रविवार, 27 फ़रवरी 2011

Life...यही ज़िंदगी है...खुशदीप



हमेशा आगे की चाल चलते रहने से कोई शतरंज की बाज़ी नहीं जीत सकता...कभी सही चाल के लिए आपको कदम पीछे की ओर भी खींचने पड़ते हैं...

यही ज़िंदगी है...

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ये सही है कि हम जब भगवान को बुलाते हैं, ठीक उसी वक्त वो नहीं आते...लेकिन भगवान की घड़ी ठीक वक्त के मामले में कभी चूक नहीं करती...ये हम ही होते हैं जो जल्दी में होते हैं...

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स्लॉग ओवर

बच्चे स्मार्ट पर स्मार्ट होते जा रहे हैं...

मक्खन रात को गुल्ली को कहानी सुना रहा था जिससे कि उसे नींद आ जाए...मक्खन ने जैसे ही कहा...एक था राजा...


गुल्ली का जवाब था...

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डैडी जी, कोई नई कहानी सुनाओ, मैं 2-G स्पेक्ट्रम घोटाले के बारे में सब कुछ जानता हूं...

शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

भारतीय रेल: अंजन की सीटी पर म्हारो मन डोले...खुशदीप

इस वक्त अंजन की सीटी पर ममता दी से ज़्यादा किसका मन डोल रहा होगा...पश्चिम बंगाल में चुनाव के लिए एक मार्च के बाद चुनाव आयोग कभी भी तारीखों का ऐलान कर सकता है...यानि राज्य के लिए चुनाव आचार संहिता लागू हो जाएगी...ऐसे में रेल बजट आखिरी मौका रहा ममता दी के लिए बंगाल से दोनों हाथों से अपनी ममता लुटाने का...वैसे भी ममता दी यूपीए में जब से रेल मंत्री बनी हैं उनकी कोशिश यही रही है कि अपनी राजनीति की पटरी को राइटर्स बिल्डिंग तक ले जाएं और पश्चिम बंगाल के लिए सत्ता का सिगनल अपने हाथ में ले लें...लेकिन ममता दी ऐसा करते वक्त ये भूल गईं कि रेल मंत्री तो पूरे देश का होता है...

चुनाव को ध्यान में रखकर ममता बनर्जी का ज़्यादा वक्त बंगाल में ही बीतता है...ऐसे में रेल मंत्रालय का दिल्ली में बाजा तो बजना ही था...पिछले बजट में ममता दी ने जिन योजनाओं का बढ़-चढ़ कर ऐलान किया था, उनमें से ज्यादातर हवा में ही लटकी रह गईं...हां, बंगाल से जुड़ी योजनाओं पर ज़रूर तेज़ी से काम हुआ...अब देखना है कि उनके इस साल के वादों का क्या हश्र होता है...और अगर ममता दी बीच में ही चुनाव जीतकर बंगाल की मुख्यमंत्री बन गईं तो फिर तो वैसे ही सारी ज़िम्मेदारी नए रेल मंत्री के कंधे पर आ जाएगी...वैसे यहां गिनाता हूं कि ममता दी के पिछले साल के कुछ वादे जो वादे ही रह गए-
1000 किलोमीटर नई पटरी बिछाने का वादा किया था, बिछ पाई सिर्फ 230 किलोमीटर...
माल ढुलाई के लिए समर्पित कारिडोर अब भी सपना बना हुआ है...
50 वर्ल्ड क्लास स्टेशन बनाने का प्रस्ताव कागज़ों से आगे नहीं बढ़ा...
मोबाइल टिकटिंग सिस्टम नहीं शुरू हो पाया...
तेज़ रफ्तार गाड़ियों (200 किलोमीटर प्रति घंटा) के लिए कारिडोर अभी सलाह मशविरे के दौर से आगे नहीं बढ़ पाया...
बेहतर खान-पान, साफ पानी, टायलेट-ट्रेन-स्टेशनों की साफ़-सफ़ाई में कोई सुधार नहीं हो सका...


इसके अलावा ममता दी के बंगाल से बाहर न निकलने से जिन अन्य योजनाओं पर असर पड़ा है वो हैं-

कश्मीर रेल लाइन पर कछुआ गति से काम चल रहा है...
सेफ्टी के लिए सबसे ज़रूरी एंटी कोलिज़न डिवाइस के लिए सरकार के पास पर्याप्त पैसा नहीं है...
जहां से रेलवे को सबसे ज़्यादा कमाई हो है डेडिकेटेड फ्रेट कारिडोर,प्रस्ताव से आगे नहीं बढ़ पा रहा है...


लेकिन ममता दी का दिल तो बंगाल की मुख्यमंत्री बनने की सोच-सोच कर ही अगर ये गाना गाने लगे तो कोई बड़ी बात नहीं आप भी सुनिए...

अंजन की सीटी पर म्हारा मन डोले...

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

ब्लागिंग की फ़ितरती ABC...खुशदीप


कल शाहनवाज़ ने ब्लागिंग की ABC पर पोस्ट लिखी थी...शाहनवाज़ बेहद काबिल, सुलझे हुए और तकनीकी तौर पर बहुत मजबूत हैं...इसलिए उन्होंने अपनी ABC में ब्लागिंग का तकनीकी पहलू पेश किया...लेकिन अब मैं आपको बताता हूं- ब्लागिंग की असली ABC...ये तकनीकी नहीं फितरती है...और हां, यकीन मानिए ब्लागर इसी तरह अपने ऊपर चुटकी लेना भी जानते हैं...अपने घर की खामियों का भी आपस में खुल कर ज़िक्र (कभी कभी सिर फुटव्वल) भी करते हैं...क्या साहित्य में भी इतनी पारदर्शिता है...

A- अपने मुंह मिया मिठ्ठू


B- ब्लागिंग पर बिना मांगे सलाह देना


C- चम्मचाना (नए ब्लागर के लिए पहली शर्त)


D- डाह की आह


E- इतराना


F- फुल एंड फालतू पोस्ट लिखने में माहिर


G- गुटबाज़ी का गेम


H- हिंदी के होनहार


I- आई एम द बेस्ट


J- जोक्स से पकाना (नेचुरली घिसे पिटे)


K- कविता आए न आए पर कवितियाना


L- लेग-पुलिंग


M- मोहे अगले जन्म ब्लागर ही कीजो


N- नाइस


O- ऊंचे लोग, ऊंची पसंद


P- पोस्ट मेरी पढ़ी या नहीं


Q- क्वीन कौन, किंग कौन


R- रतजगों के आदि


S- सफ़ल ब्लागर कैसे बनूं


T- टिप्पणी के लिए कुछ भी करेगा


U- अपर हैंड हमेशा मेरा


V- वगैरहा-वगैरहा, मेरे से ज़्यादा पापुलर कैसे


W- वाह जनाब वाह (सबसे सेफ़ टिप्पणी)


X- एक्स-फैक्टर जिसने ब्लागिंग का पा लिया, वो तर गया


Y- यारी गद्दारी, साथ-साथ


Z- ज़ूम बराबर ज़ूम ब्लागर

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

सुशील जी, क्या आपने नवाब साहब का किस्सा नहीं सुना...खुशदीप




अजय कुमार झा जी कह रहे हैं कि हिंदी ब्लागरों और साहित्यकारों का पहला विश्वयुद्ध छिड़ने ही वाला है...ये पंक्ति पढ़कर मुझे शोले में धर्मेंद्र का कहा वो डायलाग याद आ गया जिसमें वो अमिताभ से पूछते हैं कि कुछ ज़्यादा तो नहीं कह गया पार्टनर...इस पर अमिताभ का जवाब होता है...अब कह ही दिया तो पार्टनर देख लेंगे...अब अजय भैया ने विश्व युद्ध में कूदने के लिए कह ही दिया है तो सोचने-समझने का सवाल ही कहां होता है...अब अपना अंदाज़ साहित्याना तो कभी नहीं रहा, हमेशा स्लागओवराना ही रहा है...इसलिए उसी शैली में बात कहता हूं...

भाई सुशील कुमार जी ने लंगोट कस कर एक पोस्ट से इस दंगल की शुरुआत की है...साहित्यकारों के सामने ब्लागरों को तुच्छ जीव साबित करने में सुशील जी ने कोई कसर नहीं छोड़ी...इधर ये पोस्ट टाइप कर ही रहा था कि सामने टीवी पर आ रहे कामेडी सर्कस पर नज़र पड़ गई...इसमें रऊफ़ लाला बता रहे हैं कि उन्होंने एक पठान को शेखर सुमन के बड़ा कलाकार होने के बारे में समझाना शुरू किया...इस पर पठान का जवाब था...ओेए कितना बड़ा कलाकार है, क्या पैरों में बारह नंबर का जूता पहनता है...कितना बड़ा कलाकार है, क्या छत पर लगे पंखे बिना स्टूल पर चढ़े खुद उतारता है...कितना बड़ा कलाकार है, क्या दुबई जाकर ऊंट की ज़मीन पर खड़े खड़े चुम्मी ले लेता है...अब ऐसे में वही पठान पूछने लगे कि ओए कितना बड़ा साहित्यकार है...तो क्या जवाब देंगे...

सुशील जी की साहित्य ही श्रेष्ठ की ग्रंथि से मुझे लखनऊ के एक नवाब साहब का किस्सा भी याद आ रहा है...

नवाब साहब को अपनी नवाबियत का बड़ा गुरूर था...काम तो कभी पुरखों ने नहीं किया तो नवाब साहब खैर क्या ही करते...लेकिन मुगालते की गाड़ी आखिर कब तक खिंचती...नवाब साहब के सारे कारिंदे जी-हुजूर, जी-हुजूर कर नवाब साहब का माल अंटी में लगाते गए और एक दिन नवाब साहब के सड़क पर आने की नौबत आ गई...नवाब साहब को भी थोड़ा इल्म हुआ...भईया अब तो कुछ हाथ-पैर चलाने ही पड़ेंगे नहीं तो फाकों की नौबत आ जाएगी...नवाब साहब लखनऊ में तो आन-बान-शान की खातिर कुछ कर नहीं सकते थे...अपने गांव पुरानी हवेली में आ गए...अब वहां नवाब साहब ने गांव के सारे बच्चों को इकट्ठा कर लिया और उनसे कहा कि चवन्नी-चवन्नी घर से लाओ, तुम्हे बायस्कोप दिखाऊंगा...बच्चे चवन्नी-चवन्नी ले आए....नवाब साहब ने पर्दे के पीछे जाकर शेरवानी उतारकर अपने मरगिले से डौले दिखा दिए...बच्चों ने घर जाकर शिकायत की कि नवाब ने उनसे पैसे लेकर ऐसी हरकत की ...ये सुनकर बच्चों के घरवाले लठ्ठ लेकर नवाब की हवेली पहुंच गए...नवाब को घेर कर बोले...अबे ओ नवाब की दुम, ये बच्चों को क्या उल्लू बना रहा है...इस पर नवाब का जवाब था...सालों...ये तो वक्त की ऐसी-तैसी हो रही है वरना चवन्नी-चवन्नी में कहीं नवाबी चीज़ें देखने को मिला करती थी...

अब इसके बाद कहने के लिए कुछ और बचता है क्या सुशील कुमार जी...

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

पुलिस जी, आओ ढोए तुम्हारी पालकी...खुशदीप



 


 
ये तस्वीरें आज़ादी से पहले ब्रिटिश हुकूमत की नहीं हैं ...ये तस्वीरें यूपी के रामपुर मिलक में 19 फरवरी को ली गईं...खाता नगरिया गांव का किसान शाबू खां गन्ना छीलने गया था...उसकी लाश दूसरे गांव के जंगल में मिली...तफ्तीश के लिए पुलिस पहुंची... लेकिन ये देखकर ठिठक गई कि दोनों गांवों के बीच एक नाले जैसी पतली नदी बहती है...गांव वालों का ये रोज़ का रास्ता बेशक हो लेकिन पुलिस वाले साहब भला कैसे पानी में पैर रखें...जूते-पैंट भीगने का डर...वहीं सवाल करने लगे तो मृतक के परिजनों ने घटनास्थल तक चलने का अनुरोध किया....कोतवाल बीडी शर्मा और एएसआई सुरेंद्र सिंह बराच की हिचक देखकर गांववालों ने इल्तज़ा की कि हमारे कंधों पर चलिए हुजूर...और दोनों साहब भी तैयार हो गए...कौन कहता है कि देश को आज़ाद हुए 64 साल हो गए....
 

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

खुशियां बरसतीं नहीं, ढूंढनी पड़ती हैं...खुशदीप


अगर कल आप ने जैसा सोचा था, वैसा नहीं बीता, कोई बात नहीं..


याद कीजिए आपकी नए सिरे से शुरुआत के लिए भगवान ने आज बनाया है...

ऊपर वाला उन्हीं के लिए श्रेष्ठ रखता है जो कर्म में कोई कसर नहीं छोड़ते और नतीजा ऊपर वाले पर ही छोड़ देते हैं...

जीवन में सब कुछ अस्थायी है...रात का अंधकार या दिन का उजाला..

सूर्योदय अस्थायी है...सूर्यास्त अस्थायी है...

अगर सब कुछ अच्छा हो रहा है तो उसका भरपूर आनंद लीजिए..ये समां हमेशा नहीं रहेगा...

अगर चीज़ें मनमुताबिक नहीं हो रही तो हौसला मत खोइए...शांति से वक्त को गुज़रने दें...क्योंकि ये मुश्किलें भी हमेशा नहीं रहेंगी...

वक्त कैसा भी हो बदलता है...

खर्चे ज़्यादा हो गए हों और तनख्वाह का दिन अब भी दूर हो...और तनख्वाह आ भी जाए और पूरी-सूरी ही पड़े तो सिर्फ एक चीज़ है जो आपको करनी चाहिए...और वो है...




हर हाल में खुद खुश रहिए, दूसरों के चेहरे पर भी मुस्कान लाइए..

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

बांग्लादेश के लिए वर्ल्ड कप के मायने...खुशदीप

ढाका का बंगबंधु नेशनल स्टेडियम...फुटबॉल के लिए मशहूर...लेकिन गुरुवार को यहां क्रिकेट का खुमार छाया था...दसवें विश्व कप क्रिकेट की ओपनिंग सेरेमनी...तीन करोड़ डॉलर का खर्च...आप कहेंगे कि बांग्लादेश जैसा देश चंद घंटे के जश्न पर इतना शाही खर्च बर्दाश्त कर सकता है क्या...तो जनाब दुनिया के लिए बेशक ये विश्व कप क्रिकेट का आगाज़ था लेकिन बांग्लादेश के लिए इसके कुछ और ही मायने थे...

रवींद्र नाथ टैगोर और काज़ी नजरूल इस्लाम की सांस्कृतिक विरासत वाली बंग भूमि के लिए 15 अगस्त 1947 वो दिन था जिस दिन भारत और पाकिस्तान के विभाजन के साथ ही बंगाल के भी दो टुकड़े हुए थे...एक हिस्सा पश्चिम बंगाल के तौर पर भारत को मिला....दूसरा हिस्सा ईस्ट पाकिस्तान के तौर पर पाकिस्तान को मिला...लेकिन बांग्ला संस्कृति से सराबोर ईस्ट पाकिस्तान कभी वेस्ट पाकिस्तान से खुद को नहीं जोड़ पाया...दोनों के बीच 1600 किलोमीटर की दूरी की तरह ही दोनों के दिल कभी नहीं मिल सके...बंगबंधु के नाम से मशहूर शेख मुज़ीबुर्रहमान ने पश्चिमी पाकिस्तान की चौधराहट का हमेशा जमकर विरोध किया...1970 में पाकिस्तान संसद का चुनाव जीतने के बाद भी बंगबंधु को पाकिस्तान की सत्ता नहीं सौंपी गई...उलटे जेल में डाल दिया गया...लेकिन 26 मार्च 1971 को शेख मुजीबुर्रहमान ने ईस्ट पाकिस्तान को बांग्लादेश के तौर पर आज़ाद देश घोषित कर दिया...साथ ही ऐलान कर दिया कि पाकिस्तान का आखिरी सैनिक जब तक बांग्लादेश की ज़मीन नहीं छोड़ देता, मुक्तिवाहिनी का संघर्ष जारी रहेगा...पाकिस्तान के जबरदस्त दमन के बावजूद बांग्लादेश की आज़ादी चाहने वालों ने हौसला नहीं छोड़ा...फिर 16 दिसंबर 1971 का दिन आया जब पाकिस्तान को भारतीय सेना की मदद से मुक्तिवाहिनी ने मात दी...

उस जीत के 39 साल दो महीने बाद बांग्लादेश को विश्व कप की ओपनिंग सेरेमनी के ज़रिए दुनिया को फिर कुछ बताने का मौका मिला...ये ऐलान करने का...बांग्लादेश भी तेज़ी से बदल रहा है...बांग्लादेश को अब इंतज़ार है 19 फरवरी को मीरपुर, ढाका के शेरेबांग्ला स्टेडियम में विश्व कप के पहले मैच में भारत के साथ भिड़ने का...

ढाका समेत पूरे बांग्लादेश में छाया क्रिकेट का क्रेज़ बताता है कि इस देश के लोग क्रिकेट के ग्लैमर के साथ जोश और जुनून के हर लम्हे को शिद्दत के साथ जीना चाहते हैं..डंके की चोट पर दुनिया के सामने ऐलान करना चाहते हैं कि बांग्लादेश को सिर्फ गरीबी, भूख, बाढ़, चक्रवात जैसे देश के तौर पर याद करना बंद कर दिया जाए...बांग्लादेश में आज हर बच्चे, बूढ़े, जवान ने अगर अपने स्टार क्रिकेटरों को सिर-आंखों पर बिठा रखा है तो इसी उम्मीद के साथ कि वो विश्व कप में देश के लिए कमाल कर के दिखाएंगे...यही सपनों सरीखा प्रदर्शन बांग्लादेश आर्थिक मोर्चे पर भी दुनिया को दिखाना चाहता है...नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस ग्रामीण बैंक के साथ मिलकर माइक्रोलोन के ज़रिए दिखा ही चुके हैं कि गांवों के गरीबों की तकदीर कैसे बदली जा सकती है...कभी जूट के निर्यात के लिए जाना जाने वाला बांग्लादेश आज रेडीमेड गारमेंट इंडस्ट्री के लिए पूरी दुनिया में धाक रखता है...हर साल तेरह अरब डॉलर से ज़्यादा कीमत के रेडीमेड का बांग्लादेश से निर्यात होता है...

जिस भारत ने बांग्लादेश के जन्म में हाथ बंटाया आज बांग्लादेश उसी भारत के साथ विश्व कप की मेज़बानी में हाथ बंटा रहा है...जिस शेख मुजीबुरर्हमान के सपने को भारत ने हक़ीक़त में बदला, उसी शेख मुजीबुर्रहमान की बेटी शेख हसीना ने प्रधानमंत्री के नाते विश्व कप का आगाज़ किया...अब बांग्लादेश क्रिकेट की चकाचौंध के ज़रिेए यही पैगाम देना चाहता है कि वो अंगड़ाई ले चुका है...इक्कीसवीं सदी में विकास की रफ्तार के साथ कदमताल करने के लिए...

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

कांग्रेस की मनमोहनी मजबूरी...खुशदीप

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मुद्दों पर बुधवार को ऐसा नया कुछ नहीं कहा जो पहले न कहा हो...सिवाय इसके कि गलतियां हर इनसान से होती हैं, और उनसे भी हुई हैं...लेकिन उन्हें जितना दोषी प्रोजेक्ट किया जा रहा है, उतने वो हैं नहीं...प्रधानमंत्री के कहने का निचोड़ यही था जो भी गलत हुआ वो उनकी जानकारी में नहीं था...और जैसे ही जानकारी में आया करेक्टिव थिरेपी शुरू कर दी गई...ये बयान सबूत है एक विशुद्ध अर्थशास्त्री के खांटी राजनेता में तब्दील होने का...राजनीतिक मिज़ाज न होने के बावजूद राजनीतिक रंग में रमने को मनमोहन सिंह उस छात्र से जोड़ते हैं जो ज़िंदगी के फलसफे को ताउम्र सीखने की कोशिश करता है...

मनमोहन घुमा फिरा कर या लच्छेदार कहावतों के साथ बोलने के आदि नहीं है...सपाट-सीधी शैली में जवाब देते हैं...उन्होंने ये भी कहा कि राजनीति में होने वाले हर अनुभव को वो रैलिश (आनंद लेना) कर रहे हैं...उनके हाथ में अधूरा एजेंडा है इसलिए उसे पूरा करने से पहले इस्तीफ़ा देने का सवाल ही नहीं होता...आखिर चौतरफ़ा दबाव के बावजूद प्रधानमंत्री इतने निश्चिंत क्यों हैं...इसके लिए आपको पहले देश की राजनीति की ज़मीनी हक़ीक़त को समझना होगा...

मनमोहन बात-बात में गठबंधन धर्म की मजबूरी का हवाला बेशक दे रहे हों लेकिन कांग्रेस की मजबूरियों को भी वो अच्छी तरह समझते हैं...मिस्टर क्लीन को पता है कि कांग्रेस के पास तत्काल ऐसा कोई बी-प्लान मौजूद नहीं है जो उनके प्रधानमंत्री की गद्दी छोड़ने के बाद देश की कमान संभाल सके...युवराज राहुल गांधी राज्याभिषेक के लिए अभी कितने तैयार हैं, इसका सबूत पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की भद्द पिटने से मिल ही चुका है...2004 में सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया था तो सोच यही होगी कि सत्ता की ताकत भी मुट्ठी में रहेगी और राहुल गांधी को भविष्य के नेता के तौर पर तैयार भी किया जा सकेगा...इस बीच कांग्रेस को ऐसी स्थिति में लाया जाए कि वो अकेले दम पर ही सरकार बना सके...जिससे राहुल गांधी को ताजपोशी के बाद गठबंधन-धर्म जैसी किसी दिक्कत का सामना न करना पड़े...लेकिन सोनिया गांधी भी ये बात अच्छी तरह जानती हैं कि देश में अकेले दम पर किसी पार्टी को केंद्र की सत्ता मिलना दूर की कौड़ी है...

10, जनपथ की नज़र से चिदंबरम और प्रणब मुखर्जी की प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश भी छुपी नहीं है...चिदंबरम गवर्मेंट डेफेसिट और एथिकल डेफेसिट जैसे जुमले उछाल कर अपनी ही सरकार को निशाने पर लेते हैं तो मंशा यही जताने की होती है कि प्रधानमंत्री की गद्दी के लिए वो खुद भी सशक्त दावेदार हैं...ऐसे में मनमोहन के हटने का मतलब कांग्रेस में अंदरूनी टकराव को और हवा देना होगा...इन हालात में कांग्रेस आलाकमान की कोशिश यही रहेगी कि गठबंधन की बैसाखियों पर जब तक सरकार चले, मनमोहन सिंह ही कांग्रेस का चेहरा बने रहें...मनमोहन के हटने की स्थिति में प्रांतीय सहयोगी दलों के नए सिरे से ध्रुवीकरण की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता...

जहां तक बीजेपी जैसे विरोधी दलों की मिस्टर क्लीन पर हल्ला बोलने की बात है तो ये पहला मौका नहीं है जब मनमोहन सिंह इस तरह के तूफ़ान को झेल रहे हैं...यूपीए की पहली पारी में न्यूक्लियर डील पर लेफ्ट के समर्थन वापस लेने के बाद मनमोहन सरकार के गिरने की नौबत तक आ गई थी...लेकिन प्रधानमंत्री डील को खुद की प्रतिष्ठा से जोड़कर अपने रुख पर अटल रहे थे...उस वक्त कांग्रेस के पॉलिटिकल मैनेजरों ने मुलायम और मायावती से सौदेबाज़ी कर बेशक सरकार बचाई लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में मनमोहन के भले और ईमानदार इनसान की छवि ने भी कांग्रेस की नैया पार लगाने में खासी भूमिका निभाई थी...मनमोहन और कांग्रेस दोनों ही जानते हैं कि बीजेपी और लेफ्ट कितना भी शोर क्यों न मचाए लेकिन जब तक कांग्रेस को यूपीए के सहयोगियो का समर्थन मिल रहा है मनमोहन सरकार का बाल-बांका नहीं हो सकता...मनमोहन अगर महंगाई की कीमत पर भी आर्थिक एजेंडे को बढ़ाने और विकास दर नौ फीसदी लाने पर अड़े हैं तो उसके पीछे देश की राजनीति का यही सच है....सोनिया और राहुल आम आदमी की दुहाई देते हुए वेलफेयर सेक्टर के लिए बेशक ज़्यादा से ज़्यादा सरकारी पैसा खर्चने की वकालत करें लेकिन मनमोहन सिंह के अंदर के इकोनॉमिस्ट का पूरा ज़ोर इन्फ्रास्ट्रक्चर को धार देने पर है...शायद इसीलिए वो कहते हैं...मुझे अपनी ज़िम्मेदारियों का अच्छी तरह एहसास है....

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

शौरी की शॉक-थिरेपी...खुशदीप

आज से करीब डेढ़ साल पहले 24 अगस्त 2009 को अरुण शौरी ने बीजेपी नेतृ्त्व के लिए हंप्टी-डंप्टी और एलिस इन ब्लंडरलैंड जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था...उस वक्त बीजेपी की कमान राजनाथ सिंह के हाथों में थी...अरुण शौरी ने बीजेपी में रहते हुए ही जिस तरह पार्टी नेतृत्व पर प्रहार किया था वैसा प्रहार तो बीजेपी के विरोधी दलों ने भी कभी नहीं किया...पत्रकारिता में धाक जमा कर राजनीति में आए शौरी शब्दों का इस्तेमाल करना अच्छी तरह जानते हैं...

पूर्व टेलीकॉम मंत्री रह चुके शौरी को अब 21 फरवरी को 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर सीबीआई के सामने बोलना है...सीबीआई इसके लिए उन्हें समन जारी कर चुकी है...ऐसे में बीजेपी परेशान है कि शौरी अब न जाने अपनी ज़ुबान से कौन से गोले छोड़ दें...बीजेपी को ये फिक्र इसलिए भी ज़्यादा है कि उसने भ्रष्टाचार को लेकर मिस्टर क्लीन (प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह) को घेरने की मुहिम के साथ जिस तरह का माहौल अब बनाया है, वैसा मौका उसे पहले कभी नहीं मिला था...2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला, इसरो- एस बैंड स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ घपला, आदर्श सोसायटी घोटाले के साथ महंगाई के मोर्चे पर सरकार की नाकामी ने अंदरूनी मतभेदों से कॉमा में चल रही बीजेपी को बैठे-बिठाए संजीवनी दिला दी...इससे बीजेपी के नेताओं के आपसी टकराव की ख़बरे भी नेपथ्य में चली गईं और बीजेपी फिर मुख्य विरोधी दल वाली फार्म में आ गई...

लेकिन शौरी जिस तरह के तेवर दिखा रहे हैं वो कांग्रेस से ज़्यादा बीजेपी की परेशानी बढ़ाने वाले हैं...शौरी की शॉक थिरेपी बीजेपी को भी ज़ोर के झटके ज़ोर से ही दे रही है...शौरी कहते हैं कि उन्होंने 2-जी स्पेक्ट्रम को लेकर पूर्व टेलीकॉम मंत्री ए राजा के कारनामों की जानकारी सबूतों के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बहुत पहले ही दे  दी थी, लेकिन प्रधानमंत्री ने समय रहते कोई कारगर कदम नहीं उठाया...शौरी अगर प्रधानमंत्री को ही घेरे में लेकर रुक जाते तो बीजेपी से ज़्यादा खुश और कौन हो सकता था...लेकिन शौरी ने लगे हाथ सुषमा स्वराज और अरुण जेटली को भी लपेटे में ले लिया...शौरी ने बेशक नाम दोनों नेताओं का नहीं लिया लेकिन शब्दों की बाज़ीगिरी से साफ कर दिया कि 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सुषमा स्वराज और जेटली ने सब कुछ जानते हुए भी सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख नहीं अपनाया...शौरी ने ये संकेत देने में भी कसर नहीं छोड़ी कि जेटली ने वकील होने के नाते कुछ मुवक्किलों की खातिर चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी...

शौरी के इन बाणों के जवाब में बीजेपी बस यही सफाई दे सकी कि अरुण जेटली ने 23 जुलाई 2009 को संसद में दिए अपने बयान में 2-जी स्पेक्ट्रम पर कंपनियों के खेल का हवाला देते हुए सरकार की खिंचाई की थी...बीजेपी अगर चाहे भी तो इस वक्त शौरी के खिलाफ मोर्चा नहीं खोल सकती...एक तो बीजेपी को सरकार पर हमला बोलने के लिए अपना घर एकजुट दिखाने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है...दूसरे बीजेपी अच्छी तरह जानती है कि शौरी एनडीए सरकार में वरिष्ठ मंत्री रहने की वजह से ऐसा बहुत कुछ भी जानते होंगे, जिसका खुलासा उन्होंने करना शुरू किया तो फजीहत बीजेपी की ही होगी...

बीजेपी भूली नहीं है कि शौरी ने किस तरह ये कहते हुए बीजेपी पर आत्मघाती गोल किया था कि उन्हें 2009 में बजट भाषण पर चर्चा में मुख्य वक्ता बनने से इसी अंदेशे में रोका गया था कि कहीं उनके किसी बयान से मुकेश अंबानी के हित न प्रभावित हो जाएं...तब अरुण शौरी की जगह एम वेंकैया नायडू को मुख्य वक्ता बनाया गया था...उस वक्त ऐसी चर्चाएं थीं कि अरुण शौरी समाजवादी पार्टी के सहारे राज्यसभा के लिए दोबारा चुने जा सकते हैं...बीजेपी को डर था कि शौरी ऐसा कुछ न बोल दें जो मुकेश अंबानी की जगह अनिल अंबानी को ज्यादा रास आए...खैर वो पुरानी बात हो गई...अब नया ये है कि अरुण शौरी टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले मे 21 फरवरी को सीबीआई के सामने क्या बोलते हैं...ये सुनने का इंतज़ार शायद अब सबसे ज़्यादा बीजेपी को ही होगा...

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

सादे शादी-ब्याह...क्यों न ब्लॉगर ही कोई पहल करें...खुशदीप


शादी तो एक बार ही होनी है...रोज़ रोज़ कोई ये दिन आना है...और फिर कमाते किस लिए हैं...सब इन बच्चों के लिए ही न...और फिर शादी-ब्याह तो वैसे भी बिरादरी में नाक का सवाल होता है...ये बातें विकास की रौशनी से दूर किसी इलाके में अनपढ़ लोग नहीं करते...ये सारे डॉयलाग शहरों में रहने वाले पढ़े लिखे लोगों के मुंह से अक्सर सुने जाते हैं...

माना आपको अपने बेटे-बेटी से बहुत प्यार है...उनके शादी-ब्याह में आप दिल के सारे अरमान निकाल लेना चाहते हैं...लेकिन बेतहाशा पैसा फूंक कर आप किस का भला करते हैं...बस चंद मेहमानों के मुंह से ये सुनने के लिए...वाह क्या बात है...क्या धूमधाम से शादी की है...अगर आपको बेटे-बेटी से इतना ही प्यार है तो आप उसे दूसरे तरीके से भी तो जता सकते हैं...शादी की चकाचौंध पर पैसा पानी की तरह बहाने से क्या ये बेहतर नहीं कि पैसा बच्चों के नाम फिक्सड डिपोज़िट करा दिया जाए...जिससे उनका भविष्य भी सुधर सके...

फिर क्या ये कहीं शास्त्रों में लिखा है कि रात में ही शादी का आयोजन होना चाहिए...क्या दिन में समारोह कर बिजली के खर्च को बचाया नहीं जा सकता...

क्या ये ज़रूरी नहीं कि शादी के वक्त सारा ध्यान पवित्र रिश्ते की सभी रस्मों को विधि-विधान से संपन्न कराने पर होना चाहिए...ये तभी संभव है जब आप मेहमानों की आवभगत की चिंता से दूर होकर पूरी निष्ठा से अपने कर्तव्यों का पालन करें...

मेरे विचार से तो सबसे अच्छा तरीका यही है कि जिस दिन शादी की मुख्य रस्म हो, उसमें घर के या बहुत ही खास लोग शरीक हो...और ये पूरा आयोजन सादगी लेकिन गरिमापूर्ण ढंग से कराया जाए...ऐसे में सारी रस्मों पर सभी घरवालों का पूरा ध्यान रहेगा...

शादी के बाद एक दिन सभी परिचितों को बुलाकर प्रीतिभोज कराया जाए...इस प्रीतिभोज में खाने के लिए आइटम बेशक दस से ज़्यादा न हो लेकिन सब हलवाई पर खड़े रहकर वैसे ही प्यार और देखरेख के साथ बनवाएं जैसा कि घर की रसोई में खाना बनवाया जाता है...(ऐसे में सोचिए बुज़ुर्ग कितने काम आ सकते हैं)

आपके घर में मंगलकार्य को एक और तरीके से हमेशा के लिए यादगार बनाया जा सकता है...बेटे या बेटी के सुखी विवाहित जीवन की कामना के लिए कुछ पैसा खर्च कर शहर के किसी वृद्धाश्रम, अनाथालय, स्पेशल बच्चों के होम, कुष्ठ आश्रम या गरीबों के इकट्ठा होने की किसी जगह पर जाकर खाना बंटवा दिया जाए...यकीन मानिएगा, इन लोगों के मुंह से आपके और आपके बच्चों के लिए इतनी दुआएं निकलेंगी कि जीवन भर साथ देंगी...

ये सारी पहल कहीं से तो होनी चाहिए न...आजकल दूल्हा-दुल्हन सब पढ़े लिखे होते हैं...अपना भला-बुरा सब समझते हैं...अगर वो खुद भी अपने माता-पिता को झूठी शान-ओ-शौकत से बचकर समझदारी से काम लेने के लिए दबाव डालें तो तस्वीर काफ़ी कुछ बदल सकती है...

चलिए ये तो सब हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम किस तरह से अपने बच्चों की शादी करना चाहते हैं...लेकिन इस मुद्दे पर सरकार भी बड़ी भूमिका निभा सकती है...सरकार शादियों के लिए नियम बांध सकती है...जैसे मेहमानों की निश्चित संख्या, खाने के लिए आइटम की निश्चित संख्या, बिजली की सजावट पर रोक...सरकार का डंडा होगा तो फिर हर कोई फिजूलखर्ची से बचेगा...साथ ही देखादेखी पैसा फूंकने की प्रवृत्ति पर भी लगाम लगेगी...ऐसे ही नियम पड़ोसी देश पाकिस्तान में लागू हैं...यही वजह है कि जब टेनिस स्टार सानिया मिर्जा की शादी पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेट कप्तान शोएब मलिक से हुई थी तो उनके रिसेप्शन में गिनती के मेहमानों को ही न्यौता दिया गया था...ये अलग बात है कि जिन्हें न्यौता मिला था, उन्हीं में से कुछ ने अपने इन्वीटेशन कार्ड मोटी कीमत वसूल कर दूसरे लोगों या पत्रकारों आदि को बेच दिए थे...

क्या हम सब ब्लॉगर सादे शादी-ब्याह पर कोई प्रण लेकर समाज को नया रास्ता नहीं दिखा सकते...

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

40 करोड़ भूखों के देश में शादी तीन करोड़ की...खुशदीप


इमेजिन टीवी पर एक नया शो शुरू होने जा रहा है- शादी तीन करोड़ की...इमेजिन के सीनियर डायरेक्टर (मार्केटिंग एंड कम्युनिकेशंस)  निखिल मधोक के मुताबिक इस रियलिटी शो के विजेता परिवार को घर में सपनों सरीखी शादी पर खर्च के लिेए चैनल की ओर से तीन करोड़ रुपये दिए जाएंगे...इस रियलिटी शो के रेडियो पर प्रोमो में बताया जा रहा है कि आपने बेटी की शादी के लिए कितना बचाया हुआ है...पांच लाख रुपये...प्रोविडेंट फंड वगैरहा से कितना और इकट्ठा कर लेंगे पांच लाख...और हाथ-पैर मारकर ज़मीन बेचकर पांच लाख और जोड़ लेंगे...यानि टोटल 15 लाख रुपये...चैनल फिर दावा करता है भूल जाइए ये सब, वो आपको देगा तीन करोड़ रुपये...

इस सीरियल के हमारे देश में क्या मायने है...इस पर भी पोस्ट में आगे आता हूं...लेकिन पहले आपको बताता हूं, एक शादी का किस्सा जिसमें मैं इसी सात फरवरी को शरीक हुआ...दिल्ली-गुड़गांव रोड पर फार्महाउस में शादी थी...ये नाम के फार्महाउस ही हैं...वरना दिल्ली के आलीशान फाइव स्टार होटलों को भी मात देते हैं...इन फार्महाउस तक पहुंचने का रास्ता नक्शे के ज़रिए शादी के कार्ड पर ही समझा दिया जाता है...अब यहां तक पहुंचना है तो आपके पास अपनी गाड़ी होना ज़रूरी है या आपको टैक्सी करनी पड़ेगी...नहीं तो कोई बाहर से इस शादी में शरीक होने के लिए आता है तो उसके लिए शादी में पहुंचना और वहां से आधी रात को वापस आना और भी टेढ़ी खीर साबित हो जाता है...लेकिन फार्महाउस में शादी को आजकल प्रैस्टीज से जोड़कर माना जाता है...

जिस शादी में मैं गया वहां राजस्थान के थीम पर राजे-रजवाड़ों की तरह पंडाल सजे हुए थे...सब कुछ ओपन में था...लेकिन उसी रात ओलों के साथ इतनी तेज़ बारिश हुई कि सब पंडाल धुल गए...गार्डन भी पानी-पानी हो गया...बारिश रुकने के बाद आनन-फ़ानन में सब कुछ ठीक किया गया...लेकिन लड़की वालों के चेहरे पर चिंता की लकीरें तो आ ही गईं थी...खैर बारात आई और सब कुछ ठीक-ठाक संपन्न हो गया...

लेकिन अब आता हूं मैं असल बात पर, शादी में खाने के लिए इतना कुछ था, इतना कुछ था कि किसी के लिए उसे गिनाना भी आसमान पर तारे गिनने के समान हो...एक बानगी देता हूं...खाने के बाद मीठे के लिए ही कम से कम 25 आइटम होंगी...रबड़ी-जलेबी, रसमलाई, गाजर हलवा, अंजीर हलवा, गुलकंद हलवा, ड्राई फ्रूट खीर, कुल्फी, आइसक्रीम, शाही टुकड़ी, मालपुआ, चॉकलेट्स स्टाल, चाकोलावा केक और भी पता नहीं क्या...अब इससे पहले स्नैक्स और खाने में क्या क्या होगा आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं...ये सब वाच कर ही रहा था कि फिर मैंने देखा कि वहां टोटल मेहमान कितने होंगे...बारात में तीस-चालीस आदमी और लड़की वालों की तरफ से 100-110...मुझे किसी से पता चला कि सिर्फ खाने-खाने का कॉन्ट्रेक्ट ही बीस लाख रुपये से ऊपर हुआ है...यानि एक-एक मेहमान पर दस हज़ार रुपये से ज़्यादा खाने-खाने पर ही खर्च...

मैं ये सब देख देख कर यही सोच रहा था कि ये जश्न है या अपराध...इतने मेहमानों ने कितना खाना खा लिया होगा...वेटर्स ज़रूर पंडाल के पीछे जमकर पेट-पूजा कर रहे थे...केटरर मुनाफ़ाखोर होगा तो यही खाना उसकी चेन के ज़रिए अगले दिन दूसरे-शादी समारोहों में भी पहुंच गया हो तो कोई बड़ी बात नहीं...

लेकिन मेरे लिए एक और चिंता वाली बात ये थी कि वहां सभी मेहमानों के मुंह पर यही था कि भई बहुत तगड़ी शादी की है...ज़्यादातर बिजनेसमैन ही वहां थे...अब उनमें ये भावना भी ज़रूर जगी होगी कि अपने बेटे-बेटी की शादी इससे भी बढ़ कर करेंगे...अब जिसके पास पैसा है वो तो ये सब कर सकता है...लेकिन जिसके पास इतना नहीं है, वो भी कर्ज लेकर ये सब करने की सोचने लगता है...लेकिन कभी किसी ने ठंडे दिमाग से सोचा है कि चंद घंटों के जश्न पर पानी की तरह पैसा बहाने से आखिर किसका भला होगा...वो भी उस देश में जहां चालीस करोड़ से ज़्यादा लोग रोज़ आधा पेट भरे ही सोते हैं...

ऊपर से इमेजिन का नया रियलिटी शो...शादी तीन करोड़ की...आखिर लोगों में ये कौन सा संदेश देना चाहते हैं...जिनके पास पैसा नहीं है या पूरा-सूरा ही पैसा है, क्या ये शो उन लोगों में हीन-भावना या कुंठा भरना चाहते हैं...यही है वो फर्क जो इंडिया को भारत से अलग करता है...अगर इंडिया भारत के लिए संवेदनशील नहीं होगा तो एक दिन ऐसा भी आएगा कि अंजाम इंडिया को भी भुगतना ही पड़ेगा...

चलिए अब हम ब्लॉगवुड में ही विचार करते हैं कि क्या शादियों के नाम पर पैसे का ये निर्लज्ज नाच हमारे देश में सही है...फिर शादियां किस तरह की जानी चाहिएं...आप सब भी अपने विचार दें...मैं अपनी राय को जोड़ कर कल निष्कर्ष के साथ इस कड़ी को विराम दूंगा...





शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

पैदा होते ही बेटियों को मार देना चाहिए...खुशदीप



पैदा होते ही बेटियों को मार देना चाहिए...ये बयान उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की पत्नी सलमा अंसारी ने दिया है...अब इस बयान के बाद ज़रा गौर फरमाइए कल यानि ग्यारह फरवरी को देश के अलग-अलग शहरों में घटी चार घटनाओं पर...

दिल्ली

देश के दिल माने जाने वाली दिल्ली के सेंटर-पाइंट नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर दिन चढ़ते ही 22-23 साल की लड़की की लाश एक बैग से मिली...एक चश्मदीद के मुताबिक एक पुरुष और एक महिला ऑटो से आए और बैग को वहां छोड़कर चले गए...चश्मदीद ने यही समझा कि शायद वो बैग भूल गए...लेकिन थोड़ी देर में ही बैग से ख़ून निकलना शुरू हो गया तो सबका माथा ठनका...पुलिस ने आकर बैग खोला तो देखने वाले सभी सन्न रह गए...

ग्रेटर नोएडा


दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा में एक युवती से बलात्कार की कोशिश की गई...नाकाम रहने पर युवती को ज़हर की गोलियां दे दी गईं...युवती अब अस्पताल में ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रही है...

जबलपुर

जबलपुर में एक नाबालिग लड़की से बलात्कार की कोशिश में नाकाम रहने पर उसको आग लगा दी गई...

लखनऊ

लखनऊ में एक सिरफिरे आशिक ने इकतरफ़ा प्रेम में नाकाम रहने पर लड़की को गोली मार कर उसकी जान ले ली...बाद में खुद को भी गोली मार ली...अब लड़के का अस्पताल में इलाज चल रहा है...सबसे ज़्यादा दुखद ये है कि लड़का सिर्फ बारहवीं क्लास का छात्र है...

अब आप क्या कहेंगे कि सलमा अंसारी ठीक कह रही हैं या गलत...या फिर हमारा समाज, हमारा सिस्टम सब नकारा है जो विकसित देश होने के तमाम दावे करे लेकिन मानसिकता में अब भी मध्ययुगीन काल में जी रहा है...ये सही है कि पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती...बेटियों को माथे का गौरव मानने वालों की भी कमी नहीं...लेकिन हमारे देश में एक जगह भी किसी लाडली के साथ एक भी ऐसी घटना होती है तो शर्म से माथा हम सभी का झुक जाना चाहिए...

लीजिए सुनिए नारी-शक्ति पर ये गीत...


शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

आरुषि जिसे आप नहीं जानते...खुशदीप

आरुषि यानि सूरज के उगने से ठीक पहले आकाश की लालिमा...ऐलान करती अंधेरे के छटने का और उजाले के छाने का...क्या आरुषि के लिए इनसाफ़ की कहानी में भी ऐसा होगा...


आरुषि तलवार को नज़दीक से कोई जानते थे तो वो नोएडा के डीपीएस स्कूल में उसके क्लासमेट ही थे...आरुषि के चरित्र को लेकर यूपी पुलिस के ज़रिए पहली बार जो कहानी सामने आई थी उसे आरुषि के स्कूल के दोस्तों ने पहले दिन ही नकार दिया था...वो अच्छी तरह जानते थे कि सभी को ज़िंदादिली का संदेश देने वाली उनकी आरुषि कभी ऐसा काम नहीं कर सकती थी जो उसके आत्मसम्मान को कचोटे...यही वजह है कि आरुषि को लेकर जब तरह तरह की बातें फैल रही थीं तो उसके स्कूल के दोस्त एक बगीचे का नाम आरुषि पर रखने की सोच रहे थे...

आरुषि का सबसे बड़ा शौक था जैज़ डांस...आरुषि कभी भी स्कूल के गलियारों में पैरों के अंगूठों पर 360 डिग्री के एंगल पर स्पिन करती देखी जा सकती थी...दोस्तों को भी बैले का ये स्टेप सिखाना आरुषि को बड़ा अच्छा लगता था...नौंवी क्लास में पढ़ने वाली सबसे पॉपुलर स्टूडेंट्स में से एक आरुषि ब्लेज़र स्कॉलर भी रही यानि तीन साल उसने लगातार पढ़ाई में अस्सी-नब्बे फीसदी से ज़्यादा मार्क्स लिए...वो आरुषि जिसे आम बच्चों की तरह ही टीचर्स और कपड़ों के बारे में गॉसिप करना बड़ा अच्छा लगता था...वो आरुषि जिसे अपने अच्छे-बुरे की पूरी समझ थी...खुशहाल परिवार की आरुषि आम बच्चों की तरह ही कैमरे, आधुनिक मोबाइल और छुट्टियों में बाहर घूमने जाने जैसी फरमाइशें घरवालों से किया करती थी..


तलवार दंपती ने दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में पांच साल तक चले फर्टिलिटी ट्रीटमेंट के बाद इकलौती संतान के तौर पर आरुषि को पाया था...साउथ दिल्ली में 24 मई 1993 को जन्मी आरुषि की अच्छी तरह परवरिश हो सके, इसीलिए दिल्ली के हौज़खास से नोएडा के जलवायु विहार (सेक्टर 25) में आकर रहने का फैसला किया..इसकी सबसे बड़ी वजह आरुषि की नानी लता वहीं पास में रहती थीं और तलवार दंपती के काम पर रहने के दौरान आरुषि की देखभाल कर सकती थीं...आरुषि को स्कूल के लिए ज़्यादा दूर नहीं जाना पड़े इसलिए डेढ़ किलोमीटर के फासले पर ही दिल्ली पब्लिक स्कूल में उसका एडमिशन कराया गया...

आरुषि के दुनिया से दूर जाने की असल वजह पर बेशक अभी कुहासा छाया है लेकिन आरुषि के स्कूल के दोस्तों को विश्वास है कि एक न एक दिन ये छटेगा ज़रूर...और उस दिन आरुषि तारा बनकर आसमान में जहां भी होगी अपने दोस्तों को खास स्माइल ज़रूर देगी...पैरों के अंगूठे पर स्पिन करती हुई...

मेरी ओर से आरुषि को समर्पित ये गीत सुनिए...

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

धर्म को ब्लॉगिंग में मिलेगा अब नया आयाम...खुशदीप

विगत 4 फरवरी को समीर लाल जी के कनाडा लौटने से पहले दिल्ली में उनसे मिलने के लिए कनॉट प्लेस में कई ब्लॉगर जुटे थे...लेकिन मेरे साथ वहां एक ऐसे शख्स भी थे जिन्होंने तब तक ब्लॉगिंग शुरू नहीं की थी...उनका नाम है राकेश कुमार जी...मुझे पिछले कई साल से उन्हें नज़दीक से जानने का मौका मिला है...


कनॉट प्लेस बैठक में राकेश कुमार जी (सबसे बाएं) अविनाश वाचस्पति, गीताश्री और मेरे साथ

उनके विचारों से तो आप उनके ब्लॉग से परिचित हो ही जाएंगे...लेकिन उससे पहले मैं ये कहना चाहूंगा कि वो इनसान भी बेजोड़ हैं...दूसरों के दर्द में उनका दिल हमेशा धड़कता है...मैं कई दिनों से प्रयास में था कि अगर राकेश जी ब्लॉगिंग शुरू कर दें तो निश्चित रूप से ब्लॉग जगत को उनसे बहुत कुछ मिलेगा...दुनिया को अच्छी तरह समझने की ये राकेश जी की उत्कंठा ही है कि आपने पहले रूड़की के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कालेज में बड़े अच्छे नंबरों के साथ डिग्री ली, फिर लॉ किया...भारत के जितने महापुरुष हुए है राकेश जी ने उनके दर्शन को समझा है...अब इसी खज़ाने को वो हमारे साथ बांटेंगे...

राकेश जी की धर्म के विषयों पर ज़बरदस्त पकड़ है...लेकिन ये धर्म वो धर्म है जो लोगों को आपस में जोड़ता है...दूसरे धर्म को मानने वालों का सम्मान करना जानता है...अब मैं ज़्यादा देर तक राकेश कुमार जी और आपके बीच नहीं आता...ये रहा लिंक उनकी पहली पोस्ट का...

ब्लॉग जगत में मेरा पदार्पण

आप मेरी इस पोस्ट पर टिप्पणी करें या न करें लेकिन राकेश जी के ब्लॉग पर जाकर ज़रूर अपनी राय व्यक्त करिएगा...मेरा विश्वास रखिए राकेश जी को पढ़ने के बाद आपको कभी मायूस नहीं होना पड़ेगा...ये मेरी गारंटी है....





मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

लो फिर वसंत आई...खुशदीप

वसंत पंचमी पर बस आज मलिका पुखराज और उनकी बेटी ताहिरा सैयद की पुरकश आवाज़ में खो जाइए, मेरी तरह...यकीन नहीं आता तो सुनिए, वसंत का जादू आपके भी सिर चढ़ कर बोलेगा...





रविवार, 6 फ़रवरी 2011

ब्लॉगर मिले, तस्वीरों की भी एक ज़ुबान होती है...खुशदीप

ये कोई मीट-वीट नहीं थी...समीर जी से मिलने का बस बहाना था...लेकिन जो मौका-ए-दस्तूर था, वहां सीमित जगह और व्यवस्था का कसूर था कि चाह कर भी हर किसी को न बुला पाने के लिए मेजबान मंडल मजबूर था...खैर छोड़िए, लीजिए सुनिए...मौके की कहानी, राजीव कुमार तनेजा के चित्रों की ज़ुबानी...कैप्शन मेरे हैं...

आवाज़ दो हम एक हैं, हम एक हैं...

ट्रेन मिस न होने का मिस्टर हैंडसम के चेहरे पर गौरव- शाहनवाज़, महफूज़, खुशदीप




क्या मसला कुछ सीरियस है भाई- राकेश जी (जल्द ही ब्लॉगिंग में धमाकेदार एंट्री करने वाले हैं), अविनाश वाचस्पति, अजय कुमार झा, समीर लाल जी, शाहनवाज़, महफूज़, कार्टूनिस्ट इरफ़ान, खुशदीप





राजीव तनेजा भाई और मेरी खूब शिकायतें आपस में हुईं- खुशदीप, विम्मी (श्रीमति खुशदीप), संजू तनेजां (श्रीमति राजीव तनेजा)




एक इतिहासकार, दूसरा ब्लॉगरों को जोड़ने वाला बंजारा- रवींद्र प्रभात और अविनाश वाचस्पति


ताकत वतन की ब्लॉगिंग से है- रवींद्र प्रभात के नारे को गौर से सुनते इरफ़ान और राजीव तनेजा




गुरु शिष्य का दुर्लभ आई कॉन्टेक्ट...गवाह हैं- शाहनवाज़, महफूज़, इरफ़़ान, विम्मी खुशदीप



दो लखनऊओं के बीच फंसी दिल्ली...रवींद्र प्रभात, अविनाश वाचस्पति, महफूज़ अली


बैकस्टेज से मेज़बानी धर्म का निष्ठा से पालन करतीं गीताश्री...मेहमानी का आनंद उठाते शाहनवाज़, महफूज़, खुशदीप


कह दिया तो कह दिया महफूज़ से हैंडसम और कोई नहीं...राकेश जी, अविनाश वाचस्पति, गीताश्री, खुशदीप


चेहरे पर सफल आयोजन की खुशी...प्रतिभा के साथ सर्जना शर्मा


अब ये भी बता तो भाई प्लेट के नीचे क्या है...साधना भाभी के साथ समीर लाल जी



इतनी भागदौड़ के लिए ग्लूकोज़ लेना ज़रूरी है...सर्जना शर्मा और पत्रकारिता के कीर्ति-स्तंभ वीरेंद्र सैंगर जी




अरे भई मेरी फोटू-वोटू भी कोई लेगा या नहीं या मैं ही सबको शूट करता रहूंगा...राजीव कुमार तनेजा की सोलो परफॉरमेंस



यार के हंसते ही महफ़िल पर हंसी छा गई, छा गई...कार्टूनिस्ट इरफ़ान, राजीव कुमार तनेजा, सतीश सक्सेना जी





ये सनसिल्क का कमाल है...संजू तनेजा और प्रतिभा कुशवाहा



होठों को कर के गोल, सीटी बजा के बोल, के भईया आल इज़ वैल, के भईया आल इज़ वैल...संजू तनेजा, विम्मी खुशदीप, वंदना गुप्ता



दिनकर जी, मकान खाली करो कि वो कब्ज़ा जमाने आते हैं...खुशदीप



सदियों की ठंडी बुझी राख़ सुगबुगा उठी,


मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है,


दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,


सिंहासन खाली करो कि जनता आती है...

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की ये रचना कालजयी है...लेकिन अब काल ऐसा आया है जो दिनकर जी की आत्मा को भी चोट पहुंचाने से नहीं बख्श रहा...पटना के आर्य कुमार रोड पर दिनकर जी का घर है...अब इस घर में दिनकर जी की 80 वर्षीय पुत्रवधू हेमंत देवी रहती हैं...हेमंत देवी का आरोप है कि बिहार के उपमुख्यमंत्री और बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी का चचेरा भाई महेश मोदी दिनकर जी के मकान को हड़पना चाहता है...


हेमंत देवी के मुताबिक महेश मोदी किराएदार के तौर पर घर के ग्राउंड फ्लोर पर दवाओं की दुकान चलाता है...दस महीने पहले किराए की लीज़ खत्म हो जाने के बावजूद महेश मोदी दुकान खाली नहीं कर रहा...उलटे ज़ोर ज़बरदस्ती से पूरे घर पर कब्ज़ा करना चाहता है...महेश मोदी के साथ किराए की लीज़ तीन साल की थी जो पिछले साल 30 अप्रैल को खत्म हो गई...लेकिन महेश मोदी जगह खाली करने का नाम ही नहीं ले रहा...

हेमंत देवी अपने बेटे अरविंद कुमार सिंह के साथ पिछले सोमवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनता दरबार में फरियाद लगाने भी गईं लेकिन उन्हें बैरंग लौटा दिया गया...हेमंत देवी के मुताबिक उनसे कहा गया कि जनता दरबार इस तरह की शिकायतों के लिए सही मंच नहीं है...क्योंकि यहां सिर्फ जनता दल यूनाइटेड और बीजेपी के कार्यकर्ताओं की ही बात सुनी जाती है...उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी से मिलकर बात करने का भी हेमंत देवी को मौका नहीं मिल सका...न ही पुलिस इस मामले में दखल देने को तैयार है...

हेमंत देवी कहती हैं कि उनके ससुर दिनकर जी राष्ट्रकवि ज़रूर थे लेकिन उनके अपने ही राज्य में उनकी धरोहर के लिए कोई सम्मान नहीं है...दिनकर जी के इस घर की व्यथा पर नीतीश कुमार-सुशील कुमार मोदी बेशक मौन हो लेकिन लालू यादव का राष्ट्रीय जनता दल ज़रूर इस मुद्दे को सियासी रंग देना चाहता है...आरजेडी के बिहार प्रमुख अब्दुल बारी सि्ददीकी ने बृहस्पतिवार को दिनकर जी के घर जाकर हेमंत देवी से सारा हाल जाना...सि्ददीकी ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर दिनकर जी और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के करीबी रिश्तों का हवाला दिया है...साथ ही न्याय के लिए दिनकर जी के परिजनों के दर-दर भटकने का ज़िक्र भी किया है...सिद्दीकी के मुताबिक कुछ अर्सा पहले प्रख्यात विष्णु प्रभाकर जी के मकान पर भी अवैध कब्ज़ा कर लिया गया था जिसे दिल्ली सरकार ने सख्त कार्रवाई कर खाली कराया...लेकिन बिहार में दिनकर जी के मकान को लेकर ऐसी कोई कार्रवाई राज्य सरकार नहीं कर रही है...उलटे जगह खाली न करने वाले महेश मोदी का कहना है कि उसकी जानकारी के मुताबित दिनकर जी के परिवार को किराया मिल रहा है...

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है की गर्जना करने वाले राष्ट्रकवि के साथ खुद भी कभी ऐसा होगा, क्या उन्होंने जीते-जी कभी ये सोचा होगा...कदम कदम पर नैतिकता की दुहाई देने वाली पार्टी बीजेपी ऐसे मुद्दों पर मुंह क्यों सिल लेती है...

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

ओ तुझको चलना होगा...खुशदीप

एक लड़की अपने पिता के साथ कार ड्राइव कर रही थी...
रास्ते में आंधी-तूफ़ान आ गया...लड़की ने पिता से पूछा...क्या करना चाहिए...
पिता का जवाब था...ड्राइव करती रहो...
इस बीच और कारें हाइवे के साइड में होकर खड़ी होने लगीं...
तूफ़ान और तेज़ होता जा रहा था...बेटी ने फिर पूछा...अब क्या करूं...
पिता ने फिर कहा...गाड़ी ड्राइव करती रहो...
कुछ आगे बढ़ने पर लड़की ने देखा, बड़े ट्रक-ट्रेलर भी साइड में खड़े होते जा रहे हैं...
बेटी ने पिता से कहा...मुझे अब साइड में रुक ही जाना चाहिए...हर कोई यही कर रहा है...मुझे आगे कुछ भी साफ़ नहीं दिख रहा...
पिता ने फिर बेटी से कहा...धैर्य रखो और आगे बढ़ती रहो...
तूफ़ान की रफ्तार अब चरम पर थी लेकिन लड़की कार ड्राइव करती रही...
थोड़ी देर बाद लड़की को हाइवे पर आगे साफ़ नज़र आने लगा...
कुछ किलोमीटर चलने के बाद तूफ़ान पूरी तरह शांत हो चुका था...सूरज भी निकल आया था...
सब कुछ सामान्य...
पिता ने कहा...अब तुम गाड़ी साइड में रोक कर बाहर निकल सकती हो...
लड़की...लेकिन अब क्यों...
पिता...जब तुम बाहर निकलोगी तो पीछे मुड़ कर उन लोगों को देखना जिन्होंने चलना छोड़ दिया...वो अब भी तूफ़ान में फंसे हुए हैं...तुमने चलना नहीं छोड़ा...और आखिर में तूफ़ान से पार पा लिया...


स्लॉग चिंतन

जब हालात विपरीत हो, और सब हौसला छो़ड़ रहे हों तो देखादेखी खुद भी हार नहीं मान लेनी चाहिए...अगर आप कोशिश करते रहेंगे तो आप एक वक्त में तूफ़ान से ही पार पा लेंगे और सूरज आपके जीवन में फिर चमकने लगेगा...


लेखक- अज्ञात
(ई-मेल से अनुवाद)

स्लॉग गीत
मैं जब भी खुद को डाउन समझता हूं...ये गाना सुन लेता हूं...मुझमें फिर उठने का जोश आ जाता है...



शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

व्हाट एन आइडिया सर जी...खुशदीप

इस पोस्ट का संदेश शायद आप तक पहले भी ई-मेल, एसएमएस या किसी अन्य माध्यम से पहुंच चुका होगा...लेकिन जिन तक नहीं पहुंचा, उन्हें भी इसके बारे में अवश्य पता होना चाहिए...

मोबाइल आज हम सबकी ज़िंदगी का अभिन्न अंग बन गया है...ऐसा कोई ब्लॉगर शायद ही मिले जो मोबाइल का इस्तेमाल न करता हो...सेलफोन में तमाम नाम और नंबर भरे रहते हैं...लेकिन सेलफोन के मालिक के सिवा दूसरा कोई नहीं जानता कि कौन से नंबर हमारे घर के सदस्यों या बेहद करीबी लोगों के हैं...

ऊपर वाला किसी के साथ न करें लेकिन मान लीजिए हमारे साथ सड़क पर कोई हादसा होता है या हम अचानक बीमार हो जाते हैं, और कुछ बताने की स्थिति में नहीं होते...ऐसे में अनजान लोग हमारी मदद के लिए आगे भी आते हैं और उनके हाथ हमारा सेल-फोन लग भी जाता है तो वो कैसे पता चलाए कि हमारे घर वालों या करीबी लोगों के नंबर कौन से हैं...सैकड़ों नंबरों में कौन सा नंबर है जिस पर एमरजेंसी की स्थिति में संपर्क किया जा सकता है...इसीलिए 'ICE' ( In Case Of Emergency) कैम्पेन छेड़ा गया है...थोड़े वक्त में ही इस कैम्पेन ने अच्छी पकड़ बना ली है...एमरजेंसी में कॉल करने के लिए आपको बस इतना करना है कि जो भी आपके नज़दीकी लोग हैं, उनके नंबर 'ICE' नाम के तहत भी सेव कर लेने हैं...

ये आइडिया एक पैरामेडिकल स्टाफ के दिमाग की उपज है...वो जब एक्सीड़ेंट साइट पर पहुंचता था, तो यही दिक्कत आती थी कि पीड़ित के पास सेलफोन होने के बावजूद कौन से नंबर पर सबसे पहले संपर्क करे...इसी दिक्कत को दूर करने के लिए उसने सोचा क्यों न एक खास नाम को चुनकर सभी मोबाइल धारकों के लिए कैम्पेन चलाया जाए...अगर एक से ज्यादा एमरजेंसी कॉन्टेक्ट नंबर देना चाहते हैं तो उन्हें ICE1, ICE2 और ICE3 नामों से स्टोर किया जा सकता है...ये कैम्पेन लेबनान से शुरू होकर यूरोप और उत्तर अमेरिका के कई देशों में हिट हो चुका है...

वाकई ये आइडिया हट कर है और इसमें आपके दो-चार मिनट के सिवा और कुछ लगना भी नहीं है...आज से ही हम मोबाइल पर ICE नंबर स्टोर करने के साथ इस मुहिम को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश करें...ये अपनी हिफ़ाज़त के लिए अच्छा कदम है...ये उन्हें भी आपकी सिक्योरिटी का एहसास कराता है जो आपको चाहते हैं......याद रखिए घरवालों को आपके लौटने का हमेशा इतंज़ार रहता है...

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

मिस्र के संदेश को भारत समेत दुनिया समझे...खुशदीप

ये पोस्ट जिस वक्त लिख रहा हूं, बीबीसी न्यूज़ से मिल रही ख़बरों के मुताबिक काहिरा की सड़कों पर ज़बरदस्त संघर्ष चल रहा है...मिस्र के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक के समर्थक बदलाव की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों को तहरीर स्क्वॉयर से ज़बरदस्ती खदेड़ने पर तुले हैं...प्रदर्शनकारी भी करो या मरो की तर्ज पर डटे हुए हैं...दोनों तरफ़ से भारी पत्थरबाज़ी चल रही है...स्थानीय डॉक्टर से मिली रिपोर्ट के मुताबिक ताज़ा संघर्ष में कम से कम तीन लोगों की मौत की ख़बर है...बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए हैं...

प्रदर्शनकारियों की आवाज़ को दबाने के लिए 82 साल के हुस्नी मुबारक ने समर्थकों के ज़रिए दमन का रास्ता चुना है...फौज को जानबूझकर पीछे रखा जा रहा है...तीस साल से मिस्र पर निरकुंश राज कर रहे पूर्व सैनिक कमांडर मुबारक ने फौज में बगावत की संभावना को टालने के लिए आदेश जारी कर दिए हैं कि अगर कोई सैनिक अफसर विद्रोह करता है तो उसे बिना वक्त गंवाए गोली मार दी जाए...मुबारक का इरादा साफ़ है कि वो प्रदर्शनकारियों की ओर से की जा रही देश छोड़ने की मांग को फिलहाल हर्गिज कबूल नहीं करेंगे...कल अपने संबोधन में मुबारक ने ये तो कहा कि वो सितंबर में अगला राष्ट्रपति का चुनाव नहीं लड़ेंगे...लेकिन साथ ही ये भी साफ कर दिया कि मिस्र में जो भी बदलाव होगा, उसकी स्क्रिप्ट वो ही लिखेंगे...

दरअसल ये शब्द मुबारक के ज़रूर हैं, लेकिन उनके पीछे ताकत व्हाईट हाउस की है...जास्मिन क्रांति के ज़रिए ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति का हश्र देखने के बाद भी मुबारक सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं हैं...मिलियन मैन मार्च के बावजूद मुबारक विचलित नहीं है...मुबारक जानते हैं कि मिस्र के संकट को अमेरिका अपनी विदेश नीति का संकट मान रहा है...पिछले तीन दशकों में मध्य पूर्व में मुबारक को अमेरिका अपना सबसे विश्वसनीय मोहरा मानता रहा है...इस्राइल अकेले ही अरब वर्ल्ड से भिड़ा रहता है तो इस दम के पीछे मुबारक जैसे अमेरिकी एजेंटों से सहयोग मिलना भी बड़ी वजह है...

मिस्र के सत्ता पटल से मुबारक एक झटके से अलग होते हैं तो ये मध्य पूर्व में अमेरिकी हितों के लिए भी करारा झटका होगा...कहने को लोकतंत्र के नाम पर अमेरिका ज़रूर लिप सर्विस कर रहा है कि मुबारक को सत्ता में बदलाव की प्रकिया के लिए कदम उठाना शुरू करना चाहिए...लेकिन वो सीधे तौर पर मुबारक से हटने के लिए नहीं कह रहा...मिस्र के प्रदर्शनकारियों की नाराज़गी की एक बड़ी वजह मुबारक की अमेरिकापरस्ती भी है...समूचे अरब वर्ल्ड की तरह मिस्र भी अमेरिका की तेल की ज़रूरत का एक साधन है...पिछले तीन दशकों में मिस्र के लोगों में भूख, गरीबी और बेरोज़गारी बढ़ी है...लेकिन मुबारक के रिश्तेदार और करीबी अमीर से अमीर होते गए...मुबारक के घर वाले पहले ही अटैचियों में दौलत भर-भर कर दुबई में अपने ठिकानों पर पहुंचाते रहे हैं...काहिरा के जिस हेलियोपोलिस इलाके में मुबारक का महल है, या उनके करीबियों के घर हैं, वो जन्नत से कम नज़र नहीं आता...काहिरा के दूसरे इलाकों से अलग हेलियोपोलिस दुनिया के विकसित से विकसित रिहाइशी इलाकों को होड़ देता नज़र आता है...


कहते हैं कि पाप का घड़ा कभी तो भरता ही है...मिस्र से भी प्रदर्शनकारी पूरी दुनिया के लिए यही संदेश दे रहे हैं...अब वो मुबारक और उनकी चौकड़ी की लूट को बर्दाश्त नहीं करेंगे...अमेरिका को भी वो यही संदेश दे रहे हैं कि वो मिस्र के लोगों का वाकई भला चाहता है तो लोकतंत्र का झूठा रोना छोड़कर मुबारक को मिस्र से बोरिया-बिस्तर बांधने के लिए कहे...अमेरिका स्टैंडबाई प्लैन के तहत मिस्र की गुप्तचर एंजेसी के प्रमुख रह चुके उमर सुलेमान को मिस्र के नए शासक के तौर पर देखना चाहता है...उमर सुलेमान को मुबारक ने ही अभी उपराष्ट्रपति बनाया है..सुलेमान से ही फिलहाल मिस्र की सेना आदेश ले रही है...एक रणनीति के तहत ही सेना प्रदर्शनकारियों को घर लौटने के लिए कह रही है....यहां ये भी बताना ज़रूरी है कि मिस्र की सेना को हर साल अमेरिका से डेढ़ अरब डॉलर की सैनिक सहायता मिलती है...इसलिए मिस्र की सेना एकदम से अमेरिकी हितों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती...अमेरिका का गेमप्लान यही है कि फिलहाल किसी तरह प्रदर्शनकारियों को समझाबुझा कर सितंबर तक का वक्त निकाल लिया जाए....तभी मिस्र की संसद और राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होने हैं...यानि सत्ता में बदलाव के लिए जो भी प्रक्रिया अभी शुरू की जाए, अमेरिका का दांव यही है कि उसकी कमान या तो मुबारक के हाथ में रहे या फिर उमर सुलेमान जैसे किसी और प्यादे के पास...

वैसे मिस्र या अरब वर्ल्ड के और देशों में सत्ता में बदलाव के लिए हो रही सुगबुगाहट से अकेला अमेरिका ही नहीं घबरा रहा...घबरा चीन जैसे देश भी रहे हैं...चीन थ्येन आन मन चौक के विद्रोह को भूला नहीं है...विरोध की ज़रा सी भी चिंगारी को चीन में हवा न मिले, इसलिए उसने तमाम वेबसाइट पर रोक लगा दी है...और तो और भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में भी सोनिया गांधी को कहने के लिए मजबूर होना पड़ा है कि सरकार और कांग्रेस जनता की आवाज़ की ताकत को समझें...सोनिया कांग्रेस में 64 साल से ऊपर के बुज़ुर्ग राजनेताओं को आराम करने की सलाह दे रही हैं या सरकार और पार्टी के नेताओं को भोग-विलासिता से दूर रह कर देश और देशवासियों की सेवा का संदेश दे रही हैं तो उसके मायने हैं...सोनिया जानती हैं कि सरकार भ्रष्टाचार, मंहगाई को लेकर जिस तरह अब निशाने पर हैं ऐसी साढ़े छह साल के कार्यकाल में पहले कभी नहीं रहीं...सोनिया की चिंता विरोधी दलों से ज़्यादा लोगों के आक्रोश को लेकर है...इसलिए वो छुपे शब्दों में सरकार और पार्टी के नेताओं को संभलने की नसीहत दे रही हैं...

स्लॉग कंट्रास्ट

जिस दिन काहिरा के तहरीर स्कवॉयर पर सत्ता में बदलाव की मांग को लेकर जनसैलाब उमड़ा ठीक उसी दिन भारत के सबसे बड़े सूबे यूपी के बरेली शहर में भी बेरोज़गार युवकों का हुजूम उमड़ा ...इंडो तिब्बत बार्डर पुलिस में ट्रेडमैन की महज़ 412 नौकरियों की भर्ती के लिए ढाई तीन लाख युवक बरेली में जुट गए...इस पद के लिए मात्र दसवीं पास होना ही ज़रूरी है...भर्ती के लिए रजिस्ट्रेशन शुरू न होने से नाराज़ इन युवकों ने अराजकता का जो तांडव किया वो पूरे देश ने देखा...ये संदेश था कि भीड़ जब बेकाबू हो जाए तो किस तरह के विध्वंस पर उतर आती है....आक्रोश फूटता है तो ये नहीं देखता कि क्या गलत है और क्या सही...बरेली से हिमगिरी एक्सप्रेस पर भेड़-बकरियों की तरह लौटते युवक शाहजहांपुर के पास हादसे का शिकार हो गए...हैवी वायर में फंसे हो या काठ के पुल पर टकराएं हो 17  युवकों की मौत हो गई...नौकरी के लिए जो युवक बरेली गए थे उनमें से अस्सी फीसदी से ज्यादा ग्रामीण इलाकों से थे...क्या ये सरकार की आर्थिक नीतियों का नतीजा नहीं कि आज ग्रामीण युवक खेती से नहीं जुड़ना चाहता...एक अदद नौकरी की तलाश में शहर में मारा-मारा फिरता है...दरअसल किसानों की बदहाली इन युवकों से भी छुपी नहीं है...

उद्योग और विदेशी निवेश की खातिर किसान, जंगल और आदिवासियों की ज़मीन का अधिग्रहण किया जा रहा है...ये विकास की लकीर भारत और इंडिया के फर्क को कम नहीं कर रही बल्कि और चौड़ा कर रही है...ऐसे मे जनाक्रोश सड़कों पर आंदोलन बनकर न फूटने लगे ये डर हमेशा सत्ताधारियों के दिल में बना रहता है...इसलिए नीतियां बेशक अमीरों को और अमीर बनाने वाली बनें लेकिन ज़ुबां पर हमेशा आम आदमी, किसान, गरीब-गुरबों की भलाई का राग ही रहता है...

मिस्र के संदेश को तानाशाह हुक्मरान ही न समझें बल्कि लोकतात्रिक देशों की वो सरकारें भी समझें जो एक बार चुनाव जीतने के बाद पूरे कार्यकाल के लिए खुद को सिक्योर समझ लेती है...राम मनोहर लोहिया के इन शब्दों को हर सरकार को याद रखना चाहिए...ज़िंदा कौमें पांच साल का इंतज़ार नहीं करती...

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

आप क्या हैं- गाजर, अंडा या कॉफ़ी...खुशदीप

आज के प्रोफेशनल माहौल में काम करना, वो भी परफार्मेंस के साथ कोई आसान काम नहीं है...ऐसी ही एक लड़की काम के प्रैशर से तनाव में थी...छुट्टी में मां के पास घर गई तो उसे अपनी हार्ड लाइफ के बारे में बताया...साथ ही कहा कि उसे समझ नहीं आ रहा कि हालात से कैसे काबू पाना है...बेहतर होगा नौकरी ही छोड़ दूं...रोज़ रोज़ चुनौतियों से जूझना-भिड़ना...एक समस्या से पार पाओ, दूसरी लगे हाथ तैयार...
ये सुनकर लड़की की मां उसे किचन में ले गई...वहां बर्नर पर पानी से भरे तीन पतीले चढ़ा दिए...साथ ही आंच तेज़ कर दी...तीनों पतीलों में पानी उबलने लगा...पहले पतीले में मां ने गाजरें डाली, दूसरे में अंडे और तीसरे में कॉफी की बींस...

बीस मिनट बाद मां ने बर्नर बंद कर दिए...पहले पतीले से गाजर निकाल कर एक कटोरे में डालीं...दूसरे कटोरे में अंडे और तीसरे में कॉफ़ी...फिर मां ने बेटी से पूछा, तुमने क्या देखा...लड़की ने जवाब दिया-गाजर, अंडे और कॉफ़ी...मां ने उसे पास बुलाकर गाजर को छूने के लिए कहा...लड़की ने गाजर को छू कर देखा, बहुत मुलायम लगी...   .

फिर मां ने एक अंडा लेकर उसका खोल तोड़ने को कहा...अंदर से सख्त उबला हुआ अंडा निकला...फिर मां ने कॉफी का एक सिप लेने को कहा...कॉफी की खुशबू ही तरोताजा कर देने वाली थी...लड़की के चेहरे पर मुस्कान आ गई और फिर मां से बोली...इस सब का क्या मतलब है...आखिर मुझे क्या बताना चाहती हैं...

मां ने बेटी के सिर को दुलारा और फिर बताना शुरू किया...इन तीनों चीज़ों के सामने समान कठिन चुनौती थी...और वो था खौलता पानी...तीनों ने अलग अलग ढंग से इसका सामना किया...गाजर उबलते पानी में जाने से पहले सख्त और झुकने वाली नहीं थी....लेकिन उबलते पानी में जाने के बाद न सिर्फ ये मुलायम हुई बल्कि कमज़ोर भी हो गई...अंडा उबलते पानी में जाने से पहले बड़ा नाज़ुक था...इसका बाहरी खोल ही इसके अंदर के द्रव को बचाता था...लेकिन उबलते पानी में रहने के बाद ये अंदर से सख्त हो गया...लेकिन इन सब में कॉफी की बीन्स सबसे अलग थीं, ये उबलते पानी में रहीं तो इन्होंने पानी का ही स्वरूप बदल दिया...

मां ने फिर बेटी से कहा, अब तुम खुद से ही सवाल कर के देखो... तुम इनमें से क्या हो...गाजर, अंडा या कॉफी बींस...अगर मुश्किल सामने आती है तो तुम कैसे उसका सामना करती हो...अब खुद ही सोचो...क्या गाजर की तरह हो...जो मजबूत लगती है, लेकिन दर्द और मुश्किल हालात में अपनी शक्ति खोकर टूटने को तैयार हो जाती है......या फिर वो अंडा जो पहले किसी के लिए भी धड़कने वाला नाजुक दिल रखता है लेकिन हालात की गर्मी उसे बदल देती है...ऊपरी खोल उबलने के बाद भी वैसा ही रहता है जैसा कि पहले था...लेकिन अंदर से अब सख्तजान और कठोर दिल वाला जो किसी दूसरे का दर्द देखकर नहीं पिघलता...


या तुम फिर कॉफी बींस हो...जो गर्म पानी को ही बदल देती है...पीड़ा देने वाले माहौल को ही सुखद बना देती है...जैसे जैसे पानी उबलता जाता है कॉफी बींस उसमें खुशबू और स्वाद घोलती जाती हैं...जब हालात विपरीत होते हैं, आप और निखरते हैं...फिर अपने आसपास सब बदल देते हैं...

रात जितनी ज़्यादा अंधियारी होती है, उसके बाद का सूरज उतना ही ज़्यादा चमकीला होता है...अब ये तुम्हे तय करना है कि चुनौतियों से गाजर, अंडा या कॉफी बींस में से क्या बनकर निपटना है...

सबसे ज्यादा खुश वो लोग नहीं होते जिनके पास दुनिया की हर बेहतरीन चीज़ होती है...दिल से खुश इनसान वही होते हैं जो ऊपर वाले से जैसा मिला है, उसी से बेहतर से बेहतर निकालते हैं और आसपास के माहौल को भी खुशनुमा बना देते हैं...

जब आप पैदा हुए, सिर्फ आप रो रहे थे, बाकी आपके सभी अपने मुस्कुरा रहे थे...
अपनी ज़िंदगी को इस तरह जिओ कि जब अंत आए तो केवल आप मुस्कुराओ, बाकी सब आपके लिए रोएं..

चलिए आज से हम सभी कॉफी बींस होने की कोशिश करें...


(ई-मेल से अनुवाद)

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

समीर-सागर के मोती...खुशदीप

कल की पोस्ट से आगे...
लता मंगेशकर का गायन...
ए आर रहमान का संगीत...
सचिन तेंदुलकर की बैटिंग...

ये जब लय में बहते हैं तो सब कुछ इनके साथ बहता है...एफर्टलेस...ऐसा लगता ही नहीं कि वो सर्वोत्तम देने के लिए कुछ प्रयास कर रहे हैं...यही बात गुरुदेव समीर लाल समीर जी के लेखन पर भी लागू होती है...पढ़ने वालों को तब तक साथ बहा कर ले जाते हैं, जब तक किताब या पोस्ट का आखिरी शब्द नहीं आ जाता...पढ़ने वाला यही सोचता रह जाता है कि बहती धारा रुक क्यों गई...धारा रुकती ज़रूर है लेकिन इस पर पूर्ण विराम नहीं लगता...ये सिर्फ मध्यांतर होता है...तब तक जब तक गुरुदेव की उंगलियों की जुम्बिश से कंप्यूटर के कैनवास पर कुछ और नहीं उकेर आता...

एक स्वामी प्रवचन देता है, गुरु उपदेश देता है...लेकिन ग्रहण करने वाले पर ज़ोर पड़ता है...समीर जी कुछ कहते हैं, तो ग्रहण करने वाले के अंदर वो सहजता के साथ समाता चला जाता है...हम अपनी जिस दिनचर्या को रुटीन, बोरिंग, थैंकलेस कह कर खारिज करते रहते हैं, समीर जी उसी दिनचर्या से लम्हों को उठा कर खास बना देते हैं...समीर जी की उपन्यासिका देख लूँ तो चलूँ को पढ़ने का मज़ा भी एक गो में ही है...क्योंकि इसमें रवानगी के साथ बहने में ही आनंद है...

हमें कोई नसीहत देता है, हम एक कान से सुनते हैं और दूसरे से निकाल देते हैं...क्यों...क्यों कि हम अपने से बड़ी तोप किसी को मानते ही नहीं...आखिर हम से बड़ा समझदार कौन ? लेकिन समीर जी जब कहते हैं तो तज़ुर्बे की ख़ान से निकले उनके शब्द सीधे दिल में उतर जाते हैं...बड़ी से बड़ी बात इतने सरल, निर्मल और सहज ढंग से कि पढ़ने या सुनने वाले को सागर से अमृत मंथन जैसा अनुभव होता है...

समीर जी के लेखन पर मेरे लिए कुछ कहना वैसा ही है जैसे कोई नादान सूरज के सामने दियासिलाई दिखाने की हिमाकत करे...लेकिन समीर जी व्यक्ति,समाज, देश, परदेस की खामियों पर अपनी मस्तमौला लेखनी से जिस तरह प्रहार करते हैं, वो पढ़ने वाले को शिद्दत के साथ सोचने पर ज़रूर मजबूर करती हैं...समीर जी की उपन्यासिका से ली गई इस तरह की बानगियां ही यहां आपको दिखाता हूं...मसलन...

परदेस में रहने वाले भारतवंशी जब आपस में मिलते हैं तो अपनी जड़ों को याद करते हुए ऐसा दर्द ज़ुबां से उढ़ेलते हैं कि हर किसी की आंख नम हो जाती है...समीर जी यहां शब्दों की गहरी चोट करते हुए कहते हैं- जड़ों का दर्द, जड़ों का दर्द, मानो गलती इनकी न होकर जड़ की हो जो विदेश में जा बसी हो और इन बेचारे कविमना को वहीं छोड़ गई हो...


परदेस में बेबीसिटिंग के लिए दस डॉलर प्रति घंटा खर्च करने पड़ते हैं...बेटा-बहू नौकरी के लिए दिन में दस घंटे बाहर... ऐसे में अम्मा-बाबूजी को 24घंटे की सेवा में बुलाना और साथ रखना हमेशा ही दिख जाता है, बहू भी हीरा जैसी मिली है...फोन पर कहती रहती है-अम्मा जल्दी आओ, तुम्हारी बहुत याद आ रही है...अब दिन-भर अम्मा-बाबू जी बच्चे की देखभाल करें, नहलाएं, धुलाएं, खिलाएं और सुलाएं...बहू-बेटे की पौ-बारह...अम्मा के हाथ का बना खाना, नाश्ता और टिफिन...और क्या चाहिए...


या भारत में रह रहे पिता शिवदत्त और मां कांति का दर्द, जिनका इकलौता बेटा संजू विदेश में नौकरी के साथ अपने परिवार में मगन है...अब हर रात शिवदत्त और कांति किस तरह संजू की बातों में गुज़ारते हैं, इस पर समीर जी की लेखनी पढ़ने वालों का कलेजा चीर देने की ताकत रखती है...


विदेश जाने की ललक भारतीयों में कूट-कूट कर भरी होती है...भले ही भारत में आराम से कट रही हो लेकिन दूर के ढोल तो सुहाने ही नज़र आते हैं...समीर जी उपन्यासिका में एक जगह कहते हैं-भले ही कितनी मेहनत करनी पड़े, नए नए कोर्स करने पड़ें, अपना प्रोफेशन छोड़कर दूसरा काम करना पड़े, अपना नाम खो देना पड़े, मगर आना ज़रूर...हम मना नहीं करेंगे...हम मना भी करेंगे तो तुम मानोगे कहां...


परदेस में किसी पार्टी में गोरा या गोरी भी आमंत्रित हो और वो आकर नमास्टे कह दे तो फिर देखिए तमाशा...सभी करीब करीब चरण स्पर्श की मुद्रा में कहते नज़र आएंगे, ओह हाऊ डू यू डू नो हिंदी...गोरा/गोरी भी मटकते हुए बोलेगा/बोलेगी...आई नो डेलही, आई विश, आई कुड गो देयर वन डे...ए वंडरफुल कंट्री टू विज़िट...बस इसके बाद तो आमंत्रणों की बौछार शुरू...आप हमारे साथ कभी चलिएगा...अकेले मत जाना...और शुरू हिंदुस्तान की मटियामेट कि अकेले देखकर आपको लूट लेंगे...टैक्सी वाला घुमाता रहेगा...आपके पैसे लूट जाएंगे...मगर हम साथ रहेंगे तो हमें आता है कि कौन कहां लूट रहा है, उससे बचाना...


समीर जी की उपन्यासिका में ही आपको इस सवाल का जवाब मिलेगा कि वानप्रस्थ में पहुंचने के बाद पैसा खर्च कर आर्ट ऑफ लिविंग सीखने की जगह बिना कुछ खर्च किए तज़ुर्बे के निचोड़ से आर्ट ऑफ डाइंग सीखना ही क्यों श्रेयस्कर है...


देख लूँ तो चलूँ के समीर-सागर में ऐसे ही मोती भरे पड़े हैं, बस ज़रूरत है गोता लगाकर उन तक पहुंचने की...