये है कि फैशन मॉडलिंग महिला के लिए हो या मर्दों के लिए, ये दोनों ही जगह इस काम को बखूबी अंजाम दे सकता है ...इसीलिए FHM मैगजीन ने  6 फुट 2 इंच लंबे आंद्रेज की फोटो के साथ ये कमेंट भी किया है कि वो एक दिन विक्टोरिया सीक्रेट के लिए भी मॉडलिंग करते नज़र आएं तो कोई बड़ी बात नहीं...विक्टोरिया सीक्रेट महिलाओं के इनरवियर्स में दुनिया का नंबर एक ब्रैंड है...

अब आंद्रेज महाशय के बारे में थोड़ा और जान लीजिए...जनाब आस्ट्रेलिया के Androgynous मॉ़डल हैं...इस का मतलब ठीक से मैं भी नहीं समझ सका...शायद यही होगा कि ऐसा मर्द जिसमें महिलाओं वाले फीचर भी प्रधानता के साथ दिखें..या फिर ऐसा मॉडल जो महिला या मर्द दोनों रूपों में मॉ़डलिंग कर सके...या फिर पाकिस्तान की बेगम नवाजिश अली (बिग बॉस फेम) जैसा कोई चक्कर होगा जो है तो मर्द लेकिन टीवी पर महिलाओं के लिबास में आकर एंकरिंग करने के लिए मशहूर है...



ऐसा नहीं कि आंद्रेज की मर्दों की मॉडलिंग की दुनिया में कोई हस्ती नहीं है...मॉडल्स डॉट कॉम के मुताबिक दुनिया के 50 टॉप मर्द मॉडलों में आंद्रेज का नंबर ग्यारहवां है...क्रोएशिएन पिता और सर्बियन मां से टुजला (बोस्निया-हर्ज़ेगोविना) में जन्मे आंद्रेज का बचपन मेलबर्न (आस्ट्रेलिया) में बीता...आंद्रेज के परिवार को सिविल वॉर के चलते टुजला छोड़कर ऑस्ट्रेलिया में बसने का फैसला करना पड़ा था...आंद्रेज जब सत्रह साल का था तो एक फास्ट फूड सेंटर में काम करने के दौरान एक मॉ़डल कोआर्डिनेटर की उस पर पहली बार नज़र पड़ी थी...अब आंद्रेज को चार साल से ज़्यादा वक्त मॉडलिंग करते हो गया है....इस साल जनवरी में पेरिस फैशन शो के दौरान आंद्रेज महिला और मर्दे फैशन, दोनों ही सेक्शनों के लिए रैम्प पर उतरा था...

आंद्रेज के बारे में इतना जानने के बाद आप भी मेरी तरह कह रहे होंगे....अजब तेरी कारीगरी रे भगवान...


BEHIND EVERY MAN, THERE'S A SMART WOMAN...KHUSHDEEP