गुरुवार, 31 मार्च 2011

हटो, हटो, ए श्रीलंका वालों, वर्ल्ड कप हमारा है...खुशदीप




कल मोटेरा, आज मोहाली और कल मुंबई की बारी है...दिल से चाहता था मोहाली में भारत जीते, भारत जीता...दिल से चाहता था खेल भावना जीते, खेल भावना जीती...अपने करियर का सबसे अहम टूर्नामेंट खेल रहे सचिन तेंदुलकर ने जीत का आधार तैयार किया...भले ही 85 रन की ये पारी सचिन के स्टैंडर्ड के मुताबिक नहीं थी लेकिन फिर भी मैच के टॉप स्कोरर के नाते मैन आफ द मैच के वो पूरे हकदार थे...लेकिन मेरी नज़र में इस जीत के असली हीरो सुरेश रैना और आशीष नेहरा हैं...सुरेश रैना ने टेलएन्डर्स के साथ भारतीय पारी के आखिर में 36 रन की जो नाबाद पारी खेली उसी ने मैच को पाकिस्तान की पकड़ से बाहर किया...पाकिस्तान हारा भी 29 रन से ही...नेहरा के अलावा भी सारे बोलर्स ने मैच-जिताऊ बोलिंग की...फील्डिंग भी आज वैसी ही दिखी जैसे कि वर्ल्ड चैंपियन के प्रबल दावेदार की होनी चाहिए...

यहां मैं पाकिस्तान के हारने के बावजूद शाहिद आफरीदी और उनकी टीम को बधाई देना चाहूंगा...आफरीदी की टीम से वर्ल्ड कप शुरू होने से पहले किसी ने उम्मीद नहीं की थी कि वो ज़्यादा दूर तक जाएंगे...लेकिन फिर भी वो सेमीफाइनल तक पहुंचे...और भारत को कुछ हद तक टक्कर भी दी...अगर पाकिस्तान ने बैटिंग रणनीति से की होती, बैटिंग पावर प्ले का सही से इस्तेमाल किया होता, मिस्बाह ने रन रेट का ध्यान रखा होता तो पाकिस्तान मैच को बिल्कुल नज़दीक तक ला सकता था...लेकिन आज भारत का दिन था...ये तभी पता चल गया था जब सचिन को एक के बाद एक लाइफ़-लाइन मिलती गई...

चलिए अब एक दिन पाकिस्तान को वर्ल्ड कप में अब तक हुई पांच भिड़ंत में पांचों बार हराने का जश्न बना लीजिए...लेकिन धोनी की सेना को इस मिशन को शनिवार को इसके अंजाम तक पहुंचाना है...28 साल बाद वर्ल्ड कप पर दूसरी बार भारत का नाम लिखना है....लेकिन सवा अरब देशवासियों के इस सपने को पूरा करने के लिए धोनी के धुरंधरों को श्रीलंका की जिस चुनौती से निपटना है वो आसान नहीं है....इसका पता इसी से चलता है कि वर्ल्ड कप मुकाबलों में श्रीलंका से भारत 7 बार भिड़ा है, जिनमें चार बार श्रीलंका जीता है, एक मैच बारिश की वजह से धुल गया और सिर्फ दो मैचों में हमें जीत मिली है...लेकिन मुंबई में भारत के पास ये इतिहास बदलने का मौका है...धोनी अब कपिल और सौरव गांगुली के बाद तीसरे ऐसे कप्तान हो गए हैं जिन्होने अपनी कप्तानी में भारत को फाइनल तक पहुंचाया...2 अप्रैल को टीम इंडिया जीतती है तो धोनी 28 साल बाद कपिल के करिश्मे को दोहराने वाले भारत के दूसरे कप्तान बन जाएंगे......साथ ही सचिन की सबसे बड़ी ख्वाहिश भी पूरी हो जाएगी...

बस अब भारत को 2003 के फाइनल वाली गलती नहीं दोहरानी है...उस फाइनल में ऑस्ट्रेलिया के रिकी पोन्टिंग ने 140 रन की पारी खेलकर जीत को भारत की पहुंच से बाहर कर दिया था...इसलिए अब भारत को खास तौर पर श्रीलंका के ओपनर्स थरंगा और दिलशान को जल्दी आउट करने की रणनीति बनानी होगी...इंग्लैंड के खिलाफ क्वार्टर फाइनल में इन दोनों ओपनर्स ने नाबाद रहकर श्रीलंका को दस विकेट से जीत दिला दी थी...फिर सेमीफाइनल में भी न्यूजीलैंड के खिलाफ़ जीत में
थरंगा और दिलशान ने शानदार स्टार्ट दिया...इसके अलावा भारत को श्रीलंका के बोलिंग डिपार्टमेंट में मलिंगा को खेलने में खास सावधानी बरतनी पड़ेगी...

धोनी की सेना को याद रखना चाहिए जिस तरह का विनिंग टीम फार्मेशन इस वक्त भारत के पास है, ऐसा फार्मेशन हर वक्त मौजूद नहीं रह सकता...इस वर्ल्ड कप में चूके तो फिर ऐसा फॉर्मेशन अगले वर्ल्ड कप मे मिले या न मिले, भरोसा नहीं है...इसलिए इस बार मौका चूकना नहीं है...बस टीम इंडिया का हर खिलाड़ी याद रखे और वैसा ही खेल दिखाए जैसा कि आज मोहाली में दिखाया...वर्ल्ड कप की मंजिल बस अब एक हाथ दूर है...लंका को जीतना है...फिर देश में वैसी ही खुशियां मनना तय है जैसे कि भगवान राम के लंका जीतने की खुशी में दशहरे-दीवाली पर हर साल मनाई जाती है....अब बस गाना गाइए...हटो, हटो, ए श्रीलंका वालों, वर्ल्ड कप हमारा है...

बुधवार, 30 मार्च 2011

मोहाली जंग नहीं मौका है, मेरा राम तो तेरा मौला है...खुशदीप

मेरा राम तो तेरा मौला है,
एइयो ते बस इक रौला है...

वाकई हर तरफ मोहाली का ही रौला (शोर) है...मैं दिल से चाहता हूं कि मोहाली में आज भारत की जय हो...लेकिन मैं ये भी चाहता हूं कि खेल भावना की किसी सूरत में हार न हो...जब से तय हुआ है कि सेमीफाइनल में भारत का मुकाबला पाकिस्तान से होगा, सरहद के दोनों ओर हर किसी पर एक जुनून सा सवार हो गया है....क्या मंत्री और क्या संतरी, क्या आम और क्या ख़ास, दोनों देशों के मिलाकर डेढ़ अरब लोग सांस रोक कर मोहाली के नतीजे का इंतज़ार कर रहे हैं...हर ज़रूरी काम को मैच के लिए पीछे धकेल दिया है...मोहाली में क्रिकेट की पिच तो पहले से ही है, कूटनीति का कारपेट और बिछा दिया गया है...

तय है इतने हाइप, इतने प्रैशर के बावजूद भारत का हर खिलाड़ी फाइनल के लिए भारत का टिकट कटवाने को अपना सब कुछ भिड़ाएगा...लेकिन क्रिकेट तो क्रिकेट है...कुछ भी हो सकता है...ऐसे में बेहतर यही है कि हम जोश दिखाने के साथ होश न गंवाएं...अगर जीत गए तो जश्न ज़रूर मनाएं लेकिन शालीनता के साथ...कोई उकसावे वाला काम न करें...और अगर नतीजा ख़िलाफ़ गया तो भी अपने पर काबू रखे...गुस्से का इज़हार करते हुए अपने खिलाड़ियों को ही निशाना न बनाने लगें...याद रहे कि सेमीफाइनल तक भी यही खिलाड़ी भारत को लाए...एक दिन खराब हो जाने से उनके पिछले सारे अच्छे प्रदर्शन को एक झटके में ही न भुला दें...

खेल भावना यही कहती है कि खेल को खेल की तरह ही लें, जंग की तरह नहीं...जो भी टीम, जो भी खिलाड़ी बढ़िया खेलें, उनकी तारीफ़़ करें...यहां ये भी याद रखा जाए कि हम सेमीफाइनल में पाकिस्तान के लिए मेज़बानी कर रहे हैं...इसलिए मेज़बान का क्या धर्म होता है, ये दुनिया में भारतीयों से अच्छी तरह कौन जानता है...

हर दिल से हमारा नाता है,
कुछ और न आता हो हमको,
हमें प्यार निभाना आता है...


आज बस यही दुआ की जाए कि बढ़िया क्रिकेट के साथ बढ़िया कूटनीति देखने को मिले...सरहद के इस पार या उस पार दोनों तरफ़ के लोगों के बीच की दूरियां घटें...पंजाब की मिट्टी से जो आज खुशबू उड़े वो सारी तल्खियां दूर कर दें...सुनाई दें तो बस दोस्ती के तराने, मस्ती के टप्पे और  बुल्लेशाह के बोल- बुल्ला कि जाणा मैं कौण...


लीजिए पहले सुनिए गुलज़ार साहब के पैग़ाम को....




और अब जगाइए अमन की आशा...

मंगलवार, 29 मार्च 2011

कितना बदल गया इनसान...खुशदीप




देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान,
कितना बदल गया इनसान, कितना बदल गया इनसान...


 दशकों पहले कवि प्रदीप का लिखा ये गीत आज के माहौल में भी कितना फिट बैठता है...फिर कौन कहता है कि हमने तरक्की की है...जात-पात देश में खत्म हुई या और बढ़ गई है...अब तो हर जात, हर समूह अपने लिए रिज़र्वेशन मांगने लगा है...मज़हब के नाम पर पहले भी तलवारें खिंच जाती थीं, अब भी फ़साद हो जाते हैं...हां अगर कुछ बदली है तो वो है आदमी की पैसे और रिश्तों को लेकर सोच...कैसे भला...हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा से सुनी एक कहानी के ज़रिए बताता हूं...

लेकिन पहले अपनी पिछली पोस्ट पर हिंदी ब्लॉगर के नाम से आई एक टिप्पणी का ज़िक्र करना चाहता हूं...ये पोस्ट मैंने भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हज़ारे की मुहिम और उससे जुड़े नुक्कड़ नाटक- भ्रष्टाचार पर लिखी थी...टिप्पणी में कहा गया था...इसकी सफलता से व्‍यंग्‍य लेखकों को तो इससे बहुत बड़ा नुकसान होने वाला है...शायद टिप्पणीकार भाई का आशय यही था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम सफ़ल हो गई व्यंग्य लिखने वालों का क्या होगा...टिप्पणीकार जी अगर आप चार्ली चैपलिन के काम को बारीकी से देखें तो ये वो शख्स था जो खुद ट्रेजिडी बन कर लोगों को हंसाता था...सबको हंसाने वाले जोकर के अंदर कितना दर्द छुपा होता है, कितना अंर्तद्वन्द्व हर वक्त चलता रहता है, ये वो कभी बाहर नहीं आने देता...क्योंकि वो खुद तमाशा बनकर अपने हर दर्शक के चेहरे पर मुस्कान देखना चाहता है...

अरे ये रौ में मैं क्या लिखने लग गया...हां तो मुझे सुरेंद्र शर्मा जी से सुनी एक कहानी आप को बतानी थी...पैसों और रिश्तों को लेकर इनसान की बदली सोच पर...लीजिए पेश है-

पहला ज़माना-
एक शख्स अपने किशोर बेटे के साथ पहाड़ी पर चढ़ रहा था...पिता के हाथ में भारी-भरकम पोटली थी...और किशोर ने अपने छोटे भाई को गोद में उठा रखा था...आधे रास्ते में पहुंच कर पिता थक गया...पोटली एक तरफ़ रखकर सुस्ताने लगा...फिर किशोर बेटे से कहा...तू भी बोझ उठाए-उठाए थक गया होगा, छोटे भाई को ज़मीन पर छोड़ कर कुछ देर के लिए सुस्ता ले...इस पर किशोर ने जवाब दिया...ये बोझ नहीं है, ये मेरा छोटा भाई है...ढलान से फिसल गया तो...ये ख़तरा मैं कभी नहीं लूंगा...इसे गोद में ही उठाए रखूंगा...


आज का ज़माना-
एक शख्स और किशोर ने उसी तरह पहाड़ी पर चढ़ना शुरू किया...पिता के हाथ में भारी पोटली और किशोर की गोद में छोटा भाई...किशोर ने देखा कि भाई ऊंचाई तक जाने में बाधा बन रहा है, उसने भाई को वहीं पटका और रेस लगाकर पहाड़ी पर चढ़ गया...उसने पहाड़ी के ऊपर से ही पिता को आवाज़ दी...ये जो भारी पोटली उठा रखी है, उसे वहीं छोड़ कर तेज़ी से ऊपर आ जाओ...इस पर पिता ने कहा...इस पोटली को कैसे छोड़ दूं...इसमें ठूंस-ठूंस कर नोट जो भरे हैं...


मॉरल ऑफ द स्टोरी-
पुराने ज़माने में रिश्ते प्यार करने के लिए होते थे और चीज़ें इस्तेमाल करने के लिए...आज के ज़माने में ये बस उलटा हो गया है...

रविवार, 27 मार्च 2011

आज तक नहीं कहा, आज कहता हूं इसे ज़रूर पढ़ें...खुशदीप


वक्त आने पे बता देंगे तुझे ऐ आसमां,
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है....


सरफ़रोशी की तमन्ना वाली भगत सिंह के दौर की ये पंक्तियां शिद्दत के साथ आज मेरे दिमाग में गूंज रही है...दरअसल मुझे आज एक नुक्कड़ नाटक देखने का सौभाग्य मिला...अरविंद गौड़ जी के निर्देशन में अस्मिता थिएटर ग्रुप की प्रस्तुति- भ्रष्टाचार...इस नाटक में नौजवान खून के जोश को देखकर मेरे मन में युवा पीढ़ी को लेकर जो भी भ्रम थे, सभी एक झटके में मिट गए...और फिर याद आया कि इकबाल ने कभी हिन्दुस्तान के लिए क्यों ये कहा था-

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़मां हमारा...


वाकई कुछ तो खास है इस मिट्टी में...इसकी तासीर में...कम से कम युवा पीढ़ी के जोश को देखकर तो मुझे यही लगता है...हम भले कहते रहें कि देश का सारा सिस्टम सड़ चुका है...भ्रष्टाचार इसे निगल चुका है...टॉप टू बॉटम और बॉटम टू टॉप...लेकिन हम ये नहीं सोचते कि ऐसी स्थिति देश में बनी क्यों...क्या इसके लिए हम खुद भी ज़िम्मेदार नहीं...हम वोट देते हैं और फिर पांच साल सरकार को अपना नसीब मानकर होंठ सी लेते हैं, कभी प्रतिकार नहीं करते...भ्रष्टाचारी देश को बेचकर खा जाएं लेकिन हमें क्या...हमारे शहर में कुछ भी हो जाए हमें क्या...हमारे मोहल्ले में भी कुछ गलत हो, कोई लुट रहा हो तो हमें क्या...हां हम तब ज़रूर चीखेंगे जब हमारे घर में कोई घुस आएगा...लेकिन अगर सभी इस सोच पर चलते रहे तो याद रखिए कि फिर आपकी तरह आपकी चीख सुनकर भी कोई आपको बचाने नहीं आएगा...क्योंकि सिर्फ अपनी अपनी निपेड़ते रहने में सब का ख़ून कोई ख़ून थोड़े ही रहा होगा, पानी बन चुका होगा...

भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाते इस नुक्कड़ नाटक में ऐसा ही पैगाम था भारत के हर नागरिक के नाम...नुक्कड़ नाटक करने वाली युवा-शक्ति का जोश देखते ही बनता था...न कोई माइक, न किसी साज का साथ...बस हाथों की ज़ोरदार तालियों के साथ उछलते लड़के-लड़कियां...गले की पूरी ताकत के साथ संवादों की अदायगी...सटीक और पिन-पाइंट...सेंट्रल किरदार करने वाली शिल्पी मारवाह का खास तौर पर मैं नाम लेना चाहूंगा...नुक्कड़ नाटक को जीवंत बनाने के लिए उसने जो कुछ भी किया, उसके लिए मैं बस उसे सैल्यूट ही कर सकता हूं...

 
अन्ना हज़ारे


इस नाटक का उद्देश्य जन-जन में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जागरूकता लाना तो था ही...साथ ही ये बताना भी था कि अगली 5 अप्रैल सुबह 10 बजे से देश के प्रसिद्ध समाज-सेवी अन्ना हज़ारे दिल्ली के जंतर-मंतर पर आमरण अनशन शुरू करने जा रहे हैं...वही अन्ना हज़ारे जिन्होंने 1965 के युद्ध में अपनी यूनिट के सारे सिपाही शहीद होने के बाद अपनी नई ज़िंदगी समाज के नाम कर दी....शादी नहीं की...संपत्ति के नाम पर पर बस कपड़ों की कुछ जोड़ियां हैं...न कोई बैंक बैलेस...एक मंदिर में रहते हैं...अन्ना हज़ारे ने सरकार को अल्टीमेटम दिया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोक-पाल की तर्ज़ पर सख्त बिल पास किया जाए...जिसमें भ्रष्टाचारियों को जल्द और सख्त सज़ा देने का प्रावधान हो....करो या मरो के उद्घघोष के साथ अन्ना ने सरकार पर दबाव बनाने के लिए आमरण अनशन का रास्ता चुना है...ऐसे में हर ईमानदार, देशभक्त और सच्ची सोच वाले इनसान का फर्ज बनता है कि वो अन्ना की इस मुहिम को अपना समर्थन दे...

आज़ादी की दूसरी लड़ाई की अन्ना की मुहिम और भ्रष्टाचारियों के मन में डर बैठाने के लिए जन लोकपाल बिल के बारे में ज्यादा जानने के लिए आपको बस 02261550789 नंबर पर मिसकॉल करना है...इस संबंध में ब्लॉग परिवार के अहम सदस्य जय कुमार झा जी (09810752301) से भी संपर्क किया जा सकता है...

शनिवार, 26 मार्च 2011

न बोसॉन न फर्मिऑन, हम बस छिछोरिऑन...खुशदीप


आज प्रवीण पांडेय ने बड़ी शानदार पोस्ट लिखी...बोसॉन या फर्मिऑन...भौतिकी जैसे जटिल और गूढ़ विषय को भी आधार बना कर मानव व्यवहार की रोचक व्याख्या प्रवीण की अद्भुत लेखनी का कमाल है...

लेकिन दुनिया सिर्फ पढ़े लिखे लोगों के लिए ही नहीं है भाई...हम जैसे ढपोरशंख भी यहां बसते हैं...हम न बोसॉन है न फर्मिऑन...हम तो हैं बस छिछोरिऑन...अब इसे ज़्यादा अच्छी तरह समझाने के लिए मुझे अपनी एक पिछली पोस्ट रीठेल करनी पड़ रही है....



छिछोरेपन का 'न्यूटन' लॉ...

आप अगर साइंस या फिजिक्स के छात्र रहे हैं तो न्यूटन द ग्रेट के बारे में ज़रूर जानते होंगे...वहीं जनाब जिन्होंने गति (मोशन) के नियम बनाए थे...लेकिन ये बात फिजिक्स पढ़ने वाले छात्रों की है...कुछ हमारे जैसे छात्र भी होते थे जो क्लास में बैठना शान के खिलाफ समझते थे...गलती से कभी-कभार खुद ही पढ़ लेते थे तो पता चलता था कि प्रोटॉन हो या न्यूट्रान या फिर इलैक्ट्रॉन सब का एटम (परमाणु) में स्थान निर्धारित होता है...प्रोटॉन और न्यूट्रान तो न्यूक्लियस में ही विराजते हैं...इलैक्ट्रॉन बाहर कक्षाओं में स्पाईडरमैन की तरह टंगे रहते हैं...लेकिन कुछ हमारे जैसे फ्री इलैक्ट्रॉन भी होते हैं जो न तो न्यूक्लियस में बंधे रहना पसंद करते थे और न ही किसी कक्षा में लटकना...सौंदर्यबोध को प्राप्त करने के लिए कॉलेज के बाहर ही सदैव चलायमान रहते थे...

इलेक्ट्रोन का चुम्बकीय क्षेत्र बहुत गतिशील फोटोन को अपनी ओर आकर्षित करता है, प्रेम करता है... जब भी कोई विद्युत आवेश गतिशील होता है तो एक चुम्बकीय क्षेत्र बनता है...गतिशील फोटोन का भी चुम्बकीय क्षेत्र होता है... जब इलेक्ट्रान और फोटोन दोनों के चुम्बकीय क्षेत्र समान आवृत्ति पर गुंजन करते हैं तो तो गूटर-गूं, गूटर-गूं होना निश्चित है...

अब पास ही गर्ल्स डिग्री कॉलेज में इतराते-बल खाते फोटोनों (या फोटोनियों) का गुरुत्वाकर्षण चुंबक की तरह हमें खींचे रखता तो हम क्या करते...ये तो उन बुजुर्गों का कसूर था जिन्होंने दोनों डिग्री कालेजों को साथ ही बसा दिया था...बस बीच में लक्ष्मण रेखा की तरह एक दीवार बना दी...अब आग और घी इतना साथ रहेंगे तो कयामत तो आएगी ही...अरे ये क्या मैं तो पिछले जन्म के क्या इसी जन्म के राज़ खोलने लगा...भाई पत्नीश्री भी कभी-कभार हमारे ब्लॉग को पढ़ लेती है... मुझे घर में रहने देना है या नहीं...

खैर छोडि़ए इसे अब आता हूं न्यूटन जी का नाम लेकर कॉलेज में बनाए हुए हमारे छिछोरेपन के नियम से...


"हर छिछोरा तब तक छिछोरापन करता रहता है...जब तक कि सुंदर बाला की तरफ़ से 9.8 मीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से नुकीली हील वाला सैंडल उसकी तरफ नहीं आता...ये फोर्स (बल) बेइज्ज़ती कहलाता है...और ये बल शर्मिंदगी के समानुपाती (डायरेक्टली प्रपोशनल) होता है...अगर छिछोरापन फिर भी कायम (कॉन्स्टेंट) रहता है तो बेइज्ज़ती की ये प्रक्रिया अनंत ( इंफिंटी) को प्राप्त होते हुए अजर-अमर हो जाती है..."


और इस तरह हम भी अमरत्व को प्राप्त हुए...



क्रिकेट देश के लिए अफ़ीम है लेकिन...खुशदीप





ले देकर,पाकिस्तान को हराने का सुख (वो भी खेल के मैदान में) ही तो बचा है हम बेचारे भारतीयों के जीवन में।

फिर लगे हाथों "राष्ट्रीय भावना" को भी श्रद्धांजलि मिल जाएगी...

मोहाली में हम भी चाटेंगे यह अफीम !


सम्वेदना के स्वर की ये टिप्पणी कल मेरी पोस्ट पर मिली...देश के ज्वलंत और सामाजिक मुद्दों पर प्रखर सोच के लिए मैं सम्वेदना के स्वर का बड़ा सम्मान करता हूं...मैं भी मानता हूं कि...

क्रिकेट देश के लिए अफ़ीम है...

क्रिकेट मैचों के दौरान पूरा देश काम-धाम भूलकर क्रिकेट में मग्न हो जाता है...


दुनिया के अधिकतर विकसित देश क्रिकेट नहीं खेलते...


क्रिकेट सिर्फ वही देश खेलते हैं जो कभी न कभी ब्रिटेन के गुलाम रहे...


देश में क्रिकेट के अलावा दूसरे सारे खेलों की सुध लेने वाला कोई नहीं है...


बाज़ार ने क्रिकेट को तमाशा बना दिया है...


आईपीएल ने ग्लैमर को साथ जोड़कर रही सही कसर और पूरी कर दी...


लेकिन...

आखिर में ये ज़रूर पूछना चाहूंगा देश में ऐसी और कौन सी चीज़ है जो विश्व कप जैसे आयोजन के दौरान पूरे देश को एकसूत्र में जोड़ देती है...सब ये भूल कर कि वो कौन से प्रांत के हैं, कौन सी भाषा बोलते हैं, कौन सी पार्टी के हैं,  एकसुर से प्रार्थना करते हैं- विश्व कप पर बस भारत का ही नाम लिखा जाए...भारत के हर चौक्के-छक्के पर पूरा देश एकसाथ उछलता है...भारत का हर विकेट गिरने पर एक साथ सब आह भरते है...अपनी टीम की जीत पर पूरे देश में होली-दीवाली बनती है...हार पर पूरा देश गम और गुस्से का इज़हार करता है...क्रिकेट के साथ फिल्मों को देश का सबसे बड़ा पास-टाइम माना जाता है...लेकिन फिल्मों पर भी हिंदी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम,बांग्ला, मराठी, पंजाबी, उड़िया, भोजपुरी की मुहर लगी रहती है...इसलिए वहां भी प्रांतवाद या भाषावाद किसी न किसी रूप में आड़े आ जाता है और समूचे देश को एक नज़र से नहीं देख पाता...लेकिन क्रिकेट ऐसी सभी सीमाओं को मिटा देता है...बस ये याद रह जाता है...हम सब भारतीय हैं और भारत को विश्व विजयी बनते देखना है....उस खुशी, उस रोमांच, उस गौरव को फिर से जीना है जो कपिल के जांबाज़ों ने 1983 में विश्व कप जीत कर पूरे देश को महसूस कराया था...

(यहां मैं एक बात और स्पष्ट कर दूं कि मैं आईपीएल के तमाशे को क्रिकेट नहीं मानता...मैं सिर्फ उसी क्रिकेट की बात कर रहा हूं जब एक टीम के रूप में भारत मैदान में उतरता है...सारे खिलाड़ी तिरंगे की शान के लिए अपना सब कुछ झोंकने के लिए तैयार रहते हैं...तिरंगे से जुड़ी इस भावना का कोई आईपीएल अरबों-खरबों रुपये लगाकर भी मुकाबला नहीं कर सकता...)

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

पॉन्टिंग पिटे, अब आफ़रीदी की बारी है...खुशदीप




आठ साल एक दिन बाद पॉन्टिंग का गुरूर चकनाचूर करने का भारत को मौका मिला...चार बार के वर्ल्ड कप चैंपियन कंगारुओं को धोनी के धुरंधरों ने क्वार्टर फाइनल में पीट कर घर वापसी का टिकट थमा दिया...अब याद कीजिए 23 मार्च 2003 को साउथ अफ्रीका के जोहांसबर्ग में खेला गया आठवें विश्व कप का फाइनल...आस्ट्रेलिया ने पहले खेल कर सिर्फ दो विकेट के नुकसान पर 359 का पहाड़ खड़ा कर दिया...पॉन्टिंग ने उस मैच में 138 गेंदों पर 140 रन जड़े थे...कंगारुओं के स्कोर के नीचे भारत ऐसा दबा कि उठ ही नहीं पाया...सचिन तेंदुलकर को भारत की पारी के शुरू होते ही मैक्ग्रा ने सिर्फ चार रन पर चलता कर दिया...भारत का उस मैच में 234 रन पर ही पुलिंदा बंध गया और 125 रन से हार मिली...याद रहे कि 1983 में वर्ल्ड कप की जीत के बाद भारत सिर्फ एक बार 2003 में ही फाइनल में पहुंचा था...वर्ल्ड कप जीतने के सारे अरमान धरे के धरे रह गए...आस्ट्रेलिया से मिली उस करारी हार का सूद सहित अब भारत ने जवाब देकर सवा अरब भारतवासियों को जो खुशी दी है उसे बयां नहीं किया जा सकता...



पॉन्टिंग ने इस बार भी अहमदाबाद में सेंचुरी जड़ी, लेकिन फिर भी भारत को कंगारुओं का मान-मर्दन करने से नहीं रोक सके...भारत की तरफ से सेंचुरी बेशक किसी ने नहीं बनाई लेकिन सचिन, गंभीर, विराट, रैना सभी ने बैटिंग में अपना योगदान दिया...लेकिन भारत को जीत तक पहुंचाने का श्रेय युवराज को ही जाता है...बोलर्स और फील्डर्स ने भी शानदार खेल दिखाया...पॉन्टिंग ने माइंडगेम के तहत सचिन के लिए जो कुछ भी उलटा-सीधा बोला था उसका धोनी के जांबाज़ों ने जीत से मुंहतोड़ जवाब दिया...

चलिए अब आस्ट्रेलिया की सुनामी से तो हम निपट लिए, लेकिन अब पाकिस्तान के न्यूक्लियर रेडिएशन से मोहाली में 30 मार्च को सेमीफाइनल में लोहा लेना है...हर भारतीय चाहता है कि भारत ही इस मैच में जीते...लेकिन युद्धकौशल यही कहता है कि दुश्मन को कभी कमजोर नहीं आंकना चाहिए...ये अच्छा है कि भारत की टीम बैटिंग, बोलिंग और फील्डिंग, हर जगह फार्म में आ गई है...लेकिन हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए पाकिस्तान सेमीफाइनल के सफ़र तक सिर्फ एक मैच न्यूजीलैंड से ही हारा है...ग्रुप मैच में जहां हम वेस्ट इंडीज़ से जीत में पूरी मशक्कत करते दिखे, वहीं पाकिस्तान ने वेस्ट इंडीज़ को क्वार्टर फाइनल में दस विकेट से रौंदा...आस्ट्रेलिया को हमारी तरह ही पाकिस्तान ने भी पांच विकेट से ग्रुप मैच में हराया...

दरअसल पाकिस्तान के लिए इस बार वर्ल्ड कप का  मतलब सिर्फ क्रिकेट नहीं है...पाकिस्तान जिस हालात से इस वक्त गुज़र रहा है, उसे भुलाने के लिए वो क्रिकेट की जीत का सहारा लेना चाहता है...दुनिया को बताना चाहता है कि पाकिस्तान को सिर्फ आतंकवाद, धमाकों, मैच-फिक्सर्स के लिए ही नहीं किसी अच्छी उपलब्धि के लिए भी याद किया जा सकता है...कौन जानता था कि शाहिद आफरीदी खुद फ्रंट पर रहकर पाकिस्तान के नौसीखिया खिलाड़ियों में इतना जोश भर देंगे कि पाकिस्तान के लोगों को आफरीदी में ही इमरान खान का अक्स नज़र आने लगे...आफरीदी इस वर्ल्ड कप में अब तक 21 विकेट चटका कर इमरान के 17 विकेट के रिकार्ड को पीछे छोड़ चुके हैं...अब तक किसी वर्ल्ड कप में सबसे ज़्यादा 26 विकेट चटकाने का रिकार्ड आस्ट्रेलिया के मैक्ग्रा के नाम है...
 
आफरीदी एंड कंपनी को भारत ने हराना है तो धोनी के हर धुरंधर को अपना सौ फीसदी श्रेष्ठ देना होगा...धोनी इस वर्ल्ड कप में खुद अब तक कोई बड़ी पारी नहीं खेल सके हैं...अब पाकिस्तान से सेमीफाइनल में हर भारतीय को धोनी से भी कैप्टन की पारी खेलने की आस है...हर भारतीय खिलाड़ी को समझना होगा कि मैच में एक ज़रा सी भी चूक उन्हें हीरो से ज़ीरो बनाने के लिए काफी होगी...अब तक वर्ल्ड कप के मैचों में चार बार भारत का मुकाबला पाकिस्तान से हुआ है और हर बार हमने पाकिस्तान को धोया है...इस बार पूरे देश का नारा है...28 साल बाद वर्ल्ड कप भारत वापस लाना है...बस पाकिस्तान से मुकाबले से पहले भारत को यही सोचना होगा...ये क्रिकेट नहीं जंग है...

गुरुवार, 24 मार्च 2011

वंदना जी, ये रही मेरी समझदारी...खुशदीप



कल की मेरी पोस्ट पर वंदना अवस्थी दुबे जी का कमेंट मिला-खुशदीप जी, आपकी मेल आईडी बहुत खोजी, नहीं मिली (बहुत मन था आपकी बेवकूफ़ियां पढ़ने और पढ़वाने का)...

वंदना अवस्थी दुबे
दरअसल वंदना जी ने होली के मौके पर पोस्ट के लिए बड़ा शानदार विषय चुना था...सभी ब्लॉगरों की बेवकूफ़ियां जानने का...इसके लिए वंदना जी ने पहले से ही तैयारी शुरू करके ई-मेल के ज़रिए सबकी बेवकूफ़ियां मंगवा भी ली...अगर मेरा ई-मेल वंदना जी को पता होता मेरे साथ भी ऐसा ही करतीं...लेकिन वो कहते हैं न हर बात में कुछ न कुछ अच्छाई छुपी होती है...अब मैं ठहरा मक्खन मार्का लोगों की सोहबत में रहने वाला...इसलिए जैसे और सब के लिए बेवकूफ़ी करना 'वन्स इन ए ब्लू मून' वाली बात होती है...सामान्य रूटीन में उनसे समझदारी की ही उम्मीद की जाती है...उसी तरह हमारे जैसों के लिए समझदारी भी 'रेयरेस्ट आफ रेयर' वाली बात ही होती है...

दरअसल हम औरों की तरह अपना दिमाग हर वक्त इस्तेमाल नहीं करते रहते...अब बताओ ये खर्च करते करते खत्म हो गया तो फिर किसके दर पर जाएंगे इसे मांगने...कोई आसान किस्तों पर भी नहीं देगा...इसलिए वंदना जी को मुझसे पूछना चाहिए था कि मेरी एक समझदारी कौन सी है...चलिए इस पोस्ट के आखिर में बताऊंगा अपनी समझदारी...

प्रवीण पाँडेय

लेकिन उससे पहले अपने आदर्श मक्खन के जीनियस दिमाग के बारे में बताना ज़रूरी समझता हूं...आज सुबह प्रवीण पांडेय की पोस्ट पर उन्होंने ज़िक्र किया था आफिस जाते वक्त उन्हे दो किलोमीटर का सफ़र तय करना पड़ता है और शाम को वापसी पर लौटते हुए ये सफ़र एक किलोमीटर का ही रह जाता है...पढ़ कर चकराया, ये कैसा चमत्कार है, जो घर लौटने की खुशी फ़ासले को ही आधा पाट देती है...प्रवीण पाँडेय ने वन-वे जैसा कोई फंडा इसकी वजह बताया...

ये पढ़ते ही मुझे मक्खन की याद आ गई...मक्खन एक बार अपनी नई गाड़ी से मेरठ से दिल्ली के लिए चला तो 70 किलोमीटर का सफ़र उसने महज़ दो घंटे में ही पूरा कर लिया...लेकिन वापसी में उसे 18 घंटे लग गए...अब वापस आया तो पूरी तरह कुढ़ा हुआ...आते ही बोला, मैं मारूति वालों पर केस करने जा रहा हूं...मैंने पूछा...मक्खन भाई, ऐसा क्या बुरा कर दिया मारूति वालों ने...मक्खन तपाक से बोला...बताओ, ये भी कोई बात हुई, जाने के लिए तो चार-चार गियर दे रखे हैं और वापसी के लिए एक ही रिवर्स गियर...शीशे से बाहर निकाल कर पीछे देखते रहने से मुंडी भी हथौड़े की तरह सूज गई है...वाकई मक्खन की बात में लॉजिक है...गाड़ियां बनाने वालों पर जरुर मुकदमा ठोंक देना चाहिए...वापसी के लिए भी चार गियर होने चाहिए...

अब तक वंदना जी आपको थोड़ा आइडिया तो हो ही गया होगा मेरी समझदारी का...लेकिन आपका आदेश है तो बता ही देता हूं...

डेढ़ दशक पुराना किस्सा है मेरी समझदारी का...मेरे किसी परिचित का दिल्ली के एम्स अस्पताल में आपरेशन हुआ था...वो आईसीयू में भर्ती थे...मैं उन्हें देखने पहुंचा तो किसी बड़े अस्पताल के आईसीयू में जाने का ये मेरा पहला अनुभव था...वहां हरे रंग के मास्क टाइप के कपड़े पड़े थे...मैं उनमें से एक उठा कर नाक मुंह पर बांधने लगा...फिल्मों में देख रखा था कि इन्फेक्शन से बचने-बचाने के लिए डॉक्टर और नर्स मुंह पर कपड़ा बांधे रखते हैं...लेकिन ये क्या वो कपड़ा किसी तरह मेरे मुंह पर फिट ही नहीं हो रहा था...वहां लॉबी में खड़ा-खड़ा मैं कपड़े से जूझ रहा था कि तभी एक नर्स वहां आई और मुझे देखकर मुस्कुराने लगी...मैंने सोचा अजीब नर्स है...आईसीयू में भी हंस रही है...लेकिन उस नर्स ने कुछ कहा नहीं...उसने रैक से एक और हरा कपड़ा उठाया और इशारा करके दिखाया कि इसे पैर में पहना जाता है...अब उसके बाद मेरे ऊपर क्या बीती होगी, इसका आप अंदाज़ लगा सकते हैं...यही सोच रहा था कि कहां मुंह छिपाऊं...अब ये मेरी समझदारी नहीं तो और क्या थी कि फुट-कवर को ही मास्क समझ बैठा था...

बुधवार, 23 मार्च 2011

93 साल पहले खींची गई बेजोड़ फोटो...खुशदीप



ई-मेल से एक फोटो मुझे मिली...देखी तो मैं हैरान रह गया...ई-मेल में दी गई जानकारी के मुताबिक ये फोटो 1918 में खींची गई थी...इस अद्भुत फोटो को हाल ही में किसी ने लाइन पर डाला है...ये फोटो अमेरिका के आयोवा प्रांत के कैम्प डॉज में खिंची गई थी...उस वक्त वहां युद्ध के लिए ट्रेनिंग दी जा रही थी...स्टैच्यू आफ लिबर्टी की आकृति को उभारने के लिए 18,000 लोगों का एक-साथ फोटो में इस्तेमाल किया गया...अगर ये फोटो कम्प्यूटर से छेड़छाड़ कर नहीं गढ़ी गई है तो वाकई 93 साल पहले जिसने भी इसकी कल्पना की, और जिसने ये फोटो खींची, वो वाकई कमाल के लोग होंगे...अब कोई फोटोग्राफी का जानकार ही बता सकता है कि ये फोटो असली है या नहीं...फोटो पर दो बार क्लिक कर बड़ा करके देखने से ही इसकी खासियत पता चलेगी...





मंगलवार, 22 मार्च 2011

मां के दूध का भी धंधा...खुशदीप




शुक्रवार पत्रिका के संपादकीय में एक अनोखी जानकारी पढ़ने को मिली...नेट पर रिसर्च की तो इस बारे में और भी बहुत कुछ जानने को मिला...लंदन के कोवेंट गार्डन रेस्तरां (आइसक्रीमिस्ट शॉप) में आजकल बिक रही एक आइसक्रीम बेहद चर्चा में है...आइसक्रीम का नाम है बेबी-गागा...आइसक्रीम तो पूरी दुनिया में बिकती है, फिर इसमें खास बात क्या है...खास बात है हुजूर...ये आइसक्रीम मां के दूध की बनी हुई है...जी हां मां के खालिस दूध की...चौंक गए न आप ये पढ़ कर...मार्टिनी गिलास में सर्व की जाने वाली इस आइसक्रीम के एक स्कूप की कीमत 14 पाउंड (साढे 22 डॉलर या 1022 रुपये) है...ज़ाहिर है अमीर ही इस शौक को पूरा कर सकते हैं...रेस्तरां मालिक मैट-ओ-कोनोर का दावा है कि पिछले 100 साल में आइसक्रीम के साथ ऐसा अभिनव और शानदार प्रयोग कभी नहीं किया गया...

रेस्तरां ने बाकायदा आनलाइन फोरम मम्सनेट पर एड निकाल कर नवजात बच्चों को दूध पिलाने वाली माओं से दूध बेचने की पेशकश की...करीब 15 माएं अपना दूध बेचने के लिए तैयार हो गईं...जिन महिलाओं ने दूध बेचा, उनमें से ही एक विक्टोरिया हिले का कहना है कि वो पहले भी ऐसी मांओं को अपना दूध देती रही हैं, जिन्हें दूध नहीं उतरता...हिले खुश हैं...उनका तर्क है कि वयस्क लोगों को भी अब ये पता चलेगा कि मां का दूध कितना स्वादिष्ट होता है...ऐसे में वो माएं भी अपने बच्चों को दूध पिलाने के लिए प्रेरित होंगी जो अभी तक इससे परहेज़ करती रही हैं...फिर मंदी के दौर में कुछ कमाई भी हो जाए तो क्या बुरा है...



फरवरी के आखिर में ये आइसक्रीम बिकनी शुरू हुई तो लंदन के स्थानीय प्रशासन ने हानिकारक बैक्टीरिया के प्रसार से बीमारी फैलने के डर से आइसक्रीम का सारा स्टॉक जब्त कर लिया...लेकिन एक बार जांच में आइसक्रीम को क्लीयरेंस मिलने के बाद इसकी बिक्री दोबारा शुरू हो गई है...ज़ाहिर है मां के दूध को इस तरह धंधे की चीज़ बनाने के विरोध में कुछ संगठन आवाज़ भी उठा रहे होंगे...लेकिन आइसक्रीम फिर भी बिकती रहती है और धंधा चल निकलता है तो मुनाफ़े के चक्कर में दूसरे कारोबारी भी बहती गंगा में हाथ धोना पसंद करेंगे...

ब्रिटेन ही नहीं ये धंधा दूसरे देशों में भी पैर पसारेगा...अगर बडे़ पैमाने पर ऐसी आइसक्रीम का उत्पादन होने लगे और मान लीजिए यही धंधेबाज़ भारत जैसे देश में भी एड देकर माओं से आइसक्रीम के लिए दूध बेचने की लुभावनी पेशकश करना शुरू कर दें तो...इस देश में सरोगेट मदर (किराए की कोख) की सेवाएं लेने के लिए विदेश से आने वाले निसंतान लोगों की तादाद पहले से ही बढ़ती जा रही है... जिस देश में दो वक्त की रोटी का जुगाड़ भी गरीब मुश्किल से कर पाते हों, वहां क्या गारंटी कि पैसे के लालच में कुछ माएं अपना दूध बेचने के लिए तैयार न हो जाएं...

ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़े के चक्कर में प्रोफेशनल दिमाग क्या-क्या प्रयोग नहीं कर डालते...मां के दूध का धंधा करने से भी इन्हें गुरेज़ नहीं...लेकिन मां के दूध का कर्ज चुकाने की कहावत तो सिर्फ भारत में ही चलती है...ये भारत में ही कहा जाता है...मां का दूध पिया है तो सामने आ...अब ऐसी बातों का मतलब मां के दूध की आइसक्रीम बनाने वाले क्या जाने...उनके लिए तो हर चीज़ बिकाऊ है...बस जेब मुनाफ़े से भरती रहनी चाहिए... इस खबर पर लंदन में रहने वालीं शिखा वार्ष्णेय जी से आग्रह है कि वो इस पर सही वस्तुस्थिति से ब्लोगवुड को अवगत कराएं...

रविवार, 20 मार्च 2011

ब्लॉगरों का सबसे बड़ा पोल खोल...खुशदीप




डेली ब्लॉग टाइम्स ने जान पर खेल कर बिलीचीक्स से हिंदी ब्लॉगरों के सीक्रेट हासिल किए हैं...ब्लॉग केबल नंबर 420-420 के तहत हासिल किए गए इन केबल्स से ब्लॉगवुड के ऐसे ऐसे राज़ हम खोलने जा रहे हैं कि आप दांतों तले उंगली दबा लेंगे...इसके ज़रिए कई दिग्गज ब्लॉगर होने जा रहे हैं बेनकाब...मसलन आप अभी तक डी कंपनी के नाम से किसे जानते रहे हैं-दाऊद इब्राहिम...जी नहीं डी कंपनी का संचालक अब भी दुबई में ही बैठा है और धडल्ले से अपना धंधा चला रहा है...दुबई में रहने वाले इस ब्लॉगर का नाम भी डी से ही शुरू होता है...आपने अंदाज़ लगा ही लिया होगा...ये शख्स कौन है...नहीं तो आज इस शख्स का नाम इस पोस्ट की टिप्पणियों में आ ही जाएगा...

आप जानते ही हैं डी कंपनी का जानी दुश्मन छोटा साजन है...ये छोटा साजन आज भी बैंकाक से ही अपना काम चला रहा है, लेकिन इसने अपना भेस बदल दिया है...इंटरपोल को चकमा देने के लिए इसने महिला का रूप धारण कर रखा है...बैंकाक निवासी इस ब्लॉगर के नाम के साथ डॉक्टर भी जुड़ा है...ऐसे शातिर ब्लॉगरों के चेहरे बदलने का काम दिल्ली में बैठा एक टिम्बर मर्चेंट कर रहा है...शक्ल से भोले-भाले दिखने वाले इस शख्स की पत्नी भी इसके कारनामों में बढ़-चढ़ कर साथ देती है...इस ब्लॉगरी गिरोह के तार पूरी दुनिया में फैले हुए हैं और ये तेज़ी के साथ कई देशों में अपने पैर पसारते जा रहे हैं...

इनके हिसाब-किताब का ज़िम्मा कनाडा में रहने वाले चार्टेड एकाउंटेंट ने उठा रखा है...ये चार्टेड एकाउंटेट विल्स सिगरेट के खाली पैकेटों पर ही कविताओं के ज़रिए कंपनी का लेखा-जोखा रखने में माहिर है..ये शख्स वैसे भी कल ही रियल दादा बना है... कनाडा में ही रहने वाली एक लेडी डॉन कंपनी की कारगुज़ारियों को शॉर्ट फिल्मों के ज़रिए शूट करती रहती है ताकि कल कोई ब्लॉगुर्गा अपनी ज़िम्मेदारी से मुकर न सके...ब्लॉगरों की डी कंपनी खुल्लमखुल्ला तौर पर ये सब गोरखधंधा चलाती है...

इस कंपनी का बड़ा फाइनेंसर जर्मनी में मौजूद है..इस फाइनेंसर ने पिछले साल के आखिर में रोहतक के तिलयार में बड़ा जमावड़ा कराया था...वहां एक कवि महोदय, शार्पशूटर और कंपनी के इंजीनियरिंग ठेकेदार की लाल परी के साथ एक तस्वीर के मीडिया में आ जाने से बड़ा रचनात्मक बखेड़ा भी खड़ा हो गया था...इस कंपनी की हिम्मत देखिए ये अपनी मीटिंग्स का इंटरनेशनल प्रसारण जबलपुर में बैठे एक शख्स के ज़रिए कराती रहती है...इस कंपनी का कोई आदमी फंसता है तो कोटा के एक नामी वकील के साथ सेटिंग कर रखी है...ज़मानत वगैरहा में कुछ प्रॉब्लम हो तो दिल्ली की तीस हज़ारी कोर्ट में बैठे छा जी की सेवाएं ली जाती है...

इंटरनेट संबंधी कोई भी समस्या हो तो भिलाई में बैठा तकनीक का सरदार इनकी मदद करता है...इस कंपनी को पैसे की दिक्कत भी कभी नहीं हो सकती...क्योंकि नुक्कड़ नुक्कड घूमने वाले एक हवाला आपरेटर को इन्होंने सेट कर रखा है...इसी हवाला के पैसे के दम पर इन्होने छत्तीसगढ़ में रहने वाले एक शार्पशूटर का इंतज़ाम कर रखा है...इस शार्पशूटर को शूटिंग की ज़रूरत ही नहीं पड़ती क्योंकि शिकार इसकी बड़ी-बड़ी मूच्छों को ही देखकर बेहोश हो जाता है...हथियारों के लिए ये कंपनी कानपुर में आयुद्य फैक्ट्री में काम करने वाले एक शख्स से कॉन्टेक्ट करती है...ये शख्स फटफटिया पर मौज लेने का बड़ा शौकीन है...ये गैंग कितनी दूर की सोच कर चलता है, ये इसी से अंदाज लग सकता है कि इसने अपना ही मेडिकल पैनल बनाया हुआ है...इस पैनल की कमान दो डॉक्टरों के पास है...एक ने रायबरेली में डेरा डाला हुआ है...दूसरा डॉक्टर  राजधानी दिल्ली से आपरेशन संभाले हुए हैं...दोनों डॉक्टर मरीजों को दवा की जगह अपनी फुलझ़ड़ियों से ठीक करने में यकीन करते हैं...(अरे नहीं बाबा मुन्नाभाई एमबीबीएस वाली वो फुलझ़डी नहीं जो कहती रहती हैं- आंखों में आंखों में डाल कर देख ले...)

ब्लॉगिंग जैसे जुर्म का वायरस फैलाने वाली इस कंपनी ने मीडिया में भी पपलू सेट कर रखे हैं...मीडिया प्रकोष्ठ का मुखिया दिल्ली से सटे नोएडा में बैठा शख्स है जो स्लोग ओवरों से सभी को पकाता रहता है...ये कंपनी कितना दूर का सोचती है ये इसी से पता चल जाता है कि लखनऊ में इन्होंने एक इतिहासकार को अपाइन्ट कर रखा है...ये कंपनी के शुरू होने से इसके हर कालखंड को लिख-लिख कर कैप्स्यूल फार्म में ज़मीन में गाढ़े जा रहा है...लखनऊ में रहने वाला एक स्वयंभू हैंडसम शख्स अपने मैनपुरिया जोड़ीदार के साथ दावे करता रहता है कि हमारे रहते डी-कंपनी बिल्कुल महफूज़ है और इसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता...इन्होंने मुंबई के अमन के पैगाम गुरू से हमेशा मासूम बने रहने की ट्रेनिंग ले रखी है...डी कंपनी की हार्ड ड्रिंक्स की ज़रूरतों को दिल्ली में बैठा एक शाह अपनी कंपनी की सॉफ्ट ड्रिंक्स से ही पूरा करता रहता है...

मैंने भंग की तरंग में बिलीचीक्स से मिले सीक्रेट केबल्स के हवाले से जितने राज़ खोले जा सकते थे, खोल दिए...अब आप भी शिवजी की बूटी चढ़ा कर ऐसे ही जितनी सीक्रेट बातें आप जानते हैं, कमेंट्स के ज़रिए खोलिए...डरिए मत आपको डिप्लोमेटिक इम्युनिटी दिलाने के लिए मैंने यूएन हेडक्वार्टर से स्पेशल परमिशन ले रखी है...

(होली स्पेशल)

शनिवार, 19 मार्च 2011

समीर जी बने रियल दादा...खुशदीप


अभी-अभी समीर जी का ये ई-मेल पढ़कर होली की खुशी दुगनी हो गई...

Shri Shri Thakur Radha Swamy Anukoolji maharaj Sada Sahai!!

Dear All,
It is our great pleasure to announce that by the grace of Shri Shri Thankurji Anupam and Pragati are blessed with a baby boy today March 18, 2011 at 5:57 PM in York, UK.
Both Pragati and Baby are healthy and doing very well.
We will soon forward you the pictures.

Best regards,
Dadi and Dadu :
(Sadhna and Sameer)
Choti Mummy and Chote Papa
( Priyanka and Anubhav)

समीर जी के घर में लिटिल बंडल आफ जॉय आने से पूरे ब्लॉगवुड की होली की खुशी दुगनी हो गई है...समीर जी अब रियल दादा बन गए हैं...और साधना भाभी रियल दादी...पापा अनुपम, मॉम प्रगति, चाचू अनुभव और चाची प्रियंका समेत समस्त लाल परिवार को ब्लॉगवुड की ओर से बहुत बहुत बधाई...

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

जिम, रोडीज़ और विद्याभूषण...खुशदीप

 
 
हमारे देश में और कुछ हो न हो, फिल्म-टीवी का ग्लैमर युवा पीढ़ी के सिर पर चढ़ कर खूब बोलता है...जिस पर ये नशा चढ़ता है वो खुद को हमेशा ही शीशे में निहारता रहता है...जिम जाकर बॉडी वगैरहा भी बनाने लगता है...अब दिन-रात इसी काम में इतना मग्न हो जाता है कि बाकी दीन-दुनिया की ख़बर रखना मुश्किल हो जाता है...
 
कल मेरे बेटे ने मुझे यू-ट्यूब पर एक वीडियो दिखाया...इसमे एक विद्याभूषण जी आडिशन देने के लिए आए हुए हैं...वो विद्या के कितने बड़े भूषण हैं, ज़रा इस वीडियो को गौर से देखिए, आप खुद ही समझ जाएंगे...



गुरुवार, 17 मार्च 2011

समीर जी की कूउउउउउउ, इरफ़ान के कार्टून, बोलो सारा..रा...खुशदीप

होली को तीन दिन बचे है...अब तक ब्लॉग जगत पर भी होली का खुमार तारी होने लगा होगा...मैंने तो रंगों की फ्लर्टी फुहार कल ही अपनी पोस्ट पर शुरू कर दी थी...आज उसी मस्ती को आगे बढ़ाता हूं...कल की मेरी पोस्ट पर कई ब्लॉगरों ने मौन ही श्रेष्ठ का मंत्र पढ़ कर एक के पीछे एक खड़े रहना ही श्रेयस्कर समझा...मैंने ही इस पर सवाल दागा था कि एक के पीछे एक करके ट्रेन तो बन गई लेकिन सबसे आगे कूउउउउउउउउउउउउउ...कौन करेगा...बी एस पाबला जी की तरफ से जवाब आया कि पहले ट्रेन की शंटिंग-शूंटिंग होने दो फिर देखेंगे...लेकिन रात तक गुरुदेव समीर लाल समीर जी ने इस समस्या का भी निवारण कर दिया...ये कह कर कि लो हम आ गए कूउउउउउउउउउउउ...करने...

चलो भई मस्ती की ट्रेन चल पड़ी तो कार्टूनों की पिचकारी लेकर अपने इरफ़ान भाई भी आ गए...शुक्रवार मैगजीन में होली पर बनाए गए इरफ़ान भाई के खास कार्टूनों की झलक सबसे पहले ब्लॉग समुदाय के लिए यहां पेश है...






 अब आ गए न सारे होली के रंग में...मैं फिर रिवर्स गेयर मार कर पहुंचता हूं पिछले रविवार को डॉ टी एस दराल के साथ सुरेंद्र शर्मा की महफ़िल में...सुरेंद्र शर्मा के मुताबिक सारे पति उनके कार्यक्रम में पत्नियों को लाना नहीं भूलते...ऐसा क्यों भला...पतियों को खुद तो पत्नियों को कुछ कहने की हिम्मत होती नहीं इसलिए वो सुरेंद्र शर्मा की फुलझड़ियों के ज़रिए पत्नियों को जी भर कर सुनाते हैं...लेकिन सुरेंद्र शर्मा ने अपनी स्थिति साफ़ करते हुए कहा कि वो अपनी पत्नी को साथ लेकर नहीं चलते...क्यों भला...क्योंकि डॉक्टर ने टेंशन से दूर रहने को कहा है...

सुरेंद्र शर्मा ने एक और टिप भी दी...जब भी काम से घर लौटो तो हमेशा थोबड़ा लटका कर घुसो...आपके चेहरे पर ज़रा सी हंसी पत्नी को बर्दाश्त नहीं होगी...फौरन सवाल होगा...किससे मिल कर आ रहे हो जो इतना चहक रहे हो...वरना घर में  तो हमेशा मुंह सूजा किए पड़े रहते हो...

डॉ दिव्या की पोस्ट के जवाब में मैंने कल पुरुषों के कोमल-मना की बात अपनी पोस्ट पर कही थी...आज उसी के विस्तार में अगली कड़ी...

एक पति महोदय रात को गहरी नींद में सो रहे थे...अचानक बड़बड़ाना शुरू कर दिया...रूबी...रूबी...ओ माई स्वीटहार्ट..रूबी कम़आन...रूबी...बकअप...पत्नी ने सुन लिया...फौरन झिंझोड़ कर उठाया कि ये क्या बड़बड़ा रहे थे...रूबी...रूबी...पति ने मौके की नज़ाकत को ताड़ लिया...बात को संभालते हुए कहा कि सपने में दोस्त मुझे रेसकोर्स ले गए थे...वहां रूबी नाम की घोड़ी पर दांव लगाया हुआ था...उसे रेस जिताने के लिए ही उसका नाम लेकर चियर अप कर रहा था...पत्नी ने ये सुनकर जो जवाब दिया उसे सुनकर पति को काटो तो खून नहीं...

पत्नी ने कहा...

....

....

...

हां तुम्हारी उसी रूबी घोड़ी का दिन में तीन बार फोन भी आया था...

पोस्ट पढ़ ली अब कूउउउउउउउउ...करके बोलो सारा...रा...

बुधवार, 16 मार्च 2011

ZEAL लो सुनो,पुरुष बड़े कोमल-मना होते हैं...खुशदीप




कल ZEAL (डॉ दिव्या) ने पोस्ट लिखी, पुरुष फ्लर्ट होते हैं--बुरा ना मानो होली है...मैंने इस पोस्ट पर टिप्पणी लिखी थी कि पुरुष इस मामले में बड़े कोमल हृदयी और महिलाएं बड़ी कठोर होती हैं...ये वादा भी किया था कि रात को अपनी पोस्ट पर इसे साबित भी करूंगा...डॉ दिव्या ने पोस्ट में ये भी लिखा था-पुरुष के प्रेम में सच्चाई का प्रतिशत कुछ कम ही होता है...थोड़ी सी बनावट...थोड़ी सी मिलावट ....बोले तो --फ्लर्ट होते हैं !!!

अब पुरुषों की जमात में शामिल होने की वजह पुरुषों को डिफेंड करना मेरा फ़र्ज़ बनता है भाई...अब सिद्ध करना है तो करना है...नाम में मेरे दीप अवश्य हो लेकिन यहां मुझे लाइट दिखाई बड़े भ्राताश्री डॉ टी एस दराल ने...न वो मुझे बीते रविवार को अपना गेस्ट बनाकर दिल्ली के सिविल सर्विसेज़ आफिसर क्लब में मशहूर कवि सुरेंद्र शर्मा को सुनने का मौका देते और न ही मुझे आज इस पोस्ट में जवाब सूझता...

बकौल सुरेंद्र शर्मा, आप इमेज़िन करिए कि कोई पुरुष किसी बस में (अपनी अपनी जेब के अनुसार इसे ट्रेन, विमान कर सकते हैं) अकेला सफ़र कर रहा है...साथ वाली सीट पर कोई अनजान महिला बैठी है...पुरुष कई दिनों के टूर से थक-हार कर लौट रहा है...ठंडी हवा के चलते ही उसे नींद के झोंके आने लगते हैं...अब बेचारे का सिर गलती से ही महिला के कंधे को टच कर जाता है...वो महिला फौरन ऐसा 440 वोल्ट का झटका देगी कि सारी नींद 1 सेकंड में काफूर हो जाएगी...ऐ मिस्टर, ज़रा होश में बैठो, होश में...अब इसके बाद मज़ाल है कि वो पुरुष बाकी पूरे सफ़र में पलक भी झपक जाए...ऐसा तन कर बैठेगा कि कमान पर चढ़ा तीर भी मात खा जाए...तो देखी जनाब, महिला की कठोरता...


अब आप कहेंगे कि इसमें पुरुष कोमल-मना कैसे हो गए...बताता हूं...बताता हूं भाई...ऐसी जल्दी भी क्या है...तो जनाब ऊपर जो मैंने बस की सीट वाला किस्सा सुनाया है...इसे अब बस उलट कर देख लीजिए...अनजान महिला नींद के झोंके में पुरुष के कंधे पर सिर रख देती है...पुरुष वहीं मैडम तुसाद के म्यूजियम का पुतला न बन जाए तो मुझे कहिएगा...लानत दीजिएगा अगर वो ज़रा सा हिल-ढुल भी जाए...बेचारे को बस यही फ़िक्र लगा रहेगा कि कहीं महिला की नींद न टूट जाए...अब इस चक्कर में अपना उतरने का स्टेशन भूल कर 100-200 किलोमीटर और सफ़र भी तय कर ले तो कोई बड़ी बात नहीं...सफ़र का क्या है वो तो रोज़ ही होता रहता है...परन्तु महिला की नींद टूटने का गुनहगार होना...न बाबा न...किसी कीमत पर वो मंज़ूर नहीं...



तो अब बताओ ZEAL... कौन कोमल-मना है और कौन कठोर...


बुरा मानो या न मानो, पर होली तो होली है...

मंगलवार, 15 मार्च 2011

झा जी को सिंगल, शाहनवाज़ को डबल बधाई...खुशदीप

कल मुझे अपने साथ-साथ अजय कुमार झा और शाहनवाज़ सिद्दीकी के तेहरान रेडियो की हिंदी सर्विस को दिए इंटरव्यू भी आपको सुनाने थे...लेकिन फिर सबकी बातें सुनने में ज़्यादा वक्त लगता...इसलिए मैंने इन्हें दो हिस्सों में तोड़ दिया...फिर इसकी खास वजह भी थी..


आज शाहनवाज़ का जन्मदिन भी है...मैंने सोचा शाहनवाज़ को तोहफ़े के तौर पर ये पोस्ट सौंपी जाए...इसलिए शाहनवाज़ का तो डबल बधाई वाला काम हो गया...









और हमारे छैल-छबीले अजय कुमार झा जी तो हैं ही एवरग्रीन..शेखर सुमन की तरह हर बीते दिन के साथ ये रिवर्स गियर मार कर और जवान होते जा रहे हैं...दिल्ली यूनिवर्सिटी के बाहर खड़े हो जाएं तो सारे छोरे जल-जल कर राख हो जाएं...

 खैर समाज को साम्प्रदायिकता जैसे नासूर से बचाकर कैसे बेहतर बनाया जाए, कैसे अमन-प्यार का अलख जगाया जाए, इस पर दोनों ने ही इंटरव्यू में सारगर्भित विचार रखे...


सुनिए शाहनवाज़ और अजय कुमार झा को उन्हीं की ज़ुबानी...



शाहनवाज़ सिद्दीकी




अजय झा



(इस इंटरव्यू में अजय भाई के साथ अनिल कुमार तामकार, कायम मेहँदी, अपेक्षा के भी विचार है )

सोमवार, 14 मार्च 2011

रेडियो तेहरान पर मेरा इंटरव्यू...खुशदीप



रेडियो तेहरान की हिंदी सेवा ने सौहार्द बढ़ाने के उद्देश्य से एक बेहतरीन श्रंखला चलाई...इसी के तहत मेरा इंटरव्यू भी लिया...इसमें मैंने यह बताने की कोशिश की-सांप्रदायिकता हो या दूसरे कोई फसाद, उनकी  मार सबसे ज्यादा गरीब तबको को ही सहनी पड़ती है, यह ऊंच-नीच का फर्क हमारे समाज  में सदियों से चला आ रहा है, जिसे सही शिक्षा कि रोशनी से ही दूर किया जा सकता है...यह भी बताया कि मेरा हिन्दू धर्म सही मायने  में मुझे क्या सिखाता है...

आप भी सुनिए यह इंटरव्यू....


 

रविवार, 13 मार्च 2011

कितने अजीब रिश्ते हैं यहां पे...खुशदीप



आज की दुनिया को समझना, आज के रिश्तों को समझना...बड़ा मुश्किल है...खास कर हम जैसों के लिए जिन्होंने छोटे शहरों से आकर महानगर को ठिकाना बनाया है...बेसिकली हमारा ढांचा ऐसा बना है जो संयुक्त परिवार में पला-बढ़ा...बचपन मोहल्लों के ऐसे परिवेश में गुज़रा जहां के बुज़ुर्ग सभी बच्चों को अपना ही समझते थे, नज़र रखते थे...बच्चे भी उनके सामने हमेशा नज़रें नीची रखकर ही बात करते थे...

लेकिन महानगर में आकर सब बदल गया है...किसी को किसी से मतलब नहीं...ये भी नहीं पता कि पड़ोस में कौन रहता है...बच्चे भी अब पहले से कहीं ज़्यादा स्मार्ट हो गए हैं...अच्छी बात है...अपना भला बुरा समझते हैं...लेकिन दिक्कत यह है कि उन्हें be  practical का पाठ हम ही घरों पर सिखाते हैं..नैतिकता या इन्सान बनने की बात उन्हें कोई नहीं सिखाता...nuclear family होने की वजह से घर में बुज़ुर्ग भी नहीं हैं उन्हें कुछ समझाने वाले...ऐसे में हम किस मुंह से दोष देते हैं कि देश में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है...पैसा-पॉवर  ही सब कुछ माना जाने लगा है...इन हालत में रिश्तों के मायने ही क्या रह जाते हैं..

फिल्म पेज 3 में नए ज़माने के इन हालत पर ही अजय झिन्झार्न और संजय नाथ ने क्या खूब लिखा है,,, 


कितने अजीब रिश्ते हैं यहां पे,
दो पल मिलते हैं, साथ-साथ चलते हैं,
जब मोड़ आए तो बच के निकलते हैं,
कितने अजीब रिश्ते हैं यहां पे...


यहां सभी अपनी ही धुन में दीवाने हैं,
करे वही जो अपना दिल ही माने हैं
कौन किसको पूछे कौन किसको बोले,
सबके लबों पर अपने तराने हैं,
ले जाए नसीब किसी को कहां पे,
कितने अजीब रिश्ते हैं यहां पे...


ख्वाबों की ये दुनिया है ख्वाबों मे ही रहना है,
राहें ले जाएं जहां संग संग चलना है
वक्त ने हमेशा यहा नये खेल खेले,
कुछ भी हो जाए यहां बस खुश रहना है,
मंज़िल लगे करीब सबको यहां पे
कितने अजीब रिश्ते हैं यहां पे,
दो पल मिलते हैं, साथ-साथ चलते हैं,
जब मोड़ आए तो बच के निकलते हैं,
कितने अजीब रिश्ते हैं यहां पे...


अब एक सवाल क्या ब्लॉगिंग के रिश्ते भी ऐसे ही हैं...छोडिये जोर मत दीजिये लता ताई की दिलकश आवाज़ में यही गाना सुनिए...
 

शनिवार, 12 मार्च 2011

सोचो तो क्या पाया इनसान हो कर...खुशदीप


इनसान तरक्की के लिए कितना मारा-मारी करता है...लेकिन कुदरत के आगे कैसे सारा विकास एक झटके में बह जाता है, ये ब्लैक फ्राइडे को जापान में दिखा...ज़िंदगी से सराबोर शहर सैंडई को चंद मिनटों में ही समंदर से उठी पानी की दस मीटर ऊंची दीवार ने रौंद डाला...साइंस और इनसान ने हिफ़ाज़त के जो जो इंतज़ाम कर रखे थे, ताश के पत्तों की मानिंद ढह गए...

कुदरत के आगे भला इनसान की क्या बिसात...लेकिन इनसान को ये सोचने की फुर्सत कहां...महानगरों में हम रोबोट बने घूम रहे हैं...दिन-रात भागते-दौड़ते इन महानगरों में क्या नहीं है...ऐशो-आराम की ऐसी कौन सी शह है जो यहां पैसा खर्च कर नहीं खरीदी जा सकती...बस यहां रुक कर किसी को किसी की सुनने की फुर्सत नहीं है...आने वाले कल को ज़्यादा से ज़्यादा खुशहाल बनाने के लिए अपने आज की सारी खुशियों को कुरबान करते हुए हमें लगता है हम अजर-अमर है...ये भूल जाते हैं कि ज़िंदगी में जो मकाम गुज़र जाते हैं वो दोबारा कभी लौट कर नहीं आते...

वाकई लगता नहीं महानगरों में इनसान बसते हैं...यहां एक से बढ़कर एक प्रोफेशनल मिल जाएगा, बुद्धिजीवियों समेत न जाने कौन-कौन से जीवी मिल जाएंगे लेकिन एक अदद खालिस इनसान ढूंढना बड़ा मुश्किल हो जाता है...अब कत्ल के लिए भी यहां सुनसान जगह नहीं सबसे ज़्यादा भीड़ वाला इलाका ढूंढा जाता है...किसी लड़की को फुटब्रिज पर गोली मार कर हत्यारा बड़े मज़े से निकल जाता है...देखने वाले देखकर भी सूरदास बन जाते हैं...मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरा न कोय...सड़क पर भागते-दौड़ते भी बस अपने गिरधर के ध्यान में मगन...इतनी साधना कि पास में क्या घट रहा है, उसकी भी कोई सुध नहीं...क्राउड इतना है लेकिन किसी घर में कोई मर जाता है तो चार कंधे देने वाले भी मुश्किल से मिल पाते हैं...(नोएडा में बुज़ुर्ग रिटायर्ड लोगों के घर में ये त्रासदी मैं अपनी आंखों से देख चुका हूं)...यानि यहां संवेदना के लिए भी आपको क्राउड मैनेजमेंट वालों का दरवाज़ा खटखटाना पड़ेगा...

महानगरों के जीवन पर ही बशीर बद्र साहब ने क्या खूब कहा है-

कोई हाथ भी नहीं मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये अजीब मिज़ाज का शहर है,ज़रा फ़ासले से मिला करो...


ऐसे में याद आता है मेरठ में हम चार-पांच दोस्तों का बिना नागा रोज शाम को मिलना...बाज़ार का एक राउंड लेना...चाय के स्टाल पर बुलंद कहकहे लगाना...बिना किसी प्रायोजन के...बिना किसी स्वार्थ के...कभी लगता है मेरठ तो अपनी जगह पर ही है...मैं ही बदल गया हूं शायद...सब पुराने दोस्त अपनी अपनी जगह रमे हैं...मेरे समेत कहां कोई फुर्सत निकाल पाता है...

टीवी पर जापान में सुनामी की तबाही देखते-देखते यहीं सोच रहा हूं...क्या पाया इनसान हो कर....

गुरुवार, 10 मार्च 2011

छिनने वाली है ब्लॉगरों की आज़ादी...खुशदीप


अब इसे ब्लॉगिंग की ताकत कहिए या कुछ ब्लॉगरों की निरंकुशता, सभी ब्लॉगरों की आज़ादी छिनने वाली है...सरकार ब्लॉगिंग में जो कहा-लिखा जा रहा है उसके असर को अच्छी तरह समझ रही है...समझ रही है कि आने वाले वक्त में ब्लॉगिंग ट्यूनीशिया और मिस्र की तरह कहीं सत्ता में बदलाव का ही सबब न बन जाए इसलिए सरकार ब्लॉगिंग पर लगाम कसना चाहती है...और उसका काम आसान कर रहे हैं वो ब्लॉगर जो बिना सोचे-समझे धार्मिक विद्वेष, बिना सबूत अनर्गल आरोप, दूसरे की मान-हानि करने वाले शब्दों का इस्तेमाल या यौनिक गालियों का इस्तेमाल पोस्ट या कमेंट में करते हैं...सरकार इसी को आधार बनाकर ब्लॉगिंग पर सेंसरशिप लागू करना चाहती है...पहले हम खुद को एक संपादक की तरह अपने लिखे को संयमित करें, फिर सरकार के इस कदम का एकजुट होकर विरोध करें...नहीं तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घुटना तय है...

इस संदर्भ में इकोनॉमिक्स टाइम्स में छपी श्रीविद्या अय्यर की ये रिपोर्ट पढ़िए...

ब्लॉग पर डाला जाने वाला कंटेंट नियंत्रित करने से जुड़े सरकार के प्रस्तावित कदम को ब्लॉगिंग समुदाय की ओर से तीखे विरोध का सामना करना पड़ा है। ब्लॉगिंग कम्युनिटी का इल्जाम है कि सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदियां लगा रही हैं और उन्होंने इसे पुलिसिया शासन स्थापित करने की कोशिश करार दिया। दरअसल, इस विवाद की जड़ में जो मुद्दा है वह भारतीय आईटी अधिनियम है, जिसमें 2008 में संशोधन किया गया था। इस संशोधन का लक्ष्य यह था कि मध्यस्थों या वेब-होस्टिंग सेवाएं मुहैया कराने वालों, इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडरों या ऑनलाइन नीलामी साइट की कानूनी स्थिति में स्पष्टता लाने के लिए बहुप्रतीक्षित बदलाव लाए जा सकें।


हालांकि, कुछ कारणों की वजह से मध्यवर्ती संस्थाओं की टर्म का दायरा बढ़ाकर ब्लॉग तक कर दिया गया है, हालांकि न तो वे आईएसपी जैसी सेवाएं मुहैया कराते हैं और न ही बड़े पैमाने पर कमर्शियल हित रखते हैं। कानून में कहा गया है कि सरकार को वे नियम स्पष्ट करने चाहिए, जिनके तहत मध्यस्थों को काम करना चाहिए और साथ ही उन पाबंदियों की जानकारी भी देनी चाहिए, जो उन पर लगाई जाती हैं। पाबंदियों की यह सूची पिछले महीने प्रकाशित कराई गई थी और आम जनता, ब्लॉगर और मध्यवर्ती समूह के अन्य सदस्यों की ओर से टिप्पणियां आमंत्रित की गई थीं। इंटरमीडियरीज में वेब होस्टिंग प्रोवाइडर शामिल हैं, जिनमें एमेजॉन जैसी कंपनियां, साइबर कैफे, पेपाल जैसी पेमेंट साइट, ऑनलाइन नीलामी साइट, बीएसएनएल तथा एयरसेल जैसी इंटरनेट सविर्स प्रोवाइडर आदि शुमार हैं।


सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और साइबर लॉ विशेषज्ञ पवन दुग्गल ने कहा, 'यह बुनियादी रूप से खामियों से भरी प्रक्रिया है। आपको ब्लॉगर की बारीक भूमिका को दिमाग में रखना होगा। सरकार को ब्लॉगिंग समुदाय की ताकत समझने की जरूरत है। ब्लॉग की दुनिया को नियम के हिसाब से खुद को बदलने के लिए तैयार रहना चाहिए। लेकिन क्योंकि इंटरमीडियरीज नामक टर्म का इस्तेमाल हल्के में या अस्पष्ट रूप से भी होता है, ऐसे में विरोध जताने वाले ब्लॉगर अपनी जगह बिलकुल ठीक हैं।' एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने सरकार की प्रतिक्रिया का बचाव किया। उन्होंने कहा, 'हम इसे अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में शामिल हैं। हम सकारात्मक प्रतिक्रिया और रचनात्मक आलोचना का स्वागत करते हैं। मुमकिन है कि हमने जनता का पहलू समझने में चूक कर दी हो। जनता का अलग नजरिया भी हो सकता है।'


ब्लॉगर समुदाय को डर है कि सरकार इन नियमों के तहत किसी भी बात के लिए लेखकों पर आरोप लगा सकती है। ट्विटर पर ऑनलाइन यूजर और ब्लॉगरों ने एकसुर में इस मुद्दे पर अपना गुस्सा और झल्लाहट निकाली। डिजिटल बिजनेस न्यूज वेबसाइट मीडियानामा के संस्थापक और संपादक निखिल पाहवा ने कहा, 'हम सरकार को न्यायाधीश, जूरी और फांसी पर चढ़ाने वाले की भूमिका अदा करने की इजाजत नहीं दे सकते। हमारा समूचा लक्ष्य वर्ग भारतीय हैं। अगर हमारी साइट ब्लॉक की जाती है, तो हम मारे जाएंगे। मैं एक छोटा खिलाड़ी हूं, ऐसे में जो कुछ बना है, वह सब एक झटके में बिखर जाएगा।'

बुधवार, 9 मार्च 2011

पाकिस्तान हमसे बेहतर है...खुशदीप

आप ये शीर्षक पढ़ कर सोच रहे होंगे कि शायद होली की भांग अभी से चढ़ा ली है...भला पाकिस्तान भारत से बेहतर कैसे...हम ठहरे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और पाकिस्तान- Have a blast until you last...लेकिन कम से कम एक मामले में पाकिस्तान का रिकार्ड हमसे अच्छा है...


पाकिस्तान जैसे मुल्क के बारे में यही धारणा है कि कटटरपंथ के प्रभावी होने के चलते वहां महिलाओं को खुली हवा में सांस लेने की छूट नहीं होगी...और राजनीति में तो पुरुषों के आगे उनकी बिल्कुल नहीं चलती होगी...और एक हमारा देश भारत है, जहां राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस की प्रमुख सोनिया गांधी, अपोजिशन की नेता सुषमा स्वराज, स्पीकर मीरा कुमार और विदेश सचिव निरूपमा राव हैं, सबसे बड़े प्रदेश यूपी की सीएम मायावती हैं...फिर पाकिस्तान भारत से बेहतर कैसे हो गया...वहीं तो अब मैं सुनील पाल के रतन नूरा की तरह साबित करने जा रहा हूं...

क्या आपको याद पड़ता है कि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई रिज़र्वेशन देने का बिल देश में कबसे लटका पड़ा है...सोनिया गांधी के हाथ में देश की पावर होने से उम्मीद बंधी थी कि जल्द ही ये बिल पास होकर क़ानून बन जाएगा...हर साल महिला दिवस के मौके पर इस बिल को याद कर रस्म अदायगी ज़रूर की जाती है...कल तो बीजेपी के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने भी कह दिया कि बिल ज़रूर पास होना चाहिए लेकिन आम सहमति मिलने के बाद...तो क्या देश में कभी आम सहमति बन पाएगी...मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, शरद यादव जैसे नेताओं की तिकड़ी कभी बनने देगी इस पर सहमति...अरे ये तीनों नेता तो क्या कांग्रेस और बीजेपी जैसी पार्टियों के पुरुष नेताओं को भी डर है कि बिल पास हो गया तो उन्हें बरसों से अपनी जमी जमाई सीटें रिज़र्व होने की वजह महिलाओं के आगे खोनी पड़ेंगी यानि बरसों से अपने इलाके में किए गए वोट-जुटाऊ जुगाड़ धरे के धरे रह जाएंगे...नए इलाके में जाकर दोबारा से मेहनत करनी पड़ेगी...और फिर कौन जाने वहां कोई घास डालेगा या नहीं...

दुनिया भर के देशों की संसद में महिलाओं की स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय संस्था इंटर-पार्लियामेंटरी यूनियन ने एक रिपोर्ट पेश की है...इस रिपोर्ट के अनुसार इस मामले में भारत का फेहरिस्त में स्थान 98वां है...545 सदस्यीय लोकसभा मे 59 महिला सांसदों की भागीदारी 10.8 फीसदी और 245 सदस्यीय राज्यसभा में 25 महिला सांसदों की भागीदारी 10.3 फीसदी बैठती है...फेहरिस्त में 51वें नंबर पर पाकिस्तान का रिकार्ड इस मामले में हमसे कहीं अच्छा है...पाकिस्तान में संसद के निचले सदन में 22.2 फीसदी और ऊपरी सदन में 17 फीसदी महिलाएं हैं...और तो और बांग्लादेश और नेपाल भी इस मामले में हमसे आगे हैं...नेपाल की संसद में महिलाओं को 33.3 फीसदी और बांग्लादेश में 18.6 फीसदी नुमाइंदगी मिली हुई है...

पूरी दुनिया में महिलाओं को संसद में सबसे ज़्यादा नुमाइंदगी देने वाला देश रवांडा है...वहां महिलाओं की संसद में भागीदारी 57 फीसदी है...टॉप फाइव में रवांडा के बाद स्वीडन, साउथ अफ्रीका, क्यूबा और आइसलैंड के नाम आते हैं...दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र का दावा करने वाले अमेरिका की स्थिति भी इस मामले में बदतर ही है...अमेरिका का नंबर फेहरिस्त में 72वां हैं...

वैसे भारत के पुरुष नेताओं के लिए खुश होने वाली एक बात ये हो सकती है कि दुनिया में सऊदी अरब, कतर, ओमान समेत 12 देश ऐसे भी हैं जहां की संसद में महिलाओं की भागीदारी 0 फीसदी है यानि एक भी महिला सांसद नहीं है...



मंगलवार, 8 मार्च 2011

महिला असल में चाहती क्या है...खुशदीप



महिला असल में चाहती क्या है...इस सवाल का जवाब क्या है...महिला दिवस से पहले एक बहुत खूबसूरत मेल मुझे मिला है...जिसे आप सबसे शेयर करना चाहता हूं...बस मैं इतना कर रहा हूं कि सुविधा के लिए पात्रों का भारतीयकरण कर रहा हूं...

बरसों पहले एक रियासत का युवा राजा सुदर्शन भटक कर दूसरी रियासत में पहुंच गया...उस रियासत का राजा चक्रधर बड़ा क्रूर था...उसने सुदर्शन को बंधक बना लिया...चाहता तो चक्रधर वहीं सुदर्शन को मार कर उसकी रियासत पर कब्जा जमा सकता था...लेकिन चक्रधर को सुदर्शन की युवावस्था और चेहरे पर तेज देखकर दया आ गई...चक्रधर ने सुदर्शन के लिए पेशकश रखी कि वो उसकी जान बख्शने के साथ उसके राजपाट पर भी कब्जा नहीं करेगा...लेकिन उसे एक बेहद मुश्किल सवाल का जवाब देना होगा...चक्रधऱ ने सुदर्शन को अपनी रियासत लौट कर एक साल तक जवाब ढूंढने की मोहलत भी दी....साथ ही आगाह भी कर दिया कि अगर वो सही जवाब न ढूंढ सका तो उसकी मौत निश्चित है...

सवाल था...महिला असल में चाहती क्या है...

जानकार से जानकार आदमी के लिए भी इस सवाल का सटीक जवाब देना आसान नहीं...फिर सुदर्शन जैसे युवा राजा के लिए तो ये और भी मुश्किल था...लेकिन सवाल का जवाब ढूंढने का विकल्प मौत से तो अच्छा ही था...सुदर्शन ने चक्रधर की पेशकश को कबूल कर लिया...सुदर्शन रियासत लौट कर हर किसी से इस सवाल का जवाब पूछने लगा...मंत्रियों समेत कुशाग्र से कुशाग्र लोग भी ऐसा माकूल जवाब नहीं दे पाए जो सुदर्शन को संतुष्ट कर सकता...फिर कुछ सयाने लोगों ने सुदर्शन को सलाह दी कि रियासत में रहने वाली टोने-टोटके के लिए बदनाम एक अधेड़ महिला से संपर्क करे...वो ज़रूर जवाब जानती होगी...लेकिन इसके लिए वो बहुत मोटी कीमत ज़रूर वसूल करेगी..

सुदर्शन को जवाब का इंतज़ार करते-करते एक साल बीतने को आ गया...जब महज़ एक दिन बाकी रह गया तो सुदर्शन को लगा कि अब अधेड़ महिला से जवाब पूछने के सिवा और कोई चारा नहीं रह गया...अधेड़ महिला सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हो गई...लेकिन उसने पहले सुदर्शन से अपनी एक मांग पूरी करने का आश्वासन देने के लिए कहा...सुदर्शन ने मांग पूछी तो अधेड़ महिला ने कहा कि वो सुदर्शन के सबसे प्रिय दोस्त और मंत्री यशराज से शादी करना चाहती है...यशराज सुदर्शन के मंत्रिमंडल में सबसे बुद्धिमान, बलशाली, वफ़ादार और ओजस्वी मंत्री था...ये सुनते ही सुदर्शन ने कहा...नहीं ये नहीं हो सकता...मैं अपनी जान बचाने के लिए अपने दोस्त की तुम जैसी बदसूरत और अधेड़ महिला से शादी नहीं करा सकता...

य़शराज को इस बात का पता चला तो वो फौरन दौड़ कर सुदर्शन के पास आया...आते ही बोला...रियासत के राजा की जान के आगे कोई भी बलिदान बड़ा नहीं हो सकता...यशराज के बड़ा मनाने के बाद सुदर्शन अधेड़ महिला की शर्त मानने के लिए तैयार हुआ...यशराज के साथ शादी का ऐलान होने के बाद ही अधेड़ महिला सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हुई...

सवाल...एक महिला असल में चाहती क्या है...

जवाब...महिला चाहती है कि वो अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जिए...

जिसने भी ये जवाब सुना, उसे लगा कि इस सच्चाई को कोई काट नहीं सकता...रियासत में हर कोई खुशी मनाने लगा कि अब उनके राजा सुदर्शन की जान बच जाएगी...हुआ भी ऐसा ही...चक्रधर ने भी ये जवाब सुना तो बड़ा प्रभावित हुआ...उसने सुदर्शन की जान बख्शने के साथ अपनी शर्त से भी मुक्त कर दिया...इसके बाद अधेड़ महिला की मांग पूरी करने की बारी आई...यशराज और अधेड़ महिला की शादी भी धूमधाम से संपन्न हो गई...सुहागरात का वक्त भी आ गया...यशराज काफी टाइम दोस्तों के बीच बिताने के बाद अनमने ढंग से अपने कमरे में पहुंचा...यही सोचकर कि बदसूरत अधेड़ पत्नी इंतज़ार में बैठी होगी...

लेकिन कमरे में दाखिल होते ही ये क्या...यशराज को अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ...पलंग पर जो बैठी हुई थी उससे ज़्यादा खूबसूरत चेहरा उसने पूरी ज़िंदगी में पहले कभी नहीं देखा था...हैरान यशराज ने महिला से पूछा कि ये चमत्कार कैसे हुआ...जवाब मिला...क्योंकि उसने बदसूरत और अधेड़ महिला से शादी के प्रस्ताव को भी मान लिया, इसलिए वो उससे बहुत प्रभावित हुई...और अब फैसला किया है कि वो दिन के 24 घंटों में से आधा वक्त खूबसूरत युवा और आधे वक्त बदसूरत अधेड़ रहेगी...उसने साथ ही यशराज से कहा कि अब तुम ये तय कर लो कि मुझे दिन में कैसा रहना है और रात को कैसा...

यशराज सोचने लगा...अगर ये दिन में खूबसूरत रहे तो सब जानने वालों के सामने सिर उठा के चल सकूंगा...लेकिन रात को मुझे फिर बदसूरत पत्नी के साथ ही दांपत्य जीवन निभाना होगा...तो फिर क्या दिन में सबके सामने पत्नी बदसूरत ही रहे जिससे रात को मुझे खूबसूरत जीवनसाथी का साथ मिले...यशराज ने बहुत सोच-समझ कर जवाब दिया....
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यशराज ने जो विकल्प चुना वो ये था कि उसने पत्नी पर ही छोड़ दिया कि वो खुद ही ये तय करे कि कब खूबसूरत रहना है और कब बदसूरत...ये सुनते ही पत्नी ने जवाब दिया...मैंने अब हर वक्त खूबसूरत रहने का फैसला किया है...वो इसलिए क्योंकि तुमने मुझे वो सम्मान दिया है कि मैं अपना जीवन अपने हिसाब से जी सकूं...


आखिर में मेरी पसंद का ये गाना...

रविवार, 6 मार्च 2011

स्पेस में बना आल यूनिवर्स ब्लॉगर्स चंडूखाना (AUBC)...खुशदीप

कल की पोस्ट से आगे...

कुछ घंटे की नींद लेने के बाद मैं प्रसन्नचित महसूस करने लगा...अब आई फ्रैश होने की बारी...स्पेस मे फ्रैश होना भी टेढ़ी खीर है...कैसे भला...ये आपको कोई साइंटिस्ट ब्लॉगर भाई ही अच्छी तरह बता सकते हैं...खैर जादू मेरे फ्रैश होने का ही इंतज़ार कर रहा था और बाबा रामदेव की मुद्रा में हवा में ही अपना आसन ले चुका था...शायद जादू ने भी यूनिवर्स को भ्रष्टाचार और काले धन से मुक्त कराने के लिए बाबा से ही प्रेरणा ली हो...

लेकिन जादू की योजना सबसे पहले अपने ग्रह और धरती के समस्त ब्लॉगरों का कल्याण करने की थी...इसके लिए सबसे पहले ज़रूरी था कि एक संघ (एसोसिेएशन) बनाया जाए...बिना संगठित हुए कुछ भी करना धूल में लठ्ठ चलाने जैसा होता है...जादू ने बात को आगे बढ़ाते हुए मुझ पर ही सवाल दागा कि संघ का नाम क्या रखा जाए...मैंने रिपोर्टिंग के सूत्रों के हवाले से बताया कि संघ के लिए जितने भी तरीके के नाम मुमकिन हो सकते थे वो तो धरती पर नवाबों की नगरी में पहले ही रखे जा चुके हैं....इसलिए सोच-समझ कर ही नाम रखना होगा, वरना कहीं क़ानूनी नोटिस ही न आ जाए...जादू और मैंने बड़ी देर तक सिर से सिर भिड़ा कर दिमागी घोड़े दौड़ाए और इस नाम पर सहमति बनी...आल यूनिवर्स ब्लॉगर्स चंडूखाना (AUBC)...

चलो संगठन का नाम फाइनल हो गया...अब जादू ने कहा कि संगठन के कुछ नियम कायदे भी तय हो जाएं...मैंने कहा, जादू भाई, किसी भी संगठन की सफलता के लिए ज़रूरी है कि वो लोकतंत्र को कितना महत्व देता है...ये सुनकर जादू भड़क गया...कहने लगा- की न चंडूखाने वाली बात...कोई लोकतंत्र-वोकतंत्र नहीं...देख नहीं रहे लोकतंत्र के चक्कर में रब दे बंदे मनमोहन सिंह और रब दे देश भारत का हाल...इसलिए AUBC को आयरन हैंड से चलाना होगा...कर्नल गद्दाफी की तर्ज पर...

मैंने कहा...जादू भाई, जब तुमने सब कुछ पहले से ही सोच रखा है तो मुझे बस हुक्म करो कि धरती पर लौटने के बाद क्या करना है...जादू शायद मेरे मुंह से यही सुनना चाहता था...झट से उसने कमर पर लटके स्पेसबैग से एक लिस्ट निकाल कर मेरे हाथ में थमा दी...लिस्ट पर आल यूनिवर्स ब्लागर्स चंडूखाने के पदाधिकारियों और सदस्यों के लिए नियम कायदे लिखे हुए थे...मैंने पढ़ना शुरू किया...

1. कर्नल गद्दाफी की तरह AUBC का असीमित अधिकारों वाला एक चीफ़ चंडू (CC) होगा, जो कभी सलाह लेगा तो सिर्फ चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ जैसे मानव-प्रेमी नेताओं से लेगा ताकि फिर कोई थ्येन आन मन चौक जैसा कोई कांड कराना हो तो आत्मग्लानि जैसी कोई भावना न उपजे...

2 चीफ़ चंडू को किसी भी ब्लागर को एसोसिेएशन का पदाधिकारी बनाने और किसी भी वक्त हटाने का अधिकार होगा...कोई ब्लागर चीफ चंडू के इस अधिकार को चुनौती नहीं दे सकता...

3 एसोसिएशन का सदस्य बनने के लिए उन्हीं ब्लागरों को वरीयता दी जाएगी, जिनके बायोडाटा में सिर-फुटव्वल और लेग-पुलिंग की ज़्यादा से ज़्यादा घटनाएं दर्ज हों...

4 हर सदस्य रोज़ कम से कम दस-बारह पोस्ट चेप कर सभी को पकाने का माद्दा रखता हो...

5 पोस्ट कोई भी लिखे,साथ में फोटो चीफ चंडू की ही जाएगी...

6 सारे पदाधिकारी और सदस्य पीपली लाइव के नत्था की तर्ज पर काम करेंगे...

7 अगर किसी शहर में किसी को AUBC की ब्रांच खोलनी है तो उसे पहले चंडूखाने की एक पीठ स्थापित करनी होगी...जो भी चढ़ावा आएगा, उसका 90 फीसदी हेडक्वार्टर भेजा जाएगा...

8 अमेरिका हो या कनाडा, इंग्लैंड हो या यूएई,भारत हो या साउथ ईस्ट एशिया या फिर दुनिया या जादू के ग्रह के किसी भी स्थान का ब्लागर,ब्रांच किसी भी शहर में खोले, हेडक्वार्टर का पता चीफ चंडू के शहर का ही दिया जाएगा...

9 हर सदस्य के काम का मूल्यांकन करने के लिए एक 'वाह उस्ताद वाह' की नियुक्ति चीफ चंडू की ओर से की जाएगी...

10 अगर कोई अविनाश वाचस्पति या अजय कुमार झा जैसे घर-फूंक तमाशा देखने वाले जीव सच में ही ब्लागर्स को किसी सार्थक मंच पर जोड़ने की कोशिश करेंगे तो घेटो-घेटो कहकर उनका जीना हराम कर दिया जाएगा...


एक सांस में लिस्ट पढ़ने के बाद मैने जादू की तरफ देखा...वो मंद मंद कुटिल हंसी के साथ मेरे चेहरे के भावों को पढ़ रहा था...जादू ने फिर मुझसे पूछा कि क्या बोलते हो...क्या बनोगे चीफ़ चंडू...मैंने अपने स्वभाव को देखते हुए वहीं जादू से हाथ जोड़ दिए...क्योंकि मुझे चीफ चंडू का आगे चलकर होने वाला हश्र साफ नजर आ रहा था...जादू इस पर भड़क गया...चीफ चंडू नही बनना था तो मुफ्त की बारात में स्पेस के मज़े लूटने आया है...अब जादू का गुस्सा देखकर मैं ये भी याद नहीं दिला सकता था कि धरती पर स्पेस के लिए रवाना होने से पहले मुझे कुछ बताया ही कहां गया था...लेकिन मैंने फिर भी बात को संभाला...कहा- जादू भाई मैं, धरती पर जाकर फौरन किसी सूटेबल कैंडीडेट की सहमति लेकर चीफ चंडू के लिए आपको नाम भेजता हूं...

अब मैं इसी पर पोस्ट लिखने की सोच ही रहा था कि बताइए कौन बनेगा चीफ चंडू...कि पत्नीश्री की आवाज़ कानों में पड़ी, दस बज गए हैं, छुट्टी वाले दिन कितना सोओगे, बाज़ार नहीं चलना सामान लेने...वरना तु्म्हें हफ्ते भर ड्यूटी और ब्लागरी से फुर्सत ही कहां मिलती है...और मेरी नींद खुल गई...

शनिवार, 5 मार्च 2011

स्पेस से रिपोर्टिंग लाइव...खुशदीप





अभी अभी अमेरिका के न्यू मैक्सिको के स्पेसपोर्ट पर वर्जिन गैलेक्टिक एलएलसी की फ्लाइट से इंटरनेशनल स्पेस सेंटर से लौटा हूं...वर्जिन एयरलाइंस के मस्तमौला मालिक सर रिचर्ड ब्रैन्सन का भला हो जिन्होंने स्पेस में जाना ऐसा आसान बना दिया है जैसे लखनऊ के नाका टोला से रिक्शा पकड़ कर गणेशगंज होते हुए अमीनाबाद जाना...

हां, तो मैं एक सीक्रेट मिशन पर इंटरनेशनल स्पेस सेंटर गया था...दरअसल बड़े दिनों से जादू के स्पेस से मैसेज आ रहे थे...अब ये मत पूछिए कि कौन जादू...अरे वही एलियन जादू जिसने राकेश रोशन और ऋतिक रोशन की खातिर फिल्म कोई मिल गया के लिए धरती पर स्पेशल एपीयरेंस की थी...तो जादू मुझसे कह रहा था कि बहुत ज़रूरी काम है, मेरे ग्रह पर आकर मिलो...मैंने कहा, जादू भैया तुम्हे काम है तो तुम धरती पर आओ...अब जादू ने परेशानी बताई कि एक बार ही धरती पर आने का खामियाजा भुगत रहा हूं...धूप में सन-बर्न की वजह से फेस-वैल्यू खराब हो गई...इसलिए दोबारा धरती पर आने का जोखिम नहीं ले सकता...मुझे जादू का लॉजिक समझ आ गया...लेकिन मैं भी जादू के ग्रह पर जाने का रिस्क कैसे ले सकता था...पता नहीं मुंह पर कैसी थूथनी लगा दे...धरती वालों को क्या जवाब दूंगा...

फिर जादू ने ही मेरी हिचक का निवारण किया...जादू ने प्रपोज़ किया कि न धरती पर, न मेरे ग्रह पर...बीच स्पेस में इंटरनेशनल स्पेस सेंटर पर मिलते हैं...जादू ने सर रिचर्ड ब्रैनसन से डिस्काउंट पर टिकट लेकर मेरे लिए वर्जिन गैलेक्टिक एलएलसी स्पेसक्राफ्ट से टिकट भी बुक करा दी...फ्लाइट का दिन आ गया तो राम-राम करता स्पेसक्राफ्ट पर चढ़ा...सारे रास्ते महामृत्युंजय पाठ करता गया...इंटरनेशनल स्पेस सेंटर पहुंचा तो जादू स्पेसवाक करता हुआ पहले से ही मेरे स्वागत के लिए तैयार था...

दुआ-सलाम के दौर के बाद मैंने ही जादू से पूछा कि भैया ऐसा कौन सा काम मुझसे आन पड़ा...जादू ने कहा कि अभी कुछ स्पेसफूड वगैरहा छक कर आराम कर लो...थकान उतरने के बाद अपने प्रोजेक्ट के बारे में बताऊंगा...बस इतना समझ लो कि ये प्रोजेक्ट धरती और मेरे ग्रह के समस्त ब्लॉगरों की भलाई के लिए है...अब इंटरनेशनल स्पेस सेंटर में लेटना तो हवा में तैरते हुए ही था...स्पेस स्लीपिंग सूट में घुसते ही मैं खर्राटे भरने लगा...

क्रमश:

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

500वीं पोस्ट के मेरे लिए मायने....खुशदीप



कल गुरुदेव समीर लाल जी की पोस्ट से उनके ब्लागिंग में पांच साल पूरे होने का पता चला...संयोग ही है कि कल ही मुझे देशनामा के डैशबोर्ड से पता चला कि आज मेरी ये 500वीं पोस्ट है...15 अगस्त 2009 की रात को मैंने पहली पोस्ट डालते वक्त सोचा नहीं था कि ब्लागिंग में इतना रम जाऊंगा...पिछले 18-19 महीने में बस इसी मकसद से लिखता गया कि एक पोस्ट बिना नागा ज़रूर डालूं...इस चक्कर में जो अच्छा-बुरा लिख सका, उससे आप सबको खूब पकाया...कोशिश यही रही कि जिस तरह अखबार मिस नहीं होता, उसी तरह अपनी पोस्ट भी मिस न करूं...इस रूटीन को बनाए रख सका, इसकी सबसे बड़ी वजह आपका अपने दिल में जगह देना रहा...

मलाल है तो बस इस बात का कि अब मैं पहले की तरह दूसरों की पोस्ट पर कमेंट नहीं कर पाता...आप भी सोचते होंगे कि कैसा इनसान है...क्या खुदगर्ज़ी है जो रोज एक पोस्ट चेप देती है लेकिन खुद दूसरों को टिप्पणियां देने में कंजूसी बरतती है...यकीन मानिए पोस्ट लेखन मेरे लिए अब रिफ्लेक्स एक्शन सरीखा हो गया है... मैं यहां कबूल करता हूं कि चाह कर भी मैं अपने सभी प्रिय ब्लागों को पढ़ने के लिए वक्त नहीं निकाल पाता...लेकिन मेरी एक बीमारी भी है जब तक किसी पोस्ट को अच्छी तरह पढ़ कर आत्मसात न कर लूं टिप्पणी नहीं दे सकता...और इस काम के लिए यकीनन वक्त चाहिए होता है...

टिप्पणी शास्त्र के गिव एंड टेक सिद्धांत पर मैनें कभी भरोसा नहीं किया...टिप्पणी की परिभाषा को प्रशंसा से बढ़ाकर विचार-मंथन, स्वस्थ बहस, आलोचना के स्तर पर ले जाने से लेखन और लेखक का विकास होता है, इस संदर्भ में ब्लॉगिंग के कर्मयोद्धा जी के अवधिया जी की बातों को शुरू में मैं भी अनाड़ी होने की वजह से समझ नहीं पाता था...जब से अवधिया जी को पढ़ना शुरू किया है, उनका हमेशा ज़ोर रहा है कि किस तरह ज़्यादा से ज़्यादा पाठक पोस्ट पढ़ने के लिए आएं...अवधिया जी से ही सीखा कि हिंदी ब्लॉगिंग के साथ अपना विकास तभी होगा जब इसे ज़्यादा से ज़्यादा पाठक मिलेगें...ऐसे पाठक जो खुद ब्लॉगर न हों लेकिन अखबार के पाठकों की तरह हमेशा कुछ नया जानने के लिए उत्सुक हों...अब मेरी भी ये धारणा बनने लगी है कि असली चीज़ आपका स्टेटकाउंटर हैं, जिससे ये पता चलता रहे कि रोज़ आपके ब्लॉग पर कितने विजिटर आ रहे हैं...मैंने ब्लॉगिंग शुरू करने के दो-तीन महीने तक स्टेटकाउंटर का विजेट नहीं लगाया था (लगाता भी कैसे घोर अनाड़ी जो था)...किसी ने विजेट लगा कर दिया तो बड़ा खुश हुआ था...अब इस विजेट के मुताबिक करीब डेढ़ साल में एक लाख तीस हज़ार विजिटर देशनामा पर आ चुके हैं...मेरे लिए यही सबसे बड़ी उपलब्धि है...

कभी कभी ये सवाल भी ज़ेहन में चोट करने लगता है कि क्यों कर रहा हूं ब्लागिंग...इसका मेरे लिए मकसद क्या है...क्या हर पोस्ट पर कुछ टिप्पणियां...वैचारिक जुगाली का संतोष...थोड़ा सा नाम...कुछ नए दोस्त...कुछ नए रिश्ते...लेकिन किस कीमत पर...ज़ाहिर है किसी काम को दिल से करना है तो उसके लिए आपको वक्त तो देना ही होगा...लेकिन वक्त तो आपके पास गिना-चुना है...प्रोफेशन की प्रतिबद्धता से जो वक्त बचता है, उसमें घर,पति/पत्नी, बच्चे, रिश्तेदार, दोस्त सब के लिए आपकी ज़िम्मेदारियां हैं...आखिर आप समाज में रहने वाले प्राणी है...इसके बावजूद ब्लागिंग के लिए वक्त निकालते हैं तो ये आपकी इस विधा के प्रति निष्ठा है, समर्पण है...ऐसे में वक्त का प्रबंधन आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है...कितना वक्त आपको पोस्ट का मुद्दा ढूंढने पर लगाना है...कितना वक्त लेखन में लगाना है...कितना वक्त दूसरे ब्लाग को पढ़ने में लगाना है...कोशिश कर रहा हूं कि खुद को और व्यवस्थित करूं और कम से कम शनिवार-रविवार को दूसरे ब्लॉगों को ज़्यादा से ज़्यादा पढ़ूं और संभव हो सके तो सार्थक और पोस्ट के पूरक कमेंट कर सकूं...

इस ब्लॉग के सफ़र में बेशुमार दोस्त मिले...बड़ों का आशीर्वाद मिला...छोटों से प्यार और सम्मान मिला...अपनी दो पोस्टों में ज़्यादा से ज्यादा साथियों का नाम लेने की कोशिश की थी...उसके बावजूद कई नाम रह गए थे...(उम्र बढ़ रही है यादाश्त पर कुछ तो असर पड़ेगा ही)...उन्हीं पोस्ट के लिंक दे रहा हूं...

ब्लॉगिंग के मेरे हमसफ़र-1


ब्लॉगिंग के मेरे हमसफ़र-2

ऊपर के दोनों लिंक में जो नाम हैं, उनके बाद भी इस सफ़र पर कई साथी और मिले जैसे कि राकेश कुमार जी, अशोक बजाज जी, राधारमण जी,  सर्जना शर्मा, गीताश्री, सुशील बाकलीवाल जी,अरुण कुमार रॉय,प्रवीण पांडे, अतुल श्रीवास्तव, मासूम भाई, केवल राम,संजय झा,  सुनील कुमार, तृप्ति, पूरबिया, दीपक बाबा, संजय कुमार चौरसिया, पटाली द विलेज, राजेश उत्साही, संवेदना के स्वर, राहुल सिंह जी, पदम सिंह, देवेंद्र पांडेय,संजय भास्कर, उस्मान, ,'सुज्ञ',वेदिका, कोरल, प्रतिभा, पंकज उपाध्याय, स्तुति,अभिषेक अपूर्व, पूजा, दर्शन, किशोर, निशांत मिश्र, अमित शर्मा, डॉ महेश सिन्हा जी, अरुणेश मिश्र,शंभू, बिरमा राम,राजित सिन्हा,प्रतिभा कटियार और भी बहुत नाम...

आखिर में बस यही कहूंगा...

एहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तों,
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों...



गुरुवार, 3 मार्च 2011

अमीरों की सभी शादियों की बाप...खुशदीप

कुछ दिन पहले शादियों पर बेतहाशा पैसा बहाने पर पोस्ट लिखी थी...संयोग से इसी पोस्ट के अगले दिन भारत सरकार से छन कर रिपोर्ट आई कि शादियों पर फिजूलखर्ची को रोकने के लिए कुछ बंदिशें लगाने पर विचार हो रहा है...सरकार इस बाबत संसद में बिल पेश करने वाली है...भारत में जितना भी खाद्यान्न बर्बाद होता है उसका 15 फीसदी हिस्सा शादियों की दावतों से ही जुड़ा होता है...भारत के खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री के जी थॉमस का कहना है कि शादी-समारोहों में ही अन्न की बर्बादी को रोक लिया जाए तो भुखमरी के शिकार करोड़ों लोगों का पेट भरा जा सकता है...



ये तो रहा सरकार का बयान...अब देखिए चिराग तले अंधेरा कैसे होता है...दिल्ली में कांग्रेस के एक नेताजी हैं- कंवर सिंह तंवर...धन्ना सेठ हैं...2009 में बीएसपी के टिकट पर लोकसभा चुनाव और उससे पहले छत्तरपुर से विधानसभा चुनाव भी लड़ चुके हैं...दोनों बार हार गए लेकिन सबसे अमीर उम्मीदवार होने की वजह से सुर्खियों में खूब नाम बटोरा...

अब ज़रा दिल थाम कर सुनिए जनाब नेता जी के बेटे ललित की शादी का किस्सा...इसी एक मार्च को ललित पूर्व निर्दलीय विधायक सुखबीर सिंह जौनपुरिया की बेटी योगिता के साथ परिणय-सूत्र में बंधे...वर-वधू दोनों एमबीए हैं...इस शादी पर कितना खर्च हुआ होगा इसका अंदाज इसी से लगा लीजिए दूल्हे को तोहफ़े में हेलीकॉप्टर मिला है...लड़के के परिवार को नेग में 21 करोड़ रुपये मिले है...शादी को लेकर चार समारोह होने हैं जिन पर लड़के-लड़की वालों का मिलाकर 250 करोड़ रुपये का खर्च बताया जा रहा है...मुख्य समारोह दिल्ली से सटे हरियाणा के जौनपुर गांव में हुआ जहां 15,000 मेहमान शरीक हुए...जिसमें जौनपुर गांव के सारे लोग भी शामिल थे...सभी मेहमानों को 11-11 हज़ार रुपये शगुन में दिए गए...

रविवार शाम को दिल्ली के अशोक होटल में वीआईपी रिसेप्शन होगा..जिसमें सभी बड़े नेताओं के साथ शाहरुख खान जैसी बॉलीवुड की हस्तियां भी शिरकत करेंगी...आज यानि गुरुवार को गुर्जर समुदाय की दावत का कार्यक्रम हैं जिसमें फिल्म स्टार नेहा धूपिया और गायक गुरुदास मान अपनी परफारमेंस से मेहमानों का दिल बहलाएगे...

पिछले हफ्ते फतेहपुर बेरी के असोला में कंवर सिंह तंवर के फार्महाउस में लगन की रस्म हुई....इसमें 2000 मेहमानों में से हर एक को तीस ग्राम चांदी का बिस्किट, सफारी सूट और 2100 रुपये नकद दिए गए...लड़के का टीका ढाई करोड़ और परिवार के अन्य 18 सदस्यों का टीका एक करोड़ में किया गया...

ढाई सौ करोड़ की देखिए अब वैल्यू क्या है...

बुधवार, 2 मार्च 2011

बिल की लाइन और बुज़ुर्ग...खुशदीप

कल मैं बीएसएनएल ब्रॉडबैंड का बिल जमा कराने के लिए गया...वहां जाकर देखा तो लंबी लाइन लगी हुई थी...मुझे फिक्र हुई कहीं ड्यूटी पर लेट न हो जाऊं...लेकिन बिल की भी आखिरी तारीख थी, इसलिए जमा कराना ही था सो लाइन में लग गया...लाइन में कोई बीस-बाइस लोग थे...उनमें तीन-चार को छोड़कर सभी सीनियर सिटीजन (65 से ऊपर) थे...वहां कुर्सियां दो-तीन ही पड़ी थी...जो बुज़ुर्ग ज़्यादा देर तक नहीं खड़े हो सकते थे, वो वहां बैठे हुए थे...

सब बिल के बारे में बातें करते हुए...इतनी भीड़ होने के बावजूद बिल जमा कराने के लिए एक ही विंडो खुली हुई थी...उस पर बैठा क्लर्क खरामा-खरामा बिल जमा करने में लगा हुआ था...साथ ही बीच-बीच में आने वाले परिचित-दोस्तों के साथ ठहाके भी लगा रहा था...एक सिक्योरिटी गार्ड भी अंटी में कुछ बिलों को दबाए हुए क्लर्क के पास आकर खड़ा हो गया...ये देखकर मेरे आगे खड़े एक बुज़ुर्ग (सेना के कोई रिटायर अफसर) का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया...उन्होंने वहीं से क्लर्क और सिक्योरिटी गार्ड की क्लास लेना शुरू कर दिया...

मैंने नोटिस किया वहां जितने भी बुज़ुर्ग थे, वो यही बातें कर रहे थे कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता...सब भ्रष्ट और निकम्मे हैं...बुज़ुर्ग ये सब बोले जा रहे थे...मैं कुछ और ही सोच रहा था...ये गुस्सा शायद देश के माहौल पर कम बुज़ुर्गों को अपनी हालत पर ज़्यादा था...जब उन्हें घर में ही इस उम्र में भी बिल जमा कराने जैसे कामों पर लगाया हुआ है...बेशक स्टिक लेकर मुश्किल से ही चलते हों...क्योंकि घर में जो जवान हैं, उन्हें फुर्सत ही कहां हैं..ऐसे में जब बुजुर्गों की अपने घरों में ही नहीं चलती तो देश में भला कहां चलेगी...ऐसे में गुस्सा और हताशा चेहरे से न फूटे तो कहां फूटे...

प्रणब बाबू ने इस बार बजट में बुज़ुर्गों के लिए जो ऐलान किए हैं, उनमें सीनियर सिटीजन की आयकर छूट की सीमा 2.40 लाख से बढाकर 2.50 लाख करना, उम्र 65 की जगह 60 करना, अति वरिष्ठ की एक नई कैटेगरी बनाकर अस्सी से ऊपर के बुज़ुर्गों की पांच लाख तक की आय पर कोई इनकम टैक्स नहीं लगाना, निराश्रित बुज़ुर्गों की पेंशन 200 से बढ़ाकर 500 करना...अब यहां ये गौर करने काबिल हैं देश में अस्सी से ऊपर पांच लाख की आमदनी रखने वाले कितने बुज़ुर्ग होंगे...होंगे भी तो या तो बड़े उद्योगपति होंगे या फिर राजनेता...दूसरे कुछ घरों में भी टैक्स बचाने के लिए बुज़ुर्गों की सिर्फ कागज़ों में पांच लाख से ज़्यादा की आय दिखाई होगी...वरना देश में ऐसे खुशकिस्मत बुज़ुर्ग कहां जो आर्थिक मामलों में भी खुद फैसले लेते हों और जिनकी घर में भी चलती हो...मेरे हिसाब से मेजोरिटी ऐसे बुजुर्गों की ही है जो बिल की लाइन में लगे हुए थे...अब चाहे स्टिक लेकर चलते हों या लंबी सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हों, घर वालों की भला से...

वाकई मेरा देश महान है...

मंगलवार, 1 मार्च 2011

धन ते नन... FM की सुनिए और गाईए...खुशदीप



आपने FM को सुना...अरे नहीं बाबा रेडियो का FM स्टेशन नहीं अपने देश के फाइनेंस मिनिस्टर प्रणब बाबू को...वो बजट भाषण दे रहे थे और मुझे विशाल भारद्वाज की फिल्म कमीने का ये गाना याद आ रहा था...

धन ते नन...
धन ते नन...
आजा आजा दिल निचोड़े
रात की मटकी फोड़ें,
कोई गुड लक निकालें,
आज गुल्लक तो फोड़ें,


है दिल दिल दारा,
मेरा तेली का तेल,
कौडी कौडी, पैसा पैसा,
पैसे का खेल...

धन ते नन, धन ते नन...


वाकई इस गाने में गुलजार के लिखे बोलों को देखा जाए तो बजट की सारी बाज़ीगरी छुपी है...कहने को प्रणब बाबू ने  किसान-गरीब-गुरबों के लिए बहुत कुछ किया है...और मध्यम वर्ग तो आयकर की छूट सीमा बीस हज़ार बढ़कर एक लाख अस्सी हज़ार होने से ही तृप्त है...लेकिन अब ज़रा प्रणब बाबू की असली धन ते नन का मतलब भी समझ लीजिए...

कॉरपोरेट सेक्टर के लिए टैक्स सरचार्ज को साढ़े सात से पांच फीसदी कर दिया गया है...पिछले साल भी इसमें ढाई फीसदी की कटौती की गई थी...

वहीं कृषि मशीनरी पर बेसिक कस्टम ड्यूटी को पांच से घटाकर साढ़े चार फीसदी किया गया है...और शोर ऐसा है जैसे कि किसानों को छप्पर फाड़ कर न जाने क्या दे दिया गया है...

प्रणब बाबू ने बताया है कि इस बार किसानों को कर्ज़ देने का टारगेट एक लाख करोड़ बढ़ा कर पौने पांच लाख करोड़ कर दिया है...लेकिन पिछले साल भी पौने चार लाख करोड़ कर्ज़ देने का टारगेट था तो देश में बीते साल बाइस हज़ार किसानों ने खुदकुशी क्यों की...इसका जवाब प्रणब बाबू के बजट भाषण में नहीं था...खुदकुशी करने वाले किसानों में से अस्सी फीसदी ऐसे ही थे जो कर्ज लेकर वापस नहीं कर पाए थे...बीस फीसदी ऐसे थे जिनकी फसल पूरी तरह चौपट हो गई थी और उन्हें कर्ज देने वाला कोई नहीं था...दरअसल बैंक किसान की माली हालत देखकर ही कर्ज देता है...ऐसे में जिसे सबसे ज़्यादा पैसे की ज़रूरत होती है वो सूदखोरों के जंजाल में ही फंसता है...

ये बात प्रणब भी मानते हैं कि मानसून पर भी बहुत कुछ देश की अर्थव्यवस्था की तंदरुस्ती निर्भर करती है...पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले इस साल मानसून अच्छा रहा तो जीडीपी की विकास दर नौ फीसदी होने की आस भी बंध गई...इसका असली कारण यही है कि इस साल कृषि की विकास दर पिछले साल के मुकाबले बहुत अच्छी रही है....दिसंबर को खत्म हुई तिमाही के आंकड़ों के अनुसार कृषि ने 8.9 फीसदी की दर से बढ़ोतरी की...पिछले साल इसी पीरियड में ये विकास दर माइनस 1.6 चली गई थी...यानि मानसून सही रहा तो सरकार को भी अपनी पीठ ठोंकने का मौका मिल गया...फिर मानसून ही देश का असली फाइनेंस मिनिस्टर है तो किसानों के कर्ज को भी मानसून से क्यों नहीं जोड़ दिया जाता...मानसून की स्थिति के मुताबिक ही किसानों से कर्ज की वसूली की जाए...

बजट से संकेत मिलता है कि किसानों के उत्पादों के स्टोरेज के लिए सरकार प्राइवेट सेक्टर की मदद लेने जा रही है...अब प्राइवेट सेक्टर किसी चैरिटी के लिए तो ये काम करेगा नहीं...मुनाफे का खेल यहां भी होगा...किसान से सस्ती से सस्ती कीमत पर उत्पाद खरीद कर खुदरा बाज़ार में ऊंची से ऊंची कीमत पर बेचे जाएंगे...यानी फसल के बाज़ार पर सरकार की नज़र है और वो इसका भी कॉरपोरेट के ज़रिए ही समाधान ढूंढना चाहती है...

सरकार असल में किसकी ज़्यादा खैरख्वाह है, इसका जवाब मनमोहनी इकोनॉमिक्स की इस दलील से ही मिलता है कि जब दुनिया भर में आर्थिक मंदी की मार थी तो भी भारत की अर्थव्यवस्था को बचाए रखा गया...तीन तीन स्टीमुलस पैकेज के ज़रिए अरबों डॉलर के बेलआउट इंडस्ट्री को दिए गए...साथ ही उसे बाज़ार को अपने मनमुताबिक चलाने की छूट दी गई...कमर बेशक आम आदमी की टूटी...चलिए जो हुआ सो हुआ...अब तो आप दावा कर रहे हैं कि अर्थव्यवस्था पटरी पर आ गई है...तो फिर इंडस्ट्री को जो स्टीमुलस (रियायतें) दी गईं थीं वो वापस लेने का ऐलान क्यों नहीं किया जा रहा...

इंडस्ट्री की सेहत की इतनी फिक्र है...काश थोड़ी सी फिक्र उन 22 हज़ार विधवाओं के लिए भी दिखा दी जाती जिनके किसान पतियों ने बीते साल खुदकुशी कर ली...भ्रष्टाचार के लिए सिर्फ ग्रुप आफ मिनिस्टर्स और काले धन पर पांच सूत्री कार्यक्रम के महज ऐलान भर से ही सरकार ने रस्म अदायगी कर दी है...

मैं अब उस दिन की सोच रहा हूं, जब रसोई गैस से आपको और हमें सब्सिडी देना सरकार बिल्कुल बंद कर देगी और सिलेंडर 700 रुपये में मिलेगा...फिर तो वाकई सड़कों पर होगी...

धन ते नन...

आप ये सब छोड़िए बस गाना सुनिए...